सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 19 (प्रश्न 1 से 16 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 19 (प्रश्न 1 से 16 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1. (a) भारत के संविधान की संशोधन प्रक्रिया की सामान्य विशिष्टताएं क्या हैं?

(b) आंचलिक (क्षेत्राीय) परिषद क्या है? अन्तर्राज्यीय सौहार्द प्राप्त करने के संदर्भ में इनके संविधान, भूमिका तथा महत्त्व का विवेचन कीजिए।

उत्तर (a): भारतीय संविधान में संशोधन प्रक्रिया का वर्णन अनुच्छेद-368 में वर्णित हैं। भारतीय संविधान में संशोधन की निम्न तीन रीतियों का समावेश किया गया हैः

(i) सामान्य बहुमत: संसद के सामान्य बहुमत से पास होने व राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाने के बाद किसी विधेयक द्वारा संविधान में संशोधन किया जा सकता है। नए राज्य का निर्माण; राज्य के क्षेत्रा, सीमा व नाम में परिवर्तन; राज्य की व्यवस्थापिका के दूसरे सदन का उन्मूलन व पुर्नस्थान; नागरिकता; अनुसूचित क्षेत्रों, अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन व केन्द्र शासित क्षेत्रों की प्रशासन संबंधी व्यवस्थाओं में संशोधन संसद द्वारा इसी रीति से किया जाता है। 

(ii) विशेष बहुमतः राज्य व न्यायपालिका के अधिकारों व शक्तियों जैसे कुछ विशेष प्रावधानों के अलावा संविधान के अन्य सभी प्रावधानों में विशिष्ट बहुमत प्रक्रिया द्वारा ही संशोधन किया जा सकता है। सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 मतों से संबंधित विधेयक पास हो जाए तो वह दूसरे सदन में जाता हैं। वहां भी इसी तरह पास होने के पश्चात् राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए जाता है। 

(iii) विशेष बहुमत व राज्य विधान मंडलों की स्वीकृतिः कुछ मामलों में संसद में विशेष बहुमत प्रक्रिया द्वारा पास होने के पश्चात् विधेयक का राज्यों के विधान मंडल में कुल सदस्य संख्या के न्यूनतम आधे सदस्यों द्वारा अनुमोदन आवश्यक है। अनुच्छेद  54, 55, 73, 162, 241, 368 व संविधान के भाग 5 का अध्याय 4, भाग 6 का अध्याय 5, भाग 11 का अध्याय 1 सातवीं अनुसूची व संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व आदि में संशोधन इसी के अन्र्तगत आता है। 

उत्तर (b): राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा देश को 5 क्षेत्रों में बांटा गया है तथा प्रत्येक क्षेत्रा की अपनी परिषद है। पांच क्षेत्राीय परिषद् निम्नवत् हैंः 
(i) उत्तरी क्षेत्राः इसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली व हिमाचल प्रदेश हैं।
(ii) पूवी क्षेत्रा: इसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम व अरुणाचलन प्रदेश हैं। 
(iii) मध्यक्षेत्रा: इसमें उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश हैं। 
(Vi)   पश्चिम क्षेत्रा:इसमें गुजरात, महाराष्ट्र व कर्नाटक हैं। 
(V) दक्षिण क्षेत्रा: इसमें आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु व केरल हैं।
अन्तर्राज्यीय समझ बूझ व राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान करना इन क्षेत्राीय परिषदों का मुख्य उद्देश्य है। इसके निमित्त इनके निम्न लक्ष्य हैं। (I) राष्ट्र में भावनात्मक एकता की स्थापना, (II) क्षेत्राीय व भाषावाद पर नियंत्राण, (III)आर्थिक विकास, (IV) समाजवादी समाज की स्थापनार्थ पहल, व (V) विकास परियोजनाओं की पूर्ति हेतु परस्पर सहयोग। ये क्षेत्राीय परिषदें राज्य की सलाहकार संस्थाओं के रूप में हैं तथा सामाजिक व आर्थिक योजनाओं, अन्तर्राज्यीय परिवहन, सीमा विवाद, अल्पसंख्यकों से सम्बद्ध कोई भी समस्या आदि पर राज्य को अपनी संस्तुति प्रस्तुत कर सकती हैं। अन्तर्राज्यी सौहार्द बढ़ाने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उदाहरणार्थ, भाखड़ा परियोजना पंजाब व हिमाचल के लिए वरदान के समान है तथा राजस्थान नहर पंजाब व राजस्थान की संयुक्त परियोजना है। 
प्रत्येक क्षेत्राीय परिषद् में (a) राष्ट्रपति द्वारा नामांकित एक केंद्रीय मंत्राी, (b) क्षेत्रा में शामिल प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्राी, (c) प्रत्येक राज्य से दो अन्य मंत्राी, व (d) प्रत्येक केन्द्रशासित क्षेत्रा से राष्ट्रपति द्वारा नामांकित एक प्रतिनिधि होते हैं। परिषद का अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्राी होता है। प्रत्येक क्षेत्राीय परिषद् के सलाहकारों में योजना आयोग का एक प्रतिनिधि व राज्यों व मुख्य सचिव और विकास आयुक्त होते हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित का उत्तर दीजिए। (प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 150 शब्द में होना चाहिए।)
(a) भाग IV में अन्तर्विष्ट निर्देशों के अतिरिक्त संविधान के अन्य भागों कें कुछ और निर्देश हैं जो राज्यों के नाम हैं, वे क्या हैं?
(b) भारत के उच्चतम न्यायालय के सलाह.अधिकार क्षेत्रा की परिधि को समझाइए।
(c) अल्पसंख्यक आयोग की हैसियत, संगठन एवं कार्यों को समझाइए।
(d) सरकारी उपक्रम समिति की संरचना एंव कार्यों को बताइए।

