सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 15 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 15 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : भारत में सार्वजनिक व्यय को संसद जिन विधियों से नियंत्रित करती है, उनकी विेवेचना कीजिए 
अथवा
(b) आपके विचार में, भारत में राष्ट्रीय एकता की समस्याएं क्या हैं? इनको दूर करने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
  

उत्तर (a): संसदीय लोकतंत्रा की अपनी एक विशेषता है, जहाँ कार्यपालिका को संसद के प्रति जवाबदेह रहना पड़ता है। संसद द्वारा कार्यपालिका के ऊपर रखा जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण नियंत्राण है- उसके बजट के ऊपर निगरानी। कार्यपालिका संसद के अधिकृत किये बिना एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकती है। खर्च से पहले का नियंत्राण बजट प्रावधानों द्वारा होता है क्यों कि इसमें एक निश्चित राशि कार्यपालिका के खर्च के लिए निर्धारित होती है। बजट के बाद का खर्च लेखा परीक्षण द्वारा निर्धारित है। लेखा परीक्षण का काम महालेखा नियंत्राण करते हैं। फिर लेखा परीक्षण रिपोर्ट को संसद के सामने राष्ट्रपति द्वारा रखा जाता है। लेकिन संसद के पास इतना समय नहीं होता है कि वो महालेखा नियंत्राक की रिपोर्ट की तकनीकी गुत्थ्यिों को देख सके इसीलिए लोक लेखा समिति इस रिपोर्ट की जाँच पूरी तरह करती है। इसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट व लेखा परीक्षण रिपोर्ट को सरकार और संसद को भेज देती है।
सरकारी उपक्रमों सम्बंधी समिति लेखा नियंत्राक के उन अंशों पर विचार करती है, जो सरकारी उपक्रमों से संबंधित रहती है। इन सभी समितियों की सिफारिशें और लेखा नियंत्राक की रिपोर्ट संसद के हाथ में ऐसा अस्त्रा है, जिससे वो लोक व्यय पर नियंत्राण रखती है। लोकसभा की प्राक्कलन समिति एक ”स्थाई मितव्ययता समिति“ के रूप में कार्य करती है। इसकी आलोचना और सुझाव सरकारी फिलूलखर्ची पर रोक लगाने का काम करते हैं।

उत्तर (b): भारत की राष्ट्रीय अखंडता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृति के लोग परस्पर सद्भाव व मेलजोल के साथ रहते हैं। किसी योजना की बात हो या किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की, अखंडता की बात शासकों के लिए सर्वोपरि है। अखंडता के लिए जरूरी है कि सभी समूहों और वर्गों को साथ लेकर चला जाए। सिर्फ राजनीतिक और भौगोलिक स्तर पर एकता रहने से ही काम नहीं चलता, अपितु सांस्कृतिक एकता का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत में विभिन्न संस्कृतियाँ अपने विभिन्न रंगों में मिलती हैं। फिर भी कुछ जगहों पर जातीय समस्या उभर कर सामने आई है। कहीं.कहीं तो जाति के आधार पर अलग प्रान्तों की माँग होने लगी है। भारत में असामान्य क्षेत्रीय विकास भी राष्ट्रीय एकता में बाधक रहा है। झारखण्ड आंदोलन या अलग राज्यों की भाग को इस नजर से देखा जा सकता है। क्षेत्रीयवाद व जातिवाद के बाद भाषावाद भी राष्ट्र की अखंडता के सामने प्रमुख समस्या है।
राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी क्षेत्रों का समान विकास हो। विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास कार्यों का लाभ सभी वर्गों के लोगों को मिले। साम्प्रदायिक दंगों को सख्ती के साथ कुचला जाना जरूरी है। इसके लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि देश के प्रति वे लोगों के भतर एक भावनात्मक लगाव पैदा करने में आगे आए।

 

