सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 19 (प्रश्न 17 से 32 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 19 (प्रश्न 17 से 32 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 17.कूओं द्वारा सिंचाई के लाभ और दोष का उल्लेख करें।

उत्तर: कूएँ द्वारा सिंचाई से लाभ
(1) सिंचाई का सबसे सस्ता और सरल साधन
(2) बनाने में कम व्यय और तकनीकी जानकारी
(3) जल का मितव्ययिता से खर्च
(4) नहर सिंचाई की हानियों से सुरक्षा

कूएँ द्वारा सिंचाई से हानि/दोष
(i) सीमित क्षेत्रों में सिंचाई
(ii) अकाल और सूखे में जल तल नीचे चले जाने से कूएँ का सूख जाना।
(iii) नहर की अपेक्षा व्यय और परिश्रम अधिक
(iv) कुछ कूएँ का जल खारा होना जो सिंचाई के लिए अनुपयुक्त होता है।

प्रश्न 18. भारत में नहरों द्वारा सिंचाई तथा नहर सिंचाई के लाभ और दोष पर प्रकाश डालें।

उत्तर: नहरों द्वारा सिंचाई - भारत में सर्वाधिक सिंचाई नहरों द्वारा की जाती है। नहरें तीन प्रकार की होती है: 1. आप्लाव नहरें, 2. बारहमासी नहरें तथा 3. जल संग्रही नहरें। सरकारी नहरों द्वारा 1950-51 में 34.3%, 1960-61 में 37.2%, 1965-66 में 37.4 %, 1973-74 में 37.4 %, 1977-78 में 37.5%, 1983-84 में 37.5%, 1990-91 में 36.8% क्षेत्रा की सिंचाई की गयी थी।

  • गैर-सरकारी नहरों द्वारा 1950-51 में 5.5%, 1960-61 में 4.9%, 1965-66 में 4.4 %, 1973-74 में 2.7%, 1977-78 में 2.3%, 1983-84 में 1.2% तथा 1990-91 में 1.2% क्षेत्रा की सिंचाई की गयी।

नहर सिंचाई से लाभ
(i) कृषि क्षेत्रा में वृद्धि
(ii) उपज में वृद्धि
(iii) उपज में स्थिरता
(iv) अकाल का ह्रास
(V) कृषि का व्यावसायीकरण
(vi) नहरों के उपजाऊ मिट्टी से उर्वरता में वृद्धि
(vii) परिवहन एवं यातायात का विकास
(viii) सरकार के लगान में वृद्धि एवं अकाल सहायता व्यय में कमी से आय में वृद्धि

नहर सिंचाई के दोष
(i) भूमि का नमकीन और अनुर्वर हो जाना
(ii) नहर निर्माण में उपजाऊ भूमि की बर्बादी
(iii) नहर के किनारे स्थित भाग का दलदली हो जाना
(iv) मच्छर और संक्रामक रोगों का जन्म स्थल
(V) अधिक सिंचाई के कारण अधिक कृषि उत्पादन से बाजार में मंदी हो जाना

प्रश्न 19. कमान क्षेत्रा विकास कार्यक्रम क्या है, वर्णण करें।

उत्तर: कमान क्षेत्रा विकास कार्यक्रम

  • कमान क्षेत्रा विकास कार्यक्रम 1974.75 में केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजना के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य हासिल सिंचाई क्षमता के उपयोग में सुधार लाना था, ताकि सिंचित भूमि में कृषि पैदावार बढ़ाई जा सके। इस कार्यक्रम में निम्नांकित घटकों को शामिल किया जाता है कृ
  1. खेत विकास सम्बंधी;
    • प्रत्येक कमान के अंतर्गत खेतों की नालियों और सरणियों (चैनलों) का विकास;
    • कमान क्षेत्रा की इकाई के आधार पर भूमि को समतल करना;
    • खेतों की हदों का पुनर्निर्धारण (जिसके साथ जोतों की संभावित चकबंदी को भी जोड़ा जा सकता है);
    • जहां आवश्यक हो
    • प्रत्येक खेत में सिंचाई के पानी की समान और सुनिश्चित आपूर्ति के लिए बाड़ाबंदी शुरू करना;
    • ऋण सहित सभी निवेशों और सेवाओं की आपूर्ति और विस्तार सेवाओं को मजबूत बनाना;
  2. उपयुक्त फसल पद्धतियों का चयन और उन्हें अमल में लाना;
  3. सिंचाई सतह के लिए जल के पूरक के रूप में भूमिगत जल का विकास;
  4. मुख्य और मध्यवर्ती नाली-प्रणालियों का विकास और रख-रखाव;
  5. एक क्यूसेक क्षमता की निकास वाली सिंचाई प्रणाली का आधुनिकीकरण, रख-रखाव और कुशल संचालन। 1974-75 में जब यह कार्यक्रम शुरू किया गया था तो इसके तहत 60 सिंचाई परियोजनाएं थीं जो लगभग 150 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि से सम्बद्ध थी। इस समय 22 राज्यों और दो केन्द्रशासित प्रदेशों में 189 परियोजनाएं इस कार्यक्रम के तहत चलाई जा रही हैं। कार्यक्रम का कार्यान्वयन 54 कमान क्षेत्रा विकास प्राधिकरणों के जरिये किया जा रहा है। आठवीं योजना के दौरान कार्यक्रम का मुख्य बल कृषि विकास गतिविधियों के प्रमुख तथ्यों के अलावा किसानों के प्रशिक्षण, सिंचाई जल प्रबंध में किसानों की भागीदारी जैसी गतिविधियों के बेहतर जल प्रबंध के तरीके अपनाकर सिंचाई जल आपूर्ति की और अधिक विश्वसनीयता सुनिश्चित करने पर था। भौतिक लक्ष्यों को हासिल करने और अंततः कमान क्षेत्रा विकास कार्यक्रम के उद्देश्यों को पूरा करने की दृष्टि से किसानों की भागीदारी के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। मार्च 1994 में केन्द्रीय जल संसाधन और संसदीय मामलों के मंत्राी की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन किया गया है। इस समिति ने जल प्रबंध और कृषि तथा सहकारिता संबंधी कार्यक्रमों के प्रभावी ढंग से अमल के कार्य में किसानों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की है।

