सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 17 (प्रश्न 14 से 27 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 17 (प्रश्न 14 से 27 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 14. पादप संरक्षण पर टिप्पणी करें। 

उत्तर : समन्वित कीट प्रबंध योजनाओं के माध्यम से कीट एवं रोग नियंत्राण, टिड्डी निगरानी एवं नियंत्राण तथा पादप एवं बीज संगरोधन वर्तमान में प्रचलित पादप संरक्षण प्रणालियों के तीन प्रमुख पहलू हैं। समन्वित कीट प्रबंध (आई.पी.एम.) में कीट अनुवीक्षण, कीटों के जैविक नियंत्रण का संवर्धन, प्रदर्शन आयोजित करना, आई.पी.एम. तकनीक का प्रशिक्षण एवं जागरूकता शामिल है।

  • पादप संरक्षण, संगरोधन तथा संग्रहण निदेशालय के अंतर्गत टिड्डी चेतावनी संगठन (एल.डब्ल्यू.ओ.) राजस्थान के अनुसूचित मरुस्थल क्षेत्रों के 2 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्रा तथा गुजरात एवं हरियाणा के भागों में टिड्डियों की संख्या को समय पर भू-नियंत्रित करने के लिए निगरानी करता है।
  • विषैले कीटनाशकों के व्यापक एवं अव्यवस्थित उपयोग का वायु, जल एवं मृदा को विषैला एवम् प्रदूषित करने के अलावा मनुष्यों तथा पशुओं के स्वास्थ्य पर विभिन्न प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं, इस प्रकार इस कारण सामान्य पारिस्थितिकीय असंतुलन हो सकता है। कीटनाशकों के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए कीट प्रबंध के अभिनव तरीके शुरू किए गए हैं। कीट समस्याओं के प्रबंध के लिए वनस्पतिक (नीम आधारित) तथा जैवीय कीटनाशकों, फेरोमाइन तथा अन्य जैव-रासायनिक उत्पादों सहित और सुरक्षित कीटनाशकों के प्रयोग केा बढ़ावा दिया जाता है। खासकर कपास, सब्जियों तथा चावल में आई.पी.एम. अपनाए जाने के परिणामस्वरूप कीटनाशकेां की खपत 1991-92 के 71133 टन से घटकर 1995-96 के दौरान 61260 टन हो गई है। 1995.96 के दौरान 49405 कृषकों तथा 7810 विस्तार अधिकारियों केा कृषि आर्थिक प्रणाली विश्लेषण सहित आई.पी.एम. तकनीक के विभिन्न पहलुओं संबंध प्रशिक्षण प्रदान किया गया। 1996.97 के दौरान 63,000 कृषकों तथा 10500 विस्तार अधिकारियों को चावल, कपास, सब्जियों, दलहनों तथा तेलहनों के संबंध में आई.पी.एम. प्रशिक्षण दिया गया। अभी विषैला कीटनाशक का प्रयोग बहुत कम किया जाता है।

प्रश्न 15. कृषि ऋण एवं बीमा कृषि ऋण का उल्लेख करें।

उत्तर : कृषि ऋण नीति का जोर निरन्तर लघु एवं सीमांत कृषकों तथा कमजोर वर्गों पर विशेष ध्यान देते हुए कृषकों को समय पर एवं यथेष्ट ऋण सहायता प्रदान करने पर रहा है। प्रति वर्ष ऋण सहायता में 25% तक वृद्धि करने तथा इस प्रकार पांच वर्षों की अवधि के अंदर आधार स्तर पर कृषि ऋण को दुगुना करने के प्रयास जारी हैं। वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्राीय ग्रामीण बैंक (आर.आर.बी) तथा सहकारी बैंक कृषि क्षेत्रा के लिए संस्थागत ऋण प्रदान करने के प्रमुख स्रोत हैं।

