अर्थव्यवस्था - संगम युग, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : अर्थव्यवस्था - संगम युग, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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क्षेत्र भौगोलिक लक्षण निवासी व्यवसाय
कुरिंजी पर्वतीय और वन आखेटक और संग्रहक    आखेट, भोजन संग्रहण, काटना 
  (कुरवर और वेटर) जलाना और खेती
मुहल्लै  चारागाह, कम ऊँची 
 पहाड़ियाँ और छितरे वन
चरवाहे  (अयर और इटयर)पशुपालन, झूम कृषि
मरुतम नदी घाटियाँ और मैदान किसान (उषवर और  
वेल्लावर)
कृषि, जुताई
नेयतल 
 
समुद्रतट 
मछुआरे (परतवर) 
मछली पकड़ना, मोती के लिए  
 गोता लगाना, नमक बनाना

पल्लई 

शुष्क क्षेत्र, ग्रीष्म   
 ऋतु में पहाड़ी क्षेत्रों 
डाकू (एनियर, मरवर)राहजनी, डकैती और आखेट

 

अर्थव्यवस्था
 

  •  राज्यों की आधारशिला कृषि पर टिकी थी।
  • संगम साहित्य के अनुसार दक्षिण भारत की भूमि बहुत उपजाऊ थी। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि एक हाथी के बैठने में जितनी भूमि घिरती है उतने में सात आदमियों के खाने लायक अन्न पैदा होता था।
  • कृषि से प्राप्त राजस्व राज्य की आय का मूल स्रोत था। इसी आय की बदौलत से राज्य स्थायी सेना रखने में समर्थ था।
  • जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की वस्तुएँ राज्यों के अंतर्गत ही उत्पादित होती थीं।
  • वस्त्र उद्योग, गृह-निर्माण, शहरों के निर्माण की योजना, सैनिक अस्त्र - शस्त्र आदि मुख्य उद्योग-धंधे थे।
  • प्रमुख शहर पुहर, उरैयुर, वांजि, टोंडी, मुजिरी, मदुरई, काँची आदि अधिकांश उद्योग-धंधों के केन्द्र थे।
  • विदेशी बाजारों की माँगों के फलस्वरूप नौ- परिवहन और सहायक उद्योग-धंधे, बंदरगाह निर्माण और भंडारगृह निर्माण चरमोत्कर्ष पर था। बाजारों को अवनम के नाम से जाना जाता था।
  • कृषि की मुख्य फसल धान थी। साथ में ज्वार, बाजरा और अन्य प्रकार के अनाज भी पैदा किए जाते थे।
  • स्वदेशीय उद्योग के विकास की सीमा इस बात से इंगित होती है कि अनेक राज्यों ने नई तकनीक की जानकारी के लिए विदेशी लोगों को भी आमंत्रित किया था।
  • कृषि, नौ-परिवहन और सहायक उद्योगों के बाद हस्तकारी मुख्य उद्योग था।
  • रस्सी बुनना, चमड़े का कवच (युद्ध में सुरक्षा के लिए) तैयार करना, सीपी और हाथीदाँत की वस्तुएँ तैयार करना तथा चूड़ी तैयार करना आदि प्रमुख हस्तकारी उद्योग-धंधे थे। इन उद्योगों में महिलाओं का अच्छा खासा योगदान रहता था।
  • अधिकांश व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली के अंतर्गत होता था। धान इसमें प्रमुख विनिमय का स्रोत था।
  • बड़े शहरों में व्यवस्थित बाजार अंगड़ी के नाम से जाने जाते थे।
  • व्यापारी वर्ग प्रायः एक संस्था के तहत कार्य करते थे।


