सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 12 से 23 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 16 (प्रश्न 12 से 23 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 12. कृषि और में जैव तकनीक से क्या लाभ हुई।

उत्तर: जैव तकनीक से लाभ

  • पौधों में आनुवंशिक परिवर्तनों से उन्हें मृदा तथा जलवायकी प्रतिकूल परिस्थितियों से जैव दबावों का मुकाबला करने योग्य बनाया जा सकता है। इस प्रकार फसल को दुगुना करने के लिए पर्यावरण संबंधी दबावों के प्रति पौधों की भौतिक प्रतिक्रिया तथा उनकी बनावट में संशोधन करने की उत्पादन प्रणालियों में पूरक सहभागी के रूप में सहयोगी बना सकते है।
  • जैव टेक्नोलाजी की संभवतः सबसे महत्वपूर्ण विशेषता, जो उसे हरित क्रांति अथवा बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी से बेहतर बनाती है, वह है नाइट्रोजन के जैविक निर्धारण, जैव उर्वरक तथा कीड़ों का मुकाबला करने की क्षमता के कारण कीटनाशक दवाओं और उर्वरकों जैसी वस्तुओं की बचत।
  • जैव टेक्नोलाजी लागू हो जाने से हरित क्रांति टेक्नोलाजी से जुड़े ”रासायनीकरण“ का स्थान ”आनुवांशिक इंजीनियरी“ ले लेगी। जैव टेक्नोलाजी में बीच का केन्द्रीय स्थान है।
  • फसलों के नुकसान को कम करके वास्तविक तथा संभावित पैदावार में अंतर कम करती है और हरित क्रांति की तुलना में अधिक व्यापक क्षेत्रा में उपयोगी हो सकती है, क्योंकि हरित क्रांति टेक्नोलाजी का इस्तेमाल केवल अनुकूल जलवायवाले क्षेत्रों में किया गया। बीज तैयार करने की परंपरागत विधियों की तुलना में इसमें नए बीज विकसित करने में अधिक कार्यकुशलता तथा समय की बचत के कारण टेक्नोलाजी में प्रगति की दर अधिक रहने की संभावना है।

जैव तकनीक से कृषकों को लाभ/हानि

  • बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी की भांति खेत के छोटा या बड़ा होने से इसकी उपयोगिता पर कोई असर नहीं पड़ता। इससे रासायनिक आदानों की बचत होती है, पैदावार में स्थिरता आती है और प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों में इसके इस्तेमाल की बेहतर संभावनाएं है।
  • परन्तनिर्धनों के हित की इसकी क्षमताओं का उपयोग अनुसंधान के लिए प्राथमिकताओं के निर्धारण पर निर्भर करता है। इसका कारण यह है जैव टेक्नोलाजी से अनेक प्रकार के वैकल्पिक अवसर प्राप्त होते है जिन्हें गरीबों के हितों के विरुद्ध भी बनाया जा सकता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है कीड़ों का मुकाबला कर सकने और कीटनाशक दवाओं का मुकाबला कर सकने वाली किस्मों में से चुनाव करना। पहले प्रकार के बीज निर्धन लोगों के लिए हितकर तथा पर्यावरण संरक्षण में सहायक है। अतः इनसे कीटनाशक दवाओं की बचत होती है जबकि दूसरी तरह के बीजों से कीटनाशक दवाओं का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा हो सकता है।

जैव तकनीक और अनुसंधान कार्यनीति

  • जैव तकनीक में अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्रा में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिए सही प्राथमिकताएं निर्धारित करने में विकासशील देशों की सरकारों की भूमिका हरित क्रांति टेक्नोलाजी में अनुसंधान में निभाई गई भूमिका से कहीं अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि क्षेत्रा में अधिक हिस्सा प्रतिकूल परिस्थितियों वाले इलाकों का है। अतः प्रगति तथा न्याय दोनों दृष्टियों से इन परिस्थितियों के अनुरूप टेक्नोलाजी विकसित करने में निवेश करना वांछनीय होगा।
  • आधुनिक जैव टेक्नोलाजी से संभावनाओं के जो नए द्वार खुले है, उन्हें देखते हुए कृषि अनुसंधान में इस निवेश की लाभप्रदता बढ़ गई है क्योंकि पूर्वी भारत जैसे प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में वास्तविक तथा संभावित पैदावार में बहुत अधिक अंतर है।
  • जैव टेक्नोलाजी से अनेक तरह के विकल्प उपलब्ध होने के फलस्वरूप अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए भी नई टेक्नोलाजी के विकास में योगदान करने की गुंजाइश बढ़ गई है। अर्थशास्त्री अभी तक नई बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी अपनाए जाने के बाद के परिणामों का ही विश्लेषण करते रहे है। कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से उचित टेक्नोलाजी के विकास में तथा नीति निर्धारण स्तर पर उनका योगदान बहुत कम रहा है। अतः उचित टेक्नोलाजी विकसित करने तथा कृषि टेक्नोलाजी की नीति तय करने के लिए कृषि अर्थशास्त्रियों और कृषि वैज्ञानिकों के सामूहिक योगदान की दिशा में प्रयास करना अब आवश्यक है।