  • कृषि क्षेत्रा की अल्पकालिक ऋण आवश्यकता को पूरा करने में सहकारी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। अल्पावधिक अग्रिमों के लिए 90783 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों तथा दीर्घावधिक ऋण के लिए 1792 प्राथमिक इकाइयों सहित सहकारी ऋण संस्थाओं का नेटवर्क देश के सुदूर भाग में कृषकों को ऋण उपलब्ध कराने में सक्रिय रहा है। ऋण सहकारी समितियों द्वारा अल्पावधिक (उत्पादन) अग्रिम सकल संवितरण का 59% है। 1995.96 के दौरान वाणिज्यिक बैंक 35% के साथ दूसरे स्थान पर रहे तथा क्षेत्राीय ग्रामीण बैंकों ने शेष 6% ऋण प्रदान किया। मध्यम/दीर्घावधिक निवेश ऋण में सकल संवितरण में सहकारी समितियों का योगदान 35% था, जबकि वाणिज्यिक बैंकों का 58% तथा क्षेत्राीय ग्रामीण बैंकों का 7% हिस्सा था। यद्यपि कृषि ऋण में सहकारी समितियों के हिस्से में 1991.92 तक ह्नास समान प्रवृति दृष्टिगोचर हुई थी, लेकिन इसके बाद इसमें सुधार के लक्षण दिखाई दिए हैं। 
  • समग्र कृषि ऋण में महत्वपूर्ण वृद्धि के बावजूद अतिदेयताओं की एक गंभीर समस्या है, जिससे न सिर्फ ऋण विस्तार, बल्कि ऋणदाता संस्थाओं, विशेष रूप से सहकारी समितियों एवं क्षेत्राीय ग्रामीण बैंकों की आर्थिक व्यवहार्यता में भी बाधा आई है। वर्ष 1990 में कृषि ऋणों की माफी ने वसूली की समस्या को अत्यधिक विकट बना दिया था।
  • सहकारी बैंकों की व्यवहार्यता में सुधार के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने अक्टूबर 1994 से उधार देने हेतु (बशर्ते यह कम से कम 12% हो) तथा जमाराशि बढ़ाने हेतु सहकारी समितियों के लिए ब्याज दर की संरचना को विनियंत्रित कर दिया है। अगस्त, 1996 में भारतीय रिजर्व बैंक ने क्षेत्राीय ग्रामीण बैंकों के उधार दर को विनियंत्रित कर दिया।

प्रश्न 16. फसल बीमा योजना पर टिप्पणी करें।

उत्तर : प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 22 जून, 1999 को नयी राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना राष्ट्र को समर्पित की। यह योजना रबी सीजन, 1999-2000 से लागू की गई। प्रधानमंत्राी का कहना था कि भारतीय कृषि अब जल्द ही किसानों के लिए जोखिम से मुक्त हो जाएगी और भारतीय किसान अब आत्महत्या करने को विवश नहीं होंगे। यह नयी राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना पूर्व में बनी समग्र फसल बीमा योजना का नवीन एवं विस्तृत रूप होगी, जिसे समूचे देश में लागू किया जाएगा और इसमें सभी खाद्यान्नों और नकदी फसलों को शामिल किया जाएगा। नयी राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को राष्ट्र को समर्पित करते हुए प्रधानमंत्राी ने कहा कि यह योजना फिलहाल साधारण बीमा निगम (जी.आई.सी.) के जरिये तब तक सम्पन्न करायी जाएगी, जब तक कि अलग से भारतीय कृषि बीमा निगम की स्थापना नहीं हो जाती।

