सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 12 (प्रश्न 1 से 14 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 12 (प्रश्न 1 से 14 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : आभासी विधि निर्माण के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
 
उत्तर : जब कभी व्यवस्थापिका द्वारा किसी कानून को बनाते समय बाह्य रूप से यह प्रतीत हो कि वह अपनी शक्तियों की सीमा में रहकर ऐसा कर रही है, लेकिन वास्तविकता में वह संविधान या दूसरी व्यवस्थापिका की शक्तियों पर अतिक्रमण करती है, तो ऐसी स्थिति को आभासी विधि कहा जाता है। इस प्रकार के मामले में बाह्य आकृति की अपेक्षा विधि के सार का महत्व सर्वोपरि हो जाता है। भारतीय संविधान इस प्रकार से कानून बनाने या विधायन की अनुमति प्रदान नहीं करता है तथा उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय इन्हें निरस्त कर सकता है। इस प्रकार के उदाहरण में कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य केस को लिया जा सकता है। कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य विवाद में बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की वैधता को आभासी विधि के आधार पर ही चुनौती दी गयी थी। इस केस में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम को आभासी विधि के आधार पर ही अवैध करार दिया था।

प्रश्न 2 : भारत के निर्वाचन आयोग के गठन और कार्यों का वर्णन कीजिए।
 
उत्तर : संविधान के अनुच्छेद.324 के अंतर्गत संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करने, चुनाव न्यायाधिकरणों की स्थापना करने एवं चुनाव संबंधी अन्य मामलों की देखभाल करने के लिए एक स्वतंत्रा संस्था के रूप में निर्वाचन आयोग को अपनाया गया है। निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य उतने निर्वाचन आयुक्त होंगे, जितना राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर निर्धारित किया जाए। इनकी नियुक्ति छह वर्ष के लिए की जाती है। आम चुनावों के वक्त अस्थायी रूप से प्रादेशिक निर्वाचन आयुक्तों तथा उपनिर्वाचन आयुक्तों की अस्थायी नियुक्तियां की जाती हैं। ये अधिकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके कार्यों को पूरा करने में सहायता प्रदान करते हैं। 

आयोग के मुख्य कार्यः
1. चुनाव तालिकाओं को तैयार करना एंव प्रत्येक जनगणना के बाद तथा संसदीय और विधानसभा चुनावों के पूर्व उन्हें संशोधित करना।
2. संपूर्ण देश के चुनावी तंत्रा का पर्यवेक्षण करना।
3. चुनाव की तिथियों एवं कार्यक्रम की अधिसूचना जारी करना, जिससे नामांकन पत्रा भरे जा सकें एवं उनकी जांच चुनावों से पूर्व की जा सके।
4. चुनाव व्यवस्था से सबंधित विवादों को हल करना।
5. किसी राजनीतिक दल को मान्यता प्रदान करना तथा उसे चुनाव चिन्ह आवंटित करना।
6. चुनावों में गड़बड़ी किये जाने या अन्य स्थितियों में मतदान को रद्द करना।
7. किसी विधायक या सांसद की अयोग्यता के संबंध में राज्यपाल या राष्ट्रपति को परामर्श देना।
8. विधानसभा या लोकसभा चुनावों के पूर्व राष्ट्रपति को क्षेत्राीय आयुक्तों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सुझाव देना, जो कि चुनाव आयोग की सहायता कर सकें। 
9. स्वतंत्रा व निष्पक्ष चुनाव हेतु आचार संहिता का निर्माण व उसे लागू करना।

प्रश्न 3 : राष्ट्रीय विकास परिषद् के गठन और कार्य का वर्णन कीजिए।

उत्तर  (d) :
योजना आयोग के कार्यकरण से एक और संविधानेत्तर तथा विधि बाह्य निकाय की स्थापना करनी आवश्यक हो गयी, जिसे राष्ट्रीय विकास परिषद के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद एक गैर-संवैधानिक निकाय है तथा इसका आर्थिक आयोजन राज्यों व योजना आयोग के बीच सहयोग का वातावरण बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 6 अगस्त, 1952 को पारित एक प्रस्ताव के अनुसार किया गया था। भारत का प्रधानमंत्राी इसका अध्यक्ष तथा योजना आयोग का सचिव इसका सचिव होता है। सभी राज्यों के मुख्यमंत्राी एवं योजना आयोग के सभी सदस्य इसके सदस्य होते हैं। 1967 से केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य व केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को भी इसकी बैठकों में बुलाया जाने लगा है। 
राष्ट्रीय विकास परिषद के कार्य:

  • राष्ट्रीय योजना पर विचार विमर्श करना व उसे स्वीकृति देना।
  • राष्ट्रीय योजना के संचालन का समय-समय पर मूल्यांकन करना।
  • राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली सामाजिक व आर्थिक नीतियों की समीक्षा करना।
  • अविकसित व पिछड़े वर्गों एवं क्षेत्रों के विकास के लिए आवश्यक परियेाजना का सुझाव देना।
  • राष्ट्रीय योजना के लिए निर्देशित प्रारूप तैयार करना।
  • योजनाओं की सहायतार्थ राष्ट्रीय संसाधनों एवं प्रयासों को गतिशील व सुदृढ़ बनाना।
  • सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सामूहिक हितों वाली आर्थिक नीतियों को प्रोत्साहन देना।
  • राष्ट्रीय आयोजन में निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की पूत्र्ति हेतु उपाय सुझाना।

वस्तुतः राष्ट्रीय विकास परिषद का मुख्य प्रयोजन तकनीकी पक्ष (योजना आयोग), केंद्रीय राजनीतिक पक्ष (केंद्र सरकार) तथा राज्यीय राजनीतिक पक्ष (मुख्यमंत्राी) के बीच समन्वय स्थापित करना है। 

