सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 2 (प्रश्न 13 से 24 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 2 (प्रश्न 13 से 24 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 13 : परिवार की रुचि और अधिमान भी उस वस्तु की माँग को प्रभावित करते हैं। व्याख्या करें। किसी वस्तु की माँग और अन्य वस्तुओं की कीमतों के बीच सम्बन्ध को दर्शायें।

उत्तर :  परिवार की रुचि और अधिमान भी उस वस्तु की माँग को प्रभावित करते हैं। रुचि या अध्मिान को प्रायः प्रदत्त माना जाता है लेकिन यदि वे फैशन के कारण या विज्ञापनों के कारण या पड़ोसियों की नकल करने के कारण बदलते हैं तो वस्तुओं की माँग भी बदल सकती है। उदाहरण के लिए, विज्ञापन किसी परिवार को अपने टूथपेस्ट के विशेष ब्राँड की पसन्द को बदलने के लिए पे्ररित कर सकता है। इसी प्रकार, यदि पड़ोस में सभी के पास दूसरा रेप्रिजरेटर है और इसे फैशन समझा जाता है तो किसी परिवार की रेप्रिजरेटर की माँग बढ़ सकती है। परिवार की रुचि वस्तु से हट जाने पर उसकी माँग कम भी हो सकती है।
किसी वस्तु की माँग और अन्य वस्तुओं की कीमतों के बीच सम्बन्ध् निम्न प्रकार के हो सकते हंै।
(क) अन्य वस्तु की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को कम करती है। 
(ख) अन्य वस्तु की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को बढ़ाती है।
(ग) अन्य वस्तु की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को प्रभावित नहीं करती है।
पहला केस प्रतिस्थापित वस्तुओं का होगा। यदि चाय और काॅफी प्रतिस्थापित वस्तुएँ हैं, परिवार की चाय की माँग, अन्य चीजों के  अलावा, चाय की कीमत पर निर्भर करती है। काॅफी की कीमत में कमी चाय की माँग को काॅफी की ओर मोड़ देगी और काॅफी की कीमत में वृद्धि माँग को काॅफी से हटाकर चाय की ओर मोड़ देगी और चाय की माँग बढ़ जाएगी। 
दूसरा केस पूरक वस्तुओं का है। यदि डबलरोटी और मक्खन एक साथ जाते हैं तो मक्खन की कीमत में कमी के कारण उसकी माँग और साथ ही साथ डबलरोटी की माँग भी बढ़ जाएगी। 
तीसरा केस असम्बन्धित वस्तुओं का होगा। कारों की कीमत में कमी से बाल-पैनों की माँग अप्रभावित रहेगी।

 

प्रश्न 14 : माँग की लोच का संप्रत्यय को समझाऐं।
 
उत्तर :  
नीचे दिए गए चित्र में माँग वक्र A और B को देखना होगा।

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वक्र A बाजार A  में एक वस्तु की माँग को दिखाता है। वक्र B उसी वस्तु की बाजार B में माँग को दिखाता है। P कीमत पर बाजार A में माँग व्ड है, जबकि बाजार B में यह ON है। जब कीमत P से P1 तक गिर जाती है, बाजार A में माँग OM से OM1  तक बढ़ जाती है, यानि NN1 की मात्रा से बढ़ जाती है। बाजार B के केस में, कीमत में उतनी ही कमी से माँग की बढ़ोतरी NN1 है। बाजार B में माँग का फैलाव बाजार A से अधिक है। हम इस स्थिति को यह कह कर बयान कर सकते हैं कि बाजार B में वस्तु की माँग की लोच बाजार A की तुलना में अधिक है।
इस प्रकार माँग की लोच कीमत में परिवर्तन होन पर माँग की प्र्रतिक्रिया की मात्रा है।
माँग की लोच को नापने के फार्मूले को इस प्रकार लिखा जा सकता हैः:

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यदि P कीमत और फ माँगी गई मात्रा है और Δp  और Δq  क्रमशः कीमत और माँगी गई मात्रा में परिवर्तन हैं तो ऊपर दिए गए फार्मूले को इस प्रकार लिखा जा सकता हैः 
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प्रश्न 15 : निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

(a) उत्तरी भारत के पारिस्थितिक सन्तुलन को जंगलों की कटाई किस प्रकार नष्ट कर रही है?
(b) शुष्क कृषि क्या है? भारत में खाद्य आपूर्ति के विस्तार में उसके महत्व की विवेचना कीजिए।
(c) भारत के वृहत् नगरों का नाम बतलाइये और उनकी विशिष्ट समस्याओं का विवरण दीजिये।
(d) भारत के लिए हिन्द महासागर का क्या महत्व है?  

