सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 11 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 11 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : ‘भारत में योजना प्रचालन संघवाद के अपरदन की ओर ले गया है।’ विवेचन कीजिए।

उत्तर : ‘आर्थिक और सामाजिक नियोजन’ भारतीय संविधान के सातवें परिशिष्ट की समवर्ती सूची का विषय है। समवर्ती सूची के विषयों  के संबंध में संसद तथा राज्य के विधानमंडल दोनो ही विधि-निर्माण कर सकते हैं। इसका लाभ उठाकर केंद्र ने 15 मार्च, 1950 को बिना विधान बनाए मात्रा एक प्रस्ताव पारित करके संघ तथा राज्यों के समस्त प्रशासन पर अपनी नीतियों की व्यवहारिक एकरूपता स्थापित करने के लिए योजना आयोग की स्थापना कर दी। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में इस आयेाग का उल्लेख नहीं किया गया हैं योजना आयोग एक संवैधानिक निकाय न होकर एक परामर्शदात्राी संस्था है। एक संघीय देश मे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नियोजन को लेकर प्रायः मतभेद उत्पन्न होते रहते हैं, लेकिन योजना आयोग के प्रावधान द्वारा केंद्र ने राज्यों के ऊपर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लिया है। योजना आयोग राज्यों पर प्रभावी नियंत्राण, राज्यों की योजनाअेां व कार्यक्रमों की संस्तुति द्वारा रखता है। केंद्र सरकार द्वारा राज्येां को दी जाने वाली केंद्रीय सहायता की संस्तुति योजना आयोग द्वारा ही की जाती है। ये विवेकाधीन अनुदान होते हैं, जो कि संविधान की धारा 282 के तहत दिए जाते हैं। इसी प्रकार, राज्य सरकारों को ऋण भी योजना आयोग की संस्तुति पर ही जारी किए जाते हैं। ये सभी कारण केंद्र व राज्य सम्बन्धों में दबाव और तनाव उत्पन्न करते रहते हैं। यद्यपि, भारतीय संघात्मक गणराज्य में नियोजन को संवैधानिक आधार देने के लिए 1952 मे राष्ट्रीय विकास परिषद् का गठन किया गया, जो कि योजना आयेाग द्वारा तैयार योजना के प्रारूप को स्वीकार या उसमें परिवर्तन करती है। परिषद के सदस्य प्रधानमंत्राी, योजना आयोग के सदस्य व राज्यों के मुख्यमंत्राी होते हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद का मुख्य प्रयोजन योजना आयोग, केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के बीच समन्वय स्थापित करना है। लेकिन ये परिषदें आवश्यक परिणाम दे पाने में समर्थ नहीं हो पाई हैं। 

प्रश्न 2 : भाग IV में अन्तर्विष्ट निर्देशों के अतिरिक्त संविधान के अन्य भागों कें कुछ और निर्देश हैं जो राज्यों के नाम हैं, वे क्या हैं?

उत्तर : भारत के संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख है। भाग IV में अन्तर्विष्ट निर्देशों के अतिरिक्त संविधान के अन्य भागों में कुछ अन्य निर्देश हैं तथा ये राज्यों के नाम हैं। उदाहरणार्थ, अनुच्छेद-335 संघ या राज्यों के क्रियाकलापों से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए की जाने वाली नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के आरक्षण का प्रावधान करता है। अनुच्छेद-350 (क) भाषीय आधार पर अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को शिखा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए हैं। संविधान के भाग XVII क अनुच्छेद-351 हिन्दी भाषा का विकास सुनिश्चित करने के लिए है, जिससे यह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी अंगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम बने। संविधान के भाग XII अनुच्छेद-256 के अनुसार, प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा बनाई गयी विधियों का और ऐसी विद्यमान विधियों का, जो राज्य में लागू हैं, अनुपालन सुनिश्चित रहे। अनुच्छेद-265 में राज्य व संघ दोनों के लिए प्रावधान है कि विधि द्वारा अधिकृत किये बिना कोई भी कर नहीं लगाया जाएगा।  

प्रश्न 3 : भारत के उच्चतम न्यायालय के सलाह.अधिकार क्षेत्रा की परिधि को समझाइए।
 
उत्तर : भारत का सर्वोच्च न्यायालय परिसंघ न्यायालय, अपील न्यायालय व संविधान का संरक्षक न्यायालय है। संविधान ने उसे परामर्शी क्षेत्राधिकार की शक्ति भी प्रदान की है। संविधान के अनुच्छेद-143 के तहत यदि राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि का कोई प्रश्न ऐसी प्रकृति का है, जिससे सार्वजनिक महत्व से जुड़ा हो तथा उस पर सर्वोच्च न्यायालय की सलाह प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उक्त प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह मांग सकता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया परामर्श सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होगा। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय पर संवैधनिक दृष्टि से ऐसी बाध्यता नहीं है कि उसे परामर्श अवश्य ही देना है। इस क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत के विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उसकी राय ज्ञात करने के लिए प्रस्तुत किये जा सकते हैं, जिनके दायरे में पूर्ववर्ती भारतीय रियासतों से हुई संधियों और समझौतों की व्याख्या आती है। अनुच्छेद-143 खण्ड (2) के तहत राष्ट्रपति इस प्रकार के विवादों को सवोच्च न्यायालय के पास उसकी सलाह के लिए भेज सकता है। भारत सरकार और देशी रियासतों के बीच 1947 और 1950 के बीच हुए समझौते इसी के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार के विवादों में सर्वोच्च न्यायालय के लिए परामर्श देना संविधान के तहत अनिवार्य है तथा परामर्श को स्वीकृत या अस्वीकृत करना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है। गत चार दशकों में राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय के केवल 8 बार परामर्श मांगा है। अयोध्या में राम मंदिर विवाद के संबंध में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा था। 

