सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 17 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 17 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1. (a) ”आधुनिक परिसंघों को विभाजन और वियोजन पर बल देकर सहयोगिता और सहभागिता पर बल देना चाहिए।“ भारतीय राज्य व्यवस्था के संदर्भ में इस कथन का विवेचन कीजिए।
अथवा
(b) भारत की वर्तमान निर्वाचन पद्धति की समीक्षा करते हुए सुझाइए कि बेहतर और अधिक स्वास्थ्यकर राज्य-व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए इसमें क्या संशोधन किये जा सकते हैं?

उत्तर (a):
यद्यपि भारतीय संविधान में फेडरेशन या संघ की चर्चा नहीं है तथापि भारत एक संघ है। संघ की कुछ विशेषताएं होती हैं, जो निम्नलिखित हैंः
इसमें दो स्तरीय सरकार होती है। एक, केन्द्रीय सरकार व दूसरी राज्य सरकार। केन्द्र व राज्य दोनों सरकारों के कार्यों का उल्लेख संविधान में होता है। दोनों ही सरकारें स्वायत्तशासी होती हैं। केन्द्र व राज्य की शक्तियों से संबंधित विवाद का निपटारा एक स्वतंत्रा न्यायपालिका करती है
भारतीय संविधान में उपरोक्त विशेषताओं को शामिल किया गया है। विश्व में प्रथम संघ राज्य संयुक्त राज्य अमरीका है। एक प्रकार से यू.एस.ए. की संघ संबंधी विशेषताएं ही बाद में विश्व में जहां भी संघीय राज्य की स्थापना हुई, अपनायी गयी। संघीय संरचना की उत्पत्ति एक विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में हुई थी। सामाजिक न्याय की भावना से एकात्मक संविधान की उत्पति हुई। केन्द्र की शक्तियों में परिवर्तन हुआ तथा राज्य की सीमाएं निर्धारित हुई। भारत में राजनीतिक एकता कभी भी स्थायी नहीं रही। अतः संघ राज्य का निर्माण करते समय केन्द्र को अधिक शक्तियां प्रदान की गयीं। एक ओर जहां केन्द्र सत्ता का केन्द्रीयकरण कर रहा है, वहीं दूसरी ओर राज्यों में अलगाववाद की प्रवृत्तियां पनप रही हैं। बंगाल, असम, उड़ीसा, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्य स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। केन्द्र राज्यों में धारा 356 का प्रयोग कर रहा है। केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में गवर्नर विवाद के मामलों में अवशिष्टि शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन भारत जैसे बहुधर्म, जाति, संस्कृति व भाषा वाले देश में केन्द्र द्वारा केन्द्रीयकरण की योजना का सफल होना संदिग्ध है। यदि केन्द्र सरकार राज्यों की स्वतंत्राता में हस्तक्षेपकारी नीति का परित्याग करके उनके साथ सहयोग व सहकारिता के संबंधों का विकास करे तो राज्यों में देशभक्ति की भावनाओं का प्रसार होगा और वे केन्द्र को मजबूती प्रदान करेंगे।
अथवा
उत्तर (b) :
हमारी चुनावी व्यवस्था में वयस्क मताधिकार, एक निर्वाचन क्षेत्रा में एक सदस्य, गुप्त मतदान, सीधी चुनाव प्रकिया तथा सामान्य बहुमत प्रक्रिया द्वारा चुनाव होते हैं। न्यूनतम 18 वर्ष की उम्र वालों को मत का अधिकार प्रदान किया गया है तथा उसे किसी निश्चित आधार के अभाव में (जैसे अपराधिक आरोप, भ्रष्ट आचरण आदि) मत से वंचित नहीं किया जा सकता है। ऐसे निवार्चन क्षेत्रों में जहाँ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों की जनसंख्या अन्य जातियों की अपेक्षा अधिक है, उनकी सीटें सुरक्षित की गयी हैं। संसद ने जन प्रतिनिधि अधिनियम 1950, तथा सीमांकन आयोग अधिनियम, 1962, 72 पारित किये, जिसमें चुनाव के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य वर्णित हैं। चुनाव को स्वतंत्रा एवं निष्पक्ष बनाने के लिए संविधान में एक निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गयी है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त होता है तथा आवश्यकतानुसार एक से अधिक आयुक्त हो सकते हैं। आयोग, चुनाव के संचालन, निर्देशन, नियंत्राण के लिये उत्तरदायी होता है। उसे चुनावी आचार संहिता का निर्धारण करने का दायित्व भी सौंपा गया है। वही विभिन्न पार्टियों के पहचान एवं चुनाव हिन्ह को निर्धारित करता है। चुनाव आयोग राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया भी पूरी कराता हैं। चुनाव आयोग एक स्वायत्तशासी संस्था है तथा यह प्रशासनिक नियंत्राण से मुक्त होता है। हमारी चुनावी व्यवस्था निश्चित रूप से हमारी राजनीतिक वयवस्था को स्थिरता प्रदान करती है। चुनाव आयोग को ऐसी कोई पार्टी मान्य नही होती जो अपने खर्चों को नियमित नहीं करती है। अपराध साबित होने पर व्यक्ति को चुनाव से बहिष्कृत किया जाता है। सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर कड़े प्रावधान किए गए हैं।
भारत में अभी तक चैदह लोकसभा चुनाव हो चुकें हैं, जिसमें 1984 के चुनावों को छोड़कर किसी भी चुनाव में सरकारों को स्पष्ट बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं हो पाया है। मतदान का कम प्रतिशत, फर्जी मतदान, जातिवाद व साम्प्रदायिक आधार पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के साथ ही सत्ता का दुरुपयोग भी सभी चुनावों में देखने में आता है। ये हमारी चुनाव प्रक्रिया को कमजोर बनाते हंै। अतः चुनावों को निष्पक्षता व लोकतंत्रा को मजबूत करने के लिए निम्न कदम उठाए जाने की आवश्यकता हैंः (1) सरकारी साधनों के दुरुपयोग पर रोक। (2) साम्प्रदायिक व जातिवाद के आधार पर लड़े जाने वाले चुनावों पर रोक लगाने के प्रावधान और कड़े किये जाएं। (3) बूथ कब्जा की घटनाओं पर रोक व सभी को मतदान सुविधा सुनिश्चित हो। (4) सभी के लिए मतदान अनिवार्य किया जाए। (5) मतदाताओं को मतदान पत्रा जारी किये जाएं। (6) मतदान पूर्व विभिन्न संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले चुनाव विश्लेषण पर रोक। (7) जमानत राशि में वृद्धि हो, जिससे प्रत्याशियों की संख्या सीमित हो सके। (8) जनसाधारण को चुनाव प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षित किया जाए। चुनावों के लिए निश्चित सीमा से अधिक खर्च करने वाले लोगों पर नियंत्राण हेतु किये गए प्रावधान और कड़े किये जाएं तथा उन पर सख्ती के साथ अमल कराया जाए। (9) चुनाव खर्चों का अपूर्ण या असत्य विवरण देने वाले दलों की मान्यता समाप्त की जाए। 10. एक ही प्रत्याशी के एक से अधिक स्थानों से चुनाव लड़ने पर रोक लगायी जाए।

