अभ्यास प्रश्न - जाॅर्ज पंचम की नाक Class 10 Notes | EduRev

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Class 10 : अभ्यास प्रश्न - जाॅर्ज पंचम की नाक Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1. रानी एलिज़ाबेथ के आने की खबर से भारतीय अखबारों में क्या-क्या छप रहा था ?
उत्तरः (क) रानी ने हल्के नीले रंग का सूट बनवाया है जिसका रेशमी कपड़ा हिन्दुस्तान से मँगवाया।
(ख) सौ पौंड का खर्चा आना।
(ग) रानी एलिज़ाबेथ की जन्म-पत्री छपना।
(घ) प्रिंस फिलिप के कारनामे छपना। नौकरों, बाबरचियों, खानसामों, अंगरक्षकों की पूरी-पूरी जीवनियाँ छपना।
(ङ) यहाँ तक कि शाही महल में रहने वाले, पलने वाले कुत्तों की तस्वीरों का अख़बारों में छपना।

प्रश्न 2. रानी ऐलिज़ाबेथ के दर्जी की परेशानी का क्या कारण था ? उसकी परेशानी को आप किस तरह तर्क-संगत ठहराएँगे ?
उत्तरः रानी ऐलिज़ाबेथ के दर्जी की परेशानी का कारण यह था कि जब रानी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर जाएँगी तो उस समय वह क्या पहनेंगी ? उसकी परेशानी को इस आधार पर तर्कसंगत ठहराया जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने काम की प्रशंसा चाहता है। वह चाहता है कि उसके कार्य को लोग देखें और सराहें। यदि उसके कार्य को भारतीय उपमहाद्वीप में सराहा जाएगा तो राज परिवार में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और उसके वेतन में भी वृद्धि होगी।

प्रश्न 3. ”और देखते ही देखते नई दिल्ली की काया पलट होने लगी“ नई दिल्ली के काया पलट के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए
उत्तरः नई दिल्ली का कायापलट करने के लिए सभी मुख्य इमारतों की मरम्मत की गई होगी तथा उन्हें रँगा जा रहा होगा। सड़कों को पानी से धोया जा रहा होगा तथा वहाँ रोशनी की व्यवस्था की गई होगी। रास्तों पर दोनों देशों के झंडे लगाए गए होंगे। गरीबों को सड़कों के किनारे से हटाया गया होगा। दर्शनीय स्थानों की सजावट की गई होगी। रानी की सुरक्षा के कड़े प्रबन्ध किए गए होंगे। सरकारी और अर्द्धसरकारी भवनों की रंगाई-पुताई की गई होगी। मुख्य मार्गों के किनारे के पेड़ों की कटाई-छँटाई की गई होगी। जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए गए होंगे। सरकारी भवनों पर दोनों देशों के ध्वज लगाए गए होंगे।

प्रश्न 4. सरकारी तंत्र में जाॅर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह उनकी किस मानसिकता को दर्शाती है ?
उत्तरः सरकारी तंत्र में जाॅर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है, वह उनकी गुलाम एवं चाटुकारिता पूर्ण मानसिकता को दर्शाती है। हमें स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए लगभग 65 वर्ष हो चुके हैं फिर भी नाक लगाने का कार्य अनिवार्य माना गया अन्यथा दिल्ली आने पर रानी एलिजाबेथ नाराज़ हो जाएँगी। सरकार का हर कार्य केवल खानापूर्ति के लिए था न कि कत्र्तव्य बोध के लिए। स्वतंत्र होने के बावजूद भी भारतीय सरकार विदेशी उच्चाधिकारियों को नाराज़ नहीं करना चाहती थी। यह घटना भारतीयों की गुलामी की मानसिकता अब भी बरक़रार है, इस बात का द्योतक है। सरकारी तंत्र उस अंग्रेज अधिकारी जार्ज पंचम की नाक लगाने के लिए चिंतित है, जिन्होंने हम पर विभिन्न अत्याचार किए थे।