प्रश्न 4 : अल्पसंख्यक आयोग की हैसियत, संगठन एवं कार्यों को समझाइए।

उत्तर : अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा और संरक्षण के उद्देश्य से सरकार ने 1978 में अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की । अभी तक यह एक गैर.वैधानिक संगठन था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इसके स्थान पर अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयेाग की स्थापना की है, जो कि पूरी तरह एक वैधानिक संगठन है। ऐसा इसलिए किया गया है कि आयोग प्रभावी ढंग से कार्य करते हुए अपने निर्णयों का क्रियान्वयन करा 
सके। अलप्संख्यक आयोग में अध्यक्ष सहित सात सदस्य होते हैं। तथा ये सदस्य विभिन्न अलप्संख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आयोग, अल्पसंख्यकों को संविधान में दी गयी सुरक्षाओं के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करता है तथा संघ व राज्य सरकारों की इस संध में नीतियों का विश्लेषण करके, अल्पसंख्यकों के संरक्षण को प्रभावी बनाने के उपाय बताता है। अल्पसंख्यकों के उधिकारों का हनन या अतिक्रमण होने की स्थिति में आयोग संबंधित शिकायतों पर विचार करता है। यह अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार हेतु अध्ययन, अनुसंधान व सर्वेक्षण आदि कार्य करता है साथ ही, किसी अल्पसंख्यक समुदाय विशेष की स्थिति को देखते हुए उनको अतिरिक्त संरक्षण दिलाने के लिए कानूनी व कल्याणकारी कदम उठाने के लिए समय.समय पर सरकार को अपने सुझाव व प्रतिवेदन भेजता रहता है। 

प्रश्न 5 : सरकारी उपक्रम समिति की संरचना एंव कार्यों को बताइए।

उत्तर : सरकारी उपक्रम समिति की स्थापना मई, 1964 में विभिन्न औद्योगिक उपक्रमों के क्रिया-कलापों को अनुशासित व नियंत्रित करने के उद्देश्य से की गयी थी। समिति में लोकसभा के 15 सदस्य होते हैं, जो कि सदन के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय रीति द्वारा चुने जाते हैं। समिति में राज्यसभा के सात सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव लोकसभा द्वारा निर्वाचन के अनुरूप ही राज्यसभा द्वारा किया जाता है। समिति का अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से बनाया जाता है तथा उसकी नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष करते हैं समिति में किसी भी मंत्राी का चुनाव नहीं हो सकता। समिति का कार्यकाल एक वर्ष का हेाता हैं समिति क प्रमुख कार्य निम्नवत् हैंः

  • सार्वजनिक उपक्रमों की रिपोर्टों व लेखा-जोखा आदि का परीक्षण, जो विशिष्ट उद्देश्य के लिए उन्हें सौंपे गए हैं।
  • सार्वजनिक उपकरणों के संबंध में कंट्रोलर और आॅडीटर जनरल की रिपोर्ट का परीक्षण।
  • सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायत्तता व कार्यक्षमता पर रिपोर्ट तैयार करना। उनके कार्य व्यवहार, उचित व्यापार सिद्धांतों पर चलने या न चलने की जांच करना।
  • लोक सभा अध्यक्ष द्वारा इस संबंध में अन्य सौंपे गए कार्यों को करना। इसमें वे कार्य आते हैं, जिनका अधिकार सार्वजनिक उपक्रमों के बारे में लोक लेखा समिति तथा अनुमान समिति में निहित है। 

प्रश्न 6 : मौलिक कर्तव्य और उनके आशय क्या हैं?

