सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

The document सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev is a part of the Class 10 Course Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi.
All you need of Class 10 at this link: Class 10

प्रश्न 1. भारत के नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक के कत्र्तव्यों तथा शक्तियों को, लेखा परीक्षण के संदर्भ में परिभाषित करते हुए यह बताइये कि कार्यपालिका के नियंत्राण से उनको स्वतंत्रा रखने के लिए संविधान में क्या व्यवस्था की गई है? 
अथवा
(b) भारतीय संसद की शक्तियों, विशेष अधिकारों तथा उन्मुक्तियों का विवेचन कीजिए

उत्तर (a): भारत के संविधान के अनुच्छेद 148 से 151 में नियंत्राण एवं महालेखा परीक्षक के संबंध में प्रावधान हैं। अनुच्छेद 148 के अनुसार, उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वह देश की समस्त वित्तीय प्रणाली का नियंत्राण करता है। अनच्छेद 149 के अनुसार, वह संघ राज्यों या संसद के किसी कानून के तहत किसी अन्य या संस्था के लेखों के संबंध में उन कत्र्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थी। भारत के नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक के लेखा परीक्षण के संबंध में कत्र्तव्य व शक्तियाँ निम्न प्रकार हैंः
(i) भारत और प्रत्येक राज्य व विधानसभा या प्रत्येक संघ राज्य क्षेत्रा की संचित निधि से सभी व्यय का संपरीक्षा और उन पर यह प्रतिवेदन कि क्या ऐसा व्यय विधि सम्मत है।
(ii) संघ या राज्य के विभाग द्वारा किए गए सभी व्यापार और विनियोग के हानि-लाभ लेखाओं की जाँच और उन पर प्रतिवेदन।
(iii) संघ राज्यों की आकस्मिक निधि और लोक लेखाओं के सभी व्यय की जाँच और उस पर प्रतिवेदन।
(iv) संघ/राज्य के आय-व्यय की जाँच ताकि यह ज्ञात हो सके कि राजस्व के निर्धारित, संग्रहण और उचित आवंटन के लिए पर्याप्त जाँच करने के लिए हुए निमित्त नियम और प्रतिक्रियायें बनाई गई हैं।
(v) संघ/राज्य के राजस्व के पर्याप्त रूप से वित्त पोषित सभी निकायों व प्राधिकारियों, सरकारी कंपनियों और अन्य निगमों व निकायों (यदि विधि द्वारा अपेक्षित हो) की आय-व्यय की जाँच व उस पर प्रतिवेदन। 
संघ संबंधी लेखा रिपोर्ट राष्ट्रपति को तथा राज्य संबंधी लेखा रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत की जाती है। नियंत्राक व महालेखा परीक्षक को कार्यपलिका के नियंत्राण के स्वतंत्रा रखने के लिए प्रमुख संवैधानिक व्यवस्थायें निम्न प्रकार हैंः
(i) उसके वेतन व भत्ते आदि भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
(ii) उसकी सेवा की शर्तें व वेतन संसद विधि द्वारा निर्धारित करेगी तथा उसका वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होगा। उसके सेवाकाल में उसके वेतन में उसके लिए अहितकारी कोई परिवर्तन नहीं होगा।
(iii) उसे साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ही संसद के दोनों सदनों के समावेदन पर हटाया जा सकता है।
(iv) उसका कार्यकाल 6 वर्ष का होगा तथा 65 वर्ष की आयप्राप्त कर लेने पर पदमुक्त।
(v) सेवा निवृत्ति के बाद भारत सरकार/राज्य सरकार के अधीन कोई पद धारण नहीं कर सकता।

अथवा

उत्तर (b) : भारत के संविधान के अनुसार भारतीय संसद के कार्य एवं अधिकार निम्नलिखित हैंः
1. संसद को राष्ट्रीय वित्त पर पूर्ण अधिकार होता है और वही बजट पास करती है।
2. संसद का शासन पर वास्तविक नियंत्राण होता है क्योंकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
3. संसद को संघ सूची, समवर्ती सूची, अवशेष विषयों व कुछ परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।
4. वह संविधान में संशोधन कर सकती है तथा वह राष्ट्रपति ओर उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है।
5. संसद राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाकर हटा सकती है और उच्चतम व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के विरूद्ध अयोग्यता का प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति द्वारा हटा सकती है।
6. संसद को संविधान में संशोधन-परिवर्तन का अधिकार प्राप्त है (अनुच्छेद 368)।
7. राष्ट्रपति द्वारा संकटकाल की घोषणा को एक माह के अंदर संसद से स्वीकार कराना आवश्यक है।

भारतीय संसद द्वारा सांसदों को प्रदत्त विशेषाधिकार व उन्मुक्तियाँ निम्न प्रकार हैंः
1. संसद सदस्यों को सदन में भाषण की स्वतंत्राता (संसदीय नियमों व आदेशों की सीमा में)
2. संसद सदस्यों के विरूद्ध संसद अथवा उसकी किसी समिति में कही गई बात पर किसी भी न्यायालय में किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
3. संसद का सत्रा आरम्भ होने के चालीस दिन पूर्व और चालीस दिन बाद तक कोई संसद सदस्य बंदी नहीं बनाया जा सकता है। (आपराधिक आरोप, न्यायालय अवमानना निवारक निरोध कानूनों के विरूद्ध यह संरक्षण नहीं है)।
4. संसद परिसर में अध्यक्ष की आज्ञा के बिना किसी भी संसद सदस्य को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
5. संसद सदस्यों को विधि के आधार पर संसद, कुछ अन्य अधिकार व उन्मुक्तियाँ भी प्रदान कर सकती है।
6. संसद को कार्रवाइयों के प्रकाशन का, किसी कार्रवाई के प्रकाशन को रोकने का, गुप्त बैठक करने का, कार्रवाइयों के विनियमन का, अपनी अवमानना के लिए तथा विशेषाधिकार भंग करने के लिए दंड देने का अधिकार है।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में किन्हीं दो के उत्तर दीजिए। (प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 150 शब्द में होना चाहिए।)
(a) लोकसभा के अध्यक्ष की शक्तियों तथा कृत्यों का परीक्षण कीजिए।
(b) भारत की संसदीय पद्धति की परिसंघीय व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में द्वितीय सदन के रूप में राज्य सभा की प्रासंगिकता समझाइए।
(c) भारत के संदर्भ में कार्यपालिका तथा विधायिका के बीच के सम्बन्ध का विवेचन कीजिए।
(d) भारतीय संसद में समिति-पद्धति के संगठन तथा कृत्यों का विवरण दीजिए।

