सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 13 (प्रश्न 17 से 33 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 13 (प्रश्न 17 से 33 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 17 : राष्ट्रीय आवास नीति ने 2010 तक सभी के लिए आवास का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य किस सीमा तक निष्पाद्य है?
  
उत्तर :
राष्ट्रीय आवास नीति एवं सन् 2010 तक सबके लिए आवास के लक्ष्य की व्यवहार्यता-भारत सरकार ने राष्ट्रीय आवास नीति के तहत् देश में सन् 2010 तक ‘सबके लिए आवास’ मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है। इसे पूरा कराने के लिए सरकार प्रति वर्ष 20 लाख अतिरिक्त मकानों का निर्माण कराएगी जिसमें से 7 लाख मकान शहरी क्षेत्रों में तथा 13 लाख मकार ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाएंगे। सैद्धान्तिक रूप से लक्ष्य आवश्यकता के अनुरूप तथा लुभावना है, लेकिन इसे व्यावहारिक जामा पहनाना कठिन होगा। आर्थिक सुधारों तथा  उदारीकरण की नीतियों के तहत् लगभग प्रत्येक राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों के नगरीय विकास प्राधिकरणों ने स्वयं अपने स्तर से नए आवासों के निर्माण कराने से हाथ झाड़ लिए हैं। अब इनके द्वारा जो नए आवासीय क्षेत्रा विकसित किए जा रहे हैं उनमें बड़े.बडे़ प्लाटों का आवंटन सहकारी आवास समितियों या निजी कन्सट्रक्शन कम्पनियों को कर दिया जाता है। इन इकाइयों द्वारा बनाए जा रहे आवासों के आवंटन में किसी भी स्तर पर इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि आवंटी के पास पहले से ही कोई मकान है या नहीं, सरकार के पास अभी तक अधिकृत तौर पर ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि वास्तविक रूप से ऐसे परिवारों की संख्या कितनी है जिनके पास स्वयं का आवास नहीं है। मामला चाहे सरकारी क्षेत्रा का हो चाहे ग्रामीण क्षेत्रा का सरकार/ अर्द्ध.सरकारी/निजी निकयों द्वारा बनाए जाने वाले आवासों की बिक्री/आवंटन की दोषपूर्ण प्रणाली सबके लिए आवास के लक्ष्य को प्राप्त करने की सबसे बड़ी बाधा है। दूसरे 25 करोड़ से अधिक निर्धन लोगों के लिए जब जीवित रहने के लिए आवश्यक योजना की जुगाड़ कर पाना कठिन है, तो वे मकान खरीदने या बनाने के लिए धन की व्यवस्था कहाँ से करेंगे ?

 

प्रश्न 18 : उद्यम संसाधन आयोजना क्या होती है?
  
उत्तर :
किसी उद्यम की स्थापना, परिचालन तथा उपलब्धि मूल्यांकन की प्रक्रिया समग्र रूप से उद्यम संसाधन नियोजन के रूप में जानी जाती है। उद्यम की स्थापना के लिए मूल रूप से भूमि, पूँजी, मशीने एवं प्लाण्ट तथा कार्मिकों की सेवाएं आदि जुटाने के लिए आयेाजना बनाना, संसाधन जुटाना तथा बाजार की आवश्यकताओं व माँग को ध्यान में रखते हुए उत्पादन क्षमता विकसित करना उद्यम संसाधन नियोजन का ही अंग है। उद्यम संसाधन नियोजन के द्वारा उद्यम की उत्पादकता, कार्य दक्षता, प्रतिफल की दर तथा उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। इसीके द्वारा उत्पत्ति के विभिन्न संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग सम्भव हो पाता है। 
उद्यम संसाधन नियोजन द्वारा उत्पादित वस्तु/सेवा की बाजार माँग, प्रतिस्पद्र्धाओं की उपस्थिति, उत्पादन टेक्नोलोजी की स्थिति, सरकारी नीतियों के साथ समायोजन के साथ न केवल प्रतिफल की दर बढ़ाई जा सकती है, बल्कि उद्यम को पोषणीय आधार पर विकसित होने के लिए तैयार किया जा सकता है।

 

प्रश्न 19 : भारत में ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या की विवेचना कीजिए। ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लिए सरकार कौन.कौन सी विशेष योजनाएं अपना रही है?

उत्तर (a) : भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यतः दो प्रकार की बेरोजगारी की समस्या पायी जाती है। पहले प्रकार की बेरोजगारी छिपी हुई बेरोजगारी है, इसमें ऐसा प्रतीत होता है कि गाँव में लोग वर्ष भर खेती करते रहते हैं। दूसरे प्रकार की बेरोजगारी मौसमी बेरोजगारी है। इसकी मुूख्य विशेषता यह है कि गाँव के लोग एक ही मौसम के काम करते हैं तथा शेष समय वे  बेरोजगार बैठे रहते हैं। ये लोग विशेषकर खरीफ और रबी मौसमों के बीच खाली बैठे रहते हैं। वास्तव में बेरोगारी के प्रमुख कारणों में भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरी तरह से विकसित नहीं होना, रोजगार की विभिन्न योजनाओं में आधे.अधूरे प्रयास और तेजी से बढ़ती हुई आबादी उललेखनीय हैं।
1978.79 में भारत सरकार ने समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आई.आर.डी.पी.) चलाया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्व-रोजगार के अधिकतम अवसर उपलब्ध कराना था। इस कार्यक्रम के समर्थन में दो और छोटे कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। ये हैं-ग्रामीण युवक स्व-रोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम (TRYSEM) और ग्रामीण क्षेत्रों में औरतों और बच्चों का विकास (DWRCA) । ट्राइसेम के तहत 18 से 35 वर्ष के बीच के उन ग्रामीण युवकों को आवश्यक कुशलता तथा तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिनकी वार्षिक आय 3,500 रुपये से कम हो। द्वाकरा के तहत एक जिले के अन्दर ग्रामीण औरतों के समूह बनाकर व रोजगार के 
अवसर दिलाकर उनकी अवस्था को सुधारने का प्रयास किया जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (आर.एल.ई.जी.पी.) के तहत अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा किए जाते हैं। ग्रामीण औरतों के समूह बनाकर व रोजगार के अवसर पैदा किए जाते हैं। ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारन्टी कार्यक्रम (आर.एल.ई.जी.पी.) के तहत भूमिहीनों के रोगार पर विशेष बल दिया जाता है। 1989 में एन.आर.ई.पी. और आर.एल.ई.जी.पी. को मिला दिया गया और उसे जवाहर रोजगार योजना के नाम से जाना जाता है। इस योजना का 80 प्रतिशत भाग केंद्र सरकार और 20 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करती हैै। इसका उद्देश्य रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा करना है।

 

प्रश्न 20 : भारत के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रा के उद्यमों के योगदान की विवेचना कीजिए। क्या ये उद्यम इतने साधन उपजा रहे हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था में पुनर्निवेश संभव हो सके।

