सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 1 (प्रश्न 15 से 28 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 1 (प्रश्न 15 से 28 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 15: माँग के आधुनिक सिद्धान्त में कीमत का प्रभाव आय-प्रभाव एवं प्रतिस्थापन प्रभाव का जोड़ है। व्याख्या करें।

ऊत्तर : आधुनिक सिद्धांत में कीमत का प्रभाव आय-प्रभाव एवं प्रतिस्थापन प्रभाव का जोड़ है। 
1. आय का प्रभाव : एक वस्तु की कीमत में परिवर्तन का प्रभाव गृहस्थों की क्रय-शक्ति (वास्तविक आय) पर पड़ता है। वस्तु की कीमत कम होने पर गृहस्थ की वास्तविक आय बढ़ती है, तथा कीमत बढ़ने पर वास्तविक आय कम हो जाती है। 
मान लीजिए, इस वर्ष सन्तरों की अच्छी फसल के कारण सन्तरों की कीमत 20 रु. प्रति-दर्जन से घटकर 10.00 रु. प्रति-दर्जन रह जाती है। ऐसी स्थिति में जो गृहस्थ 3 दर्जन सन्तरे प्रति-सप्ताह खरीदते थे, उतनी ही मुद्रा खर्च करके अब 6 दर्जन सन्तरे प्रति-सप्ताह खरीद सकेंगे। 
स्पष्ट है कि कीमत बढ़ने पर उपभोक्ताओं की वास्तविक आय कम हो जाती है, जिसके कारण वस्तु की माँग भी कम हो जाती है। इसके विपरीत, कीमत कम होने पर उपभोक्ताओं की वास्तविक आय बढ़ जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप वस्तु की माँग भी बढ़ जाती है। 

2. प्रतिस्थापन का प्रभाव : जब किसी एक वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो इसकी स्थानापन्न वस्तअपेक्षाकृत सस्ती हो जाती है। गृहस्थ उसी वस्तको अधिक मात्रा में खरीदना चाहता है, जो कि सस्ती होती है। 
मान लीजिए, चाय और काॅफी की कीमत प्रति-कप क्रमशः 3 रु. और 5 रु. है। अब यदि चाय की कीमत बढ़कर 4 रु. प्रति-कप हो जाती है, तो इसका अर्थ यह होगा कि काॅफी जो कि चाय की स्थानापन्न वस्तहै, की सापेक्षिक कीमत घट जाएगी।

इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता काॅफी की माँग को बढ़ा देंगे, या अन्य शब्दों में, चाय की माँग कम हो जाएगी। 
उपरोक्त सभी कारण माँग वक्र के नीचे की ओर झुकाने के लिए उत्तरदायी हैं। माँग वक्र का ढाल तथा माँग का नियम दोनों ही कीमत और माँग के विपरीत सम्बन्ध को प्रकट करता है। 


प्रश्न 16: भारत में तेलशोधक कारखानों के वितरण का परीक्षण कीजिए।

उत्तर : भारत में वर्तमान 17 बड़े तेलशोधक कारखाने तथा एक लघतेल शोधक कारखाना (डिगबोई) है। इनकी कुल स्थापित शोधनक्षमता 116.97 मिलियन टन है। तेलशोधन कारखानों की स्थापना कच्चे तेल की स्थानीय एवं आयातित (बन्दगाह) की उपलब्धता,  पेट्रोलियम उत्पादों की ब्रिकी के लिए बाजार एवं कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की परिवहन लागतों को ध्यान में रख कर की गई है। जहाँ तक घरेलू तेल उत्पादक क्षेत्रों का प्रश्न है, तो वे असम, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिमी बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल, अण्डमान एवं निकोबार द्विप समूहों और समुद्र में मुम्बई के निकट केन्द्रित है। भारत में कुल 33 मिलियन टन कच्चे तेल का ही उत्पादन हो पाता है। कुल माँग को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष लगभग 90 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया जाता है जो मुख्य रूप से पश्चिमी तट के बन्दरगाहों तथा पूर्वी तट के चेन्नई, विशाखापत्तनम्, बन्दरगाहों पर उतारा जाता है। डिगबोई तेलशोधक कारखाने को कच्चा तेल असम से मुम्बई के दोनों कारखानों को मुम्बई हाई सागर सम्राट् तथा अंकलेश्वर से; नूनमती को नहरकटिया, हुगली जान.मोरान एवं रुद्र सागर से; कोयाली को गुजरात एवं मुम्बई होई से, बोंगाई गाँव को नहरकटिया से, नुमालीगढ़ को डिगबोई से; मंगलौर, चेन्नई, विशाखापत्तनम्, कोचीन, जामनगर बरौनी, मथुरा, करनाल से आयतित कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। मथुरा, करनाल, बीना, भटिंडा आदि कारखानों की स्थापना का कारण तैयार उत्पादों को कम.से.कम लागत पर उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराना है। 

प्रश्न 17: अरावली को मेवाड़ और मरवाड़ के बीच का विभाजन क्यों कहा जाता है?

उत्तर : अरावली पर्वतमाला राजस्थान में पूर्व से लेकर पश्चिम तक फैली हुई है। यह पहाड़ी भाग मालवा पठार के उत्तर.पश्चिम में स्थित है। ये पहाड़ियाँ राजस्थान के पूर्व में धौलपूर, उत्तर.पूर्व में दिल्ली से लेकर जयपुर.अजमेर.चित्तौड़. उदयपुर से होते हुए अहमदाबाद तक फैली हुई है। समुद्र तट से 300 से 810 मीटर तक की औसत ऊँचाई वाली इस पर्वत शृंखला को उदयपुर के निकट जरगा की पहाड़ियाँ, अलवर के निकट हर्षनाथ की पहाड़ियाँ कहा जाता है। राजस्थान में इनका फैलाव इस प्रकार का है कि उनके उत्तर तथा उत्तर पश्चिम में मारवाड़.जोधपुर, बीकानेर और थार मरुस्थल का क्षेत्रा आता है, जबकि इनके दक्षिण में मुख्य रूप से मेवाड़.उदयपुर, चित्तौड़ का क्षेत्रा आता है। इस प्रकार अरावली पर्वतमाला मेवाड़ एवं मारवाड़ के विभाजक का कार्य करती है। 


प्रश्न 18: स्वर्ण चतुर्भुज क्या है। देश के आर्थिक विकास में इससे किस प्रकार सहायता मिलेगी?