उत्तर (a) : लोकसभा अपने सदस्यों में से बहुमत द्वारा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव करती (अनुच्छेद.93) है। इनका कार्यकाल लोकसभा के भंग होने पर समाप्त हो जाता है। अध्यक्ष अपनी सहायता के लिए कुछ सदस्यों का एक अध्यक्ष मंडल भी मनोनीत करता है तथा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में इस अध्यक्ष मंडल का कोई सदस्य या उपाध्यक्ष के आदेश से लोकसभा की कार्रवाई का संचालन करता है। लोकसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्य व शक्तियाँ निम्नप्रकार हैंः
1. सदन के सदस्यों के प्रश्नों को स्वीकार करना, उन्हें नियमित करना व निमय के विरुद्ध घोषित करना।
2. किसी विषय को लेकर प्रस्तुत किया जाने वाला ‘कार्य स्थगन प्रस्ताव’ अध्यक्ष की अनुमति से पेश किया जा सकता है।
3. वह विचाराधीन विधयेक पर बहस रुकवा सकता है।
4. संसद सदस्यों को भाषण देने की अनुमति देता है और भाषणों का क्रम व समय निर्धारित करता है।
5. सदन में शांति व अनुशासन बनाए रखता है।
6. विभिन्न विधेयक व प्रस्तावों पर मतदान कराना व परिणाम घोषित करना तथा मतों की समानता की स्थिति में निर्णायक मत देने का उसे अधिकार है।
7. संसद व राष्ट्रपति के मध्य होने वाला पत्रा-व्यवहार अध्यक्ष के माध्यम से होता है।
8. कोई विधेयक, वित्त विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय भी अध्यक्ष करता है।

उत्तर (b) : वित्त विधेयक को छोड़कर अन्य समस्त विधेयकों के संबंध में लोकसभा व राज्य सभा को समान शक्तियाँ प्राप्त हैं। किसी विधेयक पर मतभेद की स्थिति में राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाता है तथा उसमें जो पारित होता है, वही सदन द्वारा पारित माना जाता है। इस स्थिति में राज्यसभा की शक्ति कम हो जाती है क्योंकि राज्यसभा सदस्यों की संख्या लोकसभा से कम होती है। राज्यसभा की यह स्थिति उसे एक कमजोर, निरर्थक व अनुपयोगी सदन भी ठहराती है। राज्यसभा में सरकारी प्रस्ताव अस्वीकृत होने पर भी मंत्रिमंडल को त्यागपत्रा नहीं देना पड़ता है। वित्त विधेयक को राज्यसभा मात्रा 14 दिन तथा साधरण विधेयक को 6 माह तक रोक सकती है। कुल मिलाकर राज्यसभा की शक्तियाँ लोकसभा से कम होती हैं।
इसके बावजूद भारत की संसदीय पद्धति की परिसंघीय व्यवस्था के दृष्टिगत राज्यसभा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जिसे निम्नप्रकार समझा जा सकता हैः
(1) अमरीकी सीनेट की भाँति ही राज्यसभा में संघ की इकाइयों का प्रतिनिधितव होता है, जो कि परिसंघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है।
(2) देश के विशिष्ट क्षेत्रा से सम्बद्ध विशेषज्ञ व विद्वानों का प्रतिनिधित्व होता है। अतः यह अधिक गरिमामय होती है।
(3) लोकसभा में शीर्घता से पारित पर गहन विचार-विमर्श हेतराज्यसभा एक श्रेष्ठ मंच है।
(4) राज्यसभा समवर्ती सूची के विषय को राष्ट्रीय हित का घोषित कर दे तो संसद को उस विषय पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
(5) राज्यसभा किसी अखिल भारतीय सेवा के सृजन का निर्णय भी ले सकती है।
भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व संघात्मक व्यवस्था वाले देश में संसद का द्विसदनात्मक होना लोकतंत्रा को निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करता है।

