सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 2 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 2 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : चर्चा कीजिए कि भारत का संविधान किस प्रकार समान अधिकार प्रदान करता है?

उत्तर : भारत के संविधान के भाग.3 में उल्लिखित मूल अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 एवं 18); राज्य के नीति.निदेशक सिद्धान्तों (अनुच्छेद 39, 39क, 44) तथा वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326) के प्रावधानों के अन्तर्गत सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को विधि के समक्ष समान माना गया है। अर्थात् कानून की दृष्टि में सभी एक समान हैं। अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म. स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं कर सकता। किसी भी नागरिक को केवल इन्हीं आधारों पर किसी भी सार्वजनिक स्थल पर जाने एवं उसका प्रयोग किए जाने से नहीं रोका जा सकता।

अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकारी नौकरियों के अवसर सभी नृागरिकों के लिए समान रूप से खुले हैं। धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म.स्थान के आधार पर किसी को सरकारी नौकरी पाने से वंचित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 17 के अनुसार किसी भी नागरिक को अछूत या अस्पृश्य नहीं माना जा सकता। अनुच्छेद 18 के प्रावधानों के द्वारा सभी प्रकार की उपाधियों (सेना एवं विद्या सम्बन्धी सम्मानों को छोड़कर) का अन्त कर दिया गया।
 

अनुच्छेद 39 (क) के अनुसार पुरुष और स्त्राी सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार है। 39 (घ) के अनुसार पुरुषों और स्त्रिायों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था है। 
 

अनुच्छेद 39.क में राज्य से यह अपेक्षा की गई है कि वह सुनिश्चित करेगा कि विधिक-तन्त्रा इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण न्याय प्राप्त करने से वंचित न रह जाए। अनुच्छेद 44 में "राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एकसमान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।" 
 

अनुच्छेद 326 के द्वारा 18 वर्ष या इससे अधिक के सभी नागरिकों, पुरुषों या स्त्रिायों को समान रूप से मताधिकार प्राप्त है। इसके साथ.साथ वाक.स्वातंत्रय एवं अभिव्यक्ति स्वातंत्रय, शान्तिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने, संगम या संघ बनाने, भारत के राज्य क्षेत्रान्तर्गत अवाध संचारण, बसने तथा कोई वृत्ति.उपजीविका व्यापार.कारोबार करने, धर्म धारण करने आदि के मामले में भी सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार प्राप्त हैं।
 

प्रश्न 2 : भारत का संविधान लोक सेवा आयोगों की स्वतन्त्राता को बनाए रखने का किस प्रकार प्रयास करता है?

उत्तर :  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(1) में कहा गया है कि- "राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी" तथा 16(2) के अनुसार- राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के सम्बन्ध में केवल धर्म, मुलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म.स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्रा होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।
 

संविधान प्रदत्त इस मौलिक अधिकार को भी नागरिकों को प्रदान कराने के लिए यह आवश्यक था कि लोक सेवाओं की नियुक्ति ऐसी संस्था या संस्थाओं के माध्यम से कराई जाए जो पूर्णरूपेण सत्ता के नियंत्राण से बाहर स्वतंत्रा और निष्पक्ष रूप से कार्य करें। संविधान निर्माताओं ने इस तथ्य को भली प्रकार से समझाा होगा कि विधायिका में बहुमत प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल तथा उसके नेतागण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए महत्वपूर्ण पदों पर अपने.अपने समर्थकों की नियुक्ति कर सकते हैं। इस प्रकार से नियुक्त किए गए लोक सेवकों की निष्ठा अपने राजनीतिक संरक्षकों के प्रति ही अधिक होगी। अर्थात् वे भी निष्पक्षता के साथ कार्य नहीं कर सकेंगे। दूसरे यह नियुक्ति प्रणाली संविधान के अनुच्छेद.16 की मूल भावना के प्रतिकूल होगी। इसी सम्भावित विसंगति का निराकरण करने के लिए संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग तथा प्रत्येक राज्य के लिए लोक सभा आयोगों की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद.315 में की गई।
 

संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तथा राज्य के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। प्रत्येक लोक सेवा आयोग के यथाशक्य निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे, जो अपनी.अपनी नियुक्ति की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम.से.कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हैं।
 

संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति 6 वर्ष के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक तथा राज्य लोक सेवा अयोग के सदस्यों की नियुक्ति 6 वर्ष के लिए या बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने, जो भी पहले हों, तक की अवधि के लिए की जाती है। किसी भी सदस्य की पुनर्नियुक्ति नहीं की जाती। लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों/सदस्यों को उनके पद से मनमाने ढंग से हटाया नहीं जा सकता है। संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार का नियोजन प्राप्त नहीं कर सकता। संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य राज्यों के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर तो नियुक्त किए जा सकते हैं। इसी प्रकार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों को संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, किन्तु इनमें से कोई भी संघीय सरकार अथवा राज्य सरकार के अधीन कोई भी नियुक्ति नहीं पा सकता। संघ लोक सेवा अयोग के अध्यक्ष/सदस्यों के वेतन और भत्ते भारत सरकार की संचित निधि पर तथा राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष/सदस्यों के वेतन और भत्ते राज्यों की संचित निधि पर भारित होते हैं। 

लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों एवं सदस्यों को उनके पद से हटाए जाने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इन्हें केवल कदाचार के आधार पर, दिवालिया हो जाने पर, कोई अन्य सवेतन रोजगार प्राप्त कर लेने पर शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर हो जोन पर ही हटाया जा सकता है। कदाचार की जाँच अनुच्छेद 145 के अधीन उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाती है।
 

भारतीय संविधान में लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों एवं सदस्यों की नियुक्ति उन्हें उनके पद से हटाए जाने तथा सेवा अवधि पूरी हो जाने पर सरकारी नौकरी या लाभ कोई अन्य पद धारण न कर पाने की प्रक्रिया से सम्बन्धित उपर्युक्त प्रावधान इन्हें (अघ्यक्षों को) निष्पक्षता एवं स्वतंत्राता के साथ कार्य करते रहने की गारन्टी देते हैं।
 

प्रश्न 3 : पंजाब विधान सभा केे, नदी जल मामलों पर सभी पिछले समझौतों का समापन करने सम्बन्धी विधेयक के पश्चात्, अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद फिर से ज्वलंत हो गया है। चर्चा कीजिए।