उत्तर : दिल्ली.मुम्बई; मुम्बई.चेन्नई; चेन्नई.कोलकाता तथा कोलकाता.दिल्ली को चार से छः लेन वाले विश्वस्तरीय राजमार्गों से जोड़ने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना के पहले चरण को स्वर्ण चतुर्भुज नाम दिया गया है। इस परिपथ की कुल लम्बाई 5846 किमी है। स्वर्ण चतुिर्भुज से देश के चारों महानगरों सहित अन्य प्रमुख शहर विश्वस्तरयी राजमार्गों से जुड़ रहे हैं जिससे वाहनों निर्वाध आवागमन में सुविधा होगी। यात्रा में समय कम लगेगा। डीजल एवं पेट्रोल की खपत में कमी आएगी तथा वाहनों की टूट.फूट भी कम होगी। एक मोटै अनुमान के अनुसार केवल इतने ही परिपथ के निर्माण पर 100 लाख टन सीमेन्ट, 8.6 लाख टन इस्पात की खपत हो रही है जिससे सीमेन्ट उद्योग, इस्पात उद्योग में तेजी का दौर आया है। 1997-2007 की अवधि में सड़कों के निर्माण से लगभग 7.3 करोड़ मानव दिवस रोजगार सृजित होने की सम्भावना है। 
इस परियोजना से सड़क निर्माण मशीनरी उद्योग को भी भारी लाभ होगा। सड़कों के बन जाने पर सड़कों के किनारे आवासीय बस्तियों, रेस्टोरेन्टों, होटलों, ईंधन स्टेशनों, यातायात नगरों, मोटर गैराजों, शाॅपिंग काॅम्पलेक्सों तथा मालों का निर्माण होगा जिससे बड़ी मात्रा में रोजगार सृजित होगा तथा व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी आएगी।

 

प्रश्न 19 : निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिएः
  
(क) ऐल नीनो, ला नीना और मानसून वर्षा
(ख) साँभर झील
(ग) सून्दर वन
(घ) बौम्बे हाई
(ङ) सबरकंथा और बनासकंथा

उत्तर : (क) ऐलनीनो एक गर्म धारा है जो दक्षिणी विषुवतीरेखीय धारा से निकलकर पेरू के तट के समानान्तर उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। इसके विपरीत ला नीना एक ठण्डी धारा है। ऐलनीनो के प्रभाव से दक्षिणी प्रशान्त महासागर क्षेत्रा में तापमान आवश्यकता से अधिक हो जाता है जिससे मानसूनी वर्षा अपेक्षा से कम हो जाती है। 
(ख) राजस्थान में जयपुर के निकट स्थित सांभर झील भारत में खारे पानी की सबसे बड़ी झील है। इस झील से नमक का उत्पादन किया जाता है। 
(ग) प. बंगाल में गंगा.ब्रह्मपुत्रा के डेल्टा वाल क्षेत्रा में स्थित सुन्दबन में सुन्दरी वृक्ष अधिकता में पाए जाते हैं जिनकी जड़ें जटाओं की तरह फैली होती हैं।
(घ) मुम्बई के निकट अरब सागर में 175 किमी दूर तेल का एक कुआँ है जहाँ सागर सम्राट नामक प्लेटफार्म से कच्चे तेल की निकासी की जाती है। भारत का यह सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। 
(ङ) सबरकंथा तथा बनासकंथा गुजरात राज्य के दो जिले हैं। सबरकंथा की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। लेकिन यह क्षेत्र सूखाग्रस्त है। जबकि बनासकंथा इत्रा, डेयरी उद्योग, वाथिमारी बैल तथा कंकराज गायों के लिए जाना जाता है। 

 

प्रश्न 20: भारत में मानव विकास पर यू.एन.डी.पी. की रिपोर्ट को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रत्येक वर्ष मानव विकास रिपोर्ट (Human Development Report) जारी की जाती है। इस रिपोर्ट में विकसित, विकासशील एवं अविकसित देशों में मानव विकास की स्थितियों की तुलना की जाती है। वर्ष 2004 के लिए जारी रिपोर्ट में भारत को सांस्कृतिक स्वतंत्राता, बहुलता, भाषाई, आर्थिक-सांस्कृतिक विविधता के बड़े जनक्षेत्रा के रूप में निरूपित किया गया है, तथापि भारत में बढ़ते जातीय तथा धामिर्क समुदायों में बढ़ती हताशा और उससे उपजी हिंसा के प्रति चिन्ता जताई गई। है। इस दृष्टि से रिपोर्ट में गुजरात राज्य में गोधरा काण्ड से उपजी साम्प्रदायिक हिंसा से हुए नरसंहार का विशेष रूप से हवाला दिया गया है। 
"विश्व  में सांस्कृतिक स्वतंत्राता तथा विविधता पर केन्द्रित वर्ष 2004 की रिपोर्ट में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि विगत 10.15 वर्षों की अवधि में मानव विकास के विभिन्न पहलुओं शिक्षा, जीवन प्रत्याशा, प्रति व्यक्ति आय आदि के मामले में सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार अपेक्षाओं से काफी कम है। भारत में जीवन स्थितियों में सुधार की दर 1975 में 0.411 से बढ़कर वर्ष 2001 में 0.595 हो गई है। जीवन प्रत्याशा की स्थिति में बेहतर ढंग से सुधार होते.होते यह 63.x`x`x`7 वर्ष के स्तर पर पहुँच गई है। 
लेकिन जब भारत की इन उपलब्धियों की तुलना अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर की जाती है, तो मानव विकास के लगभग सभी सूचकों के मामलों में भारत काफी नीचे चला जाता है। उदाहरणार्थ रिपोर्ट में शामिल 177 देशों की सूची में मानव विकास सूचकांक के मामले में भारत 127वें स्थान पर है। मानव निर्धनता सूचकांक के लिए 95 देशों की सूची में भारत की स्थिति 48वीं है। लिंग.मूलक विकास में 144 देशों में भारत 103 वें स्थान पर है। पारम्परिक तौर पर आकलित सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से भारत का विश्व में 177वां स्थान है। 

 

प्रश्न 21: "क्या  शिक्षा पर और अधिक व्ययन उच्चतर साक्षरता के साथ जुड़ा है?" चर्चा कीजिए।