प्रश्न 4 : राष्ट्रपति शासन की घोषणा से सम्बन्धित उच्चतम न्यायालय के अप्रैल 1994 के फैसले का महत्त्व समझाइए।

उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय के 9 न्यायाधीशों की एक पीठ ने बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश की विधान सभाओं को अनुच्छेद 356 के तहत भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू करने के निर्णय को वैध माना। 1994 में इन न्यायाधीशों की पीठ ने राष्ट्रपति शासन से संबंधित अनुच्छेद 356(1) की व्याख्या करते हुए उपरोक्त राज्यों में विधानसभा भंग करने की कार्रवाई को वैध लेकिन 1988 में नागालैंड, 1989 में कर्नाटक एवं 1991 मेघालय विधान सभाओं को भंग करने की कार्रवाई को अवैध ठहराया है। अनुच्छेद 356 शुरु से ही केंद्र और राज्य की विपक्षी सरकारों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद ऐसी उम्मीद बंधी है कि अब आसानी से किसी भी राज्य की विधानसभाओं को भंग नहीं किया जा सकता है। 
उच्च्तम न्यायालय के निर्णय में कहा गया है कि राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए राज्यपाल की लिखित रिपोर्ट आवश्यक है, यदि राज्य सरकार धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध कार्य कर रही है तब राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। न्यायालय के फैसले में विधानसभा को नहीं भंग करने पर जोर देते हुए कहा गया है कि विधानसभा को भंग कने की जगह पर निलंबित किया जाये, बिना संसद की मंजूरी के विधानसभा भंग न की जाये। आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी सारे कागजात उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय को देने पड़ेगें। न्यायालय द्वारा विधानसभा भंग करने की कार्रवाई को अवैघ करार देने पर विधान सभा और सरकार को बहाल किया जा सकता है। 

प्रश्न 5 : भारतीय संविधान में बुनियादी ढाँचे की धारणा उभरने का वण्रन कीजिए। 
 
उत्तर :
संविधान के बुनियादी ढांचे को बदलने से संबंधित विषय हमेशा से विवादित रहे हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद का निपटारा 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य एवं 1980 में मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ में किया। जिसमें यह निर्णय दिया गया कि संसद व्यक्ति को प्रदत्त मौलिक अधिकारों को तो आवश्यकता पड़ने पर संशोधित कर सकती है लेकिन संविधान के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती है। उच्चतम न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों के अनुसार संविधान की सर्वोच्चता, सरकार का लोकतंत्रात्मक ग्रणतंत्रात्मक स्वरूप सरकार की धर्मनिरपेक्ष विचार धारा, संघात्मक व्यवस्था, विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच शक्ति का स्पष्ट विभाजन, व्यक्ति की स्वतंत्राता तथा व्यक्ति को प्रदत्त मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों के बीच संतुलन ही संविधान के बुनियादी ढांचे के तत्त्व हैं।
44वें संविधान संशोधन के द्वारा निष्पक्ष चुनाव, वयस्क मताधिकार एवं न्यायालय की स्वतंत्राता को भी बुनियादी घटक माना गया। लेकिन अभी इस पर सभी का विचार एक नहीं है और आज भी संविधान के बुनियादी ढांचे के विषय में बहस जारी है।  

प्रश्न 6 : स्वामीनाथन समिति द्वारा दिए गए राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के प्रारूप में लिंग सम्बन्धित मुद्दों पर प्रमुख संस्तुतियाँ क्या हैं? 
 
उत्तर :
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का प्रारूप बनाने के लिए डाॅ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा लिंग संबंधित मुद्दों पर की गई प्रमुख संस्तुतियां निम्नलिखित हैः
(i) परिवार को नियंत्रित करने के लिए पुरुष और महिला दोनों को समान रूप से पहल करनी होगी। अब तक ऐसा देखा गया है कि परिवार नियंत्राण के लिए महिलाओं को ही बंध्याकरण करवाने पर जोर दिया जाता है।
(ii) कुल प्रजनन दर को सन् 2010 तक 2.1 पर लाने की योजना।
(iii) लड़कियों की शिक्षा पर विशेष बल 
(iv) कामकाजी महिलाओं के बच्चों को देखभाल हेतु सुविधाएं मुहैया कराना।
(v) मातृ एवं शिशु कल्याण तथा परिवार नियोजन सेवाओं का स्वास्थ्य सेवाओं के अन्तर्गत लाकर स्त्राी रोग विज्ञान, यौन जनित रोगों का निदान, सुरक्षित गर्भपात, पुनरोत्पादित स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम को सम्मिलित किया जायेगा। राज्य जनसंख्या एवं सामाजिक विकास समिति में महिला और युवा सदस्यों को शामिल करने पर जोर दिया गया है।

प्रश्न 7 : राज्यों के परिषद् के सदस्यों की आवास सम्बन्धी अर्हता पर चुनाव आयोग की स्थिति समझाइए। आप इसके बारे में क्या सोचते हैं?
 