उत्तर :  पंजाब के मुख्यमंत्राी कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने लोक सभा चुनाव में पंजाब राज्य में कांग्रेस की पराजय से उपजी हताशा में अपनी लोकप्रियता को कायम रखने के लिए एकपक्षीय रूप से पंजाब विधान सभा में एक प्रस्ताव पारित कराकर पंजाब से बहकर जा रही नदियों के जल बँटवारे के हरियाणा, राजस्थान तथा दिल्ली के साथ हुए वर्षों पुराने करार को ही रद्द कर दिया। इसने राज्यों के बीच चले आ रहे नदी जल विवादों को नए सिरे से ज्वलंत बना दिया है। इसी आधार पर आगे चलकर कर्नाटक कावेरी नदी का पानी तमिलनाडु तथा पाण्डिचेरी को देने से पूरी तरह से मना कर सकता है। मध्य प्रदेश नर्मदा तथा चम्बल के पानी को रोक सकता है, तो उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल गंगा यमुना के जल को रोककर बिहार तथा पश्चिम बंगाल को समस्याग्रस्त बना सकते हैं।
भारत एक संघीय गणराज्य है, किन्तु इसका संघीय स्वरूप सं. रा. अमरीका जैसा नहीं हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची में संघीय सरकार तथा राज्य सरकारों के कर्तव्य तथा अधिकारों का सुस्पष्ट उल्लेख है। अवशिष्ट शक्तियाँ संघीय सरकार के पास हैं। प्रत्येक राज्य को अपनी सीमाओं के भीतर प्राकृतिक संसाधनों- भूमि, पहाड़ वन, जल, खनिजों आदि की खोज एवं विदोहन का पूरा अधिकार प्राप्त है, तथापि जल एक ऐसा संसाधन है जिस पर कोई एक राज्य अपना एकाधिकार स्थापित नहीं कर सकता। विशेष रूप से नदियों का जल उन सभी राज्यों के उपयोग के लिए है जहाँ से होकर ये बहती हैं। कोई राज्य केवल इसी आधार पर किसी नदी विशेष के जल पर अपना एकाधिकार नहीं जता सकता कि वह उसके भीतर से होकर बहती हैं यदि कोई राज्य ऐसा करता है, तो यह प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है, क्योंकि जब कोई राज्य सामान्य मौसम में, जब नदियों में जल के पानी को अन्य राज्यों के लिए डाउन स्ट्रीम में नहीं छोड़ेगा, तो बरसात के मौसम में नदी में बाढ़ का पानी आने पर वह उसे डाउन स्ट्रीम में छोड़ने का अधिकार किस प्रकार प्राप्त कर सकेगा। अर्थात् उसे अपने ही क्षेत्रा को जलमग्न करने का दंश स्वयं ही झेलना होगा। इतना ही नहीं इस प्रकार का अतिवादी दृष्टिकोण पानी के लिए तरस रहे राज्यों को बदले की भावना से कुछ अन्य कदम उठाने के लिए बाध्य कर सकता है। कल को उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप यदि हरियाणा या राजस्थान के लोग अपनी सरकार से समर्थन पाकर अपने.अपने राज्य की सड़कों से पंजाब जाने वाले वाहनों का चलना बन्द कर दे या रलों की आवाजाही को बाधित करें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इस प्रकार की टकराव की राजनीति अलगाववाद को बढ़ावा देगी जो देश के संघीय ढाँचे को क्षति पहुँचाएगी। अन्तर्राष्ट्रीय/अन्तर्राज्यीय भाई.चारे की भावना तो यही कहती है कि जो कुछ है उसे मिल.बाँट कर उपभोग करो। यह सिद्धान्त जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर भी लागू होता है।

 

प्रश्न 4 :(a) आज के बदलते हुए राजनीतिक परिपे्रक्ष्य में राज्यसभा से कौन-सी विशेष भूमिका अपेक्षित है?
अथवा
(b) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 द्वारा किन आधारों पर भेदभाव वजित है? इंगित कीजिए कि किस प्रकार से विशेष संरक्षण के प्रत्यय ने इस वजित भेदभाव को मर्यादित किया है तथा सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा दिया है।

उत्तर :(a) राज्यसभा, जो कि उच्च सदन माना गया है, के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 होती है। इसके तहत प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य विशेष की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है, जो समाज में अपने उल्लेखनीय कार्यों के लिए जाने जाते हैं। इस प्रकार, राज्यसभा में परिसंघ की इकाइयों के प्रतिनिधि होते हैं, जिससे इसका परिसंघीय लक्षण प्रकट होता है। साथ ही, इससे अल्पसंख्यक समुदायों तथा दलों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित हो पाता है।
यूं तो राज्यसभा की शक्तियां लोकसभा की शक्तियों की तुलना में कमतर ही मानी गयी हैं, खासकर वित्तीय मामलों में, किंतु आज की राजनीतिक अस्थिरता के दौर में निःसंदेह राज्यसभा की भूमिका काफी प्रभावी बन गयी है। क्षेत्राीय दलों के बढ़ते वर्चस्व तथा रोज-रोज की राजनीतिक तोड़-जोड़ ने लोकसभा की कार्यावधि को सीमित कर दिया है, जिससे सरकारी प्रयासों एवं नीतियों को जबर्दस्त क्षति पहुंची है। गठबंधन के इस दौर ने लोकसभा को (खासकर 1989 के बाद से) असमय ही काल-कवलित किया है। इससे हमारी संसदीय परंपरा के प्रति लोगों में निराशा के भाव जाग्रत होने लगे हैं। शायद इसी संशय के समाधान हेतु हमारे संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा को एक स्थायी निकाय के रूप में परिभाषित किया था। ध्यातव्य है कि राज्यसभा का विघटन नहीं होता है, यद्यपि उसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते रहते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक दूसरे वर्ष राज्यसभा के एक तिहाई सदस्यों में, प्रत्येक दूसरे वर्ष राज्यसभा के एक तिहाई सदस्यों का निर्वाचन होता है, परंतु कभी भी इसका विघटन नहीं होता है। इस प्रावधान के चलते लोकसभा के विघटन की स्थिति में भी सरकारी नीतियों एवं प्रावधानों पर चर्चा करने तथा उचित मत लाने में राज्यसभा की प्रभावी भूमिका नजर आती है।
इतना ही नहीं, राज्यसभा को कुछ ऐसे अधिकार भी प्रदान किये गये हैं, जो कि लोकसभा की परिधि से बाहर हैं। इसके तहत अनुच्छेद- 249 यह उपबंध करता है कि यदि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है, तो राज्य सूची के किसी विषय की बावत संघ अस्थायी विधान बना सकता है। इस विषय में संविधान ने राज्यसभा को विशेष भूमिका प्रदान की है। इसी प्रकार, संविधान के अनुच्छेद- 312 में संसद को यह शक्ति दी गयी है कि वह संघ तथा राज्यों के लिए सम्मिलित, एक या अधिक, अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन के लिए उपबंध कर सकेगी, यदि राज्यसभा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्यों द्वारा यह घोषित कर देता है कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना समीचीन है। इन दोनों विषयों में संविधान ने राज्यसभा को विशेष स्थान दिया है, क्योंकि उसकी प्रकृति परिसंघीय है। साथ ही, इससे यह भी आभास होता है कि दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित संकल्प से राज्यों की सम्मति प्रकट होती है।
एक अन्य कारण से भी आज के परिप्रेक्ष्य में राज्यसभा की महत्वपूर्ण भूमिका नजर आती है। राजनीति के अपराधीकरण ने जहां लोकतंत्रा को कमजोर बनाया है, वहीं इसने लोकतंत्रात्मक हिस्सेदारी को भी सीमित कर दिया है। सच्चरित्रा एवं विद्वान व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्रा में कदम रखने से हिच-किचा रहा है, क्योंकि यह अपने लिए राजनीतिक दाव-पेंच तथा जोड़-तोड़ अनुकूल नहीं मानता ऐसे में, राष्ट्रपति द्वारा समाज के सम्मानित एवं कार्यकुशल व्यक्तियों को नामित करने से इस वर्ग के दृष्टिकोण को समझने में मदद मिलती है।