उत्तर (c) : भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्थानुसार, विधायिका (संसद) तथा कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) में गहन सम्बन्ध है। विधायिका का कार्य संघीय सूची के विषयों पर कानून निर्माण करना तथा कार्यपालिका का कार्य कानूनों का क्रियान्वयन करना है। भारत में कार्यपालिका के सदस्य संसद के भी सदस्य होते हैं तथा वे लोकसभा के प्रति उत्तरदायी अनुच्छेद 75(3) होते हैं। प्रधानमंत्राी व मंत्रिपरिषद ही संसद को नेतृत्व प्रदान करते हैं तथा मंत्रिमंडल उसी समय तक अपने पद पर बना रहा है, जब तक उसे लोकसभा में बहुमत प्राप्त है। भारतीय संसद का एक प्रमुख कार्य कार्यपालिका पर नियंत्राण रखना भी है। इसके लिए कुछ प्रमुख व्यवस्थायें निम्नप्रकार हैंः
1. प्रश्नोत्तर द्वारा सरकारी विभागों की त्राुटियों की निंदा व आलोचना से सरकार के गलत रास्ते पर जाने पर रोक।
2. किसी गम्भीर घटना की स्थिति में ‘काम रोको प्रस्ताव’ द्वारा उस पर विचार के लिए सरकार को बाध्य करना।
3. किसी विधेयक या नीति पर संसद की अस्वीकृति या बजट प्रस्तावों पर कटौती, मंत्रिमंडल के त्यागपत्रा की मजबूरी बन जाती है।
4. लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव।
5. संसद की अनुमति के बिना कोई करारोपण नहीं हो सकता है।
6. कार्यपालिका संसद का अनुमति के बिना लोकराजस्व का व्यय नहीं कर सकती है।
सिद्धांत रूप में देखा जाए तो विधायिका का कार्यपालिका पर पूर्ण नियंत्राण रहता है, लेकिन व्यवहारिकता इससे काफी हटकर है। प्रधानमंत्राी, जो कि बहुमत दल का नेता होता है, की नीतियों का दल के सभी सदस्य प्रायः दलीय अनुशासन के कारण समर्थन करते हैं। दल की नीतियों का विरोध करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का उन्हें भय रहता है। अतः विधायिका अप्रत्यक्ष रूप से कार्यपालिका से नियंत्रित रहती है। प्रायः मंत्रिमंडल ही काननों का निर्माण करके सांसदों की सहमति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार बहुत दल की सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट को दल के सांसद बिना कटौती के स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि कटौती की स्थिति में सरकार गिर सकती है। साथ ही प्रधानमंत्राी के पास लोकसभा भंग करने की शक्ति भी होती है, जो कि विधायिका की अपेक्षा कार्यपालिका की अधिक शक्ति को स्पष्ट करता है। कहा जा सकता है कि कार्यपालिका पर विधायिका का प्रभावी नियंत्राण होते हुए भी कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका पर श्रेष्ठता व नियंत्राण बनाए रखती है।

उत्तर (d) : संसद के पास हर मामले के लिए समय, दक्षता व परीक्षण करने का अभाव होता है। अतः संसद अपने कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न समितियों का सहयोग लेती है। इसके लिए संसद सदस्य संसद में प्रस्ताव पेश करते हैं या सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा नाम निर्दिष्ट की जाती हैं। भारत में दो प्रकार की संसदीय समितियाँ होती हैंः
I.    स्थायी समितिः प्रत्येक वर्ष या समय-समय पर कारण अनुसार, सदन द्वारा चुनी जाती हैं अथवा लोकसभा/राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा नामांकन किया जाता है।
II.    तदर्थ समितिः किसी विशेष मामले पर विचार करने व रिपोर्ट देने के लिए सदन अथवा लोकसभा/राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा संस्थापित रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद ये समाप्त हो जाती हैं। प्रवर या संयुक्त प्रवर समिति प्रमुख तदर्थ समिति है, जो कि किसी विधेयक पर विचार करने और रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त की जाती है।

स्थाई समितियाँ प्रकृति की दृष्टि से निम्न प्रकार की होती हैंः
1. लोक लेखा समिति:लोकसभा से 15 व राज्यसभा से 7 सदस्य। सरकार के विनियोग लेखा व उस पर नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट की जाँच।
2. प्राक्कलन समिति: यह समिति लोकसभा की समिति है, जिसका प्रतिवर्ष गठन होता है और सदस्य संख्या 30 है। बजट का विश्लेषण व धन प्राक्कलनों की जाँच।
3. सरकारी उपक्रम समिति:लोकसभा से 15 व राज्यसभा से 7 सदस्य। सार्वजनिक क्षेत्रा के कारखानों की रिपोर्टों तथा लेखों की देखभाल व कार्यकुशलता संबंधी सुझाव देना। कार्यकाल 1 वर्ष।
4. विशेषाधिकार समितिः 15 सदस्य। स्पीकर द्वारा नियुक्ति। सांसदों के विशेषाधिकारों के भंग होने की जाँच व उस पर अपनी व्याख्या सदन के समक्ष प्रस्तुत करना।
5. याचिका समिति:विधेयकों व जनहित मामलों से सम्बद्ध याचिकाओं या निवेदनों की जाँच।
6. कानून समितिः 20 से 30 तक सदस्य। सरकार प्रत्यायोजन की सीमा में रहकर संविधान प्रदत्त/संसद प्रत्योयोजित नियम, विनियम आदि की शक्तियों का उपयोग कर रही है या नहीं, की जाँच।
7. अनुमान समिति: विभागों द्वारा रखी गई मांगों में मितव्ययता, सुधार व दक्षता की ओर ध्यान दिलाना।
8. सार्वजनिक आश्वासन समिति: मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों को पूरा करना।

प्रश्न 3. निम्नलिखित का उत्तर दें।
(a) संसद में कटौती प्रस्ताव से क्या तात्पर्य है? उसके विभिन्न प्रकार बातइए?
(b) भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालायों से सम्बद्ध परामर्शदात्राी समितियों के तहत्त्व का विवेचन कीजिए।
(c) संसद में पूछे जाने वाले तारांकित तथा उप-तारांकित प्रश्नों का अन्तर समझाइए।
(d) संसद के विशेषाधिकार का भंग सदन के अवमानन से किस प्रकार भिन्न है?
(e) कुछ ऐसे क्षेत्रा हैं, जहाँ पर केवल राज्यसभा का प्राधिकार चलता है। वे कौन.कौन हैं?
(f) औचित्य-प्रश्न (प्वाइंट आॅफ आर्डर) क्या होता है और कब उठाया जाता है?