उत्तर :
राज्यों की परिषद या संसद का ऊपरी सदन राज्य सभा कहलाता है। इस सदन में अपनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत प्रत्येक राज्य की विधान सभाओं से सदस्य निर्वाचित कर भेजने का प्रावधान है। इसके लिए यह आवश्यक है कि जिस विधान सभा से सदस्यों का चुनाव हो रहा है, वे उसी राज्य के निवासी हों। ऐसा करने के पीछे सामान्यतया यही अवधारणा रही होगी कि राज्यसभा के सदस्य अपने राज्यों से सबंधित मुद्दों को सदन में उठाकर सरकार का ध्यान समस्या के समाधान की ओर करते रहेंगे। ऐसा करके सदन के सदस्य अनेक राज्यों के हितों का संरक्षण करते रहेंगे। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं हो पा रहा है। विभिन्न राजनीति दलों के खास राजनेता अगर किसी कारणवश लोकसभा में चुनकर नहीं आ पाते हैं तो संसद में स्थान दिलाने या मंत्रिपद बचाने के लिए इन राजनेताओं को किसी भी राज्य की विधानसभा से राज्यसभा की सदस्यता दिला दी जाती है। जिससे वे संसद के सदस्य बन जाते हैं और मंत्रिमण्डल में सम्मिलित रहने पर मंत्रिपद बच जाता है। राज्य में जिस दल की सरकार रहती है, उसी दल के सदस्यों के राज्यसभा चुनाव में निर्वाचित होने की संभावना अधिक रहती है। औपचारिकता के तौर पर राज्य के किसी भी मतदाता क्षेत्रा की मतदातासूची में इन पसंदीदा लोगों का नाम अंकित करवा कर राज्य का मतदाता बनावा दिया जाता है। 
चुनाव सुधारों के लिए विख्यात मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषण को, इस प्रकार का अव्यावहारिक हथकंडा अपनाकर संसद सदस्य बनने की प्रक्रिया पर घोर आपत्ति है। शेषन के विचार से राज्य सभा के चुनाव केा केवल उस राज्य के निवासी ही लड़ें। अगर ऐसा नहीं होता है तो राज्य सभा जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गठित की गई उसका कोई अर्थ ही नहीं रह पायेगा।

प्रश्न 8 : विक्रय लागतों का प्रभाव पर टिप्पणी करें।

उत्तर :- चैम्बरलिन ने विक्रय लागत के माँग-वक्र पर पड़ने वाले प्रभावों को दो भागों में बाँटा है: 
(1) आकृति में परिवर्तन; (2) स्थिति में परिवर्तन। 

(1) मांग वक्र की आकृति पर प्रभाव   - माँग वक्र की आकृति में उस समय परिवर्तन होता है, जबकि माँग-वक्र की लोच में परिवर्तन होता है। आरम्भ में किसी भी फर्म का माँग वक्र बेलोचदार होता है। मान लीजिए, फर्म कीमत में कटौती करके अपनी बिक्री को बढ़ाना चाहती है। फर्म को प्रचार तथा विज्ञापन की सहायता से क्रेताओं को सूचित करना होगा कि वह अन्य फर्मों की तुलना में कम कीमत पर वस्तु बेच रही है। विज्ञापन आदि पर व्यय होने से क्रेताओं को वस्तु की कीमत में कमी के बारे में ज्ञान होता है, तथा अधिक क्रेता कम कीमत पर वस्तु को खरीदेंगे, जिसके फलस्वरूप, माँग वक्र लोचदार हो जाएगा। इसको विक्रय लागत का माँग-वक्र की आकृति पर प्रभाव कहा जायेगा।

(2) माँग वक्र की स्थिति पर प्रभाव - माँग वक्र की स्थिति में उस समय परिवर्तन होगा, जबकि प्रचार के द्वारा उपभोक्ताओं की पसन्दगी में परिवर्तन कर दिया जाता है। इस प्रकार के प्रचार या विज्ञापन को प्रेरक  अथवा प्रवंचक  कहा जाता है। इस प्रकार के विज्ञापन द्वारा फर्म क्रेताओं को केवल मात्रा अपनी वस्तु की उपस्थिति और कीमत के बारे में ही सूचना नहीं देती है, बल्कि उनकों इस बात के लिए प्रेरित करती है, कि वे विशेष ब्रांड की वस्तु का सेवन करें। फर्म विज्ञापन की सहायता से अपनी वस्तु की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करती है। इस प्रकार विज्ञापन वस्तु की नई माँग निर्मित करता है, जिसके कारण माँग वक्र की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है। 

(3) विक्रय लागतों एवं उत्पादन लागतों में अंतर - प्रो. चैम्बरलिन ने विक्रय लागतों तथा उत्पादन लागतों में विभेद किया है। किसी वस्तु के निर्माण काल में होने वाले व्यय को उत्पादन लागत कहते हैं। जिस प्रकार, मशीनों, मजदूरी, कच्चे-माल, बिजली, आदि पर होने वाला व्यय उत्पादन लागत कहलाता है। इसके विपरीत, विक्रय लागत वह व्यय है, जिसके द्वारा वस्तु की माँग में अभिवृद्धि की जाती है। वस्तु के निर्माणकाल, तथा उसको उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के बाद जो व्यय बिक्री संवर्धन के लिए किया जाता है, उसे विक्रय लागत कहते हैै। 
”उत्पादन लागत वस्तु की माँग तक लाती है, जबकि विक्रय लागत माँग को वस्तु तक लाती है।“ - चैम्बरलिन
विक्रय लागतों पर भी उत्पत्ति ह्नास नियम लागू होता है। आरम्भ में तो जैसे-तैसे विक्रय लागत को बढ़ाया जाता है, वस्तु की माँग में निरन्तर वृद्धि होती है तथा फर्म को अधिकाधिक लाभ प्राप्त होते हैं। आरम्भ में उत्पत्ति वृद्धि नियम इसलिए क्रियाशील होता है कि विक्रय लागत से क्रेताओं की पसंदगी में परिवर्तन किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर विक्रय-लागत होने पर पैमाने की बचतें भी प्राप्त होती हैं। लेकिन एक सीमा के उपरान्त विक्रय-लागत होने पर पैमाने की बचतें भी प्राप्त होती हैं। लेकिन एक सीमा के उपरान्त विक्रय लागत में वृद्धि करने पर फर्म का व्यय तो बढ़ जाएगा, लेकिन इस अनुपात में वस्तु की माँग में वृद्धि नहीं हो सकेगी, जिसके परिणामस्वरूप उत्पत्ति ह्नास नियम क्रियाशील होगा। 

