सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 10 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 10 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1  भारत में सिविल सेवाओं की सांविधानिक स्थिति का विवरण दीजिए। इन सेवाओं की तटस्थता और स्वतन्त्राता को सुनिश्तिचत करने का प्रयास किस प्रकार किया जाता है?
        

उत्तर :  संसदीय व्यवस्था में राज्य प्रशासन के विस्तृत कार्यक्षेत्रा का सफलतापूर्वक संचालन सिविल (प्रशासनिक) सेवा के योग्य व व्यावहारिक ज्ञानयुक्त सदस्यों पर निर्भर करता हैं। प्रशासनिक सेवा के ये सदस्य, राजनीतिक पदाधिकारियों (राज्य कार्यपालिका) से भिन्न होते हैं अर्थात ये स्थायी कार्यपालिका का निर्माण करते हैं। इनका कार्य राज्य कार्यपालिका द्वारा निर्धारित नीति का क्रियान्वयन करना होता है। योग्य सिविल सेवा के लिए योग्य अधिकारियों का चुनाव निष्पक्ष रूप से लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता है तथा ये राजनीतिक रूप से उदासीन होते हैं। नीतिगत मामलों में इनका हस्तक्षेप सलाह तक ही होता है तथा अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल द्वारा ही लिया जाता हैं। शासन सत्ता में किसी भी दल को सरकार होने पर इनके कार्य-व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता है तथा लोक सेवा आचार संहिता के अनुसार सिविल सेवा पद पर रहते हुए ये राजनीति में भाग नहीं ले सकते हैं। इनके तीन स्तर हैं- अखिल भारतीय सेवा, जो केन्द्र व राज्य दोनों के लिए होती है (अनुच्छेद 312) केन्द्रीय सेवाएं, जो संघीय सूची के प्रशासन से संबंधित है और राज्य सेवाएं। अनुच्छेद 312 के अनुसार, राज्यसभा राष्ट्रीय हित में आवश्यक समझने पर संघ या राज्य या दानों के लिए सम्मिलित अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन कर सकती है, लेकिन इसके लिए राज्य सभा को विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। ये राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं तथा इनके कार्य स्पष्ट होते हैं। कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी समय भी किसी आधार पर निलम्बित किया जा सकता है, परन्तु सिविल सेवा का कोई भी सदस्य उसके अधीन अधिकारी द्वारा दण्डित नहीं किया जा सकता है। उसके पास धारा 4, 15, 16, 19, 20 में कुछ मूल अधिकार हैं, जो अधिकारों का सीमांकन करते हैं। राज्य अधिनियम की धारा 309 के अनुसार, सिविल सेवकों की भर्ती व सेवा शर्तों को समुचित विधानमंडल द्वारा अधिनियमों द्वारा विनियमित किये जाने के लिए छोड़ दिया गया है। प्रशासनिक ट्रिब्युनल ऐक्ट.1986 द्वारा केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की स्थापना की गयी है, जो विवादों का निपटारा करती है। इस प्रकार सिविल सेवाओं के लिए राजनीतिक तटस्थता व स्वतंत्राता की पर्याप्त व्यवस्था की गयी हे। 

प्रश्न 2 : भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के साथ.साथ जो ‘युक्ति-युक्त निर्वधन’ उल्लिखित हैं, वे क्या हैं?
        