उत्तर : नागरिकों के मौलिक कर्तव्य 42 वें संवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान में समाहित किये गए और उन्हें अध्याय IV में अनुच्छेद 51(क) के रूप में जोड़ा गया। संविधान में मौलिक कर्तव्यों का समावेश मुख्यतः इस उद्देश्य से किया गया था कि नागरिकों में देशभक्ति का भावना सुदृढ़ हो, एक ऐसी चारण संहिता का पालन करने में उनकी सहायता हो, जो राष्ट्र को सुदृढ़ बनाए, उसकी संप्रभुता व अखंडता की सुरक्षा करे। मौलिक कर्तव्यों का यह भी उद्देश्य है कि राज्य को विविध कार्यों के संपादन और सामंजस्य, एकता, भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता के आदर्शों को बढ़ावा देेने में सहायता मिले। ये आदर्श भारतीय संविधान का आधार हैं। इन मौलिक कर्तव्यों ने राज्य की कार्यप्रणली में नागरिकों के महत्व को दर्शाया है और उनसे यह अपेक्षा की है कि वे अपने कर्तव्यों का पूरी सार्मथ्य से पालन करें। इस प्रावधान के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह,  
1. संविधान, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रीय गान के प्रति आस्था व सम्मान व्यक्त करे,
2. स्वतंत्राता संग्राम के पावन आदर्शों को संजोए व उनका अनुसरण करे,
3. भारत की संप्रभुता, एकता व अखंडता को समर्थन व प्रोत्साहन दे,
4. देश की रक्षा करे व आवश्यकतानुसार राष्ट्रसेवा में जुटे,
5. सभी भारतीयों में परस्पर भातृत्व की भावना को प्रोत्साहित करे तथा महिलाओं की गरिमा के प्रतिकूल किसी भी प्रचलन का परित्याग करे, 
6. राष्ट्र की समन्वित प्रकृति की समृद्ध विरासत का अनुसरण करें, 
7. प्राकृतिक पर्यावरण को सुधारे, उसे संरक्षण दे तथा प्राणीमात्रा के प्रति करुणा भाव रखे,
8. वैज्ञानिक मानसिकता, मानववाद तथा खोज भाव विकसित करे, 
9. जन-संपत्ति की सुरक्षा करे और हिंसा का परित्याग करे, तथा  
10. सभी वैयक्तिक व सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता का प्रयास करे।
राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों की भांति ये कर्तव्य भी अपरिवर्तनीय हैं। इन्हे ंन्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। इसके बावजूद ये कर्तव्य हमें सदा इस बात की याद दिलाते रहते हैं कि हमारे राष्ट्रीय उद्देश्य क्या हैं और हमारी राजनीतिक व्यवस्था किन बुनियादी गुणों से अनुप्राणित है। ये कर्तव्य हमे अपने अंदर सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने की सही प्रेरणा देते हैं। 

प्रश्न 7 : 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा भारत में पंचायत राज व्यवस्था में किये गए मुख्य परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (b) संविधान (73वां) संशोधन अधिनियम, 1992 में पंचायती व्यवस्था के संबंध में किये गए मुख्य प्रावधान निम्नप्रकार  हैं।
(i) राज्यों में गांव, मध्यम और जिला स्तरों पर ठोस, सक्षम व उत्तरदायी पंचायतों की त्रिस्तरीय प्रणाली का प्रस्ताव।
(ii) पंचायतों की त्रिस्तरीय प्रणाली ग्राम, मध्यम जिला स्तर पर होगी।
(iii) प्रत्येक स्तर की पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष होगा। सामान्य प्रक्रिया में कार्यकाल पूरा होने से पहले उसे भंग किये जाने की स्थिति में छह माह के अंदर चुनाव कराना आवश्यक होगा।
(iv) सभी सीटें प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुनावी क्षेत्रों की जनसंख्या तथा आवंटित सीटों की संख्या के बीच आनुपातिक आधार पर भरी जाएंगी।
(v) प्रत्येक स्तर पर अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण मिलेगा।
(vi) प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाने वाले कुल पदों में से एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्गों को दिये जाने वाले आरक्षण में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई पद आरक्षित रहेंगे।
(vii) मध्य और जिला स्तर पर अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा होगा।
(viii) मध्य और जिला स्तर पर अध्यक्ष का चुनाव की प्रक्रिया राज्य पर निर्भर करेगी।
(ix) पंचायतों को लेवी तथा स्थानीय कर वसूलने और उसे खर्च करने के अधिकार होंगे।
(x) पंचायतों को राज्य कोष से अनुदान मिलेगा।
(xi) पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीखा हेतु प्रत्येक पांच वर्ष में वित्त आयोग का गठन किया जायेगा। केंद्रीय वित्त आयोग भी पंचायतों को संसाधन बढ़ाने के लिए सुझाव देगा।
(xii) पंचायतों को संविधान की 11वीं अनुसूची में निर्धारित विषय भी सौंपे जा सकते हैं, इसमें 29 विभाग हैं। 
(xiii) 29 विभागों के कर्मचारियों के स्थानांतरण, निलंबन, विभागीय जांच व सेवाएँ समाप्त करने के अधिकार पंचायतों को रहेंगे।