प्रश्न 20. लघु सिंचाई क्या है? लघु सिंचाई के लाभ का उल्लेख करें ।

उत्तर : लघु सिंचाई कार्यक्रमों में कूओं के निर्माण, निजी नलकूपों, गहरे सार्वजनिक नलकूपों, बोरिंग तथा कूओ को और गहरा करके भूमिगत जल के लिए विकास तथा पानी को निर्धारित प्रणालियों के जरिए मोड़कर अन्यत्रा ले जाने, भंडारण योजनाओं तथा लिफ्ट सिंचाई परियोजनाओं जिनमें से प्रत्येक की क्षमता कम से कम 2,000 हैक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करने की हो, के जरिए भूमिगत जल विकास शामिल है।

  • लघु सिंचाई योजनाएं कृषकों को सिंचाई का तुरंत तथा विश्वसनीय स्त्रोत उपलब्ध कराती है। यह सिंचाई के स्तर में सुधार लाने तथा नहर कमान क्षेत्रों में पानी के जमाव तथा लवणता को रोकने में भी मदद करती है। लघु सिंचाई भूतलीय जल परियोजनाओं को योजना कोषों से धन उपलब्ध कराया जाता है। यह प्रायः अनेक ऊबड़-खाबड़ भागों में भी सिंचाई के साधन उपलब्ध कराती है। इनमें भयंकर सूखाग्रस्त इलाके शामिल है। इन योजनाओं में प्रारम्भिक निवेश अपेक्षाकृत कम होता है और इन्हें शीघ्र पूरा किया जा सकता है। इन योजनाओं में सघन श्रम की आवश्यकता पड़ती है तथा इनसे ग्रामीण लोगों को रोजगार उपलब्ध होता है।

प्रश्न 21. सिंचाई कार्यक्रम पर टिप्पणी करें।

उत्तर : देश की खाद्य सुरक्षा सिंचाई क्षेत्रा के कार्य निष्पादन, वितरण और विस्तार पर निर्भर करती है। चूंकि 64 प्रतिशत कामकाजी जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है, इसलिए सिंचाई मौसमी रोजगार को साल भर के अधिक स्थायी रोजगार में परिवर्तित करके ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार क्षमता को केवल बढ़ाती ही नहीं है बल्कि ग्रामीण जनसंख्या के शहरी क्षेत्रों में पलायन को भी कम करती है। सिंचाई मानसून की अनिश्चितताओं के विरुद्ध खाद्यान्न सुरक्षा भी उपलब्ध कराती है और उसी भूमि के क्षेत्रा पर सघन फसल उगाने में वृद्धि करती है जिसके परिणामस्वरूप प्रति हेक्टैयर भूमि में खाद्यान्न का अधिक उत्पादन होता है। इस प्रकार खाद्य सुरक्षा, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन सुनिश्चित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन को घटाने में सिंचाई का महत्व अधिक स्पष्ट एवं अनिवार्य है।