प्रश्न 2 : निम्नलिखित का उत्तर दीजिए। (प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 150 शब्द में होना चाहिए।)
(a) भारत के संविधान की प्रमुख प्रतिबद्धताएं क्या हैं जैसा कि उसकी उद्देशिका में निबद्ध हैं?
(b) भारत के संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग की जो अवधारण है, उसे समझाइए और उनके संरक्षण के लिए उसमें जिन रक्षोपाय का प्रावधान किया गया है, उनका उल्लेख कीजिए।
(c) भारत के संविधान में राज्यों की भूमिका तथा उनके कृत्यों का जो प्रतिपादन हुआ है, उसके आधार पर उनका परीक्षण कीजिए।
(d) भारत के निर्वाचन आयोग के संविधानिक दायित्यों को समझाइए।

उत्तर(a) : यद्यपि भारतीय संविधान में प्रस्तावना को कोई विधिक महत्व नहीं दिया गया है, फिर भी यह काफी महत्वपूर्ण है, क्यों कि यह संविधान के स्रोत , उद्देश्य एवं प्रवर्तन विधि को जानने में सहायता पहुंचाती है। वास्तव में भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान के मूल उद्देश्योें को दर्शाती है। इसमें एक प्रमुख बचनबद्धता यह है कि भारत जैसे गणतंत्रा राज्य में सत्ता लोगों के हाथ में निहित है। इसके बाद लोगों को सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक न्याय देने की बात कही गई है। सबको बराबरी का दर्जा और अवसर प्राप्त है। प्रस्तावना बंधुत्त्व और आपसी भाईचारा बढ़ाने तथा देश की एकता और अखंडता बढ़ाने की बात करती है। 42वें संविधान संशोधन, के बाद प्रस्तावना में अखण्डता, समाजवाद और भारत के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने की बात जोड़ दी गई। कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के वचन पर भी जोर दिया गया हैै।

उत्तर (b) : संविधान में अल्पसंख्यक उन्हें कहा गया है, जो जहाँ के बहुसंख्यक निवासियों के बाद धार्मिक आधार पर गिने जाते हैं, जैस- मुस्लिम, सिक्ख, जैन और बौद्ध। अल्पसंख्यक की बात संविधान में एक विचार के रूप में निहित है ताकि बंधुत्व और अखंडता का उद्देश्य प्राप्त किया जा सके। संविधान में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। उनके हितों की रक्षा की बात भी कही गई है। उनके हितों की रक्षा के लिए कुछ संवैधानिक रक्षा कवच इस प्रकार हैंः
(क) भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ सभी अल्पसंख्यकों को भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने का अधिकार है।
(ख) भाषाई अल्पसंख्यकों को प्राथमिक शिक्षा उन्हीं की मातृभाषा में देने का काम राज्य करेगा। इसके लिए एक अधिकारी की नियुक्ति होती है। 
(ग) शिक्षा संस्थाओं में धर्म जाति, भाषा और वर्ण के आधार पर प्रवेश/नामंकन नहीं रोका जा सकता।
(ङ) सार्वजनिक रोजगार के अवसर पर कोई भेदभाव उनके साथ नहीं बरता जाएगा।

उत्तर (c) : राज्य की शासन प्रणाली का संविधानिक प्रधान राज्यपाल होता है। वह राष्ट्रपति के प्रसादर्यन्त अपने पद पर रहता है। राज्य सरकार की समस्त कार्यपालिक शक्तियाँ औपचारिक रूप से राज्यपाल में निहित होती हैं। परन्तु वह इनका प्रयोग राज्य की मंत्रिपरिषद् के परामर्श पर ही करता है। व्यवहार में राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है। उसे यह भी अधिकार है कि यदि उसे विश्वास हो जाए कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार संचालित नहीं हो पा रही है, तो वह राष्ट्रपति को इस बारे में रिपोर्ट भेज सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उस राज्य में संविधानिक आपात्काल की घोषणा कर देता है और अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है। राज्यपाल के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैंः
1. वह बहुमत दल के नेता मुख्यमंत्राी नियुक्त करता है तथा उसके परामर्श पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है। राज्य के समस्त उच्च पदाधिकारियों जैसे; राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य, महाधिवक्ता आदि को राज्यपाल ही नियुक्त करता है। राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श लेता है। साथ ही, अधीनस्त न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी राज्यपाल करता है।
2. कोई भी विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के अभाव में कानून नहीं बन सकता है। वह किसी भी विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानमंडल के पास वापस भेज सकता है।
3. वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भी भेज सकता है।
4. वह विधानमंडल का अधिवेशन बुलाता है तथा सत्रावसान करता है।
5. राज्य विधान परिषद् के लगभग 1ध्6 सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल करता है।
6. राज्य विधानमंडल का अधिवेशन न चल रहे होने की स्थिति में वह अध्यादेश जारी कर सकता है।
7. वह किसी अपराधी को क्षमादान कर सकता है, दंड कम कर सकता है या स्थगित कर सकता है।
8. विधानसभा में किसी भी दल को अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में वह स्वविवेक से किसी भी दल के नेता को मुख्यमंत्राी नियुक्त कर सकता है।