उत्तर :(a) हिमालय स्थित जंगलों की कटाई ने उत्तरी भारत के पारिस्थितिकीय संतुलन को काफी हद तक प्रभावित किया है। इसने उत्तरी भारत के वातावरणीय कारकों, मिट्टी, नदियों तथा खेतों एवं वनस्पतियों पर बुरा प्रभाव डाला है। जंगलों की कटाई से सबसे बड़ा खतरा तो यह उत्पन्न हो गया है कि बड़े-बड़े चट्टान टूट-टूट कर नदी की तलहटी में जमा हो रहे हैं, जिससे भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हुई है। साथ ही, इससे नदियों में बाढ़ आने की आंशका भी बढ़ गयी है। मालपा में हुआ भूस्खलन जंगलों की इसी कटाई का एक भयंकर  नतीजा माना जा रहा है, जहां पर चट्टानों के खिसकने तथा नदियों में आयी बाढ़ के कारण जान-माल की काफी क्षति हुई थी। जंगलों की कटाई ने जमीन को अनुर्वर तथा बंजर बना दिया है। मिट्टी द्वारा नमी को बनाये रखने की शक्ति में लगातार कमी आती जा रही है। कई तरह के जीव-जंतुओं की नस्लों का सफाया होने की आशंका उत्पन्न हो गयी है। कुल मिलाकर, इसने उत्तरी भारत के पारिस्थितिकीय संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिससे जनजीवन पर भविष्य में खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।

उत्तर : (b) ऐसे क्षेत्रों में जहां 40 से 120 सेंटीमीटर के बीच वर्षा होती है तथा जल संरक्षण की गंभीर समस्या बनी रहती है, उस क्षेत्रा में उन्नत कृषि क्रियाओं द्वारा  जल-संरक्षण करते हुए फसल उत्पादन करना शुष्क कृषि कहलाता है। भारत में संपूर्ण असिंचित क्षेत्रा का लगभग 36 प्रतिशत भाग शुष्क क्षेत्रा है। इस कृषि पद्धति द्वारा असिंचित क्षेत्रों में कृषि उत्पादन बढ़ सकता है तथा किसानों तथा मजदूरों की आय में वृद्धि हो सकती है। कृषि उत्पादों में वृद्धि के साथ-साथ क्षेत्रों में पशुपालन के स्तर में भी सुधार आ सकता है।
शुष्क क्षेत्रा में पैदावार बढ़ाने के उद्देश्य से सर्वप्रथम 1923 में ‘पूना’ में (मंजरी क्षेत्रा) कृषि अनुसंधान कार्य की शुरुआत की गयी। 1970 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) द्वारा शुष्क क्षेत्रा में कृषि की समन्वित परियोजना प्रारंभ की गयी। इस परियोजना के अंतर्गत भारत के 24 केंद्रों में शुष्क कृषि अनुसंधान कार्य चल रहा है, जिसके तहत भारत में पैदावार बढ़ाने के उपायों की व्च्याख्या की जाती है।

उत्तर : (c) भारत के छः शहरों-दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कलकत्ता, हैदराबाद तथा बंगलौर को वृहत् नगर के अंतर्गत रखा  जाता है, जिनकी जनसंख्या 50 लाख से अधिक है। अधिकाधिक जनसंख्या के बसने के चलते इन शहरों में कई तरह की नगरीय समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं। क्षेत्राफल कम होने तथा जनसंख्या अधिक होने से इन नगरों का जनसंख्या घनत्व काफी अधिक होता है। इससे कई तरह की स्वास्थ्यपरक समस्याओं का जन्म होता है। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए जन-सुविधाओं के विकास तथा कचरा एवं अन्य उत्सज्र्य पदार्थों के निष्पादन में काफी मुश्किलें आती हैं। कुप्रबंध के चलते इन क्षेत्रों में बीमारियों के प्रसार की प्रबल संभावना बनी रहती है। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए रोजगार का प्रबंधन भी एक वृहद् समस्या है। जिन लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता है, वे आपराधिक कार्यों में लिप्त हो जाते हैं, जिससे इन क्षेत्रों में रोज हत्या, बलात्कार, लूटमार आदि की घटनाएं होती हैं। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ने से गा्रमीण कृषि भी कुप्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

उत्तर : (d) भारत की भूमि को बंगाल से कच्छ तक छूने वाला हिन्द महासागर पूर्वी अफ्रीका, पश्चिम एशिया तथा दक्षिण व दक्षिण पूर्वी एशिया को एक साथ जोड़ता है। स्वेज नहर के खुल जाने से भूमध्य सागर को हिन्द महासागर से जोड़ दिया गया है और इस प्रकार दक्षिणी यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका भी हिन्द महासागर के प्रभाव क्षेत्रा में आ गये हैं। भारत का दक्कन प्रायद्वीप हिन्द महासागर में इस तरह प्रक्षेपित है कि इस देश के लिए अपने पश्चिमी तट से पश्चिम एशिया अफ्रीका व यूरोप तथा पूर्वी तट से दक्षिण-पूर्वी एशिया सुदूर-पूर्व व आस्टेªलिया को देखना संभव है। अपनी इस भौगोलिक स्थिति के कारण भारत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग के संगम पर स्थित है, जिसका इसे व्यापारिक लाभ मिलता है।
भारत की तटीय सीमा 6,100 कि.मी. लंबी है तथा हिन्दू महासागर में 200 मील तक इसका ‘एक्सक्लूसिव इकोनाॅमिक जोन’ है। इस तरह हमारे समुद्री संसाधनों में मत्स्य, खनिज व ऊर्जा संसाधनों का लगातार दोहन संभव हो रहा हैं हिन्द महासागर के केंद्र में स्थित होने के कारण भारत को इस क्षेत्रा में भू-राजनीतिक लाभ भी मिलता है। हिन्द महासागर तटवर्ती संघ (बिमस्टेक) के बन जाने से अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण भारत को व्यापारिक व भू-राजनीतिक लाभ मिलना तय है।

 

प्रश्न 16 : भारत में पुनर्नण्य ऊर्जा की विकास-संभावनाओं का क्षेत्राीय परिप्रेक्ष्य में विवेचन कीजिए?
 
