मुसलमानों के धार्मिक आंदोलन - धार्मिक आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : मुसलमानों के धार्मिक आंदोलन - धार्मिक आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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मुसलमानों के धार्मिक आंदोलन
 ¯ भारत में सूफीवाद की अनेक शाखाएं थीं। अबुल फजल ने चैदह शाखाओं का उल्लेख किया है, जिनमें प्रमुख निम्नोक्त हैं:
 चिश्तीया शाखा
 ¯ इस शाखा की स्थापना खोरासान निवासी ख्वाजा अबू अब्दाल चिश्ती ने की थी किंतु भारत में सर्वप्रथम इसका प्रचार ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने किया।
 ¯ ये गियासुद्दीन के पुत्र और ख्वाजा उस्मान हारून के शिष्य थे।
 ¯ इनका जन्म सीस्तान में 1143 ई. में हुआ था। ये 1190 में भारत आये।
 ¯ पहले वे लाहौर, फिर दिल्ली और अंत में अजमेर में रहे।
 ¯ ख्वाजा ने हिंदुओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने सर्वव्यापी एकेश्वरवाद का प्रचार किया। उनका सिद्धांत था कि मानवता की सेवा करना ही ईश्वर की सर्वोच्च कोटि की भक्ति है। उनकी मृत्यु (1234 ई.) के उपरांत उनके शिष्यों ने उनके कार्य को आगे बढ़ाया।
 ¯ इस्लामी धर्म के अनुसार संगीत अवैध है किंतु चिश्ती शाखा के संतों ने संगीत के आध्यात्मिक मूल्य पर बल दिया और उच्च कोटि के संगीतज्ञों को प्रश्रय दिया।
 ¯ ख्वाजा साहब के प्रमुख शिष्यों में शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी का नाम अग्रगण्य है। इनका जन्म 1186 ई. में फरगना में हुआ था।
 ¯ ये सुल्तान इल्तुतमिश के शासन-काल मंे भारत आये। वे पहले मुल्तान में बसे और फिर दिल्ली में। सुल्तान ने उनसे अपने महल के समीप रहने की प्रार्थना की किंतु शेख ने इसे स्वीकार न किया और नगर के बाहर एक मठ में रहने लगे।
 ¯ इल्तुतमिश ने उन्हें ‘शेख-उल-इस्लाम’ के उच्च पद पर आसीन करना चाहा। किंतु इस पद को भी शेख ने अस्वीकार कर दिया।
 ¯ कुतुबुद्दीन रहस्यवादी गीतों के बड़े प्रेमी थे। एक गायक गोष्ठी में वे भक्ति के आवेश में मूर्छित हो गये और चार दिन निरंतर मूर्छित रहने के बाद पांचवीं रात्रि (15 नवम्बर, 1235) में वे स्वर्ग सिधारे।
 ¯ कुतुबुद्दीन के शिष्य फरीदउद्दीन गंजशंकर (1175-1265) जो फरीद बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे, का जन्म मुल्तान में हुआ।
 ¯ इन्होंने हांसी और अजोधन में सूफी धर्म का प्रचार और विस्तार किया था।
 ¯ निर्धन रहते हुए भी ये सुल्तान और अमीरों के साथ संबंध रखने के विरुद्ध थे। इन्होंने सदैव हृदय की एकाग्रता पर बल दिया। सुल्तान बलबन बाबा फरीद का आदर करता था।
 ¯ उनकी मृत्यु 1265 ई. में हुई और उनकी इच्छानुसार उन्हें पकपाटन (पंजाब) में दफनाया गया, जो आज भी तीर्थस्थल है।
 ¯ शेख फरीद के सर्वाधिक विख्यात शिष्य शेख निजामुद्दीन औलिया (जन्म 1236 ई., मृत्यु 1335 ई.) थे। ये दिल्ली से कुछ दूर गियासपुर में बस गये थे, जहां आजकल उनकी दरगाह है।
 ¯ शेख औलिया ने सात सुल्तानों का राज्यकाल देखा था। किंतु किसी से संबंध नहीं रखा।
 ¯ अपने प्रिय शिष्य अमीर खुसरो के प्रयत्न के बावजूद वे अलाउद्दीन ख़लजी से नहीं मिले।
 ¯ औलिया की संगीत में रुचि के कारण प्रथम तुगलक सुल्तान ग्यिासुद्दीन ने तिरपन उलेमाओं की अदालत में उन पर अभियोग चलाया था किंतु अपने विलक्षण व्यक्तित्व के कारण शेख बरी हो गये थे।
 ¯ शेख और सुल्तान के बीच मनमुटाव का एक कारण और था। शेख ने सुल्तान के बड़े पुत्र उलूग खां (भावी मुहम्मद तुगलक) को अपना शिष्य बनाया था और भविष्यवाणी की थी कि वह शीघ्र सुल्तान बनेगा।
 ¯ उन्होंने अपार ख्याति अर्जित की और ‘महबूब-ए-इलाही’ (प्रभु के प्रिय) के नाम से प्रख्यात हुए।
 ¯ निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्यों में शेख नासिरुद्दीन महमूद चिराग को ही अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त हुई। उनके पूर्वज मध्य एशिया से आकर लाहौर में बसे थे। किंतु उनके पितामह अयोध्या में बसे थे, जहां महमूद का जन्म हुआ। 25 वर्ष की आयु में वे सूफी बन गये। 45 वर्ष की आयु में औलिया के शिष्य बने और दिल्ली में ही रहने लगे।
 ¯ औलिया ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी (खलीफा) नियुक्त किया।
 ¯ कुतुबुद्दीन मुबारकशाह चाहता था कि वे नमाज पढ़ने मीरी मस्जिद में आया करें। परंतु शेख ने वहां जाने से इन्कार कर दिया। इससे सुल्तान से उनका संघर्ष हो गया।
 ¯ मुहम्मद बिन तुगलक सूफियों को अपनी सेवा में लेकर उनसे अपने आदेश का पालन करवाना चाहता  था। अनेक सूफी भयभीत होकर झुक गये किन्तु शेख नासिरुद्दीन ने दृढ़ता के साथ उनके आदेश को ठुकरा दिया।
 ¯ 1336 ई. में उनका देहावसान हो गया।
 ¯ चिश्ती शाखा के अंतिम महान् सूफी संतों में शेख सलीम चिश्ती का नाम विशेष उल्लेखनीय है।
 ¯ शेख चिश्ती काफी समय अरब में रहे और वहां उन्हें ‘शेख-उल-हिंद’ की संज्ञा से विभूषित किया गया।
 ¯ अकबर के राज्यकाल में वे फतेहपुर सीकरी में रहने लगे।
 ¯ मृत्यु के बाद उन्हें फतेहपुर सीकरी की प्रसिद्ध जामा मस्जिद के प्रांगण में दफनाया गया।