प्रश्न 8 : एकाधिकार तथा पूर्ण प्रतियोगता में अन्तर को समझाऐं।

उत्तर : - (1) विक्रेता की संख्या - पूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेताओं की संख्या काफी अधिक होती है, तथा कोई भी फर्म या विक्रेता अपनी गतिविधि से वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। व्यक्तिगत फर्म कीमत को स्वीकार करती है उस कीमत को जो कि उद्योग द्वारा निर्धारण की जाती है। फर्म को कीमत निर्धारण की आवश्यकता नहीं होती है, उसे तो प्रस्तुत कीमत पर अपने उत्पादन के स्तर को व्यवस्थित करना होता है। 
एकाधिकार की अवस्था में वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है, अतः फर्म और उद्योग का अन्तर समाप्त हो जाता है। एकाधिकारी को कीमत सम्बन्धी निर्णय भी लेना होता है, तथा उत्पादन का स्तर भी निश्चित करना होता है। एकाधिकारी फर्म स्वतंत्रा रूप से कीमत-उत्पादन सम्बन्धी निर्णय ले सकती है। 

(2) साम्य की अवस्था  - पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के साम्य के लिए आवश्यक है साम्य बिन्दु पर सीमान्त आगम के बराबर होनी चाहिए, और दूसरे यह कि सीमान्त लागत वक्र द्वारा सीमान्त आगम वक्र को नीचे की ओर से काटा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, साम्य बिन्दु पर सीमान्त लागत बढ़ती हुई होनी चाहिए, या लागत वृद्धि का नियम  क्रियाशील होना चाहिए। 
एकाधिकारी अवस्था में साम्य की पहली शर्त (MC = MR) तो आवश्यक है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि साम्य अवस्था में सीमान्त लागत बढ़ती हुई होनी चाहिए। एकाधिकारी फर्म का साम्य तीनों अवस्थाओं में स्थापित हो सकता है, जबकि सीमान्त लगात बढ़ रही हो, घट रही हो, तथा स्थिर हो। 

(3) कीमत स्तर - पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत का निर्धारण उस स्थान पर होता है, जहाँ सीमान्त लागत और सीमान्त आगम, कीमत के बराबर होते हैं। दूसरे शब्दों में,  P = MR (कीमत त्र सीमान्त आगम) के होनी चाहिए। 

(4) उत्पादन का स्तर - पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत फर्म उसी स्थान तक उत्पादन को बढ़ाती है, जहाँ सीमांत लागत, सीमान्त आगम के बराबर हो जाती है, अथवा वस्तु की कीमत, सीमान्त लागत के बराबर (P=MC)  हो जाती है। 

निष्कर्ष - (i) एकाधिकारी उत्पादन, पूर्ण प्रतियोगिता के उत्पादन से कम होता है। 
(ii) एकाधिकारी कीमत, पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत से अधिक होती है। 

(5) साधनों का उपयोग  -पूर्ण प्रतियोगिता में उत्पत्ति के साधनों का आदर्शतम उपयोग होता है। उत्पादन का आकार आदर्श होता है, साधनों में पूर्ण गतिशीलता होने के कारण उनको मिलने वाला पुरस्कार न्यायोचित होता है। 
एकाधिकारी अवस्था में उत्पादक का उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है। एकाधिकारी सीमित मात्रा में उत्पादन करके, ऊँचे कीमत निर्धरित करना चाहता है। इसी कारण अर्थव्यवस्था के साधनों का पूर्णतम उपयोग नहीं हो पाता है। 

(6) वस्तु का स्वरूप  - पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक ही किस्म की वस्तु का विनिमय समस्त बाजार में किया जाता है। इसी कारण समस्त बाजार में एक ही कीमत प्रचलित रहती है, तथा क्रेता वर्ग का शोषण संभव नहीं होता है। 
एकाधिकार में उत्पादक एक वस्तु अथवा वस्तु-विभेद की नीति को अपना सकता है। वस्तु की किस्म में बहुत थोड़ा-सा परिवर्तन करके, एकाधिकारी विभिन्न क्रेताओं से भिन्न-भिन्न कीमत प्राप्त कर सकता है। 

प्रश्न 9 : क्या एकाधिकारी सदैव असीमित होती है? इसकी चर्चा करें।

उत्तर : - उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि एकाधिकारी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता है। वस्तु का अकेला उत्पादन और विक्रेता होने के कारण वह कितनी भी ऊँची कीमत निर्धरित कर सकता है, किसी भी प्रकार की वस्तु का उत्पादन कितनी भी मात्रा में कर सकता है। दूसरे शब्दों में, एकाधिकारी की क्रियाओं पर कोई संप्रभावी नियन्त्राण नहीं होता है। लेकिन, यह एक मिथ्या धारणा है, एकाधिकारी की शक्ति असीमित होती है। कई कारक हैं, जोकि एकाधिकारी की शक्ति नियन्त्रिात करते हैं। ये कारक निम्न हैं:

(1) क्रेता संघ - यदि एकाधिकारी ठीक किस्म की वस्तु उचित मात्रा में न्यायोचित कीमत पर  नहीं बेचता है, तो क्रेता वर्ग अपने संघ का निर्माण करके एकाधिकारी का बहिष्कार करते हैं, तथा स्वयं ही वस्तु का उत्पादन न लाभ-न हानि  के सिद्धान्त के आधर पर शुरू कर देते है। 