प्रश्न 2. निम्नलिखित का उत्तर दीजिए। (प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 150 शब्द में होना चाहिए।)
(a) महिला राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना, 1988 की प्रमुख अनुशंसाएं क्या हैं? सांविधानिक संशोधन विधेयक (64 वां संशोधन) में परिकल्पित प्रासंगिक अनुशंसाएं क्या हैं?
(b) भारतीय संविधान में राज्यपाल को प्राप्त वैवेकिक शक्तियों तथा विशेष दायित्वों का स्वरूप में और विस्तार समझाइए।
(c) भारत में सिविल सेवाओं की सांविधानिक स्थिति का विवरण दीजिए। इन सेवाओं की तटस्थता और स्वतन्त्राता को सुनिश्तिचत करने का प्रयास किस प्रकार किया जाता है?
(d) भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के साथ.साथ जो ‘युक्ति-युक्त निर्वधन’ उल्लिखित हैं, वे क्या हैं?

उत्तर (a) : महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दशाओं में सुधार एवं उनको संरक्षण प्रदान करने हेतु सरकार ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में नारी उत्थान की योजना निर्मित की। जिसे महिला राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान) के नाम से जाना जाता है। इसके तहत बाल विकास एवं महिला विकास विभा के केन्द्रीय दल ने एक करूपरेखा प्रस्तुत की, जिसे ‘अन्रर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर, 8 मार्च, 1988 को जारी किया गया। रिपोर्ट में महिलाओं के सम्पत्ति संबंधी अधिकार को संस्तुति प्रदान की गयी। इसके अतिरिक्त विधानसभा व संसदीय चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण को भी स्वीकार किया गया। इसके लिए एकीकृत नागरकि कोड (Uniform Civil Code) की आवश्यकता पर बल दिया गया। कार्यकारी महिलाओं, बालिकाओं व किशोर बालिकाओं के लिए आवश्यक सुविधाएं तथा महिलाओं के अधिकारों को दिलाने हेतु एक कमिश्नर की नियुक्ति की गयी। एक राष्ट्रीय संसाधन केन्द्र की स्थापना, सूचनाओं के प्रसार हेतु हुई। राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य योजना का मानना है कि विभिन्न कारणों से महिलाएं प्रायः सभी क्षेत्रों में उपेक्षित रही है। महिलाओं को मतदान अधिकार व मतदान प्रक्रिया में भाग लेने के बहुत कम अवसर मिले हैं। अतः लोकतंत्रा को मजबूत करने के लिए महिलाओं की सभी क्षेत्रों में सहभागिता आवश्यक है। इसके लिए जाति, वर्ग, धर्म व पारिवारिक स्तर पर प्रतिबंध लगाने वाले पारम्परिक कारकों को तोड़ना हेागा। 64 वें पंचायत राज संस्था संबंधी संविधान संशोधन विधेयक में महिलाओं के लिए तीस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इसके लिए विधेयक में संविधान में एक नया भाग 9 अनुच्छेद 243 जोड़ा गया। इसमें पचायतों की परिभाषा, उनकी संरचना, स्थान आरक्षण, शक्तियां, कार्यकाल, व उत्तरदायित्व आदि का उल्लेख है। विधेयक द्वारा संविधान में 11 वीं अनुसूची जोड़ी गयी। इसमें पंचायतों के कार्यक्षेत्रा के अनतर्गत दिये गए 29 विषयों में शैक्षिक प्रशासन, स्वास्थ्य व संस्कृति के साथ ही महिला एवं बाल कल्याण पर काफी बल दिया गया।

उत्तर (b) : राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जो कि मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है। लेकिन राज्यपाल सदैव मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने को विवश नहीं है। वह अनेक अवसरों पर स्वविवेक से भी कार्य करता है। संवधिान में राज्यपाल से विवेकानुसार निम्नलिखित कृत्य करने की विशेष रूप से अपेक्षा हैः
(क) छठी अनुसूची का पैरा 9(2) जिसमें असम का राज्यपाल अपने विवेकानुसार वह रकम अवधारित करेगा, जो असम राज्य खनिजों की अनुकूलता से उद्भूत होने वाले स्वामित्व के रूप में जिला परिषद को देगा।
(ख) अनुच्छेद 239(2), जो कि राष्ट्रपति को प्राधिकार देता है कि वह किसी राज्य के राज्यपाल को किसी निकटवर्ती संघ राज्यक्षेत्रा के प्रशासन के रूप में नियुक्त कर सकेगा और वह राज्यपाल ऐसे प्रशासक के रूप में अपने कृत्यों का प्रयोग अपनी मंत्रिपरिषद से स्वतंत्रा रूप से करेगा।
इसके अलावा संविधान में राज्यपाल के कुछ विशेष उत्तरदायित्व हैं, जिनका व्यवहार में वह अर्थ है, जो ‘विवेकानुसार’ का है। यद्यपि इसमें राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् से परामर्श करना होता है, लेकिन अंतिम विनिश्चय राज्यपाल का ही होता है। ये कार्य हैंः
(i) अनुच्छेद 371(2) के अधीन राष्टपति यह निर्देश दे सकता है कि महाराष्ट्र या गुजरात के राज्यपाल का राज्य में कुछ क्षेत्रों में विकास हेतु विशेष कदम उठाने का उत्तरदायित्व होगा, जैसे-विदर्भ या सौराष्ट्र।
(ii) नागालैण्ड के राज्यपाल का अनुच्छेद 371 (क)(ख) के अधीन उस राज्य में विधि या व्यवस्था के बाबत इसी प्रकार का उत्तरदायित्व तब तक है जब तक कि उस राज्य में विद्रोही नागाओं के कारण आंतरिक अशांति बनी रहती है।
(iii) मणिपुर के राज्यपाल का उस राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनने वाली राज्य विधानसभा की सूची का उचित कार्यकरण सुनिश्चित करना। [ अनुच्छेद 371 ग (1)]।
(iv) सिक्किम के राज्यपाल द्वारा शांति के लिए और सिक्किम की जनता के विभिन्न विभागों की सामाजिक और आर्थिक उन्नति सुनिश्चित करने के लिए कार्य करना [अनुच्छेद 371 (च) (छ)]।
इसके अलावा, राज्यपाल को परिस्थितियों के अनुसार कुछ ऐसे विवेकाधीन कार्य भी करने होते हैं, जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है।