उत्तर : (b) अनुच्छेद-14 द्वारा प्रत्याभूत समता का एक विशिष्ट पहलू ही संविधान के अनुच्छेद-15 में विभेद के विरुद्ध प्रतिषेध के रूप में अंतविष्ट है। अनुच्छेद-15 का लाभ केवल नागरिकों को ही प्राप्त है और यह किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर विभेद करने का प्रतिबंध करता है। इस अनुच्छेद का प्रतिषेध जहां राज्य की कार्यवाही के विरुद्ध है, वहीं यह व्यक्तियों के विरुद्ध भी है। इस प्रतिषेध का सीधा अर्थ यह है कि किसी विशेष धर्म या जाति आदि के किसी व्यक्ति के साथ राज्य अन्य धर्म या जातियों के व्यक्तियों की तुलना में केवल इस आधार पर पक्षपात नहीं करेगा कि वह किसी विशेष धर्म या जाति का है। यहां ‘केवल’ शब्द का यह महत्व है कि यदि विभेदनकारी व्यवहार के लिए इस अनुच्छेद द्वारा प्रतिषिद्ध आधार के अतिरिक्त कोई अन्य आधार या कारण है, तो विभेद असंवैधानिक नहीं माना जायेगा।
लेकिन संरक्षण के कुछ विशेष प्रत्यय ने इस वजित भेदभाव को मर्यादित करने तथा सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। विभेद के विरुद्ध उपर्युक्त प्रतिषेध राज्य की: (i) स्त्रिायों एवं बालकों के लिए विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगा, तथा (ii) सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगा।
दरअसल, इन आपवादिक वर्गों के व्यक्तियों को विशेष संरक्षण की आवश्यकता है, इसलिए कोई विधान, जो इस वर्ग के व्यक्तियों के लिए विशेष उपबंध करने के लिए आवश्यक है, असंवैधानिक नहीं माना जायेगा। इसी प्रकार, इस अनुच्छेद के तहत केवल जाति के आधार पर विभेद प्रतिषिद्ध है, किंतु राज्य यदि चाहे तो पिछड़े वर्गों के सदस्यों के लिए या अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए सार्वजनिक संस्थानों में स्थानों का आरक्षण कर सकता है अथवा उन्हें शुल्क में रियायत दे सकता है।
अनुच्छेद- 15 का खंड 4 एक अपवाद प्रदान करता है, जिसके तहत राज्य को सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों अथवा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार प्राप्त है। यह प्रावधान अनुच्छेद- 46 में उल्लिखित नीति के अनुसार है, जिसके तहत कहा गया है कि राज्य सरकार को विशेष ध्यान देकर पिछड़े वर्ग के लोगों के शैक्षणिक व आथिक हितों का विकास करना चाहिए तथा सामाजिक अन्याय से उनकी रक्षा करनी चाहिए। इस खंड का उद्देश्य (जिसे सन् 1951 में संविधान के एक संशोधन के रूप में जोड़ा गया था) अनुच्छेद 15 व 29 को अनुच्छेद 16(4), 46 तथा 340 के समरूप लाना तथा पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों से सम्बद्ध नागरिकों के लिए शासकीय शैक्षणिक संस्थानों में राज्य द्वारा सीटों के आरक्षण को तथा इनकी प्रगति के लिए अन्य आवश्यक प्रावधानों को संवैधानिकता प्रदान करता है।
आरक्षण की मात्रा के संबंध में, जिसे न्यायालय न्यायसंगत मान सकता है तथा जो अनुच्छेद-15(1) के अनुकूल है, यह कहा गया है कि अनुच्छेद 15(4) के तहत किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश के लिए उपलब्ध कुल सीटों के पचास प्रतिशत से कम सीटों का आरक्षण न्यायसंगत होगा तथा इससे अधिक के आरक्षण को अवैध माना जायेगा (बालाजी बनाम मैसूर इस्टेट, 1963,उच्चतम न्यायालय)।
इस प्रकार का आरक्षण प्रत्याशियों को किसी भी सामान्य अथवा गैर-आरक्षित सीटों के लिए प्रतिस्पद्र्धा करने से वंचित नहीं करता है। इसी प्रकार, यदि अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थी अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य वर्ग से कुछ सीटें प्राप्त कर लेते हैं, तो इनके द्वारा प्राप्त इस प्रकार की सभी सीटों  की संख्या को अनुच्छेद: 15(3) अथवा अनुच्छेद- 15(4) के तहत दिये गये आरक्षरण के कोटे के अंतर्गत मान कर अतर्कसंगत नहीं समझा जा सकता है। इसके विपरीत, राज्य द्वारा इन वर्गों के सदस्यों हेतु अधिकतम कोटा निर्धारित करना भी न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि इस प्रकार उन्हें अपनी कुशाग्रता के आधार पर प्राप्त सीटों से भी वंचित होना पड़ सकता है।

 

प्रश्न 5 : (a) भारत की 1991 की नई औद्योगिक नीति में ‘नवीन’ क्या है?
अथवा
(b) विनियोग पर बहुपक्षीय समझौता क्या है? भारत जैसे किसी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था को यह कैसे प्रभावित करेगा?