विदेशी व्यापार

  • तमिलहम शुरू से ही विदेशी व्यापार में संलग्न रहा।
  • विदेशी व्यापार में मसालों की प्रधानता होती थी। तत्पश्चात् हाथी दाँत, मोती, मूँगा, सीपी आदि की बनी वस्तुओं की माँग विदेशों में बराबर बनी रहती थी।
  • अगस्टस के जमाने के रोमन सिक्कों की प्राप्ति ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि तमिलहम और रोम के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता था।
  • तमिलहम, रोम और अरबी देशों के बीच सीधा सम्पर्क ‘पेरिप्लस आॅफ द एरिथ्रियन सी’ के जमाने से ही था।
  • रोम के साथ व्यापार इतना आकर्षक था कि पाण्ड्य राजा ने दो राजदूत 20 ई. पू. में अगस्टस के दरबार में उसे खुश करने के लिए भेजा था।


सामाजिक स्थिति

  • संगम साहित्य का अध्ययन हमें इस बात की ओर आकृष्ट करता है कि वह काल उत्तरी और दक्षिणी भारत के सांस्कृतिक तत्त्वों के समन्वय का काल था।
  • वैदिक संस्कृति के प्रचलन के कारण राजदरबारों में ब्राह्मणों तथा पुरोहितों की पर्याप्त प्रतिष्ठा होने लगी थी।
  • राजदरबारों में कवि के रूप में भी ब्राह्मणों का आदर था। वे राजाओं से स्वर्ण मुद्राएँ, भूमि, रथ, घोड़े, तथा हाथी भी प्राप्त करते थे।
  • पट्टिनप्पालई के रचयिता को चोल राजा करिकाल ने 16,00,000 सोने की मुद्राएँ प्रदान की थी।
  • संगमकालीन कवियों ने ब्राह्मणों को माँस और मदिरा का सेवन करते हुए चित्रित किया है। इससे ऐसा ज्ञात होता है कि उस काल में इससे कोई सामाजिक अपयश का भागी नहीं बनता था।
  • इन बातों से पता चलता है कि ब्राह्मणों को शासन में हिस्सा मिलने लगा था। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय पुरोहितों का समाज में वर्चस्व नहीं था।
  • ब्राह्मणों के अतिरिक्त अनेक वर्गों का उल्लेख मिलता है किन्तु दक्षिण में उत्तर भारत के समान चार वर्णों की धारणा विकसित नहीं हुई थी।
  • सभी राजा पेशेवर सैनिकों की सेना रखते थे जिनम वेलालर लोगों का काफी महत्त्व था। ये लोग संपन्न किसान थे फिर भी युद्ध में भाग लेते थे।
  • वेलालर वर्ग के लोग अन्य सरकारी पदों पर भी नियुक्त होते थे। चोल राज्य में इनकी उपाधि वेल और अरशु तथा पाण्ड्य राज्य में कविंदी थी।
  • वेलालर के प्रमुखों को वेलिर के नाम से संबोधित किया जाता था। विद्वानों ने काले व लाल मिट्टी के बर्तनों और लोहे के आविर्भाव का श्रेय इन्हीं वेलिर लोगों को दिया है।
  • वेलिर कृषि भूमि के बड़े भाग के स्वामी थे। आर. चम्पकलक्ष्मी के अनुसार वेल्वि का अर्थ कोई रीति-विधान हो सकता है, जिसका अनुष्ठान भूमि अधिकारों से संबंधित था।
  • वेलालर दो वर्गों में बँटे थे - एक धनाढ्य और दूसरा खेतिहर मजदूर वर्ग।
  • धनी वेलालरों की नियुक्ति ही राज्य के उच्च पदों पर होती थी। इनका शादी-संबंध भी राजपरिवारों से होता था।
  • निर्धन वेलालर स्वयं अपने श्रम से ही खेती करते थे।
