राजनीतिक इतिहास - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : राजनीतिक इतिहास - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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 राजनीतिक इतिहास

  • मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद तत्काल कोई बड़ा साम्राज्य स्थापित नहीं हो सका। इसके विपरीत 200 ई. पू. और 100 ई. के बीसुदूर उत्तर में विदेशियों के अनेक झुंड आए। वे भारत में बस गए और उन्होंने अपनी विशिष्ट जीवन-पद्धति के जरिए भारतीय संस्कृति को समृद्ध बनाया।
  • ये लोग थे - यूनानी (जिन्हें हिन्द यवन भी कहते हैं), पार्थव (पार्थियन), शक और कुषाण। यूनानियों के आलावा बाकी सब मध्य एशिया से आए थे।

हिन्द यवन

  • सिकंदर के यूनानी सेनापतियों ने ईरान और अफगानिस्तान में अपना-अपना शासन स्थापित किया था। इन राजाओं के उत्तराधिकारियों ने अब अपनी नजर उत्तरी भारत की ओर फेरी।
  • शकों के बढ़ते हुए दबाव के कारण परवर्ती यूनानी शासक अपने क्षेत्र में अपनी सत्ता बनाए रखने में असमर्थ हो गए। साथ ही उत्तरी भारत समृद्ध प्रदेश था और ईरान तथा पश्चिम एशिया के साथ उसका भारी व्यापार चलता था।
  • मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद यूनानी राजाओं के लिए पंजाब के कुछ भागों और काबुल की घाटी को जीत लेना कठिन नहीं था। यह प्रदेश गांधार प्रांत के नाम से जाना जाता था। यूनानियों ने इस गांधार प्रांत पर शासन किया।
  • दो यूनानी राजवंशों ने एक ही समय में पश्चिमोत्तर भारत में समानान्तर शासन किया।
  • सबसे अधिक विख्यात हिन्द यवन शासक मिनान्दर (165.145 ई. पू.) हुआ। वह मिलिन्द नाम से भी जाना जाता है। उसकी राजधानी शाकल (आधुनिक सियालकोट) में थी और उसने गंगा-यमुना दोआब पर आक्रमण किया। उसे नागसेन (नागार्जुन) ने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।
  • बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मिनान्दर और नागसेन के प्रश्नोत्तरों को मिलिन्दपण्हो (मिलिन्द के प्रश्न) नामक पुस्तक में संकलित किया गया है।
  • भारत में सबसे पहले इन्हीं शासकों ने सोने के सिक्के जारी किए जिनकी मात्रा कुषाणों के शासन में बढ़ी।
  • इन शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में यूनानी कला हेलेनिस्टिक आर्ट का प्रचलन किया जिससे गांधार कला विकसित हुई।

शक

  • यूनानियों के बाद शक आए जिन्होंने भारत में यूनानियों की अपेक्षा अधिक भागों में अपना आधिपत्य जमाया।
  • इनकी पांशाखाएं थीं तथा हर शाखा की राजधानी भारत और अफगानिस्तान के अलग-अलग भागों में थी।
  • शकों की एक शाखा अफगानिस्तान में बस गई।
  • दूसरी शाखा पंजाब में बसी जिसकी राजधानी तक्षशिला हुई।
  • तीसरी शाखा मथुरा मे बसी, जहां उसने लगभग दो सदियों तक राज किया।
  • चैथी शाखा ने अपनी सत्ता पश्चिम भारत में जमाई, जहां उसने ईसा की चैथी सदी के आरम्भ तक शासन किया।
  • शकों की पांचवीं शाखा ने ऊपरी दक्कन पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
  • कहा जाता है कि उज्जैन के एक राजा ने लगभग 58 ई.पू. में शकों को हराया। वह अपने को विक्रमादित्य कहता था। शकों पर अपने विजय के उपलक्ष्य में उसने विक्रम संवत् आरम्भ किया।
  • सबसे अधिक विख्यात शक शासक रूद्रदामन प्रथम (130.150 ई.) हुआ। उसका शासन न केवल सिंध में बल्कि कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा, काठियावाड़ और गुजरात के बड़े भाग में भी था। उसने सातवाहन शक्ति को नर्मदा के उत्तर में फैलने नहीं दिया।
  • उसने मौर्य शासक अशोक के समय निर्मित झील सुदर्शन सर का जीर्णोद्धार करवाया।