(2) माँग की लोच - एकाधिकारी केवल उन्हीं वस्तुओं की ऊँची कीमत ले सकता है, जिनकी माँग बेलोचदार होती है। लोचदार माँग वाली वस्तुएँ एकाधिकारी शक्ति को सीमित करती हैं। यदि, एकाधिकारी बेलोच माँग वाली वस्तुओं के सम्बन्ध में ऊँची कीमत की नीति को अपनाता है तो दीर्घकाल में क्रेता इस वस्तु से सम्बन्ध्ति अपनी माँग में संशोधन कर सकते हैं। 

(3) स्थानापन्न वस्तु का भय - व्यावहारिक जीवन में विशुद्ध एकाधिकार की स्थिति नहीं पाई जाती है। वस्तु की यदि सन्निकट स्थानापन्न नहीं होती, तो कम से कम निकट की स्थानापन्न  अवश्य उपलब्ध होती है। अतः एकाधिकारी ऐसी वस्तुओं की अधिक कीमत नहीं ले सकता, जिसकी स्थानापन्न वस्तु उपलब्ध होती है। 

(4)  उत्पत्ति के नियम - एकाधिकारी की शक्ति उत्पत्ति के नियम से भी प्रभावित होती है, जिसके अन्तर्गत वस्तु का उत्पादन हो रहा है। जिन वस्तुओं का उत्पादन उत्पत्ति वृद्धि नियम या लागत ह्नास नियम के अन्तर्गत होता है, उनकी कीमत अधिक ऊँची निर्धरित नहीं की जा सकती। यदि एकाधिकारी ऐसी अवस्था में वस्तु की ऊँची कीमत निर्धारित करता है तो वस्तु की माँग कम हो जाएगी जिसके कारण उत्पादन की मात्रा को भी घटाना पड़ेगा। उत्पत्ति वृद्धि नियम के अन्तर्गत उत्पादन का आकार जितना छोटा होगा उतना ही उत्पादन की लागत अधिक होगी। अतः लागत बढ़ने के कारण एकाधिकारी लाभ कम हो जाएंगे। 

(5) सरकारी हस्तक्षेप  - जन-हित की दृष्टि से सरकार एकधिकारी की क्रियाओं पर विभिन्न प्रकार लगा सकती है। सरकार एकाधिकारी 
विरोधी कानून  बनाकर एकाधिकारी संगठनों की स्थापना को गैर-कानूनी घोषित कर सकती है। इसी प्रकार लाइसेन्स देने के सम्बन्ध में सरकार प्रतिबन्धत्मक नीति अपना सकती है। इसी प्रकार लाइसेन्स देने के सम्बन्ध में सरकार प्रतिबन्धत्मक नीति अपना सकती है। सरकार कई प्रकार के अप्रत्यक्ष उपाय अपनाकर भी एकाधिकारी की शक्ति को नियन्त्रिात कर सकती है। जिस प्रकार, सरकार कठोर साख की नीति अपना सकती है, ऊँची दर से एकाधिकारी लाभों पर कर लगा सकती है, उत्पादन की अधिकतम मात्रा तय कर सकती है, तथा कीमत नियन्त्राण की नीति को अपना सकती है। 

प्रश्न 10 : अपूर्ण प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालें।

उत्तर : - (1) फर्मों की अधिक संख्या  - अपूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग के अन्तर्गत स्थिर फर्मों की संख्या काफी अधिक होती है। प्रत्येक फर्म कीमत और उत्पादन के सम्बन्ध में स्वतन्त्रा नीति अपना सकती है, प्रतिद्वन्द्व फर्मों की क्या प्रतिगिक्रिया होगी, इस बारे में फर्म को चिन्तित नहीं होना पड़ता है। 

(2) उत्पाद-विभेदीकरण  - अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक फर्म अलग-अलग किस्म की वस्तु उत्पादन करती है। इस वस्तु के विभेदीकृत होने के कारण दुसरी फर्म इसकी निकट स्थानापन्न तो हो सकती है, लेकिन इसकी पूर्ण स्थानापन्न वस्तुएँ बाजार में उपलब्ध नहीं होती हैं। उत्पाद-विभेद देा प्रकार से किया जा सकता है:

(i) वस्तु की किस्म में अन्तर करके- जिस प्रकार यदि वस्तु के उत्पाद के लिए अलग-अलग प्रकार के कच्चे माल का प्रयोग किया जाता है, रूप, आकार, रंग अथवा पैकिंग का अंतर होता है, टिकाऊपन में अन्तर होता है, कारगरी में अन्तर होता है, तो वस्तु की किस्म भी बदल जाती है। 

(ii) विक्रय-कला - विक्रेता अपने विक्रय कौशल के द्वारा भी अपनी वस्तु के लिए अलग से माँग तैयार कर सकता है। जिस प्रकार प्रभावकारी विज्ञापन, आकर्षक, आकर्षक शेरूम, ग्राहक के घर वस्तु पहुँचाने की सुविधा, माह के अन्त में कीमत के  भुगतान की सुविधा, आदि उपाय बिक्री संवर्धन को सम्भव बनाते हैं। 
उत्पाद विभेद के कारण फर्म का कीमत पर काफी नियन्त्राण होता है। फर्म कीमत में वृद्धि करती है तो उसके ग्राहकों में कोई महत्वपूर्ण कमी नहीं होगी, इसी प्रकार एक फर्म कीमत में कमी करके बहुत से क्रेताओ को आकर्षित नहीं कर सकती। यही कारण है कि अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की माँग वक्र अधिक लोचदार होती है। अर्थशास्त्राी हेन्डर्सन तथा क्वांड्ट का मत है,”अपूर्ण प्रतियोगिता के लिए क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि उत्पाद-विभेद महत्त्वपूर्ण है।“