उत्तर (a) : संसद में किसी मंत्रालय की प्रस्तुत अनुदान मांगो पर विचार करने के उपरांत अनुदान मांगों पर संसद सदस्यों द्वारा कटौती करने का प्रस्ताव, कटौती प्रस्ताव कहलाता है। इससे संसद सदस्यों को उस मंत्रालय के कार्य.कलापों का परीक्षण करने का एक सही अवसर मिल जाता है। कटौती प्रस्ताव तीन प्रकार के होते हैं-
1. प्रतीक कटौती:इसमें केलव प्रतीक स्वरूप एक रुपये की कटौती का प्रस्ताव रखा जाता है।
2. मितव्ययता कटौतीः इसमें मांगों में किसी व्यय को कम करने या न करने का प्रस्ताव रखा जाता है।
3. पूर्ण कटौतीःइसमें मांगों में इतनी कटौती की जाती है कि केवल 1 रुपये की अनुदान मांग ही स्वीकृत की जाती है। दूसरे अर्थों में मांगों को पूर्णतः अस्वीकार कर देना पूर्ण कटौती कहलाता है। 

उत्तर (b) : विभिन्न मंत्रालयों से सम्बद्ध परामर्शदात्राी समितियों के लिए संसद सदस्य अपनी प्राथमिकता संसदीय कार्यमंत्राी को बताते हैं। संसदीय मंत्राी उनमें से विधि समितियों में दलीय शक्ति के अनुसार सदस्यों की नियुक्ति करता है। समितियों की समय-समय पर होने वाली बैठकों में विभाग से सम्बन्धित समस्याओं पर विचार किया जाता है। यह पूरी तरह औपचारिक व्यवस्था है तथा इसके कोई नियम व संविधान नहीं होते और इसके निर्णय भी बाध्यकारी नहीं होते। इसका मूल कार्य सरकारी नीतियों व सार्वजनिक प्रशासन के सिद्धांतों, समस्याओं व कार्यप्रणली पर विचार करना तथा संसदों और विभागों में सहज सम्बंध स्थापित करना है। इसे गवाहों को बुलाने या सरकारी रिकार्ड मंगाकर देखने का भी अधिकार नहीं होता।

उत्तर (c) : जिस प्रश्न का उत्तर सदस्य संसद में मौखिक रूप से चाहता है, उस प्रश्न के सामने तारा अंकित कर देता है तथा मंत्राी द्वारा उत्तर दिए जाने के बाद पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। जबकि जिन प्रश्नों के आगे तारा अंकित नहीं रहता उनके उत्तर मंत्राी मौखिक रूप से नहीं देते, बल्कि उत्तर लिखकर प्रश्नकाल के बाद सदन की मेज पर रख देते हैं। इसमें पूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते हैं।

उत्तर (d) : संविधान में संसद सदस्यों को सदन में भाषण देने की स्वतंत्राता व बंदी बनाये जाने से मुक्ति आदि कुछ विशेषाधिकार का स्पष्ट उल्लेख है तथा इस विशेषाधिकार का भंग करना असंवैधानिक होता है। दूसरी ओर, संसद में किसी अन्य व्यक्ति के साथ जबरदस्ती प्रवेश का प्रयत्न, पर्चे फेंकना या संसद के आदेशों का उल्लंघन आदि कृत्य संसद की अवमानना कहे जाते हैं। 

उत्तर (e) (i) अनुच्छेद 249 के अनुसार, राज्यसभा विशेष बहुमत द्वारा राज्यसूची के किसी विषय पर संसद को कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है, यदि वह इसे राष्ट्रहित में आवश्यक समझे।
(ii) अनुच्छेद 312 के अनुसार, राज्यसभा विशेष बहुमत द्वारा नई अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की अनुशंसा कर सकती है। 

उत्तर (f) : व्यवस्थापिका के सदस्य द्वारा विवादास्पद या संदेहास्पद विषय पर व्यवस्थापिका में उठाया गया प्रश्न औचित्य-प्रश्न कहलाता है। इसके द्वारा सदस्य किसी कार्रवाई के नियमानुसार चलने या न चलने पर प्रश्न उठाते हैं। इसमें निर्णय का अधिकार अध्यक्ष के पास होता है।

प्रश्न 4. भारत सरकार के ऋणभार का परीक्षण कीजिए। क्या यह देश ऋण-जाल में ग्रस्त होता जा रहा है?