उत्तर : 
भारतीय संविधान में अनेक मूल अधिकारों को शामिल किया गया है। ये मूल अधिकार संविधान के भाग.3 में उचित प्रतिबंधों ;त्मेंवदंइसम त्मेजतपबजपवदेद्ध के साथ वर्णित हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में समानता के अधिकार का उल्लेख है। इसके अनुसार, कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं (अनुच्छेद 14)। समानता के अधिकार में निहित है कि जाति, लिंग, जन्म स्थान, वर्ण आदि के आधार पर राज्य नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करेगा। (अनुच्छेद 15)। लेकिन समानता के अधिकार के अन्तर्गत यह प्रतिबंध किया गया है कि राज्य महिलाओं तथा बच्चें, अनुसूचित जातियों, जनजातियों व पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान कर सकेगा। सभी नागरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समान अवसर होंगे। (अनुच्छेद 16)। यहां भी अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए कुछ स्थान सुरक्षित रखे जाने का विशेष प्रावधान है।
संविधान में अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्राता के अधिकार का विवेचन है, जिसमें प्रथम स्वतंत्रत भाषण व अभिव्यक्ति की है। राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार, न्यायालय का अपमान, मानहानि या अपराध के लिए प्रेरित करना , अलगाववादी ताकतों से निकटना आदि आधारों पर राज्य अभिव्यक्ति व भाषण की स्वतंत्राता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। अनुच्छेद, 352 के अन्तर्गत आपात्काल की अवधि के दौरान अनुच्छेद.19 के प्रावधानों को निलंबित किया जा सकता है। सार्वजनिक सुरक्षा के हित में अस्त्रा-शस्त्रा रहित व शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्राता को भी सीमित किया जा सकता है। राज्य नागरिकों के सम्पूर्ण भारत क्षेत्रा में घूमने व अस्थायी या स्थाई रूप से बसने की स्वतंत्राता पर सामान्य जनता या अनुसूचित जातियों के हित की दृष्टि से प्रतिबंध लगा सकता है। राज्य जनसाधरण के हित में सम्पत्ति के अर्जन, धारण, व्यय तथा नागरिकों की वृत्ति, उपजीविका, व्यवसाय या व्यापार की स्वतंत्राता को प्रतिबंधित कर सकता है या आवश्यक योग्यता निश्चित कर सकता है। राज्य किसी उद्योग या व्यवसाय को अपने पूर्ण या आंशिक नियंत्राण में ले सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के विरुद्ध अधिकार से संबंधित हैं। ‘जबरन मेहनत’ या ‘बेगार’ को अवैध घोषित कर दिया गया है (अनुच्छेद 23)। लेकिन राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की योजना लागू कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 26 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्राता के अधिकार उल्लिखित हैं, लेकिन मानवीय व सामाजिक आधार पर यह राज्य के निर्बन्धों के अधीन हैं। साथ ही राज्य की प्रभुसत्ता को प्रभावित करने वाले कृत्यों को प्रतिबंधित किया जा सकता है। संविधान में सांविधानिक उपचारों के अधिकार का भी उल्लेख है। यह संविधान द्वारा प्राप्त मूल अधिकारों के लिए प्रभावी कार्यविधियां प्रतिपादित करता है। अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के संदर्भ में राज्य क्रियाओं से प्रकट किसी भी प्रकार के अतिक्रमण अथवा उल्लंघन की स्थिति में नागरिकों को सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेने का अधिकार दिलाता है। लेकिन युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक अव्यवस्था व अशांति की स्थिति में, जबकि राष्ट्रपति संकटकाल घोषित कर दे, मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु कोई भी नागरिक न्यायालय में अपील नहीं कर सकेगा। जीवन रक्षा के संबंध में यह प्रतिबंध लागू नहीं होता है।

प्रश्न 3 :अनुसूचित क्षेत्रा से संबंधित भारत के राष्ट्रपति के अधिकार का विवेचन कीजिए। 

उत्तर :  संसद द्वारा बनाये गए विधान के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई है कि वह किसी क्षेत्रा को ‘अनुसूचित क्षेत्रा’ घोषित कर दे (5वीं अनुसूची, पैरा 6, 7)। राष्ट्रपति ने इस शक्ति के अनुसरण में अनुसूचित क्षेत्रा आदेश, 1950 निकाला है। ये क्षेत्रा भिन्न राज्यों में ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में विनिर्दिष्ट जनजातियों के निवास क्षेत्रा हैं। संविधान की पाँचवीं और छठीं अनुसूची में उपबंधित प्रशासन के लक्षणानुसार, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्य को उक्त क्षेत्रों के प्रशासन के बारे मे निर्देश देने तक होगा तथा ऐसे राज्य का राज्यपाल, जिसमें अनुसूचित क्षेत्रा है, प्रति वर्ष या जब भी राष्ट्रपति अपेक्षा करे, उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा (अनुसूची 5 पैरा 3)। राज्यपाल के निर्देश पर उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण व उन्नति से संबंधित विषयों पर सलाह देने के लिए जनजाति सलाहकार  परिषदों का गठन किया जाएगा (अनुसूची 5 पैरा 4)। राज्यपाल को यह प्राधिकार दिया गया है कि वह संसद का या उस राज्य के विधानमंडल का कोई विशिष्ट अधिनियम उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रा को लागू नहीं होगा। साथ ही, राज्यपाल को यह प्राधिकार दिया गया है कि वह अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा या उनमें भूमि के अतंरण कार प्रतिषेध या निर्बन्धन कर सकेगा। वह भूमि के आवंटन का और साहूकार के रूप में कारोबार का विनियमन कर सकेगा। राज्यपाल द्वारा बनाए गए उपरोक्त सभी विनियमों को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करनी होगी (अनुसूची 5 पैरा 5)। संविधान में, अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में प्रतिवेदन देने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था है। राष्ट्रपति ऐसे आयोग को कभी नियुक्त कर सकता है (अनुच्छेद-339(9), लेकिन संविधान के प्रारम्भ से दस वर्ष की समाप्ति पर ऐसे आयोग को नियुक्त करना आबद्धकारी है। 

