सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 10 (प्रश्न 14 से 27 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 10 (प्रश्न 14 से 27 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 14 : निम्न पर टिप्पणी करें।
(i)   उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (Northern Mountain Wall)
(ii)  सतलज-गंगा-ब्रह्मपुत्रा का मैदान (Sutlej-Ganga-Brahmaputra Plain)
(iii) दक्षिण का पठार (Deccan Plateau)

उत्तर :  (i)  इस क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी सीमा में पश्चिम से पूर्व की ओर 2,400 कि. मी. लम्बाई में एक वृहद् चाप के आकार में फैला है। इनकी चैड़ाई 150 से 400 कि.मी. और ऊँचाई 6,000 मीटर तक है। यह करीब 5 लाख वर्ग कि. मी. में फैला है।

  • ये पर्वत उस विशाल पर्वत प्रणाली के भाग है जो मध्य एशिया से मध्य यूरोप तक फैले है। इस पर्वत-प्रणाली को पामीर की गाँठ (Pamir Knot)  कहते है। पश्चिमी भाग में इसकी तीन श्रेणियाँ प्रत्यक्ष हैः

(i) लद्दाख-जास्कर श्रेणी,
(ii) पंगी श्रेणी और ठमेर,
(iii) पीर पंजाल श्रेणी।

  • पूर्वी भाग में हिमालय श्रेणी और सबसे उत्तर में काराकोरम श्रेणी है जो चीन तक चली गयी है। इन पर्वतों ने भारत को शेष एशिया से पृथक कर दिया है।
  • (ii)    यह मैदान हिमालय की उत्पत्ति के बाद बना है। यह हिमालय पर्वत के दक्षिण में और दक्षिण पठार के उत्तर में भारत का ही नहीं वरन् विश्व की सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है।
  •  इसका क्षेत्राफल 7 लाख वर्ग कि. मी. है। यह मैदान पूर्व में 145 कि. मी. से लेकर पश्चिम में 480 कि. मी. चैड़ा है तथा 2,414 कि. मी. की लम्बाई में धनुष के आकार में फैला है। इस मैदान की ढाल समतल है। अतः ऊँचे भाग बहुत कम है।
  • अरावली पर्वत श्रेणी को छोड़कर कोई भी भाग समुद्र तल से 150 मीटर से अधिक ऊँचा नहीं है। यह मैदान अधिक गहरा है।
  • पाताल-तोड़ कुएँ बनाने के लिए की गयी खुदाई के फलस्वरूप यह प्रकट हुआ है कि इसकी मोटाई पृथ्वी की ऊपरी धरातल से 400 मीटर तक तथा समुद्री धरातल से 3,050 मीटर नीचे तक है।
  • इस मैदान में सिन्ध का अधिकांश भाग (पाकिस्तान), उत्तरी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, बंगलादेश और असम का आधा भाग सम्मिलित है।
  • यह मैदान सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्रा और उनकी सहायक नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टी से बना है, अतः यह बहुत उपजाऊ है। इस मैदान के बीच में अरावली पर्वत आ जाने के कारण सिन्धु और उसकी सहायक नदियाँ (झेलम, चिनाव, रावी, व्यास तथा सतलज) पश्चिम में तथा गंगा और उसकी सहायक नदियाँ (यमुना, गंडक, घाघरा, गोमती, सरयू, सोन) तथा ब्रह्मपुत्रा पूर्व में बहती है।
  • अरावली पर्वत इन नदी समूहों के बीच में जल विभाजक Water-parting) का काम करता है। अतः इस मैदान के पश्चिमी और पूर्वी भाग क्रमशः पश्चिमी और पूर्वी मैदान कहलाते है। पश्चिमी मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है और पूर्वी मैदान का ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है।
  • इसका पूर्वी भाग ही वास्तव में मुख्य मैदान है। इस मैदान की गहराई बहुत अधिक है। प्रतिवर्ष गंगा और उसकी सहायक नदियों द्वारा लायी गयी बारीक लाँप मिट्टी की तहें जमती जाती है, अतः हजारों मीटर की गहराई तक खुदाई करने पर भी पुरानी चट्टानों का पता नहीं चलता है। यह मैदान अपेक्षाकृत अधिक नम तथा निम्न भूमि वाला है। इस मैदान का क्षेत्राफल 3,57,000 वर्ग कि. मी. है।