प्रश्न 13. भारत में कृषि के प्रकार का वर्णण करें।

उत्तर : जलवायु, मिट्टी, प्राकृतिक दशा आदि की भिन्नता के कारण भारतीय कृषि को 6 प्रकारों में विभाजित किया जाता है -

(1) तर कृषि - 200 सें. मी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रा में वर्ष में एक से अधिक बार फसल उत्पन्न करने वाली कृषि को तर कृषि कहा जाता है। इसके अन्तर्गत - गन्ना, धान, जूट की कृषि बिना सिंचाई के की जाती है। यह कृषि प. बंगाल, मालाबार तट, पूर्वी मध्य हिमालय आदि में की जाती है।

(2) आद्र्र कृषि - 100-200 सें. मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहाँ पर काँप तथा काली मिट्टी उपलब्ध होती है, वर्ष में दो फसलें उत्पन्न की जाती है। इस कृषि को आद्र्र कृषि कहते है। मध्य प्रदेश तथा मध्य गंगा के मैदान में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

(3) सिंचित कृषि - 50-100 सें. मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। सिंचित कृषि गंगा के पश्चिमी मैदान, उत्तरी तमिलनाडतथा दक्षिणी भारत की नदियों के डेल्टाई भागों में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत - गेहूँ, चावल, गन्ना, जौ आदि की कृषि की जाती है।

(4) शुष्क कृषि - 50 सें. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि को शुष्क कृषि कहा जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात आदि में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत ज्वार, बाजरा, गेहूँ, जौ आदि की कृषि की जाती है।

(5) पहाड़ी कृषि - पहाड़ी क्षेत्रों में पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर जो कृषि की जाती है, उसे पहाड़ी कृषि कहते है। असम तथा हिमालय के क्षेत्रा में यह कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत - धान, चाय तथा आलू की कृषि की जाती है।

(6) झूम कृषि - पर्वतीय क्षेत्रों में वन को साफ कर दो-तीन वर्ष तक एक स्थान पर कृषि कर, उसको त्याग कर फिर दूसरे स्थान पर कृषि की जाती है। इस प्रकार की जाने वाली कृषि को झूम कृषि कहते है। असम में ‘झूम’, मध्य प्रदेश में ‘डाह्या’, हिमालय के क्षेत्रा में ‘खील’, पश्चिमी घाट में ‘कुमारी’, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में ‘वालरा’ के नाम से इस कृषि को जाना जाता है।

झूम कृषि के दोष - (i) मृदा अपरदन
(ii) वन संपत्ति और जैव विविधता को हानि
(iii) मौसम परिवर्तन - शुष्कता का विस्तार
(iv) पर्यावरण संतुलन को खतरा

उपाय - (i) झूम कृषि को स्थायी कृषि में परिवर्तन करना
(ii) झूमियों को कृषि तकनीक और अधःसंरचना प्रदान करना
(iii) पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार कृषि को बढ़ावा देना

  • सरकारी योजना - झूम कृषि पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए केन्द्र प्रायोजित योजना अरुणाचल प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड , उड़ीसा और त्रिपुरा में चलाया जा रहा है। इस समन्वित कार्यक्रम में झूम कृषि करने वाले परिवारों का स्थाई बसाव, झूम कृषि को स्थाई कृषि, सीढ़ीदार कृषि, बागानी कृषि और सामाजिक वानिकी एवं पशुपालन में तब्दील करने पर जोर दिया जा रहा है।

प्रश्न 14. चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, गन्ना, कपास, जूट, चाय, तंबाकू, कहवा, रबर के उत्पादन की भौगोलिक दशाओं, क्षेत्रा और इसके उत्पादन में वृद्धि के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयासों का उल्लेख करें।

उत्तर: चावल
भौगोलिक दशाएँ -
 चावल उष्ण एवं उपोष्ण कटिबन्धीय पौधा है। इसे अधिक तापमान तथा आद्र्रता की आवश्यकता होती है। बोते समय 200 सें. ग्रे., बढ़ते समय 240 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 270 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। 75 से 200 सें. मी. वर्षा तथा डेल्टा, बाढ़ आदि की जलोढ़ मिट्टी, कुशल श्रम आदि चावल की कृषि के लिए आवश्यक है।

क्षेत्रा - चावल की कृषि मुख्य रूप से उत्तरी तथा पूर्वी भारत में की जाती है। पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि में चावल की कृषि की जाती है।

उत्पादन - 1994-95 में चावल का उत्पादन रिकार्ड स्तर 81.8 मिलियन टन तक पहुँच गया जो लक्ष्य से भी अधिक था। सन् 2000 .02 में 93.1 मी. टन. हो गयी। और सन् 2002 - 03 का अनुमान 77.7 मिलियन टन है। 