प्रश्न 4 : वे कौन से संवैधानिक प्रावधान है, जो भारत में लोक सेवा आयोग की स्वतंत्राता को सुनिश्चित करते हैं।

उत्तर :  संविधान के वे उपबंध हो कि भारत में लोक सेवा आयोग की स्वतंत्राता को सुनिश्चित करते हैं, निम्नलिखित हैंः
(i)   आयोग का अध्यक्ष या सदस्य संविधान में विनिर्दिष्ट आधार पर उसी रीति से हटाया जा सकता है। (अनुच्छेद 317)।
(ii)    लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवा शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा। (अनुच्छेद 318 का परन्तुक)A
(iii)     आयोग का व्यय भारत की या राज्य की (यथास्थिति ) संचित निधि परभारित होगा। (अनुच्छेद 322)A
(iv)    आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की सरकार के अधीन भावी नियोजन की बाबत कुछ निर्योग्यतायें हैं। (अनुच्छेद 319)A
सरकार के अधीन नियोजन के विरुद्ध संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की दशा में भारी वर्जनायें हैं। जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या संघ अथवा राज्य आयोग के अन्य सदस्यों की दशा में लोक सेवा आयोग में उच्चतर पद पर नियोजन किया जा सकता है, किन्तु आयोग के बाहर नहीं। 

प्रश्न 5 : भारतीय राज्य व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष भावना तथा भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवेचन कीजिए।

उत्तर :  भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, संविधान के अंतर्गत प्रकृति से धर्म निरपेक्ष अर्थात् भारत एक ऐसा राज्य है, जो सभी धर्मोंं के प्रति तटस्थता और निष्पक्षता का भाव रखता है। पंथ निरपेक्ष राज्य इस विचार पर आधारित होता है कि राज्य का विषय केवल व्यक्ति और व्यक्ति के संबंध से है, व्यक्ति और ईश्वर के बीच संबंध से नहीं। यह संबंध व्यक्ति के अंतःकरण का विषय है। संविधान के कई उपबंधों द्वारा सभी धर्मों के प्रति निष्पक्षता का दृष्टिकोण सुनिश्चित किया गया है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 25-28 में उल्लिखित है। राज्य किसी नागरिक को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संस्था की अभिवृद्धि या पोषण के लिए करों को संदाय करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। (अनुच्छेद 27) तथा पूर्णतः राज्य द्वारा वित्त पोषित किसी संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है। राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले व्यक्ति को उस संस्था द्वारा दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है (अनुच्छेद-28)A कुछ परिसीमाओं के अधीन रहते हुए भारत में प्रत्येक व्यक्ति को न केवल धार्मिक विश्वास का, बल्कि ऐसे विश्वास से जुड़े हुए आचरण करने का और अपने विचारों को दूसरों को उपदेश करने का अधिकार है (अनुच्छेद-25)A संविधान में प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय या उसके विभाग को धार्मिक या मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना या पोषण, धर्म-विषयक कार्यों का प्रबन्ध करने, स्थावर सम्पत्ति के अर्जन व स्वामित्व तथा ऐसी सम्पत्ति का विधि अनुसार प्रशासन करने का अधिकार (अनुच्छेद.26) है।
संविधान के उपरोक्त उपबन्ध अल्पसंख्यकों की राज्य में बराबरी की स्थति को सुनिश्चित करते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के लोग राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, राजदूत, राज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश आदि पदों पर बड़ी संख्या में नियुक्त किये जाते रहे हैं। यद्यपि, सम्प्रदाय या जाति के आधार पर होने वाले पृथक निर्वाचन को समाप्त कर दिया गया है, लकिन इससे अल्पसंख्यक समुदायों के विकास व हितों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 

 