उत्तर :
भारत में ऊर्जा संकट की समस्या गंभीर बनी हुई है। जहां एक ओर मांग, पूर्ति से बहुत ज्यादा है, वहीं अपुनर्नण्य स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। एक नये विकल्प के रूप में पुनर्नण्य ऊर्जा, हमारी समस्या का स्थायी समाधान कर सकती है। इन स्रोतों की  संभावित क्षमता लगभग 2,00,000 मेगावाट के बराबर है, जिसमें 31 प्रश्तिात समुद्री जल से, 25 प्रतिशत बायोफ्यूल से, 12 प्रतिशत वायु से तथा 2 प्रतिशत ऊर्जा अन्य स्रोतों से प्राप्त की जा सकती है। पुनर्नण्य ऊर्जा के कुछ प्रमुख क्षेत्रों का विवरण निम्नवत है:

1. सौर ऊर्जा : सौर ऊर्जा के क्षेत्रा में राजस्थान सबसे धनी क्षेत्रा है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में  भी सौर ऊर्जा को तापीय ऊर्जा में परिवर्ति त करने के अनेक संयंत्रा लगाये गये हैं। राजस्थान के विषय में कहा जाता है कि यहां के मरुस्थलीय भाग में इस ऊर्जा को विकसित कर सारे भारत की आवश्यकता पूरी की जा सकती है। राज्य सरकार ने जोधपुर में सौर ऊर्जा रेफ्रिजरेटर, बाड़मेर, नागौर एवं चुरु में सोलर पम्प, दूदू (जयपुर) में पावर पैक, मथानिया (जोधपुर) में सौर तापीय विद्युत परियोजना स्थापित की है।

2. पवन ऊर्जा : पवन ऊर्जा के मामले में तमिलनाडु अग्रणी राज्य है। सम्प्रति देश में 350 मेगावाट के उत्पादन में इस राज्य का हिस्सा 282 मेगावाट थी। इसके अलावा राजस्थान, गुजरात तथा तटीय क्षेत्रों में भी इस ऊर्जा के विकास की प्रबल संभावनाएं हैं। पवन चक्की संयंत्रा द्वारा हम कूपों से जल निकालने, आटा चक्की चलाने, फसलों की कटाई करने आदि जैसे कार्य कर सकते हैं।

3. बायोगैस : अरुणाचल प्रदेश, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम इस ऊर्जा स्रोत के मामले में धनी हैं। 1998.99 में ढाई लाख संयंत्रों को स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह स्रोत ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है।

4. भूतापीय ऊर्जा : इस ऊर्जा के दोहन के प्रमुख क्षेत्रा हिमालय, नागा, लुशाई पर्वतीय क्षेत्रा, पश्चिमी तटीय प्रदेश, पूर्वी भारत आ£कयन तापीय प्रदेश, अण्डमान एवं निकोबार द्वीप आदि हैं। हिमाचल प्रदेश के मनिकरण तथा लद्दाख की पूगा घाटी में भू-तापीय संयंत्रा स्थापित किये गये हैं।

5. समुद्री ऊर्जा : समुद्री लहरों से ऊर्जा प्राप्त करने की संभावना भारत के तटीय क्षेत्रों में  है। कच्छ की खाड़ी, अंडमान एवं निकोबार, खंभात की खाड़ी आदि में समुद्री ऊर्जा संयंत्रा लगाने की योजना है। विंजगम (केरल) में पहला संयंत्रा स्थापित किया गया है। ज्वार भाटे, समुद्री लहरों एवं समुद्री ताप से विद्युत उत्पादन करने हेतु शोध कार्य जारी हैं।
इस प्रकार भारत में पुनर्नण्य ऊर्जा के विकास की प्रबल संभावनाएं मौजूद हैं, परन्तु तकनीकी अक्षमता एवं पूंजी के अभाव में इनका समुचित दोहन नहीं हो पा रहा है।

 

प्रश्न 17 : निम्न पर आलोचनात्मक टिप्पणियां लिखिये :