उत्तर : 1989 में भारत सरकार पर 62.5 विलियन डाॅलर का ऋण भार था। भारत का कुल बाह्य ऋण जो वर्ष 1980 में 26.61 अरब डाॅलर था, वह 1991 में बढ़कर 71.56 अरब डाॅलर हो गया। वर्ष 1990 में भारत का कुल विदेशी ऋण उसकी सकल राष्ट्रीय आय का 25 प्रतिशत था। वर्ष 1990 में भारत को अपनी निर्यात आय का 28.8 प्रतिशत ऋण सेवा मे व्यय करना पड़ा था। साथ ही, भारत का कुल ऋण उसकी निर्यात आय का 282.4 प्रतिशत था। इसी प्रकार, 1989 में भारत का ऋण भार उसकी सकल राष्ट्रीय आय का 24 प्रतिशत था और उसे अपनी निर्यात आय का 29.25 प्रतिशत ऋण सेवा में व्यय करना पड़ा था। रिजर्व बैंक व वित्त मंत्रालय के आकलन के अनुसार, 30 सितम्बर, 1992 को भारत के ऊपर 2,02,972 करोड़ रुपये का विदेशी ऋण था अर्थात् प्रत्येक भारतीय के सिर पर औसतन 2,339 रुपये के विदेशी ऋण का बोझ था। भारत के विदेशी ऋणों पर औसत ब्याज दर 1970 में 2.5 प्रतिशत थी, जो 1990 में बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई। भारत का कुल ऋण सेवा भुगतान, उसके वस्तव सेवाओं के कुल निर्यात के प्रतिशत में 1980 में 9.1 प्रतिशत से बढ़कर 1989 में 26.4 प्रतिशत हो गया। ऋणों पर ब्याज के रूप में भारत को 1991. 92 में 26,563 करोड़ रुपये चुकाना पड़ा, जो 1992. 93 में बढ़कर 32,500 करोड़ रुपये हो गया।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर भारत को विदेशी ऋण के जाल में फँसा हुआ मान लेना ठीक नहीं होगा। कोई भी देश विदेशी ऋण के जाल में फँसा हुआ तब तक नहीं माना जाता, जब तक कि उसे पुराना ऋण चुकाने के लिए नया ऋण न लेना पड़ता हो, वह देश समय पर ऋण की किस्तें चुकाने में विफल हो जाता हो तथा उसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में साख गिर जाती हो और उसे वित्त की व्यवस्था करने में कठिनाई होती हो। लेकिन भारत के समक्ष ऐसी स्थिति नहीं है। विश्व बैंक द्वारा जारी विश्व विकास रिपोर्ट में भी अति ऋण ग्रसत देशों की सूची में भारत का नाम नहीं है। लेकिन ऋण भार को देखते हुए भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। यह ठीक है कि देश के विकास की गति को तीव्र करने के लिए विदेशी ऋणों की आवश्यकता होती है, लेकिन यदि ऋण की संरचना, सीमा और शर्तों पर अंकुश न रखा जा सका तो वह आर्थिक संकट भी उत्पन्न कर सकता है। निर्यात क्षेत्रा में भी भारत काफी पीछे चल रहा हैं साथ ही, विदेशी ऋणों में लगातार वृद्धि से अर्थव्यवस्था बाह्य साधनों पर निर्भर करने लगती है और ऋणदाता देश या स्ंस्थायें देश की मौद्रिक व राजकोषीय नीति को प्रभावित करने लगती हैं। अतः भारत को अपने निर्यातों को बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास के साथ ही अपने गैर.विकासात्मक व्यय पर काबू पाना होगा ओर अनावश्यक आयातों में कमी करनी होगी। इसके अलावा आंतरिक साधनों व तकनीकों पर आधारित श्रम प्रधान रोजगारोन्मुख विकास योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी अन्यथा भारत के ऋण जाल में फँस जाने का खतरा एक दिन वास्तविकता में भी बदल सकता हैै।

प्रश्न 5. स्वतंत्राता के चालीस वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में जो प्रगति हुई है, उसकी विवेचना कीजिए। आपके विचार में, इस अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन क्या हुए हैं?

उत्तर : स्वतंत्राता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था काफी दयनीय व लगभग गतिहीनता की स्थिति में थी। इस स्थिति से उबरने के लिए नियोजित विकास की प्रक्रिया अपनायी गयी।  यदि आर्थिक विकास दर में वृद्धि की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था में स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद धीमी गति से प्रगति हुई है। पिछले चालीस वर्षों के दोरान समग्र रूप से देखा जाए तो विकास दर 4 प्रतिशत से कम ही रही है। अर्थव्यवस्था के सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश के कारण अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हुए, लेकिन रोजगार की आवश्यकताओं को देखते हुए ये बहुत कम थे। भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का आकलन संसाधनों के समान वितरण की वस्तुपरक दृष्टि से कर पाना काफी कठिन है। पिछले चालीस वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद कृषिगत उत्पादन में वृद्धि के लिए यथा संभव प्रयास किये गए। साठ के दशक में हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया। आधारभूत व भारी उद्योगों में भी पर्याप्त निवेश किया गया। इससे एक ओर भारी मात्रा में आयात प्रतिस्थापन हुआ तथा दूसरी ओर, गैर पारम्परिक वस्तुओं का निर्यात तेजी से बढ़ा। साथ ही, देश में उच्च स्तरीय तकनीक व प्रशिक्षित श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। आज भारत इस स्थिति में है कि वह सभी प्रकार की उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन कर सके। भारत सरकार द्वारा घोषित औद्योगिक नीति 1948, 1956, 1977 व 1980 ने औद्योगिक क्षेत्रा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल करने में उल्लेखनीय कार्य किया है। आत्मनिर्भरता के क्षेत्रा में हमारी एक प्रमुख असफलता विकासात्मक व्यय के चलते भी निरन्तर बढ़ता घाटा व प्रतिकूल भुगतान के क्षेत्रा में रही। योजनाकाल में यद्यपि, भारत के निर्योतों में काफी वृद्धि हुई और वे 1950 -51 में 606 करोड़ रुपये से बढ़कर 1990 -91 में 32 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गये। लेकिन आयातों में हुई तीव्र वृद्धि से व्यापार घाटा भी तेजी से बढ़ता गया। सरकार ने पिछले चालीस वर्षों में राजकोषीय व बजट नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये हैं। लेकिन उसकी विवशता सदैव घाटे की वित्त व्यवस्था रही है। इससे उद्यगों और व्यापार का विकास हुआ तथा आर्थिक विकास को बल मिला, लेकिन सामान्य वर्ग के व्यक्तियों की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ा। महंगाई बढ़ी तथा उनकी क्रय शक्ति में कमी आई। अपनी बजट नीति से आर्थिक विकास सम्बन्धी उद्देश्यों की पूर्ति में भी सरकार को विशेष सफलता नहीं मिली है। यद्यपि भारत ने गत चालीस वार्षों में अपने आर्थिक विकास के लिए विभिन्न नीतियों का सहारा, आर्थिक नीति के तहत लिया और उसे बहुत कुछ सफलता भी मिली, लेकिन नीतियों के दोषपूर्ण कार्यान्वयन के कारण सफलता की जिस स्थिति में भारत को होना चाहिए था, वहाँ नहीं पहुँचा जा सका है। भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी योजना की सही उपयोग नहीं कर पाई है। 