  • सिंचाई क्षमता के सृजन और इसके सरलतम उपयोग को सरकारी आयोजना में निरन्तर उच्च प्राथमिकता प्राप्त होती है।
  • संक्षिप्त तैयारी अवधि और अपेक्षाकृत कम निवेश स्तरों के कारण भू-जल और भूमिगत जल दोनों को शामिल करने वाली लघु सिंचाई योजनाएं शुरू करने तथा पूरा करने को अधिमान्यता दी जाती है। अपेक्षाकृत लाभप्रद जल स्तर के कारण आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के दौरान लघु सिंचाई के विकास के लिए पूर्वी क्षेत्रा पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • किसानों को सिंचाई के लाभ उपलब्ध कराने हेतु परियोजनाओं का शीघ्र पूरा किया जाना सुनिश्चित करने के लिए 1996.97 में भारत सरकार ने ‘त्वरित सिंचाई लाभ योजना’ नामक एक कार्यक्रम शुरू किया था जिसके अन्तर्गत चुनिंदा बड़ी सिंचाई और बहुउद्देशीय परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने के लिए बराबरी के आधार पर केन्द्र राज्यों को ऋण के रूप में अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता उपलब्ध करा रहा है। अधिक क्षेत्रों में सिंचाई के लाभ प्रदान करने के लिए इस रणनीति के अन्य प्रमुख तत्वों में बेहतर जल प्रबंध पद्धतियों का उन्नयन, जल की कमी वाले और सूखा प्रवण क्षेत्रों में छिड़काव और हिसाब (ड्रिप) सिंचाई प्रणालियों की संस्थापना, भूतल और भूमिगत जल का संयुक्त प्रयोग और सिंचाई जल प्रबंध में किसानों की भागीदारी शामिल हैं।
  • विशेषकर बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के अन्तर्गत सिंचाई क्षमता का कम उपयोग निरन्तर बना हुआ है। इस अन्तर का मूल कारण खेती संबंधी कार्यों के विकास अर्थात खेतों में जल मार्गों का निर्माण, भू-समतलीकरण तथा परियोजना कमान क्षेत्रों में पानी के वितरण के लिए ‘वाराबंदी’ प्रणाली लागू करने और साथ ही किसानों द्वारा शुष्क/वर्षा सिंचाई खेती में सिंचित खेती अपनाने में लिये गये समय में होने वाले विलम्ब हैं। सृजित सिंचाई क्षमता और उपयोग में लाई गई क्षमता में अन्तर कम करने तथा कमान क्षेत्रों में फसल उत्पादकता बढ़ाने की दृष्टि से 1994-95 से कमान क्षेत्रा विकास कार्यक्रम (सी.ए.डी.पी.) कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • तीव्र औद्योगिकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण पानी के विविध प्रयोगों की बढ़ती मांग से जल संसाधनों के विकास पर भारी दबाव पड़ रहा है। इससे जल की उपभोक्ता लागत की तरफ ध्यान जाता है। वाणिज्यिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते हुए प्रयोग तथा उद्योगों, नगरपालिकाओं और घरेलू सिवेज द्वारा नए एवं विषैले अपशिष्टों का उत्पादन जल प्रदूषण के बढ़ते हुए स्त्रोत हैं। नदियों, झीलों और मुहानों में अधिक मात्रा में प्रदूषण पाया जाता है। इसलिए जल की गुणवत्ता के प्रति चिन्ता जल संसाधन विकास एवं प्रबंध में बहुत ही निर्णायक होने जा रही है।
  • पर्यावरणीय ह्नास की रोकथाम को जल संसाधन विकास कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पर्यावरणीय चिन्ताओं का समाधान स्वयं परियोजना की नियोजन व्यवस्था में ही हो जाए, सभी प्रमुख परियोजनाओं में अब ‘पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन’ अध्ययन किए जाते हैं और पर्यावरणीय रक्षा उपायों के कार्यान्वयन का राष्ट्रीय, राज्य एवं परियोजना स्तर की पर्यावरणीय अनुवीक्षण समितियों के माध्यम से नियमित अनवीक्षण किया जा रहा है। आवाह क्षेत्रा शोधक योजनाएं भी चलायी जा रही हैं ताकि पर्यावरणीय योजनाओं के अभिन्न अंग के रूप में जलाशयों में तलछट अन्तप्र्रवाहों को कम किया जा सके।