उत्तर (d) : संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करने, चुनाव न्यायाधिकरणों की स्थापना करने एवं चुनाव संबंधी अन्य मामलों की देखभाल के लिए एक स्वतंत्रा निकाय के रूप में एक सदस्यीय या बहुसदस्यीय चुनाव आयोग को अपनाया गया है। इसका अध्यक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता है। उसे उसके पद से उसी रीति ओर उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है। इसप्रकार चुनाव आयोग को भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सचेत अभिरक्षक कहा जा सकता है। चुनाव आयोग के प्रमूख कार्य निम्न प्रकार हैंः
1. चुनाव तालिकाओं को तैयार करना और प्रत्येक जनगणना के बाद व विधानसभा तथा संसदीय चुनाव के पूर्व उन्हें संशोधित करना।
2. पूरे देश के चुनावी तन्त्रा का पर्यवेक्षण करना।
3. चुनाव की तिथियों एवं कार्यक्रम की अधिसूचना जारी करना, जिससे नामांकन भरे जा सकें और उनकी जाँच चुनावों से पूर्व हो सके।
4. चूनाव व्यवस्थाओं से संबेधित विवादों को हल करना, किसी राजनीतिक दल को मान्यता देना एवं उसे चुनाव चिन्ह प्रदान करना तथा चुनाव में धांधली किए जाने या अन्य गड़बड़ियों की स्थिति में मतदान रद्द करना।
5. किसी विधायक या सांसद की अयोग्यता के संबंध में राज्यपाल या राष्ट्रपति को परामर्श देना।
6. विधानसभा या लोकसभा चुनावों के पूर्व राष्ट्रपति को क्षेत्रीय आयुक्तों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सुझा देना।

 

प्रश्न 3 : निम्न का उत्तर दें -
(a) संसद में कार्य-संचालन के संदर्भ मेें ‘शून्य काल’ र्;मतव भ्वनतद्ध से आप क्या समझाते हैं?
(b) संसद सदस्यों के विशेषाधिकार क्या.क्या हैं?
(c) भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 के महत्त्व को समझाइए।
(d) जाँच आयोग (संशोधन) विधेयक, 1986 का उद्देेश्य क्या है?
(e) संसदीय लोकतंत्रा में सामूहिक उत्तरदायित्त्व का क्या तात्पर्य है?
(f) भारत को गणतंत्रा क्यों कहा जाता है?