प्रश्न 6 : उत्पत्ति समता नियम पर टिप्पनी करें।

उत्तर :  उत्पत्ति समता यह नियम बताता है कि जब कुछ साधनों को स्थिर रखकर अन्य साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उत्पादन का स्तर समान रहता है। यह नियम उत्पत्ति वृद्धि नियम तथा उत्पत्ति ह्नास नियम के बीच की अवस्था है। प्रो. मार्शल का विचार है कि उत्पादन में जब प्रकृत्ति का हाथ अधिक होता है तो उत्पत्ति ह्नास नियम लागू होता है। जब उत्पत्ति वृद्धि नियम तथा उत्पत्ति ह्नास नियम एक दूसरे के प्रभावों को समाप्त कर देते हैं तो उत्पत्ति समता नियम लागू होता है। 
”जब सभी उत्पादक सेवाओं को एक दिए हुए अनुपात में बढ़ाया जाता है तो उत्पादन उसी अनुपात में बढ़ता हैै।“ - स्टिगलर
उदाहरण - मान लीजिए, कोई फर्म उत्पादन के अन्य साधनों को स्थिर रखकर पूंजी की इकाइयों में वृद्धि करती है। फर्म को प्राप्त होने वाले उत्पादन को निम्न सारणी के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
    
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सारणी को देखने से स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे पूँजी की 

इकाइयों में वृद्धि की जाती है, कुल उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि की जाती है। दूसरे शब्दों में, सीमान्त उत्पादन स्थिर रहता है।
उत्पत्ति में जब समता नियम क्रियाशील होता है तो उत्पादक उत्पत्ति के आकार के बारे में उदासीन रहता है। इसी कारण नियम का अर्थशास्त्रा में केवल सैद्धान्तिक महत्त्व है। 

प्रश्न 7 : उत्पत्ति ह्नास नियम की व्याख्या करें और इस नियम के लागु होने के कारणों पर प्रकाश डालें।

उत्तर :  यह नियम बताता है कि उत्पत्ति के कुछ साधनों को स्थिर रखकर जब अन्य साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो एक सीमा के पश्चात् कुल उत्पादन घटती हुई दर से बढ़ता है या सीमान्त उत्पादन घटने लगता है। 
”यदि कृषि-कला में साथ ही साथ उत्पत्ति न हो, तो भूमि पर खेती में लगाई गई पूंजी और श्रम की मात्रा में वृद्धि करने से कुल उपज में, सामान्यतया, अनुपात से कम वृद्धि होती है।“ - प्रो मार्शल
प्रो. मार्शल ने उत्पत्ति ह्नास नियम की व्याख्या कृषि उत्पाद के संदर्भ में की है। खेती मे जसै-जैसे श्रम एवं पूंजी की मात्रा को बढ़ाया जाता है, उसके साथ ही सीमान्त उपज घटने लगती है। कुल उत्पान में वृद्धि तो होती है लेकिन उस अनुपात में नहीं जिसमे कि श्रम और पूंजी की इकाइयों को बढ़ाया जाता है। 

उदाहरण द्वारा स्पष्टिीकरण   - मान लीजिए, एक कृषिक 5 एकड़ भूमि के टुकड़े पर खेती करता है। अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए वह अधिकाधिक मात्रा में श्रम एवं पूंजी की इकाइयों का प्रयोग करता है। मान लीजिए, श्रम और पूंजी की एक इकाई का मूल्य 100 रुपए है। कृषक को सारणी के अनुसार उत्पादन प्राप्त होगा।

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सारणी से स्पष्ट है कि श्रम और पूंजी की एक इकाई को खेत पर लगाने से 10 . क्विंटल अनाज प्राप्त होता है, दो इकाइयों का प्रयोग करने पर 18 क्विंटल और इसी प्रकार 5 इकाइयों का प्रयोग करने पर 32 क्विंटल अनाज प्राप्त होता है। अतः श्रम और पूंजी की अधिकाधिक इकाइयों का प्रयोग करने पर कुल उत्पादन बढ़ता है, लेकिन यह वृद्धि घटती हुई दर पर होती है। दूसरे शब्दों में, श्रम और पूंजी की अधिकाधिक इकाइयों का प्रयोग करने पर सीमान्त उत्पादन घटता जाता है। 
आधुनिक अर्थशास्त्रिायों ने इस नियम का प्रयोग व्यापक क्षेत्रा में किया है। यह नियम केवल कृषि व्यवसाय में ही लागू नहीं होता बल्कि सभी व्यवसायों में उत्पादन की अन्तिम अवस्थाओं में लागू होता है।
”उत्पत्ति ह्नास नियम, जैसा कि प्रायः कहा जाता है, यह बताता है कि उत्पत्ति के किसी एक साधन की मात्रा को स्थिर रखा जाये तथा उत्पत्ति के अन्य साधनों में क्रमशः वृद्धि की जाए, तो एक निश्चित बिन्दु के पश्चात् उत्पादन में घटती हुई दर से वृद्धि होती है।“
दूसरे शब्दों में, परिवर्तनशील साधनों की मात्रा में वृद्धि करने पर एक सीमा के बाद सीमान्त उत्पादन घटता है। श्रीमती रोबिन्सन की परिभाषा से यह बात स्पष्ट होती है कि उत्पत्ति ह्नास नियम केवल कृषि कार्य ही नहीं अपितु उत्पादन को प्रत्येक क्षेत्रा में लागू होता हैै।
नियम लागू होने के कारण 
आधुनिक अर्थशास्त्रिायों ने उत्पत्ति ह्नास नियम की क्रियाशीलता के निम्न कारण बताये हैं:

(1)    साधनों की स्थिरता   - उत्पत्ति के किसी एक अथवा कई साधनों की पूर्ति स्थिर होती है। प्रो. सैम्युलसन का विचार है कि जब कुछ साधनों की पूर्ति को स्थिर रखकर किसी एक साधन की अधिक इकाइयों का प्रयोग किया जाता है तो इस साधन को स्थिर साधनों की सीमित मात्रा के साथ काम करना पड़ता है। अतः परिवर्तनशील साधन की उत्पादकता घट जाती है और उत्पत्ति ह्नास नियम क्रियाशील होता है। 

(2)    पूर्ण स्थानापन्नता का अभाव   - उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का प्रतिस्थापन केवल एक सीमा तक ही सम्भव होता है। जिस प्रकार कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए भूमि के स्थान पर श्रम और पूंजी का प्रतिस्थापन एक सीमा तक ही सम्भव है। 

(3)    साधनों की सीमितता - उत्पत्ति का कोई भी साधन असीमित मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। उत्पादक जब किसी साधन को सीमित मात्रा में प्रयोग करता है तो उत्पत्ति घटती हुई दर प्राप्त होती है। जिस प्रकार कृषि व्यवसाय में भूमि, उद्योगों में कच्चा-माल, मशीन आदि सीमित मात्रा में उपलब्ध होेते हैं। 

(4)    अनुकूलतम क्षमता के बाद - अनुकूलतम उत्पादन का बिन्दु वह होता है जहाँ औसत लागत न्यूनतम होती है। यदि उत्पादन को इस आदर्श सीमा से आगे बढ़ाया जाए तो उत्पत्ति ह्नास नियम लागू होगा। 

प्रश्न 8 : निम्नलिखित पर टिप्पनी करें। (1) बाजार का ढाँचा (2) पूर्ण प्रतियोगी बाजार (3) अपूर्ण प्रतियोगी बाजार
    
उत्तर :
  (1) बाजार का ढाँचा - बाजार का ढाँचा यह तय करता है कि उत्पाद की कीमत का निर्धारण किस प्रकार होता है। बाजार का ढाँचा दो बातों से तय होता हैः    

(i)   एक वस्तु के उत्पादकों की संख्या - इसका आशय यह है कि वस्तु का केवल एक उत्पादक है या दो और दो से अधिक।

(ii)    वस्तु की प्रकृत्ति - इसका आशय यह है कि समस्त बाजार में एक समान वस्तु के सौदे होते हैं अथवा प्रतियोगी वस्तुएँ भी उपलब्ध हैं। 

बाजार ढाँचे का वर्गीकरण 
उपरोक्त दो कारकों के आधर पर बाजार ढाँचे को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता हैः 
(i)    पूर्ण अथवा शुद्ध प्रतियोगिता (अनेक विक्रेता, अनेक क्रेता, समरूप वस्तु)
(ii)   एकाधिकार (अकेला विक्रेता, अति-निकट प्रतिस्पर्धी उत्पाद)
(iii)  अपूर्ण अथवा एकाधिकारी प्रतियोगिता (अनेक विक्रेता, वस्तु विभेद)
(iv)  अल्पाधिकार (सीमित संख्या में विक्रेता, समरूप अथवा भेदात्मक उत्पाद)

(2)    पूर्ण प्रतियोगी बाजार - बाजार उस समय पूर्ण प्रतियोगी कहा जाता है, जबकि क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है तथा किसी वस्तु का इस प्रकार से विनिमय किया जाता है, कि बाजार के सभी भागों में एक ही कीमत प्रचलित होती है। पूर्ण प्रतियोगी बाजार को पूर्ण बाजार भी कहा जाता है; जिसकी निम्न विशेषताएँ होती हैं:
(i)   क्रेताओं तथा विक्रेताओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति।
(ii)    एक ही किस्म की वस्तु की विनिमय।
(iii)     समस्त बाजार में वस्तु की एक समान कीमत का प्रचलन।
(iv)    क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार की स्थिति का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
(vi)    नई फर्मों को बाजार में प्रवेश की पूर्ण स्वतन्त्राता तथा फर्मों को बाजार से बाहर जाने की स्वतन्त्राता होनी चाहिए। 
उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट है, कि क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या इतनी अधिक होती है, कि कोई भी क्रेता अथवा विक्रेता की गतिविधि का प्रभाव बाजार कीमत पर नहीं पड़ता। सामान्य कीमत निर्धारण के समय फर्म को केवल सामान्य लाभ ही प्राप्त होते हैं। केवल कुशल फर्म ही बाजार में अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है, तथा उत्पादन की मात्रा आदर्शतम होती है। 