प्रश्न 5. ‘जाॅर्ज पंचम की नाक’ पाठ के आधार पर बताइए कि जाॅर्ज पंचम की नाक हमारे देश के किन-किन नेताओं की नाक से माप में हर प्रकार छोटी निकली थी? इन नेताओं के अनुकरणीय जीवन मूल्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः जब मूर्तिकार को जार्ज पंचम की नाक के लिए समान पत्थर नहीं मिला तो वह हुक्मरानों की सलाह पर जार्ज पंचम की नाक की नाप लेकर संपूर्ण देश के दौरे पर निकल पड़ा। अपने इस दौरे में वह पहले दिल्ली से मुम्बई (बम्बई) पहुॅंचा, वहाॅं जाकर दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी आदि की नाकें टटोलीं। फिर वहाॅं से गुजरात गया। गुजरात पहुॅंचकर उसने गाॅंधी, पटेल, महादेव देसाई की नाकों की माप ली। यहाॅं से भी निराश होकर वह बंगाल गया और रवींद्रनाथ, सुभाष, राजाराममोहन राय की नाकें टटोलीं।
यहाॅं तक कि उसने बिहार जाकर शहीद हुए बच्चों तक की नाकों की माप ली उनकी भी नाक जार्ज पंचम की नाक से बड़ी निकली। हताश होकर उसने उत्तर प्रदेश पहुॅंचकर चन्द्रशेखर आजाद, बिस्मिल, मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय की नाकें मापीं। उसने मद्रास में सत्यमूर्ति की नाक का भी माप लिया। मैसूर, केरल प्रांतों का दौरा करता हुआ मूर्तिकार पंजाब जा पहुॅंचा और वहाॅं जाकर उसने लाला लाजपत राय, भगतसिंह की लाटों को टटोला, किन्तु सभी जगह उसे निराशा ही हाथ लगी, सभी शहीद देशभक्तों की नाक जार्ज पंचम की नाक से बड़ी निकली। हमारे देश के देशभक्तों एवं शहीदों मे देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। इनके जीवन के मूल्य अनुकरणीय हैं, जो निम्न प्रकार है-
(i) देशभक्ति की प्रबलता,
(ii) स्वावलंबन,
(iii) आत्मनिर्भरता,
(iv) राष्ट्र के स्वाभिमान का ध्यान,
(v) गुलामी की मानसिकता का त्याग,
(vi) राष्ट्र की पुकार में शामिल,
(vii) दृढ़ निश्चय,
(viii) राष्ट्रहित की सर्वोपरि समझ।
ये समस्त मूल्य अनुकरण करने योग्य हैं। हमें अपने शहीदों का सदैव सम्मान करना चाहिए जिनके कारण हमें यह आज़ादी प्राप्त हुई है।

प्रश्न 6. ‘जाॅर्ज पंचम की नाक’ पाठ में वर्णित खोई हुई नाक से गुजरात के किन-किन महापुरुषों की नाक बड़ी निकली ? आप इस कथन के द्वारा कौन-सा भाव ग्रहण करते हैं तथा यह व्यंग्य राष्ट्र, के प्रति लेखक की किस भावना का परिचायक है?
उत्तरः महात्मा गाॅंधी, सरदार पटेल, विट्ठल भाई पटेल, महादेव देसाई जो भारत को आजाद करके देश की प्रतिष्ठा को कायम कर सके। वस्तुतः यह कथन कि इन महापुरुषों की नाक जाॅर्ज पंचम की नाक से बड़ी थी इस बात का द्योतक है कि हमारे ये नेता जाॅर्ज पंचम से हमारे लिये अधिक सम्मानित हैं। हम विदेशी लोगों के गीत अभी भी गाएँ तो यह उपयुक्त नहीं है। यह पाठ लेखक के द्वारा देश के स्वाभिमान के प्रति संवेदनशील होने का परिचायक है।

प्रश्न 7. नाक मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है। यह बात पूरी व्यंग्य रचना में किस तरह उभरकर आई हैं? लिखिए।
अथवा
‘नाक’ शब्द का प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि खोजने पर जाॅर्ज पंचम की नाक भारत के सभी नेताओं की नाक के सामने कैसी दिखी? इस तुलना में निहित व्यंग्य को समझाकर स्पष्ट कीजिए। इस प्रसंग से अपने मन में उदित भावों को व्यक्त कीजिए।
उत्तरः नाक सदा से ही मान-सम्मान एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। इसी नाक को विषय बनाकर लेखक ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश की सरकारी व्यवस्था, मंत्रियों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों की गुलाम मानसिकता पर करारा प्रहार किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष में अंग्रेजों की करारी हार को उनकी नाक कटने का प्रतीक माना, तदापि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारत में स्थान-स्थान पर अंग्रेजी शासकों की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो स्वतंत्र भारत में हमारी गुलाम या परतंत्र मानसिकता को दिखाती है।
जाॅर्ज पंचम की मूर्ति की नाक एकाएक गायब होने की खबर ने सरकारी महकमों की रातों की नींद उड़ा दी। सरकारी महकमें रानी एलिजाबेथ के आगमन से पूर्व किसी भी तरह जार्ज पंचम की नाक लगवाने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी प्रयास में वह देश के महान देशभक्तों एवं शहीदों की नाक तक को उतार लाने का आदेश दे देते हैं, किन्तु उन सभी की नाक जार्ज पंचम की नाक से बड़ी निकली, यहाॅं तक कि बिहार में शहीद बच्चों तक की नाक जार्ज पंचम से बड़ी निकलती है। इस प्रकार देश के शहीदों के सम्मान के लिए भी ‘नाक’ शब्द का प्रयोग लेखक ने किया है, और उन सभी की नाक को जाॅर्ज पंचम की नाक से बड़ा बताया है।