उत्तर (a) : संसद के दोनों सदनों में ‘प्रश्न काल’ के तुरन्त बाद का समय ‘शुन्यकाल’ कहलाता है। इस समय की कार्य प्रकृति अनियमित होती है; क्योंकि इस दौरान बिना किसी अनुमति या पूर्व सूचना के मुद्दे उठाये जाते हैं।
उत्तर (b) : संसद सदस्य द्वारा विशेषाधिकार निम्नलिखित हैंः
(क) सदस्य को सदन या उसकी किसी समिति के, जिसका वह सदस्य है, अधिवेशन के चलते रहने के दौरान या सदनों या समितियों की संयुक्त बैठक के दौरान तथा अधिवेशन या बैठक के पूर्व या पश्चात् गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
(ख) जब संसद सत्रा में हो तो सदन की अनुमति के बिना किसी सदस्य को साक्ष्य देने हेतु समन नहीं किया जा सकता।
(ग) सदस्य को प्रत्येक सदन में वाक् स्वातंत्रा्य प्रदान है।
(घ) संवधिान में धरा 102(1) के अनुसार सांसद द्वारा संसद में किया कार्य (वोट देना आदि) को अदालत में चुनौटी नहीं दी जकती।
उत्तर (c) : भारतीय संविधान का अनुच्छेद.370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष स्तर प्रदान करता है। संविधान की प्रथम अनुसूची में दिये गए राज्यों पर जो उपबन्ध लागू होते हैं, वे सभी इस राज्य पर लागू नहीं होते। उक्त राज्य के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति संघ और समवर्ती सूची  के उन विषयों तक सीमित होगी, जो राष्ट्रपति उस राज्य की सरकार की सहमति से आदेश द्वारा निर्दिष्ट करे।
उत्तर (d) :  इसका उद्देश्य किसी भी जाँच आयोग की ऐसी रिपोर्ट को सरकार द्वारा संसद में पेश करने पर प्रतिबंध लगाना है, जिससे देश कि एकता व सुरक्षा को खतरा हो। विधेयक का मानना है कि कुछ रिपोर्ट की गोपनीयता के लिए ऐसा जरूरी है, क्योंकि कुछ मुद्दे उसमें बहुत संवेदनशील होते हैं।
उत्तर (e) : सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय शासन प्रणाली की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। मंत्रिमंडल के सभी सदस्य सरकार के प्रत्येक निर्णय और कार्य के लिए सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं। यदि उनकी नीतियों को संसद का समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता, तो सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्रा देना पड़ता है।

उत्तर (f) :  भारत को गणतंत्रा इसलिए कहा गया है कि देश का राष्ट्रपति जनता द्वारा निर्वाचित होता है, हालांकि निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
 

प्रश्न 4 : हमारे योजना प्रक्रम में सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों से किस प्रकार की भूमिका निभाने की आशा थी? सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों के संदर्भ में भारत सरकार की वर्तमान नीति का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

उत्तर : आजादी के पश्चात् देश के योजनाबद्ध आर्थिक विकास के दृष्टिगत विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक क्षेत्रा पर पर्याप्त ध्यान दिया गया तथा योजना काल में सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों की संख्या तेजी से बढ़ी। सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रम स्थापित करने के पीछे मुख्य उद्देश्य निम्नवत् हैंः  
1. आर्थिक विकास की ऊंची दर प्राप्त करना।
2. उपलब्ध दुलर्भ साधनों का अनुकूलतम उपयोग
3. आर्थिक शक्तियों के केन्द्रीयकरण पर रोक।
4. गरीबी, बेरोजगारी व क्षेत्रीय असमानता दूर करना।
5. समाजवादी समाज की स्थापना।
गत चार दशकों में अप्रत्याशित व प्रर्याप्त रूप से अकल्पित अनेक समस्याएं इस क्षेत्रा के उपक्रमों में प्रवेश कर गयी हैं। जिसमें प्रमुख हैं-आवश्यकता से अधिक मानव शक्ति का प्रयोग, बढ़ती हानियाँ, अकुशल प्रबंधन, अधिक पूंजी विनियोग के बावजूद रोजगार का कम विस्तार, राजनीतिकरण व अफसरशाही में निरंतर वृद्धि आदि। उक्त समस्याओं के चलते सरकार को इस क्षेत्रा के उपक्रमों के संबंध मे अपनी नीति की समीक्षा करना आवश्यक हो गया। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों की नवीन नीति के अन्तर्गत इस क्षेत्रा के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या में कटौती की है तथा उनमें निजी क्षेत्रा को प्रवेश दिलाने के प्रयास किये हैं। सरकार ने निकट भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्रा के उपक्रमों की नई इकाइयाँ स्थापित करने पर नियंत्राण रखने का विचार बनाया है। बीमार सार्वजनिक उपक्रमों में जान फूंकने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं तथा अनेक उपक्रमों को निजी क्षेत्रा को सौंपा जा रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों के लिए पूंजी का प्रबंध करने व निजी क्षेत्रा की सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए, उपक्रमों में सरकारी अंश का एक भाग म्यूचुअल फण्डों, वित्तीय संस्थाओं, जनता व श्रमिकों को बेचने का निर्णय किया गया है। कूल मिलाकार वर्तमान समय में सार्वधिक आवश्यकता इस क्षेत्रा के उपक्रमों में बढ़ते सार्वजनिक व्यय, विशेष कर गेर.योजनागत व्यय पर नियंत्राण की है। 