  • नयी राष्ट्रीय कृषि योजना से ग्रामीण भारत को व्यापक लाभ प्राप्त होंगे। केंद्रीय वित्त मंत्राी यशवंत सिन्हा के मुताबिक राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना सभी तरह की फसलों की हानि चाहे वह, किसी भी वजह, प्राकृतिक आपदा से हो या कृषि लागतों के असंतुलित उपयोग से हो वह नयी योजना की सेफ्ट-नेट में शामिल की जाएगी। पूर्व में इस योजना में केवल गेहूं, धान, तिलहन और दलहन फसलों को शामिल किया गया था। नयी स्कीम में उपरोक्त फसलों के अलावा गन्ना, आलू, कपास को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा पहले यह योजना केवल ऋण लेने वाले किसानों के लिए लागू थी और फसल बीमा की अधिकतम राशि दस हजार रुपये थी। नयी योजना में इस सीमा को समाप्त कर दिया गया है। पूर्व में कृषि बीमा योजना देश में केवल 18 प्रतिशत कृषि क्षेत्रा में लागू थी। अब यह स्कीम देश के सभी कृषि क्षेत्रा में लागू होगी। यह नयी योजना गैर ऋणी किसानों के लिए ऐच्छिक होगी।
  • नयी राष्ट्रीय कृषि बीमा में अन्य बागवानी और नकदी फसलों की बीमा योजना आगामी 3 वर्षों के भीतर शुरू करने की घोषणा की गयी है। नयी स्कीम के तहत बाजरा और तिलहन के प्रीमियम की मात्रा 3.5 प्रतिशत, खरीफ फसलों की प्रीमियक मात्रा 2.5 प्रतिशत, गेहूं के लिए मात्रा 1.5 प्रतिशत और अन्य रबी फसलों के लिए प्रीमियम की मात्रा 2 प्रतिशत रखी गयी है। नयी योजना की एक विशेषता यह है कि सीमांत व लघु कृषकों को प्रीमियम अदायगी में 50 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाएगी, पर अगले 5 वर्ष के भीतर इसे समाप्त कर दिया जाएगा।
  • कुछ राज्य/संघ राज्य क्षेत्र फसल बीमा योजना में 1985 से भागीदारी कर रहे हैं, जबकि कुछ भागीदारी के पश्चात् योजना से बाहर हो गए। 1985 में योजना के प्रारम्भ से इसमें लगभग 5.24 करोड़ कृषकों को शामिल किया गया है। भुगतान किए गए दावे की राशि  रबी मौसम 1995-96 तक एकत्रित लगभग 231 करोड़ रुपए प्रीमियम के विरुद्ध लगभग 1351 करोड़ रुपए थी। उपगत दावा अनुपात 1:5.85 लेने के कारण यह योजना अपने वर्तमान रूप में अत्यंत अव्यवहार्य है। तथापि, योजना का बीमा कम्पनियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, क्योंकि दावा निपटान पर होने वाली समूचे व्यय को कृषि मंत्रालय द्वारा पूरा किया जाता है। भारतीय साधारण बीमा निगम कृषि मंत्रालय की ओर से योजना का केवल संचालन करता है तथा इस हद तक प्रतिकूल दावा अनुपात साधारण बीमा निगम के लिए प्रासंगिक नहीं है। प्रतिकूल दावा अनुपात योजना के मापदण्डों में सुधार की आवश्यकता दर्शाता है, ताकि इसे वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाया जा सके। कृषि मंत्रालय ने यह प्रयास पहले ही शुरू कर दिया है।

प्रश्न 17. ”स्वराज पार्टी“ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: चैरा-चैरी की हिंसक घटना के बाद गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त कर दिया। इससे भारतीय लोगों में बड़ी निराशा फैल गयी। गाँधीजी के इस निर्णय का सभी जगह विरोध हुआ। बडे़-बडे़ नेताओं ने इसकी आलोचना की। भारतीय जनता का विचार था कि जब भारत को विजय मिलने वाली थी तो इस समय आन्दोलन को स्थगित करना जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय करना था। इसमें कांग्रेस के नेताओं में मतभेद पैदा हो गये। कांग्रेस का विरोध करने के लिए 1922 ई. में एक स्वराज नाम की बड़ी पार्टी बनायी गयी। इस पार्टी के अध्यक्ष देशबन्धु चितरंजनदास बने और पण्डित मोतीलाल नेहरू इसके सचिव थे। 1923 ई. के चुनावों में केन्द्रीय विधान सभा की 101 सीटों में से 42 स्थान स्वराज पार्टी को मिले। यह एक बहुत अच्छी विजय थी। जून, 1925 में देशबन्धु चितरंजनदास की मृत्यु हो गयी। उसके बाद गाँधीजी के प्रयत्नों से इस पार्टी का और कांग्रेस का पूर्ण रूप से विलय हो गया।

प्रश्न 18. ”नमक सत्याग्रह आन्दोलन“ का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर:  1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्राता का प्रस्ताव पास किया। इस अधिवेशन की अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू ने की। फरवरी, 1930 ई. में गांधीजी ने वायसराय को यह लिखा कि भारतीयों के पास ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ के अलावा कोई और साधन नहीं है। 12 मार्च, 1930 ई. की गांधीजी अपने कुछ साथियों के साथ साबरमती आश्रम से डांडी नामक स्थान की ओर रवाना हो गये। वहाँ उन्होंने समुद्र किनारे नमक बनाकर ‘नमक कानून’ तोड़ा। इस कानून को तोड़ने के साथ ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने जोर पकड़ लिया और सत्याग्रह फैल गया। हर गांव और शहर में गैरकानूनी ढंग से नमक बनाया जाने लगा तथा विदशी कपड़ों की होली जलायी जाने लगी। नमक कानून को तोड़ने का मुख्य उद्देश्य इस सविनय अवज्ञा आन्दोलन को शुरू करना था तथा नमक पर लगे 
कर को समाप्त करना था तथा लोगों को सस्ता नमक प्रदान करना था।