  • गंगा के मैदान को धरातल की ऊँचाई-निचाई के विचार से दो भागों में बाँटा गया है: (i)  बाँगर और (ii) खादर। इस मैदान में उन भागों के, जहाँ नदियों द्वारा कछार के प्राचीनतम संग्रहीत पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैदान बन गये है और जहाँ सामान्य रूप से नदियों की बाढ़ का पानी नहीं पहुँच जाता बाँगर (Bangar)  कहते है। नये कछारी भाग जो निचले मैदान है और जहाँ बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा देता है, खादर (Khadar) के नाम से पुकारे जाते है। कहीं-कहीं नदियों के पास ऊँचे किनारे विस्तृत उप-घाटियों के रूप में परिवर्तित हो गये है। इन छोटे-छोटे मैदानी भागों को दोआब (Doab) कहा जाता है। गंगा और यमुना नदियों के बीच पड़ने वाले समतल मैदानी भाग काफी उपजाऊ है जिन्हें गंगा-यमुना दोआब कहा जाता है। यह भारत की सबसे उपजाऊ भूमि है।
  • गंगा के डेल्टा के उत्तर :  पूर्व में ब्रह्मपुत्रा का मैदान है। यह गारो और हिमालय पहाड़ के बीच में एक लम्बा और पतला मैदान है जिसमें ब्रह्मपुत्रा नदी की बाढ़ का पानी पर्वतों से लायी मिट्टी को जमा देता है। पानी में मिट्टी की मात्रा इतनी अधिक होती है कि जल के बहाव में थोड़ी-सी रूकावट पड़ने पर ही मिट्टी के ढेर एकत्रित हो जाते है और चारों ओर फैल जाते हैं। यही कारण है कि ब्रह्मपुत्रा नदी में द्वीप बहुत पाये जाते है। ब्रह्मपुत्रा की घाटी में चावल, नारंगी, फल, जूट तथा चाय की पैदावार होती है।
  • जहाँ हिमालय पर्वत और सतलज गंगा के मैदान मिलते है वहाँ हिमालय से आने वाली असंख्य धाराओं ने अपने साथ पर्वतीय क्षेत्रा से टूट कर गिरे हुए पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़े काफी गहराई तक जमा कर दिये है। इन कंकड़-पत्थरों के ढँके हुए भाग को ही भाबर कहा जाता है। यह प्रदेश हिमालय के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगभग 8 कि. मी. तक चैड़ा है। इस प्रदेश में लम्बी जड़ों वाले बड़े-बड़े वृक्ष तो अवश्य दृष्टिगोचर होते है किन्तु छोटे पौधों, खेतों तथा जनसंख्या का प्रायः अभाव पाया जाता है।
  • भाबर प्रदेश के आगे जाकर भाबर के नीचे बहने वाला जल ऊपरी धरातल पर प्रकट हो जाता है। इसके बड़े-बड़े दलदल हो जाते है। इन दलदलों में ऊँची घास, वृक्ष और असंख्य पशु पाये जाते है। इन घने वनों वाले प्रदेश को तराई कहते है। मलेरिया के कारण यहाँ की जनसंख्या काफी कम होती है। भाबर की अपेक्षा तराई का प्रदेश अधिक चैड़ा है। उत्तर प्रदेश की सरकार इस भाग को साफ कराकर मशीनों द्वारा सामूहिक खेती करवा रही है। तराई की रचना बारीक कंकड़-पत्थर, रेत और चिकनी मिट्टी से हुई है।
  •  हिमालय पर्वत की रचना के कारण उसके और प्रायद्वीपीय भारत के मध्य में एक गहरी खाई बन गयी जिसमें टैथिस सागर की अवशिष्ट जल खाड़ियों के रूप में भरा हुआ रह गया। इन खाड़ियों को वर्तमान अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी का उत्तरी भाग कहा जा सकता है जो अब नष्ट हो चुका है। हिमालय से निकलने वाली आरम्भिक नदियों ने अपने साथ कंकड़-पत्थर और मिट्टी लाकर इन खाड़ियों के तल में जमा कर दिया। इस प्रकार नवसृजित हिमालय की आरम्भिक नदियों द्वारा जो मिट्टी का एक बड़ा भाग सतलज प्रदेश, हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के मध्य बना वही आज सिन्धु-सतलज-गंगा मैदान प्रदेश कहलाता है।
  • इस मैदान का विस्तार अधिक है। यह भारत के लगभग एक-तिहाई क्षेत्राफल को घेरे हुए है। यहाँ सम्पूर्ण देश की लगभग 45% जनसंख्या निवास करती है। यद्यपि भौगोलिक तथा आर्थिक दृष्टि से यह भारत का सर्वोत्तम भाग है किन्तु भूगर्भशास्त्रों की दृष्टि से इसका महत्व अधिक नहीं है क्योंकि यह भारत का नवीनतम भाग है और इसकी भौतिक संरचना सरल है।
  • इस भाग में खनिज पदार्थों का नितांत अभाव है किन्तु भूमि समतल होने के कारण रेलमार्गों और नदियों का जाल बिछा है, जिस कारण इस भाग में देश के अनेक प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक केन्द्र स्थित है तथा जनसंख्या भी घनी है। सिन्धु, सतलज, गंगा और ब्रह्मपुत्रा नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टी से बने होने के कारण और सिंचाई की सुविधा के कारण यह मैदान हिमालय पर्वत का उपहार(Gift of the Himalaya) कहलाता है।