उत्तर : मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश के आर्थिक विकास की गति को तेज करते हैं तथा ऐसे क्षेत्रों में पूँजी निवेश करते है, जहाँ अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है और जिसे पूर्ण रूप से चालू होने में काफी समय लगता है। सार्वजनिक क्षेत्रा के अधीन ऐसे कल कारखाने या उपक्रम लगाये जाते हैं जिनका उद्देश्य लोककल्याण होता है न कि तुरन्त लाभ। सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रम निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए काम करते हैंः
(क) अर्थव्यवस्था की अधिकतम ऊँचाईयों को नियंत्रित करना।
(ख) औद्योगिकीकरण के भार में सहभागी बनना (नये क्षेत्रों में निवेश करके)। 
(ग) अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा करना।
(घ) छोटे.छोटे कल.कारखानों और सरकारी उपक्रमों से जुड़े कारखानों के विकास में सहायता।
(ङ) अपने ऊपर लगाई गई लागत के प्रतिदान में देश को लाभ के रूप में अतिरिक्त धन दिलाना।
सार्वजनिक क्षेत्रा ने भारत के आर्थिक विकास में काफी मदद की है, जबकि इसका उद्देश्य सामाजिक है न कि आर्थिक। इन उपक्रमों ने भारत में शक्तिशाली दीर्घकालिक अन्तःसंरचना, आधुनिक प्रौद्योगिकी और रोजगार बढ़ाने में सहयोग दिया है। इसके कारण निर्यातों को बढ़ावा मिला है तथा क्षेत्राीय विकास के असंतुलन को दूर करने में भी मदद मिली है।
सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों के परिचालन में कुछ बाधाएं होने की वजह से ये लाभ नहीं दे पाते हैं तथा प्रायः घाटे में चलते हैं। वैसे भी इनमें पूँजी निर्माण दर बहुत कम होती है। इसके अलावा राजनीतिक दखलंदाजी भी इनके काम.काज में बाधा पैदा करती है, जिससे काम में देरी, अधिक पूँजी की बर्बादी, जवाबदेही के प्रति मुहँ चुराना, रोजगार अवसरों का अपर्याप्त विकास, अतर्कसंगत मूल्य नीति और बुरे प्रबंधन जैसी समस्याएं पैदा हो जाती है।

 

प्रश्न 21 : घटता वन क्षेत्र और पर्यावरण के लिए चिन्ता क विषय है। वर्णण करें।

उत्तर : संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ‘जनसंख्या और वन: भारत पर रिपोर्ट -2000' जारी कर जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं उनका विश्लेषण बहुत सावधानी से करना होगा ताकि पर्यावरण की सुरक्षा और आर्थिक विकास की नीतियों के बीच समुचित संतुलन स्थापित किया जा सके। इन आंकड़ों के अनुसार बीसवीं शताब्दी के प्रांरभ में भारत का वन-क्षेत्रा कुल भूमि-क्षेत्रा का 40 प्रतिशत था जो घट कर 1951 में केवल 22 प्रतिशत रह गया। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वतंत्राता से पहले वन-क्षेत्रों का दोहन और विनाश अधिक तेजी से हुआ और इस कारण वन-क्षेत्रा 45 प्रतिशत घट गया। आजादी के बाद भी वन-क्षेत्रा यद्यपि घटा है लेकिन पिछले पचास सालों में हमारे वन-क्षेत्रा के घटने की दर 12.5 प्रतिशत रही है। यह आजादी से पहले के 45 प्रतिशत की तुलना में काफी कम है और यह एक ऐसी कसौटी है जिसके आधार पर हमें पर्यावरण सुरक्षा और आर्थिक विकास की नीतियों का निर्धारण करना होगा।
आजादी से पहले वन-क्षेत्रा के तेजी से दोहन और विनाश के कई कारण हैं। विदेशी शासक को इस बात की कतई चिंता नहीं थी। उसका सारा ध्यान भारत से कच्चा माल अपने देश भेजने पर लगा था। वनों की रक्षा तथा वृक्षारोपण की आवश्यकता तो हमें स्वाधीनता के बाद ही महसूस हुई है। इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि वृक्षारोपण कार्यक्रम और वनों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों के फलस्वरूप हम वनों के विनाश की रफ्तार कुछ धीमी करने में सफल रहे हैं। इस सफलता को आजादी के बाद तेजी से बदलते परिप्रेक्ष्य में भी देखना आवश्यक है। 1951 से 2000 के बीच भारत की जनसंख्या में 2.8 गुना वृद्धि हुई है और इसका बहुत भारी दबाव हमारे वन-क्षेत्रों पर भी पड़ा है। इमारतों और ईंधन के लिए लकड़ी की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वन-क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की स्थापना के कारण भी पर्यावरण को क्षति हुई है। ठेकेदारों और सरकारी कर्मचारियों के बीच मिलीभगत और भ्रष्टाचार ने भी वनों पर कुठाराघात किया है। वन-क्षेत्रों में इस कमी के कारण पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक हो गई है और इस कारण वृक्षारोपण और वन्यीकरण की दिशा में युद्धस्तर पर काम करने की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। सरकार को अधिक सक्रिय होकर ऐसी दूरगामी नीतियां और कार्यक्रम बनाने होंगे जिनसे ईंधन, इमारती लकड़ी और पशुओं के चारे के लिए वनों की अनावश्यकता कटाई रोकी जा सके। इसके साथ ही आम आदमी में यह आत्मविश्वास पैदा करना होगा कि वृक्षों की रक्षा के लिए उसका छोटा-सा भी प्रयास पर्यावरण की रक्षा करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।
वन-क्षेत्रा को बचाने और बढ़ाने के साथ वनों की गुणवत्ता बढ़ाना भी जरूरी है। भारत में पहले वनों की सघनता अधिक थी और इस कारण वन्य वस्तुओं का उत्पादन भी अधिक था। लेकिन इधर वनों की सघनता घटने के कारण उत्पादन में बहुत कमी आई है। हमारा वृक्षारोपण कार्यक्रम इस दृष्टि से कमजोर रहा है कि हम वनों को अपने आर्थिक विकास का आधार बनाने में विफल रहे हैं। चीन अपनी परंपरागत जड़ी-बूटियों के निर्यात से विपुल विदेशी मुद्रा कमा रहा है, लेकिन हम इस मामले में बहुत पिछड़े हुए हैं। वृक्षारोपण के नाम पर ऐसे अनेक वृक्ष बड़े पैमाने पर लगाए गए जो बहु उपयोगी नहीं हैं। भारत चाहे तो अपनी प्राकृतिक संपदा को अब भी अपनी समृद्धि का आधार बना सकता है।

 

प्रश्न 22 : घटता वन घनत्व पर विचार करें।

उत्तर :  भारतीय वन सर्वेेक्षण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार देश के वन क्षेत्रा में 5500 वर्ग किलोमीटर की कमी आयी है। निश्चित रूप से यह मौजूदा 633,400 वर्ग किलोमीटर ;633.4 लाख हेक्टेयरद्ध वन क्षेत्रा का 0.86 प्रतिशत है। दुर्भाग्य से यह कमी केवल दो वर्षों, 1996 और 1997 में आयी है। पर इसका यह मतलब नहीं है कि अगले 25 वर्षों में भारत के बचे हुए वन नष्ट हो जाएंगे। 

