प्रमुख स्थल - इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : प्रमुख स्थल - इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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प्रमुख स्थल

  • मास्की - आन्ध्र प्रदेश स्थित रायचूर जिले में एक छोटा-सा गाँव, जहाँ से अशोक का प्रथम लघु शिलालेख प्राप्त हुआ है।
  • कालसी - उत्तर प्रदेश के देहरादून जिले में स्थित वह स्थान, जहाँ से अशोक के शिलालेख प्राप्त हुए हैं।
  • काशगर - मध्य तुर्किस्तान का एक राज्य, जिस पर चीन का अधिकार था। कुषाणवंशीय सम्राट कनिष्क ने इसे अपने अधीन कर लिया था। सातवीं शताब्दी में यहाँ बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था।
  • अहिच्छत्र - पांचाल जनपद के उत्तरी भाग की राजधानी, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केन्द्र था। मौर्य युग में यह मूर्तिकला का प्रसिद्ध केन्द्र था, राजाओं से पूर्व यह नगर नागवंशी राजाओं का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। वर्तमान में यहाँ बरेली जिले का रामनगर नामक ग्राम स्थित है।
  • अमरावती - आन्ध्र प्रदेश में गुन्टूर जिले के समीप स्थित है। यहाँ कला, वास्तुकला और मूर्तिकला की एक स्थानीय कला शैली का विकास हुआ। यहाँ से प्राप्त मूर्तियों की कोमलता और भाव-भंगिमा देखने योग्य है। यहाँ बुद्ध को मानव आकृति के स्थान पर प्रतीकों के द्वारा व्यक्त किया गया है।
  • अजन्ता - महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप अजन्ता की गुफाएँ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। यहाँ के भित्ति चित्र, चित्रकला की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट हैं। इनमें मानव जीवन का, पशु-पक्षी जगत और प्रकृति का बहुरंगी चित्रण मिलता है। इन चित्रों की रेखाएँ बड़ी जीवन्त हैं और इनमें रंगों के सम्मिश्रण में उच्चकोटि की कला का प्रदर्शन किया गया है।
  • इन्द्रप्रस्थ - वर्तमान दिल्ली के निकट स्थित प्राचीन कुरु जनपद की राजधानी, जिसका निर्माण पाण्डवों ने खाण्डव वन को जलाकर किया था। महाभारत काल में भव्य सुव्यवस्थित तथा वैभवशाली यह नगर छठी शताब्दी ई. पू. में वैभवहीन हो गया।
  • उज्जयनी - अवन्ति राज्य की राजधानी क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित प्राचीन मालवा राज्य का प्रमुख नगर विक्रमादित्य के नवरत्नों का आश्रय स्थल था। यहाँ काफी संख्या में मन्दिर बने हुए थे। प्रति बारहवें वर्ष यहाँ कुम्भ का मेला आयोजित किया जाता है।
  • एलोरा - महाराष्ट्र स्थित गुफाएँ कला की दृष्टि से अत्यन्त ही मनमोहक एवं कला प्रधान हैं।
  • एलीफेन्टा - महाराष्ट्र में बम्बई के निकट स्थित यह स्थान पौराणिक देवताओं की अत्यन्त भव्य मूर्तियों के लिए विख्यात है। यहाँ दो बड़े पर्वतों को काटकर गुफाओं का निर्माण किया गया है। यहाँ की महेश्वर की त्रिमूर्ति, शिव का ताण्डव नृत्य आदि की मूर्तियाँ कला की दृष्टि से अनुपम है इनका निर्माण काल आठवीं शताब्दी है।
  • ओदन्तपुरी - यह नगर बिहार में गया के निकट था। यह बौद्धकालीन भारत का प्रमुख शिक्षा केन्द्र था। पाल सम्राटों ने इस शिक्षा केन्द्र के विकास और सम्वर्धन में बहुत योगदान दिया था, जो बाद में विश्वविद्यालय के रूप में परिणत हो गया था। इस विश्वविद्यालय में एक विशाल पुस्तकालय भी थी, जिसमें ब्राह्मण एवं बौद्ध धर्म सम्बन्धी ग्रन्थों का विशाल संग्रह था।
