सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 3 (प्रश्न 12 से 22 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 3 (प्रश्न 12 से 22 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 12 : निम्नलिखित में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए।

(क) भारत के विभिन्न क्षेत्रों के अल्प विकास के भौगोलिक-आर्थिक कारण क्या हैं?
(ख) भारत के किन क्षेत्रों को अकाल पीड़ित चुना गया है? इस चुनाव के आधार क्या हैं?
(ग) भू-शास्त्राीय उत्क्रांति एवं थलाकृतीय अवस्थाओं में, अंडमान तथा निकोबार द्वीप एवं लक्षदीप किस प्रकार भिन्न हैं? 
उत्तर :(क) :
भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अनेक प्रकार की विशिष्टताएं एवं विषमताएं विद्यमान हैं जिनके  परिणामस्वरूप देश के कतिपय क्षेत्रा विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं। बिहार, उड़ीसा, पूर्वोत्तर सीमा प्रान्त, आंध्र प्रदेश के कुछ भाग आदि आज अत्यधिक अल्पविकसित हैं तो इसके लिए निम्नलिखित भौगोलिक आर्थिक कारण उत्तरदायी हैं।
(i)       पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल, असम आदि राज्यों में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ें।
(ii)      उड़ीसा, गुजरात के कुछ भागों, राजस्थान के कुछ भागों में लगभग प्रतिवर्ष पड़ने वाला सूखा।
(iii)     पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में भूमिगत जल संसाधनों का विदोहन न हो पाने से वर्षाधीन खेती की अधिकता।
(iv)     पिछड़े राज्यों में कमजोर आधारिक संरचना।
(v)     देश के निबल बोए गए क्षेत्राफल का लगभग 65 प्रतिशत अभी भी असिंचित रहना।
(vi)     पूर्वोत्तर सीमा प्रांतों तथा अन्य अल्प-विकसित क्षेत्रों में कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास न हो पाना।
(vii)   जल विद्युत विकास की ओर कम ध्यान दिया जाना।
(viii)  तीव्र जनसंख्या वृद्धि से उपजा बेरोजगार।

(ख) भारत में सिंचाई पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। यह मानसून औसतन 5 वर्ष पर एक बार सूखे एवं अकाल की स्थिति उत्पन्न कर देता है। भारत के कुल क्षेत्राफल का लगभग 35% भाग सूखा के क्षेत्रा में आता है। इसमें वह क्षेत्रा भी शामिल नहीं है जहां 75 सेमी के लगभग वार्षिक वर्षा होती है और सिंचाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है। सूखा खेत्रा के अंतर्गत पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग का 0.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रा अहमदाबाद, जालंधर और कानपुर, कोयम्बटूर, तिरुनेवेल्ली, कच्छ और सौराष्ट्र, कालाहांडी, पुरुलिया और मिर्जापुर का पठार आदि आते हैं। स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा सूखा 1973 में पड़ा था, जिसने आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और बिहार को सम्मिलित रूप से अपनी चपेट में ले लिया था।

(ग) बंगाल की खाड़ी में दक्षिण-दक्षिण-पूर्व की ओर चापाकार प्रवृत्ति में 6° 45" तथा 14° उत्तरी अक्षांश तथा 92° एवं 94° पूर्व देशांतर रेखाओं के बीच स्थित अंडमान तथा निकोबार द्वीप मुख्यतः निमग्न पर्वतों के उन्नत भाग हैं इन द्वीपों के उपांत क्षेत्रों में प्रवाल भित्तियां हैं। पूर्व और पश्चिम दोनों ही के तट भ्रगुमय हैं और उसमें खाड़ियां बहुत कम हैं। दक्षिण अंडमान में समान्तर कटक और घाटियां बिखरी हुई हैं। ये श्रेणियां बलुआ पत्थर के करंड अपक्षयन से बनी हैं। यहां सबसे ऊंची पहाड़ी मांउट हैरियत है जिसके दक्षिण में बिखरा तटीय क्षेत्रा अत्यधिक दंतु रहित है। अण्डमान के पश्चिम में कई छोटे-छोटे द्वीप हैं जो चूना पत्थर के बने हैं तथा अपक्षरण द्वारा पैनी शिखिरकाओं के रूप में ढल गए हैं। निकोबार द्वीप उपांतीय शेल भित्तियांे से घिरा हुआ है दक्षिण और पूर्व में चैरस तथा बालुकामय तट है, जबकि उत्तरी तट पर शैल के दृश्यांश हैं और उनमें वलमति संरचना दृष्टिगोचर होती है।
लक्षद्वीप भारत के पश्चिमी तट से लगभग 200-320 किमी दूर 8° से 12° उत्तर और 71° 40श् से 74° पूर्वी देशान्तरों के बीच फैले हैं यह मुख्य रूप से प्रवालों तथा अरोलों का द्वीप हैं अनुमान किया जाता है कि ये द्वीप समूह अरावली पर्वत माला के ही अवशेष हैं जो प्राचीनकाल में हिमालय के पश्चिमी भाग से लेकर यहां तक फैली हुई थी। ये एक डूबे हुए पर्वत के अंश हैं जिसकी उत्पत्ति भित्तियों के पूर्वी भाग से मानी जाती है। ये मूंगे के द्वीप हैं। इनके तटों के बहुत निकट उपांतीय शैलभित्तियां विद्यमान हैं।

 

प्रश्न13 : छोटी सिंचन योजना में क्या अनुस्यूत है?