(4) लाभ का जोखिम और अनिश्चितता सिद्धान्त - आधुनिक अर्थशास्त्रा में अधिकांशतः यह स्वीकार किया गया है कि उत्पादन प्रक्रिया में उद्यमी अपने योगदान के रूप में जोखिमों एवं अनिश्चितताओं का भार वहन करता है। आग, चोरी और मृत्यु, आदि से व्यावसायिक हानि होने के खतरे के अतिरिक्त, बाजार दशाओं का लागत अनुमान लगाने से पैदा होने वाली मौद्रिक हानि उद्यमी के लिए सबसे बड़ा जोखिम एवं अनिश्चितता है। लाभ की सम्भावना उद्यमी को जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
”आर्थिक क्रियाएँ जिनमें अत्यधिक अनिश्चितता और जोखिम होती है, जिनमें जोखिम को वहन करने की क्षतिपूर्ति के लिए जोखिमकत्र्ताओं को दीर्घकाल में धनात्मक लाभ प्रीमियम देना पड़ता है, ऐसे उद्योगों में विनियोग की गई पूँजी पर सुरक्षित विनियोग पर विशुद्ध ब्याज के अलावा धनात्मक लाभ का भी अतिरिक्त तत्त्व सम्मिलित होता है।“ - सेम्युलसन
जोखिम जितना अधिक होगा, सम्भावित लाभ की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी, क्योंकि सम्भावित लाभ से आकर्षित होकर उद्यमी व्यवसाय को आरम्भ करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इसी बात की पुष्टि मेयर्स ने निम्न शब्दों मे की हैं: ”किसी व्यावसायिक संस्थान में निहित जोखिम सम्बन्ध में लाभ का एक अन्य स्रोत उपस्थित होता है। यदि किसी उत्पादन के उत्पादन में इस बात का बहुत जोखिम बना रहता है कि उसमें विनियोग की पूँजी डूब जाएगी, तो उत्पाद की कीमत को इतना ऊँचा रखना पड़ेगा ताकि पूँजी के स्वामी विनियोग सम्बन्धी इस प्रकार की जोखिम को वहन करने के लिए प्रेरित हो सकें।“

(5) लाभ का जोखिम वहन करने का सिद्धान्त   - इस सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय प्रो. हाॅले को है। उनके अनुसार लाभ उत्पादक के जोखिम का पुरस्कार है। उत्पादन-क्रिया के आरम्भ होने और वस्तु के बाजार में बिकने के बीच जो समय-अन्तर  होता है वह आपद-जनक है। लाभ के रूप में उद्यमी को इसी आपदजनक उत्तरदायित्व को उठाने का पुरस्कार मिलता है। यदि इस लाभ का प्रलोभन न हो तो कोई भी उद्यमी किसी व्यवसाय को आरम्भ करने का साहस नहीं करेगा। हाॅले के शब्दों में, ”किसी व्यवसाय में लाभ या उत्पत्ति का अतिरेके, जो कि भूमि, श्रम तथा पूँजी के पुरस्कारों को देने के पश्चात शेष रहे, वह प्रबन्ध या एकीकरण करने का प्रतिफल नहीं है बल्कि जोखिम तथा उत्तरदायित्व का पुरस्कार है जो कि उस व्यवसाय को चलाने वाला उठाता है।“ स्पष्टतः व्यवसाय में जितना अधिक जोखिम होगा उद्यमी उतना ही अधिक लाभ प्राप्त करने के प्रलोभन में ही उस व्यवसाय में कार्यरत होगा। 
एक अन्य अर्थशास्त्राी, प्रो. नाइट ने इस बात को स्वीकार किया कि उत्पादन प्रक्रिया में उद्यमी अपना योगदान जोखिम का भार वहन करने के रूप में करता है। किंतु हाॅले द्वारा प्रतिपादित जोखिम के स्वरूप से नाइट सहमत नहीं है। उनके अनुसार जोखिम दो प्रकार के होते हैंः (1) व्यवसाय के वे जोखिम जो कि बीमा के योग्य होते हैं, और (2) जोखिम जो बीमा के योग्य नहीं होते। 
लाभ दूसरे प्रकार के जोखिम उठाने का प्रतिफल है, न कि पहले प्रकार के। नाइट ने दसरे प्रकार के जोखिम का नाम अनिश्चितताएँ दिया है। अतः नाइट के सिद्धान्त को लाभ का अनिश्चितता वहन सिद्धान्त भी कहा जाता है। 
इस सिद्धान्त के अनुसार केरन क्रोस के शब्दों में, फ्यदि एक बार श्रेष्ठ व्यवस्था की योग्यता का प्रतिफल, प्रबन्ध की आय के रूप में स्थानान्तरित कर दिया जाए, तो हमारे पास विशुद्ध लाभ का अवशेष रह जाता है जो कि अनिश्चितता वहन करने का शुद्ध प्रतिफल होता है तथा पूर्णतया भाग्य के द्वारा ही संचालित होता है।
‘जोखिम’ एवं ‘अनिश्चितता’ के बीच अन्तर को स्पष्ट रूप से समझ लेना आवश्यक है। आग, चोरी और मृत्यु, आदि से व्यावसायिक हानि हो जाने का सदैव खतरा बना रहता है। लेकिन, इस किस्म के जोखिम का बीमा करवाया जा सकता है। एक साहसी को इस बात की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं की आग से मशीन का स्टाॅक नष्ट हो जाने से हानि हो जाएगी। इसका अग्नि-बीमा करवाया जा सकता है। 