पार्थव

  • पश्चिमोत्तर भारत में शकों के आधिपत्य के बाद पार्थव लोगों का आगमन हुआ। प्राचीन भारत के अनेक संस्कृत ग्रंथों में इन दोनों का उल्लेख एक साथ शक-पल्लव के रूप में मिलता है।
  • पार्थवों का मूल वासस्थान ईरान में था, जहां से वे भारत की ओर चले।
  • सबसे प्रसिद्ध पार्थव राजा गोन्दोफर्निस हुआ। कहा जाता है कि उसके शासन-काल में सेंट टामस ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए भारत आया।

कुषाण

  • पार्थवों के बाद कुषाण आए जो यूची और तोखारी भी कहलाते हैं।
  • कुषाण, जिनका मूल निवास स्थान चीनी तुर्किस्तान में था, ईसा की पहली शताब्दी में अफगानिस्तान में पहुंचे और हिन्द-यवनों, पार्थवों तथा शकों को खदेड़कर खुद तक्षशिला और पेशावर में जम गए।
  • बाद में उन्होंने समूचे पंजाब के मैदान पर अधिकार कर लिया और धीरे-धीरे गंगा के मैदान के पश्चिमी भाग पर भी कब्जा जमा लिया। मथुरा उनके राज्य के दक्षिणी भाग का एक प्रमुख केन्द्र था।
  • राज्य को प्रांतों में विभक्त किया गया था और क्षत्रप या गवर्नर इसका शासन संभालते थे।
  • हम कुषाणों के दो राजवंश पाते हैं जो एक के बाद एक आए। पहले राजवंश की स्थापना कडफिस नामक सरदारों के एक घराने ने की जिसका शासन 50 ई. से 28 वर्षों तक चला। इसमें दो राजा हुए - कडफिस प्रथम तथा कडफिस द्वितीय।
  • कडफिस प्रथम ने हिन्दूकुश के दक्षिण में सिक्के चलाए तथा रोमन सिक्कों की नकल करके तांबे के सिक्के ढलवाए।
  • कडफिस द्वितीय ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की और अपना राज्य सिंधु नदी के पूरब में फैलाया।
  • कडफिस राजवंश के बाद कनिष्क राजवंश आया। इसकी दो राजधानियां थीं - पुरुषपुर या पेशावर तथा मथुरा।
  • कनिष्क सर्वाधिक विख्यात कुषाण शासक था।
  • मध्य एशिया के हूण साम्राज्य की चीनी सेनाओं के साथ कुषाणों की मुठभेड़ हुई।
  • कनिष्क ने 78 ई. में एक संवत् चलाया जो शक संवत् कहलाता है और भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
  • वह बौद्ध धर्म का समर्थक था। उसने बौद्ध विहारों के निर्माण के लिए धन दिया। उस समय प्रचलित धार्मिक वाद-विवादों में उसकी दिलचस्पी थी। उसी के शासनकाल में कश्मीर में चैथी बौद्ध महासंगीति का आयोजन हुआ था जिसमें बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय को अंतिम रूप दिया गया।
  • मथुरा के संग्रहालय में कनिष्क की एक आदमकद खंडित मूर्ति है। इसमें वह गठीले बदन का व्यक्ति नजर आता है।
  • पश्चिमोत्तर भारत पर लगभग 230 ई. तक कनिष्क के उत्तराधिकारियों का शासन रहा।
  • आरम्भिक कुषाण राजाओं ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की। उनकी स्वर्ण मुद्राएं धातु की शुद्धता में गुप्त काल की स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट हैं। उनकी स्वर्ण मुद्राएं मुख्यतः सिंधु के पश्चिम में ही पाई गई हैं।

सातवाहन

  • पुराणों में उल्लिखित आन्ध्र और ये सातवाहन एक ही माने जाते हैं। आरम्भिक सातवाहन राजा आन्ध्र में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में थे, जहां उनके आरम्भिक अभिलेख मिले हैं।
  • इस वंश का संस्थापक सिमुक था। धीरे-धीरे सातवाहनों ने अपनी सत्ता का विस्तार कर्नाटक और आन्ध्र में किया। सिमुक का शासनकाल ई.पू. 60 से 37 के मध्य माना जाता है।
  • इसकी राजधानी गोदावरी नदी के उत्तरी तट पर स्थित प्रतिष्ठान या पैठान नगरी मानी जाती है।
  • शातकर्णि प्रथम इस वंश का तृतीय और सबसे प्रतापी राजा था। पुराणों में इसे कृष्ण का पुत्र कहा गया है। नानाघाट अभिलेख में इसे सातवाहन वंश को बढ़ाने वाला कहा गया है। इसने दो अश्वमेघ यज्ञ किया।
  • सांची अभिलेख में भी राजा शातकर्णि का वर्णन है। इसने मानव शैली की गोल मुद्राएं चलायी थी।
  • सातवाहन शासक ‘हाल’ (20.24 ई.) को प्राकृत की सतसई (सप्तशती) का लेखक माना जाता है। प्राकृत ग्रंथ लीलवै  से इसकी सैनिक उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है।
  • महाक्षत्रप नहपान और उसके जमाता ऋषभदेव ने सातवाहनों को पराजित किया।
  • सातवाहनों ने पुनः अपनी सेना का संगठन करके शकों पर हमला किया और अंत में पश्चिमी दक्कन पर फिर से कब्जा करने में सफल हुए। यह काम गौतमीपुत्र शातकर्णि (106 -130 ई.) ने किया। यह इस वंश का तेईसवां शासक था। इसने नासिक जिले में वेनकटक नामक नगर का निर्माण कराया।