  • चावल उत्पादकता में वृद्धि के लिए ”चावल क्षेत्रों में समन्वित खाद्यान्न विकास कार्यक्रम“ (ICDP)  चलाया जा रहा है। केन्द्र प्रायोजित इस योजना में केन्द्र की सहभागिता 75% और संबंधित राज्य की 25% है। यह कार्यक्रम वर्तमान में देश के उन 1200 प्रखंडों में चलाया जा रहा है जहाँ चावल की उत्पादकता राष्ट्रीय दर से कम है।

गेहूँ
भौगोलिक दशाएँ - 
गेहूँ समशीतोष्ण कटिबंधीय पौधा है। इसके बोते समय सर्द-शुष्क, विकास के समय नम तथा पकते समय उष्ण एवं शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। बोते समय 200 सें. ग्रे., बढ़ते समय 160 सें. ग्रे. तथा पकते समय 220 से. ग्रे. तापमान, 50 से 75 सें. मी. वर्षा, दोमट, चिकनी तथा काली मिट्टी गेहूँ की कृषि के लिए आवश्यक होती है।

क्षेत्र - उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, गुजरात आदि में गेहूँ की कृषि की जाती है।

  • देश में गेहूँ का प्रति हैक्टेयर उत्पादन 2493 कि. ग्रा. है। देश के कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में गेहूँ उत्पादकता में वृद्धि के लिए केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम ”गेहूँ उपज क्षेत्रों में समन्वित खाद्यान्न विकास कार्यक्रम“ चलाया जा रहा है।
  • 1997.98 के दौरान गेहूं के उत्पादन में भारत अमेरिका से आगे निकल गया है तथा विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।

मोटे फसल
ज्वार -
 यह उष्ण जलवायका पौधा है। बोते समय 80-100 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 240-300 से. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। इसकी कृषि कम वर्षा वाले क्षेत्रा में की जाती है। दोमट मिट्टी ज्वार की कृषि के लिए अधिक उपयोगी होती है। इसकी कृषि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान आदि में की जाती है।

बाजरा - इसे बोते समय 100-120 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 250-310 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगायी जाती है। इसकी कृषि पश्चिमी समतल मैदान से लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडआदि के पठारी भागों में की जाती है।

  • मोटे अनाजों की उत्पादकता में वृद्धि के लिए केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम - ”मोटे अनाजों के उपज क्षेत्रा में समन्वित अनाज विकास कार्यक्रम“ चलाया जा रहा है।

नकदी फसल
गन्ना - 
यह उष्णाद्र्र जलवायका पौधा है। प्रारम्भ में 200 सें. ग्रे. और विकास के समय 200-250 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। 100 सें. मी. वर्षा, जीवांशयुक्त जलोढ़ मिट्टी एवं समतल धरातल गन्नों की कृषि के लिए उपयोगी है। गन्नों के उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। प्रादेशिक दृष्टि से गन्नों के उत्पादन में उत्तर प्रदेश का प्रथम, महाराष्ट्र का द्वितीय तथा तमिलनाडका तृतीय स्थान है। गन्ना उत्पादक प्रमुख राज्य - उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, बिहार, प. बंगाल, पंजाब है।

  • 1995 में गन्ना का उत्पादन 282.9 मिलियन टन हुआ। 

कपास - इसकी कृषि के लिए 150 से 200 सें. ग्रे. तापमान, 200 दिन पालारहित मौसम, 50 से 100 सें. मी. वर्षा, विकास के समय उच्च तापमान, स्वच्छ आकाश, शुष्क जलवायु, काली तथा कछारी दोमट मिट्टी आवश्यक है। 70 प्रतिशत कपास की कृषि दक्षिणी भारत में की जाती है। कपास उत्पादन में गुजरात का प्रथम स्थान है। गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है।

  • कपास उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के लिए 11 कपास उत्पादक राज्यों में केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम ”गहन कपास विकास कार्यक्रम“ प्ब्क्च् चलाया जा रहा है।

जूट - यह उष्ण कटिबन्धीय जलवायका पौधा है। इसकी कृषि के लिए 270 सें. ग्रे. तापमान, 159 सें. मी. वर्षा, जलोढ़ मिट्टी, पानी के निकासयुक्त धरातल आदि आवश्यक हैं। जलवायकी दशाओं की आदर्श स्थिति, उर्वरक, जलोढ़ मिट्टी, उपयुक्त तापमान आदि कारकों के कारण महानदी के डेल्टाई भाग से लेकर गंगा नदी की डेल्टा, तिस्ता नदी का मैदानी क्षेत्रा, ब्रह्मपुत्रा की घाटी में जूट की कृषि की जाती है। कपास उत्पादन में पश्चिम बंगाल का प्रथम स्थान है। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में इसकी कृषि की जाती है।

  • जूट उत्पादन, उत्पादकता और रेशे की गुणवता को उन्नत करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 8 जूट उत्पादक राज्यों में ”विशेष जूट विकास कार्यक्रम“ चलाया जा रहा है।