  • वनों के अपने पास्थितिकीय लाभ होते हैं। ये वर्षा के पानी को संरक्षित करते हैं और भूमि की ऊपरी परत की रक्षा करते हैं। लेकिन यह तभी होता है, जब हरित आवरण (वह हिस्सा, जो पेड़ों से ढका हुआ है) को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया जाये। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा घने वनों की श्रेणी में रखे गयेे वन भी इस पैमाने पर खरे उतरते हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण ऐसे वनों को घने वन की श्रेणी में रखता है, जिनका हरित आवरण 40 प्रतिशत से अधिक हो। लेकिन यह स्पष्ट है कि विरल वन, यानी जिनका हरित आवरण 10 से 40 प्रतिशत के बीच है, इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते। इस पैमाने से पिछले दो वर्षों में ही जो नुकसान हुआ है, वह भयभीत करने वाला है। कुल मिलाकर 361,567 वर्ग किलोमीटर के घने वन क्षेत्रा में से 19,450 वर्ग किलोमीटर हिस्सा विरल वन में बदल गया है। इसके अलावा 392 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा उजाड़ वन में तब्दील हो गया है, जबकि 3129 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा अवानिकीय इस्तेमाल में आने  लगा है। इस तरह केवल दो वर्षों में 361,567 वर्ग किलोमीटर घने वन क्षेत्रा में से 22,971वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा या तो नष्ट हो गया है या इसकी पारिस्थितिकीय उपयोगिता समाप्त हो गयी है। यह विनाश बाकी बचे घने वन का 6.35 फीसदी है। इस रफ्तार से 32 वर्षों में पारिस्थितिकीय दृष्टि से उपयोगी वन बिल्कुल ही नहीं बचेंगे।
  • 1988 की राष्ट्रीय वन नीति में कहा गया कि देश के पर्वतीय जिलों में कम से कम 66 फीसदी वन घनत्व होना चाहिए। आज 95 में से केवल 19 पर्वतीय जिले इस मानक को पूरा करते हैं। ये सभी जिले सुदूर उत्तर-पूर्वी भारत के हैं। पर्वतीय जिलों के वन घनत्व का औसत केवल 37 फीसदी रह गया है। इसका मतलब यह है कि उत्तर-पूर्व को छोड़ दें तो बाकी भारत के पर्वतीय जिलों में औसत वन आवरण 30 फीसदी से अधिक नहीं है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार वनों के हरित आवरण का सर्वाधिक नुकसान मध्य प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश में हुआ है, जो भारत का केंद्रीय पर्वतीय क्षेत्रा है, जहां से दक्कन और केंद्रीय भारत की नदियां अच्छी मात्रा में जल ग्रहण करती हैं। 
  • मध्य हिमालय का दयनीय वन घनत्व और घाटों व कंेद्रीय भारत की पर्वत शृंखलाओं में घटता वन घनत्व भारत के पूरे मैदानी क्षेत्रा में बाढ़ घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। पूरे मध्य भारत में अचानक बाढ़ आना आम बात हो गयी है। इससे भूमि का ऊपरी परत का क्षरण चिंताजनक ढंग से बढ़ा है। गंगा-सिंधु के मैदान का भविष्य क्या है, यह इस बात से देखा जा सकता है कि उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को बाढ़ नियमित रूप से अपनी चपेट में ले लेती है। इसका कारण है नेपाल में हिमालय क्षेत्रा में हुई वन कटाई। इन प्रवृत्तियों को अगले 30 वर्षों के संदर्भ में देखें तो ऐसी स्थिति का खाका मिलता है, जिसमें टिकना मुश्किल है। देश की जनसंख्या 1.5 अरब हो जाएगी। लेकिन वर्षा से सिंचित कृषि अस्थायी हो जाएगी। बांधों में तेजी से गाद भरते जाने से बहते पानी को संग्रहीत करने की उनकी क्षमता बहुत ही घट जाएगी। अचानक आने वाली बाढ़ों को नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा।
  • जहां 1450 वर्ग किलोमीटर वन घने से विरल में बदल गये, वहीं राज्य सरकारों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों से 7972 वर्ग किलोमीटर उजाड़ वन को विरल वनों में बदला गया। इस तरह विरल वनों का क्षेत्राफल 27422 वर्ग किलोमीटर बढ़ जाना चाहिए था। लेकिन वास्तविक वृद्धि केवल 12001 वर्ग किलोमीटर की हुई। 2827 वर्ग किलोमीटर विरल वन उजाड़ हो गये और 8846 वर्ग किलोमीटर विरल वन अवानिकीय कार्यों में चले गये। वानिकीकरण की छोटी-सी मात्रा को फिर से वर्गीकृत किया गया है, लेकिन 3000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रा का लेखाजोखा बाकी ही रह गया।
  • इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वनों पर दबाव किधर से पड़ रहा है। घने वनों को विरल वन में और विरल वनों का उजाड़ में बदलना निश्चित रूप से बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण है, जो जलावन और लकड़ी की जरूरतों को साथ लगे वन से पूरा करती है। इस कटाई में अच्छा-खासा हिस्सा तस्करी का भी है, जिसमें अब स्थानीय आबादी भी शामिल होती है। यह तस्करी इस कारण होती है कि देश के व्यापक शहरी बाजारों में लकड़ी की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, एक बहुत बड़ी दोषी खुद सरकार भी है। वन क्षेत्रा के वनविहीन क्षेत्रा में परिवर्तन ने 3129 वर्ग किलोमीटर घने वन और 8846 वर्ग किलोमीटर विरल वन को निगल लिया है। निस्संदेह इसमें से कुछ हिस्सा अवैध कब्जे को नियमित करने का परिणाम है। कुछ हिस्सा पनबिजली परियोजनाओं और अन्य औद्योगिक योजनाओं में गया है। लेकिन एक अच्छा-खासा हिस्सा वैध-अवैध प्रलोभनों के तहत वाणिज्यिक इस्तेमाल में चला गया। जिस 3000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा को बिना लेखे-जोखे के छोड़ दिया गया है, वह भी बिना किसी संदेह के अवैध कब्जे को दर्शाता है और आगे चल कर इसे भी ‘नियमित’ कर दिया जाएगा। इस तरह राज्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर 14982 वर्ग किलोमीटर वन की कटाई का जिम्मेदार है। जनसंख्या में हुई वृद्धि के कारण बढ़े जैविक दबाव और शहरीकरण व आर्थिक वृद्धि से पैदा वाणिज्यिक दबाव 19450 वर्ग किलोमीटर घने वन और इसके अलावा कम से कम 3239 वर्ग किलोमीटर विरल वन की कटाई के लिए जिम्मेदार हैं।

प्रश्न 23 : सामाजिक वानिकी क्या है। इसकी चर्चा करें।

उत्तर :  भारत में वनाच्छादित क्षेत्रा कुल भू-भाग का 19.82 प्रतिशत है। भारत के वन सर्वेक्षण विभाग की हाल ही की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में मात्रा 640.1 लाख हेक्टेयर भूमि वास्तव मेें वनाच्छादित है। भारतीय वनों की औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 0.5 घनमीटर है, जो विश्व की औसत उत्पादकता, 2.1 घनमीटर प्रति हेक्टेयर के मुकाबले बहुत कम है। वन सर्वेक्षण विभाग और राष्ट्रीय दूर संवेदन एजेंसी के अनुसार 19.52 प्रतिशत हरित क्षेत्रा में से 10 प्रतिशत से अधिक में घने जंगल हैं, 8 प्रतिशत से अधिक में मुक्त वन, लगभग 0.12प्रतिशत कच्छ वनस्पति और 1.10 प्रतिशत क्षेत्रा में काॅफी के पौधे हैं। अनुमान है कि संतुलन बनाए रखने के लिए इस शताब्दी के अंत तक हर वर्ष कम से कम 1 करोड़ हेक्टेयर विकृत भूमि को वनाच्छादित भूमि के अन्तर्गत लाना होगा।