उत्तर (a) : भारत के संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्वांे का उल्लेख है। भाग IV में अन्तर्विष्ट निर्देशों के अतिरिक्त संविधान के अन्य भागों में कुछ अन्य निर्देश हैं तथा ये राज्येां के नाम हैं। उदाहरणार्थ, अनुच्छेद-335 संघ या राज्यों के क्रियाकलापों से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए की जाने वाली नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के आरक्षण का प्रावधान करता है। अनुच्छेद-350 (क) भाषीय आधार पर अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को शिखा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए हैं। संविधान के भाग XVII क अनुच्छेद-351 हिन्दी भाषा का विकास सुनिश्चित करने के लिए है, जिससे यह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी अंगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम बने। संविधान के भाग ग्प्प् अनुच्छेद-256 के अनुसार, प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा बनाई गयी विधियों का और ऐसी विद्यमान विधियों का, जो राज्य में लागू हैं, अनुपालन सुनिश्चित रहे। अनुच्छेद-265 में राज्य व संघ दोनों के लिए प्रावधान है कि विधि द्वारा अधिकृत किये बिना कोई भी कर नहीं लगाया जाएगा।  

उत्तर (b) : भारत का सर्वोच्च न्यायालय परिसंघ न्यायालय, अपील न्यायालय व संविधान का संरक्षक न्यायालय है। संविधान ने उसे परामर्शी क्षेत्राधिकार की शक्ति भी प्रदान की है। संविधान के अनुच्छेद-143 के तहत यदि राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि का कोई प्रश्न ऐसी प्रकृति का है, जिससे सार्वजनिक महत्व से जुड़ा हो तथा उस पर सर्वोच्च न्यायालय की सलाह प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उक्त प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह मांग सकता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया परामर्श सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होगा। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय पर संवैधनिक दृष्टि से ऐसी बाध्यता नहीं है कि उसे परामर्श अवश्य ही देना है। इस क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत के विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उसकी राय ज्ञात करने के लिए प्रस्तुत किये जा सकते हैं, जिनके दायरे में पूर्ववर्ती भारतीय रियासतों से हुई संधियों और समझौतों की व्याख्या आती है। अनुच्छेद-143 खण्ड (2) के तहत राष्ट्रपति इस प्रकार के विवादों को सवोच्च न्यायालय के पास उसकी सलाह के लिए भेज सकता है। भारत सरकार और देशी रियासतों के बीच 1947 और 1950 के बीच हुए समझौते इसी के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार के विवादों में सर्वोच्च न्यायालय के लिए परामर्श देना संविधान के तहत अनिवार्य है तथा परामर्श को स्वीकृत या अस्वीकृत करना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है। गत चार दशकों में राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय के केवल 8 बार परामर्श मांगा है। अयोध्या में राम मंदिर विवाद के संबंध में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा था। 

उत्तर (c) : अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा और संरक्षण के उद्देश्य से सरकार ने 1978 में अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की । अभी तक यह एक गैर.वैधानिक संगठन था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इसके स्थान पर अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयेाग की स्थापना की है, जो कि पूरी तरह एक वैधानिक संगठन है। ऐसा इसलिए किया गया है कि आयोग प्रभावी ढंग से कार्य करते हुए अपने निर्णयों का क्रियान्वयन करा सके। अलप्संख्यक आयोग में अध्यक्ष सहित सात सदस्य होते हैं। तथा ये सदस्य विभिन्न अलप्संख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आयोग, अल्पसंख्यकों को संविधान में दी गयी सुरक्षाओं के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करता है तथा संघ व राज्य सरकारों की इस संध में नीतियों का विश्लेषण करके, अल्पसंख्यकों के संरक्षण को प्रभावी बनाने के उपाय बताता है। अल्पसंख्यकों के उधिकारों का हनन या अतिक्रमण होने की स्थिति में आयोग संबंधित शिकायतों पर विचार करता है। यह अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार हेतु अध्ययन, अनुसंधान व सर्वेक्षण आदि कार्य करता हैं साथ ही, किसी अल्पसंख्यक समुदाय विशेष की स्थिति को देखते हुए उनको अतिरिक्त संरक्षण दिलाने के लिए कानूनी व कल्याणकारी कदम उठाने के लिए समय.समय पर सरकार को अपने सुझाव व प्रतिवेदन भेजता रहता है। 

उत्तर (d) : सरकारी उपक्रम समिति की स्थापना मई, 1964 में विभिन्न औद्योगिक उपक्रमों के क्रिया-कलापों को अनुशासित व नियंत्रित करने के उद्देश्य से की गयी थी। समिति में लोकसभा के 15 सदस्य होते हैं, जो कि सदन के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय रीति द्वारा चुने जाते हैं। समिति में राज्यसभा के सात सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव लोकसभा द्वारा निर्वाचन के अनुरूप ही राज्यसभा द्वारा किया जाता है। समिति का अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से बनाया जाता है तथा उसकी नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष करते हैं समिति में किसी भी मंत्राी का चुनाव नहीं हो सकता। समिति का कार्यकाल एक वर्ष का हेाता हैं समिति क प्रमुख कार्य निम्नवत् हैंः

  • सार्वजनिक उपक्रमों की रिपोर्टों व लेखा-जोखा आदि का परीक्षण, जो विशिष्ट उद्देश्य के लिए उन्हें सौंपे गए हैं।
  • सार्वजनिक उपकरणों के संबंध में कंट्रोलर और आॅडीटर जनरल की रिपोर्ट का परीक्षण।
  • सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायत्तता व कार्यक्षमता पर रिपोर्ट तैयार करना। उनके कार्य व्यवहार, उचित व्यापार सिद्धांतों पर चलने या न चलने की जांच करना।
  • लोक सभा अध्यक्ष द्वारा इस संबंध में अन्य सौंपे गए कार्यों को करना। इसमें वे कार्य आते हैं, जिनका अधिकार सार्वजनिक उपक्रमों के बारे में लोक लेखा समिति तथा अनुमान समिति में निहित है। 

प्रश्न 3. यह दावा किया जाता है कि मुद्रा स्फीति की वार्षिक दर में क्रमिक ह्रास से वर्ष 1992.93 में भारत में मूल्य स्थिति में काफी सुधार हुआ। वे तत्त्व क्या हैं, जिन्होंने मुद्रा स्फीति को संयत किया?

