शुंग-सातवाहन काल - प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में परिवर्तन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : शुंग-सातवाहन काल - प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में परिवर्तन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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शुंग-सातवाहन काल
 

  • सातवाहन युग में दक्षिण भारत में स्त्रियों की स्थिति अच्छी मालूम पड़ती है। इस काल में आवश्यकता पड़ने पर वे शासन का कार्यभार भी उठाती थीं।
  • सातवाहन काल के शासकों का अपने मातृनामों के साथ उल्लेख मिलने से यह पता चलता है कि उस काल में वहाँ का समाज मातृप्रधान रहा होगा।
  • समाज चार वर्गों में विभक्त था। प्रथम वर्ग में महारथी, महाभोज और महासेनापति शामिल  थे। द्वितीय वर्ग में कर्मचारी और गैर-सरकारी दोनों सम्मिलित थे। तृतीय वर्ग में लेखक, वैद्य, हलकीय, सुवर्णकार और गंधिक (औषधियाँ बेचने वाला) सम्मिलित थे। चतुर्थ वर्ग में वार्धकी, मालाकार, लोहवणिज (लोहार) और दसक (मछियारा) सम्मिलित थे।
  • स्त्रियाँ पतियों के साथ धार्मिक कार्यों में सहर्ष भाग लेती थीं।
  • विधवा नारी को यंत्रणामय जीवन व्यतीत नहीं करना पड़ता था।
  • इस काल में भारत में अनेक विदेशी जातियाँ बस चुकी थीं। फलतः एक नये जाति का निर्माण हो रहा था। स्मृतिकारों ने इन्हें निम्न कोटि के क्षत्रिय के रूप में स्वीकारा।
  • इस काल में अंतर्जातीय एवं वर्णांतर विवाहों का भी उल्लेख मिलता है। सातवाहन राजा शातकर्णी प्रथम ने जो ब्राह्मण था, क्षत्रिय वंश की कन्या से और वाशिष्ठीपुत्र पुलमावि ने महाक्षत्रप रुद्रदामन की पुत्री से विवाह किया था।

गुप्त काल

  • गुप्त काल में भी भारतीय समाज वैदिक-काल से चली आ रही वर्ण-व्यवस्था के तहत ही चार वर्णों में विभक्त रहा।
  • समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व बना रहा। साधारणतः ब्राह्मण का कत्र्तव्य अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ और दान करना था। अभिलेखों में तप, स्वाध्याय करने वाले और सूत्र, भाष्य, प्रवचन में पारंगत ब्राह्मणों का उल्लेख हुआ है।
  • कभी-कभी ब्राह्मण स्वाध्याय और यज्ञादि कार्यों को छोड़कर अन्य काम भी करता था। राजा के पुरोहित के नाते राजनीति पर भी उसका दखल होता था।
  • गुप्तकाल से पहले देश, धर्म, भोजन और वैदिक शाखा के अनुसार ब्राह्मणों में उपभेद आरंभ हो गया था। गुप्तकाल में उत्तर भारत में यजुर्वेदिक ब्राह्मणों की प्रधानता थी और सौराष्ट्र में सामवेदीय ब्राह्मणों की।
  • क्षत्रियों का कत्र्तव्य अध्ययन, यज्ञ, दान, शस्त्रजीव, रक्षा तथा प्रजापालन था।
  • ब्राह्मण-ग्रंथों में ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान है, किंतु बौद्ध साहित्य में ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों को प्रधानता दी गई है।
  • कुल के आधार पर क्षत्रियों में भी वर्गीकरण होने लगे थे, यथा सूर्यवंशी, सोमवंशी आदि।
  • तीसरा वर्ण वैश्य था जिनका कार्य स्मृतियों के अनुसार कृषि, पशुपालन और वाणिज्य-व्यवसाय था किंतु धर्मशास्त्रों के अनुसार वे यज्ञ, दान और अध्ययन भी कर सकते थे।
  • गुप्त काल में वैश्यों ने प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी क्योंकि उनमें से कुछ न्यायालयों का कार्य भी देखने लगे थे।