तम्बाकू कृ तम्बाकू एक व्यापारिक फसल है। इसके उत्पादन में भारत का तृतीय स्थान है। इसकी कृषि के लिए 220C तापमान, 100 सें. मी. वर्षा, दोमट और बलुई दोमट मिट्टी, सस्ते एवं अधिक श्रमिक की आवश्यकता होती है। इसका उत्पादन आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, प. बंगाल, बिहार, पंजाब राज्यों में होता है।

उत्पादन - वर्जिनिया तम्बाकू मुख्यतः आन्ध्र प्रदेश में और बीड़ी तम्बाकू मुख्यतः गुजरात में होता है। 
बागानी फसल

चाय - यह उद्यान की कृषि में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके लिए 180 से 240 सें. ग्रे. तापमान, 150 सें. मी. वर्षा, ढालूदार पर्वतीय मैदान, जीवांशयुक्त उर्वरा मिट्टी आदि भौगोलिक परिस्थितियाँ आवश्यक है। इसकी पत्तियों को सूखने के लिए 900 सें. ग्रे. तापमान उपयुक्त होता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक एवं निर्यातक देश है। असम, पश्चिम बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा राज्यों में 75 प्रतिशत चाय का उत्पादन किया जाता है। भारत का सर्वाधिक चाय का क्षेत्रा तथा उत्पादन असम में होता है। भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में - कांगड़ा, कुल्लू क्षेत्रा, देहरादून, नैनीताल, गढ़वाल, अल्मोड़ा आदि में चाय की कृषि की जाती है। दक्षिणी भारत में - मालावार के तट के पहाड़ी ढाला , नीलगिरि, मदुराई, तिरुनेवेली, कोयम्बत्तूर, रत्नागिरि, सतारा, शिवभोगा में चाय की कृषि की जाती है।

काॅफी/कहवा
यह एक बागानी फसल है। इसकी कृषि के लिए 160 सें ग्रे. से 270 से. ग्रे. तापमान, 150 से 225 सें. मी. वार्षिक वर्षा, लोहा और चूनायुक्त मिट्टी आवश्यक है।

  • कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल राज्यों में कहवा की कृषि वृहत्-स्तर पर की जाती है। इसके अलावा महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, अण्डमान निकोबार, असम, पश्चिम बंगाल में कहवा की कृषि की जाती है।

रबर

  • यह बागानी फसल है जिसका विकास भारत में तीव्र गति से किया जा रहा है। इसकी कृषि के लिए 270 सें. ग्रे. तापमान, 200-250 सें. मी. वार्षिक वर्षा, सूर्य का तीव्र प्रकाश, गहरी दोमट, लाल, लेटराइट मिट्टियाँ आवश्यक है। रबर के उत्पादन में भारत का विश्व में 5वां स्थान है। केरल राज्य का उत्पादन में प्रथम स्थान है।
  • 95% रबर उत्पादन क्षेत्रा केरल में है। इसके अलावे तमिलनाडु, कर्नाटक, अण्डमान-निकोबार में इसकी कृषि की जाती है।

प्रश्न 15. भारत में बागानी कृषि का महत्व, उत्पादन में वृद्धि के लिए समुचित तकनीक और इसके विकास के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयासों का वर्णन करें ।

 उत्तर: बागानी कृषि का महत्व - देश के कुल कृषि क्षेत्रा 14 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर में से 10 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा बारानी कृषि के अंतर्गत आता है। कुल कृषि उत्पादन में इन क्षेत्रों का योगदान 40% खाद्यान्न, 80% मक्का या ज्वार, 90% बाजरा और लगभग 95% दालों तथा 75% तिलहनों का रहा है। इसी प्रकार देश का 70% कपास उत्पादन और लगभग समूचे पटसन का उत्पादन वर्षा आधारित स्थितियों में होता है।

  • वर्षा पर निर्भर महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन और उनकी उत्पादकता में वृद्धि बहुत धीमी रही है। अतः

- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा,
- क्षेत्राीय और पौष्टिक असंतुलन को दूर करने,
- कृषि आधारित उद्योगों के विकास और
- भीतरी इलाकों में व्यापक स्तर पर ग्रामीण रोजगार पैदा करने के लिए बागानी और वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों की तरफ अधिक ध्यान देना होगा।

बागानी कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए समुचित तकनीकः
(i) भूमि और वर्षा जल प्रबन्ध: इसके लिए दो विधियाँ अपनाई जाती है -
(क) खेत पर वर्षा जल प्रबन्ध और
(ख) तालाबों के जरिये वर्षा जल का संरक्षण और उसे पुनः खेतों में सिंचाई के लिए इस्तेमाल करना।
(ii) परिष्कृत फसल उत्पादन पद्धतियांः इसके महत्वपूर्ण घटक इस प्रकार है -
(क) समुचित और समय पर जुताई
(ख) जल्दी बोआई
(ग) उपयुक्त फसलों और वनस्पतियों का चयन
(घ) पौधों की संख्या में अधिकतम वृद्धि
(ङ) समय पर खरपतवार नियंत्राण
(च) उर्वरकों का समुचित इस्तेमाल
(iii) प्रभावकारी फसल चक्र का इस्तेमाल
(क) अन्तर फसल प्रणाली
(ख) दोहरी फसल प्रणाली
(iv) भूमि के वैकल्पिक इस्तेमाल की प्रणाली
(क) कृषि वानिकी
(ख) वन चारागाह और
(ग) कृषि बागवानी का प्रयोग

