उत्तर वैदिक काल - प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में परिवर्तन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : उत्तर वैदिक काल - प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में परिवर्तन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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उत्तर वैदिक काल
     

  • इस काल में वर्णव्यवस्था अधिक स्पष्ट हो गई। धार्मिक कर्मकांडों आदि में रुचि रखने वाले लोग ब्राह्मण, युद्ध व राजनीति में सक्रिय लोग क्षत्रिय, वणिक, कृषक और शिल्पी वैश्य और उपर्युक्त तीनों वर्णों की सेवा और अन्य शारीरिक श्रम के लिए जो दास, दस्यु और अनार्य थे वे शूद्र की संज्ञा से अभिभूत हुए।
  • इस काल तक फिर भी एक वर्ण से दूसरे वर्ण में अदला-बदली संभव था तथा उनमें परस्पर विवाह संबंध भी होते थे। ब्राह्मण च्यवन ने क्षत्रिय शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया था।
  • शतपथ ब्राह्मण के अनुसार तीसरी और चैथी जाति में विवाह वर्जित था। अनुलोम विवाह स्वीकृत था परंतु प्रतिलोम विवाह निषिद्ध माना जाता था।
  • शूद्रों को छोड़कर अन्य तीन वर्ण उपनयन संस्कार के अधिकारी थे।
  • वैदिकोत्तर काल में आकर हम आश्रम-व्यवस्था पाते हैं। संपूर्ण जीवन को आर्यों ने चार आश्रम में विभक्त किया था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। सभी आश्रमों को 25-25 साल के अंतराल में बाँट दिया गया था।
  • संन्यास आश्रम का अधिक महत्व नहीं था।
  • कुटुंब का मुखिया अधिकतर पिता होता था।
  • सम्मिलित परिवार की अवधारणा में शिथिलता का अनुभव होता है। पुत्रों में फूट पड़ने पर पिता के जीवन काल में ही वे अपनी सम्पत्ति का बँटवारा कर सकते थे।
  • इस काल में कन्या के जन्म को प्रायः दुःख का कारण समझा जाता था, लेकिन पुत्र के जन्म के अवसर पर विशेषोत्सव मनाया जाता था। उन्हें वंश का रक्षक माना जाता था।
  • इस काल में समाज में स्त्रियों की वह प्रतिष्ठा नहीं रही जो कि ऋग्वेदकाल में थी। उन्हें उपनयन संस्कार से वंचित कर दिया गया।
  • शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, पत्नी की पूर्णता पति की अर्धांगिनी बनने में थी, लेकिन वास्तव में पत्नी की स्थिति निम्न होती गई। ऋग्वेदकाल के कई संस्कार जिसकी अधिकारिणी पत्नी हुआ करती थी, अब पुरोहितों के द्वारा होने लगे।
  • इस काल में नारी के चतुर्मुखी शिक्षा पर बल दिया जाता था। शिक्षितस्त्री-पुरुष के विवाह को ही उपयुक्त समझा जाता था।
  • स्त्रियों को संगीत और नृत्य सिखाया जाता था और इस कार्य के लिए ढोल, बाँसुरी, शहनाई आदि साज का इस्तेमाल होता था।
  • स्त्रियाँ अपने-अपने पति के यज्ञादि में भाग लेती थीं। बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार राजा जनक के दरबार में गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच वाद-विवाद हुआ था। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भी परम विदुषी थी। सुयोग्य और विदुषी स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहा गया है।
  • विवाह को इस काल में धार्मिक महत्व प्राप्त था। तीसरी और चैथी पीढ़ी में विवाह करने की अनुमति थी।
  • सर्वप्रथम इसी काल में गोत्र-प्रथा का उल्लेख मिलता है। गोत्र बहिर्विवाह की प्रथा भी आरंभ हुई। परंतु सभी वर्गों में सगोत्र विवाह वर्जित न था।
  • प्रारंभ मेंस्त्री-पुरुष समागन में छूट था किंतु बाद में इसमें कठोरता आ गई।
  • सामान्यतः बाल-विवाह प्रचलन में न था। अविवाहित कन्यायें अपने माँ-बाप के साथ रहती थीं। परंतु सामान्यतः युवावस्था प्राप्त होने के बाद अविवाहित रहने की प्रथा न थी।
  • अविवाहित पुरुष को यज्ञादि करने का अधिकार नहीं था। बिनास्त्री के स्वर्ग प्राप्ति नहीं हो सकती, ऐसी धारणा थी।
  • बहुविवाह प्रचलित था परंतु केवल धनिक तथा राजकीय वर्गों में ही ऐसा उदाहरण मिलता है।
  • वैदिकोत्तर काल में विधवास्त्री का पुनर्विवाह हो सकता था। विधवा-पुत्र का उल्लेख है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुत्र प्राप्ति के लिए ही ऐसा होता था।