उत्तर :(a) भारत सरकार द्वारा जुलाई 1991 में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी, जिसके तहत कई क्रांतिकारी एवं नवीन प्रस्तावों को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य एक ऐसी संपर्क नीति तैयार करना, जिससे पूर्व नीतियों की खामियों को दूर करना आसान हो सके तथा रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करना और राष्ट्रीय उत्पादों में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा के मद्देनजर टिक पाने का सामथ्र्य उत्पन्न करना संभव हो सके। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार ने कई नये एवं प्रभावी कदम उठाये हैं, जो इस प्रकार हैं:

(i) औद्योगिक लाइसेंसिंग व्यवस्था का समापन : सामरिक, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण, उच्च रहन-सहन आदि से जुड़ी तथा अन्य 18 महत्वपूर्ण उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग प्रणाली समाप्त कर देने का निर्णय लिया गया है। नयी नीति के अनुसार, जिन उद्योगों में पूंजीगत माल के लिए विदेशी पूंजी अंश पूंजी के रूप में उपलब्ध होगी, उन्हें स्वतः ही उद्योग लगाने की अनुमति मिल जायेगी।

(ii) विदेशी निवेश को प्रोत्साहन : उच्च प्राथमिकता वाले 34 उद्योगों में, जहां अधिक पूंजी विनियोग तथा उच्च प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है, वहां विदेशी पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इन उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी निवेश को स्वतः अनुमति प्राप्त हो सकेगी। ऐसे मुख्य उद्योग हैं: खनिज, परिवहन, खाद्य पदार्थ आदि। इतना ही नहीं, विदेशी मुद्रा के लिए ‘विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम’ (फेरा) में आवश्यक संशोधन किये जायेंगे। साथ ही, विदेशी पूंजी निवेश को प्राथमिकता दी जायेगी, जिससे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, विपणन सुविज्ञता तथा आधुनिक प्रबंधन तकनीक को सुविधाएं प्राप्त हो सकें।

(iii) विदेशी प्रौद्योगिकी से जुड़े समझौते : उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों के लिए एक करोड़ रुपये तक के विदेशी औद्योगिक समझौतों को स्वतः स्वीकृति प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। इसमें राष्ट्रीय बाजार में बिक्री पर पांच प्रतिशत तथा निर्यात पर आठ प्रतिशत राॅयल्टी होगी। अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता का मुकाबला करने के लिए विदेशी तकनीशियन बुलाने तथा देश में विकसित की गयी प्रौद्योगिकी की विदेशी जांच के लिए अभी तक मौजूद पूर्वानुमति आवश्यक नहीं रह जायेगी।

(iv) सार्वजनिक क्षेत्रा से संबंधित नीति : कुल आठ उद्योगों को छोड़ कर अब तक सार्वजनिक क्षेत्रा के अंतर्गत कार्यरत अन्य सभी उद्योगों को निजी क्षेत्रा के लिए खोल दिया गया है। सार्वजनिक क्षेत्रा के लिए आरक्षित प्रस्तावित उद्योगों में शामिल हैंः सामरिक महत्व के उद्योग, परमाणु ऊर्जा, रेल यातायात, खनिज तेल आदि।

(v) एम.आर.टी.पी. कानून : नयी औद्योगिक नीति में ‘एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार कानून’ (एम.आर.टी.पी.) से प्रभावित होने वाली कंपनियों की पूंजी से पाबंदी हटाने का निर्णय लिया गया है। इस कानून में संशोधन किये जायेंगे, ताकि कंपनियों के विलय, स्थापना तथा संचालकों की नियुक्ति सरलता से हो सके।
इसके अलावा 1992.93 में औद्योगिक नीति से इन सुधारों को और आगे बढ़ाया गया, जो निम्नलिखित हैं:
(i) पूंजी बाजार को सरकारी नियंत्राण से मुक्त किया गया।
(ii) विदेशी विनिमय नियंत्राण एक्ट में पुनः संशोधन किया गया तथा फेरा कंपनियों के विनियोग संबंधी नियंत्राण को समाप्त किया गया।
(iii) औद्योगिक अल्कोहल के निर्माण को लाइसेंस से मुक्त तथा वीनीर को आवश्यक रूप से लाइसेंस की सूची में डाला गया।
(iv) लाइसेंस की श्रेणी में आने वाले उद्योगों के अतिरिक्त अन्य उद्योगों के क्षमता-विस्तार तथा आधुनिकीकरण के लिए अनुमति प्रदान की गयी।
(v)   तेल संशोधन तथा रिफाइनरीज में निजी क्षेत्रा को निवेश की स्वतंत्राता प्रदान की गयी।
(vi) ऊर्जा क्षेत्रा को घरेलू एवं विदेशी निजी क्षेत्रा के विनियोग के लिए खोल दिया गया।

