सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 20 (प्रश्न 16 से 28 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 20 (प्रश्न 16 से 28 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 16. सभी का उत्तर दीजिए।
(a) करारोपण में न्याय का क्या अर्थ है?
(b) भारत मं सामाजिक क्षेत्रा मजबूत करने के तर्क दीजिए।
(c) क्या अत्यधिक आर्थिक पिछड़ापन अपने में जनाधिक्य का कारण हो सकता है?
(d) भारत में राज-कोषीय घाटा फिर क्यों बढ़ने लग गया है?
  
उत्तर (a) :
करारोपण में न्याय यह बतलाता है कि प्रत्येक व्यक्ति से कर देने की क्षमता के अनुसार ही कर लिया जाये। कर चुकाने के पश्चात यदि किसी व्यक्ति को अपना उपभोग पूरा करने में कठिनाई होती है तब कर की ऐसी प्रणाली को अन्यायपूर्ण कहा जाता है। 

उत्तर (b) : भारत के प्रत्येक क्षेत्रा में व्याप्त बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा, कुपोषण, गरीबी, जातीय वर्ग व्यवस्था में असामंजस्य इत्यादि के समाधान के लिए ही समाजिक क्षेत्रा को मजबूत किया जाना चाहिए।

उत्तर (c) : अत्यधिक आर्थिक पिछड़ापन अपने में धनाधिक्यों के कारण हो सकता है, गांवों में रहने वाले गरीब परिवार इसलिए अधिक बच्चे पैदा करते हैं कि जितने अधिक व्यक्ति होेंगे, उतना ही अधिक मजदूरी से आय होगी। 

उत्तर (d) : शासन करने वाले राजनीतिक दल सस्ती लोकप्रियता के लिए कृषि और खाद्यान्न सामग्रियों पर सब्सिडी देते रहते हैं।तथा ब्याज देय एवं गैर-योजनागत व्यय में भारी वृद्धि होने के कारण राजकोषीय घाटे में पुनः वृद्धि होने लगी है। 
 

प्रश्न 17.बाढ़ नियंत्राण हेतु सुझाव

उत्तर: बाढ़-नियंत्रण हेतु दो प्रकार के उपाय अपनाने होंगे, 
1. निरोधात्मक तथा  2. राहत एवं बचाव कार्य।

  • निरोधात्मक उपायों का संबंध ऐसे दीर्घकालिक एवं स्थायी उपायों से है जिन्हें अपनाने से बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न न होने देने में सहायता मिलेगी। इसके लिए नदियों, सहायक नदियों तथा नालों पर जगह-जगह पर चेक-डैम बनाकर जलाशयों का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि वर्षा के पानी को नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में ही प्रभावपूर्ण ढंग से रोका जा सके।
  • निरोधात्मक उपायों के दूसरे वर्ग में वे उपाय आते है, जिन्हें अपनाकर बाढ़ के पानी को क्षेत्रा विशेष में प्रवेश करने देने से रोका जा सकता है। यह विधि नदियों के किनारे बसे नगरों, कस्बों एवं ग्रामों को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए अधिक उपयोगी है।
  • बाढ़-प्रबंध योजनाओं को एकीकृत दीर्घकालिक योजना के ढांचे के अंतर्गत और जहां उपयुक्त हो वहां सिंचाई, विद्युत एवं घरेलू जल आपूर्ति जैसी अन्य जल संसाधन विकास योजनाओं के साथ मिलाकर आयोजित किये जाने की आवश्यकता है। इससे बाढ़-नियंत्राण योजनाओं की कारगरता को बढ़ाया जा सकेगा तथा उनकी आर्थिक व्यवहार्यता में भी सुधार होगा।
  • बाढ़ नियंत्राण का दूसरा पहलू बचाव एवं राहत तथा पुनर्वास कार्यों से सम्बंधित है। उपग्रह से प्राप्त चित्रों एवं अन्य पैरामीटरों का प्रयोग करके अब बहुत पहले से क्षेत्रा विशेष में भारी वर्षा होने तथा बाढ़ आदि आने के बारे में चेतावनी दी जा सकती है।

केंद्रीय जल-आयोग देशभर में अपनी 21 शाखाओं के माध्यम से अंतर्राज्यीय नदियों के बारे में बाढ़ संबंधी पूर्वानुमानों की जानकारी देता है। विभिन्न अंतर्राज्यीय नदियों और उनकी सहायक नदियों के बारे में 157 केंद्रों से भविष्यवाणी सामान्यतः 24 घंटे पहले जारी की जाती हैं जो प्रशासन तथा इंजीनियरी कार्यों की सुरक्षा में मदद मिलती है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा 1997 के दौरान 5456 से अधिक भविष्यवाणी जारी की गईं।
 

प्रश्न 18. नर्मदा घाटी विकास योजना, इनसे लाभान्वित राज्य एवं परियोजना से लाभ

उत्तर: नर्मदा घाटी विकास योजनाएं
1. इन्दिरा सागर परियोजना (खण्डवा)
2. ओंकारेश्वर परियोजना (खरगौन)
3. महेश्वर जल विद्युत परियोजना (खरगौन)
4. मान परियोजना (धार)
5. जोबट परियोजना (झाबुआ)

नर्मदा घाटी विकास योजना से लाभान्वित राज्य है - गुजरात, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र।

लाभ

  • इसकी समग्र परियोजनाओं से प्रदेश के 14.4213 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा में सिंचाई क्षमता तथा 2,083 मेगावाट स्थापित विद्युत क्षमता निर्मित होगी।
  • कृषि उत्पादन में 185 लाख टन की वृद्धि एवं शुद्ध सकल घरेलू उत्पादन में दो हजार करोड़ की वृद्धि संभव होगी तथा साथ ही सात लाख पचास हजार रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।    

प्रश्न 19. मार्स आयोग रपट के मुख्य अंश

उत्तर : नर्मदा बचाओ आन्दोलन की गम्भीरता को देखकर विश्व बैंक ने 1991 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के पूर्व निदेशक बेडफोर्ड मार्स की अध्यक्षता में एक दो सदस्यीय आयोग का गठन किया। कनाडावासी न्यायविद थाॅमस बर्जर इसके उपाध्यक्ष थे। उन्होंने गहन अध्ययन कर 18 जून, 1992 को अपनी रपट प्रस्तुत की। उसके कुछ अंश इस प्रकार है -