प्रश्न 6. ‘निर्देशित कीमतें’ क्या होती हैं, उसकी भूमिका क्या है? सामान्य कीमत स्तर पर उनके प्रभाव का परीक्षण कीजिए।

उत्तर: सरकार द्वारा कुछ आवश्यक वस्तुओं के नियंत्रित अथवा विनियमित मूल्यों को प्रशासित मूल्य या निर्देशित कीमत ;।कउपदपेजमतमक च्तपबमेद्ध कहा जाता है। इनका भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में गहरा प्रभाव है। इसे वास्तविक आय के वितरण में सुधार हुआ है और सामाजिक समानता के उच्च स्तर को पाने की दिशा में सफलता मिली है। प्रशासित मूल्यों के अन्तर्गत एक विस्तृत क्षेत्रा, जैसे-उत्पाद, सेवायें, मजदूरियाँ, वेतन व ब्याज की दरों के भुगतान जैसे वित्तीय उपकरण आदि आते हैं। यह उपक्रमों की कार्यक्षमता, उत्पादकता और उनके समग्र निष्पादन में सुधार लाता है। प्रशासित मूल्यों के द्वारा समाज के कमजोर वर्गों के लिए आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था सम्भव हो पाती है। मुद्रा स्फीति के लिए केवल प्रशासित मूल्यों को ही उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। गैर प्रशासित मूल्यों की तुलना में प्रशासित मूल्यों का मुद्रा-स्फीति में प्रत्यक्ष योगदान औसत रूप में 2.16 प्रतिशत प्रतिवर्ष है, जबकि गैर-प्रशासित मूल्यों का योगदान औसत रूप में 5.68 प्रतिशत प्रतिवर्ष है। थोक मूल्य सूचकाँक में शामिल कुल वस्तुओं में प्रशासित मूल्यों के लिए शामिल वस्तुओं का प्रतिशत केवल 25 प्रतिशत है, जो कि 
52 प्रतिशत मुद्रा-स्फीति  बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। प्रशासित मूल्य सामान्य मूल्य स्तर को प्रभावित करते हैं, लेकिन इसके अलावा अन्य ऐसे अनेक कारक होते है, जो मुख्य रूप से मुद्रा.स्फीति के लिए उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 7. भारत सरकार के योजनेत्तर व्यय के प्रमुख घटक क्या है? इस व्यय में हाल ही की बढ़ती हुई प्रवृत्तियों पर विवेचन कीजिए।

उत्तर : ऐसा व्यय जो कि अर्थवयवस्था के विकास में योगादान नहीं देता योजनेत्तर व्यय (गैर-योजना व्यय) कहलाता है। इसमें राजस्व व्यय ;त्मअमदनम म्गचमदकपजनतमद्ध तथा पूँजी व्यय ;ब्ंचपजंस म्गचमदकपजनतमद्ध दोनों ही सम्मिलित होते हैं। राजस्व व्यय के संघटक हैं- ब्याज का भुगतान, रक्षा व्यय, कृषकों को ऋण में छूट, खाद व उवर्रकों आदि पर दिये जाने वाले अनुदान, डाक घाटा, सेवा निवृत्त कर्मचारियों को पेंशन, राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों के विकास के उद्देश्य से सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं, आर्थिक तथा अनुदान व सहायता आदि पर व्यय। पूँजी व्यय के अन्तर्गत रक्षा पूँजी, अन्य गैर-योजना पूँजी लागत, सार्वजनिक उद्यमों को ऋण तथा राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों को ऋण आदि आते हैं।
हाल के कुछ वर्षों में योजनेत्तर व्यय बहुत तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में सामान्य प्रशासनिक व्यय, सुरक्षा व्यय, ब्याज के भुगतान व खाद-उर्वरक अनुदान आदि सरकारी व्यय की सबसे बड़ी मंदे हैं। विगत वर्षों के आकड़ों को देखा जाए तो योजना व्यय की तुलना में योजनेत्तर व्यय कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है तथा यह कुल व्यय के एक बड़े भाग को अपने में समाहित कर लेता है। 1981. 82 से 1990 . 91 के दौरान योजना व्यय में दो गुना से कुछ अधिक की वृद्धि हुई, तो वहीं योजनेत्तर व्यय साढ़े चार गुना से अधिक बढ़ा। इसी अवधि में कुल व्यय में योजना व्यय का प्रतिशत 42 से घटकर 31.9 पर आ गया, जबकि योजनेत्तर व्यय का प्रतिशत 58 से बढ़कर 68.1 हो गया। वर्ष 1990 में सुरक्षा व्यय व ब्याज भुगतान पर होने वाला व्यय की कुल व्यय का क्रमशः 14 व 18 प्रतिशत होगा। यद्यपि योजनेत्तर व्यय में निरन्तर वृद्धि हो रही है लेकिन इस प्रकार का व्यय अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों के विकास में अप्रत्यक्ष रूप से सहायक होता है।

प्रश्न 8. बचत व निवेश में उन्नत दरों के होते हुए भी भारत अपनी वृद्धि दर में कमी महसूस कर रहा है। ऐसा क्यों?