उत्तर : (b) बहुपक्षीय पूंजी निवेश गांरटी एजेंसी (M.I.G.A.) विश्व बैंक से संबंधित एक संस्था है, जिसकी स्थापना विदेशी पूंजी निवेश को गैर-व्यावसायिक जोखिम से संरक्षण प्रदान करने के लिए की गयी थी। यह अभिकरण विशेषतः मुद्रा परिवर्तन तथा हस्तांतरण पर लगी पाबंदियों से उत्पन्न जोखिम से पूंजी निवेश करने वालों की रक्षा करता है। इतना ही नहीं, बहुपक्षीय विनियोग समझौते के तहत यह अभिकरण जिस देश में पूंजी निवेश किया जाता है, उसके कानूनों एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से भी पूंजी निवेश को संरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था करता है। साथ ही, यह निवेश पर लाभ की गारंटी भी दिलवाता है।
भारत, 1993 में इस एजेंसी का सदस्य बन गया। भारत जैसे विकासशील देशों में उदारीकरण के माध्यम से विदेशी पूंजी निवेश में वृद्धि को अर्थव्यवस्था को ऋण दिलाने का सर्वोत्तम उपाय माना जा रहा है। इसी लोभ के तहत इन देशों में प्रत्यक्ष तथा गैर-सरकारी पूंजी निवेश को रियायती शर्तों पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। इतना ही नहीं, विभिन्न देशों से द्विपक्षीय गांरटी संधियां भी की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य गैर-सरकारी विदेशी पूंजी निवेश को सरंक्षण प्रदान करना है। किसी देश में पूंजी निवेश आक£षत करने के लिए सामान्यतः संरक्षण की एक निश्चित सीमा होनी चाहिए, लेकिन इससे कहीं आगे बढ़कर निवेश के लिए काउंटर गांरटी देने को किसी भी स्तर से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन विभिन्न देशों के निवेशकार्ता अपने निवेश की गारंटी की मांग कर रहे हैं, जिसे भारत सहित कई अन्य विकासशील देशों ने सिद्धांतः मान भी लिया है। ऐसे में, यदि देश में विदेशी पूंजी को आक£षत करने के निमित्त पूंजी निवेश संरक्षण एवं गारंटी समझौतों की संख्या तथा मात्रा में लगातार वृद्धि होने लगे, तो अर्थव्यवस्था से प्रतिस्पद्र्धात्मक सिद्धांत का लोप हो जायेगा तथा व्यावसायिक क्षेत्रा में जोखिम उठाने का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा।
जाहिर है कि इसका प्रतिकूल प्रभाव इन विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। दूसरी ओर, सरकार द्वारा निवेश संरक्षण संबंधी काउंटर गांरटी केवल विदेशी निवेशकों को दी जा रही है तथा घरेलू निवेशकों को इससे सर्वथा अलग रखा जा रहा है। स्वदेशी तथा आत्मनिर्भर उद्यमों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन विकासशील देशों में पूंजी निवेश की आवश्यकता है तथा काउंटर गांरटी देना उन्हें आक£षत करने का एक उपाय है, किंतु इस सत्यता से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि किसी भी बात की अति सर्वथा वजित होनी चाहिए।

 

प्रश्न 6 :  माँग के नियम के अपवाद की चर्चा करें।

उत्तर : सामान्यतः, ऊँची कीमत पर वस्तु की माँग कम तथा कम कीमत पर माँग अधिक होती है लेकिन कुछ अवस्थाओं में कीमत और माँग का यह विपरीत सम्बन्ध कायम नहीं रहता। इन अवस्थाओं में कीमत बढ़ने पर माँग बढ़ती है, तथा कीमत पर माँग भी कम हो जाती है। इसको माँग के नियम के अपवाद कहा जाता है, जबकि माँग का नियम लागू नहीं होता। माँग के नियम के प्रमुख अपवाद निम्नलिखित हैंः
(1) गिफन वस्तुएँ  इस प्रकार के अपवाद का एक उदाहरण सर रोबर्ट गिफन ने सर्वप्रथम बताया। 
19वीं शताब्दी के दौरान जब इंग्लैण्ड में डबलरोटी की कीमत बढ़ रही थी तो उन्होंने यह सिद्ध किया कि कीमत में वृद्धि के साथ-साथ डबलरोटी की माँग भी बढ़ रही थी। गिफन ने इस स्थिति की इस प्रकार व्याख्या की कि डबलरोटी की कीमत में वृद्धि के कारण उपभोक्ता डबलरोटी पर अपनी आय का अधिक भाग व्यय करने के लिए बाध्य हो जाते हैं तथा दूसरे पौष्टिक पदार्थों जैसे माँस, फल आदि का पर्याप्त मात्रा में उपभोग नहीं कर पाते। इस क्षतिपूर्ति के लिए डबलरोटी का अधिक प्रयोग करते हैं। दूसरे शब्दों में ,डबलरोटी की कीमतों में वृद्धि के बावजूद  भी डबलरोटी की माँग और अधिक हो सकती है। 
निम्न आय वर्ग जीवन रक्षक वस्तुओं जैसे खाद्यान्न की कीमत बढ़ जाने पर ऐसी वस्तुओं का अधिक उपयोग करने पर बाध्य हो जाते है। ऐसी परिस्थिति में मांग वक्र नीचे की ओर झुकने की अपेक्षा ऊपर की ओर बढ़ता है। 
(2) प्रदर्शनकारी अनिवार्य वस्तुएँ  कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं, जो कि आधुनिक जीवन में प्रदर्शनकारी होते हुए भी अनवार्यताओं का सम्मान प्राप्त किये हुए हैं। ऐसी वस्तुओं को उच्च-वर्ग की वस्तुएँ कहा जाता है। ऐसी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के उपरान्त भी इनकी माँग बढ़ती है। जिस प्रकार बड़े शहरों में स्कूटरों की कीमत में वृद्धि के बावजूद भी इनकी माँग निरन्तर बढ़ रही है। 
(3) मिथ्या आकर्षण समाज में दिखावे के लिए या अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए धनी लोग ऐसी वस्तुओं को खरीदते हैं जिनकी कि कीमत काफी अधिक होती है। जिस प्रकार कि बहुमूल्य धातुओं, मूर्तियों, हीरे-जवाहरात, आदि की कीमत बढ़ने पर धनी लोग अधिक मात्रा में मांग करते है। 