  • सरदार सरोवर परियोजना के कारण उजड़ने वालों का मौजूदा परिस्थितियों में पुनर्वास कर पाना सम्भव नहीं है परियोजना का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा, सरकार ने इस पक्ष पर गम्भीरता से विचार नहीं किया है।
  • सरदार सरोवर परियोजना के कारण 245 गाँवों के लगभग 1 लाख लोग उजड़ जाएंगे, क्योंकि जलाशय आदि बनाने से ये गाँव जलमग्न हो जाएंगे। महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी इससे प्रभावित होंगे।
  •  नहरों का जाल बिछाने के लिए जो भूमि ली जाएगी, उससे 1.40 लाख किसान प्रभावित होंगे। भारत सरकार ने गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सरकारों के साथ अनुबन्ध करते समय इनके लिए कोई व्यवस्था नहीं की है।
  •  कमांड एरिया में नहर तथा जल वितरण प्रणाली के किसी भी सारगर्भित पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन नहीं किया गया है।
  • पेयजल मुहैया कराने की प्राथमिकताओं पर कोई नियोजित योजना नहीं है।
  • कमांड एरिया में मलेरिया का प्रकोप गम्भीर हो सकता है। सरकार मलेरिया की रोकथाम में विफल रही है।  
  • यह विश्व बैंक तथा भारत सरकार के साथ हुए अनुबन्ध का उल्लंघन है। विश्व बैंक को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए।
  • विश्व बैंक ने इस तथ्य को अनदेखा किया कि इस परियोजना से उजड़ने वाले अधिकांश लोग आदिवासी है, विश्व बैंक की आचार संहित में यह उल्लेख अवश्य होना चाहिए था कि आदिवासियों के लिए क्या नीति अपनाई जाए। परियोजना तैयार करते समय प्रभावित होने वाले लोगों से कोई परामर्श तक नहीं किया गया इसी कारण योजना का विरोध किया जा रहा है।
  • यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि परियोजना के कारण उजड़ने वाले लोगों का जीवन स्तर बनाए रखा जाए।
  • बाँध के निर्माण हेतु केवड़िया काॅलोनी बनाने के लिए जिन 6 गाँवों के लोगों को विस्थापित होना पड़ा, उन्हें पर्याप्त मुआवजा दिया जाना चाहिए था।    
  • 1987-88 में गुजरात सरकार के मुआवजा सम्बन्धी पैकेज को आदर्श मानते हुए, उसे मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र द्वारा न अपनाये जाने पर आयोग ने कड़ी आपत्ति की। इस पैकेज के अनुसार गुजरात सरकार ने सरदार सरोवर बाँध के कारण उजड़े परिवार को, चाहे उसकी भूमि हो अथवा वह भूमिहीन हो, दो हेक्टेयर भूमि देने का प्रावधान किया था, लेकिन महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश सरकार ने केवल भूमि मालिकों को ही उक्त भूमि दी।    
  • अपर्याप्त आंकड़ों, जानकारी के अभाव, लोगों से परामर्श न लेना ही परियोजना के पूरी होने में बाधक कारण है।    
  • विश्व बैंक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परियोजना में पर्यावरण संरक्षण तथा पुनर्वास को प्राथमिकता मिले।    

प्रश्न 20. (क) निम्नलिखित की प्रमुख विशेषताएं बताइए -
(i) सिन्धु घाटी सभ्यता में नगर योजना
(ii) गुहा शैलकृत स्थापत्यकला
(iii) अहमदिया आंदोलन
(iv) महायान बौद्ध धर्म
(ख) आप निम्नलिखित के विषय में क्या जानते हैं?
(i) बटलर कमेटी रिपोर्ट
(ii) अगस्त प्रस्ताव, 1940  
(iii) भारत की थियोसोफिकल सोसायटी
(ग) निम्नलिखित स्थान किन घटनाओं से सम्बन्धित हैं?
(i) हरिपुरा
(ii) चैरी चैरा
(iii) बारदोली
(iv) डांडी
(घ) निम्नलिखित क्यों प्रसिद्ध हुए?
(i) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ii) ए.ओ.ह्यूम
(iii) बिरसा मुण्डा

 

उत्तर - (क) (i) सिन्धु घाटी सभ्यता में नगर योजना - सिंधु घाटी की सभ्यता की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता इसका नगर नियोजन है। इसमें नगरों (मोहनजोदड़ो) की सड़कें उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम की ओर सीधी-सीधी थीं। उनकी चैड़ाई 4.10 मीटर थी। घर एक-दूसरे से अलग थे। पूर्ण रूप से विकसित प्रणाली थी। बड़े-बड़े स्नानागार तथा सार्वजनिक स्थल थे

(ii) गुहा शैलकृत स्थापत्यकला - इस स्थापत्य कला का विकास चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव शासकों के काल में हुआ। गुफाओं में शिलाओं को काटकर मंदिर और मूर्तियां बनाई गईं। एलोरा का रामेश्वर मंदिर (7वीं शताब्दी) व दशावतार मंदिर, कैलाश मंदिर, एलीफेंटा द्वीप पर शंकर का मंदिर, महाबलीपुरम के मंदिर इसी शैली के मंदिर हैं। 

(iii) अहमदिया आंदोलन - मुस्लिम धर्म में सुधारवादी विचारधारा से परिपूर्ण यह आंदोलन सन् 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद ने प्रारंभ किया। यह इस्लाम को मानवता का सार्वभौमिक धर्म मानता था तथा गैर-मुसलमानों के खिलाफ जेहाद का विरोधी था। 

(iv) महायान बौद्ध धर्म - यह बौद्ध धर्म की वह शाखा है जो ग्रीक तथा रोमन विचारों से प्रभावित प्रतीत होती है। इसके अनुयायी मूर्तियों और कर्मकाण्डों के साथ बुद्ध को भगवान मानकर उनकी पूजा करते थे। महायान बौद्ध धर्म तिब्बत, चीन, जापान, बर्मा, जावा आदि में फैला।

(ख) (i) बटलर कमेटी रिपोर्ट - अंग्रेजी सरकार तथा देशी रियासतों के बीच सम्बन्धों का अध्ययन करने के लिए सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में 1927 में गठित भारतीय राज्य समिति थी। इस समिति ने ब्रिटिश सत्ता की सर्वोच्चता, देशी रियासतों के शासकों की सहमति के बिना राज्यों को प्रस्तावित भारत सरकार न सौंपने तथा राज्यों के मामले में ब्रिटिश सरकार का एजेंट वायसराय होने की बात का समर्थन किया था।

(ii) अगस्त प्रस्ताव, 1940 - ब्रिटिश सरकार ने अगस्त 1940 में एक प्रस्ताव रखा जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा जाता है। इस प्रस्ताव में घोषणा की गई कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को ‘डोमिनियन स्टेट’ का दर्जा प्रदान कर दिया जाएगा। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को असंतोषजनक मानते हुए तत्काल रद्द कर दिया।  

(iii) भारत की थियोसोफिकल सोसायटी - पूर्व के ऐसियोटेरिक धार्मिक दर्शन का अध्ययन करने के लिए सन् 1875 में एक रूसी महिला मैडम एच.पी. ब्लावट्स्की तथा इंग्लैंड के पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल एच.एस. आल्काट ने सं. रा. अमेरिका में थियोसोफीकल सोसायटी की स्थापना की। सन् 1886 में दोनों भारत आए तथा मद्रास के निकट आड्यार में इसकी विधिवत स्थापना की। 
श्रीमती एनी बेसेंट के इस सोसायटी से जुड़ जाने पर इसे विशेष सफलता मिली। इस सोसायटी ने वेदों और उपनिषदों को भारत की धरोहर माना। 1898 में इसने बनारस में हिन्दू स्कूल की स्थापना की जो 1915 में हिन्दू विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया।