प्रश्न 19. राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी भी काफी अधिक महत्त्वपूर्ण रही। जिन महिलाओं ने इस भागीदारी में अपना योगदान दिया उनमें प्रमुख थी रानी लक्ष्मीबाई, श्रीमती एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित और श्रीमती इन्दिरा गाँधी। एक तरफ रानी लक्ष्मीबाई ने 1958 ई. में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध तलवार उठाकर यह सिद्ध कर दिया कि भारत की महिलाएँ पुरुषों से कम नहीं हैं। दूसरी ओर श्रीमती एनी बेंसेट ने थियोसोफिकल सोसाइटी नामक संस्था स्थापित करके भारत में एक आध्यात्मिक आन्दोलन को प्रारम्भ किया। इस संगठन का घनिष्ठ सम्बन्ध बाल विवाह, पर्दा प्रथा और निरक्षरता जैसी कुरीतियों को मिटाने से था। उसके पश्चात् सरोजनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित और श्रीमती इंदिरा गाँधी ने लोगों में, विशेषतौर से स्त्रिायों में अपने देश के प्रति पे्रम जगाया और उन्हें राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 20. ”आजाद हिन्द फौज“ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: कांग्रेस के बहुत से नेता गाँधी जी के अहिंसावादी आन्दोलनों से सहमत न थे। उनका मत था अंग्रेज हमें भीख द्वारा स्वतन्त्राता प्रदान नहीं करेंगे, हमें अपनी शक्ति द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करनी होगी। इन लोगों में प्रमुख थे-नेताजी सुभाचन्द्र बोस। उन्होंने क्रान्तिकारी मार्ग चुना और वे 1942 ई. में जेल से भागकर काबुल होते हुए जर्मनी पहुँचे। वहाँ से सहायता लेकर जापान और फिर सिंगापुर पहुँचे जहाँ उन्हें ‘आजाद-हिन्द फौज’ की स्थापना की। इस फौज का मुख्य नारा था ‘जय हिन्द’। इस फौज का उद्देश्य जापान की सहायता से सशस्त्रा संघर्ष करके भारत में से ब्रिटिश राज्य को समाप्त करना था। इन्होंने अक्टूबर, 1943 में इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। जापान के अमेरिका से हार जाने के कारण वह अपने उद्देश्य में सफल न हो सके। परिस्थिति वश आजाद-हिन्द-फौज दिल्ली न पहुँच सकी। इसी बीच वायुयान में आग लगने से नेताजी का देहान्त हो गया। फिर भी आजाद-हिन्द-फौज ने सन् 1945 तक देश के बाहर अपना आन्दोलन जारी रखा और भारतीयों को राष्ट्र-प्रेम, वीरता और बलिदान की प्रेरणा दी।
 

प्रश्न 21. ”भारत छोड़ो आन्दोलन“ का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।

उत्तर: मार्च, 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा गया जिसने भारतीयों की पूर्ण स्वतन्त्राता की माँग ठुकरा दी। इस पर गाँधीजी ने ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ का नारा दिया। उन्होंने कहा ‘करो या मरो’। गाँधाजी ने पुनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ दिया। उसी दिन ही (9 अगस्त, 1945) गाँधीजी, नेहरूजी आदि कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। सारे देश में प्रदर्शन आरम्भ हो गए। डाकखानों, रेलवे-स्टेशनों आदि सरकारी भवनों पर आक्रमण किए तथा जला दिए गए। इस पर सरकार ने अपना दमन चक्र तेज कर दिया। एक अनुमान के अनुसार इसमें 10,000 लोग गोलियों का शिकार हुए तथा असंख्योुं को जेलों में डाल दिया गया, जिससे लोगों में आक्रोश भड़क उठा।