उत्तर (c) :
वर्ष 1990-91 मुद्रास्फीति की दृष्टि से एक बेहद कष्टकारी वर्ष था। सितम्बर, 1991 में मुद्रास्फीति 16.3 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गयी, जो कि स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद से सर्वाधिक थी। 1991 में नरसिंह राव सरकार ने वर्ष 1992-93 के दौरान मुद्रास्फीति को आठ प्रतिशत नीचे लोने का लक्ष्य निर्धारित किया तथा उसे इस प्रयास में काफी कुछ सफलता भी प्राप्त हुई। 30 जनवरी, 1993 को मुद्रास्फीति 6.9 प्रतिशत के स्तर पर आ गयी। मुद्रास्फिीति की दर में आयी इस काम के लिए उत्तरदायी प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित थेः 
1. वर्ष 1992-93 के दौरान मानूसन की अच्छी वर्षा हुई, जिससे खरीफ की फसल बहुत अच्छी रही। इससे कृषि उत्पादन में आशानुकूल वृद्धि हुई और परिणामतः कीमत रेखा नियंत्राण में रही।
2. वर्ष 1990-91 के दौरान वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 8.4 प्रतिशत था। सरकार ने मुद्रागत वित्तीय व अन्य कठोर नियंत्राणकारी अनेक कदम उठाए, जिससे वर्ष 1991-92 के दौरान वित्तीय घाटा 5.9 प्रतिशत व वर्ष 1992-93 के दौरान 5.2 प्रतिशत के स्तर पर आ गया। 
3. सरकार ने आवश्यक वस्तुओं की सही आपूत्र्ति प्रबंध की व्यवस्था की अर्थात आपूर्ति समायोजन के रूप में आयातों का उदारीकरण किया। इससे मूल्य स्तर स्थिर रहे। 
4. औद्योगिक उत्पादन में सुधार की दृष्टि से आवश्यक आयातों में छूट प्रदान की, जबकि गेहूँ व चावल जैसे खाद्यान्नों का समय से आयात करके सुरक्षित भण्डारों को मजबूती प्रदान की। 
5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा खाद्यान्नों व अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की उचित मूल्य स्तर पर उपलब्धता के लिए आवश्यक कमद उठाए।
6. मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित किया गया। वर्ष 1992-93 के दौरान ऋण की दरों को काफी ऊँचा किया गया, जिसे ऋण मुद्रा आपूर्ति व कीमत-स्तरों के दबाव में भी कमी आई।

प्रश्न 4. हमारे जैसे विकासशील देश में आपके विचार में कराधान का आधार क्या होना चाहिए-आय अथवा खपत? अपने तर्कों को स्पष्ट लिखिए?

उत्तर (d) :
विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में उपभोग का स्तर काफी नीचा होता है। इधर पिछले दिनों सरकार ने आय की अपेक्षा उपभोग (खपत) पर कर लगाने के उद्देश्य से आयकर के स्थान पर व्यय कर लगाने का विचार किया जिसके पक्ष व विपक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत किये गए।
आय पर कर के पक्ष में तर्कः
1. भारत की अधिकांश जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे और उनका उपभोग स्तर न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने के लिए भी पर्याप्त नही है। ऐसे में उपभोग पर कर लगाना सही नहीं होगा।
2. सकल उत्पादन का वह भाग, जो उत्पादकों द्वारा उपभोग या आदान प्रदान-प्रदान कर लिया जाता है, के बारे में सही आंकड़े प्राप्त करने में अनेक कठिनाईयां हैं। ऐसी स्थिति में उत्पादन के समस्त उपभोग पर कर नहीं लगाया जा सकेगा या कर निर्धारण में कठिनाई आएगी।
3. भारत में आय पर आधारित प्रगतिशील करारोपण द्वारा ही आय व धन के वितरण की विषमताओं को कम किया जा सकता है। 
4. कंजूस धनवान लोग उपभोग कर की परिधि से बाहर ही रह जाते हैं क्योंकि कंजूसी वश वे कम उपभोग करते हैं। 

खपत (उपभोग) पर कर के पक्ष में तर्कः
1. इससे बचतों को प्रोत्साहन मिलता है, क्यों कि आय पर कर न होने की स्थिति मे बचत करके कर बचाने के लिए लोग प्रोत्साहित हैं। 
2. बचतों में वृद्धि होने से निवेश दर बढ़ती है तथा आर्थिक विकास में तेजी आती है। 
3. उत्कृष्ट उपभोग पर रोक लगती है और उसका आर्थिक विकास कार्यों में सदुपयोग हो सकता है। 
4. यदि खपत पर कर लगाने की व्यवस्था सुविचरित व सुविकसित होगी तो उपभोग पर करवंचना नहीं हो सकती है। 
5. खपत पर कर की व्यवस्था प्रगतिशील होगी अर्थात् विलासिता के साधनों पर अधिक व आवश्यक वस्तुओं पर कम शुल्क लगाया जा सकता है। 
अतः यह देखते हुए विकासशील अर्थव्यवस्था में खपत पर कर लगाने का कार्य व्यवहारिक रूप से काफी कठिन है, कराधान का मुख्य आधार आय ही होना चाहिए।

प्रश्न 5. लघु घाटी परियोजनाओं की तुलना में ऊँचे बांध वाली विशाल नदी घाटी परियोजनाओं की तर्कपूर्णता का अपना मूल्यांकन दीजिए।