प्रश्न 9 : अनिश्चितताएँ ऐसी घटनाएँ हैं जिनकी सम्भावना पहले से आँकी नहीं जा सकती। इस कथन के आलोक में अनिश्चितता के रूप एवं इस सिद्धान्त की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

उत्तर :- यह मुख्यतः कीमत-उत्पत्ति के निर्णय से सम्बन्धित होती है। उत्पादन की मात्रा में वृद्धि एवं कमी का निर्णय उद्यमी पर ही पूर्ण रूप से निर्भर करता है। वह इस निर्णय को किसी दूसरे पर नहीं टाल सकता। इस निर्णय से मिलने वाली सफलता एवं विफलता का श्रेय
इस निर्णय के जोखिम से अपने प्रीमियम की सहायता से किसी बीमा-कम्पनी द्वारा मुक्त नहीं करवा सकता, क्योंकि ऐसे जोखिम की सम्भावना को गणितीय रूप से नहीं आँका जा सकता। 

अनिश्चितता के रूप 
व्यवसाय की प्रमुख अनिश्चितताओं को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

(1) प्रतियोगिता का खतरा - व्यवसाय में अधिक प्रतियोगियों के आ जाने से या अधिक अच्छी वस्तुएँ आ जाने से व्यवसायी को प्रतियोगिता का खतरा पैदा होता है। 

(2) तकनीक के परिवर्तन का खतरा   - मशीनों का चलन न रहने या उत्पादन का नया तरीका निकल आने से तकनीक में परिवर्तन का खतरा उत्पन्न होता है। 

(3) व्यापार चक्र का खतरा - समय-समय पर व्यापार में मंदी आने से कीमतें लागत से बहुत नीचे चली जाती हैं। इससे व्यवसायी को भारी हानि का खतरा हो सकता है। 

(4) सरकारी कार्यवाही का खतरा   - सरकार द्वारा कीमतों के नियंत्राण, कर लगाने या आयात-निर्यात पर पाबन्दी लगाने आदि, से भी व्यवसायी को हानि का खतरा हो सकता है। 
इन सभी अनिश्चितताओं का पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अतः नाइट के विचार में उद्यमी को अनिश्चितता उठाने के बदले में उपयुक्त प्रतिफल मिलना चाहिए। इसी प्रतिफल का नाभ लाभ है। 
जैसा कि ऊपर संकेत दिया जाता है, आधुनिक अर्थशास्त्रा में उद्यमी को अधिकांशतः अनिश्चितता-वाहक के रूप में ही मान्यता प्राप्त है।  यद्यपि कुछ अर्थशास्त्रिायों ने इस सिद्धान्त की आलोचना भी की है। किन्तु सामान्यतः इसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। 
इस सिद्धान्त की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है:

(1) अनिश्चितता-वहन  ही उद्यमी का केवल एक मात्रा कार्य नहीं है, उद्यमी के अन्य कार्य जैसे प्रबन्ध का एकीकरण, संगठन का कार्य, नव-प्रवर्तनों का प्रतिपादन, आदि कार्य भी है। 
(2) केवल ‘अनिश्चितता’ ही लाभ को उत्पन्न नहीं करती। यह अन्य तत्वों में से केवल एक तत्त्व है। अन्य तत्त्व जैसे, अवसरों का ज्ञान, पूंजी की कमी, आदि भी लाभ को उत्पन्न करते हैं। 
(3) यह सिद्धान्त ‘अनिश्चितता-वहन’ के तत्त्व को उत्पत्ति का एक पृथक साधन मान लेता है  जो उचित नहीं है। ‘अनिश्चितता-वहन’ तो साहसी के कार्यों की केवल एक विशेषता बताता है। 

प्रश्न 10 : वनस्पति जाति की मूल उत्पत्ति का वर्णन करें।

उत्तर :

  • पुरा वनस्पतिशास्त्रियों का कहना है कि हमारा समस्त हिमालय एवं प्रायद्वीपीय क्षेत्रा देशीय एवं स्थानीय वनस्पति जाति से आच्छादित है, जबकि विशाल मैदान व थार के मरुस्थल के पौधे सामान्यतः बाहर से लाये गये है। 
  • भारत में पाये जाने वाले पौधों का करीब 40% हिस्सा विदेशी है, जो साइनो-तिब्बती क्षेत्रों से आये है। इन वनस्पति को वोरियल वनस्पति-जाति कहते है।
  • उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों से जो वनस्पति यहाँ आयी है, उसे पुरा उष्ण कटिबंधीय कहते है।
  • थार के मरुस्थल की वनस्पति का जन्म स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है।
  • उत्तरी-पूर्वी भारत की वनस्पति-जाति का उत्पत्ति स्थान इण्डो-मलेशिया माना जाता है।

प्रश्न 11 : प्राकृतिक वनस्पति पर प्रभाव डालने वाले भौगोलिक कारकों पर चर्चा करें।

उत्तर :