(3)    अपूर्ण प्रतियोगी बाजार - व्यावहारिक जीवन में पूर्ण बाजार देखने को नहीं मिलते हैं, दैनिक जीवन में अधिकांश बाजार अपूर्ण प्रतियोगी होते हैं। अपूर्ण-प्रतियोगिता अवस्था में विक्रेताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। क्रेताओं तथा विक्रेताओं को बाजार की अवस्था का पूर्ण ज्ञान नहीं होता। वस्तु की कई किस्मों का विनिमय होने के कारण कई कीमतें प्रचलित होती है। क्रेता तथा विक्रेता अपनी गतिविधियों द्वारा वस्तु की कीमत को प्रभावित कर सकते है। अपूर्ण बाजार में विक्रय लागत  को विशेष स्थान प्राप्त होता है। विक्रय लागत की सहायता से वस्तु के नये क्रेताओं को आकर्षित किया जा सकता है। अपूर्ण बाजार में कुशल तथा अकुशल दोनों प्रकार की फर्मों का अस्तित्व बना रहता है, तथा उत्पादन की मात्रा अधिकतम नहीं होती है। विक्रेताओं की संख्या के आधर पर अपूर्ण बाजार को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है।

प्रश्न 9 : बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताओं का वर्णन करें। 

उत्तर :  (1)     क्रेताओं तथा विक्रेताओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति - क्रेता और विक्रेता की संख्या इतनी अधिक होती है कि किसी भी व्यक्तिगत क्रेता अथवा विक्रेता की गतिविधि का प्रभाव बाजार में प्रचलित कीमत और उत्पादन के स्तर पर नहीं पड़ता। प्रत्येक क्रेता तथा विक्रेता कुल उत्पादन का बहुत सूक्ष्म भाग खरीदता या बेचता है। प्रत्येक फर्म को किसी दी हुई कीमत को स्वीकार करना होता है, तथा वह कीमत में परिवर्तन नहीं कर सकती। 

(2)    एक समान वस्तु का विनिमय - फर्म एक ही किस्म की वस्तु का उत्पादन करती है, तथा विक्रेता की दृष्टि से सभी क्रेता एक से होते हैं, और किसी वस्तु को बेचने पर विक्रेता को किसी विशेष लाभ या हानि की आशा नहीं होती। वस्तु की किस्म समान होने के कारण विक्रेता को उसी कीमत पर वस्तु बेचनी पड़ती है जिस कीमत पर अन्य विक्रेता बेच रहे हैं। 

(3)    फर्मों का निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन - किसी फर्म को उद्योग में प्रवेश करने तथा उसे छोड़कर बाहर जाने की पूर्ण स्वतन्त्राता होती है। यदि उद्योग को लाभ प्राप्त हो रहे हैं, या वस्तु की माँग बढ़ रही है, तो नई फर्में लाभ प्राप्ति के लिए बाजार में प्रवेश कर सकती हैं, यदि फर्मों को हानि हो रही है तो वे उद्योग छोड़कर जा सकती है। 

(4)    क्रेताओं तथा विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान   - क्रेताओं एवं विक्रेताओं को बाजार में प्रचलित कीमत का पूर्ण ज्ञान होता है, उसको इस बात की पूर्ण जानकारी होती है कि इस बाजार में किस कीमत पर वस्तु के सौदे हो रहे है। क्रेता तथा विक्रेता को बाजार की स्थिति के पूर्ण ज्ञान के कारण उनमें पूर्ण गतिशीलता पाई जाती है, तथा विज्ञाापन, विक्रय-कला, आदि का क्रेताओं की पसन्दगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 

(5)    समस्त बाजार में वस्तु की एक समान कीमत का प्रचलन - एक समय के अन्तर्गत वस्तु की कीमत सारे बाजार में एक समान रहती है। कीमत का निर्धारण समस्त क्रेता तथा विक्रेता अथवा उद्योग द्वारा किया जाता है; अतः हर एक फर्म के लिए कीमत दी हुई होती है, और वह अपनी क्रियाओं से वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती है। फर्म को प्रचलित कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। 
किसी भी पूर्ण-प्रतियोगी बाजार में उपरोक्त पाँच विशेषताएँ आवश्यक रूप से पाई जाती हैं। इनके अलावा भी अर्थशास्त्रिायों ने पूर्ण-प्रतियोगिता की कुछ और विशेषताओं का विवेचन किया है। 

