गुप्त काल - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : गुप्त काल - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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गुप्त काल

  • राजस्व मुख्यतया भूमि से प्राप्त होता था, क्योंकि व्यापार-वाणिज्य से अब उतनी आय नहीं होती थी, जितनी पहले हुआ करती थी।
  • रोम के साथ व्यापार, जिससे प्रभूत संपत्ति प्राप्त होती थी, ईसा की तीसरी शताब्दी के पश्चात् घटने लगा तथा रोमीय साम्राज्य पर हुणों के आक्रमण के साथ इसका अंत हो गया।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न भागों में भारतीय व्यापार-केन्द्रों की स्थापना से आय का रुख उन क्षेत्रों की ओर हो गया।
  • वस्तुओं के निर्माण तथा व्यावसायिक उद्यम के क्षेत्र में श्रेणियां प्रमुख संस्था के रूप में कार्य करती रहीं।
  • अपने आंतरिक मामलों में श्रेणियां लगभग स्वायत्त रहीं, और सरकार उनके नियमों का आदर करती थी। ये नियम साधारणतया एक बड़ी संस्था - श्रेणी-निगम - के द्वारा बनाए जाते थे और प्रत्येक शिल्प-श्रेणी इस निगम का सदस्य होती थी।
  • यह निगम कुछ परामर्शदाताओं का निर्वाचन करता था, और ये ही उसके मुख्य पदाधिकारी होते थे।
  • रेशम के बुनकरों की जैसी कुछ औद्योगिक श्रेणियांे का अपना पृथक निगम होता था, जो बड़े पैमाने की परियोजनाओं, उदाहरणार्थ, मंदिर के निर्माण-हेतु वृत्तिदान आदि के लिए उत्तरदायी होता था।
  • कुछ क्षेत्रों में बौद्ध-संघ साहूकार के रूप में कार्य करता था और सूद पर पैसा उधार देता था।
  • ब्राह्मण-वर्ग व्यापार की जोखिमों के लिए कम तैयार होता था और वह भूमि से अधिक बंधा हुआ था।
  • समुद्रपारीय व्यापार के प्रयोजनों से लिए गए ऋण पर मौर्यकाल में असंगत रूप से ऊंचा ब्याज वसूल करने की प्रवृत्ति अब समाप्त हो गई थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि समुद्रपारीय व्यापार में आस्था बढ़ गई थी।
  • प्राचीन काल के दो सौ चालीस प्रतिशत वार्षिक ब्याज की तुलना में अब ब्याज की औसत दर बीस प्रतिशत प्रति वर्ष थी। दोनों पक्षों की सहमति होने पर ब्याज वैध दर से अधिक हो सकता था, परंतु ब्याज की कुल राशि मूलधन से अधिक नहीं हो सकती थी।
  • विविध प्रकार के वó तैयार करने वाला उद्योग इस समय के अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण उद्योगों में गिना जाता है।
  • रेशम की बुनाई का एक केंद्र पश्चिम भारत भी था। लगता है परवर्ती गुप्त काल में रेशम का उत्पादन घट गया, क्योंकि पश्चिमी भारत में रेशम के बुनकरों की एक महत्वपूर्ण श्रेणी के अनेक सदस्यों ने अपना पारंपरिक व्यवसाय छोड़कर दूसरे व्यवसायों को अपना लिया था।
  • हाथीदांत का व्यवसाय अधिक लाभकर था, और इसी प्रकार पत्थर की कटाई तथा खुदाई का व्यवसाय भी, क्योंकि इस समय मूर्तियों की मांग बहुत अधिक थी।
  • धातुकर्म एक अनिवार्य उद्योग बना रहा, विशेषकर तांबे, लोहे और सीसे का। कांसे का भी अब व्यापक प्रयोग होने लगा। सोने और चांदी की मांग तो हमेशा रहती थी।