उत्तर : सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में निरपेक्ष रूप से 35 करोड़ से अधिक लोग निरक्षर हैं। शत.प्रतिशत साक्षरता स्तर प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, सर्वशिक्षा अभियान, आपे्रशन ब्लैकबोर्ड जैसे अनेक कार्यक्रम चलाए जाने के बावजूद दुनिया में सबसे अधिक निरक्षर भारत में ही होना एक अभिशाप है। अब जबकि शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है, तो साक्षरता के उच्चतर स्तर को प्राप्त करने के लिए और अधिक व्ययन की आवश्यकता तो होगी ही। वह भी तब जबकि  देश के दूर.दराज के इलाकों में 80 प्रतिशत से अधिक विद्यालयों में पर्याप्त कमरे नहीं हैं, 45 प्रतिशत विद्यालय बिना भवनों के खुले में चल रहे हैं, 65 प्रतिशत विद्यालय में टाट.पट्टी, फर्नीचर, ब्लैकबोर्ड जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों में अनेक विद्यालय अध्यापाक विहीन हैै तथा अनेक विद्यालयों में केवल एक ही अध्यापक है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि केवल बच्चों को विद्यालय में नाम लिखा देना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे कम से कम  पाँच वर्ष तक विद्यालय में ही शिक्षा ग्रहण करें।
 

प्रश्न 22: (a) भारतीय कृषि विकास में नवीन तकनीकी निवेश की भूमिका की विवेचना कीजिये। यह किस प्रकार इक्कीसवीं शताब्दी में खाद्य सुरक्षा में सहायक होगा?
अथवा
(b) फास्ट ब्रीडर रिएक्टर क्या है? भारतीय सन्दर्भ  में उसकी उपयुक्तता पर टीका कीजिये।

उत्तर : (a) भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी राष्ट्रीय आय का लगभग एक तिहाई हिस्सा कृषि से प्राप्त होता है और इसकी दो तिहाई जनसंख्या अपनी जीवकिा के लिए कृषि में सलंग्न जनसंख्या तथा उसके द्वारा उत्पादित खाद्यान्नों में सामंजस्य नहीं है। साथ ही, हमारे देश का प्रति हेक्टेयर उपज अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम है, अतः जहां एक ओर कृषि क्षेत्रा में संलग्न लोगों में अल्प रोजगार है, वहीं भारतीय कृषि में उपज बढ़ाने की प्रबल संभावनाएं हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कृषि में आधुनिक तकनीक का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये।
भारत में साठ के दशक के मध्य में ‘हरित क्रांति’ आयी थी। विभिन्न कारकों द्वारा कृषि उत्पादकता में व्यापक वृद्धि हुई। ये कारक थे: अधिक उर्वरक उत्पादन, बौनी किस्मों का प्रयोग, क्रमबद्ध सिंचाई, फसल नाशक जीवों एवं रोगों का नियंत्राण तथा शुल्क एवं सीमांत खेती के लिए विशिष्ट निर्देश। कृषि विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्थानों में मिशन उन्मुखी उत्कृष्ट अनुसंधान तथा प्रयोगशाला से खेतों तक प्रौद्योगिकी को ले जाने के कारण काफी लाभ मिलता देखा गया और आज दूसरी हरित क्रांति के रूप में जैव प्रौद्योगिकी ने आशा की एक नयी किरण बिखेर दी है।
मानव के लिए उपयोग वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करने के लिए सूक्ष्म जीवों तथा जैविक प्रणाली का उपयोग करना ही जैव प्रौद्योगिकी कहलाता है। इसमें संयुक्त रूप से विभिन्न प्रकार की तकनीकें जैव रसायन, आनुवंशिकी, पादप कायकी, सूक्ष्म जीवविज्ञान तथा जैव-रासायनिक अभियांत्रिकी आदि सम्मिलित हैं। आधुनिक जीवविज्ञान का यह एक महत्वपूर्ण भाग है, जो ऊर्जा लागत की बढ़त, प्रदूषण, पुनर्नवीकरणीय संसाधनों आदि की समस्याओं के लिए कम खर्चीला तथा सक्षम समाधान प्रस्तुत करता है। संक्षेप में, यह सीधे तौर पर सूक्ष्मजीवी बायोमास, उपयोग पदार्थ तथा विशेष रसायनों की बड़ी मात्रा में उत्पादन, सूक्षमजीवी कोशिकाओं से इच्छित एंटीजन, एंटीबाॅडी आदि के रूपांतरण तथा उन्नत विभेद उपलब्ध कराने और मिट्टी सुधार हेतउचित पदार्थों को प्राप्त करने जैसे कार्यों से संबंधित है। खाद्य उद्योग में इसके द्वारा आरंभिक पदार्थ तथा एंजाइम प्राप्त किये जाते हैं। इस नयी तकनीक के प्रयोग से विशिष्ट वसा तथा स्टेराॅल का उत्पादन संभव है। एंजाइम प्रौद्योगिकी की मदद से वसा की आण्विक संरचना भी बदली जा सकती है। कृषि अनुसंधान के क्षेत्रा में पृथक्करण तथा आवश्यकतानुसार उनमें उत्परिवर्ती तैयारी करने की क्षमता प्राप्त करना आसान हो गया हैं फसल सुधार के लिए पुनर्योजी डी.एन.ए. तकनीक असीमित जीन पूल प्रस्तुत करती है। एग्रो बैक्टीरियम ट्यूमेफेसिएंस नामक जीवाणका प्रयोग पौध-कोशिकाओं में जीन प्रविष्ट कराने के लिए वाहक के रूप में किया गया है, जिससे पौधों के शाकरोधी या रोगरोधी विभेद प्राप्त हो सकें। इस वाहक प्रणाली द्वारा काफी संख्या में जीन ले जाये जाने के कारण इसे प्रायः द्विबीजपत्राी पौधों के लिए काम में लाया जाता है।
कृषि में वैज्ञानिक प्रविधियों के प्रयोग के रूप में उर्वरकों का आजकल बहुधा इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ प्रकाश संश्लेषण क्रिया को बढ़ाया जा सकता है, ताकि पोधों की उचित वृद्धि को संभव बनाया जा सके। पौधों को आनुवंशिकी रूप से शाकधानियों तथा नाशक जीवों के प्रति सहनशील बनाया जा सकता है, ताकि अधिक उपज प्राप्त हो सके। आ£थक महत्व की फसलों में ऐसे जीनों को डालने की संभावनाएं भी जांची गयी हैं, जिनमें सारभूत एमिनो अम्लों से भरपूर प्रोटीनों के निर्माण की सूचना निहित होती है।
खाद्य पदार्थों की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए न सिर्फ उनके उत्पादन में वृद्धि करने की जरूरत है, बल्कि संरक्षित रूप से समस्त उत्पादन को विनष्ट हुए बिना उसका पूर्ण उपयोग भी आवश्यक है। 21वीं सदी में कोबाल्ट-60 तथा सीजियम-137 नामक समस्थानिकों का खाद्य परिरक्षण के तौर पर उपयोग कर इससे बचाया जा सकता है। साथ ही, अािक उपज प्राप्व्त करने तथा सक्षम बीजों की प्राप्ति के लिए जैव कृषि की अपनाये जाने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा के प्रति सचेष्ट हुआ जा सकता है। जैव कृषि के तहत रासायनिक उर्वरकों का ही प्रयोग किया जाता है, जो कि वातावरणीय प्रदूषण को भी घटाते हैं। कुल मिलाकर जीन परिरक्षण, उन्नत आनुवंशिकी, जैव प्रौद्योगिकी तथा जैव कृषि एवं जैव उर्वरकों के प्रयोग से 21वीं सदी में खाद्य सुरक्षा के प्रति निश्चिंत हुआ जा सकता है।