प्रश्न 22. मुस्लिम लीग की स्थापना के क्या उद्देश्य थे ? भारत के स्वतन्त्राता आन्दोलन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर: अंग्रेजों की नीति थी ‘फूट डालो और राज्य करो’। इसके अन्तर्गत उन्होंने मुसलमानों को अपनी अलग संस्था बनाने के लिए उकसाया। परिणामस्वरूप पर आगाखाँ और नवाब मोहसिन उल्मुल्क के नेतृत्व में 1906 ई. में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।

लीग के उद्देश्य - मुस्लिम लीग के मुख्य उद्देश्य थे-(i) भारतीय मुसलमानों की रक्षा करना, (ii) मुसलमानों को कांग्रेस के प्रभाव से दूर रखना और (iii) अलग निर्वाचन-मण्डल बनवाना तथा अलग राज्य की माँग।

मुस्लिम लीग का स्वतन्त्राता आन्दोलन पर प्रभाव - 1906 से 1912 ई. तक इसका मुसलमानों पर काफी प्रभाव रहा। वे अंग्रेजों के इशारों पर नाचते रहे। यद्यपि 1916 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता हो गया। फिर भी इसके दूरगामी प्रभाव पड़े। 1906 से 1940 ई. तक मुसलमानों की बहुत बड़ी संख्या ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग नहीं लिया बल्कि कांग्रेस की मांगों का विरोध किया। 1940 ई. में जब भारत आजाद हुआ तो उसके दो टुकड़े हो गए-भारत और पाकिस्तान। इस प्रकार मुस्लिम लीग अंग्रेजों की, ”फूट डालो और राज करो“ की नीति का दुष्परिणाम थी। इससे भारत की अखण्डता समाप्त हो गई। देश में साम्प्रदायिक दंगे हुए तथा जनसंख्या का स्थानान्तरण हुआ और भारत तथा पाकिस्तान में कटुता पैदा हो गई।

प्रश्न 23. सर सैय्यद अहमद खाँ ने मुसलमानों में राष्ट्रीय जागृति के लिए क्या योगदान दिया ?

उत्तर : सर सैय्यद अहमद खाँ एक प्रगतिशील मुसलामन थे। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का अध्ययन किया था और सभी मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा दिलवाने के पक्ष में थे। उन्होंने मुस्लिम समाज में विद्यमान पुराने व संकीर्ण विचारों का विरोध किया और अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से विभिन्न प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त करने के लिए मुसलमानों का आह्वान किया। सैय्यद अहमद खाँ ने अलीगढ़ में एंग्लो-मोहम्डन ओरिएन्ट काॅलेज की स्थापना की जिसमें अंग्रेजी के माध्यम से मुसलमानों को ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दिए जाने की व्यवस्था की गई थी। धीरे-धीरे अलीगढ़ मुस्लिम संस्कृति का केन्द्र बन गया और मुस्लिम समाज ने सर सैय्यद अहमद खाँ को अपना नेता स्वीकार किया। इसी कारण सर सैय्यद अहमद खाँ के प्रयत्न को ”अलीगढ़ आन्दोलन“ के नाम से पुकारा जाने लगा। सारे देश के मुसलमान विद्यार्थी अलीगढ़ में शिक्षा प्राप्त करने  के लिए एकत्रा होने लगे। सन् 1920 में इस काॅलेज ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय का रूप धारण का लिया। सर सैय्यद अहमद खाँ एक बहुत बड़े समाज सुधारक भी थे। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। वे स्त्रिायों को शिक्षा दिये जाने के पक्षपाती थे और पर्दा प्रथा के कट्टर विरोधी थे।

प्रश्न 24. भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादियों का राजनीतिक सिद्धान्त मांगों व कार्य प्रणाली का वर्णन करो।

उत्तर: राष्ट्रीय आन्दोलन के दूसरे चरण (1905 से 1919 ई. तक) के युग को उग्रवादी युग कहा जाता है।

सिद्धान्त - उनका उद्देशय स्वराज्य प्राप्त करना था। तिलक ने घोषणा की कि स्वतन्त्राता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं उसे लेकर रहूँगा।
(ii) उनका विचार था कि स्वतन्त्राता त्याग और बलिदान से मिलती है।
(iii) वे चन्द्रगुप्त, राणा प्रताप, शिवाजी और गुरु गोविन्दसिंह के जीवन की प्रेरणा से भारत के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करना चाहते थे।

