सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

The document सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev is a part of the Class 10 Course Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi.
All you need of Class 10 at this link: Class 10

प्रश्न 1. (a) भारत में राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्राी के बीच संवैधानिक संबंधों की जांच कीजिये।
(b) क्या राज्यों को और ज्यादा स्वायत्तता प्रदान करना, विशेषकर हाल की हुई घटनाओं के संदर्भ में, देश की अखंडता को सुदृढ़ बनाने तथा आर्थिक विकास के संवर्धन के हित में होगा? परीक्षण कीजिये।

उत्तर (a): भारत में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्राी के बीच संबंध सदैव बहुत ज्यादा स्नेहपूर्ण नहीं रहें है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद और भारत के प्रथम प्रधानमंत्राी पं. जवाहरलाल नेहरू के मध्य विद्यमान मतभेद सर्वविदित हैं। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और भारत के पूर्व प्रधानमंत्राी स्व. राजीव गाँधी के बीच सम्बन्धों में कड़वाहट भी किसी से छुपी नही है। 1987 में संसद द्वारा पारित पोस्टल बिल को जैल सिंह ने संसद के पुनर्विचार के लिए भेज दिया था। राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति संविधान के अनुच्छेद 74(1) में स्पष्ट कर दी गई है, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का संचालन मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्राी के परामर्श से करेगा। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्राी के बीच संबंधों को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारण संविधान का 42 वाँ संशोधन है, जिसके अनुसार राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद् एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्राी की सलाह के अनुसार काम करेगा। 44वें संशोधन के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी परामर्श को मंत्रिपरिषद के पास पुनर्विचार के लिए एक बार भेज सकता है पर दुबारा वही परामर्श आने पर वह उसे मानने के लिए बाध्य है। लेकिन संविधान ने राष्ट्रपति को कुछ ऐसे अधिकार भी प्रदान किये हैं, जिससे उसकी शक्तियों का विशेष परिस्थितियों में महत्व बढ़ जाता है। अनुच्छेद .78 के अन्तर्गत यह प्रधानमंत्राी का कत्र्तव्य होगा कि वह देश के प्रशासनिक व विधायी मामलों व मंत्रिपरिषद के निर्णय से संबंधित कोई सूचना राष्ट्रपति को दे, यदि राष्ट्रपति इसे आवश्यक समझे। उसे संसद के किसी सदन या दोनों सदनों को संबोधित करने तथा संदेश भेजने का अधिकार प्राप्त (अनुच्छेद -86) है। कुछ मामलों में राष्ट्रपति को स्वविवेक की शक्ति का भी सहारा लेना होता है। 1979 में केंद्र में शासक दल (जनता पार्टी) में विभाजन हो जाने व प्रधानमंत्राी मोरारजी देसाई द्वारा त्यागपत्रा दे दिए जाने पर तत्कालीन राष्टपति नीलम संजीव रेड्डी ने चैधरी चरण सिंह को लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने की क्षमता से युक्त मानते हुए सरकार बनाने का मौका दिया लेकिन उन्होंने एक महीने से कम समय में ही बिना बहुमत सिद्ध किये त्यागपत्रा दे दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने जगजीवन राम द्वारा बहुमत प्राप्त करने के दावे को अस्वीकार करते हुए आम चुनावों के निर्देश दे दिए। इस पर भी यह आशा की जाती है कि भारत के राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने वाला व्यक्ति भारतीय संसदीय प्रणाली की समझ रखता है तथा उसे प्रधानमंत्राी व उनकी मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुरूप कार्य करने का स्वविवेक है।

उत्तर (b) : नेहरू युग के बाद, विशेषकर हाल-फिलहाल की घटनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि देश के अधिकांश राज्य अधिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण छोटी-छोटी क्षेत्राीय पार्टियों का उदय तथा केंद्र सरकार के पास अधिक आर्थिक अधिकार होना है। राज्य सरकारें स्वयं इतने संसाधन नहीं जुटा पाती हैं कि वे संविधान में दिए गए दायित्त्वों को पूरा कर सकें। इसीलिए उन्हें केंद्र की आर्थिक अधिकार होना है। राज्य सरकारें स्वयं इतने संसाधन नहीं जुटा पाती हैं कि वे संविधान में दिए गए दायित्त्वों को पूरा कर सकें। इसीलिए उन्हें केंद्र का आर्थिक विकास में बाधक होते हैं। वास्तव में, संघीय व्यवस्था में व्यवस्था का संचालन इस प्रकार हेाना चाहिए जिसमें राज्य भी देश के आर्थिक विकास में भागीदार बनें। राज्यों की संसाधनों में निम्न हिस्सेदारी के कारण उनकी आर्थिक स्वायत्तता पर असर पड़ता है। फिर उन्हें केंद्र द्वारा लादे गए कार्यक्रमों को भी चलाना पड़ता है। ये कार्यक्रम कभी-कभी उनकी क्षेत्राीय आवश्यकताओं के प्रतिकूल भी होते हैं। केंद्र से राज्यों को अधिक अनुदान मिलना चाहिए। इससे उनके वित्तीय संसाधनों में बढ़ोत्तरी होगी और उन कार्यक्रमों को विशेष बल मिलेगा, जो राज्यों के लिए आवश्यक हैं। उपरोक्त बातों को केंद्र को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। केंद्र सरकार को सरकारिया कमीशन के सुझावों को राज्यों की स्वायत्तता के हित में देखते हुए मान लेना चाहिए। भारत अखण्ड तभी रह सकता है जब राज्य सभी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएं। इससे राज्य प्रशासनिक संरचना में प्रजातंत्राीय आधार पर शामिल हो सकेंगे और अपना काम भी सुचारू रूप से सम्पन्न करेंगे।