ये निम्न प्रकार हो सकते हैंः
(i) राज्यविधान सभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत के अभाव में राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करके सरकार का गठन कर सकता है।
(ii) यदि स्थाई सरकार बनना संभव नहीं हो रहा हो तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद् को अपदस्थ करके व राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकता है। राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार न चलने की स्थिति में भी वह राष्ट्रपति से ऐसी सिफारिश कर सकता है। राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार न चलने की स्थिति में भी वह राष्ट्रपति से ऐसी सिफारिश कर सकता है। अनुच्छेद, 356 के अधीन ऐसा प्रतिवेदन देना ऐसा कृत्य है, जो राज्यपाल अपने विवेक से करता है।
(iii) किसी स्वतंत्रा ट्रिब्युनल द्वारा मुख्यमंत्राी को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी करार दिये जाने पर राज्यपाल मुख्यमंत्राी को पदच्युत कर सकता है।
(iv) असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल स्वविवेक से विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुला सकता है।
(v) राज्यपाल को मुख्यमंत्राी से किसी भी विषय पर सूचना मांगने का भी अधिकार है।
(vi) वह किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करने का निर्णय ले सकता है। (अनुच्छेद 200)। साथ ही, किसी भी पारित विधेयक को पुनिर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
(vii) एक मंत्रिमंडल के पद त्याग व दूसरे आनुकल्पिक मंत्रिमंडल का गठन न होने की स्थिति में राज्यपाल, राष्ट्रपति के अधीन रहते हुए स्वविवेक से कार्य करता है।
(viii)किसी संकटकालीन स्थिति की आशंका को देखते हुए वह राज्य में आपात्काल की घोषणा कर सकता है।
(ix) संघ सरकार द्वारा राज्यों को राष्ट्रीय महत्त्व व प्रशासन से संबंधित निर्देश राज्यपाल के माध्यम से ही प्रेषित किये जाते हैं। राज्यपाल राज्यों द्वारा निर्देशों के उल्लंघन की स्थिति में राज्य मंत्रिमंडल को चेतावनी दे सकता है तथा अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति को संवैधानिक संकट की रिपोर्ट भेज सकता है।
(x) राज्यपाल विधानसभा चुनावों के बाद दलीय स्थिति स्पष्ट न होने की दशा में किसी भी दल के नेता को सरकार बनाने के लिए स्वविवेक से आमंत्रित कर सकता है तथा उसे एक निश्चित समय में बहुमत सिद्ध करने के लिए कह सकता है।

उत्तर (c) : संसदीय व्यवस्था में राज्य प्रशासन के विस्तृत कार्यक्षेत्रा, का सफलतापूर्वक संचालन सिविल (प्रशासनिक) सेवा के योग्य व व्यावहारिक ज्ञानयुक्त सदस्यों पर निर्भर करता हैं। प्रशासनिक सेवा के ये सदस्य, राजनीतिक पदाधिकारियों (राज्य कार्यपालिका) से भिन्न होते हैं अर्थात ये स्थायी कार्यपालिका का निर्माण करते हैं। इनका कार्य राज्य कार्यपालिका द्वारा निर्धारित नीति का क्रियान्वयन करना होता है। योग्य सिविल सेवा के लिए योग्य अधिकारियों का चुनाव निष्पक्ष रूप से लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता है तथा ये राजनीतिक रूप से उदासीन होते हैं। नीतिगत मामलों में इनका हस्तक्षेप सलाह तक ही होता है तथा अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल द्वारा ही लिया जाता हैं। शासन सत्ता में किसी भी दल को सरकार होने पर इनके कार्य-व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता है तथा लोक सेवा आचार संहिता के अनुसार सिविल सेवा पद पर रहते हुए ये राजनीति में भाग नहीं ले सकते हैं। इनके तीन स्तर हैं- अखिल भारतीय सेवा, जो केन्द्र व राज्य दोनों के लिए होती है (अनुच्छेद 312) केन्द्रीय सेवाएं, जो संघीय सूची के प्रशासन से संबंधित है और राज्य सेवाएं। अनुच्छेद 312 के अनुसार, राज्यसभा राष्ट्रीय हित में आवश्यक समझने पर संघ या राज्य या दानों के लिए सम्मिलित अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन कर सकती है, लेकिन इसके लिए राज्य सभा को विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। ये राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं तथा इनके कार्य स्पष्ट होते हैं। कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी समय भी किसी आधार पर निलम्बित किया जा सकता है, परन्तु सिविल सेवा का कोई भी सदस्य उसके अधीन अधिकारी द्वारा दण्डित नहीं किया जा सकता है। उसके पास धारा 14, 15, 16, 19, 20 में कुछ मूल अधिकार हैं, जो अधिकारों का सीमांकन करते हैं। राज्य अधिनियम की धारा 309 के अनुसार, सिविल सेवकों की भर्ती व सेवा शर्तों को समुचित विधानमंडल द्वारा अधिनियमों द्वारा विनियमित किये जाने के लिए छोड़ दिया गया है। प्रशासनिक ट्रिब्युनल ऐक्ट.1986 द्वारा केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की स्थापना की गयी है, जो विवादों का निपटारा करती है। इस प्रकार सिविल सेवाओं के लिए राजनीतिक तटस्थता व स्वतंत्राता की पर्याप्त व्यवस्था की गयी हे।