साधन - (1) उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन को देश के कोने-कोने में फैला दिया।
(ii) उन्होंने विदेशी वस्तुओं के प्रचार का बहिष्कार किया।
(iii) वे राजीनतिक जागृति के लिए राष्ट्रीय शिक्षा को जरूरी समझते थे।

मूल्याकांन - (i) उग्रवादियों ने राष्ट्रीय आन्देालन को जन-आन्दोलन बना दिया। उग्रवादियों ने स्वतन्त्राता जन्मसिद्ध अधिकार और भारत माता जैसे पवित्रा नारे दिये।
(ii) स्वदेशी आन्दोलन में भारतीयों में बलिदान और त्याग की भावना का जन्म हुआ। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि उग्रवादियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा देकर महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

प्रश्न 25. राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान भारत में हुए विभिन्न सामाजिक व धार्मिक आन्दोलनों पर एक निबन्ध लिखिए।

उत्तर: उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध जो अनेक सुधार आन्दोलन चलाये थे उन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने में बड़ा योगदान दिया। इन आन्दोलनों में जहाँ एक ओर लोगों का ध्यान तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों की ओर खींचा वही ंदूसरी ओर उन्होंने लोगों को विदेशी शासन के कुप्रभावों तथा अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे आर्थिक शोषण से भी अवगत कराया। ब्रह्म समाज, आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसाइटी, अलीगढ़ आन्दोलन ने लोगों की सामाजिक बुराइयों का जोरदार विरोध किया। ब्रह्म समाज के संस्थापक राममोहन राय ने एक सच्चे राष्ट्रीय नेता के रूप में लोगों को धर्म के नाम पर झगड़ना मूर्खतापूर्वक बताया तथा उन्होंने अवतारवाद, छूआछूत, अशिक्षा, बालविवाह और अन्ध-विश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाई आर्य समाज ने शुद्धि और संगठन का प्रचार करके असंगठित हिन्दुओं को संगठित किया। इस संस्था ने सम्पूर्ण भारतीय जनता को ‘स्वराज्य’ और ‘स्वदेशी’ के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है ‘विदेशी राज्य से, चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो स्वदेशी राज्य, उसमें कितनी ही त्राुटियाँ क्यों न हों, अच्छा होता है। ”रामकृष्ण मिशन के संस्थापक विवेकानन्द ने भारतीयों में स्वाभिमान का भाव जगाया और उनमें साहस का संचार किया। उन्होंने छुआछूत, गरीबी, पुरोहितवाद और शोषण की निन्दा की। उन्होंने ‘स्वतंत्राता ओर अधिकारों के लिए संधर्ष को उचित ठहराकर भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी। थियोसोफिकल सोसाइटी तथा होमरूल लीग के माध्यम से श्रीमती एनी बीसेंट ने स्वदेशी तथा राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार किया। उन्होंने लोगों को स्पष्ट रूप से बताया कि भारतीयों का उद्धार स्वयं भारतीयों द्वारा ही सम्भव है। उन्होंने भारत की अनेक समस्याओं (जैसे गरीबी, अस्पृश्यता, बाल-विवाह) के बारे में पुस्तकें लिखीं तथा भाषण दिये जिनसे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई।
मुसलमानों में भी सामाजिक एवं धािर्मक सुधार आन्दोलन के कारण राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हुई। अठारहवीं शताब्दी  में शुरू होने वाले अरब देशों के बहावी आन्दोलन के सन्देश में मुसलमानों को केवल एक अल्लाह की उपासना करने को कहा गया ओर पीरों तथा फकीरों की पूजा व उनके मजारों पर जाने से रोका। निःसन्देह इससे मुस्लिम सम्प्रदाय में एकता तथा जागृति आयी। उन्नीसवीं सदी में ही दूसरे धार्मिक आन्दोलन-अहमदिया आन्दोलन के रंगमंच से मिर्जा गुलाम अहमद ने मुहम्मद साहब के साथ-साथ अन्य धर्म के पैगम्बरों का भी आदर करने को कहा जिससे उदारता एवं सहनशीलता को बल मिला। आगे चलकर सर सैय्यद अहमद तथा उनके अनुयायियों ने अलीगढ़ आन्दोलन चलाया। उन्होंने मुस्लिम लोगों को पुराने व संकीर्ण विचार त्यागने तथा अंग्रेेजी एवं पाश्चात्य ढंग की शिक्षा प्राप्त करने के लिए कहा। उन्होंने पर्दा प्रथा का विरोध तथा स्त्राी-शिक्षा का समर्थन किया। शुरू में सर सैय्यद अहमद खां राष्ट्रवादी थे, परन्तु दुर्भाग्यवश बाद में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों की तरह मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से पृथक् रहने की सलाह दी ताकि वे (मुसलमान) ज्यादा सरकारी नौकरियाँ पा सकें लेकिन वे मूलतः एक राष्ट्रवादी तथा प्रगतिशील सुधारक थे। उन्होंने भी राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में किसी सीमा तक योगदान दिया था।