प्रश्न 2. निम्नलिखित का उत्तर दीजिए। (प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 150 शब्द में होना चाहिए।)
(a) अनुसूचित क्षेत्र से संबंधित भारत के राष्ट्रपति के अधिकार का विवेचन कीजिए।
(b) वे कौन से संवैधानिक प्रावधान है, जो भारत में लोक सेवा आयोग की स्वतंत्राता को सुनिश्चित करते हैं।
(c) भारतीय राज्य व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष भावना तथा भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवेचन कीजिए।
(d) ‘भारत में योजना प्रचालन संघवाद के अपरदन की ओर ले गया है।’ विवेचन कीजिए।

उत्तर (a) : संसद द्वारा बनाये गए विधान के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई है कि वह किसी क्षेत्रा को ‘अनुसूचित क्षेत्रा’ घोषित कर दे (5वीं अनुसूची, पैरा 6, 7)। राष्ट्रपति ने इस शक्ति के अनुसरण में अनुसूचित क्षेत्रा आदेश, 1950 निकाला है। ये क्षेत्रा भिन्न राज्यों में ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में विनिर्दिष्ट जनजातियों के निवास क्षेत्रा हैं। संविधान की पाँचवीं और छठीं अनुसूची में उपबंधित प्रशासन के लक्षणानुसार, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्य को उक्त क्षेत्रों के प्रशासन के बारे मे निर्देश देने तक होगा तथा ऐसे राज्य का राज्यपाल, जिसमें अनुसूचित क्षेत्रा है, प्रति वर्ष या जब भी राष्ट्रपति अपेक्षा करे, उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा (अनुसूची 5 पैरा 3)। राज्यपाल के निर्देश पर उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण व उन्नति से संबंधित विषयों पर सलाह देने के लिए जनजाति सलाहकार परिषदों का गठन किया जाएगा (अनुसूची 5 पैरा 4)। राज्यपाल को यह प्राधिकार दिया गया है कि वह संसद का या उस राज्य के विधानमंडल का कोई विशिष्ट अधिनियम उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रा को लागू नहीं होगा। साथ ही, राज्यपाल को यह प्राधिकार दिया गया है कि वह अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा या उनमें भूमि के अतंरण कार प्रतिषेध या निर्बन्धन कर सकेगा। वह भूमि के आवंटन का और साहूकार के रूप में कारोबार का विनियमन कर सकेगा। राज्यपाल द्वारा बनाए गए उपरोक्त सभी विनियमों को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करनी होगी (अनुसूची 5 पैरा 5)। संविधान में, अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में प्रतिवेदन देने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था है। राष्ट्रपति ऐसे आयोग को कभी नियुक्त कर सकता है (अनुच्छेद -339(9), लेकिन संविधान के प्रारम्भ से दस वर्ष की समाप्ति पर ऐसे आयोग को नियुक्त करना आबद्धकारी है।

उत्तर (b) : संविधान के वे उपबंध हो कि भारत में लोक सेवा आयोग की स्वतंत्राता को सुनिश्चित करते हैं, निम्नलिखित हैंः
(i) आयोग का अध्यक्ष या सदस्य संविधान में विनिर्दिष्ट आधार पर उसी रीति से हटाया जा सकता है। (अनुच्छेद 317)A
(ii) लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवा शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा। (अनुच्छेद 318 का परन्तुक)।
(iii) आयोग का व्यय भारत की या राज्य की (यथास्थिति ) संचित निधि परभारित होगा। (अनुच्छेद 322)A
(iv) आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की सरकार के अधीन भावी नियोजन की बाबत कुछ निर्योग्यतायें हैं। (अनुच्छेद 319)A
सरकार के अधीन नियोजन के विरुद्ध संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की दशा में भारी वर्जनायें हैं। जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या संघ अथवा राज्य आयोग के अन्य सदस्यों की दशा में लोक सेवा आयोग में उच्चतर पद पर नियोजन किया जा सकता है, किन्तु आयोग के बाहर नहीं।

उत्तर (c) : भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, संविधान के अंतर्गत प्रकृति से धर्म निरपेक्ष अर्थात् भारत एक ऐसा राज्य है, जो सभी धर्मोंं के प्रति तटस्थता और निष्पक्षता का भाव रखता है। पंथ निरपेक्ष राज्य इस विचार पर आधारित होता है कि राज्य का विषय केवल व्यक्ति और व्यक्ति के संबंध से है, व्यक्ति और ईश्वर के बीच संबंध से नहीं। यह संबंध व्यक्ति के अंतःकरण का विषय है। संविधान के कई उपबंधों द्वारा सभी धर्मों के प्रति निष्पक्षता का दृष्टिकोण सुनिश्चित किया गया है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 25-28 में उल्लिखित है। राज्य किसी नागरिक को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संस्था की अभिवृद्धि या पोषण के लिए करों को संदाय करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। (अनुच्छेद 27) तथा पूर्णतः राज्य द्वारा वित्त पोषित किसी संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है। राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले व्यक्ति को उस संस्था द्वारा दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है (अनुच्छेद -28)। कुछ परिसीमाओं के अधीन रहते हुए भारत में प्रत्येक व्यक्ति को न केवल धार्मिक विश्वास का, बल्कि ऐसे विश्वास से जुड़े हुए आचरण करने का और अपने विचारों को दूसरों को उपदेश करने का अधिकार है (अनुच्छेद -25)A संविधान में प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय या उसके विभाग को धार्मिक या मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना या पोषण, धर्म-विषयक कार्यों का प्रबन्ध करने, स्थावर सम्पत्ति के अर्जन व स्वामित्व तथा ऐसी सम्पत्ति का विधि अनुसार प्रशासन करने का अधिकार (अनुच्छेद -26) है।
संविधान के उपरोक्त उपबन्ध अल्पसंख्यकों की राज्य में बराबरी की स्थति को सुनिश्चित करते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के लोग राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्राी, राजदूत, राज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश आदि पदों पर बड़ी संख्या में नियुक्त किये जाते रहे हैं। यद्यपि, सम्प्रदाय या जाति के आधार पर होने वाले पृथक निर्वाचन को समाप्त कर दिया गया है, लकिन इससे अल्पसंख्यक समुदायों के विकास व हितों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