उत्तर : विकास की साधारण मान्यता है कि बचतें आर्थिक विकास प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इसलिए आर्थिक योजनाओं व नीतियों का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक विकास दर की गति को बढ़ाना होता है। लेकिन भारत के संदर्भं में यह देखने में आया है कि बचतों व विनियोग की दर उच्च होने के बावजूद विकास दर (वार्षिक 3.5 प्रतिशत पर स्थिर) कम हैं यदि बजट के क्षेत्रा में देखा जाए तो भारत में निम्न प्रति व्यक्ति आय की दशाओं में भी उच्च बजट की दर प्राप्त कर ली है। प्रथम योजना के प्रारम्भ में सकल घरेलू बचत की दर मात्रा 10.4 प्रतिशत थी तथा यह 1987 . 88 के आते.आते 19.6 प्रतिशत तक पहुँच गई। साथ ही इस काल मे पूँजी निर्माण की दर भी 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, लेकिन सूक्ष्मता से देखा जाए तो बचतों के स्तर में दिखाई देने वाला यह सुधार वास्तविक आय में वृद्धि के कारण नहीं है, अपितभुगतान व मुद्रा-स्फीति जैस बाह्य तत्वों का परिणाम हैं। विनियोग क्षेत्रा में देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि भारत में विनियोग वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं, जिसके कारण बढ़ी हुई बचतों का प्रभाव कम हो गया है और विकास को वांछित प्रोत्साहिन नहीं मिल पाया है। अर्थव्यवस्था की विनियोग प्रक्रिया उच्च, मध्यम व धनाढ्य वर्ग की मांग प्रक्रिया को निर्देशित करती है तथा तेजी से अधिक पूँजी विनियोग होता है। राष्ट्रीय उत्पादन की उच्च विकास दर के लिए अर्थव्यवस्था को दो बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए-(अ) विनियोग की दर को बढ़ाना और (ब) सीमांत पूँजी उत्पत्ति अनुपात को कम करना। उल्लेखनीय है कि प्रथम योजना में पूँजी उत्पत्ति अनुपात 3 प्रतिशत था, जो कि चैथी योजना में 6 प्रतिशत पर चला आया। इसे कम करने के लिए कार्यकुशलता में वृद्धि करना अनिवार्य होगा। साथ ही, जनसंख्या की अप्रत्याशित वृद्धि विकास की निम्न दर का एक प्रमुख कारण है, क्योंकि अतिरिक्त विनियोग का अधिकांश भाग बढ़ती जनसंख्या की उपभोग जरूरतों को पूरा करने में व्यय हो जाता है।

प्रश्न 9.  पिछड़े क्षेत्र के विकास कार्यक्रम अपनाने में आर्थिक तर्काधार क्या है? इस दिशा में सरकार ने जो विशिष्ट उपाय अपनाये हैं, उनका विवेचन कीजिए।

उत्तर : भारत में  विभिन्न क्षेत्राीय भिन्नतायें विद्यमान हैं, जैसे-प्रति व्यक्ति आय की दर, निर्धानता से नीचे या ऊपर रहने वाले लोगों का अनुपात, कृषि कार्य में लगे लोग, कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का प्रतिशत, विनिर्माण उद्योगों में कार्यरत लोगों का प्रतिशत आदि। इसी प्रकार कुछ राज्य दूसरों की अपेक्षा पिछड़े हुए हैं। क्षेत्राीय असंतुलन राज्य में तथा अंतर्राज्यीय दोनों स्तरों पर है। भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश की सुव्यवस्थित उन्नति के लिए संतुलित विकास आवश्यक है। कुछ चुने क्षेत्रों का विकास करके संतुलित विकास करना संभव नहीं है। अतः पिछड़े क्षेत्रा के विकास की ओर ध्यान देना परमाश्वयक है। इसके लिए पंचवर्षीय योजनाओं में भारत सरकार ने पर्याप्त ध्यान दिया है। कुछ कार्यक्रम निम्नलिखित हैंः
(1) सामुदायिक विकास कार्यक्रम द्वारा गांवों में विस्तार व विकास प्रक्रिया को बढ़ावा।
(2) आठवें दशक में सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों के विकास हेतविशेष कार्यक्रम।
(3) रेर्गिस्तान क्षेत्रा के विकास हेतविशेष कार्यक्रम।
(4) निर्धन ग्रामीण को रोजगार सुलभ करने के लिए 1977 में ‘काम के बदले अनाज‘कार्यक्रम।
(5) 1980 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम ।
(6) पर्वतीय, जनजातीय, निर्धन व असुविधाग्रस्त क्षेत्रों में क्षेत्रातीय विषमताओं को कम करने के लिए विभिन्न उपयोजनायें आरम्भ।
(7) ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, विद्युतीकरण व सड़क निर्माण कार्यक्रम को प्राथमिकता।
(8) कृषि सम्बन्धी औद्योगिक निवेश के प्रोत्साहन के लिए कम विकसित क्षेत्रों को आसान शर्तों पर ऋण, आर्थिक सहायता व वित्तीय रियायतें।
(9) ग्रामीण बेरोजगारों के लिए 1979 में ट्राइसेम योजना आरम्भ।
10. गरीबी दूर करने हेत1983 में भूमिहीन ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम आरम्भ।

इसके अलावा पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतउठाये गये और कुछ कदम हैं।
(1) पिछड़े क्षेत्रों की पहचान करके केन्द्र से राज्यों को वित्तीय साधनोें का स्थानान्तरण।
(2) पिछड़े क्षेत्रों में निजी क्षेत्रा को विनियोग हेतप्रोत्साहन। इसके लिए उन्हें राजकोषीय व अन्य सुविधाओं में प्राथमिकता, जैस-आयकर में रियायतें, केंद्रीय विनियोग रियायत योजना, परिवहन रियायत योजना, एम.आर.टी.पी/फेरा कंपनियों को उदार नियायतें व आई.डी.बी.एफ., आई.एफ.सी.एफ., आई.सी.आई.सी.आई. आदि वित्तीय संस्थाओं से रियायती वित्त की सुविधायें।

प्रश्न 10. उच्च लागत अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है? कया भारत उच्च लागत अर्थव्यवस्था के रूप में विकसति हुआ है? यदि हुआ है, तो कैसे हुआ है?