(6)   साधनों में पूर्ण प्रगतिशीलता होनी चाहिए - उत्पत्ति के साधन, जिस उद्योग में अधिक लाभ की प्राप्ति की आशा रखते हैं, उसमें प्रवेश करने के लिए स्वतन्त्रा होते हैं। इसी प्रकार यदि कोई उत्पादक उत्पत्ति के साधनों को उचित पारिश्रमिक नहीं दे रहा है तो साधनों को उस उद्योग को छोड़ने की स्वतन्त्राता होनी चाहिए।(7)    विक्रय तथा परिवहन लागतें नही होनी चाहिए - कीमत की समानता के लिए यह आवश्यक है कि वस्तु का उत्पादन एक ही स्थान पर किया जाना चाहिए तथा परिवहन लागत स्थिर रहनी चाहिए।ण्

प्रश्न 10 : अंतर स्पष्ट करें -
(i)   हिमालय पर्वत और प्रायद्वीपीय पठार
(ii)    पूर्वी तटीय मैदान और पश्चिमी तटीय मैदान

उत्तर :    (i) प्रायद्वीपीय पठार और हिमालय पर्वत के उच्चावच के लक्षणों में निम्नलिखित भिन्नता पाई जाती है -

भारतीय पठार
1.    यह पठार भू-पृष्ठीय शैलों का एक खंड है जो बहुत प्राचीन है।
2.    यह एक उत्खंड के रूप में खड़ा है।
3.    इस प्रदेश में प्राचीन वलन पर्वत जैसे अरावली स्थित है।
4. पठार का उच्चावच उत्खंड तथा भू-भ्रंश घाटियों का बना है।
5. पठार का धरातल एक ऊबड़-खाबड़ प्रदेश है जिसमें नदियों ने गहरी घाटियां बनाई है।

हिमालय पर्वत
1. हिमालय पर्वत नवीन मोड़दार पर्वत है।
2. हिमालय पर्वत में वलन पाये जाते है।
3. इस प्रदेश में नवीन पर्वत श्रेणियां अपने ऊंचे-ऊंचे शिखर के लिए जगत प्रसिद्ध है।
4. हिमालय पर्वत के उच्चावच में तीन समानान्तर पर्वत श्रेणियां है जिनके बीच-बीच में घाटियां पाई जाती है।
5. हिमालय प्रदेशों में नदियों द्वारा निर्मित संकरी घाटियां तथा न्-आकार की घाटियां पाई जाती है।
(ii) पूर्वी तटीय मैदान और पश्चिमी तटीय मैदान

पूर्वी तटीय मैदान
1. पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित अपेक्षतया अधिक चैड़ा तटीय मैदान।
2. पूर्वी तटीय मैदान का निर्माण महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि नदियों के निक्षेपण कार्य द्वारा हुआ है।
3. इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि नदिया ने उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण किया है।
4. पूर्वी समुद्री तट बहुत कम कटा-फटा है, जिससे यहाँ प्राकृतिक बन्दरगाहों का अभाव है।
5. पूर्वी तट के निकट कहीं-कहीं बालू के टीले मिलते है, जिनसे चिल्का, कोल्लेरू और पूलीकट जैसी लैगून झीलों का निर्माण हुआ है।
6. पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षतया शुष्क है और इसके अधिकाँश भाग (विशेषकर दक्षिणी भाग) में शीत ऋतु में उत्तर :  पूर्वी मानसून पवनों द्वारा वर्षा होती है।

पश्चिमी तटीय मैदान
1. पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच स्थित संकरा तटीय मैदान।
2. पश्चिमी तटीय मैदान का निर्माण अधिकतर समुद्री निक्षेपों द्वारा हुआ है।
3. इसमें पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढाल पर द्रुत गति से बहने वाली छोटी नदियों ने किसी भी डेल्टा का निर्माण नहीं किया है।
4. पश्चिमी समुद्री तट अपेक्षतया अधिक कटा-फटा है, जिससे यहाँ प्राकृतिक बन्दरगाहें पाई जाती है।
5. पश्चिमी तट के निकट अनेक बालू के टीले मिलते है, जिससे यहाँ भी अनेक लैगून झीलें बन गई है जो वर्षा ऋतु में आपस में मिल जाती है।
6. पूर्वी तटीय मैदान की अपेक्षा पश्चिमी तटीय मैदान अधिक आद्र्र है और यहाँ ग्रीष्म ऋतु में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों द्वारा वर्षा होती है।