उत्तर (d) : ‘आर्थिक और सामाजिक नियोजन’ भारतीय संविधान के सातवें परिशिष्ट की समवर्ती सूची का विषय है। समवर्ती सूची के विषयों के संबंध में संसद तथा राज्य के विधानमंडल दोनो ही विधि-निर्माण कर सकते हैं। इसका लाभ उठाकर केंद्र ने 15 मार्च, 1950 को बिना विधान बनाए मात्रा एक प्रस्ताव पारित करके संघ तथा राज्यों के समस्त प्रशासन पर अपनी नीतियों की व्यवहारिक एकरूपता स्थापित करने के लिए योजना आयोग की स्थापना कर दी। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में इस आयेाग का उल्लेख नहीं किया गया हैं योजना आयोग एक संवैधानिक निकाय न होकर एक परामर्शदात्राी संस्था है। एक संघीय देश मे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नियोजन को लेकर प्रायः मतभेद उत्पन्न होते रहते हैं, लेकिन योजना आयोग के प्रावधान द्वारा केंद्र ने राज्यों के ऊपर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लिया है। योजना आयोग राज्यों पर प्रभावी नियंत्राण, राज्यों की योजनाअेां व कार्यक्रमों की संस्तुति द्वारा रखता है। केंद्र सरकार द्वारा राज्येां को दी जाने वाली केंद्रीय सहायता की संस्तुति योजना आयोग द्वारा ही की जाती है। ये विवेकाधीन अनुदान होते हैं, जो कि संविधान की धारा 282 के तहत दिए जाते हैं। इसी प्रकार, राज्य सरकारों को ऋण भी योजना आयोग की संस्तुति पर ही जारी किए जाते हैं। ये सभी कारण केंद्र व राज्य सम्बन्धों में दबाव और तनाव उत्पन्न करते रहते हैं। यद्यपि, भारतीय संघात्मक गणराज्य में नियोजन को संवैधानिक आधार देने के लिए 1952 मे राष्ट्रीय विकास परिषद् का गठन किया गया, जो कि योजना आयेाग द्वारा तैयार योजना के प्रारूप को स्वीकार या उसमें परिवर्तन करती है। परिषद के सदस्य प्रधानमंत्राी, योजना आयोग के सदस्य व राज्यों के मुख्यमंत्राी होते हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद का मुख्य प्रयोजन योजना आयोग, केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के बीच समन्वय स्थापित करना है। लेकिन ये परिषदें आवश्यक परिणाम दे पाने में समर्थ नहीं हो पाई हैं।

प्रश्न 3. निम्नलिखित का अन्तर दें -
(a) मूल्यों पर आधारित राजनीति एवं व्यक्तित्त्व पर आधारित राजनीति के बीच के अंतर को समझाइए।
(b) काम चलाऊ सरकार तथा अल्पमत सरकार में अन्तर समझाइए।
(c) कब किसी राज्य का राज्यपाल किसी विधेयक (बिल) को भारत के राष्ट्रपति के विचारणार्थ आरक्षित कर सकता है?
(d) शिक्षा को राज्य सूची से निकालकर भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में क्यों डाल दिया गया था?
(e) मंत्रिमंडल के कार्यों को बताइए।
(f) प्रशासन में संगठन एवं पद्धति (ओ. तथा एम.) का क्या महत्व है?

उत्तर (a) : मूल्य-आधारित राजनीति -इस प्रकार की राजनीति की राजनीति में समाज के लिए हितकर मुद्दों के आलोचनात्मक विश्लेषण पर विषेश बल दिया जाता है। इसमें नीति संबंधी सिद्धांतों पर जोर रहता है।
व्यक्ति-आधारित राजनीति-इस प्रकार की राजनीति में किसी व्यक्ति विशेष की विचारधारा पूरी राजनीति को प्रभावित किए रहती है।

उत्तर (b) : काम चलाऊ सरकार (Care-taker Govt.)- संसद में बहुमत खो चुकी वह सरकार, जो राष्ट्रपति के अनुरोध पर नए चुनाव हो जाने तक शक्ति में बनी रहे।
अल्पमत सरकार (Minority Government)- अल्पमत सरकार का गठन तब होता है, जब सत्ताधारी दल को अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, लेकिन वह अन्य दलों के समर्थन से सरकार बना लेता है।

उत्तर (c) : राज्यपाल किसी भी विधेयक को कभी भी राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकता है। (अनुच्छेद -200)। उच्च न्यायालय की शक्तियों में परिवर्तन करने वाले किसी अधिनियम को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजा जाना अनिवार्य है।

उत्तर (d) : केंद्र व राज्य सरकार के बीच मतभेदों से बचने के लिए शिक्षा को राज्यसूची से हटाकर समवर्ती सूचीं में भेज दिया गया।

(e) : कैबिनेट, मंत्रिपरिषद के अन्तर्गत महत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रमुख मंत्रियों का एक संगठन (Body) है। कैबिनेट, सरकार की नीतिनिर्धारण करने वाली सर्वोच्च परिषद् है। यह नितियों को बनाने व लागू करवाने के लिए भी उत्तरदायी होती है।

(f): ओ. तथा एम. (आर्गेनाइजेशन एंड मेथाॅड) एक ऐसी संस्थानिक व्यवस्था है, जो सरकार के संगठन व प्रक्रिया को सुधारता है। यह सरकार की कार्यक्षमता में सुधार को सुनिश्चित करता है।

प्रश्न 4. आपके विचार से ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्याओं के क्या उपचार हैं?