उत्तर :
वर्तमान युग में विशेषकर भारत की वृहत जनसंख्या एवं क्षेत्राफल के लिए सिंचाई, उद्योग व अन्यान्य विकास कार्यों हेतु ऊर्जा की बड़े पैमाने पर आवश्यकता है। ऊर्जा की इन आवश्यकताओं की पूत्र्ति के लिए ऊँचे बांध वाली विशाल नदी घाटी परियोजनाओं को लगाया जाना उचित ही जान पड़ता है। ऐसी परियोजनाओं के निर्माण से सिंचाई की अधिक सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जिससे कृषि क्षेत्रों का विकास होता है और परिणामतः कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। इन परियोजनाओं द्वारा बाढ़ पर भी प्रभावी नियंत्राण किया जा सकता है तथा इन पर बनने वाले बैराज से यातायात एवं संचार की सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जिससे कृषि क्षेत्रा का विकास होता है और परिणामतः कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। इन परियोजनाओं द्वारा बाढ़ पर भी प्रभावी नियंत्राण किया जा सकता है तथा इन पर बनने बाले बैराज से यातायात एवं संचार की सुविधाएं बढ़ती हैं। जिससे संसाधनों में गतिशीलता आएगी तथा उनका देश के विकासार्थ समुचित दोहन किया जाना संभव हो सकेगा। विशाल नदी घाटी परियोजनाओं के निर्माण से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसरों का भी सृजन होता है। यथा, नर्मदा घाटी परियोजना के निर्माण के दौरान 7 लाख लोगों को तात्कालिक रोजगार व इसके पूर्ण होने पर 6 लाख लोगों को स्थायी रोजगार उपलब्ध होगा। बड़े बांधों के किनारे जलाशयों का निर्माण करके मत्स्य पालन को भी बड़ावा दिया जा सकता है तथा भूमिगत जल के नीचे खिसकने व गंदगी से उत्पन्न रोगों पर भी रोक लगाया जा सकती है। 
बड़ी परियोजना के निर्माण से लोगों के पुनर्वास, विभिन्न वन्य प्राणियों व वनस्पतियों के विनाश, आदिवासियों की पुरातन संस्कृति व नैसर्गिक जीवन शैली पर प्रतिकूल प्रभाव, पारिस्थिति असंतुलन, पानी में अम्लता व भूगर्भिक असंतुलन के कारण भूकंप की संभावना जैसे दुष्प्रभाव उत्पन्न हो जाने की प्रायः बात की जाती है, लेकिन ये सब ऐसी समस्याएं जिनके समाधान के लिए आवश्यक उपाय किये जा सकते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसी दूसरे के कल्याण के लिए अन्य की सुख-सुविधाओं का हरण नहीं किया जाना चाहिए तथा सरकार को मानवीय पहलुओं पर भी आवश्यक ध्यान देना चाहिए। सरकार को विस्थापितों के पुनर्वास व आदिवासियों की संस्कृति व विरासत को बनाए रखने की ओर समुचित कदम उठाने चाहिएं। साथ ही, पर्यावरण की रक्षा व विकास कार्यों में परस्पर संतुलित संबंध स्थापित करना भी अत्यावश्यक होगा। अतः तमाम विरोधाभासों व अनियमितताओं के बावजूद ऊँचे बांध वाली विशाल नदी घाटी परियोजनाएं देश के विकास में सहायक हैं। 

प्रश्न 6. भारत के किन भागों को सूखा क्षेत्रा कहा जाता है? इन क्षेत्रों के अभिलक्षण तथा उनमें प्रचलित आर्थिक कार्यकलापों पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर :
भारत का सूखा क्षेत्रा: भारत में थार मरुस्थल सूखा क्षेत्रा के अंतर्गत आता हैं। थार मरुस्थल के अंतर्गत राजस्थान के बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर, पश्चिमी जोधपुर व गंगानगर का दक्षिणी भाग तथा गुजरात का उत्तर.पश्चिमी भाग आता है। 
सूखा क्षेत्रा के अभिलक्षण: इन क्षेत्रों में प्रतिवर्ष औसत 25 से.मी. से कम वर्षा होती है तथा जनवरी माह में तापक्रम 5°C से 22°C ओर जून माह में 28°C से 45°C के मध्य रहता है। यहां प्रायः बलुई मिट्टी है तथा हवा के कारण बालू के वृहद् टीले बनते व बिगड़ते रहते हैं। बलुई मिट्टी में फास्फेट की काफी मात्रा होती है, जबकि नाइट्रोजन बहुत कम मात्रा में होता है। वनस्पतियां प्रायः न के बराबर होती हैं और जो थोड़ी बहुत होती है हैं, वे कंटीली झाड़ियों, कांटेदार वृक्षों, बबूल या कैक्टस के रूप में हैं। सिंचाई सुविधाओं का अभाव होता है तथा दिन अधिक गर्म व रातें काफी ठंडी होती हैं। 

सूखा क्षेत्रा के आर्थिक कार्यकलापः ऐसे क्षेत्रों में प्रायः सूखी खेती की जाती है। बाजरा व तिलहन मुख्य फसलें होती हैं। ऊँट व भेड़पालन में काफी लोग संलग्न रहते हैं तथा इन पर अपनी आजीविका के लिए आश्रित होते हैं। खजिन पदार्थों में इन क्षेत्रों में जिप्सम पाया जाता है। 

प्रश्न 7.आर्थिक विकास की महालनोबिस व्यूहरचना का तर्क.अधार क्या था?