(4) कीमत वृद्धि की आशंका जब उपभोक्ता को यह आंशका होने लगती है, कि भविष्य में वस्तु की पूर्ति बहुत कम हो जायेगी, और कीमतों में काफी वृद्धि हो जायेगी, तो वर्तमान समय में कीमतों में वृद्धि के बावजूद भी वे वस्तू की अधिक माँग करते हैं। 
(5) आपातकालीन स्थिति जैसे, युद्ध, अकाल, आदि में भी माँग का नियम लागू नहीं होता। ऐसे समय में वस्तुओं का अभाव उत्पन्न होने लगता है। गृहस्थों को यह आशंका होने लगती है कि भविष्य में कहीं वस्तु बिल्कुल ही उपलब्ध न हो। इसलिए, ऊँची कीमतों पर भी वे वस्तु की अधिक मात्रा में माँग करते हैं। 
(6) फैशन में परिवर्तन यह सिद्धान्त उन वस्तुओं पर लागू नहीं होता जो कि फैशन में नहीं रहती हैं। जिस प्रकार, यदि ऊँची एड़ी के जूतों या चैड़ी टाइयों का फैशन नहीं रहता है, तो इन वस्तुओं की कीमतों में काफी कमी होने के बावजूद भी इनकी माँग में वृद्धि नहीं होगी। 
(7) अज्ञानता- कभी-कभी अज्ञानतावश लोग यह समझ बैठते है कि जिस वस्तु की कीमत अधिक है या जिसका रेडियो और टी.वी. पर सबसे अधिक विज्ञापन आता है या जिसका पैकिंग बहुत सुन्दर है वह निश्चित रूप से अच्छी वस्तु होगी। ऐसी वस्तु को उपभोक्ता ऊँची कीमत पर अधिक मात्रा में खरीदने के लिए तत्पर रहती हैं।
इन अपवादों के उपरान्त भी माँग का नियम व्यावहारिक जीवन में लागू होता है। उपरोक्त दशाएँ कोई सामान्य दशाएँ नहीं हैं, अतः  यह कहा जा सकता है कि माँग का नियम व्यावहारिक जीवन की कसौटी  पर खरा उतरता है एवं सत्य प्रतित होता है। 

 

प्रश्न 7 : सम्पत्ति के सार्वजनिक स्वामित्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर : - पुराने समाजवादी समाज में उपभोक्ता वस्तुओं के निजी स्वमित्व की तो व्यवस्था है लेकिन उत्पानदन के साधनों का स्वामित्व सामाजिक है। भूमि, पूँजी तथा उद्यम समाज की सम्पत्ति होते हैं। उत्पादन के साधनों में निजी स्वामित्व के स्थान पर सामाजिक स्वामित्व की व्यवस्था होती है। सामाजिक स्वामित्व के दो मूल रूप हैंः (क)राजकीय स्वामित्व (ख) सामूहिक स्वामित्व। 
सोवियत यूनियन तथा अन्य समाजवादी देशों में उद्योग तो सामान्यतया राजकीय स्वामित्व में होते हैं, लेकिन कृषि का स्वमित्व सामान्यतया सामूहिक होता है। कई समाजवादी देशों में कृषि, उद्योग तथा व्यापार सभी के लिए सहकारी समितियाँ भी होती हैं। सहकारी समितियों का चरित्रा सामाजिक है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इनके मजदूरों का वेतन किस प्रकार मिलता है। यदि समिति से होने वाली आय मजदूरों में बाँट दी जाती है तो उस समिति का चरित्रा सामूहिक होता है। लेकिन यदि उससे होने वाली आय को (1)  काम से होने वाली आय में, और (2)  समिति के साधनों में योगदान से होने वाली आय में बाँट दिया जाए और इन दोनों में असमानता हो तो उस समिति को समाजवादी नहीं माना जा सकता। समाजवादी वातावरण में ये समितियाँ पूँजीवाद और समाजवाद के बीच की अस्थायी अवस्था को चित्रित करती है।
कुछ समाजवादी देशों में कृषि तो सामूहिक फार्मों के द्वारा चलाई जाती है, लेकिन सामूहिक फार्मों के किसानों को सब्जियाँ व अन्य फसलें उगाने के लिए एक-एक छोटा निजी खेत भी दिया जाता है। लेकिन इस खेत को जोतने के लिए बाहर से मजदूरों को लगाने की सामान्यतया मनाही होती है। केवल परिवार के सदस्य ही जोतने का काम कर सकते हैं। लेकिन इस प्रकार का स्वामित्व कुल कृषि का बहुत ही छोटा अंग है। 

 

प्रश्न 8 : समाजवादी अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध होते हुए भी इसमें आय में असमानता होती है। दर्शाऐं।

उत्तर :  समाजवादी अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था होती है। चूँकि उत्पादन-साधनों को कोई निजी स्वामी नहीं होता, इसलिए उत्पादन से सृजित बचत का निजी स्वामित्व भी नहीं होता। नीचे दिए गए चार मूल तरिकों से उत्पादित वस्तुओं का प्रयोग होता हैः
(क) उत्पादन में योगदान देने वाले मजदूरों द्वारा निजी उपभोग
(ख) स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सेवाओं के रूप में लोगों द्वारा सामूहिक उपभोग
(ग) राज्य का भरण-पोषण; और 
(घ) भौतिक सम्पत्ति के रूप में पूँजी का सृजन।
यह फैसला कीमत-तन्त्रा की बजाय एक केन्द्रीय योजना द्वारा किए जाते हैं, हालाँकि कई समाजवादी देशों में पूर्ति तथा माँग के अनुरूप बाजार-तन्त्रा का भी सीमित उपयोग किया जाता है।
आय में असमानता के दो स्रोत हैं: निजी सम्पत्ति और मजदूरी/आय। इनमें से केवल दूसरा ही समाजवादी व्यवस्था में पाया जाता है। मजदूरी में फर्क के कारण आय मेें असमानताएँ होती हैं जिसके कारण विभिन्न वर्गों के रहन-सहन के स्तर में भी अन्तर होता है। वैज्ञानिकों, सफल लेखकों, संस्थानों के मैनेजरों, सरकार के उच्च अफसरों तथा पार्टी के ऊँचे पदाधिकारियों को दूसरों से अधिक तनख्वाह मिलती है। विभिन्न धन्धों में मिलनेवाली मजदूरी में भी अन्तर होता है।
लेकिन इस सबके बावजूद पूँजीवादी देशों की तुलना में आय की असमानताएँ काफी कम है। गरीब समाजवादी देशों में यह असमानता अमीर समाजवादी देशों के मुकाबले में काफी कम है। वास्तविक आय-असमानताएँ धन-आय की असमानताओं के द्वारा इंगित असमानताओं से काफी कम होती हैं क्योंकि बहुत सी सेवाएँ: स्वास्थ, शिक्षा इत्यादि : मुफ्त होती है। 

 

प्रश्न 9 : समाजवादी व्यवस्था में उपभोक्ता को क्या मिलेगा? इसकी आलोचना करें।
(लगभग 150 शब्दों में) 6