उत्तर (d) : भारतीय संविधान में अनेक मूल अधिकारों को शामिल किया गया है। ये मूल अधिकार संविधान के भाग.3 में उचित प्रतिबंधों ;त्मेंवदंइसम त्मेजतपबजपवदेद्ध के साथ वर्णित हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में समानता के अधिकार का उल्लेख है। इसके अनुसार, कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं (अनुच्छेद 14)। समानता के अधिकार में निहित है कि जाति, लिंग, जन्म स्थान, वर्ण आदि के आधार पर राज्य नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करेगा। (अनुच्छेद 15)। लेकिन समानता के अधिकार के अन्तर्गत यह प्रतिबंध किया गया है कि राज्य महिलाओं तथा बच्चें, अनुसूचित जातियों, जनजातियों व पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान कर सकेगा। सभी नागरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समान अवसर होंगे। (अनुच्छेद 16)। यहां भी अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए कुछ स्थान सुरक्षित रखे जाने का विशेष प्रावधान है।
संविधान में अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्राता के अधिकार का विवेचन है, जिसमें प्रथम स्वतंत्रात भाषण व अभिव्यक्ति की है। राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार, न्यायालय का अपमान, मानहानि या अपराध के लिए प्रेरित करना , अलगाववादी ताकतों से निकटना आदि आधारों पर राज्य अभिव्यक्ति व भाषण की स्वतंत्राता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। अनुच्छेद, 352 के अन्तर्गत आपात्काल की अवधि के दौरान अनुच्छेद.19 के प्रावधानों को निलंबित किया जा सकता है। सार्वजनिक सुरक्षा के हित में अस्त्रा-शस्त्रा रहित व शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्राता को भी सीमित किया जा सकता है। राज्य नागरिकों के सम्पूर्ण भारत क्षेत्रा में घूमने व अस्थायी या स्थाई रूप से बसने की स्वतंत्राता पर सामान्य जनता या अनुसूचित जातियों के हित की दृष्टि से प्रतिबंध लगा सकता है। राज्य जनसाधरण के हित में सम्पत्ति के अर्जन, धारण, व्यय तथा नागरिकों की वृत्ति, उपजीविका, व्यवसाय या व्यापार की स्वतंत्राता को प्रतिबंधित कर सकता है या आवश्यक योग्यता निश्चित कर सकता है। राज्य किसी उद्योग या व्यवसाय को अपने पूर्ण या आंशिक नियंत्राण में ले सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के विरुद्ध अधिकार से संबंधित हैं। ‘जबरन मेहनत’ या ‘बेगार’ को अवैध घोषित कर दिया गया है (अनुच्छेद 23)। लेकिन राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की योजना लागू कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 26 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्राता के अधिकार उल्लिखित हैं, लेकिन मानवीय व सामाजिक आधार पर यह राज्य के निर्बन्धों के अधीन हैं। साथ ही राज्य की प्रभुसत्ता को प्रभावित करने वाले कृत्यों को प्रतिबंधित किया जा सकता है। संविधान में सांविधानिक उपचारों के अधिकार का भी उल्लेख है। यह संविधान द्वारा प्राप्त मूल अधिकारों के लिए प्रभावी कार्यविधियां प्रतिपादित करता है। अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के संदर्भ में राज्य क्रियाओं से प्रकट किसी भी प्रकार के अतिक्रमण अथवा उल्लंघन की स्थिति में नागरिकों को सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेने का अधिकार दिलाता है। लेकिन युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक अव्यवस्था व अशांति की स्थिति में, जबकि राष्ट्रपति संकटकाल घोषित कर दे, मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु कोई भी नागरिक न्यायालय में अपील नहीं कर सकेगा। जीवन रक्षा के संबंध में यह प्रतिबंध लागू नहीं होता है।

प्रश्न 3. ”वृद्धि केन्द्रों“ (ग्रोथ सैंटर्स) की स्थापना के पीछे आर्थिक तर्क क्या है? इन वृद्धि केन्द्रों के चयन में अपनाई जाने वाली कसौटियों को संक्षेप में समझाइए।

उत्तर : पिछड़े क्षेत्रों में आद्योगिकरण का प्रभावी ढंग से विकास करने के उद्देश्य से सरकार ने देश भर में वृद्धि केन्द्र खोलने का निर्णय किया। इस उद्देश्य के निहितार्थ 1989 में सरकार ने पूरे देश में 100 वृद्धि केन्द्र खोले जाने का फैसला किया। यह कार्यक्रम आगामी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत पूरा किया जाएगा। इससे पिछड़े क्षेत्रों को विकास के अवसर प्राप्त होंगे क्योंकि इन विकास केन्द्रोें पर लागत के आधार पर देश में उपलब्ध सबसे अच्छी आधारित संरचनाएं उपलब्ध करायी जाएंगी। आधारित संरचनाओं में विद्युत, जल, संचार व बैंकिंग सेवाओं की उपलब्धता पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाएगा। ये वृद्धि केन्द्र जिला या तहसील मुख्यालय से पिछड़े क्षेत्रों में इतनी दूरी पर खोले जाएंगे, जिससे कि उद्योगों को आकर्षित कर सकें। प्रथम चरण में 61 वृद्धि केन्द्र खोलने का निर्णय लिया गया, जिसमें 16 बड़े राज्यों, 9 छोटे राज्यों में और शेष अन्य राज्यों में खोले जाएंगे। प्रत्येक वृद्धि केन्द्र आधारित संरचनाओं के विकास के लिए 400 से 800 हेक्टेयर तक भूमि का अधिग्रहण करेगा, औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र आदि की स्थापना के लिए वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया जाएगा। प्रत्येक वृद्धि केन्द्र को विभिन्न माध्यमों से 25 से 30 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जाएंगे। इस प्रकार वृद्धि केन्द्रों द्वारा पिछड़े क्षेत्रों में आधारित संरचना की उपलब्धता कारगर औद्योगिकरण के लिए वातावरण बनाया जाएगा।

प्रश्न 4. ”काम पाने के अधिकार“ के साथ जुड़े हुए आर्थिक प्रश्नों का उल्लेख करते हुए उनको संक्षेप में समझाइए।

उत्तर: भारत में रोजगार कार्यालयों के आंकड़ों के अनुसार, देश में रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या दिसम्बर, 1989 में 327.76 लाख थी, जबकि दिसम्बर, 1982 में यह 197.53 लाख थी। इस प्रकार देश में बेरोजगारों की संख्या दिनप्रतिदनि बहुत तेजी से बढ़ रही है और भविष्य में इसमें और वृद्धि की संभावना है। रोजगार के अवसरों में कमी से गरीब परिवार निरंतर और गरीबी की ओर बढ़ता जा रहा है। यद्यपि सरकार द्वारा काम के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल करने से गरीबी को कम या दूर किया जा सकता है, लकिन इसके अनेक विपरीत परिणाम भी सामने आ सकते हैं। उल्लेखनीय है कि काम का अधिकार राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अनुच्छे.14 के अन्तर्गत रखा गया है। इस कदम से एक ओर जहां बेरोजगार व्यक्ति अपने लिए तुरन्त राहत हेतु न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। (अनुच्छेद 226 व अनुच्छेद 32 के आधार पर), वहीं विभिन्न स्वैच्छिक व राजनैतिक संगठन बेरोगारों के समर्थन में विधिसेल स्थापित कर सकते हैं। साथ ही, बेरोजगारी भत्ते की राशि पर भी अनेक विवाद खड़े हो सकते हैं। काम के अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखने से सरकार को सभी बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की अनिवार्यता हो जाएगी। लेकिन देश के संसाधनों व आय स्रोतों को देखते हुए यह संभव दिखाई नहीं देता। इसके अलावा बेरोजगारों को न्यूनतम रोजगार भत्ता देने पर ही राज्य की कुल आय का 42.7 प्रतिशत व्यय हो जाएगा और सरकार के पास इतना बड़ा भार सहन करने की क्षमता नहीं है। अनुमानानुसार, यदि बेरोजगार पंजीकृत व्यक्तियों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाए तो कम से कम 23,000 करोड़ रुपये का व्यय होगा। इस स्थिति में सरकारों के पास अन्य विकास योजनाओं के लिए धन की भारी कमी हो जाएगी। इसके अलावा बेरोजगारी भत्ता दिये जाने पर उसे मंहगाई के अनुसार बढ़ाने संबंधी विवाद भी पैदा हो सकते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निजी संगठनों की अर्थव्यवस्था में सहभागिता होते हुए भी काम के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल कर पाना व्यवहारिक नहीं होगा। 2001 ई0 तक आबादी में 15 से 65 आयु वर्ग के 225 मिलियन लोगों की वृद्धि हो जाएगी और सभी को रोजगार दे पाना संभव नहीं होगा। शायद नहीं। सरकार कितने लोगों को रोजगार दे पाती है, यह उसके पास उपलब्ध साधनों पर निर्भर करता है। वास्तव में, पंचवर्षीय योजनाओं में उत्पादन के साथ.साथ रोजगार उत्पन्न करने के कार्यक्रमों व श्रम प्रधान उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 5. सामान्य मूल्य स्तर में हाल ही में जो वृद्धि हुई है, उसके पीछे के संघटक कारकों का विवेचन कीजिए और बताइए कि इनका सामना करने के लिए सरकार ने क्या.क्या कदम उठाए हैं?