उत्तर : (b) फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफ.बी.आर.) भारत के परमाणऊर्जा कार्यक्रम के द्वितीय चरण का द्योतक है। इस रिएक्टर के लिए उपयुक्त ईंधन यूरेनियम-प्लूटोनियम आॅक्साइड के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इसमें शृंखला अभिक्रिया को तेज न्यूट्राॅन द्वारा जारी रखा जाता है, जिसके कारण ताप रिएक्टर की अपेक्षा इसमें अधिक संख्या में न्यूट्राॅन का उत्सर्जन होता है। इसमें शीतलक के रूप में सोडियम का उपयोग किया जाता है तथा रेडियो सक्रिय पदार्थों का बहुत कम उत्सर्जन हो पाता है।
कलपक्कम (तमिलनाडु) स्थित इंदिरा गांधी अनुसंधान केंद्र में इसका सफलतापूर्वक संचालन प्रारंभ हो चुका है। यद्यपि परीक्षण के तौर पर ऐसा रिएक्टर लगाया जा चुका है, परंतव्यावसायिक स्तर पर इससे बिजली पैदा नहीं की जा सकती है। दरअसल, इन रिएक्टरों के लिए यूरेनियम जैसे प्राथमिक ईंधनों की जरूरत नहीं होती है, बल्कि यूरेनियम से चलने वाले ताप रिएक्टरों में प्रयुक्त ईंधनों से उत्पन्न प्लूटेनियम को आवश्यकता होती है। यह नाभिकीय शस्त्रों में भी प्रयुक्त होता है। अतः बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन एवं संग्रहण काफी जटिल है।
वर्तमान में परमाणऊर्जा संयंत्रों में परमाणविखंडन प्रक्रिया का उपयोग किया जाता हैं। भारत के पास पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक यूरेनियम उपलब्ध है, परंतइसे संव£द्धत करने के साधन नहीं हैं। मुक्त किये गये शेष ईंधन में पर्याप्त मात्रा में विखंडन पदार्थ मौजूद रहता है, जिससे इसकी प्राप्ति लाभप्रद होती है। ब्रीडर रिएक्टर उपयोग किये जाने वाले ईंधन से अधिक विखंड्य पदार्थ देता है। परमाणविखंडन से भी उपयोगी ऊर्जा की प्राप्ति संभव है, परंतइसके लिए काफी उच्च तापक्रम की जरूरत होती है तथा इससे प्राप्त ऊर्जा को नियंत्रित करना भी मुश्किल होता है।
इस प्रकार, यद्यपि वर्तमान परिस्थितियों में भारत ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की स्थापना कर ली है, परंतकई तरह की समस्याओं, यथा: वैज्ञानिक तकनीक के अभाव, अंतर्राष्ट्रीय दबाव आदि के चलते इसे अपनी इस योजना को बढ़ाने में दिक्कतें पेश आ रही हैं।

 

प्रश्न 23: अंग्रेज शासकों द्वारा भारत में  प्रेस की स्वतंत्राता पर अंकुश लगाने के लिए अधिनियमित प्रमुख विनियमों पर चर्चा कीजिए।  

उत्तर : सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्राता संग्राम आन्दोलन के बाद से शिक्षित भारतीयों में जागरूकता आई जो विभिन्न प्रकार के समाचार.पत्रों, पत्रिकाओं के लेखों एवं सम्पादकीय टिप्पणियों से उजागर होती थीं। औपचारिक तौर पर भारत में पहला समाचार.पत्रा सन् 1780 में प्रकाशित होना प्रारम्भ हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारत के सभी प्रमुख शहरांे से अंग्रेजी भाषा में तथा स्थानीय भाषाओं में समाचार.पत्रा प्रकाशित होने लगे। इनमें राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बन्धित समाचार भी प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। प्रारम्भ में अधिकांश समाचार.पत्रों का प्रबंन्धन अंग्रेजों के हाथों में था। जिस किसी अंगे्रज सम्पादक या मालिक से ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मालिक रुष्ट हो जाते थे, उसे इंगलैण्ड वापस भेज दिया जाता था, लेकिन भारतीय सम्पादकों/मालिकों के साथ ऐसा करना सम्भव नहीं था। इसलिए सरकार ने प्रेस की स्वतंत्राता पर अंकुश लगाने के लिए निम्नलिखित विनियमों को अधिनियमित किया।