(i) नर्मदा बांध परियोजना
(ii) भारत के भूकम्प प्रवण क्षेत्रा 

उत्तर :(i) नर्मदा बांध परियोजना गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र की संयुक्त परियोजना है। इस परियेाजना के अन्तर्गत 3000 छोटे-बड़े बांध नर्मदा नदी पर बनाये जाएंगे। इन बांधों में नर्मदा (इन्दिरा) सागर बांध (पुनासा, म.प्र.) तथा सरदार सरोवर (गुजरात) प्रमुख हैं। इस परियोजना की संभावित लागत 20,000 करोड़ रु. आंकी गयी है। इस परियोजना से गुजरात की 18 लाख हेक्टेयर, राजस्थान की 76 हजार हेक्टेयर तथा महाराष्ट्र की 37,500 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। इस परियोजना से 1450 मेगावाट विद्युत उत्पादन संभव हो पायेगा। इसमें गुजरात का हिस्सा 16%, मध्य प्रदेश का 57%, तथा महाराष्ट्रका 27% है। इस परियोजना द्वारा 132 नगरीय केन्द्रों तथा 7,234 गांवों को जलापूर्ति की जायेगी। इस परियोजना से मध्य प्रदेश में 33,000, गुजरात में 4600 तथा महाराष्ट्र में 31,000 लोग विस्थापित किये गये हैं। इनमें से क्रमशः मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र ने 3700, 4502 तथा 2100 विस्थापितों के पुर्नवास का प्रबंध कर लिया है। सम्प्रति विस्थापितों के पुनर्वास के लिए मेधा पाटेकर एवं अरुंधति राय द्वारा आंदोलन चलाया जा रहा है। लोगों को यह भी आशंका है कि भूकम्पीय क्षेत्रा में स्थित होने के कारण यह परियोजना खतरनाक सिद्ध हो सकती है। फिलहाल उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार नर्मदा बांध की ऊंचाई 85 मीटर तय की गयी है और निर्माण कार्य फिर से शुरू हो गया है।

(ii) भूकम्पनीयता की दृष्टि से भारत विश्व में दसवें स्थान पर आता है। भारत में भूकम्प का सबसे अधिक प्रभाव हिमालय के निकटवर्ती क्षेत्रों में पड़ता है। प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के अनुसार हिमालय की उत्पत्ति भारतीय एवं यूरेशियन प्लेट के टकराने के फलस्वरूप हुई। इस क्षेत्रा में एक भ्रंश का निर्माण हुआ, जिसे ‘महान सीमांत भ्रंश’ कहा जाता है। यह भ्रंश कश्मीर से लेकर असम तक फैला हुआ है। प्लेटों के खिसकने से इस क्षेत्रा में भूकम्पीय घटनायें आम हो गयी हैं। मार्च’99 में चमोली (उ.प्र.) का भूकम्प इसी प्रक्रिया का प्रतिफल था। इसके अलावा कच्छ एवं अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह भी भूकम्प प्रवण क्षेत्रा हैं। आमतौर पर प्रायद्वीपीय भारत को (ओसमानाबाद, महाराष्ट्र) में आये भूकम्प ने इस धारणा को गलत सिद्ध कर दिया। इस क्षेत्रा में भी एक भ्रंश के खिसकने से लातूर में भूकम्प आया था। इस प्रकार नर्मदा घाटी क्षेत्रा को भी भूकम्पीय क्षेत्रा में शामिल कर लिया गया है और हिमालय के निकटवर्ती क्षेत्रा, कच्छ एवं अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के साथ यहां भी भूकम्पों के आने की संभावना प्रबल है।
 

प्रश्न 18 : मानव पोषण में खनिज लवणों का महत्व दर्शाइये ।
 
उत्तर :
हमारे शरीर में उपापचयिक क्रियाओं के लिए अनेक खनिज लवण आवश्यक हैं। इनमें सोडियम, क्लोरीन, कैल्शियम, सल्फर, लौह, आयोडीन, क्लोरीन, जस्ता आदि महत्वपूर्ण हैं। खनिज कुपोषण के कारण हमारे शरीर में अनेक बीमारियां फैलती हैं। इन लवणों के महत्व निम्नलिखित हैं:
1. कैल्शियम : हमारे हड्डियों के विकास के लिए यह लवण अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्भावधि एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कैल्शियम की अधिक आवश्यकता होती है। इसकी कमी से उपापचायिक क्रिया प्रभावित होती है।
2. आयोडीन : थायराॅयड ग्रंथ एवं इससे प्रभावित हारमोन की क्रियाविधि के लिए आयोडीन अत्यावश्यक है। इसकी कमी से घेंघा नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह लवण हमारे मस्तिष्क के विकास के लिए भी आवश्यक है। इस लवण के अभाव में ‘जड़ वामनता’ नामक रोग भी हो जाता है।
3. फ्लोरीन : इसकी कमी से दांत टूटने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अतः यह लवण महत्वपूर्ण है।
4. लौह : अस्थि मज्जा में रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए लौह की उपलब्धता अत्यावश्यक है। इस लवण की कमी से ‘एनीमिया’ नामक रोग हो जाता है।
5. तांबा : यह लवण भी रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक है।
6. लौह, पोटैशियम, सल्फर, सोडियम आदि प्लाज्मा में उपस्थित होते हैं, जिनके कारण रक्त मंद क्षारीय होता है।
7. कार्बन डाईआक्साइड के संचरण में सोडियम एवं पोटैशियम की महत्वपर्ण भूमिका होती है।
इस प्रकार इन खनिज लवणों की उपस्थिति हमारे शरीर के विकास एवं रोग निवारण के लिए अत्यावश्यक होती है।