उत्तर :
महालनोबिस एक विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्राी थे। महालनोबिस द्वारा दिया गया आर्थिक विकास का माॅडल समाजवादी विचारधारा के देशों में हुए विकास पर आधारित था। भारत में द्वितीय पंचवर्षीय योजना और बाद की योजनाओं का आधार महालनोबिस की आर्थिक व्यूह रचना ही थी। महलनोबिस की व्यूह रचना इस विचारधारा पर आधारित थी कि अधोरचना के निर्माण एवं भारी पूंजी निवेश के द्वारा सहायता प्राप्त आधुनिक औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना द्वारा विकास के ऊंचे आयाम स्थापित किये जा सकते है। इसके फलस्वरूप आधुनिक औद्योगिक क्षेत्रा का विस्तार स्वाभाविक रूप से हो पायेगा एवं श्रमशक्ति के लिए अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सकेगा। यह श्रमशक्ति अदृश्य बेरोजगारी एवं अल्परोजगार से ग्रसित वर्ग में आसानी से मिल जोयेगी। प्रारंभिक अवस्था में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों से न केवल आसानी से श्रम शक्ति प्राप्त होगी बल्कि खाद्यान्न एंव आवश्यकता की अन्य वस्तुएं भी प्राप्त होंगी। धीरे.धीरे आधुनिक औद्योगिक क्षेत्रा का विस्तार होगा। इससे कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रा भी पूरी तरह अत्याधुनिक गत्योत्मक अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित हो जायेगा।

प्रश्न 8. भारत में नई आर्थिक नीति के आने के बाद से किए गए कर सुधारों को मोटे तौर पर बतलाइए।

उत्तर:
भारत में 1990 के आर्थिक संकट के बाद आर्थिक सुधार एवं उदारीकरण की नीति अपनायी गयी। जिसके अन्तर्गत करारोपण में भी व्यापक सुधार की संभावना व्यक्त की गयी। सरकार ने करारोपण में सुधार के लिए राजा चेलैया समिति का गठन किया। राजा चेलैया सतिति द्वारा की गयी सिफारिशों के आधार पर सरकार ने करारोपण के क्षेत्रा में काफी सुधार किये, जिसे संक्षिप्त रूप से नीचे दिया जा रहा हैः
(i) प्रत्यक्षकर में व्यक्तिगत आयकर की उच्चतम प्रभावी दर को 40 प्रतिशत किया गया है एवं आय के मात्रा तीन स्तर को बनाकर आयकर की दरें कम की गई हैं।
(ii) सभी प्रकार की घेरलू कंपनियों पर कर की दर 50 प्रतिशत से घटाकर 45 प्रतिशत तथा विदेशी कंपनीयों पर 65 प्रतिशत से घटाकर 55 प्रतिशत कर दी गई है। 
(iii) सीमा शुल्क में आयात कर की अधिकतम दर 300 प्रतिशत को कम करके 50 प्रतिशत कर दिया गया है। विदेशों में रहने वाले भारतीयोें के लिए लाये जाने वाले सामान पर सीमाशुल्क घटाया गया है एवं बैगेज नियमों का सरलीकरण किया गया है। 
(Vi)   केन्द्रीय उत्पाद शुल्क की दरों को भी बहुत अधिक कम कर दिया गया है और चुने हुए उत्पादों में मोडवेट का प्रणाली लागू की गई है। 
इन सभी सुधारों को लागू करने का उद्देश्य औद्योगिक विकास एवं निर्यात को बढ़ावा देना है। 

 प्रश्न 9. भारत में कृषि-पदार्थों के आयात-निर्यात पर से सारे नियंत्राण हटाने की वांछनीयता की विवेचना कीजिए।

उत्तर :
विश्व व्यापार संगठन एवं उरुग्वे चक्र के डंकल प्रस्तावों पर 15 अप्रैल, 1994 को मराकेश में हस्ताक्षर करने के बाद भारत को विश्व निर्यात में बहुत अधिक संभावनाएं दिखने लगी है। भारत को विदेशी मुद्रा कमाने के लिए खाद्यान्न निर्यात करना जरुरी है। विश्व बाजार में प्रभुत्व स्थापित करने और अपनी उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता साबित करने के लिए आयात-निर्यात पर से प्रतिबंध हटाना आवश्यक हो गया है। आयात से प्रतिबंध हटाने के फलस्वरूप ऐसी वस्तुओं की आपूर्ति संभव हो सकेगी जिसकी उत्पादकता बहुत ही कम है। इसी तरह निर्यात से प्रतिबंध हटाने के बाद देश से कृषि पदार्थों का निर्यात बढ़ेगा, जिससे विदेशी मुद्रा में बढ़ोत्तरी संभव हो सकेगी। 
कृषि उत्पादों पर से प्रतिबंध हटाने के फलस्वरूप कृषि का व्यवसायीकरण होगा और भारतीय कृषक वर्ग समृद्ध होते जायेंगे एवं गाँवों से शहरों की ओर पलायन रूक जायेगा। अतः कृषि-पदार्थों के आयात -निर्यात पर से अधिकांश नियंत्राण हटाने आवश्यक हो गये हैं। 

प्रश्न 10. नवोत्पाद क्या है? भारत जेसे देश में, आपके अनुसार, किस प्रकार की आर्थिक मजबूरियाँ बास्तव में नवोत्पाद को प्रोत्सहित कर सकती है।

उत्तर : नवोत्पाद ऐसी प्रक्रिया है जो पहले से चली आ रही व्यवस्था, कानून रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डो में परिवर्तन लागर एक नयी प्रकार की व्यवस्था को जन्म देती है। अर्थशास्त्रा में उत्पादन की नयी तकनीक को अपनाना नवोत्पाद कहलाता है। बशर्तें यह नयी तकनीक किसी दूसरे व्यक्ति या फर्म के नाम नही हो। 
भारत में बहुत पहले से चली आ रही पारम्परिक व्यवस्थाएं सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रा में आज भी कामय हैं, जिसके उन्मूलन के लिए नवोत्पाद की आवश्यकता है। सामाजिक क्षेत्रा में वर्ण व्यवस्था, रूढ़िवादिता, अस्पृश्ता, अशिक्षा इत्यादि क्षेत्रों के नवोत्पाद की आवश्यकता है। आर्थिक क्षेत्रा को देखें तो कृषि जगत में खेती की प्राचीन तकनीकों में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और इसके लिए नवोत्पाद जरूरी है। औद्योगिक क्षेत्रा में देश को विश्वस्तर पर अपनी साख वनाये रखने के लिए  नवोत्पादक की आवश्यकता है। भारत के करीब-करीब प्रत्येक क्षेत्रा में नवोत्पाद आवश्यक हो चुकी है। लेकिन आर्थिक संसाधनों की कमी, ओर अनुसंधान तथा विकास कार्यों के लिए प्रयाप्त साधन उपलब्ध कराने के कारण भारत अभी नवोत्पाद को अपनाने के विषय में विश्व के अनेक देशों की तुलना में बहुत पीछे है।