सेंसरशिप अधिनियम, 1799 -  भारत के विभिन्न भागों में फ्रांसीसी आक्रमण के भय से लाॅड वैलेजली ने 1799 में पे्रस पर सेंसरशिप लगा दी जिसके तहत् प्रत्येक अंक पर छापने वाले, सम्पादक तथा मालिक का नाम छापना अनिवार्य बना दिया गया। किसी भी समाचार सम्पादकीय एवं लेख को प्रकाशित करने से पूर्व उसे सेंसरशिप हेतसरकार के पास जमा करना होता था। सन् 1807 में इस अधिनियम को पत्रिकाओं, पुस्तकों तथा पर्चों पर भी लागू कर दिया गया। यद्यपि लाॅर्ड हेसंटिग्स ने इस अधिनियम को समाप्त कर दिया तथापि ऐसे किसी भी लेख/समाचार के प्रकाशन पर पाबन्दी लगी रही जो सरकार की सत्ता को चुनौती देता हो अथवा जनहित में न हो।

अनुज्ञाप्ति विनियमन, 1823 - कार्यकारी गवर्नर जनरल जाॅन एडम ने लाॅर्ड हेस्टिंग्ज की नीति को समाप्त करते हुए अनुज्ञाप्ति विनियमन, 1823 लागू किया जिसके तहत् प्रत्येक प्रकाशक एवं प्रिन्टर को सरकार से अनुज्ञा लेनी होती थी। न लेने पर 400 रुपए जुर्माना किया जा सकता था तथा उनकी प्रेस सरकार जब्त कर सकती थी। अनुज्ञा को सरकार कभी भी रद्द कर सकती थी। विलियम बैंटिक ने इन विनियमनों को जारी रखते हुए प्रेस को कुछ स्वतन्त्राता प्रदान की। "भारतीय प्रेस को आजादी दिलाने वाले“ के रूप में विख्यात कार्यवाहक गवर्नर जनरल चाल्र्स मेटकाफ ने अनुज्ञाप्ति अधिनियम को निरसन कर दिया। यह स्थिति सन् 1856 तक विद्यमान रही।

अनुज्ञाप्ति अधिनियम, 1857 - 1857 के विद्रोह के कारण अनुज्ञाप्ति अधिनियम 1857 नए सिरे से पारित किया गया जो एक वर्ष तक जारी रहा।

पंजीयन अधिनियम, 1867 - मेटकाफ द्वारा पारित अधिनियम, 1835 को ‘पे्रस एण्ड रजिस्टेªशन आॅफ बुक्स अधिनियम, 1867 से प्रतिस्थापित कर दिया गया जिसके अन्तर्गत प्रेस की स्वतन्त्राता पर सीधे तौर पर कोई अंकुश तो नहीं लगाया गया, लेकिन प्रत्येक छापेखाने, के लिए प्रिन्टर, प्रकाशक का नाम तथा पता छापना अनिवार्य कर दिया गया। प्रत्येक प्रकाशक को एक प्रति सरकार के पास भी जमा करनी होती थी। सन् 1870 में भारतीय दण्ड संहिता में देश द्रोह की एक धारा को जोड़कर प्रेस की स्वतन्त्राता पर अंकुश लगाया गया।

वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम, 1878 - भारतीय भाषाओं के समाचार.पत्रा तथा पत्रिकाएं ब्रिटिश सरकार की रंग विरोधी नीति की आलोचना कर रही थी तथा लाॅर्ड लिट्टन द्वारा उठाए गए कतिपय उपायों की तीखी आलोचना की थी । इससे प्रभावित होकर लाॅर्ड लिट्टन ने वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम पारित करके प्रेस की स्वतन्त्राता पर अंकुश लगा दिया। इस अधिनियम के तहत् मजिस्ट्रेटों को यह अधिकार दे दिया गया कि वे किसी भी समाचार.पत्रा के प्रकाशक से इस बात का आश्वासन ले कि वह ऐसा कोई भी समाचार या लेख प्रकाशित नहीं करेगा जिससे शान्ति भंग हो सकती हो या सरकार की सुरक्षा को कोई खतरा पैदा हो सकता हो। भारतीयों द्वारा इस अधिनियम की तीखी आलोचना की गई तथा इसे ‘Gagging Act’ की संज्ञा दी गई। लाॅर्ड रिपन ने 1882 में इस अधिनियम को वापस ले लिया। लाॅर्ड कर्जन ने भारतीय दण्ड संहिता में कतिपय प्रावधान जोड़ कर प्रेस की स्वतंत्राता पर अंकुश लगाया।

समाचार.पत्रा अधिनियम, 1908 - इस अधिनियम के द्वारा मजिस्ट्रेटों को हिंसा फैलाने के दोषी पाए जाने पर किसी भी समाचार.पत्रा के छापेखाने, कार्यालय की सम्पत्ति को जब्त करने का अधिकार दे दिया गया। 

भारतीय प्रेस अधिनियम, 1910 - इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थानीय सरकारों को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वे किसी भी प्रेस से जमानत की राशि माँग सकती थीं, ‘आपत्तिजनक सामग्री’ छापने के दोषी पाए जाने पर यह जमानत राशि जब्त की जा सकती थी तथा समाचार पत्रा का पंजीयन रद्द किया जा सकता था। 

भारतीय प्रेस अध्यादेश 1930 - भारतीय प्रेस पर दमनात्मक कार्यवाही और अधिक कठोरता के साथ करने की नीयत से सरकार ने यह अध्यादेश जारी किया ।
सन् 1942 में सरकार ने भारतीय प्रेस पर निम्नलिखित प्रतिबन्ध लगाए-

  • संवाददाताओं का पंजीयन।
  • नागरिक उथलपुथल सीमित कर दी गइ।
  • तोड़.फोड़ के कृत्यों के समाचारों का प्रकाशन।
  • अनिवार्य पे्रस सलाह।
  • नागरिक आन्दोलनों से सम्बन्धित शीर्षक पंक्तियों तथा स्थान को सीमित कर देना।
  • मनमानी सेंसरशिप।
     