उत्तर : भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता का काफी प्राचीन इतिहास है, जो कि सामंतशासी व्यवस्था के कारण असमान सामाजिक संरचना का परिणाम है। गाँवों में संयुक्त परिवार व्यवस्था, गृहस्वामी पर आश्रितों की अधिक संख्या, कृषि क्षेत्रा की निम्न उत्पादकता, कार्यशील लोगों की कमी, अंधविश्वास, भाग्यवादिता, सामाजिक प्रतिष्ठता व दिखावे के लिए किये गये कार्य आदि ऐसे कुछ कारण हैं जो किसी न किसी रूप में ग्रामीणों की ऋणग्रस्तता के लिए उत्तरदायी हैं। एक बार साहूकारों के ऋणजाल में फँस जाने के बाद ग्रामीण लोगों का उनके कुचक्र से निकलना काफी कठिन होता है। राज्य सरकारों को ग्रामीण लोगों को साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। मौजूदा मजदूरी अधिनियमों में परिवर्तन किया जाना चाहिए तथा न्यूनतम मजदूरी अधिनियम को प्रभावशाली ढंग से लागू करने की आवश्यकता है। गाँवों के विकास के लिए विकास कार्यक्रमों को तीव्रगति से लागू किया जाना चाहिए, इससे रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे। ग्रामीण कृषि श्रमिकों को सहकारी समितियों एवं व्यापारिक बैंकों से सस्ते मूल्य पर ऋण दिलाए जाने चाहिए। पुराने ऋणों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। कुटीर उद्योगों की स्थापना एवं अन्य अत्पादन कार्यों के लिए सस्ते मूल्य पर दीर्घकालीन साख की व्यवस्था कर दी जानी चाहिए। इससे रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आवश्यकताओं के मद्देनजर सहकारी समितियों व स्थानीय बैंकों द्वारा प्रदान किये जाने वाले ऋणों पर ब्याज दरों को न्यूनतम रखा जाना चाहिए तथा इस संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक को भी अपने नियमों व अधिनियमों की जाँच करनी चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में सभी आवश्यक चीजों का वितरण किया जाना चाहिए। श्रमिकों की सामाजिक व आर्थिक दशाओं में सुधार के लिए आवश्यक है कि पहले उनकी रोजगार व कार्य की दशाओं को सुधारा जाए। उनके कार्य के घंटे निश्चित किए जांए। सरकार को चाहिए कि वह भूमीहीन ग्रामीणों को ग्राम पंचायत की सहायता से आवास हेतु भूमि तथा सस्ती ब्याज दरों पर मकान बनाने हेतु ऋण उपलबध कराए। साथ-ही, साहूकारों द्वारा दिए जाने वाले ऋणों के संबंध में प्रभावी व स्पष्ट कानून बनाए जाएं। इन कानुनों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।

प्रश्न 5. वे कौन से कारक हैं, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सफलता को सुनिश्चित करते हैं?

उत्तर : सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) आशय एक ऐसी प्रणाली से है, जिसमें उपभोक्ता वस्तुओं को इस प्रकार वितरित किया जाता है कि वे सभी उपभोक्ताओं को निर्धारित मूल्य पर प्राप्त हो सके। इसके अन्र्तगत सरकार द्वारा निर्धारित मध्यस्थ विक्रेता ही वस्तुओं का क्रय.विक्रय करते हैं तथा उनके लाभ की मात्रा निश्चित होती है। भारत में खाद्यान्नों को उचित मूल्य पर बेचने वाली 2.5 लाख से अधिक राशन की दुकाने हैं; जहाँ-गेहूँ, चावल, चीनी, मैदा, सूजी, आटा, मिट्टी का तेल आदि सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों पर निश्चित मात्रा में विक्रय होता है। देश में लगभग 500 केन्द्रीय उपभोक्ता भण्डार तथा उनकी 3,500 शाखायें, 17,000 प्राथमिक उपभोक्ता सहकारी समितियाँ व 14 राज्य स्तरीय उपभोक्ता परिसंघ हैं, जो लगभग 1,600 करोड़ रुपये वार्षिक मूल्य की वस्तुओं की बिक्री करते हैं। देश में नियंत्रित कपड़े की दुकानों (लगभग 63,000) में 78 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर कोयला उपलब्ध कराने के लिए लगभग 25,000 कोयले के डिपों हैं। देश में 100 से अधिक सुपर बाजार भी कार्य कर रहे हैं। लेकिन सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार नगरों तक ही सीमित रहने, गाँवों में उचित वितरण व्यवस्था का अभाव, सरकार के पास वस्तुओं के स्टाॅक की कमी, अफसरशाही व सरकारी तंत्रा के भ्रष्टाचार के कारण इस प्रणाली में अनेक दोष आ गया हैं। अतः सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सफलता को मजबूत करने के लिए निम्न कदम उठाये जाने आवश्यक हैंः
(i) वितरण की जाने वाली आवश्यक वस्तुओं की स्पष्ट व्याख्या
(ii) चुनी हुई वस्तुओं के उत्पादन, प्राप्ति, वितरण की उचित व्यवस्था।
(iii) पी.डी.एस. के तहत वितरित वस्तुओं की प्रमाणिक सूची।
(iv) वस्तुओं की नियमित आपूर्ति व पर्याप्त बफर स्टाॅक।
(v) ग्रामीण, आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्रों में पी.डी.एस. का विस्तार।
(vi) अन्य आवश्यक वस्तुओं जेसे-चाय, साबुन, नमक, दालें आदि भी पी.डी.एस. में शामिल की जाएं।
(vii) वितरण लागत न्यूनतम करने के प्रयास। उपभोक्ता व विपणन सहकारी समितियों को सुदृढ़ किया जाए और परस्पर समन्वय स्थापित किया जाएं
(viii) ऐच्छिक उपभोक्ता संगठनों की स्थापना व सतर्कता विभाग द्वारा दुकानों का अचानक निरीक्षण।
(ix) वस्तुओं की अच्छी किस्म उपलब्ध कराई जाए तथा विक्रय दोष दूर किए जाएं।

प्रश्न 6. रुपए की आंशिक विनिमेयता क्या है? इसके मूल उद्देश्य क्या हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था को इनसे कैसे लाभ पहुँचेगा?