प्रश्न 19 : निम्नलिखित के उत्तर दीजिए।

(क) प्रजातंत्रा पर रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों का परीक्षण कीजिए
(ख) बंगाल में स्वदेशी आंदोलन ने किस प्रकार राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया।
(ग) भारत की स्वतंत्राता पूर्व के दशक में देशी रियासतों के प्रजामंडल आंदोलनों का क्या महत्व था?
(घ) विभाजन पूर्व के वर्षों में भारत के सार्वजनिक जीवन में सी. राजगोपालाचारी की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर (क) : रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रजातांत्रिक भावनाओं की अभिव्यक्ति उने मानववाद में देखने को मिलती है। इस मानववाद का सार तत्व था “यदि हमारी राजनीतिक प्रगति को वास्तविक होना है, तो हमारे समाज में कुचले हुए लोगों को मनुष्य बनने में मदद मिलनी चाहिए।” इसके लिए टैगोर द्वारा स्वतंत्राता पर जोर दिया गया। उनकी स्वतंत्राता की अवधारणा में राष्ट्र तथा व्यक्ति की राजनीतिक स्वतंत्राता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्राता के महत्व को भी रेखांकित किया गया। टैगोर ने स्वतंत्राता तथा आर्थिक प्रगति के उद्देश्यों को साधन के रूप में स्वीकार किया लक्ष्य था मानव की आध्यात्मिक मुक्ति।

(ख) बंगाल में 1905 में चला विदेशी आंदोलन केवल आंदोलन था, जो इस दृष्टि से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहा कि 1911 में बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया गया। इस आंदोलन ने जहां भारतीय जनमानस में आंदोलन के महत्व को फैलाया, वहीं इस आंदोलन ने सम्पूर्ण भारत को राष्ट्रीयता के एक सूत्रा में बांधने में, जनआंदोलन के महत्व को समझाने में और उद्योगों, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य और फैशन में स्वदेशी की भावना ने कांग्रेस पर नरम दल के प्रभाव को कम करने में और राष्ट्रीय आंदोलन में उग्र विचारधारा का वर्चस्व स्थापित करने में तथा आगे बढ़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 

(ग) भारत की स्वतंत्राता के पूर्व के दशक में अर्थात् 1937.47 के काल में प्रजामण्डल आंदोलनों का महत्व बहुत अधिक है। इस दौर में इन आंदोलनांे का कांग्रेस के साथ घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित हुआ। इस सम्पर्क के फलस्वरूप यह आंदोलन राजाओं की निरंकुशता तथा सामंती उत्पीड़न  के विरुद्ध जनांक्रोश की अभिव्यक्ति मात्रा नहीं रहे। वह राष्ट्रीय राजनीति की धारा से जुड़ गए। इन आंदोलनों ने देशी राज्यों में जनवादी शक्तियों को बल प्रदान किया तथा देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के कार्य में सहायता दी। प्रजामंडल आंदोलन के दबाव ने पूर्वी भारत के राजाओं के संघ को समाप्त किया, जूनागढ़ तथा त्रावणकोर जैसी रियासतों की स्वतंत्रा बनने की इच्छा पर तुषारापात किया।

(घ) विभाजन पूर्व के वर्षों में भारत के सार्वजनिक जीवन में सी. राजगोपालाचारी की भूमिका मद्रास के मुख्यमंत्राी ;1937.39द्ध और 1947 में केंद्र सरकार के मंत्राी के रूप में काफी महत्वपूर्ण थी। इन्होंने 1945 में दिए गए एक फार्मूले द्वारा हिन्दू-मुस्लिम विवाद एवं भारत के विभाजन की समस्या को हल करने का प्रयास किया था। इनका सुझाव था कि भारत एवं पाकिस्तान के रूप में विभाजन के बाद भी दोनों की प्रतिरक्षा और जनसंचार प्रणाली एक ही हो। इनके इस फार्मूले को गांधी जी का समर्थन प्राप्त था। सी. राजगोपालाचारी ने दक्षिण में हिन्दी लागू करने का विरोध कर हिन्दी-दक्षिण भारतीय भाषाओं के विवाद को एक राजनीतिक रूप देने में भी प्रारम्भिक भूमिका निभायी थी। इन्होंने दशमलव प्रणाली पर आधारित सिक्कों के चलन का भी विरोध किया था।
 

प्रश्न 20 : (क) निम्नलिखित में किसी 10 के विषय में आप क्या जानते हैं?