 

प्रश्न 11 : हिमालय की नदियों और प्रायद्वीपीय नदियों के अपवाह तंत्रा में अंतर स्पष्ट करें ।

उत्तर :  हिमालय की नदियां
1. हिमालय की नदियों का बेसिन तथा जल ग्रहण क्षेत्रा बहुत बड़ा है।
2. हिमालय की नदियाँ विशाल गार्ज से होकर बहती है।
3. हिमालय की नदियों के दो जल स्त्रोत है - वर्षा तथा हिम। इसलिए ये नदियां सदा- नीरा है।
4. इन नदियों के मार्ग में कम जलप्रपात होने के कारण जल विद्युत उत्पन्न करने की संभावना कम है।
5. इन नदियों में नौका चालन एवं नहरों द्वारा सिंचाई की सुविधाएं अधिक है।
6. हिमालय की नदियों का पर्वतीय मार्ग काफी टेड़ा-मेढ़ा होता है तथा मैदान में ये विसर्प बनाती हैं और अक्सर अपना मार्ग बदल देती है।
7. हिमालय की अधिकांश नदियां पूर्ववर्ती नदियां है। ये नदियां हिमालय की उत्पत्ति से भी पहले की है। इस प्रकार ये हिमालय के ढाल के अनुरूप नहीं बहतीं।
8. गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्रा हिमालय अपवाह तंत्रा का निर्माण करती हैं।

प्रायद्वीपीय नदियाँ
1. प्रायद्वीपीय नदियों का बेसिन तथा जल ग्रहण क्षेत्रा काफी छोटा है।
2. प्रायद्वीपीय नदियां उथली घाटियों में बहती है।
3. प्रायद्वीपीय नदियों का जल स्त्रोत केवल वर्षा है इसलिए शुष्क ऋतुओं में ये प्रायः सूख जाती है।
4. प्रायद्वीपीय नदियों के मार्ग में अधिक जलप्रपात होने के कारण ये जल विद्युत पैदा करने में सक्षम है।
5. इन नदियों में नौका चालन एवं नहरों द्वारा सिंचाई की सुविधाएं कम है।
6. प्रायद्वीपीय नदियां कठोर चट्टानों के आधार और जलोढ़ की कमी के कारण विसर्प नहीं बनातीं तथा प्रायः सीधे मार्गों में बहती है।
7. प्रायद्वीपीय नदियों की चैड़ी और लगभग संतुलित एवं उथली घाटियां यह संकेत देती है कि वे हिमालय की नदियों से काफी पहले से अस्तित्व में रही है और प्रायद्वीपीय ढाल के अनुरूप बहती है अर्थात् ये अनुवर्ती नदियाँ  है।
8. नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी आदि नदियाँ प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्रा का निर्माण करती हैं।

प्रश्न 12 :   पश्चिमी तट पर नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती हैं, क्यों ?

उत्तर :  पश्चिमी तट पर बहने वाली प्रमुख नदियाँ नर्मदा और ताप्ती हैं। इनके अतिरिक्त अनेक छोटी-छोटी नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरती हैं। यद्यपि ये नदियाँ पश्चिमी घाट से पर्याप्त मात्रा में तलछट बहाकर लाती हैं, परन्तु ये डेल्टा नहीं बनातीं। इसके निम्नलिखित कारण है -
    (i) ये नदियाँ संकरे मैदान से बहकर आती हैं, अतः इनका वेग तीव्र होता है।
    (ii) तट के पास इन नदियों की ढाल प्रवणता अधिक होने के कारण ये तीव्र वेग से बहती हैं जिससे इनके मुहानों पर तटछट का निक्षेप नहीं हो पाता।

प्रश्न 13 :   गोदावरी को ”वृद्धगंगा“ या ”दक्षिण गंगा“ क्यों कहा जाता है?

उत्तर :  जिस प्रकार हिमालय पर्वत की नदियों में गंगा सबसे बड़ी नदी है, ठीक उसी प्रकार प्रायद्वीपीय नदियों में गोदावरी सबसे बड़ी नदी है। इसके अलावा जिस प्रकार गंगा को उत्तरी भारत में पवित्रा नदी माना जाता है, ठीक उसी प्रकार दक्षिणी भारत में गोदावरी को पवित्रा नदी माना जाता है। अतः अपने विशाल आकार एवं विस्तार तथा पवित्राता के कारण गोदावरी को ”वृद्ध गंगा“ कहा जाता है।

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