प्रश्न 11. गंगा कल्याण योजना पर विस्तृत चर्चा करें।

उत्तर : ‘गंगा कल्याण योजना’ 1 अप्रैल 1997 से देश भर के सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में एक स्वतंत्रा योजना के रूप में लागू करने का निर्णय ग्रामीण क्षेत्रा एवं रोजगार मंत्रालय का एक अति महत्वपूर्ण निर्णय है, जो नौवीं योजना में सरकार के गांवों से गरीबी हटाने के कार्यक्रमों को एक नई दिशा प्रदान करेगा। पहले भी भारत सरकार ने गंगा कल्याण योजना को 1 फरवरी 1997 से समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम की एक उप-योजना के रूप में प्रारम्भ किया था।

  • 1 फरवरी 1997 से गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे लक्ष्य-समूह के लघु और सीमान्त कृषकों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक नई योजना ‘गंगा कल्याण योजना’ शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य किसानों की सहायता करना है, उन्हें आर्थिक रख-रखाव तथा ऋण संबंधी सहायता देना है ताकि वे अपने क्षेत्रों में भूमिगत जल और भूतल जल के लिए योजनाएं शुरू कर सकेें। इसके लिए 1997.98 में 200 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया।
  • गंगा कल्याण योजना भारत सरकार की दस लाख कूओं की योजना जैसी लगती हुई भी, उससे भिन्न है। दस लाख कूओं की योजना मुख्य रूप से बेरोजगार लोगों को मजदूरी पर काम दिलाने के माध्यम से सिंचाई के खुले कूओं के निर्माण की योजना है जिसके अंतर्गत अब तक लगभग 10,57,000 खुले कूएं खोदे जा चुके हैं जबकि गंगा कल्याण योजना में सिंचाई साधनों के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे बसर कर रहे लोगों को स्वरोजगार से समृद्धि की ओर बढ़ने में सहायता प्रदान करना है। गंगा कल्याण योजना में बोरवैल और ट्यूबवैल की अनुमति है। यह योजना एक केन्द्र-प्रायोजित है जिस पर खर्च होने वाली राशि का 80 प्रतिशत 

केन्द्र सरकार द्वारा तथा 20 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। सिंचाई के क्षेत्रा में भी यह योजना बहुत लाभकारी है। इसमें अनेक विशेषताओं का समावेश है, जैसे-भूजल का प्रयोग कर सिंचाई व्यवस्था करना तथा भूजल आधारित परिसम्पत्तियों (बोरवैल, ट्यूबवैल) का सृजन/उन्नयन करना।