(3) फर्मों के प्रवेश एवं बहिर्गमन की स्वतन्त्राता  - फर्मों को यह स्वतन्त्राता होती है, कि वे उद्योग में किसी भी समय प्रवेश कर सकती हैं, तथा किसी भी समय उद्योग छोड़कर बाहर आ सकती हैं। अपूर्ण प्रतियोगिता की इस विशेषता का आशय यह है कि नई फर्म बाजार में प्रवेश करके निकट स्थानापन्न वस्तु का उत्पादन कर वस्तु की पूर्ति को बढ़ा सकती हैं। इसी प्रकार, फर्म के साधनों की मात्रा इतनी कम होती है कि किसी भी समय हानि होने पर फर्म उत्पादन बन्द कर सकती है।

प्रश्न 11 : निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें।  
(i) जलोढ़ मिट्टी
(ii) काली या रेगुर मिट्टी
(iii) लाला मिट्टी
(iv) लैटराइट मिट्टी

उत्तर :  (i)  जलोढ़ मिट्टी उत्तर भारत में पश्चिम में पंजाब से लेकर सम्पूर्ण उत्तरी विशाल मैदान को आवृत करते हुए गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्रा तक फैली है। अत्यधिक उर्वरता वाली इस मिट्टी का विस्तार सामान्यतः देश की नदियों के बेसिनों एवं मैदानी भागों तक ही सीमित है। हल्के भूरे रंगवाली यह मिट्टी 75 लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्रा को आवृत किये हुए है।

  • इसकी भौतिक विशेषताओं का निर्धारण जलवायविक दशाओं विशेषकर वर्षा तथा वनस्पतियों की वृद्धि द्वारा किया जाता है। इस मिट्टी में उत्तरी भारत में सिंचाई के माध्यम से गन्ना, गेहूँ, चावल, जूट, तम्बाकू, तिलहनी फसलों तथा सब्जियों की खेती की जाती है।
  • उत्पत्ति, संरचना तथा उर्वरता की मात्रा के आधार पर इसको तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है जो निम्नलिखित है-

(क) पुरातन जलोढ़ या बांगर मिट्टी-नदियों द्वारा बहाकर उनके पाश्र्ववर्ती भागों में अत्यधिक ऊँचाई तक बिछायी गयी पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बांगर के नाम से जाना जाता है। नदियों में आने वाली बाढ़ का पानी ऊंचाई के कारण इन तक नहीं पहुंच पाता है। नदी जल की प्राप्ति न होने, धरातलीय ऊंचाई तथा जल-तल के नीचा होने के कारण इनकी सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है।

(ख) नूतन जलोढ़ या खादर मिट्टी-यह मिट्टी नदियों के बाढ़ के मैदानों तक ही सीमित होती है। इसके कण बहुत महीन होते है तथा इनकी जलधारण शक्ति पुरातन जलोढ़ की अपेक्षा अधिक होती है। इन मिट्टियों की स्थिति नदी घाटी में होने के कारण इनकी सिंचाई की आवश्यकता सामान्यतः नहीं होती है।

(ग) अतिनूतन जलोढ़ मिट्टी-इस प्रकार की मिट्टी गंगा, ब्रह्मपुत्रा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि बड़ी नदियों के डेल्टा क्षेत्रा में ही मिलती है। यह मिट्टी दलदली एवं नमकीन प्रकृति की होती है। इसके कण अत्यधिक बारीक होते है तथा इसमें पोटाश, चूना, फास्फोरस, मैग्नीशियम एवं जीवांशों की अधिक मात्रा समाहित रहती है। इस मिट्टी में गन्ना, जूट आदि फसलों की कृषि की जाती है।

  • उपर्युक्त प्रकार की जलोढ़ मिट्टियों का गठन बलुई-दोमट से लेकर मृत्तिकामय रूप में पाया जाता है तथा इनका रंग हल्का भूरा होता है। इस प्रकार की मिट्टियों में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा वनस्पतियों के अंश पर्याप्त मात्रा में मिलते है।

(ii) काली या रेगुर मिट्टी एक परिपक्व मिट्टी है जो मुख्यतः दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के लावा क्षेत्रा में पायी जाती है। यह मिट्टी गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों के अधिकांश क्षेत्रा, मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रा, उड़ीसा के दक्षिण क्षेत्रा, कर्नाटक राज्य के उत्तरी जिलों, आन्ध्र प्रदेश के दक्षिणी एवं समुद्रतटीय क्षेत्रा, तमिलनाडु के सलेम, रामनाथपुरम, कोयम्बटूर तथा तिरुनलवैली जिलों, राजस्थान के बूंदी तथा टोंक जिलों आदि में 5 लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्रा पर विस्तृत है।