  • वनस्पति पर सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु डालता है। वर्षा की मात्रा और तापमान जलवायु के दो प्रमुख तत्व है जो प्राकृतिक वनस्पति पर प्रभाव डालते है। भारत में तापमान की अपेक्षा वर्षा की मात्रा का अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वर्षा की मात्रा के अनुसार ही वनस्पति में भिन्नता पाई जाती है। जहाँ अधिक वर्षा और तापमान होता है वहाँ सम्पन्न सदाबहार वन और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष पाये जाते है और जहाँ वर्षा कम और तापमान अधिक रहता है वहाँ वन कम पाये जाते है।
  • धरातलीय दशा का भी वनों पर प्रभाव पड़ता है। ऊँचाई के अनुसार वनों का रूप बदल जाता है। हिमालय पर्वत क्षेत्रा में समुद्र तल से ऊँचाई तथा तापमान ने वनस्पति प्रदेश निर्धारित किए है। वहाँ वर्षा की मात्रा इतनी प्रभावी नहीं होती। 1200 से 1800 मीटर की ऊँचाई पर ओक, बर्च, चीड़, पापलर, पाईन, खरसिया आदि वृक्ष पाये जाते है। 1800 से 3000 मीटर की ऊँचाई पर देवदार, सिल्वर फर, स्प्रूस, मेपिल श्वेत पाइन, ब्लूपाइन वृक्ष पाये जाते है। 3000 से 4500 मीटर की ऊँचाई पर घास, बर्च, बोना, जूनीपर प्रकार की वनस्पति मिलती है।
  • मिट्टी का भी वनस्पति पर प्रभाव पड़ता है। जैसे-जैसे मिट्टियों के प्रकार बदलते जाते है उनमें पानी संचित करने की शक्ति भिन्न होती जाती है। साथ ही उनमें विद्यमान रासायनिक तत्वों में भी अन्तर आता जाता है। इन सब बातों का वन पर काफी प्रभाव पड़ता है।
  • इस प्रकार भारत में जलवायु और भूमि संबंधी विशेषतायें वनस्पति के प्रकार निर्धारित करती है। इसी के कारण भारत में उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों प्रकार की ही वनस्पतियाँ पायी जाती है। देश के कुल वनों का 7% शीतोष्ण वन तथा शेष 93% उष्ण कटिबंधीय वन है।

 प्रश्न 12 : वनों के प्रकारों का वर्णण करें।

(i) स्वामित्व के आधार पर 
(ii) प्रशासनिक आधार पर
(iii) विदोहन (Exploitation) के आधार पर
(iv) वृक्षों की पत्ती के आधार पर 
(v) भौगोलिक आधार पर 

उत्तर : (i) 

  • विभिन्न विशेषताओं के आधार पर वनस्पतिशास्त्रियों ने वनों का वर्गीकरण किया है।
  • राजकीय वन - पूर्णतः सरकारी नियन्त्राण वाले वन जो 717 लाख हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत है जो कुल वनों का 96.11% है।
  • संस्थानीय वन - यह प्रायः स्थानीय नगरपालिकाओं एवं जिला परिषदों के नियंत्राण में है। इनका क्षेत्राफल केवल 20 लाख हेक्टेयर है जो कुल वनों का 2.68% है।
  • व्यक्तिगत वन - यह व्यक्तिगत लोगों के अधिकार में है। इसका क्षेत्रफल केवल 9 लाख हेक्टेयर है।

(ii) का उत्तर
 

  •  सुरक्षित वन - यह वन 394 लाख हेक्टेयर भूमि में फैले है, तथा कुल वनों का 52.8% है। इन वनों को काटना और इनमें पशुओं को चराना मना है। भूमि के कटाव को रोकने, बाढ़ों को रोकने, मरुस्थल के प्रसार को रोकने और जलवायु व अन्य भौतिक कारणों से ऐसा किया गया है।
  • संरक्षित वन - यह वन 233 लाख हेक्टेयर भूमि अर्थात् कुल वनों के 31.2% भू-भाग पर विस्तृत है। इनमें लोगों को अपने पशुओं को चराने तथा लकड़ी काटने की सुविधा तो दी जाती है, किन्तु उन पर कड़ा नियंत्राण रखा जाता है ताकि वनों को नुकसान न पहुँचे और वन कहीं धीरे-धीरे समाप्त न हो जाये।
  • अवर्गीकृत वन -  कुल वनों का 16% अर्थात् 119 लाख हेक्टेयर भू-भाग पर विस्तृत है। ये ऐसे वन है जिनका वर्गीकरण अभी तक नहीं किया गया है। इनमें लकड़ी काटने और पशुओं को चराने पर सरकार की ओर से कोई रोक नहीं है।

(iii) व्यवसाय के लिए उपलब्ध वन - इस प्रकार के वन 430 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले है। यह कुल वनों का 57.64% है। इन वनों को काम में लाया जा रहा है।%¯ सम्भावित उपलब्ध वन - ये वन भावी उपयोग के लिए सुरक्षित रखे गये है। इन वनों का विस्तार 163 लाख हेक्टेयर भूमि पर है जो कुल वनों का 21.85% है। इन वनों का क्षेत्रा सरकार के द्वारा धीरे-धीरे बढ़ायी जा रही है।

  •  अन्य वन - ये वन 153 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले है, जिनके उपयोग के लिए कोई नियन्त्राण नहीं है। इनमें अप्राप्य वन भी शामिल है। इस प्रकार के वन कुल वनों का 20.51% है।

(iv) कोणधारी वन - 48 लाख हेक्टेयर भूमि पर यह वन विस्तृत है जो कुल वनों का 6.43% है। यह शीतोष्ण वन है।

  • चैड़ी पत्ती वाला वन - इन वृक्षों का कुल क्षेत्राफल 69.8 लाख हेक्टेयर है, अर्थात् कुल वनों का 93.57% है। ये उष्ण कटिबंधीय वन है। इनमें मानसून वन सबसे अधिक है। साल, सागवान के वन अधिक महत्वपूर्ण है।