(ग) (i) हरिपुरा - यहां पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन 1939 में सम्पन्न हुआ जिसमें नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को अध्यक्ष चुना गया। किन्तु महात्मा गांधी के विरोध के कारण नेताजी बोस ने त्यागपत्रा दे दिया। डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद उनके स्थान पर पर अध्यक्ष बने।
(ii) चैरी चैरा - सन् 1920.21 के असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजी पुलिस के अत्याचारों से उग्र हो गई भीड़ ने चैरी-चैरा (उत्तर प्रदेश) में एक थाने में आग लगा दी जिसमें कई पुलिसकर्मी जलाकर मारे गए।
(iii) बारदोली - सूरत के निकट एक स्थान जहां सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कर अदा न करने के लिए सत्याग्रह चलाया और सफलता प्राप्त की। तभी से उन्हें सरदार कहा गया।
(iv) डांडी - अंग्रेजी सरकार के नमक कानून को तोड़ने के लिए गांधी जी ने डांडी से यात्रा की थी जिसे डांडी मार्च के नाम से जाना जाता है। समुद्र तट पर पहुंचकर उन्होंने नमक कानून को तोड़ते हुए नमक बनाया।

(घ) (i) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र - हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, लेखक, कहानीकार तथा उपन्यासकार भारतेन्दु, हरिश्चन्द्र (1850.1885) ने हिन्दी साहित्य को एक नवीन दिशा दी। इसीलिए इनके काल को हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है।

(ii) ए.ओ.ह्यूम - एक सेवानिवृत्त आई.सी.एस. अधिकारी जिनके परामर्श एवं सहयोग से सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई। ताकि भारतीय सार्वजनिक महत्व के मामलों पर एक संस्था के रूप में अपने विचार प्रकट करें।

(iii) बिरसा मुंडा - बिहार (झारखंड) के एक आदिवासी क्रांतिकारी जिन्हांेने आजादी के लिए अंग्रेजों से संघर्ष किया। स्थानीय लोग उन्हें भगवान मानकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
 

प्रश्न 21. द्वितीय विश्व महायुद्ध के आरम्भ का भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर क्या प्रभाव पड़ा? क्या क्रिप्स मिशन भारत में राजनीतिक संकट सुलझा पाया?

उत्तर - सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व महायुद्ध प्रारम्भ होने के समय भारत के राजनीतिक वातावरण में अस्थिरता थी। सभी राजनीतिक दल एक स्वर से भारत की स्वतंत्राता के लिए ब्रितानी सरकार पर दबाव डाल रहे थे। 1935 का भारत सरकार का कानून यद्यपि संघीय मामलों में लागू नहीं था तथापि देश की एक केंद्रीय विधान परिषद् थी तथा राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित विधायिकाएं एवं सरकारें थीं। ऐसे समय में भारत के वायसराय द्वारा 3 सितम्बर, 1939 को भारत के राजनेताओं को विश्वास में लिए बिना ब्रिटेन के साथ भारत को भी युद्ध का एक पक्ष बना दिए जाने की घोषणा कर देना भारतीय जनता के लिए अत्यधिक स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। पश्चिमी मोर्चे पर जर्मनी की लगातार होती जा रही विजय तथा पूर्वी मोर्चे पर जापान के बढ़ते दबाव के वातावरण में ब्रिटेन की कमजोर होती जा रही स्थिति ने भारतीयों के लिए एक ऐसा अवसर पैदा कर दिया था जिसमें वे ब्रिटेन को युद्ध में सशर्त समर्थन देकर भारत को आजाद कर देने के लिए बाध्य कर सकते थे, लेकिन पारस्परिक फूट तथा राजनीतिक पैंतरेबाजी ने इस अवसर को खो दिया। अपनी पूर्व नीति पर चलते हुए यद्यपि कांग्रेस ने ब्रितानी सरकार को समर्थन  न देने की घोषणा की तथापित इसके दो शीर्ष नेताओं महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू ने संकट की इस घड़ी में ब्रिटेन को बिना शर्त समर्थन एवं सहयोग देने के बयान जारी किए। कांग्रेस से अलग होकर फारवर्ड ब्लाॅक का गठन करने वाले सुभाषचन्द्र बोस ने इस अवसर पर ब्रितानी सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए नागरिक अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया। वे मानते थे कि इस महायुद्ध में ब्रिटेन जितना ही अधिक कमजोर एवं छिन्न-भिन्न होगा, भारत को आजादी उतनी ही जल्दी प्राप्त होगी, आचार्य विनोबा भावे ने व्यक्तिगत अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया। मुस्लिम लीग के शीर्ष नेतृत्व ने इस अवसर पर कोई बयान जारी नहीं किया तथापि पंजाब, बंगाल एवं सिन्ध प्रांतों में उसकी सरकारों ने बिना शर्त समर्थन दिए जाने की घोषणा कर दी।
वायसराय एवं ब्रिटिश सरकार ने इस पारस्परिक फूट का लाभ उठाया और भारत को आजादी अथवा अधिक राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाने का मसला एक बार पुनः अधर में लटका रह गया। इस प्रकार भारतीय नेता विश्व युद्ध के कारण बदली हुई परिस्थितियों में कोई विशेष लाभ नहीं उठा सके और एक सुंदर अवसर उनके हाथों से चला गया। ब्रिटिश सरकार ने भी भारतीय राजनीतिक संकट को सुलझाने के लिए क्रिप्स मिशन भारत भेजा।
क्रिप्स मिशन - हताशा के दौर में भारत का पूरा और सक्रिय सहयोग पाने के लिए परेशान ब्रिटिश सरकार को भारत में स्वशासी सरकार बनाने के पूरे अधिकार सुनिश्चित करने का आश्वासन देने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए युद्धकालीन मंत्रिमंडल के एक सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को एक प्रस्ताव के तहत भारत भेजना पड़ा। इस प्रस्ताव में निम्नलिखित धाराएं थीं -
(i) युद्ध की समाप्ति पर भारत को उपनिवेशिक दर्जा प्रदान कर दिया जाना।
(ii) युद्धोपरान्त संविधान सभा का गठन किया जाना जिसमें ब्रितानी भारत तथा देसी रियासतें दोनों के ही सदस्य हों।
(iii) भारत की कोई भी देशी रियासत अथवा प्रांत यदि भारत संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहता है तो उसे ऐसा करने की पूरी छूट थी।
(iv) युद्ध काल में किसी भी प्रकार का संवैधानिक परिवर्तन न किया जाना।
(V) जब तक नया संविधान नहीं बन जाता तब तक भारत की सुरक्षा का भार ब्रिटेन का ही होगा।
क्रिप्स मिशन के उपर्युक्त प्रस्तावों में अन्ततः कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सभी उचित मांगें मान ली थीं, लेकिन इसके बावजूद इस प्रस्ताव को भारत के सभी राजनीतिक दलों ने अस्वीकृत कर दिया। हालांकि ऐसा किए जाने के कारण अलग-अलग थे।
(i) कांग्रेस को प्रांतों अथवा देशी रियासतों को भारतीय संघ में न मिलने की स्वतंत्राता देने का सिद्धांत स्वीकार्य नहीं था। इतना ही नहीं वह संविधान सभा में मनोनीत सदस्यों को शामिल किए जाने की भी विरोधी थी, इसके साथ ही कांग्रेस भविष्य के वादों पर विश्वास न करके तत्काल ही राजनीतिक  सत्ता में एक निश्चित भागीदारी चाहती थी।
(ii) मुस्लिम लीग को प्रस्ताव की यह धारा तो स्वीकार्य थी कि प्रांतों को भारतीय संघ में शामिल होने या न होने की स्वतंत्राता प्राप्त हो, परन्तु वह मुसलमानों के लिए स्पष्ट तौर पर पृथक देश के रूप में पाकिस्तान बनाए जाने की मांग को प्रस्ताव में शामिल न किए जाने तथा 
संविधान का मसविदा तैयार करने के लिए अपनायी जाने वाली विधि, जोकि अस्पष्ट एवं लोचहीन थी, को लेकर प्रस्ताव का विरोध प्रकट कर रही थी।
(iii) हिन्दू महासभा किसी भी कीमत पर देश के विभाजन के विरुद्ध थी इसलिए उसे क्रिप्स प्रस्ताव अस्वीकार्य था।
(iv) सिक्ख साम्प्रदायिकतावादियों को भय था कि मुस्लिम बहुमत वाला पंजाब भारतीय संघ से बाहर रहने का निर्णय करेगा इसलिए वे इसके विरुद्ध हो गए।
(V) दलितों के नेताओ - डाॅ. बी.आर. अम्बेडकर तथा सी.एम. राजा ने इस आधार पर प्रस्ताव का विरोध किया कि इसमें दलितों के हितों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी।
कुल मिलाकर सभी पक्षों को क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव अस्पष्ट और असंतोषजनक लगा इसीलिए सभी ने इसे अस्वीकार कर दिया और क्रिप्स मिशन भारत में राजनीतिक संकट को सुलझाने में असफल रहा।