  • शहरो में अनेक व्यावसायिक वर्ग निवास करते थे। तोल्काप्पियम में इसे वैसिगस के नाम से संबोधित किया गया है।
  • पुलैयन नामक जाति रस्सी की चारपाई बनाने के काम में लगी थी।
  • चरवारों का अलग वर्ग था। पशुपालन ही इनके जीवन-यापन का मुख्य स्रोत था।
  • तमिलहम की उत्तरी सीमा पर मलवर नाम के लोग रहते थे जिनका मुख्य पेशा डाका डालना था।
  • बधिकों की एक जाति एनियर थी जिनके घरों में बड़ी संख्या में धनुष तथा ढाल रहते थे।
  • संगम कवियों ने एक और जनजाति का उल्लेख किया है जिसे मरवा के नाम से जाना जाता है। इनका मुख्य पेशा पशुओं की चोरी या लूट था जिसे वेत्ची (गोहरण) प्रथा कहा गया है।
  • पहाड़ के ढलानों पर स्थित पशुहरण में कुशल और लड़ाकू मरवा जाति तथा मैदान के शांतिप्रिय पशुपालक लोगों के बीच संघर्ष संगम काल के दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग प्रतीत होता है।
  • मरवा जाति के लोग राजा के साथ युद्ध में भी भाग लेते थे। अपने स्वामी तथा गाँव वालों के लिए युद्ध करना कबीले के नेता अपना कुल धर्म समझते थे।
  • युद्ध में जिस स्थल पर इनकी मृत्यु होती थी वहाँ उस नायक के सम्मान में पत्थर लगाया जाता था।
  • ये लोग तमिल सेना में उच्च स्थान पाते थे।
  • ब्राह्मण धर्म के उच्च आदर्शों के प्रति इनका कोई विशेष लगाव दृष्टिगोचर नहीं होता।
  • संगम कवियों के वर्णन से स्पष्ट है कि चेर, चोल, पाण्ड्य तथा दक्षिण के अन्य छोटे राज्यों के अंतर्गत जिस सामाजिक ढांचे में ब्राह्मण संस्कृति की नैतिकता तथा उच्च आदर्श स्थापित थे, उसी में जनजातीय रीति-रिवाज तथा जीवन-मूल्य भी प्रतिष्ठित थे।
  • स्वदेशीय उद्योग के विकास की सीमा इस बात से इंगित होती है कि अनेक राज्यों ने नई तकनीक की जानकारी के लिए विदेशी लोगों को भी आमंत्रित किया था।
  • कृषि, नौ-परिवहन और सहायक उद्योगों के बाद हस्तकारी मुख्य उद्योग था।
  • रस्सी बुनना, चमड़े का कवच (युद्ध में सुरक्षा के लिए) तैयार करना, सीपी और हाथीदाँत की वस्तुएँ तैयार करना तथा चूड़ी तैयार करना आदि प्रमुख हस्तकारी उद्योग-धंधे थे। इन उद्योगों में महिलाओं का अच्छा खासा योगदान रहता था।
  • अधिकांश व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली के अंतर्गत होता था। धान इसमें प्रमुख विनिमय का स्रोत था।
  • बड़े शहरों में व्यवस्थित बाजार अंगड़ी के नाम से जाने जाते थे।
  • व्यापारी वर्ग प्रायः एक संस्था के तहत कार्य करते थे।
राजस्व
करई भू-कर, जो राज्य के आय का मुख्य स्रोत था (उपज का छठा हिस्सा)
इरई सामंतों द्वारा दिया जाने वाला कर और युद्ध से लूटे हुए माल का हिस्सा
उल्गू या सुंगम सीमा शुल्क और राहदारी
कडमई या पडुवडु राजा के प्रति समर्पित कत्र्तव्य
इरडू जबरन लिया जाने वाला उपहार
वरियम क्षेत्र की उपज के हिसाब से लिया जाना वाला कर जिसे वरियर नामक कर्मचारी वसूलता था

 