सरकारी नीतियाँ

  • बागानी कृषि के उत्पादन और उत्पादकता में सुधार लाने के उद्देश्य से केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में सातवीं योजना के दौरान वर्ष 1986-87 से ”राष्ट्रीय जल विभाजक विकास कार्यक्रम“ शुरू किया गया जो देश के 16 राज्यों के 99 जिलों में चलाया जा रहा है। देश के 127 कृषि जलवायक्षेत्रों में से 115 कृषि जलवायक्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू है।
  • जल विभाजक कार्यक्रम के अंतर्गत वर्षा जल के प्रबंध, भूमि के विकास, सूखा प्रतिरोधी किस्मों के सुधरे बीजों और उर्वरकों के इस्तेमाल, वनारोपण, पशुपालन और संबंधित कार्यक्रम चलाये जा रहे है।

प्रश्न 16. प्रथम गोलमेज सम्मेलन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: प्रथम गोलमेज सम्मेलन नवम्बर 1930 ई. ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 ई. को प्रथम गोलमेज सम्मेलन इंग्लैण्ड में बहुत उत्साह से आयोजित किया। इस सम्मेलन में मुख्यतः ब्रिटेन द्वारा मनोनीत सदस्यों ने भाग लिया। संघीय व्यवस्था प्रश्न पर सहमति हुई, जिसमें प्रांतों को स्वायत्तता दी गई। लेकिन धार्मिक और अन्य वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व एक ऐसा विषय था जिस पर सदस्यों में असहमति थी। पहले सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था। इस प्रकार सरकार का यह सम्मेलन असफल हो गया क्योंकि कांग्रेस उस समय देश की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था थी।
यद्यपि कांग्रेस ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया था परन्तसरकार उसे भारत की सबसे और लोकप्रिय राजनैतिक संस्था मानते हुए उसके साथ तुरन्त बातचीत करने के लिए तत्कालीन वाइसराय लार्ड इर्विन (मार्च, 1931) को निर्देश दिये। परिणामस्वरूप गांधी इर्विन समझौता हुआ। सरकार उन राजनैतिक बन्दियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गई जो आन्दोलन के दौरान अहिंसक रहे। कांगे्रस ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गयी।

प्रश्न 17. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन पर संक्षिप्त विवेचन कीजिए।

उत्तर: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन अक्टूबर 1931ई. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गाँधीजी ने भाग लिया लेकिन सरकार ने इस सम्मेलन में भी स्वराज्य देने की मांग को स्वीकार नहीं किया। मुस्लिम लीग ने भी इस सम्मेलन में कई बेढंगी मांगें रखीं। यह सम्मेलन भी पूरी तरह असफल रहा। गांधीजी ने स्वदेश लौटकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः छेड़ दिया। सरकार ने परम्परावादी दमन नीति का प्रयोग कर गाँधीजी व अन्य नेताओं को गिरफ्तार  कर लिया तथा पे्रस पर पाबन्दी लगा दी। सरकार के दमनचक्र को जवाहर लाल नेहरू ने अपने इन शब्दों में वर्णित किया है, ”ऐसा लगता था कि गोरों की सरकार केवल लाठी अैर गोली से ही इस देश पर शासन करना चाहती है। ऊपर वायसराय से लेकर नीचे छोटे से छोटा अधिकारी मनमानी करने पर तुला हुआ है।“ महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं सहित एक लाख व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए गए थे।

प्रश्न 18. तीसरे गोलमेज सम्मलेन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: तीसरा गोलमेज सम्मेलन 1932ई. तीसरा तथा अन्तिम गोलमेज सम्मेलन 17 नवम्बर, 1932 को लन्दन में हुआ। इस सम्मेलन में भी कांग्रेस ने भाग नहीं लिया क्योंकि वह देश में जोरों से सविनय अवज्ञा आन्दोलन चला रही थी। भारत का प्रतिनिधित्व कुछ कट्टर साम्प्रदायिक नेताओं ने किया। इंग्लैण्ड के मजदूर दल ने भी इससे स्वयं को पृथक् कर लिया। अतः यह सम्मेलन भी असफल रहा। उसने केवल पूर्व गोलमेज सम्मेलनों के निर्णयों की दोहराया मात्रा था तथा नये संविधान में कुछ बातों को शामिल करने के बारे में निर्णय लिया गया। यह तीसरा गोलमेज सम्मेलन 24 दिसम्बर 1932 को समाप्त हो गया।