  •  साधारणतः यह मिट्टी मृत्तिकामय, लसलसी तथा अपारगम्य होती है। इसका रंग काला तथा कणों की बनावट घनी होती है।
  • इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं जीवांशों की कम मात्रा पायी जाती है, जबकि चूना, पोटाश, मैग्नेशियम, एल्यूमिना एवं लोहा पर्याप्त मात्रा में मिले रहते है।
  • उच्च स्थलों पर मिलने वाली काली मिट्टी निचले भागों की काली मिट्टी की अपेक्षा कम उपजाऊ होती है।
  •  निम्न भाग वाली गहरी काली मिट्टी में गेहूँ, कपास, ज्वार, बाजरा आदि की कृषि की जाती है। कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होने के कारण इसे ‘कपास की काली मिट्टी’ भी कहा जाता है।

(iii) लाल मिट्टी का निर्माण जलवायविक परिवर्तनों के परिणाामस्वरूप रवेदार एवं कायान्तरित शैलों के विघटन एवं वियोजन से होता है। ग्रेनाइट शैलों से निर्माण के कारण इसका रंग भूरा, चाकलेटी, पीला अथवा काला तक पाया जाता है। इसमें छोटे एवं बड़े दोनों प्रकार के कण पाये जाते है। छोटे कणों वाली मिट्टी काफी उपजाऊ होती है जबकि बड़े कणों वाली मिट्टी प्रायः उर्वरताविहीन बंजरभूमि के रूप में पायी जाती है।

  •  इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा जीवांशों की कम मात्रा मिलती है जबकि लौहतत्त्व एल्यूमिना तथा चूना पर्याप्त मात्रा में मिलते है। लगभग 2 लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्रा पर विस्तृत यह मिट्टी आन्ध्र प्रदेश एवं मध्य प्रदेश राज्यों के पूर्वी भागों, छोटानागपुर का पठारी क्षेत्रा, पश्चिम बंगाल के उत्तरी-पश्चिमी जिलों, मेघालय की खासी, जयन्तिया तथा गारो के पहाड़ी क्षेत्रों, नागालैण्ड, राजस्थान में अरावली पर्वत के पूर्वी क्षेत्रों तथा महाराष्ट्र, तमिलनाडु एवं कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में पायी जाती है।
  • इस मिट्टी में कपास, गेहूँ, दाल तथा मोटे अनाजों की कृषि की जाती है।

4. देश के 1 लाख वर्ग कि. मी. से अधिक क्षेत्रा पर विस्तृत लैटराइट मिट्टी का निर्माण मानसूनी जलवायु की आद्र्रता एवं शुष्कता के क्रमिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न विशिष्ट परिस्थितियों में होता है। इस विभिन्नता से निक्षालन की प्रक्रिया अधिक क्रियाशील रहने के कारण शैलों में सिलिका की मात्रा कम पायी जाती है।

  • इस मिट्टी का विस्तार मुख्यतः दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्रा के उच्च भू-भागों में हुआ है। इसके प्रमुख क्षेत्रा है मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पूर्वी तथा पश्चिमी घाट पहाड़ों का समीपवर्ती क्षेत्रा, बिहार में राजमहल की पहाड़ियां, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा तथा असम राज्य के कुछ भाग।
  • शैलों की टूट-फूट से निर्मित होने वाली इस मिट्टी को गहरी लाल लैटराइट, सफेद लैटराइट तथा भूमिगत जलवाली लैटराइट के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
  • गहरी लाल लैटराइट में लौह आक्साइडों तथा पोटाश की मात्रा अधिक मिलती है। इसमें उर्वरता कम रहती है किन्तु निचले भागों में कुछ खेती की जाती है।
  • सफेद लैटराइट की उर्वरता सबसे कम होती है और केओलिन की अधिकता के कारण इसका रंग सफेद हो जाता है।
  • भूमिगत जलवाली लैटराइट मिट्टी काफी उपजाऊ होती है क्योंकि वर्षाकाल में मिट्टी के ऊपरी भाग में स्थित लौह-आक्साइड जल के साथ घुलकर नीचे चले जाते है। इसमें चावल, कपास, मोटे अनाज, गेहूँ, चाय, कहवा, रबड़, सिनकोना आदि पैदा होते है।
  • भारत में दो और मिट्टियाँ मिलती है जिन्हें मरुस्थलीय तथा नमकीन अथवा क्षारीय मिट्टियाँ कहा जाता है।

मरुस्थलीय मिट्टी प्रायः कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में पायी जाती है। इसका विस्तार पश्चिमी राजस्थान, गुजरात, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश के भू-भागों पर है। यह बलुई मिट्टी है जिसके कण मोटे होते है। इसमें खनिज नमक की मात्रा अधिक मिलती है किन्तु ये जल में शीघ्रता से घुल जाते है। इसमें आर्द्रता तथा जीवांशों की मात्रा कम पायी जाती है। जल की प्राप्ति हो जाने पर यह मिट्टी उपजाऊ हो जाती है तथा इसमें सिंचाई द्वारा गेहूँ, कपास, ज्वार-बाजरा एवं अन्य मोटे अनाजों की कृषि की जाती है। सिंचाई की सुविधा के अभाव वाले क्षेत्रों में इस मिट्टी में कृषि कार्य नहीं किया जा सकता है।