प्रश्न 26. वे सामाजिक बुराइयाँ बतावें जिनके विरुद्ध समाज-सुधार आन्दोलनों ने कार्य किया। किन्हीं तीन कुरीतियों का सविस्तार वर्णन करें।

उत्तर: भारतीय समाज में बहुत समय से कई प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ फैली हुई थीं। उनमें प्रमुख थीं: जाति प्रथा, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध, आधुनिक शिक्षा का विरोध आदि। समाज सुधारकों ने समय-समय पर अपने सुधार आन्दोलनों द्वारा इन बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया।

तीन प्रमुख कुरीतियाँ

(i) जाति प्रथा व छूआछूत - यह प्रथा भारत में सभी सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में थी आजकल भी है। हिन्दुओं में इसका परिणाम छुआ-छूत एवं शूद्रों से घृणा थी। आर्य समाज, ब्रह्म समाज तथा रामकृष्ण मिशन ने जाति प्रथा का विरोध किया और अछूतोद्वार और समानता का प्रचार किया।

(ii) सती प्रथा - यह हिन्दू समाज में प्रचलित एक ऐसी कुप्रथा थी जिससे स्त्राी समाज बहुत पीड़ित था। जिस स्त्राी के पति की मृत्यु हो जाती उसकी अपने पति के साथ ही चिता में जीवित जलना होता था। जो स्त्राी ऐसा नहीं करना चाहती उसको जबरन जलाया जाता था। यह प्रथा सती प्रथा कहलाती थी और जलने वाली विधवा स्त्राी सती कहलाती थी। हिन्दू समाज सुधारकों, मुख्यतः राजा राममोहन राय के प्रयत्नों से 1829 ई. में यह कुप्रथा कानून द्वारा बन्द हो गई।

(iii) बाल विवाह - बाल-विवाह की कुप्रथा भारतीय समाज में बहुत पुराने समय से फैली हुई है। आज भी यह बुराई हमारे समाज से समाप्त नहीं हुई है। नगरों में यह बुराई कम है जबकि गाँवों में अधिक फैली हुई है। बहुत समाज सुधारकों के प्रयत्नों से 1891 ई. में कानून द्वारा विवाह की आयु को बढ़ाया गया और 1926 ई. में ”शारदा एक्ट“ द्वारा बाल-विवाह को कानून विरोधी घोषित कर दिया गया। स्वतन्त्राता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने समय-समय पर काननू द्वारा बाल-विवाह पर पाबन्दी लगाई है तथा लड़कियों व लड़कों के विवाह की आयु को बढ़ाया है।

प्रश्न 27. असहयोग आन्दोलन क्यों शुरू किया गया ? इस आन्दोलन के कार्यक्रम तथा प्रगति का विवेचन कीजिए।

उत्तर: गाँधीजी ने रौलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड तथा मुसलमानों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध चलाये गये खिलाफत आन्दोलन को  देखते हुए, ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चलाने का निश्चय किया। असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम की स्वीकृति के लिए सितम्बर, 1920 ई. में कलकत्ता में कांग्रेस महासमिति का एक विशेष अधिवेशन बुुलाया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता लाला लाजपतराय ने की। गाँधीजी ने इस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव 
में उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार ने खिलाफत के बारे में दिये गये अपने कथनों का पालन नहीं किया एवं न केवल पंजाब के निर्दोष लोगों की अत्याचारी अधिकारियों से रक्षा नहीं की एवं उनकी अमानुषिक कार्यवाहियों को भी क्षमा कर दिया। अतः भारत के लोगों के पास अब इसके सिवाय और कोई चारा बाकी नहीं रहा कि वे गाँधीजी द्वारा बताए गए प्रगतिशील अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन को स्वीकार करें और तब तक चलाएं जब तक ऊपर कही गई गलतियाँ ठीक न हो जायें और स्वराज्य की स्थापना न हो जाये। गाँधीजी के इस प्रस्ताव को बहुतम से पास कर दिया गया। दिसम्बर, 1920 ई. में नागपुर के अधिवेशन में कांग्रेस ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव को पुनः पास कर दिया।

असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम -
(i) उपाधियाँ तथा अवैतनिक पदों का त्याग करना।
(ii) स्थानीय संस्थाओं में नामजद किए गए सदस्यों द्वारा त्याग पत्रा।
(iii) सरकारी दरबारों में उपस्थित होने से इन्कार करना।
(iv) नये विधानमण्डलों के चुनाव में खडे़ हुए उम्मीदवारों को बिठाना तथा मतदाताओं को चुनाव में मत डालने से रोकना।
(v) ब्रिटिश कचहरियों का वकीलों तथा मुकदमा लड़ने वाली पार्टियों द्वारा बहिष्कार।
(vi) विदेशी माल का त्याग तथा स्वदेशी माल का प्रयोग।
(vii) धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों तथा सरकारी सहायता से चल रहे स्कूलों से अपने बच्चों को हटाना।
(viii) सैनिकों, क्लकों तथा मजदूरों एवं मैसापोटामिया के लिए जाने से इन्कार करना। असहयोग आन्दोलन के दौरान कांग्रेस के द्वारा कुछ रचनात्मक कार्य भी किए गए। जैसे-कई संस्थाएँ खोली गई, देशी अदालतें स्थापित की गईं, घर-घर में चर्खे का प्रचार किया गया। असहयोग आन्दोलन के कार्यंक्रम की प्रगति - आन्दोलन के प्रस्ताव के पास हो जाने के पश्चात् गांधीजी ने सारे देश को आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रेरित किया। गांधीजी ने सर्वप्रथम कैसरे हिंद का पदक वापिस कर दिया, रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘सर’ की उपाधि इससे प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपनी-अपनी उपाधियाँ वापिस कर दीं। अनेकों न्यायालयों का व सरकारी समारोहों का बहिष्कार किया गया। भारतीय विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों व कालिजों को छोड़कर राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं में दाखिल होना शुरू कर दिया। अनेक प्रसिद्ध वकीलों जैसे-पं. मोती लाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, देश बन्धु चितरंजन दास, लाला लाजपतराय व डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद आदि ने अपनी वकालत छोड़कर इस आन्दोलन में भाग लिया। विदेशी कपड़े की स्थान-स्थान पर होली जलाई गई और लोगों ने देशी कपड़े पहनना शुरू कर दिया।

असहयोग आन्देालन का स्थगन - एक वर्ष से भी अधिक समय तक असहयोग आन्दोलन शान्तिपूर्वक अहिंसात्मक ढंग से चलता रहा। गाँधी जी की इच्छा थी कि आन्दोलन पूर्ण रूप से शान्तिमय रहे किन्तु देश के कुछ स्थानों में हिंसात्मक कार्यवाहियाँ हो गईं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में चैरी-चैरा नामक स्थान पर जब कांग्रेस का जुलूस निकल रहा था उस समय पुलिस ने अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप किया जिसका परिणाम यह हुआ कि भीड़ कुद्ध हो गई और आवेश में आकार उसने थानेदार व 21 सिपाहियों सहित थाने को जला डाला। दूसरी ओर चेन्नई में युवराज प्रिंस आॅफ वेल्स के भारत आगमन पर स्वागत समारोह में इसी प्रकार की हिंसा का प्रदर्शन हुआ। गाँधीजी के अनुसार आंदोलन का स्वरूप हिंसात्मक होते ही उनकी आत्मा का हनन हो गया और उसे इस रूप में चलाया जाना व्यर्थ था। अतः उन्होंने फरवरी सन् 1922 में असहयोग  आन्दोलन को स्थगित कर दिया।
यद्यपि असहयोग आन्दोलन के द्वारा भारत को स्वतन्त्राता तो प्राप्त न हो सकी परन्तु इसने भारतवासियों में महान त्याग, बलिदान और देशभक्ति की भावना भर दी।

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