(v) उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests) - इस प्रकार के वन उन प्रदेशों में पाये जाते है जहाँ वर्षा 200 से.मी. या उससे अधिक पड़ती है तथा आद्र्रता की मात्रा वर्षभर 70% से अधिक पायी जाती है और तापमान 24॰C  से अधिक रहता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, अण्डमान निकोबार, लक्षद्वीप समूह, पश्चिम बंगाल और असम में ऐसे वन पाये जाते है। ये सघन और सदैव हरे-भरे रहते है। वृक्षों की ऊँचाई 50 मी. तक पाई जाती है। यहाँ के महत्वपूर्ण वृक्ष रबर, महोगनी, एबोनी, नारियल, बाँस, सिनकोना, बेंत, ताड़, आइरन वुड है। वृक्षों के परस्पर मिले रूप में पाये जाने के कारण इन्हें काटना काफी असुविधाजनक होता है।

  • उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन (Tropical Deciduous Forests) - इस प्रकार के वन 100 से 200 से. मी. वर्षा वाले क्षेत्रा में पाये जाते है। ये मानसून वन कहलाते है। ग्रीष्मकाल में ये अपनी पत्तियाँ गिरा देते है। ये वन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, असम राज्यों में पाये जाते है। व्यावसायिक दृष्टि से इन वनों का काफी महत्व है। यह लगभग 7 लाख वर्ग कि. मी. में फैला है। इनका अधिकांश भाग सरकार द्वारा सुरक्षित है। इसमें साल और सागौन के वृक्ष काफी महत्वपूर्ण है। सागौन के वृक्ष महाराष्ट्र और कर्नाटक में सबसे अधिक पाये जाते है। अन्य प्रमुख वृक्ष शीशम, चन्दन, कुसुम, पलास, हल्दू, आँवला, शहतूत, बाँस, कत्था व पैडुक है। इन वनों से लकड़ी के साथ-साथ अनेक उपयोगी पदार्थ भी प्राप्त होते है - जैसे तेल, वार्निश, चमड़ा रंगने का पदार्थ इत्यादि।
  • उष्ण कटिबंधीय शुष्क वन (Tropical Dry Forests) - इस प्रकार के वन 50 से 100 से. मी. वर्षा वाले क्षेत्रा में पाये जाते है। इन वृक्षों की लम्बाई 6 से 9 मीटर तक होती है तथा जडें काफी गहरी होती है। पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वन उन भागों में पाये जाते हैं, जहाँ भूमि कुछ अनुपजाऊ होती है। दक्षिण भारत के शुष्क भागों में भी इस प्रकार के वन मिलते है। आम, महुआ, बरगद, शीशम, हल्दू, कीकर, बबूल इनके प्रमृख वृक्ष है। तराई प्रदेशों में सवाना प्रकार की घास उगती है, जिसे सवाई, मूँज, हाथी व काँस घास के नाम से जानते है।
  • मरुस्थलीय और अर्द्ध-मरुस्थलीय वन (Desert and Semi-Desert Forests) - इस प्रकार के वन 50 से. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलते है। ये वृक्ष छोटी-छोटी झाड़ियों के रूप में होत है। वृक्षों की जड़ें लंबी होती है। वर्षा की कमी के कारण वृक्षों में पत्तियाँ छोटी और काँटेदार होती है। इनका प्रमुख वृक्ष बबूल है। इसके अलावा खेजड़ा, खैर, खजूर, रामबाँस, नागफनी भी प्रमुख वृक्ष है। ये वन दक्षिण-पश्चिम, हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात तथा कर्नाटक के वृष्टिछाया प्रदेश में पाये जाते है।
  • पर्वतीय वन (Mountain Forests) - ये वन ऊँचाई और वर्षा के अनुसार उपोष्ण प्रादेशीय और शीतोष्ण प्रादेशीय प्रकार के होते है। पूर्वी हिमालय में पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा वर्षा अधिक होती है। दोनों प्रकार की वनस्पतियों में भिन्नता पाई जाती है। पूर्वी हिमालय में दालचीनी, अमूरा, साल, ओक, लारेल, मेपिल, एलडर, बर्च, सिल्वर फर, पाइन, स्प्रूस और जूनीपन आदि वृक्ष प्रमुख है। वहीं पश्चिमी हिमालय में साल, सेमल, ढाक, शीशम, जामुन, बेर, चीड़, देवदार, नीला पाइन, एल्ब आर्मद वृक्ष महत्वपूर्ण है।
  • अल्पाइन वन (Alpine Forests) - इस प्रकार के वन हिमालय पर्वत पर 2400 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मिलते है। यह पूर्णतया कोणधारी वृक्ष हैं। इसका विस्तार 2400 से 3600 मीटर के बीच की ऊँचाई में मिलता है। इसमें ओक, मेपिल, सिल्वर फर, पाइन, जूनीपर प्रमुख वृक्ष है। जहाँ पर घास व फल वाले पौधे भी उगते है। हिमालय के पूर्वी भागों में इनका अधिक विस्तार पाया जाता है। 3600 मीटर से 4800 मीटर की ऊँचाई तक टुण्ड्रा प्रकार की वनस्पति मिलती है, अर्थात् छोटी झाड़ियाँ व काई उत्पन्न होती है। 4800 मीटर से ऊपर वनस्पति के कोई चिन्ह नहीं मिलते, क्योंकि यहाँ हर समय बर्फ जमी रहती है। हिमालय पर 4800 मीटर ऊँचाई की सीमा को हिम रेखा कहते है।
  • ज्वारीय वन (Tidal Forests) - गंगा, ब्रह्मपुत्रा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा नदियों के डेल्टा प्रदेश में मैनग्रोव व सुन्दरी वृक्ष मिलते है। गंगा-ब्रह्मपुत्रा डेल्टा के वनों को सुन्दर वन कहते है क्योंकि यहाँ का प्रधान वृक्ष सुन्दरी है।
  • समुद्र तटीय वन (Coastal Forests) - जहाँ समुद्री तट पर रेतीला किनारा मिलता है, वहाँ इस प्रकार के वन पाये जाते है। इनमें बहुधा केसूरिना वृक्ष उत्पन्न होते है। कहीं-कहीं पतझड़ की किस्म वाले वन तथा सदाबहार वन भी मिलते है। ताड़ व नारियल यहाँ के प्रमुख वृक्ष है।
  • नदी तट के वन (Riverine Forests) - यह वन विशाल मैदान की नदियों के किनारे खादर प्रदेशों में पाये जाते है। प्रमुख वृक्ष खैर, झाऊ तथा इमली है।