सुहरवर्दी शाखा
 ¯ यह शाखा मुख्य रूप से उत्तरी-पश्चिमी भारत में स्थापित हुई।
 ¯ इस शाखा के संस्थापक जियाउद्दीन अबुलजीव थे, जो गजाली के समकालीन थे।
 ¯ शेख शहाबुद्दीन सुहरवर्दी इस शाखा के प्रख्यात सूफी संत थे। इनके द्वारा रचित अबारिफ-उल-मआरिफ (ईश्वरी ज्ञान की भेंट) इस शाखा का प्रसिद्ध ग्रंथ है।
 ¯ इनके प्रमुख शिष्यों में शेख बहाउद्दीन ज़करिया और शेख हमीदउद्दीन नागौरी थे।
 ¯ भारत में सबसे पहले इस शाखा का प्रचार कार्य शेख बहाउद्दीन ज़कारिया सुहरवर्दी ने किया।
 ¯ इनका जन्म मुल्तान के समीप कोट अरोर में लगभग 1182 ई. में हुआ था।
 ¯ यौवनकाल में शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से इन्होंने खुरासान, बुखारा, मदीना और फिलिस्तीन आदि शिक्षा-केंद्रों की यात्रा की थी।
 ¯ जब वे बगदाद में थे, तभी शेख शिहाबुद्दीन का शिष्यत्व ग्रहण किया था और उनके ही आदेशानुसार मुल्तान में आकर बसे और उसे शिक्षा केन्द्र बनाया।
 ¯ शेख बहाउद्दीन जकारिया 13वीं शताब्दी के बड़े प्रभावशाली सूफी संत थे। उनकी अन्य शाखाओं के सूफी संतों से भी घनिष्टता थी।
 ¯ वे चिश्तियों की भांति निर्धनता, उपवास, आत्मदमन और शरीर को यातना देने में विश्वास नहीं रखते थे, वरन् उन्होंने आरामदेह जीवन बिताया।
 ¯ उन्होंने धन संग्रह भी किया और तत्कालीन राजनीतिक मामलों में रुचि ली।
 ¯ उनके अनेक शिष्यों में प्रमुख शेख फखरुद्दीन ईराकी और शेख हुसेन अमीर हुसेनी सुहरवर्दी उल्लेखनीय हैं।
 ¯ शेख मूसा की विशेषता यह थी कि वे óी वेश धारण किये रहते थे। नृत्य एवं संगीत में उन्हें विशेष रुचि थी।
 ¯ शाहदौला मूसा के शिष्य थे। ये गुजरात निवासी थे और शाही वंश के थे। किन्तु सूफी बनने के कारण सब कुछ त्याग दिया। वे भी बड़े संगीत प्रेमी, उदार और दयालु थे।