उत्तर : रुपए की आंशिक विनिमेयता या परिवर्तनीयता का अर्थ दोहरी विनिमय दर प्रणाली से है। वर्ष 1992.93 के बजट में भारत सरकार ने रुपए को आंशिक रूप से परिवर्तनीय बनाया था। इसके अन्तर्गत निर्यातकों और अन्य विदेशी मुद्रा अर्जित करने वालों को अपनी आय का चालीस प्रतिशत हिस्सा सरकार द्वारा (रिवर्ज बैंक द्वारा) अधिकृत विनिमय दर पर तथा शेष साठ प्रतिशत हिस्सा उच्च बाजार दरों पर विदेशी मुद्रा में परिवतर्तित करने की सुविधा दी गयी थी। सरकार द्वारा अधिकृत विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा केवल अत्यावश्यक आयातों के लिए ही उपलब्ध करायी जाती थी। इस व्यवस्था का एक उद्देश्य विदेशी मुद्रा को गुप्त रूप से हवाला बाजार में जाने से बचाना तो था ही, साथ ही, अत्यावश्यक आयातों को हत्सात्साहित करना व निर्यातकों को प्रोत्साहित करके अधिक विदेशी मुद्रा बर्जित करना भी था। इस दोहरी विनिमय दर प्रणाली में आयातकों के लिए भी प्रावधान निश्चित किये गए थे। निर्यातकों और अन्य विदेशी मुद्रा अर्जकों ने सरकारी दर पर अभ्यर्पित किये जाने वाले चालीस प्रतिशत भाग को आधार बनाकर इसको नुकसानदायक बताना शुरू कर दिया। अतः निर्यात को पूर्ण समर्थन देने के उद्देश्य से सरकार ने दोहरी विनिमय दर प्रणाली को समाप्त करके रुपये की आंशिक विनिमयता को पूर्ण विनिमयता में बदल दिया। इससे उत्पादन, पूंजी निवेश तथा निर्यात को बढ़ावा मिलने के साथ ही, कुछ अद्योगों में व्याप्त मंदी दूर होने की आशा है।

प्रश्न 7. कृषि क्षेत्रा के विशेष संदर्भ में भारत की आठवीं पंचवर्षीय योजना की मुख्य विशेषताओं का विवेचन कीजिए।

उत्तर: गत चार दशकों से खाद्यान्न व अन्य कृषि जिन्सों के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों व फसलों के असमान विकास को प्रोत्साहन मिला। अस्सी के दशक में कृषि पूंजी निवेश में कमी की प्रवृत्ति दिखाई दी। भारत सरकार ने कृषि विकास की गति को बनाए रखने व इसका आधार व्यापक करने के लिए आठवीं पंचवर्षीय योजना में इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया। आठवीं योजना में कृषि विकास की कार्यनीति का उद्देश्य न केवल अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से निर्यात के लिए कुछ विशिष्ट कृषि वस्तुओं का अतिरिक्त उत्पादन करना भी है। आठवीं योजना में कृषि कार्यक्रमों में निम्नलिखित पहलुओं पर जोर दिया गया थाः
(i) कृषि में विविधता लाना तथा बागवानी, पशुधन व मत्स्य पालन आदि का विकास करना।
(ii) पूर्वोत्तर क्षेत्रों में उत्पादकता में वृद्धि करके कृषि विकास की गति बढ़ाना।
(iii) वर्षा सिंचित क्षेत्रों का विकास करना।
(iv) तिलहन एवं दालों का उत्पादन बढ़ाना।
(v) सहकारी समितियों और कृषि ऋण संस्थाओं को फिर से सक्रिय बनाना तथा कृषि उत्पादों के विपणन को सुधारना।
(vi) फसल कटाई के बाद के कार्य की प्रौद्योगिकी विकसित करना।
(vii) भूमि सुधार व जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना।
(viii) कृषिगत निर्यातों को बढ़ावा देकर देश की निर्यात आय में वृद्धि करना।
(ix) योजना के अन्तर्गत कुल निवेश का 18.65 प्रतिशत कृषि के लिए प्रस्तावित।
(x) ग्रामीण विकास हेतु 30ए000 करोड़ रुपये का प्रावधान।
(xi) जवाहर रोजगार योजना व ग्रामीण विकास की नयी योजना को प्राथमिकता।

प्रश्न 8. भारतीय उद्योग के लिए दीर्घावधि एवं अल्पावधि वित्त के मुख्य स्रोत क्या हैं?

उत्तर : किसी भी देश का औद्योगिक विकास उसके औद्योगिक वित्त पर निर्भर करता है। भारत में उद्योगों को दीर्घकालिक, मध्यकालिक व अल्पकालिक, इन तीन प्रकार के वित्त की व्यवस्था करनी होती है। औद्योगिक वित्त के मुख्य प्रबंध स्रोत में शेयर, ऋणपत्रा, सार्वजनिक जमा, बैंक उधार व औद्योगिक संस्थान आते हैं। अल्पावधि वित्त का प्रबंध करने में अनुसूचित व्यापारिक बैंकों, जनता से प्राप्त जमाओं तथा बैंकरों की मुख्य भूमिका है। मध्यम स्तर के उद्योगों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लघु उद्योग विकास बैंक व राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एन.एस.आई.सी.), राज्यीय वित्त निगम (एस.एस.सी.) स्थापित किये गए हैं। साथ ही, जीवन बीमा निगम व इसकी सहायक कंपनियां भी वित्त प्रबंध में सक्रिय हैं। देश में बढ़ते औद्योगिकरण की आवश्यकतों के मद्देनजर सरकार ने निम्न संस्थाओं की स्थापना कीः

  • औद्योगिक वित्त निगम (आई.एफ.सी.आई. 1948),
  • भारतीय औद्योगिक उधार व विनियोग निगम (आई.सी.आई.सी.आई. 1955),
  • भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (आई.डी.बी.आई, 1964),
  • यूनिट ट्रस्ट आॅफ इंडिया ; यू.टी.आई., 1964द्धए
  • भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्जिम बैंक) । 1982 से ये सभी संस्थाएं उद्योगों को दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध करती हैं।

