निम्बार्काचार्य (मृत्यु 1162 ई.) - धार्मिक आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : निम्बार्काचार्य (मृत्यु 1162 ई.) - धार्मिक आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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निम्बार्काचार्य (मृत्यु 1162 ई.)
 ¯ ये रामानुज के समकालीन थे। इनका जन्म वेलारी (मद्रास) के निकट हुआ था।
 ¯ इन्होंने रामानुज की भांति शंकर के अद्वैतवादी दर्शन का खंडन किया और द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों सिद्धांतों को अपने मत में स्थान दिया जिसके फलस्वरूप इन्हें ‘द्वैताद्वैतवादी’ दर्शन का प्रवर्तक कहा जाता है।
 ¯ उनके मतानुसार ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। सगुण ब्रह्म ही ईश्वर है। जीवन और जगत् ईश्वर पर आश्रित होने के कारण अभिन्न हैं, किंतु स्वरूप की दृष्टि से वे भिन्न हैं।
 ¯ उन्होंने कृष्ण को ईश्वर माना है और साथ में राधा की भी उपासना की। उनके मतानुसार राधा-कृष्ण की भक्ति के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति संभव है।

माधवाचार्य (1199-1278 ई.)
 ¯ ये शंकर के अद्वैतवाद और रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद के विरोधी थे और द्वैतवाद के समर्थक थे।
 ¯ इनका द्वैतवाद भागवत पुराण पर आधारित है।
 ¯ इनके मतानुसार विष्णु ही ईश्वर हैं जो सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं। जीव ईश्वराश्रित रहने के कारण अल्पज्ञ है। 

इन्होंने ईश्वर और जगत् दोनों को सत्य बताया।
 ¯ इनका संप्रदाय ‘ब्रह्म’ या ‘स्वतंत्रा स्वतंत्रवाद’ के नाम से प्रसिद्ध है।

रामानंद (1299.1411 ई.)
 ¯ ये प्रयाग में जन्में कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इन्होंने काशी को अपना स्थायी केंद्र बनाया और उत्तर भारत में एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन का सूत्रपात किया। इस आंदोलन ने जाति-पांति के बंधनों को तोड़ा और कर्मकांडवाद का विरोध किया।
 ¯ यद्यपि इन्होंने रामानुज की भक्ति-परंपरा को अग्रसर किया किंतु इनके विचार रामानुज के विचारों से अधिक क्रांतिकारी थे।
 ¯ तत्कालीन समाज में स्त्रियों का धार्मिक कार्यों में भाग लेना वर्जित था, किंतु इन्होंने स्त्रियों को भी शिष्य बनाया।
 ¯ वे वैष्णव थे और उनके इष्टदेव राम थे।

कबीर (1440-1510 ई.)
 ¯ अनुश्रुति है कि वे एक हिंदू विधवा के पुत्र थे, जिसने लोकलज्जा के भय से उन्हें लहरतारा नामक तालाब के किनारे फेंक दिया था। नीरू नामक निःसंतान जुलाहे ने बालक को उठा लिया और उसकी पत्नी ने उसे पाला।
 ¯ अनपढ़ होते हुए भी कबीर बाल्यकाल से ही भक्ति-भावित थे और विचार-मग्न रहते थे।
 ¯ बड़े होने पर वे रामानंद के शिष्य हो गये।
 ¯ यह भी कहा जाता है कि कबीर ने प्रख्यात सूफी संत शेख तकी से दीक्षा ली थी।
 ¯ कबीर के उपदेशों के दो लक्ष्य थे, एक तो धर्म के बाह्याडम्बरों से मुक्त होकर आध्यात्मिक विकास करना और दूसरा हिंदू तथा मुसलमानों के बीच सद्भावना स्थापित करना।
 ¯ वे निराकार ईश्वर को मानते थे और वेद तथा कुरान दोनों को स्वीकारते थे।
 ¯ वे जाति-पाति और मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे।
 ¯ इसी प्रकार वे नमाज, रमजान के उपवास, मकबरों और कब्रों की पूजा के निंदक थे।
 ¯ उन्होंने एकेश्वर, प्रेममार्ग और भक्ति पर बल दिया।
 ¯ कबीर की विचारधारा विशुद्ध अद्वैतवादी थी।
 ¯ उन्हें निर्गुण ईश्वर में विश्वास था।
 ¯ वे ब्रह्म को ‘राम’ कहकर पुकारते थे।
 ¯ उन्हें अवतारवाद में विश्वास न था।
 ¯ इन्होंने गुरु की आवश्यकता पर बल दिया।

वल्लभाचार्य (जन्म 1409 ई.)
 ¯ ये वैष्णव संप्रदाय की कृष्ण-भक्ति शाखा के महान् संत थे।
 ¯ इनका जन्म वाराणसी में हुआ था, किंतु पिता तेलंगना के निवासी थे।
 ¯ इन्होंने बाल्यकाल में ही चारों वेद, छः शास्त्र और अठारह पुराणों पर अधिकार कर लिया था।
 ¯ देश का खूब भ्रमण किया था और अंत में तेलंगना आकर विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय का संरक्षकत्व प्राप्त कर शैव संप्रदाय के विद्वानों से शास्त्रार्थ कर वैष्णवमत का प्रभुत्व स्थापित किया।
 ¯ उसके बाद उत्तरी भारत लौट कर वृन्दावन को अपना निवास स्थान बनाकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया।
 ¯ गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी उन्होंने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चिंतन में अनुरक्त रहकर जीवनयापन किया।
 ¯ वल्लभाचार्य ने शंकर के ‘ब्रह्म सत्यं जगंमिथ्या’ के सिद्धांत का खंडन कर यह प्रमाणित किया कि ‘जीव’ भी उतना ही सत्य है जितना ‘ब्रह्म’। उनके मतानुसार जीव ब्रह्म का एक अंश है।
 ¯ इस प्रकार उन्होंने शंकर के निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर सगुण ब्रह्म की भक्ति पर बल दिया।
  

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