कादरीया शाखा
 ¯ कादिरिया शाखा की स्थापना बगदाद के शेख अब्दुल कादिर जीलानी ने बारहवीं शताब्दी में की थी।
 ¯ मध्य एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में इसी शाखा ने इस्लाम का प्रचार किया।
 ¯ भारत में इस शाखा का प्रचार सर्वप्रथम शाह नियमतउल्ला और मखदूम जीलानी ने 15वीं शताब्दी में किया।
 ¯ मखदूम ने उच्च को अपना निवास स्थान बनाया।
 ¯ इसके बाद इस शाखा का नेतृत्व मखदूम अब्दुल कादिर जीलानी और प्रपौत्र शेख हमीद गंज बख्श ने किया।
 ¯ इसके बाद उनके दो पुत्रों शेख अब्दुल कादिर जीलानी और शेख मूसा ने प्रचार किया।
 ¯ शेख मूसा ने अकबर के काल में राजकीय पद स्वीकार किया।
 ¯ किन्तु शेख अब्दुल कादिर जीलानी ने राजकीय पद ठुकरा दिया। वे फतेहपुर सीकरी के दीवानेआम में नमाज पढ़ा करते थे। अकबर ने इस पर आपत्ति प्रकट की किंतु शेख अडिग रहे। अतः अकबर ने उनसे भूमि वापस ले ली और वे पुनः वापस चले गये।
 ¯ इसके बाद शेख मीर मोहम्मद (मियां मीर) इस शाखा के प्रमुख संत हुए, जो जहांगीर और शाहजहाँ के समकालीन  थे।
 ¯ दारा शिकोह अपने पिता शाहजहाँ के साथ शेख के पास गया और उनसे अत्यधिक प्रभावित हुआ। किन्तु उसी वर्ष (1635 ई.) में शेख की मृत्यु हो गयी। उनके स्थान पर मुल्ला शाह बदख्शी खलीफा हुए। अतः दारा शिकोह ने इन्हीं का शिष्यत्व ग्रहण कर ‘तसव्वुफ’ से संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे, उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया और कराया, तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का प्रयास किया।