प्रश्न 9. ‘समाकलित ग्राम विकास’ के सामरिक महत्त्व को समझाते हुए इस पद की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : भारतीय अर्थव्यवस्था में गांवों की महत्त्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित है, तथापि इनके साथ निर्धनता, बेरोजगारी व भूमि संबंधी विभिन्न समस्याएं निरंतर जुड़ी हुई हैं। इन समस्याओं के निवारणार्थ चैथी पंचवर्षीय योजना में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से अनेक कार्यक्रम आरंभ किए गए, जैसे- एस.एफ.डी.ए., एम.एफ.ए.एल., डी.पी.ए.पी., सी.एस.आर.ई., पी.आई.आर.ई.पी. आदि। लेकिन ये सभी कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं हो पाए। राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास को प्राथमिकता देते हुए 2 अक्टूबर, 1980 को
समाकलित ग्राम विकास कार्यक्रम (आई.आर.डी.पी.) आरम्भ किया गया। केन्द्र और राज्यों द्वारा 50.50 के अनुपात में वित्तपोषित इस कार्यक्रम का उद्देश्य गरीबी उन्मूलन अर्थात पता लगाए गए ग्रामीण गरीब परिवार को गरीबी रेखा को पार करने के लिए समर्थ बनाना हे। इस उद्देश्य को, लक्षित समूहों को उत्पादक परिसंपत्तियां तथा निवेश उपलब्ध कराकर प्राप्त किया जाता है। ये परिसंपत्तियां प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक क्षेत्रों में वित्तीय सहायता के माध्यम से उपलब्ध करायी जाती हैं। यह वित्तीय सहायता सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी तथा वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिये गए सावधि ऋणों के रूप में होती है। यह कार्यक्रम देश के सभी विकास खंडों में चलाया जा रहा है।

प्रश्न 10 : भारत में औद्योगिक विकास की नई रणनीति के एक अंग के रूप में भारत सरकार ने सीधे विदेशी पूँजी निवेश को आकर्षित करने के लिए क्या उपाय अपनाए हैं?

उत्तर : वर्ष 1990.91 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकट स्थिति के उपरांत अर्थव्यवस्था में संचरात्मक सुधारों के कार्यक्रम लागू किये गए। नयी आर्थिक नीति के तहत विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए उल्लेखनीय उपाय किये गए, जिनसे देश में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश हुआ तथा भारत के विदेशी विनिमय कोष में अत्यधिक वृद्धि हुई। प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैंः
1. वर्ष 1991 की नयी औद्योगिक नीति में उच्च प्राथमिकता प्राप्त 34 उद्योगों को अपनी पूंजी के 51 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी के लिए स्वतः अनुमोदन की स्वीकृति।
2. उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में पूंजी और आय की प्रत्यावर्तन नीयत के साथ प्रवासी भारतीयों को शत-प्रतिशत इक्विटी तक निवेशकी अनुमति।
3. भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को आर.बी.आई. की अनुमति बिना ही आवासीय सम्पत्ति खरीदने की स्वीकृति।
4. जनवरीष् 93 में फेरा के उपबंधों को उदार बनाया गया।
5. अप्रैल’92 में भारत बहुपक्षीय पूंजी निवेश गारंटी एजेंसी (एम.आई.जी.ए.-मीगा) में शामिल। उल्लेखनीय है कि ‘मीगा’ मुद्रा परिवर्तन और हस्तांतरण पर पाबंदियों से उत्पन्न जोखिम से पूंजी निवेश करने वालों की रक्षा करती है। यह पूंजी निवेश पर लाभ की गारंटी भी दिलाती है।
6. मई ' 92 से विदेशी कंपनियों को देशी बिक्री के संबंध में अपने व्यापार चिन्ह (प्रतीक) प्रयोग करने की स्वीकृति दी गयी।
7. वर्ष 1992.93 के बजट में रुपये को व्यापार खाते में आंशिक रूप से व वर्ष 1993.94 के बजट में व्यापार खाते में पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया।
8. वर्ष 1994.95 के बजट की घोषणानुसार अगस्त’94 में चालू खाते में रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया है। इससे अब विदेशी निवेशक अपनी पूरी आय को चरणबद्ध रूप से (तीसरे चरण में वर्ष 1996.97 के बाद) ले जा सकेंगे। इससे सीधे विदेशी पूंजी निवेश में वृद्धि होगी।
9. आयत-निर्यात शुल्क एवं उत्पाद शुल्क के ढांचे का सरलीकरण किया गया।
इस प्रकार, औद्योगिक विकास की नयी नीति के फलस्वरूप अगस्त’91 से दिसंबर’.93 के बीच 13 हजाार 160 करोड़ रुपये व इससे अगले वर्ष में 7,220 करोड़ रुपये के विदेशी निवश्ेा प्रस्तावों को मंजूर किया। अमरीका, ब्रिटेन व जर्मनी क्रमशः सबसे बड़े निवेशक सिद्ध हुए।

प्रश्न 11. कृषि विपणन पर टिप्पणी करें।

उत्तर : पेट्रोलियम, कोयला, नाइट्रोजनीय उर्वरक को छोड़कर जिनकी कीमतें नियंत्रित होती हैं कृषि वस्तुओं की कीमतें मांग एवं पूर्ति की सामान्य शक्तियों द्वारा संचालित होती हैं। कृषि बाजारों का नियमन एवं विकास, कृषि वस्तुओं का मानकीकरण एवं श्रेणीकरण, कृषि उत्पाद बाजारों में आधारभूत ढांचे की सुविधाओं के सृजन के लिए सहायता तथा ग्रामीण गोदामों की स्थापना के लिए सहायता कृषि विपणन के अंतर्गत आने वाली मुख्य गतिविधियां हैं। सरकार की भूमिका मुख्यतया फार्म समर्थक नीतियों के माध्यम से उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनांे के हितों का संरक्षण करने तथा कृषि जिंसों के संगठित विपणन को बढ़ावा देने तक सीमित है। कृषि उत्पाद संबंधी बाजारों के विनियमन हेतु अधिकांश राज्य सरकारों ने आवश्यक कानून भी बनाए हैं।