उत्तर : भारत 50 के दशक के मध्य में मूल्य वृद्धि के युग में प्रवेश कर चुका था। मूल्य स्तर में वृद्धि का यह क्रम पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से निरंतर चल रहा है। हाल में मूल्य स्तर में वृद्धि के लिए उत्तरदायी कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंः
(i) गैर-विकासात्मक खर्चों में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन इससे वस्तुओं व सेवाओं की पूर्ति में कोई वृद्धि नहीं हुई और असन्तुलन उत्पन्न हो गया।
(ii) विदेशी ऋणों का बढ़ता बोझ राष्ट्रीय आय में कमी तथा प्रशासनिक मूल्यों (Administered Price) में वृद्धि करता है।
(iii) हमारी औद्योगिक संरचना, मांग में वृद्धि को पूरा कर पाने में असफल रही है, विशेषकर उपभोक्ता वस्तुओं के संदर्भ में।
(iv) सरकार को कुछ आवश्यक वस्तुओं जैसे गेहूँ, खाद्य तेल व पेट्रोलियम का आयात करना पड़ा। विशेषकर खनिज तेल मूल्यों में वृद्धि से मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई । सरकार द्वारा तेल पर लगाया गया 25 प्रतिशत का खाड़ी अधिभार भी मूल्यों में वृद्धि का एक कारण रहा।
(v) बढ़ते घाटे की वित्तीय व्यवस्था के चलते मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि होती है। तथा प्रभावकारी मांग में वृद्धि हुई है।
(vi) घरेलू उत्पादन में कमी व भुगतान सन्तुलन पर दबाव के कारण अनेक वस्तुओं की मांग व पूर्ति में असन्तुलन उत्पन्न होता है तथा स्फीतिक दशाएं उत्पन्न होती है।

सामान्य मूल्यस्तर पर नियंत्राण के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जो निम्न प्रकार हैंः
(i) रिजर्व बैंक ने चयनात्मक साख नियंत्राण को कड़ाकर दिया है तथा अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं।
(ii) बैंकदर में वृद्धि की गयी है।
(iii) व्यापारिक बैंकों की सभी जमाओं पर वैधानिक तरलता अनुपात 38 प्रतिशत से बढ़ाकर 38.5 प्रतिशत कर दिया है।
(v) घरेलू उतपादन में वृद्धि हेतु अनेक नवीन योजनाएं व कार्यक्रम शुरू किये गए हैं।

प्रश्न 6. आजादी के बाद से 1990 तक पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए क्या.क्या कदम उठाए गए हैं?

उत्तर : पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगारोन्मुख योजनाओं के विकास के संबंध में निम्नलिखित कदम उठाए गए हैंः
(i) 1971.72 में ग्रामीण रोजगार हेतु पुरजोर योजना आरम्भ की गयी है। इसके अन्तर्गत देश के प्रत्येक जिले के एक हजार लोगों को एक वर्ष में दस महीने तक रोजगार उपलब्ध कराने की योजना तैयारी की गयी।
(ii) 1771 में लघु कृषक विकास अधिकरण (SFDA) की स्थापना की गयी।
(iii) 1969.70 में सीमान्त किसान एंव कृषि श्रमिक एजेन्सी (M.F.A.L.A.) नामक योजना प्रारम्भ की गयी।
(iv) 1962 में ग्रामीण उद्योग परियोजना, 1966 में किसान प्रशिक्षण एवं शिक्षा कार्यक्रम, 1970 में सूखा पीड़ित क्षेत्रा कार्यक्रम, 1971 में ग्रामीण रोजगार हेतु नकद योजना, 1972 में जनजाति विकास हेतु पायलट योजना, 1973 में पायलट गहन ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम व न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम तथा 1977 में काम के बदले अनाज कार्यक्रम रोजगार बढ़ाने के उद्देश्य से आरम्भ किये गए।
(v) 1978.79 में SFDA व MFALA कार्यक्रमों को मिलाकर समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) शुरू किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रा के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना था। इसके लिए उन्हें ऐसी उत्पादक परिसम्पत्ति व कौशल से सम्पन्न कर देना था कि वे अपना जीवन निर्वाह उचित प्रकार से कर सकें। इसके अन्तर्गत 3,500 रुपये (सातवीं योजना में 4,800 रुपये किया गया) वार्षिक से कम आय वाले कृषकों या सम्बद्ध व्यवसाय वाले लोगों को व्यावसायिक सुविधा उपलब्ध कराना था। छठी योजना में इससे 165.6 लाख लोग लाभान्वित हुए।
(vi) 1980 में मौसमी तथा अल्परोजगार के काल में समय वृत्ति रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) शुरू किया गया। छठी योजना में 17,750 लाख कार्य दिवसों का सृजन किया गया। इसके अन्तर्गत कूओं, तालाब, सड़क, विद्यालय, पंचायत घर, वालवाड़ी भवन आदि का निर्माण किया जाता है। 1989 में इस योजन को जवाहर रोजगार योजना से जोड़ दिया गया।
(vii) 1979 में 18 से 35 आयु वर्ग के ग्रामीण युवकों को स्वरोजगार के लिए व्यवसायों का प्रशिक्षण देने के लिए ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम (TRYSEM) शुरू किया गया। छठी योजना में 10.11 लाख युवक युवतियों को प्रशिक्षित किया गया।
(viii) 1983 में ग्रामीण भूमिहीनों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारन्टी कार्यक्रम (RLEGP) आरम्भ किया गया। इसमें प्रत्येक भूमिहीन मजदूर परिवार के एक सदस्य को वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार दिलाने का लक्ष्य था। छठी योजना में इसके लिए 600 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। 1989 में इसे जवाहर रोजगार योजना में विलीन कर दिया गया।
(ix) 1985 में अनुसूचित जाति व जनजाति तथा मुक्त बंधुआ मजदूरों के लिए लघु आवास बनाने के लिए इन्दिरा आवास योजना शुरू की गयी। इस योजना से रोजगार का सृजन भी होता है।
(x) 1989 में ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दूर करने, स्थायी प्रकृति की सामुदायिक परिसम्पत्तियों के निर्माण, सामाजिक वानिकी तथा अनुसूचित जाति व जनजाति के व्यक्तियों के लाभार्थ जवाहर रोजगार योजना आरम्भ की गयी। इसके अन्तर्गत प्रतिवर्ष गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 4.40 करोड़ परिवारों के कम-से-कम एक सदस्य को 50.100 दिन का रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया। इसमें 3,000 से 4,000 जनसंख्या वाली ग्राम पंचायतों को प्रतिवर्ष अस्सी हजार से एक लाख रुपये दिये जाते हैं। इसमें 30 प्रतिशत रोजगार महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया है तथा केन्द्र व राज्य सरकार का योगदान क्रमशः 60 व 20 प्रतिशत है।