नक्शबंदी शाखा
 ¯ इस शाखा की स्थापना 14वीं शताब्दी में ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद ने की थी किन्तु भारत में इसका प्रचार ख्वाजा बाकी बिल्लाह ने 1563-1603 ई. में किया, जो अपने गुरु के आदेशानुसार भारत में आये थे।
 ¯ भारत में केवल तीन वर्ष कार्य करने के उपरांत उनका देहांत (1603 ई.) हो गया।
 ¯ वे सनातन इस्लाम (मोहम्मद साहब के उपदेशों) में आस्था रखते थे और धर्म के नवीन परिवर्तनों के विरोधी थे।
 ¯ ख्वाजा बाकी विल्लाह के प्रमुख शिष्य अहमद फारूक सरहिंदी थे।
 ¯ ये अकबर और जहांगीर के समकालीन थे और ‘मुजद्दित’ (इस्लाम धर्म के सुधारक) के नाम से विख्यात थे।
 ¯ इन्होंने ”बहादत-उल वजूद“ (एकात्मवाद) की तीव्र आलोचना करके उसे अस्वीकारा और उसके स्थान पर ‘वहादत-उश-शुहूद’ (प्रत्यक्षवाद) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
 ¯ उनके कथनानुसार मनुष्य और ईश्वर का संबंध स्वामी और सेवक का है, प्रेमी और प्रेमिका का नहीं जैसा कि अन्य सूफी सोचते हैं।
 ¯ उनके पत्रों का संकलन मक्तूवाद-ए-रब्बानी के नाम से प्रसिद्ध है।
 ¯ उन्होंने शिया संप्रदाय की कटु आलोचना की।
 ¯ उन्होंने अकबर द्वारा प्रतिपादित ‘दीने इलाही’ का भी खंडन किया।
 ¯ जहांगीर भी उनका शिष्य हो गया था।
 ¯ औरंगजेब भी, जो कट्टर सुन्नी था, सरहिंदी के पुत्र शेख मासूम का शिष्य हो गया था।
 ¯ इस शाखा के दूसरे प्रमुख संत शाह वलीउल्लाह (1707-62 ई.) हैं, जो औरंगजेब के समकालीन थे।
 ¯ उन्होंने ‘वहादत-उल-वजूद’ और ‘वहादत-उश-शुहूद’  के सिद्धांतों को समन्वित करने का सफल प्रयास किया।
 ¯ ख्वाजा मीरदर्द इस शाखा के अंतिम प्रख्यात संत थे।

सिक्ख गुरु
 ¯    नानक (1469-1538 ई.): सिक्ख धर्म के प्रर्वतक।
 ¯    अंगद (1538-1552 ई.): गुरुमुखी लिपि के जनक।
 ¯    अमरदास (1552-1574 ई.): सती एवं पर्दा प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया, धर्म प्रसार के लिए 22 गद्दियां स्थापित की, अकबर इनसे पंजाब में मिला था।
 ¯    रामदास (1574-1581 ई.): 1577 ई. में अमृतसर की स्थापना की, अकबर ने इन्हें भूमि उपलब्ध कराई।
 ¯    अर्जुन (1581-1606 ई.): स्वर्ण मन्दिर की नींव रखी तथा आदि ग्रन्थ ”गुरु ग्रन्थ साहिब“ (हरमिन्दर) का संकलन किया, धार्मिक कार्यों के लिए मसनद एवं मीडरा की नियुक्ति की। जहांगीर ने उन्हें फांसी दे दी।
 ¯    हरगोविन्द सिंह (1606-1645 ई.): सिक्खों को एक लड़ाकू जाति में बदला, अकाल तख्त की स्थापना की एवं अमृतसर की किलेबन्दी की।
 ¯    हर राय (1645-1661 ई.)
 ¯    हरकिशन (1661-1664 ई.)
 ¯    तेग बहादुर (1664-1675 ई.): इस्लाम कबूल न करने के कारण औरंगजेब ने इन्हें फांसी दे दी।
 ¯    गोविन्द सिंह (1675-1708 ई.): खालसा सेना की स्थापना की तथा एक धर्माचार ”पाहुल“ चलाया।


¯ वे भी ”वहादत-उल-वजूद“ के सिद्धांत के विरोधी थे। किंतु वे मानते थे कि अंत में एकात्मवाद के दोनों ही सिद्धांतों का लक्ष्य एक ही है। सांसारिकता से विरक्ति दोनों का उद्देश्य है।
 ¯ उनका झुकाव मुस्लिम रूढ़िवादिता की ओर था जिसके अनुसार उन्होंने ‘इल्मे इलाही मुहम्मद’ (मुहम्मद के उपदेशों में ईश्वरीय ज्ञान) नामक एक नये सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है कि कुरान की शिक्षाओं का पालन करें और ईश्वर की भक्ति में दास बनकर रहें।