  • गुप्त काल में व्यापारी, गौपालक, सुनार, लोहार, बढ़ई आदि व्यवसाय समूहों ने अपनी श्रेणियाँ बना ली थीं। फाह्यान के अनुसार प्रमुख वैश्य लोग औषधालय और धर्मशालाएँ भी चलाते थे।
  • चैथा वर्ण शूद्रों का था जिनका मुख्य कार्य द्विजों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करना था।
  • चूँकि शूद्र भी वर्ण-चातुण्र्य के सदस्य थे, अतः द्विजों के साथ नगरों और गाँवों में रहते थे।
  • दंडविधान में उन्हें अपराधों के लिए अन्य वर्णों की अपेक्षा कठोर दंड देने की व्यवस्था थी।
  • शूद्र खेती और व्यवसाय भी करने लगे थे, अतः राजासन तक पहुंचने की क्षमता रखते थे।
  • इन चारों वर्णों के अतिरिक्त समाज में चांडाल भी शामिल थे, जो प्रायः नगरों और गाँवों के बाहर रहते थे।
  • फाह्यान के अनुसार उनका स्पर्श तक वर्जित था। अतः जब वे गाँवों और नगरों की देहरी पर कदम रखते थे तो उन्हें अपने आने की सूचना लाठी या अन्य प्रकार के उपकरणों की मदद से आवाज करके देनी पड़ती थी।
  • उनका मुख्य काम शवों को जलाना या गाड़ना, पशुओं का शिकार, मछलियाँ पकड़ना आदि था।
  • मनुस्मृति और कात्यायन स्मृति में दासों की चर्चा मिलती है।
  • दासों से उत्पन्न होने वाले संतान का दास ही होना और ब्राह्मणेतर व्यक्तियों के दास बन जाने और उनके क्रय-विक्रय का उल्लेख मिलता है। केवल ब्राह्मण ही दास नहीं बनाये जा सकते थे।
  • कात्यायन के अनुसार द्विजस्त्री दास से विवाह करते ही दास हो जाती थी, किन्तु दासस्त्री यदि अपने द्विज स्वामी से पुत्र उत्पन्न कर लेती थी तो वह दासत्व से मुक्त हो जाती थी।
  • यदि कोई दास अपने स्वामी के प्रतिबंधों को पूरा कर देता था तो उसे आजादी मिल जाती थी।
  • संकट के समय यदि दास स्वामी के प्राणों की रक्षा करता था तो भी उसे दासत्व से मुक्ति मिल जाती थी।
प्राचीनकालीन साहित्य
     ग्रंथ का नाम    लेखक
     अष्टाध्यायी    पाणिनी
     महाभारत    वेदव्यास
     रामायण    वाल्मीकि
     अर्थशास्त्र   चाणक्य
     मुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्तम    विशाखदत्त
     बुद्धचरित, सारिपुत्र प्रकारम, 
     सौन्दर्यानन्द काव्य     अश्वघोष
     कुमारसम्भव, विक्रमोर्वशियम, 
     मालविकाग्निमित्रम, मेघदूत, 
     रघुवंश, अभिज्ञानशाकुंतलम    कालिदास
     सहस्त्रिका सूत्र, प्रज्ञापारमिता सूत्र, 
     माध्यमिका सूत्र    नागार्जुन
     नागानंद, प्रियदर्शिका, रत्नावलि    हर्षवर्धन
     बृहत्संहिता, पंचसिद्धांतिका    वाराहमिहिर
     दसकुमारचरित    दंडी
     स्वप्नवासवदत्ता, पृतिजनोयोगंधरायन    भास
     ब्रह्म सिद्धांत    ब्रह्मगुप्त
     हर्षचरित, कादम्बरी    वाणभट्ट
     पृथ्वीराजरासो    चन्दबरदाई
     हम्मीरमदमर्दन    जयसिंह
     इंडिका    मेगास्थनीज
     कामांदक नीतिसार    शेखर
     मृच्छकटिकम्    शूद्रक
     रावणवध    भट्टी
     किरातार्जुनीया    भारवि
     पंचतंत्र    विष्णु शर्मा
     सूर्य सिद्धांत    आर्यभट्ट
     प्रयाग प्रशस्ति    हरिषेण
     आर्य सिद्धांत    आर्यभट्ट
     शिशुपालवध    माघ
     वासवदत्ता    सुबंधु
     बृहतकथामंजरी    क्षेमेन्द्र
     कामसूत्र    वात्सयायन
     कोकशास्त्र   कोकापंडित
  • पूर्व की भाँति इस काल में आश्रम-व्यवस्था कायम थी परंतु व्यावहारिक जीवन में ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के ही कुछ लोग वानप्रस्थी और संन्यासी बनते थे।
  • विवाह एक संस्था के रूप में कायम था। यज्ञादि में पति-पत्नी को एक साथ होना पड़ता था।
  • ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल में आज की तरह प्राग्वैवाहिक प्रसाधन (कोर्टशिप) भी होता था।
संस्कृत साहित्य
 काव्य

     कविराज    राघवपंडविय    जीनसेन    पाश्र्वभ्युदय-काव्य
     श्रीहर्ष    नैसधचरित    जयदेव    गीत-गोविन्द
     हेमचन्द्र    द्वाश्रय-काव्य    सोमदेव    कीर्ति कौमुदी
     जयानक    पृथ्वीराज-विजय    कल्हण    राजतरंगिणी
 खंडकाव्य 
     राजशेखर    काव्यमीमांशा    धनंजय    दसरूप
     भोज    सरस्वती कंठाभरण    हेमचन्द्र    काव्यानुशंसा
 नाटक
     भवभूति    मालतीमाधव, महावीर चरित, उत्तर रामचरित
     राजशेखर    बालरामायण, बालभारत
     सोमदेव    ललित विग्रह-राज
 शब्दकोष 
     हलयुध    अभिधन रत्नमाला
     हेमचन्द्र    अभिधन-चिंतामणि
     महेश्वर    विश्व प्रकाश
 दर्शन
     कुमारिल    व्याख्यान तीन भाग में - श्लोक वर्तटीका, तंत्रवर्तटीका
     और तुपटीका
     वाचस्पति मिश्रा न्यायकनिका, तत्त्वबिन्दु कौमुदी
  • याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार रजस्वला होने से पूर्व कन्या का विवाह कर देना चाहिए। वात्स्यायन ने वर-वधु के बीच कम-से-कम तीन वर्ष के अंतर को आदर्श माना है।
  • राजपरिवारों में बहुविवाह का उल्लेख मिलता है।
  • विधवा विवाह भी प्रचलित था। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य  का अपने अग्रज रामगुप्त की विधवा पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह का उल्लेख साहित्यिक ग्रंथों में मिलता है।
  • अनमेल और अंतर्जातीय विवाह का भी जिक्र है। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के भी काफी उल्लेख मिलते हैं।
  • कालिदास के अनुसार उस काल में पूर्ववर्ती कालों की तरह आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे।
  • रघुवंश के अनुसार स्वयंवर-प्रथा का भी प्रचलन था।
  • कालिदास की कृतियों से पता चलता है कि कन्या को भरपूर प्यार मिलता था और उसका जन्म दुर्भाग्य के रूप में नहीं लिया जाता था। यद्यपि पुत्र का महत्व अधिक था।
  • कुमार संभव के अनुसार कन्या कुल का प्राण थी।
  • कात्यायन सम्पत्ति में नारी के अधिकारों को मान्यता देते हैं।
  • कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतलम् से पता चलता है कि कभी-कभी नारियों की उपेक्षा भी होती थी।
  • रघुवंश में कुछ जगहों पर नारी को पुरुष का भोग्या के रूप में दर्शाया गया है। फिर भी पत्नी और माता के रूप में नारी की स्थित संतोषजनक थी।
  • सती-प्रथा का भी एकाध जगहों पर उल्लेख मिलता है। एरण अभिलेख में गोपराज की पत्नी के सती होने का उल्लेख है।
  • तात्कालिक साहित्यों से पता चलता है कि समाज में वेश्याएँ भी थीं। वे शिशु जन्म के अवसर पर और मंदिरों में नृत्य करती थीं।
  • कुछ वेश्याओं का उनके रूप और गुण के कारण समाज में प्रतिष्ठा थी। वसंत सेना ने वेश्यावृत्ति छोड़कर विवाह किया था।
  • अमरकोश में वैदिक मंत्रों की शिक्षा प्रदान करने वाली स्त्रियों का उल्लेख है। आश्रम में रहने वाली स्त्रियाँ विभिन्न विषयों का अध्ययन करती थीं।
  • शील भट्टारिका नामक एक विदुषी महिला का उल्लेख है। मृच्छकटिकम् में अनेक शिक्षित महिलाओं का उल्लेख है। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पुत्री प्रभावती गुप्त सुशिक्षित थी।
  • पर्दे की प्रथा नहीं थी।
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