प्रश्न 24: सहयोग आन्दोलन का समालोचनात्मक आकलन कीजिए।

उत्तर : असहयोग आन्दोलन -जुलाई 1920 को महात्मा गांधी ने वायसराय को औपचारिक तौर पर यह सूचित कर दिया कि वे निम्नलिखित दो मुद्दों पर सत्याग्रह प्रारम्भ करने जो रहे हैं-
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित तुर्की के सुल्तान, ओटोमान साम्राज्य के शासक को खलीफा, (मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी) माना जाता था। अंग्रेजों ने उनके अधिकार क्षेत्रा (खिलाफत) को इस सीमा तक कम कर दिया कि इस्लाम के अनेक पवित्रा स्थान तुर्की से छीन लिए गए। भारत के मुसलमानों ने अंग्रोजों के इस कृत्य के विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन छेड़ दिया।
पंजाब में जालियाँवाला बाग में किए गए जघन्य हत्याकाण्ड
गांधीजी ने महसूस किया कि उपर्युक्त दोनों मुद्दों को एक साथ मिलाकर यदि अंग्रेज शासन के विरुद्ध अहिंसक सत्याग्रह प्रारम्भ किया जाए तो इससे न केवल हिन्दू मुस्लिम एकता मजबूत होगी, वरन् अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए मजबूर होंगे।
असहयोग आंदोलन 1 अगस्त, 1920 को प्रारम्भ किया गया यद्यपि सितम्बर 1920 में कलकत्ता के अधिवेशन में एनी बेसेन्ट, चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू तथा सिन्हा जैसे सभी बड़े नेताओं ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन का विरोध किया। कांग्रेस के ये नेता विद्यालयों तथा महाविद्यालयों का बहिष्कार करने, काउंसिलों का बहिष्कार करने के विरुद्ध थे तथापि गांधीजी अपनी प्रगतिशील अहिंसक एवं असहयोग की नीति को मनवाने में सफल रहे।
गांधीजी ने अपने आन्दोलन को ‘शान्तिपूर्ण तख्तापलट’ की संज्ञा दी और देश वासियों से सरकार के प्रत्येक कानून का पालन न करने की अपील की। इस आंदोलन के जरिए वे तिलक कोष में एक करोड़ रुपए की धनराशि जमा करना चाहते थे, ताकि आगे के दिनों में असहयोग आन्दोलन का खर्चा चलाया जा सके। साथ ही वे एक करोड़ स्वयं सेवकों का ऐसा समूह बनाना  चाहते थे जो सामाजिक, शैक्षणिक, विधिक एवं आर्थिक स्तर पर अनेक प्रकार के बहिष्कार कार्यक्रमों को चला सके। 
इस आन्दोलन को प्रारम्भिक रूप से व्यापक सफलता मिली। तिलक कोष में लक्ष्य से अधिक धनराशि जमा हुई। मोतीलाल नेहरू, चितरंजनदास, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी जैसे नामी.गिरामी वकीलों ने वकालत छोड़ दी। इससे पे्ररित होकर देश के विभिन्न भागों में अदालतों का बहिष्कार किया गया।  विद्यार्थियों ने अंग्रेजों द्वारा संचालित महाविद्यालयों तथा विद्यालयों का बहिष्कार किया। विदेशी वस्त्रों तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की भावना जाग्रत हुई। काशी विद्यापीठ, जामिया मिलिया जैसी स्वदेशी संस्थाएं स्थापित हुई।
एक वर्ष में ही असहयोग आन्दोलन ने सारे भारत में जनजागृति पैदा कर दी। हिन्दू.मुस्लिम एकता के लिए इस काल को स्वर्णिम युग कहा जाता है। नीतिकारों का मानना है कि यदि चैरी.चैरा में उग्रभीड़ द्वारा पुलिस थाने को जलाकर सिपाहियों को जिन्दा जलाने जैसी हिंसक घटना से दुःखी होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन, वापस न लिया होता, तो भारत के स्वतन्त्राता संग्राम आन्दोलन के इतिहास की तस्वीर कुछ दूसरी ही होती। 

प्रश्न 25: क्या जवाहरलाल नेहरू वास्तव में गांधी जी की ‘भाषा बोलते’ थे? उनके मध्य सहमति एवं असहमति के बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : जवाहरलाल नेहरू को गांधी के प्रति काफी श्रद्धा थी। वे गांधी जी को भारतीय प्रणाली पर आधारित भारतीय नेतृत्व मानते थे। गांधी का स्वराज्य का वायदा जिसे नेहरू ने सुनहरी कल्पना बताया था, अविश्वसनीय था। गांधी जी इसे नेहरू के पूर्ण स्वतंत्राता के लक्ष्य के मार्ग में नहीं आने देना चाहते थे। परन्तदोनों में लक्ष्य तथा कार्य के प्रति निष्ठा की भावना के आधार पर पर्याप्त समानता थी। उन्होंने निस्वार्थ रूप से कार्य किया। कई बिन्दुओं पर असहमति होने के बावजूद दोनों एक-दूसरे का पूर्ण सम्मान करते थे। नेहरू गांधी से अत्यधिक प्रभावित थे तथा उन्हें गांधी के नेतृत्व में अटूट विश्वास था। गांधी भी यह मानते थे कि नेहरू उनकी ही ‘भाषा बोलते’ हैं। जलियांवाला बाग की घटना (1919) के बाद गांधी के सम्पर्क में आए नेहरू का भारतीय राजनीति में प्रवेश गांधी द्वारा शुरू किये जाने वाले सत्याग्रह की घोषणा पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में हुआ था। नेहरू भी गांधी की तरह मानवतावादी विचार, ग्रामीण विकास को प्राथमिकता, जन आंदोलन के महत्व एवं देश के प्रति अगाध प्रेम का विचार रखते थे। गांधी द्वारा आरंभ किए गए सभी आंदोलनों जैसे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं रचनात्मक कार्यों को नेहरू का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। लेकिन नेहरू पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन, ट्रस्टीशिप के विचार, किसी भी जन आंदोलन को बीच में ही बंद कर देने, राजनीति में धर्म के महत्व, विशाल उद्योगों का विरोध, वैज्ञानिक सोच की अवहेलना एवं सिर्फ व्यवहारिक शिक्षा की धारणा से असहमति रखते थे। नेहरू ने गांधी के विचारों के विरुद्ध समाजवादी विचार को अधिक समर्थन दिया एवं गांधी जी के लाख मना करने पर भी भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया  था।
 

प्रश्न 26: प्रारम्भिक भारतीय राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्य आर्थिक राष्ट्रीयता में किस प्रकार प्रदर्शित करते हैं?