  •  जब तक ईंधन की लकड़ी और विभिन्न उपयोगों में आनेवाली इमारती लकड़ी के समुचित विकल्प नहीं तलाश कर लिए जाते, और साथ ही बड़े पैमाने पर उचित वन-रोपण परियोजनाएं लागू नहीं की जातीं, तब तक वनों के ह्नास को नहीं रोका जा सकता। वास्तव में वानिकी के क्षेत्रा में महत्वपूर्ण कार्यों में वर्तमान वनों का संरक्षण, बंजर भूमि के प्रसार को रोकना और पहले से ही निरावृत्त भूमि तथा यथासंभव अन्य स्थानों पर अधिक से अधिक पेड़ लगाना शामिल है। वनों को बचाने के लिए कड़े कानून मौजूद हैं लेकिन उनके प्रावधानों को ठीक से लागू नहीं किया जाता।
  • वनस्पति संबंधी क्षेत्राीय असंतुलन दूर करने में सामाजिक वानिकी का विशेष महत्व है। चूंकि वनाच्छादित क्षेत्रा में बढ़ोतरी का कोई अवसर नहीं है, अतः एकमात्रा विकल्प यही है कि अधिक से अधिक संभावित निजी भूमि को वनों के अन्तर्गत लाया जाये, अतः व्यापक सामाजिक वानिकी कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है। इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा, औद्योगिक और औषधीय उत्पादों जैसी लोगों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने के स्रोत के रूप में वन अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। विभिन्न विकास योजनाओं को देखते हुए वन संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है क्योंकि उनकी जरूरतें वनों से पूरी होती हैं। इससे मांग और आपूर्ति के बीच अन्तर बढ़ता जा रहा है। इस अन्तराल को काफी हद तक पूरा करने के लिए, यह आवश्यक है कि सरकारी और निजी, सभी प्रकार की उपलब्ध जमीन पर वनों को बढ़ावा दिया जाये। सरकार सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में पेड़ों के प्रति जागरूकता पैदा करने के प्रयास कर रही है, लेकिन वृ़क्षों को बढ़ावा देने की हमारी गति अत्यन्त धीमी है। भारत में, हमें हर रोज 1 करोड़ पूर्ण विकसित पेड़ों को काटने की आवश्यकता पड़ती है और इस तरह यह जरूरी है कि हम उनके स्थान पर नए पौधे लगाएं ताकि संतुलन बना रहे और पर्यावरण को और क्षति न पहुंचे। लेकिन, पौधों को लगाने और उनका पालन-पोषण करने के वर्तमान प्रयासों को फल वर्षों बाद ही मिल पायेगा, जब वे पर्ण विकसित हो जायेंगे और कटाई के लिए तैयार होंगे।
  • वन भूमि में, पूर्ण विकसित पेड़ तैयार करने के वृक्षारोपण के अनुभव आशाजनक नहीं रहे हैं। अगर ऐसे वृक्षों की भली-भांति देखभाल की जाये और पूरी तरह संरक्षित किया जाये, तो उन्हें पूर्ण विकसित होने में 40 से 50 वर्ष का समय लगता है, इस तरह वे भूमि-कटाव नियंत्राण, जल संरक्षण, वन्य जीव आवास, प्रदूषण नियंत्राण आदि उद्देश्यों को पूरा करने में मददगार साबित नहीं होते। ऐसी स्थिति में भूमि की उत्पादकता में निरन्तर गिरावट का क्रम रोकने और देश में ईंधन की लकड़ी, इमारती लकड़ी और कागज की लुगदी के भंडारों को समाप्त होने से रोकने के लिए सामाजिक वानिकी योजनाओं के समक्ष बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
  • हमारी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में तीव्र प्रगति के बावजूद, विशेषकर ग्रामीण समुदाय के समक्ष समस्याएं विद्यमान हैं, जनसंख्या का दबाव निरंतर बढ़ता जा जा रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर ग्राम्य क्षेत्रा विकृत होते जा रहे हैं और ईंधन, चारा और इमारती लकड़ी की भीषण कमी होती जा रही है तथा बेरोजगारी और अर्ध-बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। इसका एकमात्रा हल और उपाय यही  है कि सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के जरिए मानवीय आवास-केंद्रों में खाली पड़ी भूमि पर पेड़-पौधे लगाकर वनाच्छादित क्षेत्रा में बढ़ोतरी की जाये ताकि आम आदमी को लाभ पहुंचाया जा सके। इस तरह बंजर भूमि, सड़कों के किनारे, नदी-तटों पर, रेलवे मार्गों के साथ-साथ और अन्य खाली पड़ी भूमि पर पेड़ लगाकर वनों से प्राप्त होने वाले कच्चे माल संबंधी संसाधन हासिल किए जा सकते हैं।
  • पिछले कई वर्षों में वनस्पति चूंकि नष्ट हो चुकी है, अतः विभिन्न उत्पादों का अभाव है। सामाजिक वानिकी श्रम-बहुल होती है, जिससे लाभकारी रोजगार मिलता है और ग्रामीण लोगों की क्रय-शक्ति में बढ़ोतरी होती है। अतः यह जरूरी है कि नौवीं पंचवर्षीय योजना में गैर कृषि-भूमि पर सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों को केंद्र तथा राज्य सरकारों, स्वयंसेवी एजेंसियों और वन्य प्रेमियों की मदद से पूरे उत्साह के साथ चलाया जाये। इसके लिए संरक्षण, उत्पादन और पर्यावरण के महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखकर देश भर में व्यापक कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है
  • वन विभाग राज्य स्तरीय विभिन्न योजनाओं के तहत् वन गतिविधियों पर नियंत्राण रखता है सामाजिक वानिकी पहले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के अन्तर्गत आती थी, जो अब एकीकृत ग्रामीण विकास में शामिल कर दी गई है, जिसे जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों के माध्यम से लागू किया जा रहा है। एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत् सामाजिक वानिकी कार्यक्रम की योजना राज्य सरकारों के ग्रामीण विकास विभागों द्वारा तैयार की जाती है।
  • वानिकी क्षेत्रा को अन्य क्षेत्रों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। चीन और दक्षिण स्वीडन के उदाहरण से संकेत मिलता है कि कृषि-क्षेत्रा की उत्पादकता में बढ़ोतरी वनों के विकास के प्रेरक के रूप में काम करती है। भारत में भी कृषि-वानिकी के विकास के लिए अनिवार्य प्रोत्साहन प्रदान कर सकती है, जो सामाजिक वानिकी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976) ने सामाजिक वानिकी के निम्नांकित उद्देश्य बताए थे -  

(क) गोबर के स्थान पर ईंधन की लकड़ी की आपूर्ति 
(ख) इमारती लकड़ी की लघु आपूर्ति 
(ग) चारा आपूर्ति 
(घ) खेतों की हवाओं से सुरक्षा 
(ड.) मनोरंजन संबंधी आवश्यकताएं। इसके मुख्य घटकों में हैं -  
(i) कृषि वानिकी 
(ii) ग्रामीण वानिकी 
(iii) शहरी वानिकी  

  • इस प्रकार सामाजिक वानिकी से ईंधन चारा, लघु इमारती लकड़ी और अन्य छोटे उत्पाद प्राप्त होते हैं, जो समुदाय के लिए जरूरी हैं। लेकिन, फिर भी इसी वजह से इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हो पाई है। प्रमुख भ्रांतियां इस प्रकार हैं -  

(i) इससे किसानों की समृद्धि में कमी आयी है 
(ii) इससे व्यापक स्तर पर सामाजिक और पर्यावरण संबंधी लाभ नहीं हुए हैं, और
(iii) कुछ मामलों में इससे गरीबों की हालत और खराब हो गई है।