  • कपिलवस्तु - उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के उत्तर में नेपाल की तराई में स्थित है। ऐतिहासिक दृष्टि से बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के जन्मस्थल तथा प्राचीन शाक्य गणराज्य के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ पर अनेक मठ तथा स्तूप निर्मित हुए, जोकि वर्तमान में ध्वस्त हो चुके हैं।
  • कल्याण - यह दक्षिण भारत का एक प्रमुख नगर था। यह एक व्यापारिक नगर था। यह भड़ौंच के निकट था। यहाँ विदेशी व्यापार वर्जित था। यह नगर शकों के अधीन भी रहा।
  • कान्यकुब्ज - वर्तमान में यह कन्नौज के नाम से जाना जाता है। हर्ष ने ह्नेनसांग के नेतृत्व में यहाँ एक सभा का आयोजन किया था। हर्षकाल में बाणभट्ट, मयूर मातंग, दिवाकर धाक्क आदि कवियों का यह निवास स्थान था। इस समृद्ध नगर के ऐश्वर्य का वर्णन विदेशी यात्री अलबरुनी ने भी किया है। छठी शताब्दी तक यह नगर भारत की राजनीति का प्रमुख केन्द्र था। व्यापारिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक वैभव की दृष्टि से यह नगर पटिलीपुत्र के समान ही महत्वपूर्ण था।
  • कावेरीपत्तन - यह दक्षिण भारत का एक प्रमुख नगर था। यह चोल नरेशों की राजधानी भी रहा था। यह प्राकृतिक साधनों से भरपूर उर्वराशक्ति सम्पन्न नगर था। यहाँ अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ।
  • कुरुक्षेत्र - थानेश्वर के निकट स्थित यह नगर महाभारत काल में कौरवों तथा पाण्डवों के मध्य हुए घोर संग्राम का रण स्थल था। वर्तमान में यह हरियाणा प्रदेश का प्रमुख नगर है, जहाँ पर एक विश्वविद्यालय भी है।
  • कुशीनगर - इसका प्राचीन नाम कुशावती था। यह में गणराज्य की राजधानी के रूप में विख्यात रहा। अशोक महान् ने यहाँ अनेक मठ, स्तूप, स्तम्भ आदि का निर्माण कराया। यह स्थान गौतम बुद्ध की निर्वाण भूमि तथा बौद्धों का महान् तीर्थ स्थल है, जिसका धार्मिक महत्व आज भी पूर्ववत् है।
  • कौशाम्बी - प्राचीन वत्स जनपद की राजधानी रहा तथा गुप्तकाल में मूर्तिकला का प्रमुख केन्द्र था। हरिषेण द्वारा लिखित समुद्रगुप्त की विजय प्रशस्ति का स्तम्भ इस नगरी के महत्व का वर्णन करता है। उदयनकाल में यह सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक एवं व्यापारिक केन्द्र था।
  • काँची - प्राचीन पल्लव शासकों की राजधानी काँची तमिलनाडु में स्थित है। इसे दक्षिण भारत की काशी कहा जाता है। यह नगर साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति का केन्द्र था।
  • खजुराहो - यह मध्य प्रदेश में छतरपुर क्षेत्र में स्थित है। चन्देल शासकों द्वारा इसका निर्माण किया गया। यह नगर मन्दिर समूह के लिए विशेष प्रसिद्ध है। यहाँ जैन एवं वैष्णवों के अनेक मन्दिर हैं। यह स्थान मैथुनरत मूर्तियों, प्रसाधनरत नायिकाओं आदि की मूर्तियों के लिए विशेष चर्चित है।
  • गया - प्राचीनकाल में यह बौद्ध धर्म का केन्द्र था। बुद्ध ने यहाँ छः वर्ष तक कठोर साधना की थी। यहाँ पर अनेक मठों व विहारों का निर्माण किया गया। वर्तमान में यह हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यहाँ हिन्दू अपने पितरों का पिण्डदान, श्राद्ध आदि करने आते हैं।