 

प्रश्न 22.  1917 के चम्पारन सत्याग्रह तक भारतीय राजनीति में हुए गांधीजी के उद्भव को रेखित कीजिए, उनके द्वारा प्रतिपादित सत्याग्रह का आधारभूत दर्शन क्या था?

उत्तर - गांधीजी 9 जनवरी, 1915 को भारत वापस लौटे। उस समय तक दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की सरकार के विरुद्ध उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन की ख्याति भारत में फैल चुकी थी। सम्भवतः यही कारण था कि बम्बई पहुंचने पर उनका भव्य और ऐतिहासिक स्वागत किया गया। भारत में उन्होंने गोपालकृष्ण गोखले से भेंट की और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु स्वीकार किया। तात्कालिक परिस्थितियों का भली-भांति अध्ययन करने के उपरांत वे अन्ततः भारतीय राजनीति में कूद पड़े। अंग्रेजों के विरुद्ध सीधी लड़ाई में उनकी सफलता का पहला पड़ाव वैसे तो 1917 का चम्पारन सत्याग्रह माना जाता है, लेकिन इससे भी पूर्व गांधीजी ने निम्नलिखित मामलों में भारतीय राजनीति को काफी बड़ी सीमा तक प्रभावित किया।

(i) करारबद्ध श्रम की समाप्ति - गांधीजी ने भारतीय श्रमिकों को दक्षिण अफ्रीका एवं अन्य अफ्रीकी तथा लैटिन अमेरिकी देशों में ले जाने तथा स्थायी रूप से बसाए जाने के विरुद्ध सत्याग्रह चलाया तथा इस प्रथा को समाप्त कराया।

(ii) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना - फरवरी 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह पर गांधीजी द्वारा दिए गए भाषण ने उन्हें प्रमुखता में ला दिया। इस अवसर पर उपस्थिति राजाओं, महाराजाओं एवं सेठ-साहूकारों को आड़े हाथों लिया तथा अपने-अपने करोड़ों निर्धन देशवासियों की खातिर विलासिता पूर्ण जीवन त्यागने के लिए कहा। इसी प्रकार उन्होंने उस समय पण्डाल में मौजूद गुप्तचर सेवा के लोगों को तैनात किए जाने में आलोचना की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि हमें स्व-शासन प्राप्त करना है तो इसे हमें प्राप्त करना होगा। ब्रितानी सरकार तो इसे देने से रही।

(iii) वीरमगांव तटकरों को समाप्त कराना - गांधीजी ने अपने देशवासियों की छोटी-बड़ी सभी प्रकार की समस्याओं के लिए प्रयास करने प्रारम्भ कर दिए। एक बार वे अपने सम्बन्धियों से मिलने राजकोट गए। रास्ते के एक स्टेशन वीरमगांव पर लोगों ने उन्हें सीमा शुल्क अधिकारियों के स्तर से परेशान किए जाने की बात बताई। उन्होंने यह मामला अपने हाथ में लिया तथा सरकार को सत्याग्रह की धमकी देकर इसे समाप्त करवाया।

गांधीजी द्वारा प्रतिपादित सत्याग्रह का आधारभूत दर्शन - सत्याग्रह, सत्य, प्रेम और अहिंसा पर आधारित सामाजिक एवं राजनीतिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने का एक नैतिक तरीका है। गांधीजी ने अहिंसात्मक कष्ट सहने की विचारधारा को मानव जीवन की सभी क्रियाओं में लागू किया, ताकि सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्रा में मौलिक परिवर्तन लाए जा सकें। सत्याग्रह से तात्पर्य प्रत्येक कीमत पर सत्य पर डटे रहने से है। चूंकि सत्य अनन्त है, इसलिए इसे सीमित मानव द्वारा नहीं समझा जा सकता। सत्य की अवधारणा व्यक्ति से व्यक्ति के बीच भिन्न हो सकती है। जहां सब कुछ असफल हो जाता है, वहां एक सत्याग्रही, व्यक्ति को विवेकपूर्ण ढंग से समझने का प्रयास करता है तथा उसके हृदय और अन्तरात्मा को परिवर्तित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्याग्रह के मूल में यह बात छिपी हुई है कि सत्य केवल उसी दशा में कार्य कर सकता है, जबकि व्यक्ति स्वयं को कष्ट दे तथा अहिंसा का पालन करे। इसमें शब्दों, विचारों एवं कार्यों से किसी भी जीवित वस्तु को चोट न पहुंचाने का विचार भी निहित है। अहिंसा का अर्थ यह भी हो सकता है कि आप अपने विरोधी का भला ही करें सत्याग्रह की तुलना में उस स्थिति से की जा सकती है जिसमें सत्याग्रही अपने विरोधी द्वारा कष्ट पहुंचा सकने की क्षमता के विरुद्ध कष्ट सहने की क्षमता रखता हो। गांधीजी का मानना था कि सत्याग्रह बलवानों का हथियार है। इससे लोगों के मस्तिष्क से भय का निवारण होता है यह एक ऐसा आदर्श हथियार है जिसका प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति द्वारा प्रत्येक परिस्थिति में किया जा सकता है।
 