  • यह बड़ी दिलचस्प बात है कि गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में सामाजिक वानिकी की प्रारंभिक सफलता मझौले किसानों ;2 हेक्टेयर से अधिक और 4 हेक्टेयर से अधिक जमीन वालेद्ध और बड़े किसानों ;4 हेक्टेयर से अधिक जमीन वालेद्ध  की भागीदारी तथा लकड़ी के दामों में बढ़ोतरी पर आधारित थी। चूंकि वृक्षारोपण एक वित्तीय आकर्षण रहा है जिसमें लकड़ी के लिए बाजार उपलब्ध रहने का खास महत्व है, अतः बड़े किसानों ने कार्यक्रम के लाभों की आमतौर पर सराहना की। गरीब किसानों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में सामाजिक वानिकी की विफलता इस वजह से रही  है कि बड़े किसान परम्परागत रागी (मोटे अनाज) के बजाय यूकेलिप्टस के पेड़ लगाते रहे हैं, जिससे स्थानीय तौर पर कम भोजन उपलब्ध रहता है और खाद्य सामाग्री के दाम बढ़ जाते हैं तथा ख्ेातिहर श्रमिकों को काम नहीं मिल पाता क्योंकि यूकेलिप्टस के पेड़ों को अधिक देखभाल की आवश्यकता नहीं होती। ऐसी स्थिति में गरीब किसानों की समस्याओं पर ध्यान देने और उन्हें सर्वाधिक लाभ पहुंचाने के लिए नई योजना विकसित करने की आवश्यकता है।
  • सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों का उद्देश्य न केवल प्राकृतिक वन क्षेत्रों के ह्रास की भरपायी करना है बल्कि इस्तेमाल योग्य भूमि में वनों की सापेक्षिक भागीदारी भी बढ़ाना है। सामाजिक वानिकी के फलस्वरूप कुछ हरित वन भू-भाग, सामने आये हैं, जो अब तक बंजर पड़े थे, लेकिन दूसरी ओर नए परिदृश्य में कुछ जटिल तत्व भी पैदा हुए हैं। जिससे विस्तृत वन क्षेत्रों का ह्रास हुआ है। और वनाच्छादित क्षेत्रा का संकट पैदा हो गया है। सामाजिक वानिकी के अंतर्गत कुछ ऐसी खेती योग्य भूमि को भी शामिल किया गया है जिसकी उत्पादन क्षमता काफी अधिक है। ऐसी स्थिति में समुदाय को सामाजिक वानिकी  के सामाजिक अवसरों की कीमत चुकानी पड़ रही है। अतः यह जरूरी है कि जहां भी यह कार्यक्रम शुरू किया जाये वहां इसका लागत-लाभ विश्लेषण भी किया जाये।
  • सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों में निजी क्षेत्रा को अधिक करीब और गहरायी से शामिल किया जाना चाहिए। निजी क्षेत्रा को इस दिशा में प्रेरित करने के लिए वित्तीय उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं बल्कि वृ़क्षारोपण में निवेश के लिए उसे आकर्षित करने के अन्य उपाय भी जरूरी हंै। यह जरूरी है कि देश में बंजर तटवर्ती क्षेत्रों और अन्य विस्तृत बंजर भू-भागों की पैदावार पर स्वाभाविक अधिकार लीजधारी कम्पनियों का होना चाहिए। ऐसे प्रोत्साहन कुछ कर संबंधी रियायतों के मुकाबले निश्चय ही अधिक सफल हो सकते हैं।
  •  किसी भी हालत में लागत-लाभ विश्लेषण के दौरान पारिस्थितिकी और रोजगार में सुधार के लाभों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, भले ही उनसे लागत-लाभ अनुपात पर प्रतिकूल असर पड़ता हो। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय कृषि आयोग ने सिफारिश की थी कि घाटियों का परिष्कार और विकास किया जाये, हालांकि लागत-लाभ अनुपात पर इसका असर पड़ रहा था। अतः लागत की दृष्टि से कारगरता का मूल्यांकन व्यापक पैमानों के आधार पर किया जाना चाहिए और इस तरह का विश्लेषण करते समय 10.20 वर्षों की अवधि को ध्यान में रखना चाहिए।
  • वास्तव में, भावी परिदृश्य में सामाजिक वानिकी की दिशा में अधिक प्रभावी कदम उठाने होंगे ताकि भूमि के संरक्षण के लिए जल और कटाव की वजह से मिट्टी की होने वाली क्षति को रोका जा सके। हमें अपने सीमित भूमि संसाधनों पर बायो-मास अधिक से अधिक पैदा करना होगा, ताकि समुदाय में सभी संबद्ध पक्षों को उसमें हिस्सेदारी मिल सके। इस दिशा में किए गए वर्तमान प्रयास भविष्य की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • वर्तमान में देश में प्रतिव्यक्ति वन-क्षेत्रा की उपलब्धता मात्रा 671 वर्गमीटर है जबकि अनुमानित आवश्यकता 1ए605 वर्गमीटर की आंकी गई है। इस तरह इसे करीब 2.39 गुणा बढ़ाने की आवश्यकता होगी। राष्ट्रीय कृषि आयोग को अनुमान है कि सन् 2000 तक ईंधन सहित विभिन्न उद्देश्यों के लिए 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि को वन-उत्पादन के तहत् लाना  होगा और फसलों तथा चारे के उत्पादन के लिए एक-एक करोड़ हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए हमें अतिरिक्त क्षेत्रा की आवश्यकता पड़ेगी जिसे गैर-खेती-उपयोग की दिशा में, विशेष रूप से शहरीकरण के लिए हस्तांरित करना होगा।
  • सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के अन्तर्गत डेयरी उद्योग का विकास भी शामिल है जो रोजगार के सर्वाधिक अवसर उपलब्ध कराने वाले उद्योगों में से एक है। इसी तरह रेशम से रेशमी कपड़े बुनना भी इसके अन्तर्गत आता है, जहां रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। सामाजिक वानिकी लघु, उद्योग और कुटीर उद्योगों की भी मदद करती है। जैसे साबुन बनाना, लघु उद्योग के तहत् कागज की लुगदी  बनाने वाली फैक्टरियां, फर्नीचर उद्योग और तेल निकालना, इनसे लोगों को अपने आवास के निकट काम हासिल करने में मदद मिलती है।

प्रश्न 24 : निम्नलिखित में से किन्हीं दो के प्रमुख लक्षणों का मूल्याकंन कीजिए। विशेषताएं बताइये। 
(i) गान्धार कला सम्प्रदाय
(ii) शिलाकृत मन्दिर स्थापत्य
(iii) चोल स्थापत्य

उत्तर (i) गांधार कला सम्प्रदाय-गांघार स्कूल प्रथम शती ई.पू. में आरम्भ हुआ तथा कनिष्क के राज्यकाल में इसका सर्वाधिक विकास हुआ। तक्षशिला इसका प्रमुख केन्द्र था। पश्चिमी पंजाब व अफगानिस्तान के बीच गांधार में पल्लवित होने के कारण इसका नाम ‘गांधार शैली’ पड़ा। इसे ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहा जात है। इसकी प्रारंभिक मूर्तियों में बुद्ध का मुख ग्रीक देवता अपोलोे से मिलता है। इस शैली के अन्तर्गत शरीराकृति को यथार्थ रूप में दिखाने का प्रयास किया जाता है। गांधार शैली की मूर्ति संपदा भूरे सलेटी पत्थर पर बनी हैं।