 

प्रश्न 5 : ‘आर्थिक उदारीकरण के नए कार्यक्रम में भारत का एक्जिट पाॅलिसी (निकास नीति) के मामले में धीरे-धीरे चलना चाहिए’। क्या इस सुझाव के पीछे उपयुक्त कारण है?

उत्तर : एक्जिट नीति के संबंध में विचार-विमर्श 1991 के उत्तरार्द्ध में आरम्भ हुआ था तथा वर्तमान में यह सरकार के आर्थिक उदारीकरण के नए कार्यक्रम का एक नीतिगत कार्यक्रम हैं इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक भार को कम करने के लिए बीमार व अकुशल उपक्रमों को बंद करना और आवश्यकता से अधिक कर्मियों को कार्यमुक्त करना है। उद्योगों के बीमार हो जाने से उसमें लगी करोड़ों रुपये की पूंजी ही नहीं डुब्ती, बल्कि उसमें कार्यरत हजारों श्रमिक भी बेरोजगार हो जाते हैं और अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता का ह्रास भी होता है। 30 मार्च, 1991 को देश में बीमार औद्योगिक इकाइयों की कुल संख्या 2,23,809 थी। रुग्ण कंपनी अधिनियम, 1985 के अनुसरण में बी.आई.एफ.आर. बीमार इकाइयों को पहचानने व उनकों बीमार होने से रोकने आदि में मदद करता है। इस समस्या पर विचार के लिए गठित गोस्वामी सीमति ने भी एक्जिट (छंटनी) नीति अपनाने का सुझाव दिया है। साथ ही, विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाएं भी एक्जिट नीति अपनाने पर जोर दे रही हैं। 
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार द्वारा स्वीकृत एक्जिट नीति का औचित्य सर्वथा मान्य है, लेकिन इसे एकाएक क्रियान्वित कर देना उचित नहीं होगा। एक्जिट नीति के क्रियान्वय में तेजी के प्रयासों से औद्योगिक संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा तथा उत्पादन भी प्रभावित होगा। पहले से ही विभिन्न आन्तरिक समस्याओं व बेरोजगारों को निरंतर बढ़ती संख्या से पीड़ित राष्ट्र को इसके लिए एक सुविचारित नीति के तहत धीरे.धीरे चलना हितकर होगा। हालांकि, एक्जिट नीति को श्रमिकों के हितों के अनुकूल बनाया जा रहा है, लेकिन इसके तात्कालिक प्रभाव से बेरोजगारी में और वृद्धि स्वाभाविक है। एक्जिट नीति के अन्तर्गत आए श्रमिकों को प्रदत्त क्षतिपूर्ति का भारी वित्तयी भार नियोजकों व सरकार को ही उठाना है। अतः इस वित्तीय भारत को देखते हुए धीरे.धीरे वहन करना ही हितकर होगा। एक ओर, विश्व बैंक जैसी संस्थाएं आद्योगिक इकाइयों से श्रमिकों की छटनी को उचित ठहरा रही हैं, तो दूसरी ओर, यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस अभियान से लगभग 1 करोड़ लोग बेरोजगारी के भंवर में फंस चुके हैं। 

 