(iii)  पठार के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियां, पश्चिम में ऊँचे पश्चिम घाट और पूरब में निम्न पूर्वी घाट और दक्षिण में नीलगिरि पर्वत है। इस प्रायद्वीप की औसत ऊँचाई 487 से 762 मीटर है।

  • यह भारत का सबसे बड़ा पठार है जिसका क्षेत्राफल 7 लाख वर्ग किलोमीटर है। प्रायद्वीप के अंतर्गत दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग, दक्षिणी बिहार, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक आदि राज्य सम्मिलित है।
  • यह प्रायद्वीप भारत की प्राचीनतम कठोर चट्टानों का बना वह भू-भाग है जिसका क्षरण मौसमी क्षति की क्रियाओं द्वारा होता रहा है और जिनके कारण यह अनेक छोटे-मोटे पठारों में विभाजित हो गया है - उत्तर में बिहार के राँची जिले में छोटानागपुर का पठार और दक्षिण में दक्षिण का मुख्य पठार आदि इसके उदाहरण है। इस प्रायद्वीप का धरातल कम चपटी है। यह साधारणतः टीलेदार या लहरदार है।
  • मालवा के पठार के पूर्वी भाग महादेव, मैकाल, बराकर और राजमहल की पहाड़ियों के रूप में गंगा नदी की घाटी में वाराणसी तक फैला हुआ है।
  • विन्ध्याचल के दक्षिण में इसके समानान्तर 1,120 किलो मीटर के विस्तार में सतपुड़ा पर्वत फैला है। यह पर्वत श्रेणी मध्य प्रदेश में नर्मदा के दक्षिण और ताप्ती के उत्तर में रीवा से लगकर पश्चिम की ओर राजपीपला पहाड़ियों में होती हुई पश्चिमी घाट तक फैली है। यह श्रेणी अधिकतर बेसाल्ट और ग्रेनाइट चट्टानों की बनी है जिनकी औसत ऊँचाई 762 मीटर है किन्तु अमरकण्टक की पहाड़ियाँ 1,066 मीटर तक ऊँची है जो आगे जाकर पूर्व की ओर छोटानागपुर के पठार पर समाप्त हो जाती है।
  • छोटानागपुर पठार के अन्तर्गत झारखंड में राँची, हजारीबाग और गया जिले है जिनके बीच से गहरी नदियाँ (महानदी, दामोदर, सोन और सुवर्णरेखा) बहती है। पठार की औसत ऊँचाई 760 मीटर है किन्तु पाश्र्वनाथ चोटी 1, 365 मीटर ऊँची है। इस पठार पर अधिकतर चावल पैदा होता है। इमारती पत्थरों और खनिज का धनी यह प्रदेश खनिज भण्डार के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

प्रश्न 15 : भारत में ‘गैर ब्रिटिश’ शासन का क्या अर्थ है? भारत के राष्ट्रवादियों की इसके प्रति क्या प्रतिक्रिया हुई थी? भारत में ब्रिटिश शासन की बुराईयों का उजागर करने में दादाभाई नौरोजी की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। 