प्रश्न 22. मधुबनी चित्रकला की विस्तृत विवेचना करें।

उत्तर - लोककला का मानव जीवन के इतिहास से अत्यन्त घनिष्ठ संबंध रहा है। लोक कला बढ़ाने और उसे जीवित रखने में ग्रामीण जनता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लोक कला अपने भाव को व्यक्त करने में स्वच्छंद होती है। अतः जनसाधारण के व्यवहार की कला होने के कारण लोक कला का स्वच्छंद विकास भारत के सभी क्षेत्रों में हुआ है। इस प्रकार की कलात्मक अभिव्यक्ति में एक देश, एक संस्कृति, एक भावना, एक विचार एवं एक देश के लोगों की आत्मा बोलती है। मधुबनी चित्राकला भी भारत की समृद्ध और उन्नत कला के अन्तर्गत आती है। मधुबनी चित्राकला को मिथिला चित्राकला के नाम से भी जाना जाता है। यह चित्राकला मिथिलांचल के लोकजीवन की ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपरा में विद्यमान है। नाम से मशहूर मधुबनी चित्राकला का केन्द्र मधुबनी होने के बावजूद इसका क्षेत्रा दरभंगा, सहरसा और पूर्णियां जिला भी है। यह इन जिलों की भी लोक कला है।
इस चित्राकला में चित्रांकन भित्तिचित्रा, पट्टचित्रा और भूचित्राण (अरिपन) तीन प्रकार की भावनायें में परिलक्षित होती है। इसकी प्रेरणा महर्षियों से मिलने के बावजूद इसकी जन्मस्थली मिथिला ही रही है। मिथिलांचल में किसी भी शुभकार्य को शुरू करने के पहले अरिपन बनाया जाता है। स्वास्तिक अरिपन की चार रेखाएं आर्शीवाद प्रदान करते हुए भगवान विष्णु की चार भुजाओं का प्रतीक मानी गयी हैं। दो पुरनी के पत्रों के आकार की आकृति में एक पत्ते को दूसरे पत्ते में परस्पर दर्शाया जाना वर-वधू युगल का प्रतीक है। मिथिला क्षेत्रा में भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के अरिपन का प्रयोग किया जाता है।
मिथिला चित्राकला में भित्ति चित्रा की भी समृद्ध परंपरा रही है। धार्मिक भित्ति चित्रा में शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण, विष्णु, दुर्गा-काली, सरस्वती, लक्ष्मी, दशावतार इत्यादि की प्रमुखता है। भित्तिचित्रा में वर कन्या, हाथी, तोता-मैना, सूर्य-चन्द्र, कमल, शंख इत्यादि के चित्रा रहते हैं। प्रत्येक चित्रा का अपना अलग महत्व है। इन चित्रों में हाथी-घोड़ा ऐश्वर्य का, हंस-मयूर सुख-शांति का तथा सूर्य-चन्द्र दीर्घ जीवन का प्रतीक है।
मिथिला चित्राकला में कोहबर चित्राण अथवा कोहबर लेखन का अपना एक विशिष्ट महत्व है। कोहबर लेखन एक प्रकार से ज्यामितिक और तांत्रिक पद्धति की चित्राकला है। इसमें बांस, तोता, कछुआ, मछली, कमल के पत्ते इत्यादि का प्रयोग प्रतीक रूप में किया जाता है। बांस पुरुष लिंग तथा कमल का पत्ता स्त्राी जनेन्द्रिय का प्रतीक है। पटचित्रों का विकास प्राचीन भारतीय चित्राकला एवं नेपाली चित्राकला के मिश्रण से उत्पन्न हुआ है। मिथिला पटचित्रों के कुछ चित्रा कपड़े पर भी बने मिलते हैं, जो कि अठाहरवीं शताबदी के आस-पास के हैं। इन चित्राकलाओं में शैव, शाक्त और वैष्णव चिन्तन धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
चावल के आटे और सिंदूर से लेप (अरिपन) बनाया जाता है। ग्रामीण महिलाओं द्वारा खुद ही रंग तैयार किया जाता है। मिथिला लोक चित्राकला की एक उपशैली, हरिजन शैली है। मधुबनी के लहेरियागंज की महिलायें इस शैली में कार्य करती हैं।
इस चित्राकला के प्रमुख चित्राकारों मे जगदम्बा देवी, सीतादेवी, गंगादेवी, बौआदेवी, हीरादेवी इत्यादि का नाम प्रमुख है। शांतिदेवी की चित्राकला पर एक वृत्तचित्रा का निर्माण कर अमेरिकी दूरदर्शन पर भी प्रदर्शित किया गया था।

प्रश्न 23. किन कारणों से 1920 में गांधीजी का संवेदनापूर्ण सहयोग का दृष्टिकोण असहयोग में बदल गया? इसके क्या परिणाम हुए?