  • उत्पादन, मूल्य निर्धारण और कृषि उत्पादों के विपणन को प्रभावित करने वाली उत्पाद एवं क्षेत्रा संबंधी विशिष्ट समस्याओं का समाधान करने में इस समय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सी.ए.सी.पी.), भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.), भारतीय पटसन निगम (जे.सी.आई.) तथा जिंस बोर्ड जैसे कुछ संगठन एवं संस्थाएं लगी हुई हैं।
  • केन्द्रीय सरकार ने विपणन हेतु आधारभूत ढांचे की सुविधाओं के सृजन तथा ग्रामीण गोदामों की स्थापना के लिए भी सहायता प्रदान की है।
  • कृषि उत्पादकों को पहंुच तथा उत्पादों की दूर तक बिक्री में सहायता देने के लिए राष्ट्रीय स्तर, राज्य स्तर एवं प्राथमिक स्तर पर सहकारी समितियों का एक नेटवर्क कार्य करता है। राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (एन.सी.डी.सी.) सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि उत्पादों के विपणन, संग्रहण, उत्पादन, निर्यात एवं आयात के लिए ग्रामीण नीति तैयार करने वाला शीर्षस्थ संगठन है। एन.डी.एम.सी. ने मार्च, 1996 के अंत तक 7.386 लाख टन की संस्थापित क्षमता वाले 248 शीतागारों की स्थापना के लिए 79.97 रुपए प्रदान किए हैं।
  • भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लि. (नैफेड) चुनिन्दा कृषि जिंसों के वितरण, प्रापण, निर्यात और आयात में कार्यरत एक शीर्षस्थ सहकारी संगठन है। दलहनों तथा तिलहनों के लिए समर्थन मूल्य संबंधी कार्य तथा उद्यान कृषि की वस्तुओं आलू, प्याज, अंगूर, किन्नू/माल्टा, काली मिर्च तथा सूखी लाल मिर्च आदि के लिए बाजार में हस्तक्षेप कार्रवाई करने के लिए नैफेड एक केन्द्रीय नोडल अभिकरण है। 1996-97 के लिए नैफेड की कुल बिक्री का लक्ष्य 936 करोड़ रुपए है। सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि उत्पादनों के विपणन में 1980-81 के 1950 करोड़ रुपए से 1994-95 में लगभग 9503.84 करोड़ रुपए की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राष्ट्रीय सहकारी तम्बाकू उत्पादक संघ लि., राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ तथा विशेष तौर पर जनजातीय क्षेत्रों की समस्याओं पर ध्यान देने वाला भारतीय जनजातीय सहकारिता विपणन विकास संघ लिमिटेड सहकारी क्षेत्रा के अन्य संगठन हैं।

प्रश्न 12. कृषि अनुसंधान, शिक्षा एवं इसकें विस्तार पर चर्चा करें।

उत्तर : भारतीय कृषि एवं अनुसंधान परिषद कृषि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा इसके अनुप्रयोग के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सर्वोत्तम किस्म की अपेक्षा प्रति हेक्टेयर एक टन की अधिक उपज के सुस्पष्ट लाभ वाले चावल की संकर किस्में 1996 में 50,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रा में सामान्य कृषि के लिए जारी की गई। एक राष्ट्रीय जीन बैंक, जो कि एशिया में सबसें बड़ा है, नई दिल्ली में खोला गया है।

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अतिरिक्त 29 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, उत्तर पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रा के लिए एक केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, परिषद के चार राष्ट्रीय संस्थान, यथा-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान, राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान तथा केन्द्रीय मत्स्य पालन शिक्षा संस्थान के लिए हैं, जो कि विशिष्ट क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य करते हैं। वर्ष के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्रों (के.वी.के.) द्वारा कृषि उत्पादन के विभिन्न पहलुओं पर 2.51 लाख किसानेां, कृषक महिलाओं तथा ग्रामीण युवकों को प्रशिक्षित किये जाने की आशा है।
  • अनुसंधान, विस्तार तथा सुपुर्दगी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अब गैर-सरकारी संगठनों को शामिल किया जाना शुरू किया गया है। दो योजनाओं अर्थात् ”स्वैच्छिक संगठन के माध्यम से कृषि विस्तार“ को 14 स्वैच्छिक संगठनों द्वारा व्यापक आधार पर 6 राज्यों में 1994.95 में प्रारम्भ किया गया तथा ”कृषि योजना में महिलाएं“ को 7 राज्यों के 7 जिलों में शुरू किया गया।

प्रश्न 13. कृषि आयकर पर चर्चा करें।

उत्तर : कृषि कर

  • कृषि क्षेत्रा में प्रत्यक्ष करों में भू-राजस्व, कृषि आय कर और नकद फसलों पर लगाए जाने वाले उप-कर आते हैं। साथ ही यह क्षेत्रा केन्द्र और राज्य सरकारों के कोष में भी एक बड़ी रकम अप्रत्यक्ष कर के रूप में (उत्पादन शुल्क, बिक्रीकर, परिवहन सेवा, संचार साधन मनोरंजन कर, सुविधा शुल्क, आयात-निर्यात शुल्क तथा भूमि के क्रय-विक्रय पर लगने वाले टिकट का निबंधन शुल्क) भुगतान कर रहा है। कृषि क्षेत्रा में कराधान राज्य सरकारों की परिधि में आता है।