  • मूलतः सैनिक महत्त्व के कारण जनजातीय लोगों ने संगम काल के राजनीतिक और सामाजिक जीवन को अनेक ढंगों से प्रभावित किया।
  • इस काल में पुरुषों का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था और महिलाओं की सामाजिक स्थित अच्छी नहीं थी।
  • औरत अपने पतियों के युद्ध के मैदान में खेत आने पर हरी सब्जी तक खाना बंद कर देती थीं। उन्हें ठंडे पानी से नहाना भी बंद कर देना पड़ता था।
  • बहुत सारी विधवा अपने बाल मुड़वा लेती थीं और बदन के सभी गहनों और शंृगार-सामग्रियों को अपने से दूर कर देती थीं। उन्हें बाद के जीवन में सादे भोजन पर निर्भर रहना होता था।
  • कदाचित् इन्हीं बातों के मद्देनजर अधिकांश महिलाएँ अपने पति के साथ जलकर सती कहलाना पसंद करती थीं।
  • कृषि और उद्योग की अभिवृद्धि तथा व्यापार की उन्नति के बावजूद तत्कालीन समाज में आर्थिक विषमता स्पष्ट रूप से था।
  • नगरों में धनी लोग ऊपरी मंजिल में रहते थे और नीचे का भाग व्यापार के प्रयोग में आता था। इनके मकान ईंट और गारे के बने होते थे।
  • निर्धन लोगों के घर कच्चे होते थे और जनजातीय आबादी झोपड़ियों में रहती थी।
  • धनी लोगों के मकानों के कमरों में चित्रकारी का कमाल भी देखने को मिलता था।
  • अमीरों के मुख्य मंनोरंजन के साधन संगीत और गीत हुआ करते थे। वे नृत्य का भी आनन्द उठाते थे।
  • उस समय का नृत्य और संगीत काफी विकसित अवस्था में था। संगम कृतियों में अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र यथा यल और नगाड़े की चर्चा मिलती है।
  • बहुतेरे खेलों और आमोद-प्रमोद के साधनों के अतिरिक्त कुत्ते और खरगोश का शिकार, कुश्ती और मुक्केबाजी आदि का भी उल्लेख मिलता है।
  • वृद्धजन शतरंज खेलते थे जबकि महिलाएँ और लड़कियाँ गेंद और गोली खेलती थीं।
  • ज्योतिष और सगुन में लोगों का विश्वास गहरा था। बाल मुड़वाई महिलाएँ बुरे सगुन की द्योतक थीं।
  • केले के पेड़ों में ईश्वर का निवास माना जाता था तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहणों को साँप द्वारा सूर्य और चन्द्र को निगलने के अर्थ में लिया जाता था।
  • शवोत्सर्ग की कोई निश्चित विधि नहीं थी। दाहकर्म और दफनाने की प्रथाएं साथ-साथ मौजूद थीं।
  • संगमकालीन तमिल व्याकरण ग्रंथ तोल्काप्पियम के अनुसार विवाह को एक संस्कार के रूप में आर्यों द्वारा स्थापित किया गया।
  • धर्मशास्त्रों में व्यवस्थित आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख तोल्काप्पियम में भी है।
  • तमिल प्रदेश में स्त्री तथा पुरुष के सहज प्रणय तथा उसकी अभिव्यक्तियों को पाँच तिणई कहा गया है।
  • तमिल परंपरा में एकपक्षीय प्रणय को कैक्किड़ई तथा औचित्यहीन प्रणय को पेरुन्दिणई कहते थे।
स्मरणीय तथ्य
  • संगम साहित्य में पुहार के जिस महान मेला का वर्णन मिलता है, उसका आयोजन मुरुगन देवता के सम्मान में किया जाता था।
  • ब्राह्मणों का प्रभाव तमिल समाज के उच्च लोगों तक सीमित था।
  • राजा वैदिक यज्ञ करते थे।
  • तृतीय संगम में भाग लेने वाले महत्वपूर्ण साहित्यिक हस्ती थे - सत्तनार, उग्र, नक्किरार तथा कपिलार।
  • संगम काल में वंशानुगत राजतंत्र प्रणाली थी; चक्रवर्ती राजा बनने की महत्वाकांक्षा राजाओं में व्याप्त थी; युवराज को मोहन कहा जाता था।
  • प्रचलित परंपरा, विद्वानों की सलाह, मंत्रियों का आकस्मिक विद्रोह आदि तत्व संगमकालीन राजाओं पर अंकुश का काम करता था।
  • सेना परंपरागत रूप से रथवाहक, हस्ति सेना, घुड़सवार तथा पैदल सेना के रूप में चार भागों में विभाजित थी।
  • सेनापति को ‘एनाडी’ की उपाधि दी जाती थी।
  • युद्धक्षेत्र में मृत्यु को स्वर्ग में स्थान प्राप्त करने का साधन माना जाता था।
  • ग्रीक-रोमन व्यापारिक विवरण तथा संगम साहित्य के बीच समानता और श्रीलंका के राजा गजबाहु प्रथम का चेर राजा शेनगुट्ट¨वन का समकालीन होने के आधार पर संगम साहित्य का रचना काल प्रथम शताब्दी ई. से लेकर तीसरी शताब्दी ई. तक माना जाता है।