प्रश्न 7. भारतीय श्रमिक संघ आंदोलन की मुख्य कमजोरियों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर : श्रमिक संघ से तात्पर्य ऐसे संगठनों से है, जो ऐच्छिक रूप से ओर सामूहिक शक्ति के आधार पर श्रमिकों के हितों की रक्षार्थ बनाए जाते हैं। श्रमिक संघ श्रमिकों में सामूहिक आचरण और सामूहिक सौदाबाजी की भावना जाग्रत करके मजदूरियों तथा कार्य की दशाओं में सुधार के प्रयास करते हैं तथा सेवायोजकों से श्रमिकों को संरक्षण प्रदान करते हैं। विभिन्न कारणों से भारत में श्रम संघ आंदोलन की प्रगति काफी मंद रही है। श्रम संघों के छोटे आकार, कम सदस्यता, सदस्यों में निश्क्रियता व साधनों का अभाव आदि कारक भारत में श्रम संघों की धीमी प्रगति के लिए उत्तरदायी हैं। साथ-ही, भारतीय श्रमिकों में शिक्षा का अभाव है। वे श्रम संघों के उद्देश्य, अपने अधिकार और कत्र्तव्यों की पूर्ण जानकारी नहीं रखते तथा संघों के कार्यों में रुचि नहीं लेते हैं। श्रमिकों की प्रवासी प्रवृत्ति के कारण उनके संगठनों में स्थायित्व का अभाव रहता है। हड़ताल व तालाबंदी के दौरान अधिकांश श्रमिक अपने गाँवों को चले जाते हैं, जिससे आंदोलन विफल हो जाता है। इसके अलावा जाति-भेद, वर्ग-भेद, रीति-रिवाजों की भिन्नता आदि के कारण भी उनके संगठनों में प्रायः फूट पड़ती रहती है। श्रम संघों के नेतृत्व पर राजनीतिक नेताओं का कब्जा रहता है तथा वे श्रमिक समस्याओं की अनदेखी कर अपना हित साधते हैं। एक ही उद्योग में एक से अधिक श्रम संघ बन जाते हैं और इस फूट का लाभ सेवायोजक उठाते हैं। साधनों के अभाव में श्रम संघ के पास रचनात्मक कार्यों का अभाव रहता है ओर सदस्य भी संगठन के प्रति उदासीन हो जाते हैं। इसके साथ ही, कार्य की प्रतिकूल दशाओं के चलते थके-हारे श्रमिक संघ के कार्यों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं। श्रमिकों की निर्धनता का लाभ उठाकर उद्योगपति विभिन्न उपायों से श्रमिकों में फूट डालकर श्रम संघों का विकास नहीं होने देते। जबकि दूसरी ओर, श्रमिकों की भर्ती मध्यस्थों के हाथ में होती है, अतः वे अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए श्रम संघों का विरोध करते हैं। उपरोक्त सभी कारण सम्मिलित रूप से भारत में श्रम संघों के विकास में प्रमुख रूप से बाधक रहे हैं।

प्रश्न 8. भारत की व्यापार नीति की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: निर्यात संबंधी प्रोत्साहनों को सुदृढ़ करने तथा आयातों में ईष्टतम संकुचन के उद्देश्य से वाणिज्य मंत्राी पी. चिदम्बरम द्वारा जुलाई’ 91 में घोषित भारत की व्यापार नीति की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित हैंः
(i) नकद प्रतिपूरक मुआवजे के रूप में दिया जाने वाला अनुदान पूर्णतः समाप्त।
(ii) परवर्ती मुआवजे की एक समान दर 30 प्रतिशत कर दी गई तथा भारी सामान और कच्चे माल के आयात के लिए लाइसेंस समाप्त (इसमें छोटे उद्योगों व जीवन रक्षक दवाइयों को छूट)
(iii) परवर्ती मुआवजे का नाम बदलकर एक्सिम स्क्रिप किया गया। एक्सिम स्क्रिप प्राप्त करने की दर, जो पहले 5.10 प्रतिशत निर्यात कीमत के आधार पर थी, अब बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दी गयी।
(iv) आयात लाइसेंसिंग में चोर-बाजारी रोकने के लिए एक्सिम स्क्रिप खुलेआम खरीदे या बेचे जाएंगे।
(v) कुछ समय बाद एक्सिम स्क्रिप के स्थन पर विदेशी मुद्रा प्रमाण-पत्रा जारी करने का विचार।
(vi) भारत का रुपये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में तीन से पाँच वर्ष के भीतर पूर्णतः परिवर्तनीय मुद्रा का रूप ले लेगा।
(vii) अब तक खुले-आम लाइसेंस के अनतर्गत आयात की जाने वाली वस्तुयें आगे से एक्सिम स्क्रिम के द्वारा ही आयात होंगी।
(viii) आवेदन के 15 दिन के अंदर अग्रिम लाइसंस जारी कर दिये जाएंगे व उनका सरलीकरण किया जाएगा।
(ix) निर्यातकों को विदेशों में खाता खोलने व आयात की गयी वस्तु का भूगतान करने की स्वीकृत।
वास्तव में, सरकार की नीति लाइसेंस व्यवस्था तथा मशीनें, कच्चा माल व पूर्जे आदि के आयात में मात्रा संबंधी नियंत्राण को समाप्त करने की है। साथ-ही, सरकार की नीति आर्थिक स्थितिकरण व संरचनात्मक सुधार लाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पद्र्धात्मक व स्वावलम्बी बनाना है।