कृषि आय

  • कृषि आय का क्या आशय है, सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है। आयकर अधिनियम 1961 की धारा 2(1,) के अनुसार ‘कृषि आय’ से तात्पर्य है (अ) कोई किराया या लगान जो ऐसी भूमि से प्राप्त हो जो भारत में स्थित है तथा कृषि कार्यों में लाई जाती है; (ब) ऐसी आय जो निम्नलिखित क्रियाओं से हुई हो-(i) कृषि क्रिया, (ii) कृषक अथवा भूमि का किराया अथवा लगान प्राप्त करने वाले द्वारा उपज को विक्रय योग्य बनाने के लिए साधारणतया की जाने वाली क्रिया, (iii) कृषक अथवा भूमि का किराया अथवा लगान प्राप्त करने वाले द्वारा अपनी उपज (जिसके सम्बन्ध में केवल उपर्युक्त वर्णित क्रिया की गई हो) की बिक्री; (स) ऐसी भूमि का किराया अथवा लगान प्राप्त करने वाले के स्वामित्व वाले ऐसे मकान से आय जो उसके कब्जे (प्रयोग) में हो बशर्ते कि-(i) यह मकान उस भूमि पर अथवा उसके बिल्कुल निकट स्थित हो तथा यह मकान कृषक अथवा लगान प्राप्त करने वाले के रहने के लिए अथवा भूमि के सम्बन्ध में बाहरी मकान के रूप में प्रयोग के लिए हो, तथा (ii) इस भूमि पर भारत में लगान लगता हो अथवा कोई स्थानीय कर लगता हो जो सरकारी अफसरों द्वारा निर्धारित तथा वसूल किया जाता हो।
  • यदि इस भूमि पर लगान अथवा स्थानीय कर नहीं लगता तो वह भूमि निम्न क्षेत्रा में स्थित होनी चाहिएः (क) दस हजार से कम आबादी वाले नगरपालिका अथवा छावनी बोर्ड के क्षेत्रा में, अथवा (ख) नगरपालिका अथवा छावनी बोर्ड की स्थानीय सीमाओं से अधिक से अधिक 8 किलोमीटर दूर के क्षेत्रा में। केन्द्रीय सरकार को अधिकार है कि किसी भी नगरपालिका अथवा छावनी बोर्ड के लिए सीमा 8 किलोमीटर से कम निश्चित कर सकती है।
  • इस प्रकार कृषि आय में (अ) भूमि से प्राप्त किराया जो लगान, (ब) भूमि पर कृषि करने से प्राप्त आय, (स) भूमि पर उपज को विक्रय योग्य बनाने वाली क्रिया से प्राप्त आय और (द) कृषि के कार्य में आने वाले मकान की आय भी सम्मिलित की जाती है। कृषि आय कर मुक्त है लेकिन कुछ दशाओं में गैरकृषि आय पर कर निर्धारण के लिए कृषि आय को कुल आय में सम्मिलित किया जाता है।

कृषि आय कर

  • देश में सर्वप्रथम 1935 में कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया। बिहार राज्य ने सबसे पहले 1938 में यह कर लगाया। इसके बाद अन्य राज्य सरकारों ने क्रमशः यह कर लगाया। कृषि आयकर की अधिकांश आय बागानों (चाय, कहवा, रबड़) से प्राप्त होती है। विभिन्न राज्यों में कृषि आय कर की दर एवं छूट की सीमा में विषमता है। यह छूट की सीमा रकम और जोत के क्षेत्राफल दोनों में दी गई है। पहली पंचवर्षीय योजना में राज्य सरकारों की अपनी कुल प्रत्यक्ष करों की आय में कृषि आय कर का हिस्सा 4.96 प्रतिशत था जो दूसरी, तीसरी, चैथी, पांचवी, छठी और सातवीं योजनाओं में क्रमशः 6.13 प्रतिशत, 5.20 प्रतिशत, 4.56 प्रतिशत, 7.21 प्रतिशत, 5.22 प्रतिशत और 4.27 प्रतिशत प्रतिशत रहा। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उपरोक्त अवधि में कृषि आयकर का हिस्सा 4 से 7 प्रतिशत के बीच रहा। इसी प्रकार विभिन्न वार्षिक योजनावधियों में यह हिस्सा 2 से 6 प्रतिशत के बीच रहा लेकिन वर्ष 1978/79 और वर्ष 1979/80 की अवधि में यह क्रमशः 12.46 प्रतिशत और 9.19 प्रतिशत रहा। यदि कृषि आय कर से प्राप्त आय का ही अवलोकन किया जाए तो ज्ञात होता है कि पहली पंचवर्षीय योजना में इस कर से 24.70 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जो दूसरी, तीसरी, चैथी, पांचवी, छठी और सातवीं योजनावधि में क्रमशः 42.50, 48.90, 61.50, 138.90, 242.60 और 450.20 करोड़ रुपये रहे जो इस बात की ओर इंगित करता है कि कृषि आय कर से प्राप्त होने वाली आय में लगातार वृद्धि हुई है।
  • विभिन्न पंचवषीय योजनावधियों में कृषि आयकर का हिस्सा राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद के 0.03 प्रतिशत से 0.06 प्रतिशत के बीच रहा। वर्ष 1978/79 में कृषि आय कर का हिस्सा जी.डी.पी. में सबसे अधिक 0.08 प्रतिशत रहा। यह हिस्सा 1979/80 में 0.05 प्रतिशत, 1990/91 में 0.04 प्रतिशत, 1991/92 में 0.03 प्रतिशत और 1992/93 में 0.02 प्रतिशत रहा।

इस प्रकार कृषि आय कर का हिस्सा सकल घरेलू उत्पाद में कम होता दिखाई पड़ता है।

  • इससे मुख्य रूप से दो बातें स्पष्ट होती हैंः

(i) कृषि आयकर से प्राप्त होने वाली आय में वृद्धि होती दिखाई पड़ती है और
(ii) सकल घरेलू उत्पाद में इस कर से प्राप्त होने वाली आय के हिस्से में गिरावट आ रही है।

Offer running on EduRev: Apply code STAYHOME200 to get INR 200 off on our premium plan EduRev Infinity!

Related Searches

Viva Questions

,

pdf

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

Sample Paper

,

study material

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

Previous Year Questions with Solutions

,

video lectures

,

shortcuts and tricks

,

Objective type Questions

,

ppt

,

Summary

,

Semester Notes

,

Free

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 18 (प्रश्न 1 से 13 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

Extra Questions

,

Important questions

,

MCQs

,

past year papers

,

mock tests for examination

,

Exam

,

practice quizzes

;