प्रश्न 6 : डंकेल मूल मसौदे में, भारत के संदर्भ में, व्यापार संबंधित बौद्धिक स्वामित्व अधिकार के मुख्य विषयों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : व्यापार और तटकर संबंधी सामान्य समझौत (General Agreement on Tarriff and Trade-GATT गेट) के डंकुल  मूल प्रस्तावों में व्यापार से संबंधित (Trade Related Intellectual Property Right -  बौद्धिक संपदा अधिकार) प्रस्तावों के अनुसार, किसी वस्तु के आविष्कार की मंजूरी के बिना उस वस्तु की किसी भी प्रकार नकल या प्रतिकृति तैयार नहीं की जा सकती। बौद्धिक संपदा अधिकार के अंतर्गत सात क्षेत्रा हैं- काॅपीराइट, ट्रेडमार्क, ट्रेड सीक्रेट औद्योगिक अधिकल्पना, एकीकृत परिपथ, भौगोलिक संकेत तथा पेटेंट। इससे संबंधित प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैंः

  • अभिव्यक्त कार्यप्रणाली, संचालन प्राविधि, गणितीय अवधारणाएं व कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग को साहित्यिक वस्तु की श्रेणी में मानकर काॅपीराइट की परिधि में लाया गया है। 
  •  ध्वनि-रिकार्डिंग, ट्रेडमार्क व मूल लेबलों के मामले में निर्माताओं, वैज्ञानिकों, कलाकारों व उत्पादकों द्वारा कराए गए पेटेंट व काॅपीराइट के नियम और कड़े होंगे तथा इनका उत्तरोत्तर प्रयोग करने पर रायल्टी देनी होगी।
  • मौलिक औद्योगिक अभिकल्पन के संरक्षण की व्यवस्था।
  • वस्तुओं व सेवाओं से सबंधित व्यापार चिन्ह (ट्रेडमार्क) के सुनिश्चित पंजीयन की व्यवस्था। 
  • जैव प्रणालियों, सूक्ष्म जीवों व गैर-जीव को भी पेटेंट किया जाएगा।
  • वस्तु या प्रक्रिया तकनीक के हर क्षेत्रा में पेटेंट नए अविषकार के लिए उपलब्ध हो।
  • पेटेंट की न्यूनतम सीमा 20 वर्ष हो।
  • विकसित देशों को एक वर्ष व अन्य को 9 वर्ष के संक्रमण काल का प्रावधान। 

‘ट्रिप्स’ के अन्तर्गत आने वाले सात क्षेत्रों में पेटेंट संबंधी कानून में भारत और विकसित देशों में अंतर है, जबकि अन्य छह क्षेत्रों में कानून व्यवस्थाएं अन्य देशों के ही समान हैं। भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 में ‘प्रक्रिया’ को पेटेंट करने की व्यवस्था है, जबकि डंकेल प्रस्ताव में ‘उत्पाद’ को भी पेटेंट करने का प्रावधान है। साथ ही, डंकेल प्रस्तावों में पेटेंट प्रावधानों के लिए बीस वर्ष की अवधि निर्धारित है, जबकि भारत में पेटेंट की अवधि सात वर्ष निर्धारित है। अतः इस क्षेत्रा में भारत को परेशान होना स्वाभाविक ही है। पेटेंट की नयी व्यवस्था से भारत में दवा उद्योग पर काफी प्रभाव पड़ेगा। दवाओं के दाम बढ़ेंगे, दवा क्षेत्रा में उत्पादों का पेटेंट छोड़ना होगा, अनेक दवाओं का आयात करना होगा व दवाओं के स्वदेशी उत्पाद पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। भारतीय कृषकों को बीजों पर पेटेंट संबंधी शुल्क से हानि होगी क्योंकि वे पेटेंट किये बीजों की बिक्री दूसरे किसान को नहीं कर सकेंगे।
 

प्रश्न 7 : आठवीं पंचवर्षीय योजना के प्राथमिक उद्देश्यों में से एक ”शताब्दी अंत तक लगभग पूर्ण नियोजन स्तर प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नियोजन उत्पन्न करना है।“ (आठवीं पंचवर्षीय योजना) इस उद्देश्य प्राप्ति के लिए क्या योजना प्रस्तावित है?