उत्तर :  समाजवादी व्यवस्था की आलोचना मुख्य रूप से दो कारणों से की जाती है। पहला यह कि समाजवादी व्यवस्था में उपभोक्ताओं द्वारा चयन इतना प्रतिबिम्बित नहीं होता जितना की पूँजीवादी व्यवस्था में। पूँजीवादी व्यवस्था में माँग उपभोक्ता के चयन को प्रतिबिम्बित करती है। लेकिन यह आरोप लगाया जाता है कि समाजवादी व्यवस्था में ‘उपभोक्ता को क्या मिलेगा’ का फैसला योजना प्राधिकरण करता है। दूसरा आरोप यह है कि चूँकि समाजवादी व्यवस्था लाभ की इच्छा से काम नहीं करती, इसलिए उत्पादन में कुशलता नहीं रहती। यह दावा किया जाता है की पूँजीवादी व्यवस्था में कीमतें उपभोक्ता की पसन्द को प्रदर्शित करती हैं और लाभ या हानि कुशलता या अकुशलता के द्योतक होते हैं।
यह आलोचना किसी सीमा तक ठीक है। पूँजीवादी व्यवस्था में बाजार-शक्तियाँ किसी सीमा तक ही उपभोक्ता की पसन्द का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। पहली समाजवादी व्यवस्था में परीक्षण-प्रणाली द्वारा पूर्ति और माँग में समन्वयता आ जाती है। न बिकी वस्तुओं और लम्बी कतारों से उपभाक्ताओं की पसंद का पता लग सकता है और यह तो मानने की बात है ही नहीं की योजनातन्त्रा इन संकेतों को नहीं पहचानेगा और असन्तुलन को ठीक नहीं करेगा। दूसरी, पूँजीवादी व्यवस्था में विज्ञापन पर खर्च का उपभोगता की पसन्द पर काफी प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, विज्ञापनों की दौड़ सामाजिक फिजूलखर्ची ही तो है। तीसरी, उपभोक्ताओं की माँग विद्यमान आय-वितरण को दिखाती है, न कि उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को।

यह सच है कि समाजवादी व्यवस्था में लाभ कमाना उत्पादन का मुख्य उद्देश्य नहीं होता लेकिन लागत पर होने वाली बचत के रूप में होने वाला लाभ नीति का मार्गदर्शन तो हो सकता है। समाजवादी व्यवस्था में लाभ नहीं बल्कि निजी लाभ अनुपस्थित रहता है। 
जिस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्था विभिन्न तरीकों में विकसित हुई है, उसी प्रकार समाजवादी व्यवस्था भी किसी एक तरीके से विकसित नहीं हुई है और कोई एक आदर्श ढाँचा हमारे सामने नहीं आया है।

 

प्रश्न 10 :  मिश्रित अर्थव्यवस्था की परिभाषा दें। यह किस प्रकार काम करती हैं? इसमें क्या, कैसे और किसके लिए जैसे मूल निर्णय कैसे लिये जाते हैं?

उत्तर :   मिश्रित अर्थव्यस्था की परिभाषा उस व्यवस्था के रूप में दी जा सकती है जिसमें राजकीय या सार्वजनिक क्षेत्रा तथा निजी क्षेत्रा साथ-साथ होते हैं। कुछ व्यवस्थाओं में कई कार्य-क्षेत्रा केवल सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए आरक्षित रखे जाते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में गोला-बारूद, अणु-उद्योग और तेल-उत्पादन राजकीय क्षेत्रा के लिए आरक्षित हैं। दूसरे देशो में कई क्षेत्रों में सरकारी और निजी उद्योग साथ-साथ चल सकते हैं। कुछ अन्य में ये दोनों क्षेत्रा अपने संयुक्त साधनों से मिलकर उद्योग चलाते हैं। इस प्रकार मिश्रित व्यवस्था के भिन्न-भिन्न स्वरूप हो सकते हैं। विशुद्ध पूँजीवादी व्यवस्था में कानून-व्यवस्था, न्याय तथा बाहरी आक्रमण से सुरक्षा आदि सरकार अपने हाथों में रखती है। उत्पादन तथा लाभ कमाने का काम निजी क्षेत्रा को सौंप दिया जाता है। समाज सेवा के कुछ कार्य भी राजकीय क्षेत्रा द्वारा किए जाते है। जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा नागरिक सेवाओं और सिचाई से सम्बन्धित कार्य अधिकतर देशों में सरकार ही करती है।
बहुत से विकसित पूँजीवादी देशों में लाभ कमानेवाल कुछ काम भी राजकीय क्षेत्रा के अन्तर्गत आते हैं। इटली, ग्रेट-ब्रिटेन तथा पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों में ऐसा ही हैं। लेकिन अधिक प्रवृत्ति लाभ कमानेवाल उद्योगों के विराष्ट्रीयकरण की है।
बहुत से कम-विकसित देशों में जिनमें पूर्व-पूँजीवादी क्षेत्रा काफी विस्तृत है, राजकीय क्षेत्रा के विस्तार से ही विकास किया गया है। सामाजिक एवं आर्थिक ढँाचे के क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, बिजली, परिवहन जैसी सार्वजनिक सेवाएँ) में ही नहीं बल्कि कुछ अन्य क्षेत्रों में भी विकास की दर राजकीय क्षेत्रा को विस्तृत करके तेज की गई है। इस प्रकार, भारत में सुरक्षा तथा गोला-बारूद उद्योग, लोहा तथा इस्पात उद्योग, भारी मशीनरी उद्योग, रेल तथा वायु परिवहन के सामान बनाने का उद्योग, बिजली उत्पादन के सामान का उद्योग, दवाओं के उद्योग और मशीन उद्योग के कुछ भाग राजकीय क्षेत्रा में ही हैं। लेकिन अधिकतर उद्योग, कृषि तथा माल वाहन का एक बड़ा भाग निजी क्षेत्रा में ही हैं।
इन देशों में राजकीय क्षेत्रा में उद्योगों के विकास का मुख्य औचित्य नीजी क्षेत्रा को उन्हें विकसित न करने की इच्छा या अयोग्यता ही उनकी अयोग्यता का मुख्य कारण इस उद्योग में लगनेवाली अतिविशाल पूँजी हो सकता है, जिसे लगाना निजी क्षेत्रा की क्षमता के बाहर है। पूँजी-बाजार भी अविकसित हो सकता है। उनकी अनिच्छा का कारण पूँजी पर कम लाभ या उत्पादन में लगनेवाली समय की लम्बी अवधि हो सकता है। भारत में इस्पात उद्योग को भी अपने हाथ में ले सकता है जिनको निजी क्षेत्रा में नुकसान हो रहा है और उनको बन्द होने देना आवश्यक है। भारत में कपड़ा उद्योग का कुछ भाग, वनस्पति तेल की कुछ इकाइयाँ तथा साइकिल उद्योग का कुछ भाग इसीलिए राज्य द्वारा चलाया जा रहा है। 
लेकिन निजी क्षेत्रा की क्षमता या इच्छा तो आनुपातिक है। यह क्षमता समय के साथ बढ़ सकती है। इस प्रकार, एक समय पर नाइट्रोजन खाद उद्योग निजी क्षेत्रा के बस के बाहर की बात थी। लकिन समय के साथ इसमें बढ़ोतरी हुई और खाद की इकाइयाँ अब निजी क्षेत्रा में भी लगने लगी हैं। 
लाभ कमानेवाले उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्रा की सीमा देश के विकास की स्थिति, निजी क्षेत्रा की शक्ति तथा सरकार की नीति पर निर्भर करती है। प्रश्न यह है कि क्या राजकीय क्षेत्रा फैल रहा है या संकुचित हो रहा है। पूँजीवादी व्यवस्था में यह सिकुड़ेगा जबकि समाजवादी व्यवस्था में यह फैलेगा। इस प्रकार लाभ कमानेवाले उद्योगों में मिश्रित व्यवस्था अर्थव्यवस्था का एक अस्थायी रूप है। मिश्रित व्यवस्था में क्या, कैसे और किसके लिए जैसे मूल निर्णय किस प्रकार लिए जाते हैं? इसका उत्तर हैः बाजार-तन्त्रा तथा योजना के सम्मिश्रण द्वारा। पूँजीवाद की ओर अधिक झुकी व्यवस्था में बाजार-तन्त्रा(या कीमत) ही मुख्य समस्याएँ सुलझाता है। व्यवस्था के कुछ भाग में ही आंशिक योजना और कीमतों पर रोक स्वतंत्रा बाजार की शक्तिायों पर अंकुश लगाते है।