प्रश्न 23. उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हुए अद्वितीय जनजातीय विप्लव का विवेचन कीजिए।

उत्तर - जनजातीय विप्लव - जनजातीय विप्लव का आधुनिक भारत के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। देश के विभिन्न भागों में अपनी सांस्कृतिक एवं चारित्रिक विशिष्टता लिए आदिवासियों ने अंग्रेजी शासनकाल में आने वाले परिवर्तनों एवं उससे उपजे शोषण के विरुद्ध समय-समय पर संघर्ष किया। उन्होंने उपनिवेशवादी शासन की घुसपैठ और ब्रितानी शासन के विस्तार पर आक्रोश व्यक्त किया। आदिवासियों ने अंग्रेजी शासनकाल में आनेवाले परिवर्तनों एवं उससे उपजे शोषण के विरुद्ध समय-समय पर संघर्ष किया। उन्होंने उपनिवेशवादी शासन की घुसपैठ और ब्रितानी शासन के विस्तार पर आक्रोश व्यक्त किया। आदिवासियों का विद्रोह उनके अदम्य साहस और बलिदान तथा सरकारी मशीनरी द्वारा उन्हें क्रूर ढंग से दबा देने, दोनों ही दृष्टियों से उल्लेखनीय है। एक ओर तीर-कमान और टांगियों जैसे आदिकालीन हथियारों से लड़ने वाले क्रुद्ध तथा असंगठित आदिवासी थे तो दूसरी ओर आधुनिक अस्त्रा-शस्त्रों से सुसज्जित, संगठित एवं अनुशासित ब्रितानी सेनाएं थी। यही कारण था कि इन आंचलिक विद्रोहों को कोई सफलता नहीं मिली, परन्तु उन्होंने यह तो दिखा ही दिया कि उनके मन में अंग्रेजों और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आक्रोश है। संक्षेप में देश के प्रमुख जनजातीय विद्रोह निम्नलिखित थे -

(i) सन 1820 से 1837 तक कोलों का विद्रोह - जब कोलों के गांवों को कोल मुखियों (मुण्डाओं) के हाथ से छीनकर बाहरी क्षेत्रों से आए सिखों एवं मुसलमानों को दिया जाने लगा तो कोलों ने इसका विरोध किया। रांची से प्रारम्भ होकर यह विप्लव सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू तथा मानभूम के पश्चिमी भाग में फैल गया। अंग्रेजी सरकार ने इसे दबाने के लिए बड़े-बड़े पैमाने पर सैनिक कार्यवाही की।  

(ii) सन् 1855.56 में संथालों का विद्रोह - हजारीबाग और मानभूम से राजमहल पहाड़ियों के क्षेत्रों में जाकर बस गए संथालों के लगभग 40 गांवों में उस समय विद्रोह फूट पड़ा जब इन पर बहुत ऊंची लगान से लगान लेना निश्चित किया गया। साहूकारों द्वारा ऊंची ब्याज दर पर ऋण प्रदान किए गए, रेल एवं राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा बेगार ली गयी तथा उनकी स्त्रिायों की इज्जत लूटी जाने लगी। इस विद्रोह का नेतृत्व सीदों और कान्हू नामक दो भाइयों ने किया। अन्ततः यह सरकार के दमन चक्र का शिकार हुआ। 

(iii) 1879 का रम्पा विद्रोह - आंध्र प्रदेश में गोदावरी के पहाड़ी क्षेत्रा में उपजे रम्पा संघर्ष को कोया तथा कोंडा डोरा आदिवासीयों मुखियों ने प्रारम्भ किया, क्योंकि यहां के मनसबदार ने इमारती लकड़ी व चराई कर में भारी वृद्धि कर दी। बाद में इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सेना का इस्तेमाल किया।

(iv) 1895.1901 का मुण्डा विद्रोह - रांची के दक्षिण क्षेत्रा में बसे मुण्डा आदिवासियों ने बिरसा मुण्डा नामक युवक के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया जिसे देश के स्वतंत्राता संग्राम आंदोलन का सर्वाधिक सुसंगठित जनजातीय विप्लव कहा जा सकता है।

(V) अन्य विद्रोह - उपर्युक्त के अतिरिक्त निम्नलिखित आदिवासी विद्रोह भी भारत के स्वतंत्राता आंदोलन में अपना विशिष्ट महत्व रखते हैं -
(I) 1822.1883 तक महाराष्ट्र का रामोसी विद्रोह।
(II) 1819.1846 तक मध्य भारत तथा राजस्थान में भीलों का विद्रोह।
(III)1768.1831 तक चुआर विद्रोह
(IV) 1820.22 तक ‘हो’ विद्रोह
(V) 1829 में खासी विद्रोह
(vi) 1815.1855 तक खोंद (तमिलनाडु) विद्रोह।
इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय जनजातीय विद्रोह हुए, परन्तु सभी विद्रोह क्रूरता एवं बलपूर्वक ब्रिटिश सरकार द्वारा दबा दिये गये और ये मात्रा पानी के बुलबुले ही सिद्ध हुए।

 