उत्तर :  ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रुल इन इंडिया’ के लेखक ‘ग्रैंड ओल्ड मैन आॅफ इंडिया’, के नाम से प्रसिद्ध भारतीय अर्थशास्त्राी दादाभाई नौरोजी ने, भारत में गोरी सरकार के उद्देश्य व कार्य करने के तरीकों का विश्लेषण करते हुए इसे ‘गैर ब्रिटिश शासन’ की संज्ञा दी। नौरोजी के अनुसार भारत में ब्रिटिश शासन, ब्रिटेन के शासकों द्वारा प्रतिपादित नियमों व क्रिया विधि के अनुरूप नहीं है। भारत में तो आर्थिक व बौद्धिक ज्ञान का शोषण किया जा रहा है, जो कि भारत के लिए हानिकारक है। दादाभाई के अनुसार’ यह एक चिरस्थायी और दिनोदिन बढ़ने वाला विदेशी आक्रमण है।’
राजद्रोह के नाम पर हो रहे अन्यायपूर्ण मुकदमें, भारतीय भाषा की स्वतंत्राता पर प्रतिबंध, तानाशाही, अत्याचार, अनाचार आदि उदाहरण देते हुए दादाभाई नौरोजी ने गैर ब्रिटिश शासन को कोसते हुए ब्रिटेन पर चल रहे शासन से उसकी तुलना की, जो कि ब्रिटेन की ख्याति और सम्मान के अनुपयुक्त है। 
भारत के राष्ट्रवादियों ने दादाभाई नौरोजी की राय से सहमतता प्रकट करते हुए कहा कि, ‘जब तक इस अन्यायपूर्ण और अब्रिटिश शासन को दूर करके उसके स्थान पर वास्तविक ओर न्यायोचित ब्रिटिश रूप का शासन नही चलाया जाता, तब तक न तो भारत का उद्धार हो सकता है और न ही ब्रिटिश सरकार का।’
दादाभीई नौरोजी ने विभिन्न पत्रा-पत्रिकाओं, राजनैतिक- सामाजिक मंचों से स्पष्ट तौर पर ब्रिटिश आर्थिक नीति की आलोचना की। इनका मानना था कि भारत में उपजी निर्धनता, महामारी, अकाल, विकास की धीमी गति व अन्य बुराईयों के लिए ब्रिटिश शासन ही उत्तरदायी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कि हितों की अवहेलना अंग्रेज सरकार स्वयं की सम्पन्नता के लिए कर रही है। 1867 में लंदन की ईस्टइंडिया एसोसिएशन के समक्ष पढ़े हुए लेख ‘भारत के प्रति इंग्लैंड का कत्र्तव्य’ में उन्होंने कहा, ‘ब्रिटिश शासन में सारे देश का दोहन होने के कारण इसकी जीवनदायी शक्ति व कार्यक्षमता में गिरावट आ रही है।’ दादाभाई ने विभिन्न संस्थाओं के सामने ब्रिटिश उपनिवेशवाद का असली चेहरा दिखाते हुए कहा कि, ‘ब्रिटिश सरकार, भारतीय उपनिवेश से आर्थिक संसाधनों का दोहन कर इसे कंगाल बनाने में जुटी हुयी है।’
भारतीय स्वतंत्राता की आवाज को बुलन्द करते हुए ‘भारत के महान वृद्ध व्यक्ति’ ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की खुलकर आलोचना की। 

प्रश्न 16 : उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर लार्ड कर्जन के वायसराय पद पर रहने तक तिब्बत के प्रति रही ब्रिटिश नीति का विवेचन कीजिए।
    
उत्तर : 
 हिमालय के उत्तर में तिब्बत का क्षेत्रा ऊंची नीची घाटियाँ, विशाल पर्वत शृंखलाओं व पर्वत चोटियों से निर्मित हैं। यह सामरिक दृष्टिकोण से रूस, चीन व ब्रिटिश सरकार के बीच उपभोग का केन्द्र बनता रहा है। अठाहरवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में तिब्बत ने चीन का प्रभुत्त स्वीकार कर लिया था, तिब्बत सरकार के नियन्त्राण के लिए दो चीनी राजदूत नियुक्त किये गये। तिब्बत से अंग्रेजों का संपर्क 1773.75 में वाॅरेन हैस्टिंग्स के शासनकाल में हुआ। तिब्बत का शासन दो महान लामाओ-दलाई लामा व ताशीलामा द्वारा किया जाता था। अंग्रेजों के बढ़ते साम्राज्यवाद ने चीनियों पर दबाब डाला जिसके फलस्वरूप 1876 ई. में ‘चीफू कन्वेशन’ गठित किया गया, जिसमें भारत सरकार का वाणिज्यिक शिष्टमंडल ‘ल्हासा’ भेजा गया। 1980 तक तिब्बत के दक्षिण में एक शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी जो एशिया की राजनीति का केंन्द्र बन गया था। भारत की अंग्रेजी सरकार की तिब्बत में रुचि केवल व्यापार के लिए थी, क्यांेकि इस विशाल औद्योगिक राष्ट्र को अब भी मंडियों की आवश्यकता थी। तिब्बत के स्थायित्व हेतु दलाई लामा ने 1898 ई. में एक शिष्टमंडल रूस भेजा जो जार से मिलकर बौद्ध प्रजा के लिए दान एकत्रा करके लाया। रूस की बढ़ती शक्ति को देखकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद को खतरे का अंदेशा हुआ, जिसके फलस्वरूप लार्ड कर्जन ने 1903 ई. में कर्नल यंग हस्बेण्ड को एक छोटी सेना के साथ तिब्बत भेजा, छुट-पुट घटनाओं के पश्चात् तिब्बतियों को अंग्रेजी सेना से संधि करनी पड़ी, यंगहस्वेंड व कर्जन द्वारा तिब्बतियों पर अनेक शर्तें थोपी गयी परन्तु भारत सचिव ने संधि में हस्तक्षेप करते हुए शर्तों को आसान बनाने की कोशिश की, इसके एवज में दलाईलामा को 25 लाख राशि का भुगतान किश्तों में करना पड़ा। इस संधि के दौरान तिब्बत में अंग्रेजी रेजीडेन्ट की नियुक्ति प्रस्तावित थी। परन्तु जैसे ही अंग्रेजी सेना ने तिब्बतियों का देश छोड़ा चीनियों ने पुनः घुसपैठ करते हुए तिब्बती शासन पर अधिकार कर लिया। 1914 में शिमला में आयोजित त्रिमुखी सम्मेलन में चीन, तिब्बती और अंग्रेज प्रतिनिधियों ने एक समझौता किया जिसके अनुसार तिब्बत पर चीनी अधिकार स्वीकार कर लिया गया।
कुल मिलाकर यदि तिब्बत पर ब्रिटिश नीति का प्रभाव देखें तो यह नगण्य मात्रा रहा, यद्यपि यह कुछ समय के लिए ब्रिटिश वस्तुओं के लिए मंडी के रूप में उपयोग हुआ किंतु अंततः यहाँ चीनी आधिपत्य ही सिरमौर रहा। 

