वे आँखें - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

Hindi Class 11

Humanities/Arts : वे आँखें - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

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सारांश -: प्रस्तुत कविता ‘वे आँखें’ पंत जी के प्रगतिशील दौर की कविता है| इसमें विकास की विरोधाभासी अवधारणाओं पर करार प्रहार किया गया है| यह कविता शोषण के दुश्चक्र में फँसे किसानों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक दुखों की परतों को खोलती है और स्पष्ट रूप से विभाजित समाज की वर्गीय चेतना का खाका प्रस्तुत करती है

कवि के अनुसार किसानों की हताशा, निराशा और दुःख भरी आँखें मन में भय जगाती हैं| वे किसी अँधेरी गुफा की तरह डरावनी हैं| किसान जब तक स्वतंत्र था उसका स्वाभिमान ही उसकी ताकत थी| लेकिन अब वे अपनी स्वतंत्रता खो चुके हैं और उनकी स्थिति बदतर हो चुकी है| किसान अपने उन लहलहाते खेतों को याद करता है जो अब उससे छिन चुके हैं| उसकी एकमात्र संपत्ति उसके खेत थे, जिससे उसे बेदखल कर दिया गया| किसान अपने जवान बेटे को याद करके रोता है जो साहूकार के कारिंदों की लाठी से मारा गया| महाजन ने ऋण वसूल करने के लिए किसान के बैल के जोड़े को नीलाम कर दिया| कर्जा चुकाने के चक्कर में उसके घर तक बिक गए| किसान की प्रिय गाय तक बिक गई जो सिवाय उसके अन्य को दूध दुहने नहीं आने देती थी| दवा-दारू के अभाव में किसान की पत्नी मर गई| माँ के दूध के अभाव में उसकी बेटी भी दो दिन बाद चल बसी| घर में बस एक विधवा बहू बच गई जिसे वह घर की लक्ष्मी समझता था| अब उसे भी पति घातिन अर्थात् जिसे पति के मृत्यु का कारण समझा जाने लगा| उसने भी एक दिन कुएँ में डूबकर अपनी जान दे दी क्योंकि कोतवाल ने उसकी इज्जत लूट ली थी| जवान बेटे को याद करकर किसान की छाती विदीर्ण हो जाती थी और इसी कारण उसने दूसरी शादी नहीं की| अपने गत दिनों के सुख और वैभव को याद करके एक पल के लिए किसान की आँखें चमक उठती हैं| लेकिन जैसे ही उसका सामना वास्तविकता से होता है तो उसके लिए ये सब स्मृतियाँ दुखदायी बन जाती है|

कवि-परिचय -: सुमित्रानंदन पंत

जन्म- सन् 1900 में कौसानी, जिला अल्मोड़ा (उत्तरांचल) में|

प्रमुख रचनाएँ- वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन, युगवाणी, ग्राम्या, चिदंबरा, उत्तरा, स्वर्ण किरण, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन आदि हैं|

पुरस्कार - भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा पद्मभूषण सम्मान| 

मृत्यु - सन् 1977 में|

उनका मूल नाम गोसाँई दत्त था| छायावाद के महत्त्वपूर्ण स्तंभ सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के चितेरे कवि हैं| हिंदी कविता में प्रकृति को पहली बार प्रमुख विषय बनाने का काम पंत ने ही किया है| इनकी प्रारंभिक शिक्षा कौसानी गाँव में तथा उच्च शिक्षा बनारस और इलाहाबाद में हुई| युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी| उसके बाद स्वतंत्र लेखन करते रहे|

पंत जी भाषा के प्रति बहुत सचेत थे| इनकी रचनाओं में प्रकृति की जादूगरी जिस भाषा में अभिव्यक्त हुई है उसे स्वयं पंत चित्र भाषा की संज्ञा देते हैं| ब्रजभाषा और खड़ी बोली के विवाद में उन्होंने खड़ी बोली का पक्ष लिया और पल्लव की भूमिका में विस्तार से खड़ी बोली का विस्तार किया|

कठिन शब्दों के अर्थ

 • सरीखी- समान

• दारूण- घोर, निर्दय, कठोर

• चितवन- दृष्टि

• बेदखल- हिस्सेदारी से अलग करना

• कारकुन- जमींदारों के कारिंदे

• कुर्क- नीलामी

• बरघों- बैलों

• घरनी- घरवाली, पत्नी

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