उत्तर - शांतिपूर्ण अवज्ञा से शत्राु को आंदोलन की मांगें मनवाने पर मजबूर करने के प्रयोग को दक्षिण अफ्रीका में सफल करके जनवरी, 1915 में भारत लौटे गांधीजी सत्याग्रह के बल पर ही भारत को स्वतंत्राता दिलाना चाहते थे, लेकिन इसके बारे में उनका दृष्टिकोण संवेदनापूर्ण सहयोग का था। उनका विचार था कि वैयक्तिक स्वतंत्राता और लोकतंत्रा की समर्थक ब्रितानी जनता और सरकार अन्ततः भारतीय नागरिकों को स्वशासन का अधिकार देगी। दूसरे अपने स्वभाव से गांधीजी अपने विरोधी की कमजोरी का फायदा उठाकर अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के प्रबल विरोधी थे। वह होमरूल आंदोलनकारियों की इस रणनीति के खिलाफ थे कि अंग्रेजों पर कोई भी मुसीबत उनके लिए एक अवसर है।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच पर घटित घटनाओं ने गांधीजी के दृष्टिकोण को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया। भारतीयों और स्वयं गांधीजी को विश्वास था कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रितानी सरकार भारतीयों को स्वशासन का अधिकार प्रदान करने और उनकी आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएगी, लेकिन राॅलट एक्ट के दमनकारी प्रावधानों, अमृतसर के जलियांवाला बाग में विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्रित निहत्थी जनता का जनरल ओ डायर द्वारा किए गए निर्मम नरसंहार, ब्रिटिश संसद की लाॅर्ड सभा द्वारा जनरल ओ डायर के कारनामों को उचित करार दिए जाने, ‘मार्निंग पोस्ट’ द्वारा ओ डायर के लिए 30 हजार पौंड का कोष एकत्रित करार किए जाने, तुर्की का विभाजन करके खलीफा के अधिकारों में कटौती किए जाने जैसी घटनाओं से तमाम भारतीयों सहित गांधीजी को निराशा ही हाथ लगी।
1919-20 में विजित उस्मानियां साम्राज्य पर संधि की कड़ी शर्तें लादे जाने के विरोध में जब भारत के मुसलमानों ने अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन प्रारम्भ किया तो गांधीजी इसमें सहर्ष सम्मिलित हो गए, क्योंकि (i) उन्हें यह अहसास हुआ कि अंग्रेजों ने विश्व के तमाम मुसलमानों को धोखा दिया है। (ii) ‘खिलाफत आंदोलन’ गांधीजी के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों को एकता में बांधने का एक ऐसा सुअवसर था, जो सैकड़ों वर्षों में नहीं आएगा।
इन्हीं समस्त कारणों से अन्ततः गांधीजी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। उन्होंने 22 जून, 1920 को वायसराय को एक नोटिस भेज कर कहा, “कुशासन करने वाले शासक को सहयोग देने से इनकार करने का अधिकार हर आदमी को है।“ पहली अगस्त को तिलक के निधन पर शोक और आंदोलन की शुरुआत दोनों चीजें एक साथ मिल गईं। पूरे देश में हड़ताल मनाई गई, प्रदर्शन हुए, सभाएं आयोजित की गईं और कुछ लोगों ने उपवास रखा। असहयोग आंदोलन से देश के विभिन्न भागों में हिन्दुओं, मुसलमानों एवं सिखों में अभूतपूर्व एकता स्थापित हुई और इसने अन्ततः आजादी का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 24. अंग्रेजी भारतीय सरकार की 1858-1905 के मध्य नीतियों का उद्देश्य जनता के अन्य विद्रोह को रोकना था। व्याख्या कीजिए।

उत्तर - परम्परागत ढंग से ब्रिटिश शासन का विरोध करने की परिणति सन् 1857 के विद्रोह में हुई जिसमें बलपूर्वक अथवा कपटपूर्ण तरीके से सत्ताच्युत कर दिए गए देशी रियासतों के शासकों; अधिकारों एवं सत्ता से वंचित राजकुमारों, राजाओं, जमींदारों एवं ताल्लुकेदारों, भू-राजस्व की शोषणवादी नीतियों से असन्तुष्ट कृषकों, अंग्रेजें द्वारा समाप्त की गई जागीरों व रियासतों में कार्यरत नौकरीपेशा लोगों, द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा व्यवहार सहने वाले सैनिकों तथा सांस्कृतिक और साम्प्रदायिक रूप से संगठित हुई जनता ने समग्र रूप से भाग लिया। इस विद्रोह को कुचलने में सफल अंग्रेजों ने जब भारत को कम्पनी से लेकर महारानी के सीधे नियंत्राण में कर लिया तो उन्हें इस बात का पता चल गया कि यदि भविष्य में उन्हें भारत पर निर्बाध रूप से शासन करना है तो उन्हें ऐसी नीतियां अपनानी होंगी जो इस प्रकार के विद्रोह को पुनः पैदा ही न होने दें। इसके लिए 1858-1905 के काल में निम्नलिखित नीतियां अपनाई गईं।
(I) भारतीय रियासतों के शासकों के साथ मित्रावत् व्यवहार किया गया तथा उन्हें गोद लिए पुत्रा को सत्ता सौंपने का अधिकार प्रदान कर दिया गया। देशी राजाओं के अधिकारों, प्रतिष्ठा एवं सम्मान का आदर करने की नीति अपनाई गई, ताकि वे अंग्रेजी साम्राज्य के स्वामिभक्त होकर रहें।
(II) शासन-तंत्रा धीरे-धीरे पूर्णता के साथ संगठित किया गया। भारतीय बाबुाओं का एक ऐसा वर्ग तैयार किया गया जो साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करने में सहायक सिद्ध हो।
(III)स्थानीय स्वशासन विकसित किया गया।
(IV) मादक द्रव्यों पर प्रतिबंध, फैक्ट्री कानून का निर्माण, अकाल राहत, रेलों का विकास, नहरों का निर्माण जैसे कल्याणकारी कार्य करके जनता में यह विश्वास पैदा करने का प्रयास किया गया कि अंग्रेजी शासक उनके सच्चे समर्थक थे।
(V) सैनिक विद्रोह की सम्भावनाओं को समाप्त करने के लिए सेना के संगठन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ा दिया गया। उत्तरी भारत के सैनिकों की भर्ती मिश्रित आधार पर की जाने लगी, ताकि हर कम्पनी में प्रत्येक नस्ल, जाति और धर्मावलम्बी रहें जो आसानी से एकबद्ध होकर विद्रोह न कर सके। गोरखों, पठानों और सिखों जैसी लड़ाकू नस्लों के लोगों का अधिक प्रवेश।
(vi) हिन्दूओं और मुसलमानों में फूट डालने की नीति अपनाई गई।