प्रश्न 13 :  वनो का वितरण पर टिप्पणी करें।

उत्तर : भारत के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्राफल में से 633.4 लाख हेक्टेयर भूमि पर वन-सम्पदा फैली है। इनका भौगोलिक वितरण बहुत असमान्य है। सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत में केवल 19.27% भू-भाग पर ही वन पाये जाते है। यह प्रतिशत विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम है।

  •  ‘राष्ट्रीय वन’ नीति द्वारा यह निश्चित किया गया है कि वनों का प्रतिशत 33.3 कर दिया जाय। इस दिशा में प्रयास जारी है। हाल ही में उपग्रह के चित्रा से यह पता चला है कि देश की कुल भूमि के केवल 10% भू-भाग पर अच्छे वन पाये जाते है। सरकारी आंकड़े के 750.62 लाख हेक्टेयर वन में केवल 300 लाख हेक्टेयर पर ही वास्तविक वन है।
  • देश के कुल वनों का 22% भाग अकेले मध्य प्रदेश में पाया जाता है, इसके बाद महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश राज्यों का स्थान आता है। वास्तव में पठारी राज्यों में देश के कुल वनों का 60% से अधिक भाग पड़ता है। इसके बाद उत्तरी-पूर्वी राज्यों का स्थान आता है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे मैदानी राज्य देश के केवल 16% वन रखते है।
  • भारत में प्रति व्यक्ति वनों का औसत केवल 0.2 हेक्टेयर है जबकि ब्राजील में यह 8.6 हेक्टेयर, आस्ट्रेलिया में 5.1 हेक्टेयर, स्वीडन में 3.2 हेक्टेयर तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.8 हेक्टेयर है।
  • ‘राष्ट्रीय वन नीति’ के अनुसार वास्तविक रूप से हिमालय पर्वत और दक्षिणी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्रों की कुल भूमि के 60% भू-भाग पर तथा मैदानों की 20% भूमि पर वनों का विस्तार होना चाहिए। जनसंख्या के बढ़ते हुए भार और ईंधन की माँग के कारण नदी-तटों तथा अन्य अनुपजाऊ क्षेत्रों में भी वन प्रदेशों का विस्तार आवश्यक माना गया है।

प्रश्न 14 :   वन नीति और कानून क्या हैं? 

उत्तर: भारत उन कुछ देशों में से है जहां 1984 से ही वन नीति लागू है। इसे 1952 और 1988 में संशोधित किया गया। संशोधित वन नीति, 1988 का मुख्य आधार वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास है। इसके मुख्य लक्ष्य हैं -
(i) पारिस्थितिकीय संतुलन के संरक्षण और पुनःस्थापन द्वारा पर्यावरण स्थायित्व को बनाए रखना,
(ii) प्राकृतिक संपदा का संरक्षण,
(iii) नदियों, झीलों और जलधाराओं के आवाजाही के क्षेत्रा में भूमि कटाव और मृदा अपरोदन पर नियंत्राण,
(iv) राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में तथा तटवर्ती क्षेत्रों में रेत के टीलों के विस्तार को रोकना,
(v) व्यापक वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के जरिए वन और वृक्ष के आच्छादन में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी, 
(vi) ग्रामीण और आदिवासी जनसंख्या के लिए ईंधन की लकड़ी, चारा तथा अन्य छोटी-मोटी वन-उपज आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कदम उठाना,
(vii) राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन-उत्पादों में वृद्धि,
(viii) वन-उत्पादनों के सही उपयोग को बढ़ावा देना और लकड़ी का अनुकूल विकल्प खोजना, और
(ix) इन उद्देश्यों की प्राप्ति और मौजूदा वनों पर पड़ रहे दबाव को न्यूनतम करने हेतु जन साधारण, विशेषकर महिलाओं का अधिकतम सहयोग हासिल करना।

  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के अंतर्गत वन भूमि को गैर-वन भूमि में बदले जाने से पूर्व केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है। इस अधिनियम को लागू किए जाने के बाद से वन-भूमि के अपवर्तन की दर घटकर वर्ष 1980 के पहले 1.43 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष के मुकाबले लगभग 25,000 हेक्टेयर प्रतिवर्ष हो गई है। 1988 के दौरान, विभिन्न राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों से प्राप्त 851 से अधिक प्रस्तावों को इस अधिनियम के तहत जांचा जा चुका है।
  • ‘नष्ट वनों को उपभोग के आधार पर पुनर्जीवित करने के लिए जनजातियों और ग्रामीण निर्धन वर्ग का संगठन’ नामक योजनादेश के नौ राज्यों में लागू की जा रही है। वन क्षेत्रा में वृद्धि के अलावा, इस योजना का उद्देश्य आदिवासी लोगों को रोजगार और फलोपभोग की सुविधाएं मुहैया करवाने का है। देश के 21 राज्यों में संयुक्त वन प्रबंधन व्यवस्था अमल में लाई जा रही है। देश के नष्ट हुए वनों के 70 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा का लगभग 35,000 ग्रामीण वन सुरक्षा समितियों द्वारा रख-रखाव और संरक्षण किया जा रहा है। 
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