प्रश्न 9. भारत में बागवानी फसलों के नाम, उत्पादन क्षेत्रा, महत्व और इनके विकास के लिए सरकारी योजनाओं का उल्लेख करें।

उत्तर : बागवानी के तहत शीतोष्ण, उपोष्ण और उष्ण जलवायु वाले फल , शाक-सब्जियां , सजावटी पौधों, औषधियों में काम आने वाले पौधों, नारियल, सुपारी, मसालों, काजू, तेल-खजूर (Oilpalm), खुमी आदि का विकास किया जाता है।

  • केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर राज्य तथा नगरों के निकटवर्ती क्षेत्रा बागवानी फसलों के उत्पादन के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • कृषि में विविधता लाने, प्रति इकाई क्षेत्रा की आय में वृद्धि करने, रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने, पर्यावरण को बेहतर बनाने तथा लोगों के लिए पोषण का बेहतर स्तर सुनिश्चित करने की दृष्टि से बागवानी कृषि की एक महत्वपूर्ण गतिविधि है।
  • बागवानी प्रभाग के अंतर्गत दो बोर्ड और दो निदेशालय आते हैं। ये है - राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड और नारियल विकास बोर्ड तथा कोचीन स्थित काजू विकास निदेशालय तथा कालीकट स्थित कोको, सुपारी और मसाले विकास निदेशालय।

केन्द्रीय क्षेत्रा की और केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं -

(क) केन्द्रीय क्षेत्रा की योजनाएं -
(1) राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के कार्यक्रम;
(2) विशिष्ट पौधों के बाग लगाना;
(3) नारियल विकास बोर्ड के कार्यक्रम;
(4) केरल में तेल-खजूर के पेड़ लगाना और तेल-खजूर का संसाधन;
(5) काली मिर्च के लिए केन्द्रीय पौधशालाएं तैयार करना;
(6) कोका विकास के लिए योजना और
(7) फलों व शाक-सब्जियों विशेषकर सब्जियों के बीजों का उत्पादन;

(ख) केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं -
(1) बढ़िया सेब के उत्पादन के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी;
(2) केन्द्रशासित प्रदेशों में केला और अनानास के विकास के एकमुश्त कार्यक्रम;
(3) काजू के विकास के लिए एकमुश्त कार्यक्रम; और मसालों के विकास के लिए समन्वित कार्यक्रम।

प्रश्न 10. भारतीय कृषि के स्वरूप, महत्व और कृषि के पिछड़ेपन के कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर : भारतीय कृषि का स्वरूप और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान

  • भारत एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था है। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार देश की 74.28ः जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है।
  • योजना काल में सकल राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण रहा है परन्तु कृषि के तुलनात्मक योगदान में निरंतर कमी आई है। दूसरी ओर सकल राष्ट्रीय आय में उद्योग व सेवा क्षेत्रा के प्रतिशत हिस्सों में निरन्तर वृद्धि हुई है। कृषि उत्पादन न केवल देश की विशाल जनसंख्या को खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराता है बल्कि साथ ही अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग होने के कारण उद्योगों के लिए भी इसका बहुत महत्व है। कृषि उत्पादन भारत के निर्यात में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते है। वर्ष 1951 में कृषि क्षेत्रा में रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या 9 करोड़ 72 लाख थी जो वर्ष 1991 में बढ़कर 18 करोड़ 52 लाख हो गई।

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का कारण

(1) सामान्य कारण
(अ) कृषि क्षेत्रा में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव
(ब) ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन
(स) वित्त एवं विपणन सुविधाओं का अभाव
(द) मानसून की अनिश्चितता

(2) संस्थागत कारण
(अ) उपखण्डन एवं उपविभाजन के कारण खेतों का आकार छोटा होना।
(ब) भू-स्वामित्व की अनुचित पद्धति के कारण काश्तकारों पर लगान का भारी बोझ तथा असुरक्षा
(स) ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की अपर्याप्त मात्रा के कारण ऋण सुविधाओं का अभाव

(3) तकनीकी कारण
(अ) अधिकांशतः पिछड़ी एवं अव्यावहारिक पद्धति
(ब) बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों, उपकरणों आदि आगतों का अभाव।

प्रश्न 11. भारत में बागवानी और पुष्प कृषि पर चर्चा करें।

उत्तर : कृषि जलवायु की अत्यधिक विभिन्नता भारत को बागवानी फसलों की कई किस्मों का उत्पादन करने में सक्षम बनाती है जिसमें फल, सब्जियां, फूल, मसाले और बागानी फसलें शामिल हैं। सुव्यवस्थित उच्च भूमि की चाय और काॅफी बागानों से लेकर विस्तृत और प्रायः नारियल के पेड़ों की घनी तटीय पट्टियों के साथ-साथ अन्तभौम कन्द और मूल वाली फसलें देश में बागवानी संभाव्यता की विविध प्रकृति की परिचायक हैं। देश को केले, आम, नारियल और काजू के विश्व-उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त है और यह रसदार अनानास तथा सेब के उत्पादन वाले दस देशों में शामिल है। फूलगोभी के विश्व-उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है और आलू, टमाटर, प्याज और हरी मटर के उत्पादन वाले दस शीर्षस्थ देशों में शामिल है। बागवानी उत्पाद-फल, सब्जियां, फूल, काजू, मसाले कुल कृषि निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत होता है।

  • पुष्प कृषि-फूलों का उत्पादन, विशेषतया कटे हुए फूलों की निर्यात संभाव्यता, हाल के वर्षाें में अधिक उत्पादन वाले एक उदीयमान क्षेत्रा के रूप में उभरा है। वर्ष 1994.95 में अनुमानतः 30 करोड़ रुपए के फूलों का निर्यात हुआ। 2006 में यह एक व्यापार का रूप धारण कर चुकी है। इस क्षेत्रा में निर्यात संवृद्धि में तेजी लाने के लिए 200 से अधिक निर्यातोन्मुखी इकाइयों की पहचान की गई है।
  • आठवीं योजना अवधि (1992.97) में पादप गृहों, प्लास्टिक पलवारों और ड्रिप सिंचाई के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 250 करोड़ रुपए का निवेश नियत किया गया था जिसमें 200 करोड़ रुपए केवल ड्रिप सिंचाई के लिए उद्दिष्ट किए गए थे। ड्रिप सिंचाई के लिए प्रत्येक लाभ भोगी को केवल 1 हैक्टेयर हेतु सहायता देने के पूर्ववर्ती प्रतिबंध को वर्ष 1995.96 के दौरान हटा लिया गया है और अब यह सहायता लाभभोगी को बागवानी फसलें उगानें हेतु पूरी जोत के लिए दी जाती है। वर्ष 1996.97 के दौरान यह आर्थिक सहायता बढ़ाकर छोटे और सीमांत किसानों, अ.जा./अ.ज.जा. और महिला किसानों के लिए कुल लागत का 90 प्रतिशत या 25000 रुपये प्रति हेक्टयर, जो भी कम हो, तथा अन्य किसानों के लिए कुल लागत का 70 प्रतिशत या 25000 रुपये, जो भी कम हो, कर दी गई थी। कम लागत वाले पादप-गृहों को गैर-मौसम के दौरान सब्जियां उगाने के लिए लद्दाख जैसे ठंडे शुष्क क्षेत्रों में भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रश्न 12. भारतीय बीज कार्यक्रम का वर्णन करें।