  • देश की आर्थिक प्रगति का आधार है-कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करने हेतु आधारभूत कारकों में एक अति-आवश्यक कारक है-समुचित सिंचाई व्यवस्था। देश में कुल कृषि योग्य भूमि के मात्रा 28 प्रतिशत में सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था है, शेष 72 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि सिंचाई के लिए तरसती है। इस अभाव को दूर करने और सिंचाई व्यवस्था को अति उत्तम तथा  सुव्यवस्थित करने के लिए ‘गंगा कल्याण योजना’ आरम्भ की गई है जो इस दिशा में निश्चय ही मील का पत्थर साबित होगी।
  • इस योजना के अंतर्गत लघु तथा सीमान्त किसान जिनकी जोत की भूमि छोटी है अर्थात 5 एकड़ से कम है, के हितों को ध्यान में रखा गया है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति तथा शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के कल्याण के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं जिनके हित के लिए इस योजना की 50 प्रतिशत धनराशि व्यय की जाएगी। इनके अलावा अन्य लोगों के लिए अलग से राशि नियत की गई है। इस योजना में सामूहिक और व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए सब्सिडी का भी प्रावधान है। अनुसूचित जाति/जनजाति तथा शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को सामूहिक परियोजना लागत का, 75 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में तथा शेष राशि बैंकों, वित्तीय संस्थाओं तथा निगमों से मियादी ऋण के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी जबकि अन्य जाति के किसानों को सामूहिक परियोजनाओं  हेतु सब्सिडी 50 प्रतिशत तथा शेष ऋण के रूप में दिया जाएगा। प्रति समूह सब्सिडी की अधिकतम सीमा 40,000 रुपये है। व्यक्तिगत लाभार्थी को सब्सिडी की राशि 5,000 रुपये प्रति एकड़ भूमि तथा प्रति लाभार्थी अधिकतम राशि 12,500 रुपये है।
  • योजना की एक अन्य विशेषता यह है कि केन्द्र राज्यों को गरीबी के अनुपात के आधार पर धनराशि आवंटित करेगा तथा राज्य भू-जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की संभावना तथा इससे जुडे़ अन्य तथ्यों पर विचार करके जिलावार आवंटन भी प्राप्त कर सकते हैं।
  •  इस योजना के लक्षित वर्ग की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लघु तथा सीमान्त किसान हैं लेकिन राज्य अथवा केन्द्र सरकार के किसी लघु सिंचाई कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता प्राप्त किसानों को इस योजना से लाभान्वित नहीं किया जाएगा। कृषक समूह बनाकर भी सामूहिक सिंचाई परियोजनाएं शुरू कर सकते हैं जिसमें 5 से 15 सदस्य हो सकते हैं।
  • इस योजना के अंतर्गत लाभार्थियों का चयन खण्ड के अधिकारियों, बैंक अधिकारियों तथा गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में एक सार्वजनिक बैठक में ग्राम सभा द्वारा गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले कृषकों में से किया जाएगा। इसके पश्चात खण्ड पंचायत तथा जिला ग्रामीण विकास एजेंसी/जिला परिषद इन लाभार्थियों की सूची की जांच करेगी ताकि वास्तविक जरूरतमंद लोग ही इस योजना के तहत लाभ उठा सकें और योजना अपने ध्येय में कामयाब हो।
  • जिला ग्रामीण विकास एजेंसियां तथा जिला परिषदें ही परियोजनाओं का अनुमोदन करेेंगी तथा प्रत्येक वित्त वर्ष में योजना के अंतर्गत आवंटित निधियों के 125 प्रतिशत के बराबर वार्षिक कार्य-योजना तैयार करेंगी। वार्षिक कार्य-योजना में निश्चित कार्यों के अलावा कोई अन्य कार्य नहीं किया जाएगा। वार्षिक कार्य-योजना तैयार करते समय नए काम शुरू करने की अपेक्षा अधूरे काम पूरे करने को तरजीह दी जाएगी। जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों/जिला परिषदों द्वारा कोई भी ऐसा कार्य शुरू नहीं किया जाएगा जिसे दो वित्त वर्षों में पूरा न किया जा सके।
  • योजना के अंतर्गत परियोजना लागत में ड्रिलिंग, पम्पशेड का निर्माण, सामूहिक परियोजनाओं में अलग-अलग लाभार्थी की भूमि के लिए जल वितरण प्रणाली  की पाइपों तथा नालियों का निर्माण, भूमि समतल बनाने का प्रावधान आदि कार्य शामिल होंगे लेकिन इसके अंतर्गत ड्रिप तथा स्प्रिंकल सिंचाई प्रणाली के लिए धनराशि नहीं दी जाएगी। विशेष बात यह है कि ड्रिलिंग के अलावा किसी भी अन्य कार्य के लिए ठेकेदारों को नहीं लगाया जाएगा।
  • गंगा कल्याण योजना में लक्षित वर्ग के समूहों को परियोजना के संचालन और रख-रखाव की लागत तीन वर्ष के लिए अतिरिक्त सब्सिडी के रूप में मिलेगी, जिसकी अधिकतम सीमा परियोजना लागत की 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक होगी। अन्य समूहों को इसके लिए कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। इस योजना का उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इसकी देख-रेख और रख-रखाव किसानों के समूह द्वारा ही किया जाएगा।
  • इस योजना का एक अन्य अहम पहलू है-उपभोक्ता संघ तथा मददगार। मददगार, उपभोक्ता संघ तथा कार्यान्वयन एजेंसी के बीच एक सम्पर्क-सूत्रा की भूमिका निभाएगा। सामूहिक परियोजनाएं उन लाभार्थियों द्वारा शुरू की जाएंगी जो एक उपभोक्ता संघ बनाते हैं। यह संघ अपने सदस्यों में से किसी एक व्यक्ति को मददगार नियुक्त करेगा जिसे संघ द्वारा कुछ मानदेय भी दिया जा सकता है। मददगार को कार्यान्वयन एजेंसी द्वारा पम्पसेटों के संचालन, मरम्मत तथा रख-रखाव, फसल उगाने एवं जल प्रबंधन आदि के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाएगा और यह सिंचाई परियोजनाओं के संचालन की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों का प्रभारी होगा। संघ को यह छूट होगी कि योजना का रख-रखाव तथा संचालन वह स्वयं करे या फिर किसी सरकारी अथवा प्राइवेट एजेंसी को इसका उत्तरदायित्व सौंपे। योजना के संचालन तथा रख-रखाव का काम जहां किसी सरकारी/निजी एजेंसी को सौंपा जाएगा, वहां धनराशि के सीधे आवंटन के लिए राज्य सरकारों/जिला ग्रमीण विकास एजेंसियों/जिला परिषदों को अधिकृत नहीं किया जाएगा।
  • योजना की समुचित निगरानी और पर्यवेक्षण भी एक अहम पहलू है। इसके लिए जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के परियोजना निदेशक के साथ-साथ जिला कलेक्टर-जिला परिषद का मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिलों में योजना के पर्यवेक्षण और निगरानी के प्रभारी होंगे। वे योजना के द्रुत कार्यान्वयन और लेखा-जोखा के रख-रखाव के लिए उत्तरदायी होंगें। क्षेत्रा स्तर के कार्यकर्ताओं को यह सावधानी बरतनी होगी कि योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति/जनजाति समूहों के लाभार्थियों के उपयुक्त समूह ही बनाए गए हैं। निर्बाध भागीदारी, सृजित जल स्रोत तक पहंुच और परियोजना परिसम्पत्तियों पर प्रभावी नियत्रांण को सुनिशिचत करने के लिए उपयुक्त तंत्रा विकसित किया जा सकता है। राज्य के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव इस योजना के अंतर्गत शीर्षस्थ एजेंसी के रूप में कार्य करेंगे।

प्रश्न 12. भारत में सिंचाई की आवश्यकता का मुख्य कारण क्या है?