 

धार्मिक जीवन

  • संगमकालीन दक्षिण भारत का धार्मिक जीवन मुख्यतः कर्मकांडों और आध्यात्मिक विचारों का समन्वय था। यद्यपि इसमें कहीं-कहीं एकरूपता का अभाव झलकता है।
  • दक्षिण भारत पर वैदिक धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा। कुछ यज्ञों तथा कर्मकांडों का वैदिक रूप ज्यों-का-त्यों बना रहा किन्तु इस काल के अनेक धार्मिक कृत्य, विश्वास तथा उपासना पद्धति में दक्षिण की प्राचीन परंपरा का समन्वय भी हुआ।
  • वैदिक मत को मानने वाले ब्राह्मणों का प्रायः विरोधी संप्रदाय के लोगों से वाद-विवाद होता था। संभवतः यह विरोधी संप्रदाय बौद्ध धर्म वालों का था।
  • दक्षिण भारत में मुरुगन या मुरुकन की उपासना सबसे प्राचीन थी। बाद में मुरुगन का नाम सुब्रह्मण्य भी मिलता है और स्कंद-कार्तिकेय से इस देवता का एकीकरण होता है।
  • आदिच्चनल्लूर से प्राप्त शव-कलश के साथ मिलने वाले काँसे के कुक्कुट (मुरुगन का प्रतीक अर्थात् मुर्गा), लोहे के बर्छे तथा स्वर्णपन के मुखखंड यह संकेत करते हैं कि मुरुगन की उपासना प्रागैतिहासिक काल से ही किसी-न-किसी रूप में प्रचलित रही।
  • मुरुगन की उपासना में वेलनाडल नामक उल्लासमय नृत्य वह पुजारी आत्मविभोर होकर करता था, जिसके सर पर वेलन (मुरुगन) आकर बैठ जाता था।
  • धार्मिक कृत्यों और अनुष्ठानों में गायन और नृत्य का प्रचलन था।
  • बहेलिया जाति के लोग कोर्रलई की और पशुचारण जाति के लोग कृष्ण की नृत्य और गायन के साथ उपासना करते थे।
  • पुहर के वार्षिक उत्सव में इंद्र की भी विशेष प्रकार की पूजा होती थी।
  • संगम काल में दक्षिण भारत में उत्तर भारत की ही भाँति अनेक ग्रामदेवताओं की आराधना होती थी। इन देवताओं के लिए मुर्गे, भेड़ और भैंस की बलि दी जाती थी।
  • बिशप ह्नाइटहैड के अनुसार आदिम जीववाद के बाद पशुचारण जीवन-पद्धति की प्रधानता होने पर टोटम आदि पर भी विश्वास दृढ़ होता गया।
  • शिव, अर्द्धनारीश्वर, अनंतशायी विष्णु, कृष्ण, बलराम आदि की उपासना भी बाद में काफी लोकप्रिय हुई।
  • मणिमेकलई में कापालिक शैव संन्यासियों की चर्चा हुई है।
  • संगमकालीन लोग कर्म, पुनर्जन्म और भाग्यवाद पर भी विश्वास करते थे।
  • अशोक के अभिलेख हमें दक्षिण में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के बारे में जानकारी देते हैं।
  • दक्षिण में बौद्ध धर्म के प्रचार और विकास का प्रमाण हमें पश्चिमी घाट के पर्वतों पर पत्थर काटकर बनाए गए चैत्यों तथा विहारों के भव्य अवशेष से भी प्राप्त होता है। ऐसे निर्माण दक्षिण से लेकर पूना के निकट तक मिलते हैं।
  • आंध्र में कृष्णा नदी के निचले क्षेत्रों में भी समुद्र तट पर बौद्ध अवशेष मिलते हैं।