(1) नील दर्पण (2) शारदा सदन (3) साबरमती आश्रम (4) हंटर आयोग (5) बंदी-जीवन
(ख) निम्नलिखित किसलिए प्रसिद्ध हुए?
(6) खान अब्दुल गफ्फार खां (7) सेठ जमनालाल बजाज 
(8) एस. सत्यमूर्ति (9) उधमसिंह (11) सरोजिनी नायडू
(ग) निम्नलिखित की प्रमुख विशेषताएं बताइए।
(11) कुल्लू शैली (12) गोपुरम् (13)वहाबी आंदोलन (14) भारत धर्म महामंडल (15) साम्प्रदायिक घोषणा।

उत्तर (क) (1) ‘नील दर्पण’ दीनबन्धु मित्रा द्वारा लिखित एक नाटक है। इस नाटक की पृष्ठभूमि नील विद्रोह ;1860 ई.द्ध पर आधारित हे। इस नाटक द्वारा मित्रा ने ब्रिटिश शासन व शोषण की स्थिति को उजागर किया।
(2) शारदा सदन 1889 ई. में रमाबाई द्वारा महाराष्ट्र में स्थापित एक सामाजिक संस्था थी, जो बाल-विवाह के विरोध एवं विधवा पुनर्विवाह द्वारा नारी विकास के लिए कार्य करती थीं। 1930 में इसी सदन के नाम पर सरकार ने शारदा अधिनियम द्वारा विवाह के लिए कन्या की न्यूनतम आयु 14 और युवकों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निश्चित की।
(3) दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधी जी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया था जो बाद में साबरमती नदी के किनारे स्थानान्तरित कर दिया गया व आश्रम, इसी नाम से विख्यात हुआ। यह आश्रम 150 एकड़ भूमि में है।
(4) हंटर आयोग की स्थापना भारतीय अंग्रेजी सरकार ने 1882 में डब्ल्यू.डब्ल्यू.हंटर की अध्यक्षता में शिक्षा के क्षेत्रा में 1854 के पश्चात् हुई प्रगति की समीक्षा करने के लिए की थी।
(5) ‘बंदी-जीवन’ अमर शहीद एवं क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा लिखित एक पुस्तक का नाम है। इस पुस्तक में उन्होंने अपने काले पानी की सजा के दिनों का उल्लेख किया है।

(ख) (6) बादशाह खान तथा सीमान्त गांधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खां ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत में राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया तथा खुदाई खिदमतगार संगठन बना लाल कुर्ती आंदोलन चलाया। 1947 में पाकिस्तान जा बसे गफ्फार खां को मृत्यु से पहले भारत रत्न दिया गया था।
(7) सेठ जमनालाल बजाज का जन्म 1889 ई. में जयपुर में हुआ था। वे 1915 ई. में गांधी जी के सम्पर्क में आये और जीवन भर गांधीवादी बने रहे। 1920 से लेकर मृत्यु तक (1942) वे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे। 1921 में उन्होंने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।
(8) सुप्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता, जिन्हें “दक्षिण भारत की मशाल” के नाम से लोकप्रियता मिली। इन्होंने सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन (इस आंदोलन में जेल गये और वहीं उनकी मृत्यु हो गई) में सक्रिय रूप से भाग लिया।
(9) उधमसिंह पंजाब के क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने जलियांवाला बाग के नरसंहार का बदला लेने के लिए ओ. डायर की लंदन में मार्च, 1940 में हत्या कर दी थी, जिसके लिए इन्हें गिरफ्तार करके मृत्युदंड दे दिया गया।
(10)  सरोजिनी नायडू प्रख्यात कवयित्राी, राष्ट्रवादी नेता एवं गांधी की विश्वासपात्रा थी। 1925 में कानपुर में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 40वें वार्षिक अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। वे 1947-48 में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल भी रहीं।

(ग) (11) कुल्लू शैली पहाड़ी चित्राकला की एक शैली है,जिसका मुख्य विषय प्रेम हे जो लय, शोभा तथा सौंदर्य के साथ दर्शाया गया है। ‘नायिका भेद’ एवं व्यक्ति चित्रा सजीव से, रंगों का संयोजन कुशलता से, रेखा सौंदर्य का विशेष ध्यान इस शैली की विशेषता है।
(12) गोपुरम् का अर्थ है : प्रवेश द्वार, जो दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली के मंदिरों के आगे होता था। यह काफी कलात्मक ढंग एवं भव्यता के साथ बनाया जाता था और कभी-कभी मुख्य मंदिर से भी ऊंचा होता था। चोल राजाओं द्वारा बनवाये गये गोपुरम् भव्य हैं।
(13) वहाबी आंदोलन अठारहवीं शताब्दी के प्रथम भाग में अरब निवासी अब्दुल वहाब के नेतृत्व में हुआ। इस आंदोलन का प्रचार-प्रसार रायबरेली के सैयद अहमद ने किया। यह आंदोलन भारत में पुनः मुस्लिम राज्य स्थापित करना चाहता था।
(14) पं. दीनदयाल शर्मा द्वारा सन् 1890 में पंजाब में स्थापित भारत धर्म महामण्डल रूढ़िवादी शिक्षित हिन्दुओं का अखि भारतीय संगठन था, जो आर्य समाज, ब्रह्मविद्यावादियों (थियोसाॅफियों) तथा रामकृष्ण मिशन की शिक्षाओं से रूढ़िवादी वर्ग हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उठ खड़ा हुआ था।
(15) साम्प्रदायिक घोषणा 17 अगस्त, 1932  को ब्रिटिश, प्रधानमंत्राी रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा किया गया था। इस घोषणा में मुसलमानों तथा ईसाइयों के अतिरिक्त हरिजनों के साम्प्रदायिक प्रतिनिधियों का भी समर्थन किया गया था। बाद में विरोध होने पर इसे 20 सितम्बर, 1932 को वापस ले लिया गया था।

 

प्रश्न 21 : परमोच्च शक्तिमता की राज्य अपहरण नीति के दुष्परिणामों को अपवारित कर भारत की रियासतों के समाकलन करने में सरदार बल्लभभाई पटेल किस प्रकार सफल हुए?