प्रश्न 24. भारत में ‘गैर ब्रिटिश’ शासन का क्या अर्थ है? भारत के राष्ट्रवादियों की इसके प्रति क्या प्रतिक्रिया हुई थी? भारत में ब्रिटिश शासन की बुराइयों का उद्घाटन करने में दादाभाई नौरोजी की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर - भारत में ब्रिटिश शासन के उद्देश्य एवं प्रक्रिया को देखते हुए दादा भाई नौरोजी ने इसे ब्रिटिश शासन (जैसा ब्रिटेन में था) के सिद्धान्तों के प्रतिकूल बताया तथा इसे गैर ब्रिटिश शासन कहा। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी जिसका शीर्षक ‘पावर्टी एण्ड अन-ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ रखा। उन्होंने यह वक्तव्य दिया कि भारत में ब्रिटिश शासन भारत का आर्थिक एवं ज्ञान का दोहन एवं शोषण के लिए है, भारत के लाभ के लिए नहीं। उनके मतानुसार, “वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों की शासन नीति, जैसी कि वह है (न कि जैसी हो सकती है या होनी चाहिए) एक चिरस्थायी और हर रोज बढ़ने वाला विदेशी आक्रमण हैं।“ 28 दिसम्बर, 1897 को दादा भाई ने एक प्रस्ताव में कहा - “राजद्रोह के नाम पर अन्यायपूर्ण मुकदमें चलाए गए और कहा गया कि पढ़े-लिखे भारतीय राजद्रोही हैं, भारतीय पत्रों की स्वत्रांता का मनमाना अपहरण, प्रशासन की तानाशाही और नालायकी-इन सभी बातों और बहुत सी अन्य बुराइयों का मुख्य कारण अन्यायपूर्ण अब्रिटिश शासन पद्धति, जिससे अविराम तथा निरन्तर बढ़ती हुई गति से देश का दोहन हो रहा है। इस दोहन को राजनीतिक ढोंग तथा चालाकी से कायम रखा जा रहा है, जो ब्रिटेन की ख्याति और सम्मान के अनुपयुक्त हैं और सब ब्रिटिश जाति और ब्रिटिश सम्राट की इच्छाओं के विरुद्ध हो रहा है, इसलिए उन्होंने कहा “जब तक अन्यायपूर्ण और अब्रिटिश शासन को दूर कर उसके स्थान पर न्यायपूर्ण और वास्तविकता ब्रिटिश रूप का शासन नहीं चलाया जाता, तब तक यही अनिवार्य नतीजा हो सकता है कि भारत का नाश हो और ब्रिटिश साम्राज्य पर आफत आए।“
भारत में ब्रिटिश शासन की बुराइयों का उद्घाटन करने में दादाभाई नौरोजी की भूमिका - ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की सम्पदा का खुले तौर पर शोषण तथा उससे सम्बन्धित ब्रितानी शासन की आर्थिक नीतियों की सबसे तीखी आलोचना करने वालों में ‘भारत के महान वृद्ध व्यक्ति’ दादा भाई नौरोजी का नाम सर्वप्रमुख है। उन्होंने अपने लेखों, विभिन्न समितियों को दी गई गवाहियों आदि में स्पष्ट तौर पर इस तथ्य का उल्लेख किया कि भारत की निर्धनता, महामारी, अकाल एवं धीमे विकास के लिए अन्तः ब्रितानी शासन ही उत्तरदायी है। इस सम्बन्ध में उन्होंने ‘Poverty and Un British rule in India’  नामक पुस्तक लिखी। 1867 में लन्दन की ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के समक्ष पढ़े गए लेख ‘भारत के प्रति इंग्लैंड का कत्र्तव्य’ में उन्होंने भारत की दुर्दशा के लिए भारत के शोषण को उत्तरदायी ठहराया। उनका मानना था कि “भारत के हितों की अवहेलना करने वाली ब्रितानी नीति तथा इंग्लैंड के लाभ के लिए भारत का शोषण होने के कारण यह सारा शासन गलत, अप्राकृतिक और आत्महत्या पर चलता है।“ दादा भाई नौरोजी ने वेलची कमीशन  (1897) लन्दन इंडिया सोसायटी (1904) कलकत्ता कांग्रेस (1906) आदि सभी के सामने एक ही दृष्टिकोण रखा। “ब्रिटिश सरकार भारत से आर्थिक संसाधनों का दोहन कर ब्रिटेन ले जा रही है तथा भारत को कंगाल बना रही है।“ इस प्रकार दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेज सरकार की आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की और भारतीयों को स्वतंत्राता प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।

 

प्रश्न 25. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर लार्ड कर्जन के वायसराय पद पर रहने तक तिब्बत के प्रति रही ब्रिटिश नीति का विवेचन कीजिए।

उत्तर - तिब्बत का शासन चीन के नाममात्रा के अधिराज्य के अंतर्गत बौद्धों के धर्म गुरुओं (लामाओं) द्वारा चलाया जा रहा था। इनमें दो महान लामा ही प्रमुख थे - दलाईलामा और ताशीलामा - जिन्हें भगवान बुद्ध का अवतार माना जाता था। दलाई लामा यदि राजनीतिक प्रमुख थे तथा ल्हासा मुख्यालय में रहते थे जो धार्मिक मामलों के प्रमुख ताशीलामा शिगाट्से के निकट ताशी लिंपू में रहते थे। उनमें से जब भी किसी की मृत्यु होती थी तो उसका उत्तराधिकारी ठीक उसी समय जन्मे नवजात शिशुओं में से चुना जाता था तथा उसे ही दिवंगत लामा का अवतार माना जाता था। प्रमुख लामाओं की एक रीजेन्सी स्थापित की गई थी जिसे 1898 में दलाई लामा ने समाप्त कर दिया। रूस का एक बौद्ध दौरजी एफ दलाई लामा में रुचि लेता था और इसी आधार पर दलाई लामा ने कई बार रूस की यात्राएं की तथा वहां के शासक जार का आतिथ्य स्वीकार किया। ब्रितानी भारत की सरकार को इन यात्राओं पर आपत्ति थी।  ऐसा विश्वास किया जाता था कि तिब्बत रूस के सहयोग से चीन को अलग-थलग कर देना चाहता था। लाॅर्ड कर्जन अनेक प्रयासों के बावजूद तिब्बत से सीधे और चीन के माध्यम से किसी समझौते पर पहुंचने में असफल रहे। 1903 में कर्नल यंगहस्बैण्ड को एक छोटी सी सेना के साथ तिब्बत भेजा गया। तिब्बतियों ने इस पर उस समय तक कोई बातचीत करने से मना कर दिया जब तक सेना सीमाओं पर वापस नहीं चली जाती। वे इससे पहले सेना की वापसी की शर्त रखते रहे। रूस ने ब्रितानी भारतीय सरकार के इस कदम का विरोध किया। यंगहस्बैंड 1904 में तिब्बत में काफी आगे से बढ़ता गया 
तथा उसने लगभग 600 तिब्बतियों को मार डाला। ब्रितानी सेनाएं 7 सितम्बर, 1904 तक आगे बढ़ती रही और अंततः इसी दिन तिब्बतियों को अंग्रेजी सेना से संधि करनी पड़ी। यंगहस्बैंड ने तिब्बतियों पर अनेक शर्तें थोपीं और लाॅर्ड कर्जन ने उनका समर्थन किया, लेकिन भारत सचिव को इस संधि में संशोधन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। दलाई लामा द्वारा भुगतान की जाने वाली राशि 25 लाख निर्धारित की गई। चुम्बी घाटी से ब्रितानी सैनिकों को वापस बुला लिया गया। तिब्बतियों ने जान्टसे में ब्रितानी एजेंट की नियुक्ति तथा उसे ल्हासा आने-जाने की छूट को स्वीकार किया, लेकिन जैसे ही ब्रितानी सेनाएं वापस हुई चीन ने वहां व्यापारिक तौर पर सम्प्रभुता स्थापित कर दी। इस प्रकार तिब्बत में अंग्रेजों के हस्तक्षेप का सीधा लाभ अन्ततः चीन को ही मिला।

 

प्रश्न 26. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आरम्भि दिनों में नरम दल वालों के क्या योगदान रहे?

उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों में नरमदलीय नेताओं ने प्रार्थना और आवेदनों के जरिये ब्रितानी सरकार से भारतीयों को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने, सामाजिक आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्रा में सुधारों को लागू करके भारत के नागरिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए अंग्रेजों से भीख मांगने जैसा व्यवहार किया। उसमें उन्हें कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली अंग्रेजी शासकों द्वारा उनकी उपेक्षा की गयी, उन्हें समय-समय पर अपमानित किया और उनकी खिल्ली उड़ाई गयी, लेकिन इतना सब कुछ होने पर निम्नलिखित क्षेत्रों में नरमदल वालों की उपलब्धियां निश्चित तौर पर उल्लेखनीय कही जा सकती हैं -
(i) भारतीयों में राष्ट्रीयतावाद की भावना पैदा करने में सफल रहे तथा उनके प्रयासों से भारत के जनमानस में राजनीतिक जागरूकता आई तथा स्वतंत्राता आंदोलन के लिए मजबूत पृष्ठभूमि तैयार हुई।
(ii) उन्होंने अंग्रेजी शासकों के वास्तविक चरित्रा को उजागर किया तथा सारे विश्व को यह बता दिया कि अंग्रेज कितने क्रूर, अमानवीय तथा शोषक हैं।
(iii) उन्होंने भारत के आर्थिक हितों को राजनीतिक हितों से सम्बद्ध किया तथा भारत की आर्थिक दुर्दशा के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया।
(iv) उन्होंने भारतीयों में लोकतंत्रा एवं नागरिक स्वतंत्राता के विचार को पैदा किया।
(V) उनके प्रयासों से लोक सेवा आयोग की स्थापना हो सकी तथा भारतीय काउंसिल अधिनियम, 1892 पारित को सका।
(vi) उनके प्रयासों से ही भारतीय सिविल सेवा में भारतीयों की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त हुआ तथा भारतीय व्यय पर वेल्बी आयोग का गठन किया गया।
इस प्रकार नरमपंथियों ने आगामी स्वतंत्राता संग्राम की नींव रखी और उसके लिये उपयुक्त वातावरण तैयार किया।

 

प्रश्न 27.निम्नलिखित पर टिप्पणीयां लिखें।
(I) ज्योति बा फुले
(II) प्रेसलर संशोधन
(III) सी. रोगापोलाचारी
(IV) जगजीवन राम

उत्तर - (I) ज्योति बा फुले - यह 1828 में एक माली परिवार में पैदा हुए तथा एक ईसाई की कृपा से शिक्षा प्राप्त कर सके। उनके जीवन का लक्ष्य ब्राह्मण श्रेष्ठता को चुनौती देना तथा दलितों एवं स्त्रिायों का उत्थान करना था। इसके लिए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए एक स्कूल तथा विधवाओं के लिए विधवाश्रम खोला। ‘सत्य-शोधक समाज’ की स्थापना की। उन्होंने ‘सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक’ तथा ‘गुलामगीरी’ आलोचनात्मक पुस्तकंे लिखीं।

(II) प्रेसलर संशोधन - संयुक्त राज्य ने 1985 में परमाणु अप्रसार के लिए प्रेसलर कानून बनाया था, जिसे क्लिंटन प्रशासन द्वारा समाप्त करने का प्रयास सफल नहीं हो सका। प्रेसलर कानून के अन्र्तगत अमेरिका उस राष्ट्र को आर्थिक व सैनिक सहायता नहीं देगा जो परमाणु शक्ति बनने का प्रयास कर रहा हो। इसी कारण अमेरिका पाकिस्तान को  F-16 युद्ध विमान नहीं दे पा रहा है। क्लिंटन प्रशासन प्रेसलर कानून में संशोधन के लिए अभी भी प्रयत्नशील है।

(III) सी. राजगोपालाचारी - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी स्वतंत्रा भारत के प्रथम तथा अन्तिम (1948.50) भारतीय गवर्नर जनरल रहे। उन्होंने गांधीजी के साथ स्वतंत्राता संग्राम में भाग लिया। वह केन्द्र में मंत्राी (1950.51) तथा मद्रास के मुख्यमंत्राी (1952.54) रहे। 1959 में राज गोपालाचारी ने नया राजनीतिक दल ‘स्वतंत्रा पार्टी’ बनाया। उन्हें ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया। ‘यंग इण्डिया’ के सम्पादन के साथ-साथ राजगोपालाचारी ने अनेक पुस्तकें तमिल तथा अंग्रेजी में लिखीं।
(vi) जगजीवन राम - जगजीवन राम 1946 से 49 तक संविधान सभा के सदस्य रहे। 1952 के बाद वे लगातार सासाराम (बिहार) निर्वाचन क्षेत्रा से मृत्युपर्यन्त तक सांसद रहे। वह कांग्रेस सरकार के प्रारम्भ से ही मंत्राी रहे। कामराज योजना के अंतर्गत वे 28 माह तक मंत्राी पद पर नहीं रहे थे।  1977 में वे कांग्रेस से अलग हो गए और ‘कांग्रेस फाॅर डेमोक्रेसी’ नाम से पृथक् दल की स्थापना की। वह मोरारजी मंत्राीमंडल में भी सम्मिलित रहे। उसके पश्चात् 1980 से सरकार से अलग रहे। 6 जुलाई, 1986 को 78 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने अपना जीवन दलितों की सेवा में समर्पित कर दिया था।

 

प्रश्न 28. स्वतंत्राता आन्दोलन के सन्दर्भ में निम्नलिखित के महत्व की विवेचना करें।
(I) लखनऊ समझौता, 1916
(II) चैरीचैरा कांड 
(III) चम्पारन सत्याग्रह
(vi) नौ सेना विद्रोह, 1946
(V) गोलमेज काॅन्फ्रेंस

उत्तर - लखनऊ समझौता - 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य लखनऊ में समझौता हुआ। तिलक ने यह अनुभव किया कि बिना हिन्दू-मुस्लिम एकता के सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। अतः उन्होंने दोनों को साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लखनऊ समझौता हिन्दू-मुस्लिम एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन जैसा कि गांधीजी ने कहा, ”वह शिक्षित और धनी हिन्दुओं तथा शिक्षित और धनी मुसलमानों के बीच का एक समझौता था।” अतः स्पष्ट है कि हिन्दू मुसलमानों के आम व्यक्ति में भावनात्मक एकता उत्पन्न करने में असमर्थ रहा।

(II) चैरीचैरा कांड - 5 फरवरी, 1922 को असहयोग आन्दोलन के समय कस्बे में कांग्रेस के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस के साथ पुलिस ने दुव्र्यवहार किया जिससे जुलूस में सम्मिलित सदस्य उत्तेजित हो गए और थाने पर हमला बोल दिया। पुलिस ने गोली चला दी। भीड़ ने प्रत्युत्तर में थाने में आग लगा दी तथा पुलिसकर्मियों को बाहर नहीं निकलने दिया। इसमें 22 पुलिस कर्मी मारे गए। गांधजी ने इस घटना के तुरन्त बाद असहयोग आन्दोलन वापस लेने की घोषणा कर दी।
(III)चम्पारन सत्याग्रह - बिहार में चम्पारन में गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध कर रखा था जिसके तहत जमीन के 3/20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। बागान मालिकों ने नील की खेती तो बन्द कर दी, लेकिन किसानों के लगान आदि मनमाने ढंग से बढ़ाकर उत्पीड़न प्रारम्भ कर दिया। गांधीजी चम्पारन के राजकुमार के अनुरोध पर 1917 में चम्पारन पहुंचे तथा कमिश्नर के आदेश की अवज्ञा करके किसानों से मिले। सरकार ने एक आयोग गठित किया जिसमें गांधीजी ने बागान मालिकों को किसानों की 25 प्रतिशत रकम वापस करने को तैयार कर लिया। यह गांधीजी की बहुत बड़ी जीत थी।