  • गिरिनार (जूनागढ़) - गुजरात के खैतक पर्वत के समीप स्थित है। नाम से ऐसा विदित होता है कि प्राचीनकाल में यहाँ कोई दुर्ग रहा होगा। यह नगर अशोककालीन अभिलेखों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ अशोक के अनेक अभिलेख मिले हैं, जिनमें अशोक के अनेक संदेश उत्कीर्ण हैं।
  • चम्पा - छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इस नगर की गणना भारत के प्रमुख नगरों में की जाती थी। गंगा के संगम पर स्थित यह नगर धर्म, संस्कृति, कला, व्यापार और वैभव का केन्द्र था, जहाँ प्राचीनकाल में अनेक मठ, विहार तथा स्तूपों का निर्माण हुआ था।
  • तक्षशिला - पश्चिमी पंजाब में रावलपिंडी से उत्तर-पश्चिम की ओर 20 मील की दूरी पर स्थित यह नगर प्राचीनकाल में शिक्षा, चिकित्सा तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण था। व्याकरण के विख्यात विद्वान ऋषि पाणिनी, राजनीति और अर्थशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान चाणक्य, आयुर्वेद के आचार्य जीवक तथा कुमार जीव जैसे शल्य चिकित्सकों ने इसी नगर में विद्या ग्रहण की थी।
  • थानेश्वर - छठी शताब्दी के अन्त में पुष्यभूति वंश की राजधानी रहा। यह नगर प्राचीन इन्द्रप्रस्थ नगर के उत्तर में अम्बाला और करनाल के मध्य में स्थित है। चीनी यात्री ह्नेनसांग के अनुसार, यहाँ अनेक शिक्षण संस्थान, संगीतशाला, मठ एवं मन्दिर थे। इसी नगर के समीपस्थ भू-भाग पर तराइन तथा पानीपत के युद्ध हुए। सातवीं और आठवीं शताब्दी में हूणों के आक्रमणों के फलस्वरूप इस नगर का पतन हो गया।
  • दशपुर - प्राचीन मालवा प्रदेश के सिवनी के तट पर स्थित यह नगर वर्तमान में मन्दसौर के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर सूर्य मन्दिर का निर्माण कराया गया था। कुमारगुप्त के शासनकाल में यह नगर वैभव एवं समृद्धि के शिखर पर था।
  • देवगढ़ - झाँसी मण्डल के ललितपुर के निकट एक छोटा-सा गाँव है, यहाँ गुप्तकाल में अनेक सुन्दर एवं भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। यह विशेष रूप से गुप्तकालीन दशावतार मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मन्दिर में शिव, विष्णु तथा अन्य देवी-देवताओं की अत्यन्त कलात्मक मूर्तियाँ मिलती हैं।
  • नालन्दा - पटना से 55 मील दक्षिण और राजगृह से 7 मील उत्तर में यह नगर स्थित था। इसके भग्नावशेष बड़गाँव में मिले हैं। पाँचवीं से ग्यारहवीं सदी तक यह नगर बौद्ध धर्म एवं शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।
  • ताम्रलिप्ति - यह बंगाल में गंगा के मुहाने पर स्थित था। पूर्वी समुद्रतट पर स्थित यह प्राचीनकाल का सर्वश्रेष्ठ बन्दरगाह था। यहाँ से पूर्वी देश जावा, सुमात्र और चीन आदि से व्यापार होता था।
  • पाटिलीपुत्र - भारत का प्राचीन नगर जो मौर्य, शुंग तथा गुप्त राजाओं की राजधानी के रूप में विख्यात रहा। यहाँ मौर्यकाल में तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। साथ ही यहाँ प्रथम जैन संगीति भी आयोजित हुई। वर्तमान में इस नगर के अवशेष पटना के समीप बुलन्दी-बाग में मिले हैं।