प्रश्न 25. 1905 में बंगाल को प्रशासकीय कारणों की अपेक्षा राजनीतिक उद्देश्यों से विभाजित किया गया। व्याख्या कीजिए।

उत्तर - भारत के वायसराय लाॅर्ड कर्जन ने सन् 1905 में राजनीतिक रूप से सर्वाधिक जागरूक प्रांत-बंगाल का विभाजन कर दिया। तर्क यह दिया गया कि बड़ा प्रांत होने के कारण इसका प्रशासन सही ढंग से नहीं चल पाता तथा पश्चिमी भाग की तुलना में अविकसित पूर्वी भाग के विकास कार्यों पर सरकार समुचित ध्यान नहीं दे पाती। लेकिन बंगाल विभाजन का वास्तविक कारण तो कुछ और ही था। ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति पर चलने वाली अंग्रेजी सरकार का मुख्य उद्देश्य उनके शासन के संगठित विरोध को दो टुकड़ों में बांट कर कमजोर कर देना था। देश में राजनीतिक रूप से सर्वाधिक जागरूक तथा अंग्रेजी शासन का विरोध करने वाले प्रांत बंगाल में उस समय तक हिन्दू तथा मुसलमान काफी बड़ी सीमा तक संगठित थे। अंग्रेजी सरकार ने मुस्लिम बाहुल्य असम तथा पूर्वी बंगाल को नया प्रांत बनाकर साम्प्रदायिकता की भावना को बढ़ावा देने की चाल चली। कर्जन और उसके सलाहकारों को विश्वास था कि असम और पूर्वी बंगाल में बहुसंख्यक मुसलमान हिन्दुओं पर अत्याचार करेंगे तथा जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप प. बंगाल के बहुसंख्यक हिन्दू अल्पसंख्यक मुसलमानों से इसका बदला लेंगे। इस प्रकार दोनों समुदाय एक दूसरे के आमने-सामने होंगे तथा इससे उनकी अंग्रेजी शासन का विरोध करने की शक्ति कम हो जाएगी।

प्रश्न 26. दक्ष निष्क्रिय नीति क्या थी? इसका क्यों त्याग किया गया?

उत्तर - भारत की ब्रिटिश सरकार के तीसरे गवर्नर जनरल और वायसराय पर जाॅन लारेंस (जन. 1864 - जन. 1869) द्वारा अपनाई गई शासन की नीति, विशेष रूप से अफगानिस्तान के सम्बन्ध में, को दक्ष निष्क्रिय नीति के नाम से जाना जाता है। लाॅर्ड डलहौजी ने यद्यपि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का चैतरफा विस्तार किया, तथापित उसने पश्चिम सीमा प्रांत में जुझारू समझे जाने वाले जनजातीय पठानों के साथ समझौतावादी नीति ही अपनाई। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सैनिक कार्यवाही भी की जाती रही। वायसराय सर जाॅन लारेंस, जो ‘हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत’ का समर्थक था, ने दक्ष निष्क्रिय नीति को अपनाते हुए सन् 1866 में जनरल जैकब के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया जो क्वेटा पर कब्जा कर लेने से सम्बन्धित था। हस्तक्षेप न करने की नीति पर ही चलते हुए डेरा गाजी खान के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन सैण्डमैन ने बुग्ती और मारी जनजातियों के साथ सीधे सम्बन्ध स्थापित किए। इसी बीच अंग्रेजों ने पश्चिमी सीमा प्रांत की भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक एं सामाजिक स्थति तथा भाषा आदि को सीखने व समझने का कार्य किया। कलात के खान से समझौता करके कलात से होकर रेलवे लाइन डाली गई। जिसके सहारे बाद में अंग्रेजों ने क्वेटा पर आधिपत्य कर लिया। और जब इस क्षेत्रों में अंग्रेजों की स्थिति काफी मजबूत हो गई तो लाॅर्ड लिटन ने सन् 1869 में दक्ष निष्क्रिय नीति का परित्याग कर दिया।

प्रश्न 27.मेकडोनल्ड निर्णय क्या था? इसको किस प्रकार संशोधित किया गया?