शत्तारीया शाखा
 ¯ शत्तारिया शाखा के प्रवर्तक शेख अब्दुल्ला शत्तारी थे, जो शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी के वंशज थे।
 ¯ अब्दुल्ला के गुरु शेख मुहम्मद आरिफ ने इन्हें भारत भेजा था।
 ¯ उनका कथन था ‘जो भी ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, मेरे पास आये, म® उसको ईश्वर तक पहुँचाऊंगा’।
 ¯ वे सर्वप्रथम सुल्तान इब्राहीम शर्की की राजधानी जौनपुर गये, किंतु सुल्तान से अनबन हो जाने के कारण मालवा चले गये, जहाँ उनका देहावसान (1428-29 ई.) हो गया।
 ¯ इस शाखा के दूसरे प्रमुख संत शाह मुहम्मद गौस थे।
 ¯ वे हुमायूं के समकालीन थे, जो उनका बड़ा सम्मान करता था।
 ¯ वे अपने काल में ‘कुतुब’ कहलाये। इन्होंने दो प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे--जवाहिर-ए-खस्मा और अवराद-ए-गौसिया।
 ¯ इनका देहावसान (1562 ई.) ग्वालियर में हुआ, जहां आज भी उनकी मज़ार बनी है।
 ¯ शाह गौस के प्रमुख उत्तराधिकारी और इस शाखा के अंतिम संत शाह वजीउद्दीन थे। इन्होंने गुजरात को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जहां इन्होंने अपना प्रचार कार्य किया और एक मदरसा स्थापित किया।

कलंदरिया शाखा
 ¯ इस शाखा का सर्वप्रथम संत अब्दुल अजीत मक्की को माना जाता है।
 ¯ अनुश्रुति है कि वे मोहम्मद साहब के साथियों में से एक थे और सूफी अनुश्रुति के अनुसार आज भी जीवित हैं।
 ¯ इनके शिष्य सैय्यद खिज्र रूमी कलंदर ‘खपरादरी’ हुए।
 ¯ इन्होंने चिश्तीया शाखा के कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से भेंट की और दोनों ने एक दूसरे की शाखा को स्वीकार किया। फलस्वरूप ‘चिश्तीया-कलंदरिया’ उपशाखा का जन्म हुआ।
 ¯ तत्पश्चात् सैय्यद नजमुद्दीन कलंदर ने इस शाखा का खूब प्रचार किया। इन्होंने मक्का तथा अन्य देशों की यात्राएं की।
 ¯ अनुश्रुति के अनुसार उन्होंने 40 वर्ष तक उपवास किया था और एक पत्थर पर निरंतर 30 वर्षों तक समाधिस्थ रहे।
 ¯ दो सौ वर्ष की आयु (1432 ई.) में मांडू में उनकी मृत्यु हुई जहां आज भी उनकी मज़ार मौजूद है।
 ¯ सैय्यद नजमुद्दीन के उत्तराधिकारी और इस शाखा के अंतिम महत्त्वपूर्ण संत कुतुबद्दीन कलंदर हुए, जिन्हें ‘सरंदाज’ की संज्ञा दी गयी, क्योंकि कहा जाता है इनका सिर जिक्र (संस्मरण) की अवस्था में अलग हो जाया करता था।
 ¯ सौ वर्ष की आयु में इनका देहावसान (1518 ई.) हुआ।
 ¯ इस शाखा के सूफी संत मंुडित केश रखते थे।

मदारिया शाखा
 ¯ शेख बदीउद्दीन शाह मदार इस शाखा के प्रवर्तक थे।
 ¯ ये शेख मुहम्मद तैफूरी विस्तामी के शिष्य थे।
 ¯ गुरु के आदेशानुसार इन्होंने मक्का जाकर अध्ययन किया किन्तु शान्ति न मिली। इसलिए वहां से मदीना गये, जहां इन्हें पैगंबर मुहम्मद साहब की वाणी सुनायी पड़ी कि ‘तुमको शांति मिली’। वहाँ से भारत आये और अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की आत्मा के निर्देशानुसार मकनपुर (कानपुर, उत्तर प्रदेश के निकट) को अपना निवासस्थान एवं प्रचार केंद्र बनाया, जहाँ 1485 ई. में इनका देहावसान हो गया।

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