शक-कुषाण

  • शक-कुषाण काल में भवन-निर्माण के दौरान पकी ईंटों का प्रयोग फर्श बनाने में किया गया तथा टाइलों का प्रयोग फर्श और छत दोनों में किया गया। इस काल की एक विशेषता ईंटों के कुँओं का निर्माण है।
  • इसका अपना खास मदभंड है - लाल बर्तन।
  • चूँकि इन लोगों के पास अपनी लिपि, लिखित भाषा और सुव्यवस्थित धर्म नहीं था, इसलिए इन लोगों ने इन चीजों को सीधे-सीधे भारतीय संस्कृति से ग्रहण किया।
  • इन्होंने मध्य एशिया से लाकर भारत में टोपी, शिरस्नान एवं बूट चलाए जिनका इस्तेमाल योद्धा लोग करते थे।
  • इन लोगों ने ही सर्वप्रथम भारत में परदे का प्रचलन आरंभ किया। चूँकि परदा यवनों की देन था, इसलिए यवनिका कहलाया।
  • इसी काल में हम गांधार और मथुरा कला का उत्कर्ष देखते हैं। गांधार कला मूलतः भारतीय और यूनानी सभ्यताओं के सम्मिश्रण का परिणाम था।
  • इस काल में ही शल्य-चिकित्सा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई। चरक संहिता और सुश्रुत-संहिता का उद्भव इसी काल में हुआ।
  • चमड़े के जूते बनाने का प्रचलन भारत में संभवतः इसी काल में आरम्भ हुआ।
  • इस काल के सीसे के कामों पर विदेशी प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।

 

स्मरणीय तथ्य

  • गुप्त काल में व्यापारियों एवं शिल्पियों की अनेक श्रेणियां थीं, जैसे - श्रेणी, गण, निगम।
  • कुलक निगम एवं श्रेष्ठि निगम संपन्न व्यापारियों के व्यापारिक संघ होते थे। इन संघों की अपनी मुहरें होती थीं। कुलक निगम की मुहरें इलाहाबाद के निकट भीटा से प्राप्त हुई हैं। श्रेष्ठि निगम की मुहरें वैशाली से मिली हैं।
  • विदेशी बन्दरगाह मेडागास्कर से प्राप्त गुप्तकालीन सिक्का तत्कालीन सामुद्रिक व्यापार को प्रमाणित करता है।
  • दूसरी शताब्दी की महायान कृति महावस्तु से हमें 36 प्रकार के शिल्प का विवरण मिलता है।
  • भारत-ईरान संपर्क के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में खरोष्ठी लिपि का उदय हुआ तथा मौर्यकालीन कला पर भी ईरानी प्रभाव देखने को मिलता है।
  • भारत-यूनान संपर्क के कारण भारत का मध्य-एशिया, पश्चिमी एशिया और चीन के साथ व्यापार में वृद्धि हुई; भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रचार हुआ तथा यूनानी व भारतीय कला का समन्वित रूप गांधार शैली का जन्म हुआ।

 

  • वाशिष्ठिपुत्र पुलुमावी (130 -145 ई.) ने शक शासक रूद्रदमन की पुत्री से विवाह किया, तभी जाकर कुछ समय के लिए शकों और सातवाहनों के बीशांति बनी रही। इसे ‘दक्षिणा- पथपति’ तथा ‘आन्ध्र प्रदेश का राजा’ भी कहा जाता है। इसके सिक्के और अभिलेख आंध्र में पाए गए हैं।
  • यज्ञश्री सातकर्णि (165.194 ई.) इस वंश का अंतिम महत्वपूर्ण राजा था।
  • अंततः इक्ष्वाकुयों का शासन स्थापित हो गया।
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