उत्तर : आठवीं पंचवर्षीय योजना में माना गया है कि जनसंख्या व श्रमिशक्ति में होने वाली तीव्र वृद्धि के कारण बेरोजगारी  निरंतर बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी समस्या के समाधान की दृष्टि से आठवीं योजना में सन् 2002 तक बेरोजगारी को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के मद्देनजर योजना के दौरान सकत घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में 5.6 प्रतिशत औसत वार्षिक विकास दर प्राप्त करने को प्राथमिकता दी गयी है। उल्लेखनीय है कि आठवीं योजना अवधि के प्रारंभ में देश में बेरोजगारों की संख्या 170 लाख थी, जिसमें नौवीं पंचवर्षीय योजना के अंत (सन् 2002) तक और भी अधिक वृद्धि होना लगभग निश्चित ही है। इस स्थिति में नौवीं योजना के अंत तक सभी को रोजगार मुहैया कराने के लक्ष्य तक पहुंच पाना उसी स्थिति में संभव हो सकता है, जब आठवीं और नौवीं पंचवर्षीय योजना में रोजगार विकास की दर तीन प्रतिशत रहे।
सन् 2002 तक पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त करने के लिए आठवीं पंचवर्षीय योजना में संगठित निर्माण क्षेत्रा के साथ ही, सभी उत्पादन प्रणालियों में उत्पादकता के स्तर में सुधार लाए जाने की रणनीति पर जोर दिया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में पिछली उपलब्धियों की समीक्षा करने तथा उनकी वृद्धि की प्रक्रिया में रोजगार अवसर उत्पन्न करने की क्षमता को और अधिक बढ़ाने के लिए इसमें से हर एक की क्षमता का उचित मूल्यांकन करने की नीति का भी प्रस्ताव किया गया है। रोजगार बढ़ाने के लिए लघु उद्योग व असंगठित क्षेत्रों की पहचान की गयी है और भवन निर्माण, आवास, सेवा क्षेत्रा व सार्वजनिक क्षेत्रा आदि की संभावनापूर्ण क्षेत्रों के रूप में पहचान की गयी है। इसके अलावा कृषि क्षेत्रा में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी समुचित बल दिया गया है। ऐसे क्षेत्रा जो कि काफी पिछड़े हैं, उन क्षेत्रों में तेजी से रोजगार बढ़ाने की रणनीति से वहाँ का विकास तेजी से होगा। कृषि के सहायक बल देने का प्रस्ताव है। साथ ही, रोजगार की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने के लिए श्रम नीति में आवश्यक सुधार, कारीगरी कुशलता में वृद्धि तथा प्रशिक्षण सुविधाओं के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया है। 
प्रश्न 8 :परिचायक आयोजन एवं लक्ष्य आयोजन में क्या अन्तर है? आठवीं पंचवर्षीय योजना को आप किसमें रखेंगे?

उत्तर : ऐसी विधि जिसमें व्यवस्थित आर्थिक समृद्धि बिना किसी आधिकारिक (नौकरशाही) हस्तक्षेप के तीव्रता के साथ होती है, परिचायक आयोजन कहलाता है। इस आयोजन के अंतर्गत आर्थिक आयोजन का विकेन्द्रीकरण एवं निजीकरण लोकतांत्रिक पद्धति से किया जाता है। इस आयोजन में लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विकास की गति को तेज करने पर बल दिया जाता है तथा आर्थिक विकास के लिए योग्य समझे जाने वाले उद्यम को आवश्यक धन उपलब्ध कराया जाता है। परिचायक आयोजन के अंतर्गत सरकार की नीतियाँ लोचदार होती हैं एवं आयोजन द्वारा दी गयी सूचना से सरकार और उत्पादक दोनों लाभान्वित होते हैं। इस लाभ की वजह से वस्तुओं के प्रसार की दर बढ़ जाती है। 
ऐसा आयोजन, जिसमें योजना का विनिर्माण एवं कार्यान्वयन सरकार द्वारा किया जाता है। लक्ष्य आयोजन में योजना का समय निश्चित होती है। आमतौर पर यह एक वर्ष, दो वर्ष या पाँच वर्ष तक का होता है। लक्ष्य का निर्धारण शून्य या सरकार इस उद्देश्य से करती है कि वस्तुओं का कितना उत्पादन कितनी समयावधि के बीच हो जायेगा। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा संसाधन जुटाये जाते हैं।
भारत में आठवीं पंचवर्षीय योजना की काल है। जिसकी अवधि 1 अप्रैल, 1992 से 31 मार्च, 1997 था। आठवीं योजना का स्वरूप परिचायक आयोजन के अंतर्गत है। इस योजना में मानवीय विकास पर बहुत अधिक बल दिया गया है।