 

प्रश्न 11 : बाजार में किसी वस्तु की कीमत का निर्धारण कैसें होता है।

उत्तर : बाजार में किसी वस्तुकी कीमत का निर्धारण माँग और पूर्ति की शक्तियों की पारस्परिक क्रिया द्वारा होता है। वस्तु से आशय ऐसी वस्तु से है जो बाजार में बिक्री के लिए उत्पादित की जाए। बाजार का अर्थ है वह सारा क्षेत्रा जिसमें वस्तु की खरीद और बिक्री के लिए खरीददार और बेचनेवाले एक दूसरे से सम्पर्क में रहते हैं। एक वस्तु की माँग को उस मात्रा के रूप में एक विशेष कीमत पर बाजार में खरीदने को तैयार है। आय में वृद्धि का सम्बन्ध प्रायः वस्तुओं की माँग में वृद्धि से तथा आय में कमी का सम्बन्ध उनकी माँग में कमी से जोड़ा जाता है।
 

प्रश्न 12 : परिवार की माँग अनुसूची और माँग वक्र को समझाऐं। 

उत्तर : इस सम्बन्ध को परिवार की सन्तरों की माँग की एक काल्पनिक अनुसूची बनाकर दिखाया जा सकता है। पहले काॅलम में प्रति सन्तरा वैकल्पिक कीमतें दी गई हैं और दूसरे काॅलम में प्रत्येक कीमत पर सन्तरों की प्रति सप्ताह को दिखाया गया है। 

एक परिवार की सन्तरों की माँग की काल्पनिक अनुसूची
कीमत प्रति सन्तरा की मात्रा (पैसे) प्रति सप्ताह सन्तरों की माँग
1 2

70

60

50

40

30

20

15

30

45

60

75

90


इस अनुसूची को ग्राफ पर उतारने से परिवार के सन्तरों का माँग वक्र प्राप्त होता है। Y एक्सिज पर स्वतंत्रा चर यानि कीमत प्रति सन्तरा को दिखाया गया है, और X एक्सिज पर आश्रित चर यानि प्रत्येक कीमत पर सन्तरों की माँगी गई मात्रा को दिखाया गया है। 
प्रत्येक बिन्दु A, B, C, D, E, F, G,  कीमत के एक जोड़े का प्रतिक हैः एक सन्तरे की कीमत और उस कीमत पर परिवार की सन्तरों की माँग। इन बिन्दुओं को मिलाकर हमें माँग वक्र AG प्राप्त होता है जो दिए गए समय में परिवार की सन्तरों की माँग को दिखाता है। 
माँग वक्र दिए गए समय में किसी एक समय बिन्दु पर एक वस्तु की कीमत और उसकी माँग की मात्रा के सम्बन्धों को दिखाता है। माँग वक्र बाईं से दाईं ओर ढाल लिए होता है। बाईं से दाईं तरफ ढालवाले माँग वक्र को आॅऋणात्मक ढालवाला माँग वक्र भी कहते हैं।

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 2 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

जब किसी वस्तु की कीमत कम होती है तो उस वस्तु की उसी मात्रा की खरीद पर कम खर्च करना पड़ता है। इसका प्रभाव बढ़े हुए पैसे की खरीदनें की शक्ति में बढ़ोतरी के रूप में पड़ता है। यह वस्तु की कीमत में कमी का आय प्रभाव है। वास्तविक आय में वृद्धि के साथ परिवार  वस्तु की अधिक मात्रा खरीदता है। प्रतिस्थापना प्रभाव का अर्थ है कि जब किसी वस्तु की कीमत कम होती है वह अन्य वस्तुओं के मुकाबले में सस्ती हो जाती है। इसके कारण जिन वस्तुओं की कीमतें नहीं गिरी हैं उनका स्थान सस्ती वस्तुएँ ले लेती हैं। इस कारण सस्ती वस्तुओं की माँग बढ़ जाती है। वस्तु की कीमत बढ़ जाने पर प्रभाव विलोम दिशा में काम करते हैं। दोनों मिलकर माँग के सिद्धान्त के रूप में परिवार के व्यवहार की व्याख्या करते है।

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