(IV) नौ सेना विद्रोह, 1946 - 18 फरवरी, 1946 को मुम्बई में राॅयल इण्डियन नेवी के एच.एम.आई.एस. तलवार के  1100 नाविकों ने नस्लवादी भेदभाव और अखाद्य भोजन के प्रतिवाद में हड़ताल कर दी। नाविक विद्रोह के परिणाम-स्वरूप मुम्बई की जनता उत्तेजित हो गई और उसने नाविकों का समर्थन करते हुए भारी तोड़-फोड़ की, मद्रास, विशाखापत्तनम, कलकत्ता, दिल्ली, कोचीन, जामनगर, अण्डमान आदि में भी सांकेतिक हड़तालें हुईं। ब्रिटिश सरकार ने यद्यपि इस विद्रोह को दबा दिया, लेकिन यह जन-चेतना एवं निर्भीकता की एक सशक्त अभिव्यक्ति थी। इस आन्दोलन की समाप्ति के लिए कांग्रेस नेताओं ने भी अपील की थी।

(V) गोलमेज काॅन्फ्रेंस - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में तीन गोलमेज काॅन्फ्रेंस लन्दन में 1930, 1931 तथा 1932 में सम्पन्न हुए जिसमें से केवल दूसरे काॅन्फ्रेंस में गांधीजी ने कांग्रेस की ओर से भाग लिया। प्रथम गोलमेज काॅन्फ्रेंस के पश्चात् गांधी इरविन समझौता हुआ। द्वितीय गोलमेज काॅन्फ्रेंस में गांधीजी की बातों को स्वीकार नहीं किया गया अतः गांधीजी निराश होकर वापस लौट आए। इसके पश्चात् सरकार ने दमनात्मक कार्यवाही प्रारम्भ की। तृतीय गोलमेज काॅन्फ्रेंस में कांग्रेस सरकार के दमनात्मक रवैये के विरोध में भाग नहीं लिया। इसके पश्चात् 1935 का भारतीय विधेयक पारित किया गया।
 

प्रश्न 29. होमरूल आंदोलन में एनी एसेंट की भूमिका को स्पस्ट कीजिए।

उत्तर - मिन्टो मोरले सुधारों.1909 से उपजी निराशा और असंतोष से भारत के स्वतंत्राता संग्राम आंदोलन में और अधिक उग्रता आयी और इसी के परिणाम स्वरूप 1916 में होमरूल का विचार भारत में सर्वप्रथम एनी बेसेन्ट ने प्रस्तुत किया। ‘होमरूल’ की अवधारणा मूल रूप से आयरलैंड में चलाए जा रहे इसी प्रकार के आंदोलन से ली गयी थी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रायः इस पर चर्चा होती रही थी। 1914 में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने सामूहिक रूप से नरमपंथियों और गरमपंथियों को एक ही  मंच पर लाकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशक्त विरोध प्रदर्शित करने का प्रयास किया जो सफल नहीं हो सका। एनी बेसेंट ने नपे-तुल चरणों में सुधारों को लागू करके कांग्रेस को ‘होमरूल’ का लक्ष्य प्राप्त करने में देरी करने की नीति का पालन किया, जबकि तिलक के लिए होमरूल का अर्थ ‘प्रतिनिधि सरकार’ ही था। एनी बेसेंट ने 1916 में मद्रास में होमरूल लीग की स्थापना की। होमरूल के विचार ने भारतीयों को कांग्रेस के सुधारवादी कार्यक्रम की अपेक्षा अधिक प्रभावित किया। सभी बड़े नेता अपने-अपने नगरों में गठित होमरूल इकाइयों के प्रमुख बने कुछ देशी राजाओं ने भी इसे अपना समर्थन दिया, आम आदमियों के लिए होमरूल का अर्थ स्व-सरकार ही था। इस आंदोलन में प्रचार के नए साधनों-समाचार पत्रों, पम्फलेट्स, पोस्टरों, पोस्टकार्डों, नाटकों, धार्मिक गीतों आदि का प्रयोग किया गया। सार्वजनिक सभाएं आयोजित की गयीं। राजनीतिक जागरूकता से पिछड़े क्षेत्रों की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इसी आंदोलन की सफलता के आधार पर एनी बेसेंट को सन् 1917 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। होमरूल लीग के अनुयायियों का विश्वास था कि भारत ने प्रथम विश्व युद्ध में जिस प्रकार अंग्रेजों को सहयोग दिया है उसके आधार पर उन्हें स्वशासन का अधिकार मिलना चाहिए। होमरूल लीग में संगठन के अभाव, 1917.18 में उपजी साम्प्रदायिकता आदि के चलते यद्यपि इस आंदोलन को तात्कालिक रूप से कोई सफलता नहीं मिली, लेकिन इस आंदोलन ने 1919 के मोन्टग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया, देश को गांधीवादी राजनीतिक आंदोलन के लिए प्रारम्भिक तौर पर तैयार किया गया तथा आने वाले दिनों में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन को नई दिशा एवं स्फूर्ति प्रदान की।   
 

प्रश्न 30. विद्यालय में शारीरिक शिक्षा के क्या उद्देश्य है?

उत्तरः विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा के निम्न उद्देश्य होते है -
1. बालक की शारीरिक क्षमताओं का विकास करना। 2. शारीरिक क्रियाओं एवं मांसपेशियों से सम्बन्धित क्रियाओं में कुशलता का विकास करना। 3. खेल-कूद तथा शारीरिक व्यायाम के प्रति अभिरुचि एवं वांछित अभिवृत्तियाँ विकसित करना। 4. बालक के शरीर के विभिन्न अंगों को सम्पुष्ट बनाना। 
विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा का कार्यक्रम बनाते समय निम्नांकित बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। 
(i) विद्यालयों में शारीरिक कार्यक्रम बालकों की शारीरिक क्षमताओं एवं अभिरुचियों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए। 
(ii) इस कार्यक्रम में देश के परम्परागत खेलों एवं शारीरिक व्यायामों की विधियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए। 
(iii) ग्रामीण क्षेत्रों के खेलों आदि का भी इन कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए। 
(Vi)   इन कार्यक्रमों की योजना बनाते समय स्थानीय परिस्थितियों एवं उपलब्ध साधनों, खेल के मैदान आदि को भी दृष्टि में रखना चाहिए। 
(V) ऐसा कार्यक्रम बनाना जिसमें विद्यालय के सभी छात्रा किसी न किसी रूप में उसमें सक्रिय भाग ले सकें। 
(vi) विभिन्न ऋतुओं एवं मौसम के अनुरूप विभन्न कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए।
(vii) इन कार्यक्रमों के आयोजन में भी प्रजातांत्रिक परम्पराओं का निर्वाह किया जाना चाहिए। 

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