श्वेत पत्रा - तीनों गोलमेज सम्मेलनों के निर्णयों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 को एक श्वेत पत्रा प्रकाशित किया। इस पत्रा में भारत के भावी संविधान तथा प्रशासनिक सुधारों की चर्चा की गई। इसमें निहित प्रस्तावों के आधार पर 1935 का भारत अधिनियम को तैयार किया जाना था।

प्रश्न 19. भारत सरकार अधिनियम 1858 की मुख्य धाराओं का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।

उत्तर: ब्रिटिश संसद ने भारत का शासन सीधा ब्रिटिश ताज के अधीन करने के लिए 1858 ई. में एक अधिनियम पास किया जिसे भारत सरकार अधिनियम 1858 कहते हैं। इस अधिनियम की मुख्य धाराएँ निम्नलिखित थीं:
1858 के अधिनियम की मुख्य धाराएँ

(i) भारत की सत्ता ब्रिटिश सम्राट को हस्तान्तरित - 1858 ई. के अधिनियम द्वारा भारत का शासन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया से लेकर ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया गया। अब भारत का शासन ब्रिटिश ताज के नाम से गवर्नर जनरल द्वारा निश्चित किया गया। भारतीय प्रदेश ब्रिटिश ताज की सम्पत्ति माना जाने लगा और राजस्व उसी के नाम से वसूल किया जाने लगा।

(ii) भारत मंत्राी की नियुक्ति व बोर्ड आॅफ कंट्रोल का अन्त - इस अधिनियम के द्वारा अब तक भारत में शासन कर रहे बोर्ड आॅफ कंट्रोल तथा कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स को समाप्त कर दिया गया और उनके सारे अधिकार भारत मंत्राी को दे दिए गए। भारत मंत्राी की नियुक्ति ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा की गई। वह इंग्लैंड की संसद के प्रति उत्तरदायी और प्रति वर्ष संसद के सामने भारतीय शासन की रिपोर्ट प्रस्तुत करता था। उसका वेतन भारतीय राजस्व से दिया जाने लगा। भारत सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था।

(iii) भारत परिषद् की स्थापना - भारत सचिव की सहायता के लिए एक परिषद् की स्थापना की गई जिसे भारत परिषद् कहा जाता था। इस परिषद में 15 सदस्य थे। इनमें से सात सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश साम्राज्ञी करती थी और 8 की नियुक्ति प्रथम बार के लिए कम्पनी के संचालकों द्वारा की गई। भविष्य में सभी खाली स्थानों पर ब्रिटिश साम्राज्ञी द्वारा ही नियुक्त की जानी थी। इस परिषद् के कम से कम आधे व्यक्ति ऐसे होने चाहिये थे जिन्होंने कम से कम 10 वर्ष तक भारत में नौकरी की हो या दस वर्ष तक भारत में रहे हों।

(iv) भारत सचिव के अधिकार - भारत सचिव का कार्य भारत के शासकीय कार्यों की देखभाल, नियन्त्राण और संचालन करना था। भारतीय राजस्व, भारतीय सरकार की ओर से ऋण लेने तथा भारतीय सम्पत्ति को खरीदने, बेचने तथा गिरवी रखने के लिए भारतीय सचिव को परिषद् का निर्णय मानना पड़ता था। भारत सचिव परिषद् को बताए बिना गवर्नर जनरल को गुप्त पत्रा भेज सकता था। भारत सचिव को I.C.S. की परीक्षा के सम्बन्ध में भी नियम बनाने का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 20. 1909 ई. के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ? इस अधिनियम के महत्त्व और दोषों का भी वर्णन कीजिए।

उत्तर: 1909 ई. के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ - 1909 ई. के सुधार अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थीं:

(i) केन्द्रीय विधान परिषद का विस्तार - 1909 ई. के अधिनियम के द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद के सदस्यों की संख्या को बढ़ा दिया गया। इस परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 60 कर दी गयी जिसमें से 32 गैर-सरकारी सदस्य होते थे। उन 32 सदस्यों में से 27 सदस्य चुने हुए थे और 5 मनोनीत किये जाते थे।

(ii) विधान परिषद के सदस्यों की शक्तियों में वृद्धि - 1909 ई. से पहले पास किये गये 1982 ई. के अधिनियम में विधान परिषद के सदस्यों को बजट पर बहस करने और कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया किन्तउन्हें पूरक पूछने का अधिकार नहीं था। इस अधिनियम से उन्हें पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें जन कल्याण सम्बन्धी विषयों पर प्रस्ताव रखने, उस पर बहस करने तथा मतदान करने का अधिकार दिया गया।

(iii) साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली की व्यवस्था - इस अधिनियम के द्वारा मुसलमानोें के लिए साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली को अपनाया गया। इससे तात्पर्य यह था कि केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान सभाओं के कुछ मुसलमान सदस्यों का चुनाव केवल मुसलमानों द्वारा ही किया जाये। केन्द्र में ऐसे सदस्यों की संख्या 6 रखी गई किन्तप्रान्तों में उनकी संख्या भिन्न-भिन्न थी।