  • पुष्कलावती - पुष्कलावती आधुनिक पेशावर से लगभग 30 किलोमीटर दूर सिन्धु नदी के पश्चिम में स्थित था। यह नगर राजनीतिक, व्यापारिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व का था। अशोक महान् ने यहाँ एक स्तूप का निर्माण भी कराया था।
  • पुरुषपुर - यह नगर कुषाण साम्राज्य की राजधानी थी। प्राचीनकाल में यह पश्चिमोत्तर भारत का प्रमुख व्यापारिक तथा सांस्कृतिक केन्द्र था। कुषाण सम्राट कनिष्क ने यहाँ एक बहुमंजिला भवन बनवाया था। नगर में निर्मित मघाराम में अनेक बौद्ध भिक्षु रहते थे एवं अध्ययन करते थे। वर्तमान काल में यह पेशावर के नाम से जाना जाता है।
  • प्रागज्योतिषपुर - इसे वर्तमान में गुवाहाटी के नाम से जाना जाता है। यहाँ के राजा भगदत्त ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया। यहाँ का एक अन्य राजा भास्कर वर्मा शैवोपासक तथा हर्ष का सहयोगी था। कहा जाता है कि यह नगर ज्योतिष का अच्छा केन्द्र था।
  • बाघ - बाघ चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है। यह ग्वालियर के निकट एक छोटा-सा गाँव है। यह बाघ नदी के तट पर स्थित है तथा जंगलों से घिरा हुआ है। इसमें नौ गुफाएँ हैं, जो कला की दृष्टि से अत्यन्त ही उच्चकोटि की हैं।

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  • भृगुकच्छ - वर्तमान में पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित भड़ौंच नगर ही प्राचीनकाल में भृगुकच्छ के नाम से पश्चिमी तट के सबसे बड़े बन्दरगाह और वाणिज्य प्रतिष्ठान के लिए प्रसिद्ध था।
  • भरहुत - मध्य प्रदेश में सतना जिले के निकट स्थित है। यह आरम्भिक बौद्ध वास्तु एवं मूर्तिकला के लिए विशेष प्रसिद्ध है। यहाँ का बौद्ध स्तूप विश्व प्रसिद्ध है। मौर्य एवं शुंग कला ने इसके निर्माण में असीम योगदान दिया था। इस स्तूप की वेदिका कलकत्ता संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है।
  • मथुरा - प्राचीन काल में शूरसेन जनपद की राजधानी रहा। महानगर उत्तर प्रदेश में यमुना तट पर स्थित श्रीकृष्ण की जन्मस्थली तथा तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है। कुषाणकाल में यह स्थापत्य एवं मूर्तिकला के केन्द्र के रूप में विख्यात रहा, जहाँ कुषाणकाल के अनेक अभिलेख एवं सिक्के मिले हैं। इसी नगर में कला की नई शैली मथुरा कला का विकास हुआ। वर्तमान में यहाँ अनेक मन्दिर, शिक्षण संस्थाएँ तथा एक पुरातत्व संग्रहालय भी है, जो इसके महत्व को दर्शाता है।
  • राजगृह - यह प्राचीनकाल में जैन और बौद्ध धर्मों का केन्द्र रहा। यहाँ के भग्नावशेषों में मुगियार मठ, गुप्तकाल में बना जरासंघ की बैठक नामक स्तूप प्रसिद्ध है। वर्तमान में यह नगर राजगिरि के नाम से जाना जाता है।
  • वैशाली - इक्ष्वाकुवंशीय राजा विशाल ने इस नगर को बसाया था, जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में गंडक नदी के तट पर स्थित था। जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म भी यहीं हुआ था। गुप्तकाल में इस नगर का विशेष महत्व बढ़ गया था। आज इस नगर के भग्नावशेष मात्र हैं जो वसाढ में मिलते हैं।
  • विक्रमशिला - पालवंशी राजा देवपाल ने बिहार के भागलपुर से 24 मील दूर पथरघाटा नामक स्थान पर एक बौद्ध विहार की स्थापना की थी। आठवीं सदी के इस विहार में बड़े-बड़े भवन हैं। इसी विहार ने विश्वविद्यालय का स्वरूप ग्रहण कर आठवीं से तेरहवीं सदी तक शिक्षा के क्षेत्र में महान् कार्य किया।