उत्तर - दूसरा गोलमेज सम्मेलन सन् 1931 में लंदन में आयोजित किया गया। इसमें देशी राज्यों, मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा के प्रतिनिधियों और गांधीजी ने कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। जब यह सम्मेलन सर्वसम्मति से किसी समझौते पर नहीं पहुंच सका तो ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्राी रेमजे मैकडोनल्ड ने अपना स्वयं का निर्णय सुना दिया जिसे सन् 1932 का साम्प्रदायिक निर्णय कहा जाता है। इस निर्णय के अनुसार भारत के विभिन्न समुदायों प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया। इसका सीधा-सा अर्थ यह था कि प्रत्येक सम्प्रदाय के सदस्यों को अपना-अपना हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों तथा हरिजनों के लिए पृथक-पृथक प्रतिनिधि चुनना था। अंग्रेजों का यह निर्णय उनकी ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का परिचायक था। इस प्रणाली को सन् 1909 में आंशिक रूप से लागू किया जा चुका था, लेकिन मेकडोनल्ड निर्णय में तो हिन्दुओं को हरिजनों और गैर-हरिजनों में विभाजित करने का प्रयास किया गया।
सारे भारत में इस निर्णय का विरोध हुआ। गांधी जी ने इसे वापस लेने के लिए आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। इस पर पूना में सवर्णों तथा हरिजनों के नेता डाॅ. अम्बेडकर एकत्रित हुए तथा उन्होंने संयुक्त निर्वाचक मण्डल बनाए रखने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस निर्णय से अंग्रेजी सरकार को अवगत करा दिया गया जिसने अन्ततः इस निर्णय को संशोधित कर दिया।

प्रश्न 28. भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रवाह को प्रभावित करने में तिलक का क्या योगदान रहा?

उत्तर - बाल गंगाधर तिलक (1856-1920) भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नेता थे। अपने साथी विपिनचन्द्र पाल तथा लाला लाजपतराय के साथ मिलकर उन्होंने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को जुझारू रूप प्रदान किया। तिलक उदारवादियों की राजनीतिक भिक्षावृत्ति की नीति के कटु आलोचक थे। उन्होंने जनता को बताया कि अंग्रेजी राज्य न तो ईश्वरीय वरदान है न भारत के हित में है। तिलक ने देश की जनता के सामने स्पष्ट लक्ष्य रखा। ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा देकर तिलक ने राष्ट्रीय संघर्ष की दिशा को निर्धारित कर दिया। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने संघर्ष की एक रूपरेखा भी प्रस्तुत की। आजादी की प्राप्ति के लिए साधनों के उपयोग को पवित्रा मानते हुए भी मौजूदा परिस्थितियों में उन्होंने ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ के उस मार्ग का प्रतिपादन किया जो हड़ताल, प्रदर्शन आदि पर आश्रित था तथा स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा उसके कार्यक्रम के मुख्य भाग थे। तिलक ने राष्ट्रीय संघर्ष को जन संघर्ष में बदलने की आवश्यकता को भी महसूस किया। यह दूसरी बात है कि इसके लिए धार्मिक प्रतीकों व उत्सवों का प्रयोग कर वह साम्प्रदायिकता की राजनीति को बल प्रदान करने में सहायक बन गए। जैसा कि मजूमदार का मानना है कि गांधीवादी आंदोलन के तौर तरीके वही थे जो तिलक के। इसीलिए तिलक को गांधी का वास्तविक गुरु माना जाता है, भले ही वह अपने को गोखले का शिष्य कहते हैं।

प्रश्न 29. अपनी आत्मकथा में नेहरू ने ‘लिबरल’ वर्ग की इतनी अधिक आलोचना क्यों की थी?

उत्तर - पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में उदारवादियों से शिकायत रही कि उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को सदैव ईश्वरीय वरदान के रूप में देखा। इस सोच का यह परिणाम था कि उदारवादियों ने अपने को देश की जनता, कांग्रेस पार्टी तथा आंदोलन से पूरी तरह काट लिया। असहयोग आंदोलन के अवसर पर आंदोलन में सम्मिलित होने के स्थान पर वह सरकार का साथ देते रहे। उन्होंने परिषदों का बहिष्कार नहीं किया तथा मंत्राी व अन्य सरकारी पदों को स्वीकार कर लिया। जब देश में उत्तेजना की लहर थी तथा जनता अधिक से अधिक क्रांतिकारी होती जा रही थी उदारवादी खुले रूप से प्रतिक्रांतिकारी और सरकार का एक हिस्सा बन गए थे। नेहरू ने व्यंग्य से उदारवादी नेता निवासशास्त्राी को एक साम्राज्यीय राजदूत कहकर पुकारा जो देश और विदेश में कांग्रेस की नीति व आंदोलन की आलोचना करते रहे। नेहरू की दृष्टि में लिबरल पार्टी सही अर्थों में एक पार्टी नहीं थी। वह कुछ प्रमुख व्यक्तियों का जमघट थी तथा उसका प्रभाव देश के कुछ बड़े नगरों के हिस्सों में ही सीमित था। उसकी सरकार परस्ती का आलम यह था कि 1935 के सुधारों का भी उसने दो टूक ढंग से विरोध नहीं किया यद्यपि वह इन सुधारों से असंतुष्ट थी।

प्रश्न 30. अंतर्राष्ट्रीय और मानववाद पर बल देने में टैगोर अपने समय से बहुत आगे थे। व्याख्या कीजिए -