प्रश्न 17 : 1905 में बंगाल विभाजन किस कारण हुआ?
  
उत्तर :  
1905 में बंगाल विभाजन के कारण-बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत आए लार्ड कर्जन को बंगाल में सक्रिय स्वतन्त्राता संग्राम आन्दोलन का सामना करना पड़ा। उस समय तक कलकत्ता ब्रिटिश भारत की राजधानी तथा देश का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र होने के कारण राजनीतिक गतिविधियों का संचालन होता था। बंगाल की एक जनांकिकीय विशेषता यह थी कि इसके पूर्वी भाग में जहाँ मुस्लिम जनसंख्या बहुतायत में थी वहीं पश्चिमी भाग में हिन्दू अधिकता में थे। इसी तथ्य को समझते हुए अंग्रेजों ने विभाजित करो और शासन करो की  नीति को चरितार्थ करते हुए वस्तुतः मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग.थलग करने के उद्देश्य से बंगाल का विभाजन कर दिया। यह और बात रही कि दिखावे के तौर पर कर्जन ने बंगाल.विभाजन के निम्नलिखित कारण गिनाए-

  • क्षेत्रफल तथा जनसंख्या की दृष्टि से बंगाल प्रान्त आकार की दृष्टि से बहुत बड़ा था।
  • बंगाल के लेफ्टीनेन्ट गवर्नर को 7.8 करोड़ जनसंख्या तथा 1.89 लाख वर्ग मील क्षेत्र पर शासन.व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने में कठिनाइयाँ आ रही थीं।
  • रेल लाइनों की कमी, नदियों की अधिकता के कारण कमजोर परिवहन प्रणाली।
  • मार्गों पर सुरक्षा की अपर्याप्त व्यवस्था, चोरी.डकैती राहजनी की बढ़ती घटनाएं।
  • स्थायी बन्दोबस्त व्यवस्था के चलते कृषकों की दयनीय स्थिति।
     

प्रश्न 18 :  थियोसोफिकल सोसाइटी पर एक टिप्पणी लिखिए।
  
उत्तर :  
एक रूसी महिला एच.पी. ब्लावोत्सकी तथा इंग्लैण्ड की सेना के एक पूर्व अधिकारी कर्नल एच. एस. अल्काट द्वारा सन् 1875 में अमरीका में थियोसोफकल सोसाइटी की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य धर्म को समाज सेवा का मुख्य साधन बनाना एवं धार्मिक मातृभाव के प्रचार.प्रसार द्वारा अधिकतम जनकल्याण करना था। पूर्व के धार्मिक दर्शन का अध्ययन करने के उद्देश्य से सन् 1879 में ब्लावोत्सकी तथा अल्काट भारत आए तथा सन् 1886 में मद्रास के निकट आडयार नामक स्थान पर थियोसोफिकल सोसाइटी स्थापित की। इस आन्दोलन की सफलता क श्रेय श्रीमती एनी बेसेन्ट को जाता है जो सन् 1889 में इस सोसाइटी में शामिल हुई तथा चार वर्ष बाद स्थायी तौर पर भारत में ही रहने लगी। थियोसोफिकल आन्दोलन हिन्दू आध्यात्मिक ज्ञान की खोज पर केन्द्रित था। इसने हिन्दू धर्म के दर्शन तथा ज्ञान का प्रसार किया। इस आन्दोलन के समर्थक वेदों एवं उपनिषदों को भारत का गौरव मानते थे तथा भारतीय विचारों की पुनस्र्थापन पर बल देते थे। थियोसोफीकल सोसायटी ने समाज के सभी वर्गों की शिक्षा पर बल दिया। थियोसोफिकल सोसाइटी ने बनारस में सन् 1898 में एक विद्यालय की स्थापना की जो बाद में काॅलेज के रूप में विकसित हुआ तथा जिसने सन् 1915 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का स्वरूप धारण किया। 