  • ईसा की प्रथम दो शताब्दियों में दक्कन क्षेत्र में बौद्ध धर्म अत्यंत शक्तिशाली था। अमरावती के स्तूपों को इसी काल में अलंकृत किया गया।
  • इस काल में मूर्ति कला का यथेष्ट विकास हुआ। अराध्य देवता के सम्मुख स्त्री-पुरुष घुटने के बल बैठे हुए अथवा साष्टांग रूप में प्रस्तुत किये गए हैं।
  • नागार्जुनकोंड, गोली, घंटाशाला तथा काँचीपुरम् बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध केन्द्र बने। बाद में इन स्थानों में महायान सम्प्रदाय का विकास हुआ।
  • लगभग दूसरी सदी ई. के मध्य में महायान सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध आचार्य नागार्जुन ने माध्यमिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करके शून्यवाद दर्शन को विकसित किया। इन्होंने चतुःशतक नामक ग्रंथ की रचना की।
  • दक्षिण के ही बुद्धपालित नामक एक अन्य महायान आचार्य ने नागार्जुन के मूल माध्यमिक सूत्र पर भाष्य लिखा।
  • भावविवेक नामक आचार्य ने तर्कज्वाला शीर्षक ग्रंथ की रचना की।
  • पाँचवी सदी के अंत अथवा इसके कुछ बाद के समय के सुप्रसिद्ध बौद्ध आचार्य दिङ्नाग ने प्रमाण समुच्चय, न्याय प्रवेश तथा प्रज्ञापारमितापिण्डार्थ नामक ग्रंथ की रचना की।
  • शिलप्पदिकारम और मणिमेकलई महाकाव्यों में बौद्ध तथा जैन संस्थानों के उल्लेख मिलते हैं।
  • अशोक के कलसी शिलालेख 13 के अनुसार यवन प्रदेश को छोड़कर उनके राज्य के सभी स्थानों में ब्राह्मण तथा श्रमण विद्यमान थे।
  • एक जैन परंपरा के अनुसार मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म स्वीकार करके कर्णाटक में श्रवण बेलगोला नामक स्थान पर सन्यासी का जीवन व्यतीत किया तथा उपवास करके प्राण त्याग दिया।
  • एक अन्य परंपरा के अनुसार महावीर की मृत्यु के दो सौ साल बाद मगध में भयंकर अकाल पड़ा जो बारह वर्षों तक चलता रहा। जैन संप्रदाय के बहुतेरे लोग उस समय के सुप्रसिद्ध आचार्य भद्रबाहु के साथ दक्षिण भारत चले गए। दक्षिण में इन्हीं प्रवासियों ने जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
  • जैन मतावलंबियों को दान में भूमि भी मिली।
  • कर्नाटक तथा तमिल प्रदेश में परवर्ती सदियों में स्थापत्य, कला, साहित्य आदि की प्रगति में जैनियों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान है।
स्मरणीय तथ्य
  • संगम साहित्य में ग्रीक-रोमन व्यापारियों को यवन कहा गया है।
  • प्रारंभिक तमिल अभिलेखों में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
  • इस काल में मुरुगन, शिव, इन्द्र, कृष्ण और बलराम को ‘देववृन्द’ कहा जाता था।
  • ‘तिरुक्कुरल’ को तमिल क्षेत्र का बाइबिल माना जाता है।
  • सर्वप्रथम मणिमेकलई से संगम युग में ललित कला के विकास की जानकारी मिलती है।
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