  • जब विदेशी बाजारों में मोतियों का अधिक मूल्य मिलने लगा, तो पश्चिमी भारत के मोती खोजने के व्यवसाय में उन्नति हुई।
  • आकर्षक काली पालिश के बर्तनों का प्रयोग अब नहीं होता था। उसके स्थान पर एक भूरी-सी लेवी से लाल रंग के साधारण बर्तन विशाल परिमाण में बनाए जाते थे। इनमें से कुछ बर्तनों को मिट्टी में अभ्रक मिलाकर आकर्षक बना दिया जाता था।
  • समुद्रगुप्त के अभियानों ने आवागमन की व्यवस्था को सुचारू बनाया, जिससे माल भारत के समस्त भागों में सरलता से पहंुसकता था।
  • सड़कों पर सामान लादने वाले पशुओं और बैलगाड़ियों का इस्तेमाल होता था। कुछ क्षेत्रांे में हाथियों का भी प्रयोग किया जाता था।
  • बड़ी नदियां मुख्य जल-मार्ग थीं।
  • पूर्वी तट के बंदरगाह - ताम्रलिप्ति, घंटशाला और कदूरा - पूर्व एशिया के साथ उत्तर-भारतीय व्यापार को संभालते थे, तथा पश्चिमी तट के बंदरगाहों - भड़ौच, चोल, कल्याण तथा क®बे - के माध्यम से भूमध्यसागर एवं पश्चिम एशिया के साथ व्यापार होता था, परंतु इनमें दक्षिण की ओर पड़ने वाले बंदरगाह गुप्तों के नियंत्रण में नहीं थे।
  • मसालों, काली मिर्च, चंदन की लकड़ी, मोतियों, रत्नों, सुगंधियों, नील और जड़ी-बूटियों का निर्यात पूर्ववत होता रहा, परंतु आयात की जानेवाली वस्तुएं अब पहले की वस्तुओं से भिन्न थीं।
  • चीनी रेशम तथा इथोपिया से हाथीदांत अब अधिक मात्रा में आता था।
  • इस काल में अरब, ईरान और बैक्ट्रिया से घोड़ों का आयात बढ़ गया था। ये घोड़े या तो स्थल मार्ग से उत्तर-पश्चिम के व्यापारिक केंद्रों में पहंुचते थे या समुद्री मार्ग से पश्चिमी तट पर।
  • भारत ने अच्छी नस्ल के पर्याप्त घोड़े कभी उत्पन्न नहीं किए - अच्छे घोड़ों का सदैव आयात ही किया गया।
  • भारतीय जलयान अब अरब सागर, हिंद महासागर तथा चीन सागर की नियमित यात्रा करने लगे थे, और इन क्षेत्रों के प्रत्येक बंदरगाह में वे दिखाई पड़ते थे।
  • एक स्थान पर ‘काले यवनों के द्वीप’ की चर्चा की गई है, और इसका संकेत संभवतः मेडागास्कर या जंजीबार की हब्शी जनसंख्या की ओर है।
  • पूर्व-अफ्रीकी तट से भारत का व्यापार-संपर्क बढ़ा। पूर्व-अफ्रीकी बंदरगाहों पर चीनी व्यापारी भी प्रतियोगिता
  • करने लगे थे।
  • धर्मशाóी एक हिंदू के लिए समुद्र-यात्रा करने और काला सागर पार करने को भारी पाप घोषित कर रहे थे, और शायद यही कारण था कि समुद्री व्यापार में भारतीयों ने कम भाग लिया।
  • पाटलिपुत्र का महत्व कम होने लगा था और उसके स्थान पर गंगा के मैदान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित कन्नौज का महत्त्व बढ़ने लगा।
  • मथुरा और उसी प्रकार बनारस भी कपड़े के व्यापार तथा मंदिरों के केंद्र बन गए।
  • अधिकांश नगरों का मानचित्र बिल्कुल साधारण था, वे वर्गाकार बसे हुए थे।
  • नगर के समृद्धतर भागों में अब लकड़ी के मकानों का स्थान प्रायः पूर्णतया ईंटों से निर्मित मकानांे ने ले लिया था, और अपेक्षाकृत कम संपन्न लोगों के मकान बांसों के टट्टर के होते थे।
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