उत्तर (ii) शिलाकृत मन्दिर स्थापत्य-इस शैली के वास्तुशिल्प के अन्तर्गत एक ही पत्थर को काटकर निर्माण कार्य किया जाता है। इस शैली का विकसित रूप ‘महेन्द्र वर्मन’ शैली कहलाया तथा इसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘रथपांच’ है। इसमें पांच रथ एक ही पत्थर को काटकर अलग-अलग ढंग से बनाए गए हैं। इसमें द्रौपदी और गणेश रथ को मिलाकर ‘साता पगोडा’ नाम से पुकारते हैं। यह वास्तुकला मुख्यतः दक्षिणी व पश्चिमी भारत में देखने को मिलती है।

उत्तर (iii) चोल स्थापत्य-चोलों ने द्रविण शैली की स्थापत्य परम्परा को पराकाष्ठा पर पहुंचाया। इन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण किया। राजराज प्रथम का तंजोर का शिवमंदिर द्रविड़ शैली का जाज्वल्यमान नमूना है। राजेन्द्र प्रथम द्वारा निर्मित मन्दिर चोल वास्तुकला का प्रभावशाली उदाहरण है। उसका विशाल आकार, ठोस पाषाण का विराट लिंग व पाषाण में उत्कीर्ण मनोरम आकृतियां असाधारण विशेषताओं से युक्त हैं। राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया कैलाश मन्दिर प्राचीन भारतीय वास्तु एवं तक्षणकला का भारत में सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
 

प्रश्न 25 : निम्नांकित के प्रमुख लक्षण बताइए?
(i) कर्नाटक संगीत
(ii) किशनगढ़ चित्राकाला शैली
(iii) नागर स्थापत्य शैली
(iv) अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का नव्य-कला आन्दोलन
 
उत्तर (i) : कर्नाटक संगीत-
कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत में विकसित हुआ तथा इसका मुख्य आधार भक्ति संगीत है। जब ‘कीर्ति’ के विकास को पूरा कर लिया गया, फिर ‘सानिली’ ‘जंदाई’ ‘धातु’ एवं ‘गीतम’ जैसे संगीत अभ्यासों का उदया हुआ। ताल पक्कम अण्णमाचार्य, शैली पल्लवी, अपुपल्लवी आदि कर्नाटक संगीत शैली की भिन्न-भिन्न शैलियां हैं।

(ii) किशनगढ़ चित्राकला शैली - किशनगढ़ शैली राजस्थानी चित्राशैली का एक उपभाग है। आरंभिक चित्रा दरबार ओर शिकार के बने हैं तथा बाद में राधा.कृष्ण के चित्रा बने। नागरीदास की प्रयेसी ‘बाण.ठगी’ इस शैली की प्रसिद्ध कृति है। कृष्णलीला, गोपियों की क्रीड़ा इत्यादि प्रमुख विषय है। नाक, चक्षु एवं पैरों का चित्राकंन इसकी विशेषता है और ‘चांदनी रात की संगीत गोष्ठी’ दरबार संग्रह का उत्तम चित्रा है।

उत्तर (iii): नागर स्थापत्य शैली-नागर शैली की वस्तुकला की मुख्य विशेषताएं हैं- मंदिर वर्गाकार या चैपहले रूप में बने हैं। विस्तार, उत्तर भारत में हिमालय व विंध्य पर्वत से घिरा क्षेत्रा। साधारणतः मध्य प्रदेश इसका केन्द्र रहा है। 

उत्तर (iv) : अवनींद्रनाथ ठाकुर का नव्य कला आन्दोलन-अवनींद्रनाथ टैगोर का नव्य कला आन्दोलन इस बात पर बल देता था कि पुराने एवं मध्य युग की भारतीय कला की अच्छी बातों की खोज की जाए तथा चित्राकला को आधुनिक परिवेश में पुर्नजीवित किया जाये। उन्होंने यूरोप, जापान व चीन की कला के सम्मिश्रण से एक नीवन भारतीय शैली को जन्म दिया, जिसे बांग्ला शैली कहा गया।
 

प्रश्न 26 : निम्नांकित आन्दोलनों के सम्बन्ध में आप क्या जानते हैं?
(i) रहनुमाई जाज्दा यसनाम
(ii) भगत आन्दोलन
(ii) वहाबी आन्दोलन
 
उत्तर (i) : रहनुमाई माज्दा यसनाम-
रहनुमाई माज्दा यसनाम सभा की स्थापना 1850 में बम्बई में नौरोजी फरदोनजी, दादाभाई नौरोजी एवं एस.एस. बंगाली ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य पारसी धर्म में सुधार करना, पारसी समाज को आधुनिक बनाना और पारसी महिलाओं को ऊपर उठाना था। इस सभा को धार्मिक सुधार संगठन भी कहते हैं।

उत्तर (ii): भगत आन्दोलन - भगत आन्दोलन का नेतृत्व नाना भगत ने किया था। छोटानागपुर के आदिवासियों का ये आंदोलन, चैकीदारी कर ओर किराये के खिलाफ था। आदिवासी इनके भुगतान के खिलाफ थे। आंदोलन को कुचल दिया गया परंतु स्थानीय जनता में जागरुकता आयी।

उत्तर (iii) बहाबी आंदोलन - बहाबी आंदोलन की शुरुआत सऊदी अरब के मौ.इब्न अब्दुल वहाब ने की। भारत में इसके प्रर्वतक सर सैयद अहमद थे। ये आंदोलन इस्लाम में किसी भी तरह के बदलाव एवं परीक्षण के खिलाफ था। इसका प्रसार मुख्यतः उत्तर एवं पूर्वी भारत में हुआ। पटना, हैदराबाद, मद्रास, बंगाल व बम्बई आदि इसके प्रमुख केन्द्र थे। 19 वीं सदी के चैथे दशक से सातवें दशक तक चलता रहा।
 

प्रश्न 27 : निम्नांकित आन्दोलनों के सम्बन्ध में आप क्या जानते हैं?
(i) सुब्रह्मण्यम भारती
(ii) एस.ए. अंसारी
(iii) चापेकर बन्धु
(iv) पन्नालाल पटेल
(v) खुदीराम बोस
 
उत्तर :
(i) सुब्रह्मण्यम भारती-तमिलनाडु के प्रसिद्ध कवि, प्रत्राकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने एक तमिल दैनिक का प्रकाशन भी शुरु किया, स्वतंत्राता के प्रबल समर्थक एवं राष्ट्रीय अभिलाषाओं के पक्ष में मुखर स्वर। सिस्टर निवेदिता के आचार-विचारों से प्रभावित।

उत्तर (ii) एम.ए. अंसारी -दिल्ली के प्रमुख डाक्टर, जिन्होंने 1912 में टर्की में मेडिकल मिशन का आयोजन किया, 1920 में मुस्लिम लीग तथा 1922 में खिलाफट कमेटी के प्रमुख, काँग्रेस पार्लिमेंटरी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष व 1928.36 तक जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रहे।

उत्तर (iii) चापेकर बंधु- चापेकर बंधुओं (बालकृष्ण एवं दामोदर) ने 1897 में दो अलोक प्रिय ब्रिटिश आफिसरों मि. रैंड एवं ले. अयरस्त की पुणे में हत्या की थी।

उत्तर (iv) पन्नालाल पटेल-पन्नालाल पटेल को 1985 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (20वां) मिल चुका है। वे गुजराती साहित्य से संबंधित हैं।