उत्तर : ब्रिटिश सरकार ने जब भारत को स्वतंत्रा करने का निर्णय लिया तो यह भी तय किया कि भारत की स्वतंत्राता के साथ ही देशी राज्यों पर ब्रिटिश सरकार की परमोच्च शक्ति का भी अन्त हो  जाएगा। इसका तात्पर्य था कि देशी राज्यों की स्थिति ऐसे स्वतंत्रा राज्यों की हो जाएगी जो यह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होंगे कि वह भारत या पाकिस्तान में मिलें अथवा स्वतंत्र रहें। इस तरह यह नीति भारतीय उपमहाद्वीप में विघटन की शक्तियों को प्रोत्साहन देने की नीति हो जाती थी।
सरदार पटेल और उनके सहयोगी वी.पी.एस. मेनन को इसका श्रेय जाता है कि विघटन के इस दुष्परिणाम से देश की रक्षा करते हुए उन्होंने देशी राज्यों का भारत में विलय करने में सफलता प्राप्त की। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु जिस कार्य नीति का पालन किया गया उसके दो अंग थे: (i) देशी राज्यों के शासकों को प्रलोभन देकर भारत में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करना, (ii) इन राज्यों के जनआंदोलनों का प्रयोग राजाओं पर दबाव डालने के लिए करना। जब कहीं पर दबाव और प्रलोभन की यह कार्यनीति पूर्णरूप से सफल नहीं हुई तो वहां पर बल प्रयोग का रास्ता अपनाया गया।
15 अगस्त, 1947 तक कश्मीर, हैदराबाद व जूनागढ़ को छोड़कर अन्य रियासतों को दबाव व प्रलोभन के माध्यम से भारत में मिला लिया गया। वहाबलपुर अपादस्वरूप पाकिस्तान में चला गया। जूनागढ़ में पुलिस कार्यवाही की तथा हैदराबाद में सैनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। कश्मीर को प्रच्छन्न पाक आक्रमण ने भारत से मिलने के लिए तैयार किया। इस प्रकार सरदार पटेल ने भारत की रियासतों का समाकलन करने में सहायता प्राप्त की।

 

प्रश्न 22 : वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में भारतीय राजनीति में उग्रवाद के कारण और उसके स्वरूप का परीक्षण कीजिए।

उत्तर :
वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में उग्रवाद के उदय का एक प्रमुख कारण उदारवादियों की ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की नीति की असफलता थी। प्रार्थना व ज्ञापन के माध्यम से कुछ हासिल करने में असफल रहने का स्वाभाविक परिणाम उग्रवाद की तरफ झुकना था। कर्जन का भारतीयों के प्रति विद्वेषपूर्ण रुख तथा उनके द्वारा अपनाई गई नीतियां विशेषकर 1899 में कलकत्ता नगर निगम में परिवर्तन, 1904 का विश्वविद्यालय अधिनियम और 1905 का बंग-भंग भी उग्रवाद के उदय के प्रमुख कारण थे। देश के अन्दर तथा बाहर विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में अपनाई जा रही नस्लवाद की नीति ने भी उग्रवाद को बढ़ावा दिया। एवीसीनिया की इटली पर विजय (1896) तथा जापान के हाथों रूस की पराजय (1904.5) वह प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय घटनाएं थीं जो उग्रवादियों के लिए प्रेरक सिद्ध हुईं।
उग्रवादी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कट्टर विरोधी थे। वह उसे भारत के पतन और गरीबी का मूल कारण मानते थे। उनका लक्ष्य स्वराज था जिसका तात्पर्य था भारत में भारतीयों को वही अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो इंग्लैंड में एक अंग्रेज को प्राप्त हैं। उनकी कार्यनीति ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ की थी। हड़ताल, विरोध में जुलूस प्रदर्शन इसका अंग थे। उनका कार्यक्रम था: स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा। स्वदेशी भारत के आर्थिक हितों के संरक्षण का तथा बहिष्कार ब्रिटिश आर्थिक हितों पर चोट करने का हथियार हो जाता था। इस प्रकार वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में ही राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा मिली। इससे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन भी हुआ, किन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रवाह अवरुद्ध नहीं हुआ।

 

प्रश्न 23 : निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

(क) गांधी-इरविन समझौते की प्रमुख विशेताएं क्या थीं?
(ख) महात्मा गांधी की बेसिक शिक्षा’ की अवधारणा की विवेचना कीजिए। रूढ़िगत शिक्षा पद्धति से यह कहां तक भिन्न थी?
(ग) 1947 में भारत का विभाजन किन परिस्थितियों में हुआ? 