प्रश्न 19 : हार्टौग समिति (1929) के मुख्य निष्कर्षों पर चर्चा कीजिए।
  
उत्तर :  
सन् 1919 के कानून द्वारा शिक्षा प्रान्तों को हस्तान्तरित कर दी गई तथा केन्द्र सरकार ने शिक्षा के लिए अनुदान देना बन्द कर दिया। प्रान्तीय सरकारों ने अपने स्तर से शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु कुछ विशेष नहीं किया, तथापि निजी प्रयासों से स्कूलों और महाविद्यालयों की संख्या में वृद्धि होती गई। इससे शिक्षा के स्तर में गिरावट आई। शिक्षा के लगातार गिरते स्तर को सँभालने के लिए भारतीय सांविधिक आयोग ने सन् 1929 में सर फिलिप हार्टौग की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। समिति के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित प्रकार थे-
प्राथमिक शिक्षा पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी पर इसे अनिवार्य न बनाया जाए।
केवल योग्य विद्यार्थियों को ही हाई स्कूल तथा इण्टरमीडिएट शिक्षा में प्रवेश दिया जाए। औसत स्तर के विद्यार्थियों को कक्षा 7 के बाद से व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाया जाए।
विश्वविद्यालय अपने यहाँ शिक्षा के स्तर को सुधारें और इसके लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश को नियन्त्रिात किया जाए।

प्रश्न 20 : ‘डिस्कवरी आॅफ इण्डिया’ में नेहरू के प्रभाव प्रतिपाद्य विषय को स्पष्ट कीजिए।    

उत्तर :  जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखित ‘भारत एक खोज’ का मुख्य सार भारत व भारतीयों की गरिमामयी विरासत को उजागर करना है। वह भारत के इतिहास की सार्थकता और वर्तमान में उसके महत्व पर प्रकाश डालना चाहते थे। इस पुस्तक से भारत की गरिमामयी बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डाला गया है। उक्त पुस्तक में ब्रिटिश शासकों द्वारा किये एग अमानवीय कृत्यों, आर्थिक संरचना को नष्ट करने के प्रयासों को भी प्रमुखता दी गयी है। नेहरू के विचारानुसार, आन्तरिक संघर्ष, तानाशाही के बाहरी दबाव, भीतरघात व घृणा का शिकार होकर भी भाईचारे के उद्देश्य को बनाए रखने की भारतीय सभ्यता की परम्परा विश्व में अन्यत्रा मिलनी दुलर्भ है।
 

प्रश्न 21 : सन् 1947 से पूर्व की अवधि में रूस के प्रति नेहरू के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।    
 
उत्तर : 
1929 में अमरीका महान मंदी के दौर से गुजर रहा था, जिसने पूंजीवादी देशों पर आर्थिक रूप से प्रत्यक्ष और अन्य क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डाला। इस मंदी के दौर में रूस ही एक ऐसा देश था जो न केवल अप्रभावित रहा, बल्कि महत्वपूर्ण प्रगति भी की। रूस की इसी आर्थिक योजना से नेहरू अत्यन्त प्रभावित हुए और इसे अपनी आर्थिक योजनाओं का एक हिस्सा बनया।

प्रश्न 22 :   नारी उत्थान के लिए 1856.1956 की अवधि में जो विधायी अध्युपाय पारित किये गए, उनका परिचय दीजिए। हाल ही में सती का प्रतिरोध करते हुए नया अधिनियम क्यों पारित किया गया?