उत्तर : 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में महादेव गोविन्द रानाडे, दादाभाई नौरोजी, आर.सी. दत्त जैसी राष्ट्रीय नेताओं ने अपने समय की आर्थिक विकास के प्रश्न का गहराई के साथ अध्ययन किया तथा ऐसा करके आर्थिक परिदृश्य का वह चित्रा प्रस्तुत किया जो भारत की औपनिवेशिक सत्ता द्वारा शोषण के तथ्य को सामने लाता था। वह अपने लेखन और वाणी के द्वारा यह सिद्ध करने में समर्थ रहे कि भारत की गरीबी के लिए भारत सरकार की आर्थिक नीतियां ही उत्तरदायी हैं इस प्रकार अपने विचारों में उन्होंने आर्थिक राष्ट्रवाद को मूर्तरूप दिया तथा अखिल भारतीय कांग्रेस ने जो आर्थिक मांगें सरकार के सम्मुख प्रस्तुत कीं वह भी इन विचारों पर ही आधारित थीं। इस तरह आर्थिक राष्ट्रवाद भारत में प्रारम्भिक राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्यों को प्रदर्शित करता है।
भारत के प्रारम्भिक राष्ट्रवादी यह बताने में सफल रहे कि भारत अत्यन्त गरीब देश तथा प्रतिदिन गरीब होता जा रहा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक विकास में भारत यूरोप से बहुत पीछे था तथा समय के साथ और अधिक पिछड़ा एवं अल्पविकसित होता जा रहा था। इन भारतीय  लेखकों ने इस तथ्य से इंकार नहीं किया कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत की आर्थिक संरचना में तीव्र परिवर्तन से मात्रा इतना हुाआ कि सामंतीय पिछड़ापन अब औपनिवेशिक पिछड़ेपन में बदल गया। भारत के इन राष्ट्रीय नेताओं ने दो टूक शब्दों में बताया कि भारत की इस आर्थिक बदहाली के लिए ब्रिटिश शासन के द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियां उत्तरदायी हैं, जो ब्रिटिश हितों के पोषण के लिए बनाई जाती थीं। आर्थिक राष्ट्रवाद की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति दादाभाई नौरोजी की ‘पावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ तथा आर.सी. दत्त रचित ‘भारत के आर्थिक इतिहास’ में हुई है। 
 
प्रश्न 27: निम्नलिखित में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए।
(क) भारतीयों पर नरम दल वालों का प्रभाव क्यांे समाप्त हो गया और वे अंग्रेजों से इच्छित प्रत्युत्तर प्राप्त करने में क्यों असफल रहे?
(ख) 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मुक्त व्यापार की नीति ने किस प्रकार भारतीय कपड़ा और कुटीर उद्योगों को हानि पहुंचाई?
(ग) नाविक विद्रोह की उत्पत्ति का वर्णन कीजिए। स्पष्ट कीजिए की इसने भारतीय राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया।

 उत्तर (क) : नरम दल वालों द्वारा भारतीयों को अधिक राजनीतिक अधिकार दिए जाने, प्रशासन को और अधिक उत्तरदायी बनाने, भारत का आर्थिक शोषण कम किए जाने आदि से सम्बन्धित मांगों को अंग्रेजी शासन द्वारा नहीं माने जाने के कारण इनका प्रभाव भारतीयों पर से समाप्त होता गया, क्योंकि जनता यह समझ चुकी थी कि ये लोग जनता के लिए भी कुछ कर सकने में असमर्थ हैं। साथ ही, जनता नरम दल की कार्य पद्धति ‘क्रमिक विकास तथा संविधानवाद’ एवं प्रार्थना, ज्ञापन तथा विरोध की अभिव्यक्ति को असम्मानजनक और अंग्रेजी शिक्षित भारतीय कुलीनों की भिक्षावृत्ति के रूप में देखती थी। और ये ऐसे कुलीन थे जो सामान्य जनता से एकदम पृथक थे। दूसरी तरफ, अरविंद घोष, तिलक, पाल, लाला लाजपत राय एवं रवीन्द्र नाथ टैगोर जैसे लोगों ने नरम दल वालों की प्रार्थनाओं और दरख्वास्तों के बदले ‘आत्मनिर्भरता’, ‘रचनात्मक कार्यों’ और ‘स्वदेशी’ के नये नारे को प्रचारित कर नरम दलों के भिखमंगेपन पर कड़ा आघात किया था। साथ ही नरम दल वाले अपनी कम संख्या, जनता का पूर्ण समर्थन नहीं और अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर अधिक विश्वास रखने के कारण अंग्रेजों से इच्छित प्रत्युत्तर प्राप्त करने में भी असफल रहे।

उत्तर (ख) : 19वीं शताब्दी का उत्तराद्ध्र्र वह समय था, जबकि इंगलैंड में  औद्योगिक क्रांति की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी तथा मशीनों के द्वारा कारखानों में उत्पादन पूरे जोर-शोर के साथ आरम्भ हो गया था। इस स्थिति का तात्पर्य यह था कि अब इंगलैंड विनिर्मित वस्तुओं विशेषकर वस्त्रों का उत्पादन इतनी मात्रा में हो रहा था कि वह न केवल अपने घरेलू बाजार की मांग को पूरा कर सकता था। अपितविदेशी बाजार में भी अपना माल भेज सकता था। इस विदेशी बाजार में भारतीय बाजार भी सम्मिलित था। इसका तात्पर्य यह था कि भारत के वस्त्रा उद्योग व अन्य हस्तशिल्प उत्पादनों को भारत तथा भारत के बाहर के बाजारों में ब्रिटिश माल की प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़ रहा था। मुक्त व्यापार की नीति का मतलब था कि इन भारतीय उत्पादनों को किसी भी प्रकार का संरक्षण अपनी तुलना में सस्ते व कम लागत के मशीनी माल के विरुद्ध नहीं था। अतः वह इस माल के सामने न  टिक सके तथा नष्ट हो गए। घरेलू बाजार में इंगलैंड के हस्तशिला पदार्थों का आयात 1860 में 96 लाख पौंड से बढ़कर 1900 में 27 करोड़ पौंड का हो गया। यह भारतीय हस्तशिला की अवनति का सूचक है। 