  • विदिशा - मध्य प्रदेश में स्थित यह नगर द्वितीय शताब्दी में शुंगों की राजधानी था। शुंगकाल में यह नगर कला का केन्द्र था। साँची के तोरणों के निर्माण में यहाँ के कलाकारों ने अपना पर्याप्त योगदान दिया था। यहाँ स्तूपों के कुछ अवशेष भी मिलते हैं।
  • वल्लभीपुर - इसकी स्थापना मैत्रक वंश के राजाओं ने की थी। यह शिक्षा एवं व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। इत्सिंग के अनुसार यहाँ अनेक बौद्ध मठ तथा विहार थे, जहाँ भिक्षु विद्यार्जन करते थे। आठवीं शताब्दी में अरब आक्रान्ताओं के आक्रमण में यह नष्ट हो गया, किन्तु इस विद्या केन्द्र ने पुनः सम्मान अर्जित किया और राजपूत युग तक इसका वैभव बना रहा।
  • शाकाल - यह उत्तर-पश्चिम भारत का प्रसिद्ध प्राचीन नगर है। प्राचीनकाल में भद्र देश की राजधानी रहा। बौद्ध क्रियाओं का प्रमुख प्राचीन केन्द्र वर्तमान में स्यालकोट के नाम से जाना जाता है।
  • साकेत - कौशल राज्य का प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था। यह नगर धनी सेठों के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ एक सेठ ने सुप्रसिद्ध राजवैद्य जीवक को शिरोवेदना के उपचार हेतु सोलह कार्षापण भेंट किए। गौतम बुद्ध धर्म प्रचार के लिए अनेक बार यहाँ आए।
  • सारनाथ - वाराणसी के समीप सारनाथ वह स्थान है, जहां महात्मा गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् अपना प्रथम उपदेश दिया था। यह स्थान बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थल है।
  • साँची - मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित यह नगर बौद्ध कला का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ तीन स्तूप मिले हैं। साँची का स्तूप मौर्यकाल की कला का अमर स्मारक है। बौद्ध धर्म के प्रचार कार्य के लिए लंका जाते समय अशोक का पुत्र यहाँ कुछ समय तक रुका भी था।
  • सोमनाथ - इसका प्राचीन नाम ‘प्रभास’ था। यह गुजरात के समुद्र तट पर स्थित है। श्रीकृष्ण और अर्जुन का यह विहार स्थल था। समुद्र तट पर स्थित होने के कारण जलमार्ग से होने वाले व्यापार का यह केन्द्र बन गया। यह नगर मन्दिर समृद्धि के लिए भी प्रसिद्ध था।
  • लुम्बिनी वन - नेपाल की तराई में स्थित रुम्मनदेई ही प्राचीन लुम्बिनी वन है। यह मूलतः बौद्ध तीर्थस्थल है। यहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ। अशोक ने यहाँ लघु स्तम्भ लेख उत्कीर्ण कराया था। यहाँ बौद्धों का एक समाधिस्तूप भी है। यहाँ पुष्करणीय मन्दिर देखने योग्य है।
  • बोधगया - गया से 7 मील दूर दक्षिण में स्थित है। कहते हैं कि यहाँ गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः यह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति वाला बौद्ध तीर्थस्थल है। यहाँ भगवान बुद्ध का विशाल कलापूर्ण एक मन्दिर है। इसके पीछे एक पत्थर का चबूतरा है, जिसे बौद्ध सिंहासन कहा जाता है। इसी स्थान पर बैठकर गौतम बुद्ध ने तपस्या की थी। यही बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था इसीलिए इसे बोधगया कहा जाता है।
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