सूत्र व महाकाव्य काल

  • इस काल में वर्ण-व्यवस्था काफी कठोर हो गई और वर्ण जन्म से निर्धारित होने लगा।
  • यदि कोई कुल-परिवार बहुत समय तक चलता रहे तो वंश बन जाता था। एक ही पूर्वज के सभी वंशजों का एक ही गोत्र होता था।
  • गृह्य सूत्र, जिसमें लोगों के घरेलू जीवन की चर्चा है, के अनुसार आठ प्रकार के विवाह होते थे - ब्रह्म-विवाह, प्रजापत्य-विवाह, आर्ष-विवाह, दैव-विवाह, गांधर्व-विवाह, आसुर-विवाह, राक्षस-विवाह और पैशाच-विवाह। पहले चार विवाह गृह्य सूत्रों में मान्य हैं लेकिन शेष चार मान्य नहीं हैं।
  • हर गृहस्थ को पंच महायज्ञ करने पड़ते थे ब्रह्म-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, देव-यज्ञ, भूत-यज्ञ और अतिथि-यज्ञ। कुछ निश्चित अवधियों के बाद गृहस्थों को इनके अतिरिक्त अन्य सात पाक यज्ञ भी करने पड़ते थे।
  • सामाजिक पद्धति वर्णाश्रम धर्म पर आधारित थी। अन्तर्विवाह और अन्तर्भोज वर्जित करके विभिन्न जातियों में रक्त की पवित्रता पर बल दिया जाने लगा था।
  • शूद्रों को नमस्कार मंत्र का उच्चारण और पाक यज्ञ की छूट थी।
  • धर्म सूत्रों में अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग लेखकों का भिन्न-भिन्न मत है। गौतम, बौधायन और वशिष्ठ नियोग-प्रथा की स्वीकृति देते हैं जबकि आपस्तंब ने उसकी भत्र्सना की है।
  • बौधायन के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को शेष संतान से अधिक भाग मिलना चाहिए लेकिन आपस्तंब इस मान्यता का खंडन करते हैं।
  • आपस्तंब ने किसी रथवान को उपनयन संस्कार की छूट नहीं दी है परंतु बौधायन ने ऐसी अनुमति प्रदान की है।
  • बौधायन के अनुसार ब्याज लेना ब्रह्म-हत्या के समान है और जो ब्राह्मण ब्याज लेता है वह शूद्र बन जाता है। आपस्तंब ने भी इसी प्रकार की बात कही है परंतु गौतम ने ब्राह्मणों को ब्याज पर ऋण देने की अनुमति प्रदान की है।
  • धर्मसूत्रों ने राजा को केवल कानून का रक्षक माना है।
  • इस काल में तीन प्रकार के मुख्य अपराध का वर्णन मिलता है - परस्त्री-गमन, पर पुरुष-गमन और चोरी।

 

वर्ण उत्पत्ति

  • ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में उल्लेख किया गया है कि वर्णों की उत्पत्ति ब्रह्म के विभिन्न अंगों से हुई है - ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मणों की, भुजाओं से क्षत्रियों की, जंघा से वैश्यों की और पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई है।
  • बृहदारण्यक उपनिषद् में वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। इसमें यह उल्लेख मिलता है कि वर्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा हुई है। सर्वप्रथम ब्रह्मा ने ब्राह्मण वर्ण को जन्म दिया। जब ब्राह्मणों द्वारा सामाजिक जीवन से संबंधित समस्त कार्य पूर्ण नहीं किए जा सके तो ब्रह्मा ने क्षत्रिय वर्ण को जन्म दिया, किन्तु जब ब्रह्मा को इससे भी संतोष प्राप्त नहीं हुआ तो ब्रह्मा ने वैश्य वर्ण को जन्म दिया। जब इन तीन वर्णों के द्वारा भी समस्त सामाजिक कार्य पूर्ण नहीं किए जा सके तब ब्रह्मा ने शूद्र वर्ण को जन्म दिया। इस सिद्धांत से यह स्पष्ट होता है कि अलग-अलग कार्यों को करने के लिए अलग-अलग वर्णों की रचना हुई।
  • महाकाव्यों में महाभारत को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। महाभारत में वर्णों के संबंध में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि प्रारंभ में हमारे समाज में ‘वर्ण व्यवस्था’ जैसा कोई विभाजन नहीं था। धार्मिक आचरणों तथा अपने कत्र्तव्यों को पूरा करने वाले सभी व्यक्ति ब्राह्मण कहे जाते थे। बाद में जिन व्यक्तियों ने अपने कत्र्तव्यों का पालन न कर क्रोधी और राजसी गुणों का प्रदर्शन किया वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। रजोगुण की प्रधानता वाले जो व्यक्ति कृषि और व्यापार करने लगे वे वैश्य कहलाए तथा जिन व्यक्तियों द्वारा असत्य और अपवित्रता का आचरण किया जाने लगा तथा जिनमें तमोगुण की प्रधानता हो गयी, वे शूद्र कहे जाने लगे।

  

  • इन अपराधों के लिए वर्ण-विशेष के आधार पर दंड निर्धारित था। ब्राह्मणों को सबसे कम और शूद्रों को सबसे अधिक दंड एक ही प्रकार के अपराध के लिए निर्धारित था। क्षत्रिय और वैश्य भी क्रम के हिसाब से दंड के भागी थे।
  • महाकाव्य-काल में चार मुख्य जातियों के अलावे कुछ अन्य जातियों का भी पता चलता है जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण संभवतः विभिन्न जातियों में अंतर्विवाहों का होना था।
  • स्त्रियों और पुरुषों दोनों में बहु-विवाह प्रथा थी।
  • नियोग की प्रथा प्रचलित थी।
  • विधवाओं के पुनर्विवाह का उल्लेख नहीं मिलता है परंतु बाल-विवाह महाकाव्य युग के अंत तक प्रचलित हो गया था।
  • राजवंशों में स्वयंवर का उल्लेख मिलता है। कन्याओं की प्रदर्शनी की जाती थी और सबसे अधिक बोली देने वालों के हाथों उन्हें बेच दिया जाता था।
  • आरंभ में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी लेकिन अंत में अवनति दृष्टिगोचर होता है। द्रौपदी को ब्रह्मवादिनी कहा गया है।
  • सती-प्रथा का प्रचलन शुरू हो गया था। पांडु की द्वितीय पत्नी माद्री के सती होने का उल्लेख मिलता है।
  • कहीं-कहीं पर्दा प्रथा का भी उल्लेख मिलता है।
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