(iv) मुसलमानों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था - 1909 ई. के अधिनियम के अनुसार मुसलमानों को प्रतिनिधित्व में विशेष रियायत दी गई। केन्द्रीय तथा प्रान्तीय दोनों विधान सभाओं में उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार प्रदान किया गया।

(v) सीमित मताधिकार प्रदान किया जाना - इस अधिनियम के अनुसार निर्वाचन पद्धति को स्वीकार कर लिया गया था लेकिन मताधिकार बहुत ही समिति तथा भेदभावपूर्ण था। मतदान का अधिकार बड़े-बड़े जमींदारों तथा उपाधियां प्राप्त-व्यक्तियों को दिया गया। साधारण लोगों को मताधिकार का कोई लाभ नहीं मिला।

(vi) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी का विस्तार - 1909 ई. के अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी का विस्तार किया गया। उसकी कार्यकारिणी में पहली बार एक भारतीय सदस्य को शामिल किया गया। इस सदस्य का नाम था श्री एस. पी. सिन्हा। इसे कार्यकारिणी का विधि सदस्य नियुक्त किया गया।

1909 ई. के अधिनियम का महत्त्व
(i) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद में पहली बार इस अधिनियम के द्वारा भारतीयों को सदस्य नियुक्त किया गया।
(ii) 1909 ई. के सुधारों का विशेष महत्त्व यह है कि चुनाव पणाली के सिद्धान्त को पहली बार मान्यता प्राप्त हुई।
(iii) विधान परिषद की शक्तियों का विस्तार किया गया। पूरक प्रश्न पूछना तथा बजट पर सीमित रूप से बहस करने का अधिकार पहले बार भारतीयों को दिया।

1909 ई. के अधिनियम के दोष
(i) यद्यपि 1906 ई. में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वराज्य प्राप्ति को अपना राजनीतिक लक्ष्य घोषित कर दिया था परन्तफिर भी इस अधिनियम द्वारा यहाँ पर उत्तरदायी शासन की स्थापना का प्रयत्न नहीं किया गया।
(ii) इस एक्ट द्वारा प्रथम बार भारत में साम्प्रदायिक फूट के बीच बोये गये, जिसके प्रभाव स्वरूप भारत का बंटवारा हुआ। चुनाव में मुसलमानों को पृथक् प्रतिनिधित्व दिया गया।

प्रश्न 21. भारतीय स्वतन्त्राता अधिनियम 1947 की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर: ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्राता अधिनियम 15 जुलाई, 1947 ई. को पास कर दिया और 18 जुुलाई 1947 ई. को ब्रिटिश सम्राट ने इस अधिनियम पर अपनी अनुमति दे दी। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं -
(i) दो उपनिवेशों की स्थापना - भारतीय स्वतन्त्राता अधिनियम के अनुसार भारत का विभाजन कर दिया गया तथा यह कहा गया कि 15 अगस्त 1947 ई. से भारत और पाकिस्तान दो उपनिवेश स्थापित कर दिए जायेंगे और उन उपनिवेशों की संविधान सभाओं की ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रभुसत्ता दे दी जाएगी।
(ii) ब्रिटिश सरकार के नियन्त्राण की समाप्ति - इस अधिनियम में यह कहा गया कि 15 अगस्त 1947 ई. को भारत और पाकिस्तान पर से ब्रिटिश सरकार का नियन्त्राण समाप्त हो जायेगा और इस तिथि के पश्चात् ब्रिटिश सरकार दोनों उपनिवेशों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
(iii) संविधान सभाओं को कानून बनाने का अधिकार - इस अधिनियम में यह कहा गया कि जब तक दोनों उपनिवेशों के लिए नया संविधान न बन जाये तब तक दोनों उपनिवेशों की संविधान सभायें कानून बनाने का कार्य करेंगी।
(iv) ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल छोड़ने का अधिकार - भारतीय स्वतन्त्राता अधिनियम के अनुसार भारत तथा पािकस्तान दोनों देशों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि 15 अगस्त 1947 के बाद वे जब चाहें अपनी इच्छानुसार ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल को छोड़ सकते हैं।
(v) देसी रियासतें - 15 अगस्त, 1947 के बाद ब्रिटिश सरकार के भारतीय रियासतों पर समस्त सर्वोच्चता अधिकार समाप्त होने निश्चित हुए। भारतीय रियासतों को भारत अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित होने अथवा स्वतन्त्रा रहने का अधिकार दिया गया।
(vi) भारत में शामिल किए जाने वाले देश - इस अधिनियम के अनुसार भारतवर्ष में मुम्बई, मद्रास, यू.पी., एस.पी. बिहार, पूर्वी-पंजाब, पश्चिमी बंगाल, आसाम, देहली, अजमेर, मेवाड़ तथा कुर्ग सम्मिलित होने निश्चित किए गए।
(vii) पाकिस्तान में शामिल किए जाने वाले प्रदेश - इस अधिनियम में यह कहा गया कि पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिन्ध, बलुचिस्तान, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त तथा आसाम का मुस्लिम क्षेत्रा सिलहट जिला शामिल होंगे।
(viii) गवर्नर जनरल की नियुक्ति - दोनों उपनिवेशों को 15 अगस्त 1947 के बाद उनके अपने-अपने संविधान के तैयार होने तक के लिए अपना-अपना गवर्नर जनरल नियुक्त करने के लिए कहा गया। इसमें यह भी कहा गया कि इस अवधि के लिए गवर्नर जनरल की नियुक्ति उपनिवेशों की मंत्रिमण्डल की सलाह द्वारा ब्रिटिश सम्राट करेगा। इस अधिनियम में कहा गया कि एक व्यक्ति भी दोनों उपनिवेशों के गवर्नर जनरल के रूप में कार्य कर सकता है।  इस शक्ति के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लार्ड माउंट बेटन को भारत का गवर्नर जनरल स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 22. ”स्वतंत्राता आंदोलन में लोकतांत्रिक नेतृत्व का उदय“ पर प्रकाश डालें।