उत्तर :  भारत की भौगोलिक स्थिति तथा वर्षा का वितरण इस प्रकार है कि बिना सिंचाई द्वारा कृषि कार्य सम्भव नहीं है। सिंचाई की आवश्यकता निम्न कारणों से होती है -
(i) वर्षा के स्थानीय वितरण में विषमता,
(ii) वर्षा का समय की दृष्टि से असमान वितरण
(iii) मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता तथा
(iv) कतिपय फसलों के लिए जल की अधिक आवश्यकता।

प्रश्न 13. भारत में उपलब्ध सिंचाई और सिंचाई के साधन पर टिप्पणी लिखें।

 उत्तर : भारत में 18 करोड़ हैक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्रा है। 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू होने के समय सिंचाई की जो क्षमता 226 लाख हेक्टेयर वार्षिक थी, वह आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक बढ़कर लगभग 894.4 लाख हेक्टेयर (अनन्तिम) हो गई। इस प्रकार भारत में जहाँ कुल फसल क्षेत्रा के मात्रा 45% भाग पर सिंचाई क्षमता वर्तमान है वहीं सकल सिंचाई विभव का 72.6% भाग प्राप्त हो चुका है।

  •  संपूर्ण कृषि क्षेत्रा का 40%  चावल, 4.1% ज्वार, 52ः बाजरा,  16.4 % मक्का, 74 % गेहूँ,  50.4 % जौ,       83.8%  गन्ना, 25.6% कपास सिंचाई द्वारा उत्पन्न किया जाता है (1984-85)।
  •  भारत में सिंचाई के प्रमुख साधन है -

(1) नहर, (2) तालाब, (3) कुएँ और (4) नलकूप।

गौण साधन - (i) स्प्रींकल या फव्वारा सिंचाई
(ii) ड्रिप सिंचाई आदि।

प्रश्न 14. भारत में तालाबों द्वारा सिंचित क्षेत्रा और दक्षिणी भारत में तालाब द्वारा अधिक सिंचाई के कारण क्या है।

उत्तर: तालाबों द्वारा सिंचाई - गर्तयुक्त प्राकृतिक या कृत्रिम धरातल जिसमें जल भर जाता है, उसे तालाब की संज्ञा दी जाती है। अपर्याप्त जलापूर्ति की दशाओं में इन तालाबों में संचित जल राशि का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। 1950-51 में 36 लाख, 1968-69 में 39 लाख, 1970-71 में 45 लाख हेक्टेयर भूमि पर तालाबों का विस्तार था। वर्तमान समय में 15% सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है। देश में 5 लाख तालाब है, जिनसे 80 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। भारत में सर्वाधिक तालाब तमिलनाडु में है। यहाँ 24 हजार तालाब है।

  • दक्षिणी भारत में तालाब द्वारा अधिक सिंचाई होने के निम्न कारण है:

1. यहाँ की धरातलीय बनावट अत्यन्त कठोर है, जिस कारण यहाँ कूआं तथा नहरों की व्यवस्था करना कठिन तथा अधिक खर्चीला है।
2. नदियों ने तंग घाटियों का निर्माण किया है, जिनको बाँधकर तालाब आसानी से बनाया जा सकता है।
 3. दक्षिणी भारत में प्राकृतिक गर्तों की संख्या अधिक है, जो जलापूर्ति के कारण तालाब बन जाते है।

प्रश्न 15. भारत में तालाब सिंचाई के दोषों पर चर्चा करें।

 उत्तर : तालाबों द्वारा सिंचाई में निरन्तर ह्रास हो रहा है। 1950-51 में 17.3%, 1960-61 में 18.5%, 1965-66 में 16.2%, 1973-74 में 12%, 1977-78 में 10.6%, 1983-84 में 9% तथा 1990-91 में 8% तालाबों द्वारा सिंचाई की गयी।

  • विस्तृत क्षेत्र वाले तालाब निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्ण सागर (कर्नाटक), जय समुद्र, उदय सागर व फतेह सागर (राजस्थान) आदि प्रमुख है।
  • तालाबों द्वारा सिंचाई से अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाते है। तालाबों में चारों तरफ से जल बह कर आता है, जो अपने साथ मिट्टी लाकर तालाब में जमा कर देता है। तालाब उथला न हो जाए, इसके लिए तालाब की सफाई की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसमें खर्च तथा श्रम दोनों का दुरुपयोग होता है। साथ-ही-साथ जिस वर्ष वर्षा कम या बिल्कुल ही नहीं होती, उस वर्ष तालाब बेकार हो जाते है तथा उन पर आश्रित फसलें सूख जाती है।

प्रश्न 16. भारत में कूओं और नलकूपों द्वारा सिंचाई कैसे किया जाता है?

 उत्तर: कूओं द्वारा सिंचाई - प्राचीन काल से ही कूओं द्वारा सिंचाई करना भारत की प्रमुख आर्थिक क्रिया मानी जाती है। रचना के आधार पर कूएँ तीन प्रकार के होते है  
1. कच्चा कूआँ, 
2. पक्का कूआँ, तथा 
3. नलकूप।

  • कूओं द्वारा सिंचाई उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश में की जाती है। इसके द्वारा 34 % भाग की सिंचाई की जाती है। कूओं की संख्या लगभग 12.8 लाख है।
  • गंगा घाटी का मध्यवर्ती प्रदेश, काली मिट्टी का क्षेत्रा, तमिलनाडु का क्षेत्रा, पंजाब-हरियाणा का क्षेत्रा आदि प्रमुख कूओं की सिंचाई के क्षेत्रा है।

नलकूपों द्वारा सिंचाई - विगत 30 वर्षों से भारत में भू-गर्भिक जल का प्रयोग सिंचाई में किया जा रहा है। विश्व में सबसे पहले इस विधि का प्रयोग चीन में किया गया था। भारत में 21.46 लाख नलकूप है, जिनमें 16.7 लाख केवल उत्तर प्रदेश में है। इसके पश्चात् पंजाब, गुजरात, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश में हैं।

  • कूओं तथा नलकूपों की सिंचाई में नवीन तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, परन्तु जो नलकूप विद्युत द्वारा चालित है, उनको समय से विद्युत आपूर्ति नहीं की जाती, जिस कारण कृषकों को निराश होना पड़ता है। सरकार द्वारा व्यवस्थित नलकूपों की बाद में देख-रेख नहीं की जाती, जिससे इनका उपयोग सुचारु रूप से नहीं किया जाता।
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