उत्तर (v) खुदीराम बोस- मिदनापुर के छात्रा भंडारण इम्पोरियम से सम्बद्ध, जहाँ स्वदेश में बना हथियार आदि सामान रखा जाता था। मुजफ्फरपुर में प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर जिला न्यायाधीश की हत्या का असफल प्रयास व गिरफ्तार। 11 अगस्त, 1908 को इस क्रांतिकारी को फाँसी दे दी गई।
 

प्रश्न 28 : निम्नलिखित के प्रमुख लक्षण बताइएः
(i) शास्त्राीय संगीत
(ii) भरतनाट्यम 
(iii) शब.ई.बरात
(iv) कांगड़ा चित्राकला

उत्तर 4.
(i) : शास्त्राीय संगीत-संगीत जगत में जो संगीत धारा अविकृत भाव से, एक से अधिक शताब्दी से, विभिन्न घरानों के माध्यम से आधुनिक काल तक चली आ रही है, वही शास्त्राीय संगीत है। ध्रुपद, ख्याल, ठुमरी, और टप्पा शास्त्राीय संगीत की श्रेणी में सम्मिलित हैं। भारत की संगीत, हिन्दुसानी संगीत और कर्नाटक संगीत दो मुख्य धाराओं में विभक्त है। दक्षिण भारत में कर्नाटक पद्धति का संगीत तथा अन्य भागों में हिन्दुस्तानी पद्धति का संगीत प्रचलित है।

उत्तर (ii): भरतनाट्यम-दक्षिण भारत का प्रमुख नतृत्य, जिसमें तांडव का बलिष्ठ भाव विद्यमान है। इसका स्रोत भरतमुनी का नाट्यशास्त्रा है। यह गीतमय काव्य परम्पराबद्ध तथा शैली निष्ठ है। इसका रूप तंजौर चतुष्टय-पोन्नैया पिल्ले और बन्धुओं ने तैयार किया। पूर्व में इसे ‘आट्टम’ व ‘सदिर’ कहा जाता था। यह नृत्य मंदिरों में देवदासियों द्वारा किया जाता था। भरतनाट्यम के साथ मृदंग और मादल बजाया जाता है। इसमें डेलाग, दिगितक, ताधिकित आदि बोलों का प्रयोग होता है। तंजौर, कांजीपुरम व पड़नलूर इसके तीन प्रमुख घराने हैं।

उत्तर (iii) : शब.ई.बरात-मुस्लिम वर्ष के आठवें माह ‘शबन’ में 13वें व 14वें दिन रात्रि में मनाया जाने वाला त्यौहार, जिसमें पूरी रात जागरण होता है व मिठाई बांटी जाती है। विश्वास किया जाता है कि इस रात्रि को अगले वर्ष के लिए सभी मानवों का भविष्य स्वर्ग में पंजीकृत किया जाता है। पैगम्बर, उनकी पुत्राी फातिमा व उसके पति अली के नाम पर भोजन पर आशीर्वाद (फातिहा) पढ़े जाते हैं।

उत्तर (iv) : कांगड़ा चित्राकाला-कांगड़ा चित्राकला शैली का जन्म 18वीं शताब्दी के अंत में हुआ। इसमें मुगल और राजस्थानी दोनों शैलियों का सम्मिश्रण है। मुख्य विषय ‘प्रेम’ है जो लय, शोभा तथा सौंदर्य के साथ दर्शाया गया है। सोने व चांदी के रंगों का प्रयोग अत्यन्त सुचारूता से हुआ है। राधा की विरह वेदना इस शैली के चित्राकारों के चिन्तन का विषय रहा है। इसका प्रमुख केन्द्र गुलेर, नूरपुर व तीरा सुजानपुर है।
 

प्रश्न 29 : निम्नांकित आन्दोलनों के बारे में आप क्या जानते हैं?
(i) फराजी आन्दोलन
(ii) शुद्धि आन्दोलन
(iii) तरुण बंगाल आन्दोलन
 
उत्तर  (i) : फराजी आंदोलन-
मुसलमानों के धर्म सम्प्रदाय विशेष का धर्म सुधार व ब्रिटिश सरकार विरोधी आन्दोलन, जिसे दौलतपुर (फरीदपुर) निवासी हाजी सरीतुल्ला ने चलाया। ये कुरान शरीफ के टीकाकार अमूहनीफ के मत का अनुसरण करके जगत क्रिया और ईश्वर ततव के संबंध में विशेष भक्तिभाव प्रदर्शित करते थे। ये कुरान को ही मोक्ष का साधन मानते थे। इस आंदोलन के प्रमुख नियम हैं-जिहाद की कत्र्तव्यता, ईश्वर पूजा में क्रियाकलाप आदि का अनुष्ठान, पाखण्ड व नास्तिकों को पाप तथा सभी को एक ही ईश्वर का अंश मानना।

उत्तर (ii) : शुद्धि आंदोलन-आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा चलाया गया एक आन्दोलन, जिसका उद्देश्य भारत की एकता व अखण्डता को बल प्रदान करना था। इसे उद्देश्य के मद्देनजर स्वामी जी ने आन्दोलन के जरिये अनेक गैर-हिन्दुओं को हिन्दू बनाया और हिन्दू धर्म को पुनः शक्तिशाली बनाने के प्रयास किये।

उत्तर (iii) : तरुण बंगला आंदोलन-19वीं शताब्दी में प्रसिद्ध लेखक हेनरी एल. डेरोजियो द्वारा चलाया गया आन्दोलन, जिसका उद्देश्य धर्म में पाखण्ड व सामाजिक कुरीतियों को दूर करना, स्त्राी-शिक्षा का प्रसार, सामाजिक दशा का सुधार व देश भक्ति की भावना का विकास करना था। रूढ़ीवाद व अन्धविश्वास के विरोधी होने के कारा इस आन्दोलन से सम्बद्ध लोग नास्तिक कहे जाने लगे। कृष्णमोहन बंधोपाध्याय, दक्षिण रंजन मुखोपाध्याय, प्यारे चन्द्र मित्रा, रसिक कृष्ण मलिक व रामतनु लहिरी इस आन्दोलन में काफी सक्रिय थे।
 

प्रश्न 30 : निम्नलिखित किस लिए प्रसिद्ध हुए?
(i) कंवर सिंह
(ii) एस.एच. स्लोकम
(iii) पी.आनंद चारू
(iv) के एम. मुंशी
(v) मुजफ्फर अहमद 
 
उत्तर
(i) : कंवर सिंह-बिहार में जगदीशपुर के एक राजपुत सरदार व 1857 के स्वतंत्राता आंदोलन के सैनानी, जिनके नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध बिहार आन्दोलन शुरू हुआ। बिहार आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज निरन्तर प्रयत्नशील रहे। बिहार को छोड़कर वे दूसरे अन्य स्थानों से अपना संघर्ष जारी रखे हुए थे। 23 अप्रैल, 1858 को इनकी मृत्यु हो गयी।