उत्तर : उच्च लागत अर्थव्यवस्था से तात्पर्य ऐसी अर्थव्यवस्था से है, जहाँ वस्तुओं की उत्पादन लागत उच्च होती है, जिससे वस्तबाजार में वस्तुओं के मूल्य भी ऊँचे रहते हैं। गत दो दशकों से भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास एक उच्च लागत अर्थव्यवस्था के रूप में हुआ है। इसके लिए मुख्य रूप से करारोपण की उच्च दर, कृषि व औद्योगिक क्षेत्रों में निम्न उत्पादकता, कोयला, विद्युत, सीमेन्ट, लोहा, इस्पात व पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि व परिवहन लागतों में वृद्धि आदि उत्तरदायी हैं। इन आधारभूत वस्तुओं की लागतों में वृद्धि से अन्य वस्तुओं की लागतों में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। यह एकदम सत्य है कि निम्न लागत पर अधिक वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन के लिए भारत के पास पर्याप्त मानव संसाधन, प्राकृतिक संसाधन व पूँजी उपकरण हैं। योजना व योजनेत्तर व्यय के लिए सरकार ऊँची दरों के उत्पाद शुल्क व सीमा शुल्क आदि लगाती है, जिससे अर्थव्यवस्था उच्च लागत वाली हो जाती है। पुरानी तकनीक, रख-रखाव की उच्च लागत और प्रायः होने वाली यांत्रिक गड़बड़ियाँ, कृषि व औद्योगिक क्षेत्रा में निम्न उत्पादकात का कारण हैं। कृषि भूमि पर बढ़ता जनसंख्या दबाव, छोटे-छोटे खेत, जीवन निर्वाह हेतखेती आदि कारक कम आय, कम बचत तथा कम विनियोग की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। सरकारी तंत्रा भ्रष्टाचार के कारण लाइसेंस, कोटा आदि प्राप्त करने के लिए किये गए गैर-कानूनी व्यय का प्रभाव भी अन्ततः उत्पादन लागत पर ही पड़ता है। उत्पादकता की अपेक्षा मजदूरी दरों में तीव्र वृद्धि भी उच्च लागतों का एक प्रमुख कारण है। इन सभी कारणों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उच्च लागत अर्थव्यवस्था में बदलने में अपना योगदान दिया है।

प्रश्न 11. सन् 2010 में कृषि के वांछित विकास के लिए सुझाव दें।

उत्तर : सन् 2000 में भारत में जनसंख्या के 1 अरब से अधिक होने का अनुमान है। इतनी जनसंख्या तथा आय बढ़ने से उपभोक्ता स्तरों में होने वाले सुधारों को देखते हुए सन् 2000 में 24.5 करोड़ टन खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ेगी।

  • कृषि का वांछित विकास दीर्घावधि में केवल क्षेत्राीय दृष्टि से अधिक व्यापक आधार वाले प्रगति के स्वरूप से ही संभव हो सकता है, जिसके लिए वर्षा सिंचित इलाकों पर और अधिक ध्यान देना होगा तथा इन इलाकों पर अधिकाधिक संसाधन लगाने होंगे। खेती के लिए विकसित सिंचाई सुविधाओं का कुशल उपयोग करना होगा और वर्षा पर आधारित व सिंचित क्षेत्रों दोनों ही के लिए आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक तकनीकों का निरंतर प्रवाह बनाए रखना होगा।
  • समान कृषि जलवायक्षेत्रों के संपर्क में कृषि नियोजन की अवधारणा में तेजी लानी होगी और इसे संस्थागत स्वरूप प्रदान करना होगा।
  • ऊर्जा के प्रत्यक्ष उपयोग तथा उर्वरकों के जरिए इसके अप्रत्यक्ष उपयोग से कृषि का ऊर्जा-घनत्व बढ़ रहा है। भूमि पर दबाव और रोटी, कपड़ा व अन्य कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए उत्पादकता बढ़ाने की अनिवार्यता का मतलब है कि ऊर्जा का घनत्व और भी बढ़ेगा। इसलिए ऊर्जा के उपयोग की कुशलता में सुधार करने के लिए व्यापक प्रयास करने होंगे।
  • जल का कुशल उपयोग और उर्वरकों का कुशल उपयोग, दो ऐसे क्षेत्रा है जिस पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
  • जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में अनुसंधान के लिए अधिक निवेश करना जरूरी है ताकि संवर्धनात्मक आनुवांशिकी तथा जैविक विधियों से समन्वित पोषक तत्व व कीट प्रबंध संभव हो सके।
Offer running on EduRev: Apply code STAYHOME200 to get INR 200 off on our premium plan EduRev Infinity!

Related Searches

Summary

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

past year papers

,

Extra Questions

,

practice quizzes

,

Free

,

Previous Year Questions with Solutions

,

ppt

,

Important questions

,

study material

,

shortcuts and tricks

,

Semester Notes

,

pdf

,

Objective type Questions

,

Sample Paper

,

Exam

,

mock tests for examination

,

video lectures

,

MCQs

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

Viva Questions

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

;