उत्तर : (क) 1930 में गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया गया तथा 31 जनवरी, 1931 तक वह घोषणा करते रहे कि सरकार के साथ कोई समझौता नहीं होगा, किन्तु उदारवादी नेताओं विशेषकर तेजबहादुर सप्रे, एम.आर. जयकरआदि के प्रयास तथा व्यापारिक हितों के दबाव के चलते 5 मार्च, 1931 को गांधी इरविन समझौता हो गया।
इस समझौते के अनुसार कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित करना स्वीकार कर लिया। वह द्वितीय गोलमेज परिषद् में भाग लेने के लिए भी तैयार हो गई। बहिष्कार कार्यक्रम को वापस लेना तथा पुलिस क्रूरता की जांच की मांग को त्यागना समझौतों के अन्तर्गत ही हुआ। दूसरी ओर सरकार ने दमनात्मक अध्यादेशों और मुकदमों को वापस लेने का वचन दिया। उसने अहिंसात्मक आन्दोलन से जुड़े राजनीतिक बन्दियों को रिहा करने, कुर्क की गई सम्पति को यदि वह नीलाम न हो गई हो तो वापस करने तथा विदेशी वस्तुओं और शराब की दुकानों पर शान्तिपूर्ण पिकेटिंग के अधिकार को स्वीकार किया।
गांधी-इरविन समझौता कांग्रेस के एक वर्ग ने, जिसमें जवाहरलाल नेहरू भी थे, काफी कशमकश के बाद कराची अधिवेशन में स्वीकार किया था।

(ख) ब्रिटिश काल में जो शिक्षा पद्धति थी गांधीजी उससे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने ‘बेसिक शिक्षा’ की नई अवधारणा प्रस्तुत की। गांधीजी की मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा सामाजिक और रचनात्मक गुणों के विकास का साधन होनी चाहिए। शिक्षा राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो तथा व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोगी हो। शिक्षा शारीरिक प्रशिक्षण तथा मानसिक विकास में सहायक हो तथा साथ ही किसी दस्तकारी (हस्तकला) से सम्बन्धित हो जिससे कोई भी व्यक्ति अपनी आजीविका अर्जित करने में सक्षम हो सके। शिक्षा विदेशी संस्कृति पर आधारित होनी चाहिए। बेसिक शिक्षा का माध्यम हिन्दी या भारतीय भाषा था और इसका उद्देश्य छात्रा का स्वालम्बी बनाना था, जबकि रूढ़िगत शिक्षा पद्धति अंग्रेजों के फायदे के लिए थी इसका उद्देश्य सस्ते बाबू पैदा करना और तमाम जनता को अशिक्षित रखना था।

(ग) 1947 में देश के विभाजन के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों में प्रमुख स्थान ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ के अन्तर्गत 16 अगस्त, 1946 से आरम्भ होने वाले साम्प्रदायिक दंगों का है। ब्रिटिश सत्ता की मिली-भगत अथवा निष्क्रियता से हवा पाकर इन दंगों ने भारतीय परिदृश्य को बदल दिया तथा जो कल तक विभाजन की नहीं सोचते थे वह भी नरसंहार से विभाजन अच्छा है, में विश्वास करने लगे। नेहरू के नेतृत्व में गठित अन्तरिम सरकार में लीगी मन्त्रिायों के काम करने के तौर-तरीके तथा अवरोध पैदा करने की नीति ने यह आशंका पैदा की कि विभाजन न होने की स्थिति में हर सरकारी दफ्तर विभाजित तथा निष्क्रिय होकर रह जाएगा। अन्त में जैसा कि प्रसिद्ध इतिहासकार सुमित सरकार का मानना है इस दौर ;1946.47द्ध के उग्र परिवर्तनवादी आन्दोलनों-तेभागा, पुन्नप्रा, व्यालार तेलंगाना ने वामपंथी ताकत के उदय के भय को पैदा कर दक्षिणपंथी कांग्रेस नेतृत्व को विभाजन के साथ शन्तिपूर्ण हस्तांतरण के लिए उत्सुक बना दिया। रही-सही कसर नए गवर्नर माउण्टबैटन की कूटनीति ने पूरी कर दी।
 

प्रश्न 24 : सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्तियों में क्या विशेषताएं पायी जाती है?

उत्तर : (i) सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक मूल्यों के अनुरूप होते हैं। वे कोई भी ऐसा व्यवहार नहीं करते हैं जो सामाजिक आदर्शों के विरुद्ध हो।
(ii) सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक हित में होते हैं। वह कोई भी ऐसा काम नहीं करता है, जिससे समाज के विकास में बाधा आए।
(iii) सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्ति समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ निष्पक्ष तथा यथोचित व्यवहार करता है। 
(iv) सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्ति गम्भीर होता है, चिन्तनशील होता है, किन्तु उसमें उत्साह, आशावादिता की भी कमी नहीं होती है।
(v)   सामाजिक रूप से परिपक्व व्यक्ति सामाजिक कुरीतियों को पनपने नहीं देता है तथा समाज की संस्कृति का हस्तान्तरण, उन्नयन तथा परिमार्जन के प्रति सजग रहता है। 

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