उत्तर: भारत में स्वतंत्राता आंदोलन में लोकतांत्रिक नेतृत्व का उदय - भारतीय स्वतंत्राता आंदोलन की यह एक विशेषता है कि इसने देश में लोकतांत्रिक ढांचे और संस्थाओं के उदय तथा विकास में ही भूमिका नहीं अपनाई बल्कि लोकतांत्रिक नेतृत्व को भी जन्म दिया। राष्ट्रीय आंदोलन के सभी नेता लोकतंत्राीय विचारधारा का समर्थन करने वाला नेता देश के सभी भागों में तथा सभी स्तरों पर इस आंदोलन में भाग ले रहे थे। स्वतंत्राता आंदोलन में ही इन नेताओं को लोकतंत्रा की ट्रेनिंग मिली और स्वाभाविक था कि जब भारत को स्वतंत्राता मिली तो इन प्रशिक्षित तथा लोकतंत्रा दिन-प्रतिदिन मजबूत होता गया।

प्रश्न 23. पढ़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का वर्णण करें।

उत्तरः एच. सी. मोरीसन. के अनुसार ”शिक्षण एक अधिक परिपक्व और कम परिपकव व्यक्तित्व के मध्य घनिष्ट सम्पर्क है जिसके द्वारा कम परिपक्व व्यक्तित्व को शिक्ष की दिशा में और आगे बढ़ाया जा सकता है“ पढ़ाने का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे विद्यार्थी और उसके व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए सभी आवश्यक क्रियाओं के आयोजन पर ध्यान दिया जाता है। यदि विद्यार्थी के व्यावहार में परिवर्तन हुआ तो समझा जाना चाहिए कि पढ़ाने का तरीका सही है।
पढ़ाने के निम्नलिखित तरीके अपनाये जा सकते है।
A.    शिक्षक को पहले अपने उद्देश्य निश्चित कर लेने चाहिए। इसे निश्चित उद्देश्य का सिद्धान्त कहते हैं।
यदि आवश्यक हो तो पूर्व निर्धारित विषय वस्तु, समय, स्थान और विधियों में परिवर्तन लाया जा सके।
छात्रा पूर्व में जो भी सीखा है; आगे का पाठ उससे जोड़कर पढ़ाया जाय।
शिक्षण बाल केन्द्रित होना चाहिए; न कि शिक्षक केन्द्रित।
चूँकि विभिन्न बालकों की क्षमताएं भी भिन्न-भिन्न हैं अतः शिक्षण सभी को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। 
पाठ्य वस्तको ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। 
पाठ्य वस्तको छात्रों के जीवन से जोड़ देने से वह पाठ आसानी से और रुचिपूर्वक सिखाया जा सकता है।
शिक्षण के लिए प्रभावशाली विधियों, सहायक सामग्री आदि का चुनाव कक्षा में जाने से पूर्व में ही कर लेना चाहिए।
पाठ के विकास में बच्चों का सहयोग लिया जाय और उन्हें क्रियाशील रखा जाय।
B.    छात्रा को पहले पढ़ने के लिए तैयार किया जाना चाहिए (अभिप्रेरण एवं रुचि का सिद्धांत)। किसी विषय वस्तका बार-बार अभ्यास कराया जाय।
शिक्षण विधियों में परिवर्तन के साथ आराम का अवसर दिया जाय।
यदि किसी बच्चे द्वारा की गए कार्य को स्वीकारोक्ति मिल जाए, तो वह दौगुनी ऊर्जा से काम करने लगता है अतः आवश्यक है कि उसे शाबासी दी जाय। 
C.   कुछ प्रमुख शिक्षण - सरल से जटिल की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर, सामान्य से विशिष्ट की ओर, विशिष्ट से सामान्य की ओर, पूर्ण से अंश की ओर, अनिश्चितता से निश्चितता की ओर, विश्लेषण से संश्लेषण की ओर, मनोविज्ञान से तर्क की ओर।

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