उत्तर ः फसल का अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए गुणवत्ता वाले बीजों के उत्पादन में वृद्धि, वितरण और उपलब्धता त्वरित फसल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। बीज प्रौद्योगिकी की उपलब्धि जो सातवें दशक की हरित क्रान्ति और आठवें दशक में भी प्राप्त हुई थी दुर्भाग्यवश उसने नौवें दशक में अपनी वह गति खो दी। हाल के वर्षों में विशेषकर अनाजों और दलहनों के साथ-साथ फलों और सब्जियों के संबंध में बीजों की नई किस्में विकसित करने में कोई प्रत्यक्ष प्रगति नहीं हुई है। बीज प्रौद्योगिकी में किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि की कमी शायद नौवें दशक के दौरान खाद्यान्न उत्पादन में मन्द वृद्धि का एक मुख्य कारण है। यह गंभीर चिंता का विषय है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के लिए आवश्यक होगा कि वह वर्तमान बीज प्रौद्योगिकी परिदृश्य पर नई हानि वाले और तत्काल कुछ ऐसे उपाय करे जिससे कि विशेषतया सामाजिक रूप से संवेदनशील कुछ वस्तुओं में स्थिर उत्पादन की स्थिति में सुधार किया जा सके।

  • भारतीय बीज कार्यक्रम में प्रमुखतया बीज के अधिक उत्पादन के लिए सीमित उत्पादन प्रणाली अपनाई जाती है। इस प्रणाली में तीन तरह के उत्पादन अर्थात् प्रजनक, आधार और प्रामाणिक बीज होते हैं और यह किस्म की शुद्धता बनाए रखने के लिए बीज उत्पादन में वृद्धि की शृंखला में गुणवत्ता आश्वासन हेतु समुचित रक्षा उपाय उपलब्ध कराती है क्योंकि इसका प्रवाह प्रजनक अवस्था से किसानों की ओर होता है।
  • वर्ष 1969 से कृषि और बागवानी फसलांे की 2385 किस्मों को अधिसूचित किया गया है जिनमें से कृषि और बागवानी फसलों की 221 किस्मों को 1995.96 के दौरान अधिसूचित किया गया है। बीज नियंत्राण आदेश 1983 से बीजों के वितरण, आपूर्ति और व्यापार को विनियमित किया जाता है। विशेषकर खाद्य फसलों और अनाजों के लिए बीजों का उत्पादन और वितरण अभी भी प्रमुख रूप से राज्य के अभिकरणों द्वारा किया जा रहा है।

प्रश्न 13. भारत में उर्वरक के उत्पादन के लिए क्या किया जा रहा है?

उत्तर : देश के लिए समग्र रूप से नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटाश का कुल सही अनुपात 4:2:1 है परन्तु वर्तमान अखिल भारतीय एन.पी.के. के अनुपात इस मानदंड से काफी अलग हैं। खपत की प्रवृत्ति नाइट्रोजन उर्वरक के पक्ष में ही है जिसका प्रमुख प्रयोग विभिन्न उर्वरकों के लिए अपनाई गई मूल्य नीति के परिणामस्वरूप होता है।

  • फाॅस्फेटिक एवं पोटैशिक उर्वरकों (डी.ए.पी., एम.ओ.पी. तथा संयुक्त श्रेणी के उर्वरकों सहित) को अगस्त 1992 में विनियंत्रित किया गया था। केवल यूरिया (नाइट्रोजनीय उर्वरक) मूल्य नियंत्राण प्रणाली के अंतर्गत बना हुआ है तथा इसके उपभोक्ता मूल्य ( फार्म गेट) केा निम्न रखने के लिए भारी आर्थिक सहायता दी जाती है। मार्च 1992 से मार्च 1994 के बीच उर्वरकेां के साथ-साथ उर्वरक कच्चे मालों एवं मध्यवर्ती वस्तुओं के आयात को भी उत्तरोत्तर विसरणीकृत किया गया। 1992 में विनियंत्राण के परिणामस्वरूप फाॅस्फेटिक एवं पोटाशीय उर्वरकों के मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई। यूरिया, डी.ए.पी. तथा एम.ओ.पी. के मूल्यों में परिवर्तन तथा विनियंत्राण के पश्चात सापेक्षिक मूल्यों में परिवर्तनों को सूचीबद्ध किया गया है। विनियंत्राण के पश्चात् डी.ए.पी. के बिक्री मूल्य में वृद्धि प्रभाव को संतुलित करने के लिए देश में उत्पादित डी.ए.पी. पर आर्थिक सहायता जुलाई, 1996 से 1000 रु. प्रति मी. टन से बढ़ाकर 3000 रु. प्रति मी. टन एवं आयातित डी.ए.पी. के लिए 1500 रु. प्रति टन कर दी गई।
  • उर्वरकों का घरेलू उत्पादन आवश्यकता से कम होता है। पोटेशिक उर्वरकों के मामले में पूरी मात्रा आयात की जाती है। जबकि फाॅस्फेटिक एवं पोेटाशीय विनियण के बाद डी.ए.पी. तथा एम.ओ.पी. मूल्यों पर 1000 रु. प्रति टन की आर्थिक सहायता दी जाती है। के. खरीफ; आर-रबी उर्वरकेां के मूल्य विनियति बने हुए हैं, लेकिन नाईट्रोजनीय उर्वरक का मूल्य अभी भी नियंत्रित मूल्य प्रणाली के अधीन है जिससे घरेलू उत्पादक संयंत्रों को न केवल प्रति आर्थिक सहायता मिलती है बल्कि विक्रय मूल्य को औसत फैक्टरी अवधारणा मूल्य से काफी कम रखकर पूर्ण आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, क्योंकि यहां आने पर इसकी लागत घरेलू नियंत्रित विक्रय मूल्य की अपेक्षा अधिक होती है।
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