उत्तर :  महिलाओं के उत्थान के लिये सरकार एक निश्चित, सोची.समझी नीति पर चल रही है। समाज में महिलाओं की दशा सुधारने के लिए समय-सयम पर वैधानिक कार्रवाईयां भी की गयी हैं, जो निम्नवत् हैंः
1956 में हिन्दू विधवा पुर्नविवाह अधिनिमय द्वारा विधवा विवाह को वैधानिकता प्रदान की गयी और उनके उत्पन्न बच्चे भी वैध घोषित किये गए।
1872 में नेटिव मैरिज एक्ट पास हुआ। इसके द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं का विवाह वर्जित कर दिया गया और बहुविवाह को गैर कानूनी घोषित किया गया।
1874 में सम्पत्ति कानून पास हुआ जिसके द्वारा स्त्राी द्वारा अर्जित धन, स्त्री धन माना गया।
1929 में शारदा एक्ट पारित हुआ, जिसके द्वारा लड़की व लड़के की शादी योग्य उम्र बढ़ायी गयी।
स्वतंत्रा भारत का संविधान स्त्राी व पुरुष दोनों को समानता प्रदान करता है। इस संबंध में स्वतंत्रा भारत में सबसे महत्वपूर्ण कानून विशेष विवाह अधिनियम.1954ए हिन्दू विवाह अधिनियम .1955ए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम.1956 आदि हैं। 1955 के अधिनियम के अनुसार, लड़की की आयु 15 वर्ष व लड़के आयु 18 वर्ष निर्धारित की गयी। 1956 के अधिनियम के अनुसार, लड़की को पिता की सम्पत्ति में पुत्र के साथ बराबरी का हक दिया गया।
सती प्रथा की रोकथाम के लिए नया अधिनियम लाने का मुख्य कारण देवराला (राजस्थान) में रूपकुंवर द्वारा सती होना रहा।

प्रश्न 23 : उग्रपंथी राष्ट्रवादी आन्दोलन के विकास में धार्मिक सुधार आन्दोलनों के योगदान का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिए?

उत्तर :  धार्मिक सुधार आन्दोलन ने भारतीयों को आत्म-सम्मान, आत्म बल एंव अपने देश के गोरव के प्रति जागरुक किया। इससे अनेक भारतीय आधुनिक दुनिया की वास्तविकता को भी समझने लगे। इस आन्दोलन ने पुरातन धर्म को नये रूप में ढालकार आधुनिक समाज के लिए उपयोगी बनाया। सुधारक, आधुनिक मूल्यों एवं विज्ञान में हो रही प्रगति का सर्मथन एवं इसे भारतीय जीवन में अपनाने पर बल देते थे। इससे धर्मनिरेपक्ष एवं राष्ट्रवादी ताकतों का उदय हुआ और राष्ट्रवाद की भावना में बढ़ोतरी हुई। लोग कर्म और ज्ञान पर जोर देने लगे, जिसे उग्रपंथी राष्ट्रवादी गतिविधियों का उदय हुआ, जो समानता, भाई-चारे और स्वतन्त्राता में विश्वास रखते थे। देखा जाये तो भारत वर्ष में सामाजिक सुधार आंदोलन, धार्मिक सुधार आंदोलन का ही अभिन्न अंग है और यह आंदोलन लोगों में राजनैतिक व आर्थिक उत्थान की भावना को जागृत करने में सफल रहा।

प्रश्न 24 : ‘आइ.एन.ए. के अधिकारों के न्यायविचारण से भारत में ब्रिटिश शासन को हानि ही अधिक हुई, लाभ कम’। स्पष्ट कीजिए?

उत्तर :   अब ब्रिटिश सरकार ने आई.एन.ए. अधिकारियों पर ब्रिटिश राजशाही के प्रति निष्ठा की शपथ तोड़ने के अभियोग में मुकदमा चलाने का फैसला किया तो देश भर में इस फैसले के खिलाफ लहर दौड़ गयी। सर्वत्रा प्रदर्शन एवं हड़ताल हुई तथा आई.एन.ए. अधिकारियों की रिहाई की मांग की गयी। कांग्रेस भी जनभावना का सर्मथन कर रही थी। इस मौके का लाभ उठाकर कांग्रेस ने आई.एन.ए. बचाव समिति की स्थापना की। इस समिति में जवाहर लाल नेहरूए मूला भाई देसाई, तेज बहादुर सप्रु, कैलाशनाथ काटजू व आसफ अली आदि जैसे प्रसिद्ध वकील शामिल थे। लाल किले में आयोजित कोर्ट मार्शल में सरकार ने आई.एन.ए. अधिकारियों को दोषी माना, लेकिन जनमत की भावना इस फैसले के खिलाफ थे। अतः उन्हें छोड़ दिया गया और सभी आरोप रद्द कर दिये गए।
इस बात से साफ जाहिर हो गया कि ब्रिटिश साम्राज्य की एक नींव (सेना) में दरार पैदा हो गयी है और उसमें देश भक्ति की भावना का उदय हो गया है। देश अब ज्यादा उत्पीड़न सहने की दशा में नहीं था और खोखले वायदों से जनता ऊब गयी थी। जनसाधरण की आवाज को दबाने के लिए अधिक बल के प्रयोग से पूरे देश में स्थिति विस्फोटक हो सकती थी। आई.एन.ए. की घटना से देश में देश भक्ति एवं साहस की प्रवृत्ति का उदय हुआ तथा इससे ब्रिटिश राज्य की नींव और कमजोर हो गयी।

 

प्रश्न 25 : ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर का मानवातावाद ईश्वर तथा मानव में उनके विश्वास का सम्मिश्रण है?’ व्याख्या कीजिए?
     