उत्तर (ii) : एस. एच. स्लोकम-भाखड़ा बांध का डिजायन तैयार करने वाले एक ब्रिटिश। यह बांध प्रजाब के अम्बाला जिले में सतलज नदी पर स्थित है। इसमें 518 मी. लम्बा व 226 मीटर ऊँचा बांध बनाया गया है, जो कि भारत का सबसे ऊंचा बांध है।
उत्तर (iii) : पी. आन्नद चारु-दक्षिण भारत के स्वाधीनता सेनानी व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापाकों में से एक, जो कि 1891 के सातवें (नागपुर) अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचन हुए। मद्रास के प्रतिनिधि के रूप् में ये आठ वर्ष तक सुप्रीम लेलिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य रहे तथा आई.सी.एस. परीक्षा इंग्लैंड के साथ.साथ भारत में आयोजित करने के लिए आन्दोलन चलाया। 1908 में निधन हो गया।

उत्तर (iv) : के. एम. मुंशी -गुजरात के प्रसिद्ध लेखक, वकील व हिन्दु संस्कृति के कट्टर समर्थक, जो कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। होमरूल, भारत छोड़ो आदि स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले स्वतंत्राता सेनानी व भारतीय विद्या भवन के संस्थापक, जो कि केन्द्रीय कृषि मंत्राी भी रहे। इन्होंने सी. राजगोपालाचारी के साथ स्वतंत्रा पार्टी की स्थापना की।

उत्तर (v) : मुजफ्फर अहमद-कलकत्ता में पढ़े व भारतीय साम्यवादी दल के शीर्ष नेता, जो कि दल की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। बंगाली दैनिक ‘नवयुग’ बंगाली साप्ताहिक ‘लंगल’ व ‘गणवाणी’ के सम्पादक तथा ऐटक (AOTIC)  के उसभापति (1928.29), जो कि 1945.47 में अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। मेरठ षड़यंत्रा केस में (1929.33) जेल गए।
 

प्रश्न 31 : निम्नलिखित की मुख्य विशेषताओं के बारे में लिखिए?
(i) वास्तुकला का चन्देल स्कूल
(ii) मणिपुरी नृत्य
(iii) बैशाखी
(iv) जन्माष्टमी
 
उत्तर : (i)
वास्तुकला का चन्देल स्कूल-चंदेलों ने स्थापत्य कला की एक भव्य शैली का विकास किया। इसमें वास्तुकला का चन्देल स्कूल प्रमुख है। चंदेल कालीन कला में उत्कृष्ट स्त्रिायोचित अलंकरण देखने को मिलते हैं। बुंदेल खण्ड के चंदेल राजाओं ने मंदिरों, विशेषकर खजुराहो के मंदिरों का निर्माण कराया। यहां शिव, विष्णु के भव्य मंदिर हैं। साथ.ही.साथ जैन धर्मगुरुओं से संबंधित अराध्य स्थल भी वास्तुकला की उत्कृष्टता को व्यक्त करते हैं। इनमें महादेव मंदिर प्रसिद्ध है।

उत्तर : (ii) मणिपुरी नृत्य-मणिपुरी शास्त्राीय नृत्य, उत्तरी पूर्वी क्षेत्रा में स्थित मणिपुर घाटी में प्रचलित एक प्राचीन नृत्य शैली है। मणिपुरी नृत्य मानव की आध्यामिक चेतना का स्फरण है। इसमें आदि पुरुष व प्रकृति द्वारा सृष्टि की रचना की कहानी, पौराणिक कथनकों के माध्यम से कही जाती है। कालांतर में इस नृत्य के साथ रास लीला की कथा जुड़ गयी। यह लीला जीवात्मा तथा परमात्मा के साथ गहरा संबंध प्रकट करती है। इस नृत्य में शैव धर्म व तांत्रिक उपासना के प्रभाव भी देखने को मिलते हैं। 

उत्तर (iii): बैशाखी-पंजाब में बैशाखी का दिन सिक्खों के लिए महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन गुरु गोविन्द सिंह ने ‘खालसा’ की नींव रखीं थी। बैशाखी, बैशाख मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। किसान इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाते हैं, क्योंकि उनकी फसल इस समय कटाई योग्य हो जाती है।

उत्तर (iv) : जन्माष्टमी-जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनायी जाती है। यह पर्व भाद्रपक्ष के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह उत्सव उनके जन्म स्थान मथुरा के साथ.साथ पूरे भारत में मनाया जाता है। कृष्ण को ईश्वर के दस अवतारों में से एक माना गया है। 
 

प्रश्न 32 : निम्नलिखित आंदोलनों के बारे में आप क्या जानते हैं?
(i) स्वदेशी आंदोलन
(ii) खिलाफत आंदोलन 
(iii) नामधरी आंदोलन

उत्तर (i) : स्वदेशी आंदोलन-स्वदेशी आंदोलन का जन्म 1905 के बंगाल विभाजन के समय हुआ। कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन की घोषणा से राष्ट्रवाद की भावना को उत्तेजना मिली तथा स्वदेशी आंदोलन का उदय हुआ। इसका समर्थन गरम दल के नेताओं ने किया था। इस आंदोलन में विद्यार्थियों का प्रमुख योगदान था। अंग्रेजों के आर्थिक हितों पर चोट करने में यह आंदोलन बहुत सफल रहा। 

उत्तर : (ii) खिलाफत आंदोलन-खिलाफत आंदोलन का प्रारंभ अली बंधु, मौलाना आजाद, हकीम खां और हसरत मोहानी के नेतृत्व में हुआ। इनकी मांग थी कि तुर्की के सुल्तान की ‘खलीफा’ उपाधि को पुनः प्रतिष्ठित किया जाए क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने तुर्की के सुल्तान पर कठोर व अपमानजनक सेवे्र की संधि थोपी थी। तुर्की का सुल्तान मुसलमानों का धर्मगुरु था। 

उत्तर (iii): नामधारी आंदोलन-यह आंदोलन गुरु राम सिंह के नेतृत्व में लुधियाना में शुरु हुआ था। इसको कूका आंदोलन भी कहते हैं। इसका उद्देश्य सिखों के मध्य जाति-भेद को समाप्त करना तथा अंतरजातीय विवाह एवं विधवा विवाह की व्यवस्था करना था। धार्मिक तथा सामाजिक सुधार के रास्ते से आगे बढ़कर शीघ्र ही यह आंदोलन उग्र साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में परिवर्तित हो गया। 
 

प्रश्न 33 :  विद्यालय में स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत क्या कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए?

उत्तरः विद्यालय में स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत निम्न कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
1. विद्यालय के छात्रों के विभिन्न अंगों की देखभाल करना। जैसे प्रतिदिन उनके नाखूनों की देखभाल, दाँत की सफाई इत्यादि। 
2. छात्रों के नहाने, दाँतों की सफाई एवं नाखूनों की कटाई की व्यवस्था स्कूल में ही कराना।
3. बिमारियों की रोकथाम के उपाय करना। जैसे छात्रों का विद्यालय में विभिन्न प्रकार के टीके लगवाने की व्यवस्था करवाना।
4. छात्रों की डाक्टरी जाँच की व्यवस्था करना। अगर सम्भव हो सके तो प्रतिदिन नहीं तो सप्ताह में कम से कम एक बार डाक्टर द्वारा छात्रों की स्वास्थ्य परीक्षा करानी जानी चाहिए। 
5. अभिभावकों से छात्रों के स्वास्थ्य के सम्बन्ध आवश्यक अभिलेख तैयार कराना।
6. बालकों को शारीरिक स्वास्थ्य के संबंध में आवश्यक अभिलेख तैयार कराना।
7. विद्यालय में विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं का गठन करना।
8. मध्यान्तर के समय भोजन की विद्यालय में व्यवस्था कराना।
9. विद्यालय में ही प्राथमिक चिकित्सा एवं उपचार की व्यवस्था करवाना।

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