उत्तर - टैगोर का विचार था कि प्रत्येक देश और व्यक्ति को कुछ-न-कुछ अधिकार होने चाहिए, ताकि इनके द्वारा वह अपने व्यक्तित्व के विकास की स्थिति में हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोगों के पास इतनी शक्ति और हिम्मत होनी चाहिए कि वे अपने अधिकार प्राप्त कर सकें। राज्य व्यक्ति के लिए हो न कि व्यक्ति राज्य के लिए। वह राष्ट्रीयतावाद की तुलना में अंतर्राष्ट्रीयवाद के समर्थक थे। उनके अनुसार अंतर्राष्ट्रीयवाद के माध्यम से विश्व की विभिन्न संस्कृतियों को एक-साथ लाया जा सकता है और इन सबको मिलाकर एक ऐसी नवीन संस्कृति विकसित की जा सकती है। जो सबको स्वीकार्य हो तथा जो
मानवता के समग्र विकास के लिए आवश्यक हो। स्पष्ट है कि इन दोनों ही मामलों में टैगोर अपने समकालीकों से बहुत आगे थे।

प्रश्न 31. भारतीय कला एवं संस्कृति के क्षेत्रा में रवीन्द्रनाथ टैगोर के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर -
गुरुदेव के नाम से विख्यात रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1961 को हुआ था। कला और संस्कृति के प्रति लगाव इन्हें अपने पारिवारिक माहौल से प्राप्त हुआ था। टैगोर के प्रशंसकों ने कला और संस्कृति के क्षेत्रा में इनके योगदान के कारण इन्हें भारत के लियोनार्दो द विंसी की संज्ञा दी है। वे एक साथ ही उपन्यासकार, अभिनेता, शिक्षाविद्, विचारक, चित्राकार एवं संगीत संयोजक थे। वे भारतीय कला के प्रवर्तक और संस्थापक थे। उन्होंने अपनी सृजनात्मक क्षमता की बदौलत भारतीय कला एवं सांस्कृतिक जगत में अपनी एक अलग पहचान बनायी है। उनकी सृजनात्मक क्षमता ऐसी थी कि सत्तर वसंत पार करने के बाद उन्होंने चित्राकारी सीखनी शुरू की। उन्होंने 1000 से अधिक कविताएं और 2000 से अधिक गीतों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने लघु कथाएं, नाटक, उपन्यास तथा कई निबन्ध भिन्न-भिन्न विषयों पर लिखा। 1912 में उन्हांेने ‘जन-गण-मन’ गीत लिखा, जो भारत का राष्ट्रगीत है। इसमें उन्होंने भारत के बारे में विविधता में एकता का निरूपण किया। उन्होंने 3000 से भी अधिक चित्रा चित्रित किए। 1913 में उनकी कृति ‘गीताजंली’ को साहित्य के क्षेत्रा में ‘नोबेल पुरस्कार’ के लिए चुना गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का भारतीय कला और संस्कृति में विशिष्ट योगदान है।

प्रश्न 32. बुद्धि तथा विकास के नियमों का शिक्षा में क्या महत्व है?
उत्तरः
ये नियम अध्यापक को स्कूल के कार्यक्रम में विधियों तथा उद्देश्यों को बच्चे के विकास के स्तर अनुसार ढ़ालने में सहायता करते हैं।
1. ये माता-पिता तथा अध्यापकों को बच्चे के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने तथा उनकी समस्याओं को वास्तविक ढंग से हल करने में सहायता देते है।
2. ये अध्यापक की बच्चों के व्यक्तिगत अन्तरों को सूझ तथा समय अनुसार उचित पथ-प्रदर्शन करने में सहायता करते हैं।
3. ये माता-पिता तथा अध्यापकों को बचपन का महत्व जानने में सहायता करते हैं। बच्चों में समान, सामाजिक तथा संवेगात्मक अनुभव के आदर्श पेश किये जाएँ तो व्यवहार अच्छा करने लगते हैं।
4. ये माता-पिता तथा अध्यापकों को अच्छे वातावरण का महत्व जानने में सहायता करते हैं।
स्कूल के पाठयक्रम का एक हिस्सा होना चाहिए अध्यापक-अभिभावक संघ की स्थापना। इनका उद्देश्य निम्नलिखित है।
(i) बालकों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सदैव अभिप्र्रीत करना।
(ii) अभिभावकों तथा शिक्षकों के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध एवं सद्भाव करना। बालकों के सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करना।
(iii) घर में बालकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।
(Vi) बालकों के हित को दृष्टिगत रखते हुए पारिवारिक स्तर को ऊँचा उठाना।
(V) परस्पर सहयोग और सदृभाव द्वारा बालकों की विभिन्न समस्याओं का हल खोजना।
(vi) बालकों के पारिवारिक पृष्ठभूमि से अध्यापकों को परिचित करना।
(vii) शिशुओं के सर्वांगीण विकास हेतु अध्यापकों एवं अभिभावकों द्वारा सम्मिलित प्रयत्न करना।

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