उत्तर :
  टैगोर का मानववाद आध्यात्मिक नीवों पर आधारित है। वे मनुष्य को भगवान का प्रतीक मानते हैं। यद्यपि टैगोर आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास रखते थे, फिर भी उन्हें मानव धर्म में विश्वास था। मानवतावादी होने के नाते टैगोर मनुष्य में ईश्वर का अंश देखते थे। वे मानव व्यक्तित्त्व में विश्व को अंतर्निहित मानकर मानवता की सीमा रेखा में ईश्वर का दर्शन करते थे। उनका आध्यात्मिक मानवतावाद इश्वर साधना का एकाकी पथ नहीं बल्कि उनका दर्शन समग्र रूप से मानव कल्याण से अभिप्रेरित है। उनकी अवधारणा थी कि ईश्वर पृथ्वी पर कठोर कर्म करने वाले व पत्थर तोड़ने वाले श्रमिकों के हृदय में वास करता है।

प्रश्न 26 : भारत में शास्त्रीय नृत्य के प्रमुख रूप क्या.क्या हैं? प्रत्येक की दो विशेषताएं बताइए।
 

उत्तर :  शास्त्रीय नृत्य के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैंः
(i) भरत नाट्यम:तमिलनाडु का प्रमुख नृत्य। इसमें तांडव का बलिष्ठ भाव विद्यमान है।
(ii) कथकली: केरल से सम्बन्धित नृत्य। कथकली का अभिप्राय ‘कथा पर आधारित नाटक’ है।
(iii) कत्थक: मूलतः उत्तर प्रदेश का नृत्य, जिसे मुगल बादशाहों का काफी प्रश्रय मिला। शाब्दिक अर्थ.कथा सुनाने वाला।
(iv) मणिपुरी: मणिपुर का लोकप्रिय नृत्य, जिसमें वैष्णव धर्म की विषय.वस्तु का प्रभाव है। अंग संचालन के ‘तांडव व लास्य’ दो प्रमुख स्वरूप हैं।
(v)  कुचिपुड़ी: मूलतः आंध्र प्रदेश से संबंधित। कृष्ण भक्ति की विषय.वस्तु से ओत.प्रोत।
(vi) ओडिसी: उड़ीसा में उत्पत्ति। मुख्यरूप से नाट्य शास्त्रा, अभिनय चंद्रिका व अभिनय दर्पण शास्त्रा पर निर्भर।

 

प्रश्न 27 : प्रमुख शिक्षण विधियों का वर्णण करें।

उत्तर :  आगम विधि - इस विधि से प्रत्यक्ष अनुभवों, उदाहराणों तथा प्रयोगों का अध्ययन कर नियम निकाले जाते है तथा ज्ञात तथ्यों के आधार पर उचित सूझ-बूझ से निर्णय लिया जाता है।

निगमन विधि - इसमें छात्रा स्वयं नियम नहीं बनाते, उन्हें पहले बने नियमों, उदाहरणों, प्रयोगों और पूर्व अनुभवों आदि से अवगत करा दिया जाता है और कुछ प्रश्नों को हल करके दिखा दिया जाता है।

हरबर्ट विधि (प्रणाली) -
1. प्रस्तावना या पाठ की तैयारी 2. विषय प्रवेश 
3. तुलना 4. नियमीकरण 
5. प्रयोग एवं अभ्यास।

प्रोजेक्ट विधि - इसमें शिक्षण के सोपान निम्नवत हैं -  
1. समस्या उत्पन्न करना 
2. समस्या का चुनाव
3. कार्यविधि की रूपरेखा बनाना 
4. कार्यविधि का प्रयोग
5. आकड़ें निकालना/एकत्रा करना 
6. परीक्षण या निष्कर्ष। 

डाल्टन विधि - इसकी कार्य प्रणाली अधोलिखित हैं -  
1. कार्य का ठेका 2. निर्दिष्ट कार्य 
3. कार्य की इकाई 4. प्रयोगशाला 
5. कक्षा की सभा 6. प्रगतिसूचक रेखाचित्रा 
किण्डर गार्टन प्रणाली - किन्डर गार्टन बच्चों का एक छोटा सा स्कूल है जहाँ बच्चों को चटाई बुनने, मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा क्रियात्मक गाने सिखाए जाते हैं।

माण्टेसरी पद्धति - इसके मतानुसार शिक्षा 
(1) कर्मन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ही जानी चाहिए तथा अन्त में भाषा शिक्षण किया जाना चाहिए।

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