  • नमकीन एवं क्षारीय मिट्टियाँ शुष्क तथा अर्द्धशुष्क भागों एवं दलदली क्षेत्रों में मिलती है। इसे विभिन्न स्थानों पर थूर, ऊसर, कल्लर, रेह, करेल, राँकड़, चोपन आदि नामों से जाना जाता है। इसकी उत्पत्ति शुष्क एवं अर्ध-शुष्क भागों में जल तल के ऊँचा होने एवं जलप्रवाह के दोषपूर्ण होने के कारण होती है। यह मिट्टी प्रायः उर्वरता से रहित होती है क्योंकि इसमें सोडियम, कैल्सियम तथा मैग्नेशियम की मात्रा अधिक होती है जबकि जीवांश आदि नहीं मिलते।
  • भारत की 47 प्रतिशत मिट्टी में जिंक, 11 प्रतिशत में लोहा एवं 5 प्रतिशत मिट्टी में मैगनीज की कमी देखी गयी है।
  • मृदा में खनिज पदार्थ (45.50 प्रतिशत), कार्बनिक पदार्थ (5 प्रतिशत), मृदा जल (25 प्रतिशत) तथा मृदा वायु पाये जाते हैं। मृदा के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-¯ सामान्यतः
  • पौधे आवश्यक खनिज पदार्थ मृदा से ही ग्रहण करते हैं।
  • पौधे अपनी जड़ों से आवश्यक जल मृदा से ही अवशोषित करते हैं।
  • मृदा द्वारा ही पौधों को जरूरी आॅक्सीजन व नाइट्रोजन उपलब्ध कराया जाता है।
  • मृदा पौधों की जड़ों को मजबूती से पकड़कर जमीन पर खड़ा रहने में सुदृढ़ आधार प्रदान करती है।
  • मृदा में कार्बनिक पदार्थ ह्यूमस विद्यमान होता है जो पौधों की वृद्धि में सहायक होता है।
  • पौधों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करने वाली मृदा असंख्य छोटे-छोटे कणों की बनी होती है, जिनके बीच-बीच में खाली स्थान होते हैं, जिन्हें रंध्राकाश कहा जाता है। इन्हीं रन्ध्राकाशों में वायु और जल मौजूद होते हैं जबकि पादप पोषक रंध्राकाशों में विद्यमान जल में घुले हुए होते हैं। पौधे अपनी जड़ों के मूल रोमों द्वारा जल में घुले हुए पादप पोषकों को अवशोषित करते रहते हैं। यह विदित है कि पौधों को पोषक तत्त्वों की आपूर्ति मृदा द्वारा ही होती है।

प्रश्न 12 : लाला लाजपतराय और बाल गंगाधर तिलक ने भारत में सामरिक राष्ट्रवाद की धारणा का समर्थन कैसे किया?
 
उत्तर : गरमपंथियों को अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास नहीं था तथा वह संघर्ष द्वारा भारत को आजाद करना चाहत थे। गरमपंथियों का नेतृत्व लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक व पिपिन चंद्र पाल ने किया। लाला लाजपत राय जिन्हें ‘शेरे पंजाब’ के नाम से भी जाना जाता है, ने अपने समाचार पत्रों ‘दि पंजाब’ (अंग्रेजी) व ‘वंदे मातरम्’ (उर्दू) के द्वारा राष्ट्रवादी जनभावनाओं को उद्धेलित कर अंग्रेजी शासन के प्रति उत्पन्न घृणा को तीव्र बनाया। श्री राय ने 1907 में किसानों के एक जबरदस्त आन्दोलन का संचालन किया। साइमन कमीशन के विरोध में निकाले गए जुलूस में पुलिस लाठी चार्ज में लाजपत राय घायल हो गया तथा 1928 में इनकी मृत्यु हो गयी। तिलक ने ‘मराठा’ (अंग्रेजी) तथा ‘केसरी’ (मराठी) समाचार पत्रों के सम्पादक के रूप में राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रसार किया। तिलक ने राष्ट्रीय भावनात्मक एकता को सुदृढ़ करने के लिए शिवाजी उत्सव (1895) तथा गणेश उत्सव (1893) आरम्भ किये, तिलक  की यह उक्ति ‘स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’ भी उनकी राष्ट्रवाद की भावना को स्पष्ट उजागर करती है। उनकी मान्यता थी कि ब्रिटेन केवल दबाव की भाषा समझता है तथा स्वराज्य भिक्षा से प्राप्त नहीं हो सकता है। तिलक विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग तथा स्वदेशी शिक्षा द्वारा अंग्रेज सरकार से संघर्ष की प्रेरणा देते थे।

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