उत्तर (ग) : 1946 में 18.23  फरवरी तक को राॅयल इण्डियन नेवी (भारतीय शाही नौसेना) के गैर-कमीशंड अधिकारियों एवं नौसैनिकों, जिन्हें रेटिंग्ज कहा जाता था, ने बम्बई में सैनिक विद्रोह किया। इस नौसैनिक-विद्रोह के मुख्य कारण भोजन एवं वेतन के सम्बन्ध में भयंकर कष्टों और रंगभेद के आधार पर अत्यधिक अपमानजनक व्यवहार था, जिसमें भारतीय लोगों के राष्ट्रीय चरित्रा पर छींटाकशी करना भी शामिल था। इस नौसैनिक विद्रोह का प्रारम्भ नौसैनिक प्रशिक्षणपोत ‘तलवार’ के नौसैनिकों द्वारा खराब खाने के बारे में शिकायत के साथ हुआ। 19 फरवरी को बम्बई के 20 नौसैनिक जहाजों में इस नौसैनिक विद्रोह का असर हुआ। इस विद्रोह ने भारतीय राजनीति को निम्न रूप से प्रभावित किया:
(i) इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि बगैर किसी राजनीतिक दल के समर्थन के भी भारतीय जनता विद्रोह कर सकती है।
(ii) सम्पूर्ण भारत में इस विद्रोह के समर्थन में स्वतः उठे आंदोलनों ने राष्ट्रीय नेताओं को यह सोचने पर बाध्य कर दिया कि अब अगर कोई बड़ा स्वतंत्राता आंदोलन नहीं आरंभ किया गया तो जनता स्वयं ही आंदोलन शुरू कर देगी, जो अव्यवस्थित और हिसंक भी हो सकती है।
(iii) इस विद्रोह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अब सेना भी अंग्रेजी शासन के साथ नहीं है, यही कारण था कि अंग्रेजी सरकार ने वस्तुस्थिति को समझते हुए भारत की समस्या को हल करने के लिए 19 फरवरी, 1946 को तुरंत ही कैबिनेट मिशन को भारत भेजने की घोषणा की।
(iv) इस विद्रोह का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि इसने भारतीय स्वतंत्राता आंदोलन को और अधिक तीव्रता प्रदान करने में ईंधन का काम किया था।

 

प्रश्न 28: ”शिक्षक उस दीपक के समान है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है“ व्याख्या करें।

ऊत्तर : इस कार्य के लिए व्यक्ति में विशेष प्रकार की योग्यता, क्षमता, कुशलता, प्रवृत्ति, अभिवृत्ति और रुचि अपेक्षित है। इस अपेक्षित क्षमता का नाम ही शैक्षणिक अभिरूचि है। शिक्षा शास्त्रिायों ने इन अपेक्षित गुणों में कई बातें गिनाई हैं जैसे बौद्धिक योग्यता। इसे मानसिक योग्यता तथा विषयगत योग्यता के परीक्षण से जाँचा जाता है। दूसरी ओर यह जानना कि व्यक्ति में अध्यापन कार्य करने की लगन, निष्ठा, प्रवृत्ति और क्षमता कितनी है। भावी अध्यापन की सफलता के लिये ही इन क्षमताओं की जाँच की जाती है। अध्यापन कार्य में अपना विषय पाढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता। छात्रों के सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी अध्यापक के ऊपर होती है। अतः अध्यापक को देश-विदेश, सामाजिक ज्ञान, नैतिक शिक्षा, संस्कृति, खेल-कूद, संगीत, मनोविज्ञान की भी जानकारी अवश्य होनी चाहिए। शिक्षक का आचरण श्रेष्ठ होना चाहिए ताकि वह बच्चों के चरित्रा निर्माण व सर्वांगीण विकास पर प्रभावी असर डाल सके।
एक अध्यापक को विषय विशेषज्ञ, चरित्रावान, संयमी और सहनशील होना चाहिए। छात्रा गलती करते हैं। समाज में कमी आ सकती है। परिस्थितियाँ विपरीत हो सकती हैं। लेकिन अध्यापक को संयम नहीं खोना चाहिए। एक अध्यापक को दृढ़-संकल्पी होना चाहिए।
शिक्षक बनने के इच्छुक व्यक्ति में शिक्षा के प्रति स्पष्ट तथा लक्ष्यात्मक दृष्टिकोण होना अत्यंत आवश्यक है। यदि व्यक्ति की शिक्षण में अभिरुचि है तथा वह शिक्षा के प्रति लक्ष्यात्मक दृष्टिकोण रखता है तो उसके के लिए शिक्षा मात्रा औपचारिक न होकर जीवन के लिए उपयोगी तथा सर्वांगीण विकास के लिए सहायक होती है। ऐसा व्यक्ति शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए शिक्षण कार्य पूर्ण निष्ठा, परिश्रम एवं इंमानदारी के साथ करेगा। शिक्षण परीक्षार्थी में शिक्षा के प्रति साकारात्मेक दृष्टिकोण होना अत्यंत आवश्यक है। यदि वह अपनी पूर्व प्राप्त शिक्षा को मूल्यवान, उपयोगी, ज्ञानवर्द्धक तथा जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक मानता है तभी वह शिक्षा के महत्व को समझते हुए रुचि के साथ शिक्षण कार्य कर सकेगा तथा देश के भविष्य निर्माण में रचनात्मक सहयोग कर सकेगा।
शिक्षक का प्रमुख दायित्व अपने छात्रों को शिक्षण तथा निर्देशन प्रदान करके देश के भविष्य निर्माण में सहायक बनाना है। शिक्षक के लिए छात्रा कुम्हार की गीली मिट्टी के समान होता है जिसे उचित मार्गदर्शन के द्वारा वह एक अच्छे नागरिक के रूप में ढाल सकता है। शिक्षक पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी देश के भविष्य निर्माण में सहायक नौनिहालों के पथ-प्रदर्शक की है। अतः माता के बाद एक बच्चे की सार्वजनिक जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। शिक्षण कार्य में शिक्षक की सफलता केवल उसकी विषय वस्तसंबंधी योग्यता पर ही आधारित नहीं होती बल्कि शिक्षण के प्रति उसकी अभिरुचि एवं विधेयात्मक अभिवृत्ति द्वारा भी निर्धारित होती है। शिक्षक को बाल केन्द्रीय शिक्षा पद्धति अपनाकर बालाकोें में दबी हुई विशिष्ट विशेषताओं को उजागर करना चाहिए। मनोवैज्ञानिक तरीके से उनकी मदद करनी चाहिए जिससे आगे चलकर वे राष्ट्र की उन्नति व प्रगति में अपना सहयोग कर सकें। शिक्षक को सामाजिक रूप से परिपक्व होना चाहिए।

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