 

प्रश्न 9 : सुझाव दिया जा रहा है कि भारत में व्यापारिक बैंक को अपनी ऐसी परिसम्पत्ति को कम करना चाहिए जो कार्यशील न हो। क्या इसका यह अर्थ है कि बैंकों को सामाजिक प्राथमिकताएँ त्याग कर देनी चाहिए?

उत्तर : पूर्व प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी के शासन काल वर्ष 1969 एवं 1980 में क्रमशः 14 एव 6 वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। जिसके कारण सभी बैकों में लाभ कमाने के उद्देश्य से ग्राहकों को बेहतर सेवा देने की होड़ लग गयी। इसके लिए बैंकों ने अपनी सेवाओं की गुणवत्ता, तुरन्त कार्य सम्पादन, आसानी से ऋण उपलबध कराने जैसे विषयों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। सरकार ने भी इन बैंकों को रिर्जव बैंक द्वारा कुल व्यवसायिक ऋणों का कम से कम 40 प्रतिशत प्राथमिकता क्षेत्रा के लिए रखने का नियम बनाया है। इसी के तहत ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण बैंक खोले गये। जिसके तहत ग्रामीणों एवं बेरोजगारों के बीच ऋण वितरित किए गए। बैंकों में बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा होने एवं उनके कार्यक्षेत्रा का विस्तार होने के बावजूद भी अनेक बैंक घाटे में चल रहे हैं। घाटे के कारण वर्ष 1993 में न्यू बैंक आफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय कर दिया गया। अब शेष 19 राष्ट्रीयकृत बैंकों में से केवल 5 ही लाभ दर्शा पाये हैं और शेष ने घाटा ही दर्शाया है। सरकार द्वारा विभिन्न सुधार कार्यक्रम चलाने के बावजूद भी अनेक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसम्पत्तियों की अधिकता एक गंभीर समस्या बनी हुई है। 
सरकार द्वारा बैंकों के सुधार के लिए गठित समिति ने यह सुझाव दिया है कि मुक्त बाजार के दौर में बैंकों को गैर निष्पादित परिसम्पत्तियों को किसी भी हालत में कम करना होगा। मुक्त बाजार में राष्ट्रीयकृत बैंकों की प्रतिस्पर्धा विदेशी बैंको से होती है। राष्ट्रीयकृत बैंक अपनी कार्यक्षमता में सुधार लाकर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों को कम करके आर्थिक रूप से लाभ कमा सकते है और तब राष्ट्रीयकृत बैंक सामाजिक आर्थिक दायित्वों को भी ठीक ढंग से पूरा कर सकेंगे।
जब से भारत सरकार ने व्यापारिक बैंकों में परिसंपत्तियों के वर्गीकरण के लिए नए मानक लागू किये हैं तब से बैंकों की बैलेंसशीट पर प्रभाव पड़ने लगा है। चूँकि, भारत एक बड़ा देश होने के साथ.साथ निर्धन भी है, अतः यहाँ के राष्ट्रीयकृत बैंको का यह दायित्व बनता है कि वे भारत की गरीब जनता को आसान ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराकर सामाजिक प्राथमिकताओं को पूरा करें। 

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