कविता का सार - एक फूल की चाह, स्पर्श, हिन्दी, कक्षा - 9 | EduRev Notes

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Class 9 : कविता का सार - एक फूल की चाह, स्पर्श, हिन्दी, कक्षा - 9 | EduRev Notes

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कविता का सार

‘एक फूल की चाह’ गुप्त जी की एक लंबी और प्रसिद्ध् कविता है।  प्रस्तुत पाठ उसी कविता का अंश मात्रा है। यह कविता तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत की समस्या की भयावहता को उजागर करती है। महामारी के दौरान एक चंचल अछूत बालिका अस्वस्थ हो जाती है। उसकी हालत निरंतर बिगड़ती जाती है। मरणासन्न बेटी अपने पिता से कहती है कि उसे मंदिर से देवी के प्रसाद का एक पूफल लाकर दें। पिता असमंजस की स्थिति में है। एक ओर वह अपनी बेटी की अंतिम इच्छा पूरी करना चाहता है तो दूसरी ओर वह अछूत होने के कारण मंदिर में केसे प्रवेश करेगा, वह यह सोचने लगता है। अंत में बेटी की इच्छा पूरी करने के लिए वह दीप-फूल लेकर मंदिर जा पहुँचा है। भक्तों की भीड़ में धक्के खाता हुआ वह आगे पहुँच गया है। उसने दीप और फूल माँ को भेंट चढ़ाए। पूजा के पूफल लेकर वह इतना प्रसन्न एवं भावविभोर हो गया कि पुजारी के हाथों से प्रसाद लेना भूल गया। इतने में वहाँ उपस्थित कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया और उसे मार-पीटकर मंदिर के बाहर निकाल दिया। इसी मारपीट के दौरान उसके हाथ से देवी का फूल गिर पड़ा, जिसे वह बेटी को देने के लिए ले जा रहा था। लोगों का आरोप था कि मंदिर में प्रवेश करके इस अछूत ने देवस्थान की पवित्रता को कलुषित कर दिया। अंत में वे सब उसे न्यायालय ले गए, जहाँ उसे सात दिन कारावास की सशा मिली। कारावास का दंड भोगकर सात दिन बाद जब वह बाहर आया, तब उसे पता चला कि उसकी बेटी की मृत्यु हो चुकी  है। वह अपनी बेटी को जीवित न पाकर शमशान तक दौडा़ गया, जहाँ उसके अवशेष राख की ढेरी के रूप में पडे़ थे। अभागे पिता को इस बात का दुख सालता रहा कि न तो वह मरणासन्न बेटी की अंतिम इच्छा पूरी कर सका और न ही उसे अंतिम बार अपनी गोद में ले सका।

कवि परिचय

सियारामशरण गुप्त
इनका जन्म झांसी के निकट चिरगांव में सन 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे तथा पिता भी कविताएं लिखते थे।  ये महत्मा गांधी और विनोबा भावे के अनुयायी थे जिसका संकेत इनकी रचनाओं में मिलता है। गुप्त जी की रचनाओं का प्रमुख गुण है कथात्मकता। इन्होंने सामाजिक कुरुतियों पर करारी चोट की है। इनके काव्य की पृष्ठभूमि अतीत हो या वर्तमान , उनमें आधुनिक मानवता की करुणा , यातना और द्‍वंद्‍व समन्वित रूप में उभरा है।

प्रमुख कार्य
प्रमुख कृतियाँ - मौर्य विजय , आर्द्रा , पाथेय , मृण्मयी , उन्मुक्त , आत्मोत्सर्ग , दूर्वादल और नकुल।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • उद्‍वेलित – भाव–विह्वल
  • अश्रु- राशियाँ – आँसुओं की झड़ी 
  • प्रचंड – तीव्र 
  • क्षीण – दबी आवाज़ 
  • मृतवत्सा – जिस माँ की संतान मर गई हो 
  • रुदन – रोना 
  • दुर्दांत – जिसे दबाना या वश में करना करना हो 
  • कॄश – कमज़ोर 
  • रव – शोर 
  • तनु - शरीर
  • शिथिल – कमज़ोर
  • अवयव - अंग
  • विह्वल – बेचैन
  • स्वर्ण घन - सुनहले बादल
  • ग्रसना - निगलना
  • तिमिर – अंधकार 
  • विस्तीर्ण – फैला हुआ 
  • रविकर जाल - सूर्य किरणों का समूह
  • अमोदित - आनंदपूर्ण
  • ढिकला - ठेला गया
  • सिंह पौर - मंदिर का मुख्या द्वार
  • परिधान - वस्त्र
  • शुचिता – पवित्रता
  • सरसिज – कमल 
  • अविश्रांत – बिना थके हुए 
  • कंठ क्षीण होना - रोने के कारण स्वर का क्षीण या कमजोर होना।
  • प्रभात सजग - हलचल भरी सुबह।
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