प्रश्न 8. ‘जाॅर्ज पंचम की नाक’ पर किसी भी भारतीय नेता, यहाँ तक कि भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करना चाहता है?
उत्तरः
जाॅर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने निम्नलिखित यत्न किए-
(i) मूर्तिकार ने जार्ज पंचम की मूर्ति की नाक के पत्थर की किस्म का पता लगाने के लिए प्रयास किया।
(ii) पत्थर की किस्म का ठीक से पता न चलने पर उसने हिन्दुस्तान के प्रत्येक पहाड़ी प्रदेश और हर एक पहाड़ पर जाकर ऐसा ही पत्थर खोजने की कोशिश की।
(iii) मूर्तिकार भारतीय नेताओं की मूर्तियाँ देखने के लिए देश में चप्पे-चप्पे पर घूमा ताकि उनकी नाक को काटकर लाट पर लगाया जा सके।
(iv) उसने बिहार सेक्रेटेरिएट के सामने सन् बयालीस में शहीद होने वाले बच्चों की मूर्तियों की नाकों को भी देखा।
(v) अन्त में उसने जिंदा व्यक्ति की नाक काटकर जार्ज पंचम की लाट पर लगा दी।

प्रश्न 9. जाॅर्ज पंचम की नाक सम्बन्धी लम्बी दास्तान को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः (क) सरकारी तंत्र के खोखलेपन तथा अवसरवादिता को अत्यंत प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करना। यह लेख भारत के अधिकारियों की स्वाभिमान शून्यता पर करारा व्यंग्य है जो अभी भी मानसिक रूप से ग़ुलाम हैं।
(ख) इंडिया गेट के सामने वाली जाॅर्ज पंचम की लाट से उसकी नाक गायब हो जाना, वह भी तब जब इंग्लैण्ड से महारानी एलिज़ाबेथ और प्रिंस फिलिप का भारत भ्रमण पर आना। एक गंभीर समस्या।
(ग) मूर्ति पर नाक लगवाने के लिए गम्भीरतापूर्वक प्रयास करना जिसके लिए मूर्तिकार को बुलाना, फाइलों में मूर्ति के पत्थर से सम्बन्धित जानकारी ढुँढ़वाना, मूर्तिकार द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों और खानों का दौरा करना, महापुरुषों तथा स्वाधीनता सेनानियों की मूर्तियों की नाकों का नाप लेना-एक लम्बी दास्तान जिसकी परिणति एक जिंदा व्यक्ति की नाक लगाए जाने से होती है।

प्रश्न 10. आज की पत्रकारिता आम जनता विशेषकर युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव डालती है ?
उत्तरः आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान सम्बन्धी आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा है। इस तरह की पत्रकारिता से आम जनता तथा युवा पीढ़ी प्रभावित होने लगती है। यदि ख्याति प्राप्त व्यक्ति का चरित्र अच्छा है तब तो ये अच्छी बात है। अन्यथा इससे समाज का संतुलन बिगड़ने और आदर्शों को नुकसान पहुँचने का डर रहता है। इस तरह की पत्रकारिता युवा पीढ़ी को भ्रमित एवं कुंठित करती है। युवा पीढ़ी देश की रीढ़ है, उसके कमज़ोर होने से देश कहाँ जाएगा। युवा पत्र-पत्रिकाओं को पढ़कर चर्चित हस्तियों के खान-पान एवं पहनावे को अपनाने पर मजबूर हो जाती है। अपनी इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए उचित-अनुचित मार्ग अपनाने में भी संकोच नहीं करती। इससे दिखावा, बनावटीपन और हिंसा आदि बढ़ती है, क्योंकि पत्रकारिता दबंग और अपराधी छवि वाले व्यक्तियों को नायक की तरह प्रस्तुत करती है।

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