उत्तर : दो हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि से कम क्षेत्राफल पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने वाली सिंचाई परियोनाओं को छोटी सिंचन परियोजना कहा जाता है।

प्रश्न 14 : पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन से क्या तात्पर्य है?

उत्तर : ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा परमाणु विकिरण से वनस्पतियां एवं जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करने की योजना पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन की योजना कहलाती है। 

प्रश्न 15 : भारत में भूमि सुधारों पर अपना मूल्यांकन दीजिए

उत्तर : स्वाधीनता संग्राम में देश के किसान समुदाय ने राष्ट्रवादी तत्वों का भरपूर साथ दिया था। इसलिए स्वतंत्रा भारत के आर्थिक विकास में उन्हें बराबर का सहयोगी बनाने के लिए जमींदारी प्रथा को समाप्त करना आवश्यक समझा गया। इसलिए सरकार और समाज के स्तर पर भूमि सुधार के लिए व्यापक प्रयत्न किए गए हैं, जैसे:
1. बिचैलियों को समाप्त करना तथा बटाईंदारों को सीधे सरकार के संपर्क में लाना।
2. काश्तकारों को जमीन का मालिक बनाना।
3. भूस्वामित्व प्रणाली में सुधार लाकर समतामूलक समाज बनाना।
4. ग्रामीण गरीबों को जमीन दिलाकर उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाना।
5. स्थानीय संस्थाओं में समानता की भावना विकसित करना।
6. जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना।
7. फालतू भूमि का पुनर्वितरण।
8. कृषि जोतों की चकबंदी।
9. भूमि अभिलेखों को अद्यतन बनाना।
भूमि सुधारों को आर्थिक विकास की मुख्यधारा से पृथक रखकर लागू किया गया तथा भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न अंशों पर जोर डाला गया। अतः भूमि सुधार हेतु अनुकूल वातावरण नहीं बन पाया। चकबंदी कार्यक्रम को बिना ग्रामीण अधःसंरचना को विकसित किए लागू किया गया। भूमि सुधारों के अधिकांश अधिनियम राज्यों द्वारा तुरंत लागू न करके कुछ समय उपरांत लागू किए गए। इस दौरान समृद्धशाली मध्यस्थ भूमि को अपने परिवारजनों के नाम हस्तांतरित करके कानूनों की सीमा से बच निकले। इस सबके बावजूद यह संतोष का विषय है कि भूमि सुधारों के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता विभिन्न स्तरों पर आज भी बरकरार है। आठवीं योजना में भूमि सुधारों पर फिर जोर देते हुए निम्नलिखित लक्ष्य स्पष्ट किए गए थे:
1. समानता पर आधारित सामाजिक ढांचा विकसित करने के लिए कृषि संबंधों की पुनर्रचना।
2. भूमि संबंधों में शोषण को समाप्त करना।
3. “भूमि जोतने वालों की“ के नारे को चरितार्थ करना।
4. निर्धन ग्रामीण लोगों के भूमि आधार को व्यापक बनाकर उनका आर्थिक तथा सामाजिक स्तर ऊंचा करना।
5. निर्धन ग्रामीणों के भूमि आधारित विकास में और तेजी लाना।
6. स्थानीय निकायों में और अधिक समानता का संचार करना।
अब 81वें संविधान संशोधन के द्वारा कृषि सुधारों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर लिए जाने से इन कानूनों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। इस उपाय से भूमि सुधारों लागू करने में निश्चय ही मदद मिलेगी। भूमि सुधारों के बिना गांवों से गरीबी दूर करना और आर्थिक विषमता कम करना कठिन है। भूमि सुधार कानूनों पर अमल न हो पाने के कारण ही गरीबी उन्मूलन के अब तक के सभी प्रयास अपर्याप्त सिद्ध हुए हैं। वास्तव में ग्रामीण गरीबों की दशा सुधारने के लिए भूमि सुधारों की महत्ता सर्वव्यापी है और इसके बिना हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कोई मूलभूत बदलाव लाना संभव नहीं है।

 

प्रश्न 16 : निम्नलिखित में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए।

(क) भारत में मानसून की उत्पत्ति का वर्णन करें।
(ख) भारत सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए क्या उपाए किए हैं। 

उत्तर : (क) : भारत की जलवायु में मानसून की प्रधानता देखी जाती है। भारतीय मानसून की उत्पत्ति का मूल कारण जलभाग और स्थलभाग का पारस्परिक संबंध है। ग्रीष्म ऋतु में जब उत्तर-पश्चिम भारत में अत्यधिक तापमान के कारण वायु का कम दाब होता है तब निकटवर्ती अरब सागर पर वायु का अधिक दाब होता है जिससे सागर से स्थल की ओर वायु चलने लगती है। दक्षिणी गोलार्द्ध के वाणिज्य पवन विषुवत रेखा तक द.-पू. से चलते हैं पर इसके उत्तर हिन्द महासागर में द.प. दिशा से भारत के कम दाब क्षेत्रा की ओर चलने लगते हैं। हजारों किलोमीटर की समुद्री यात्रा करने के बाद भारत भूमि पर पहुंचने के कारण ये जलवाष्प से भरे होते हैं। हिमालय की अत्यधिक ऊंचाई इन्हें उत्तर की ओर नहीं जाने देती। उन दिनों में पर्वतों व पहाड़ियों की स्थिति वर्षा वितरण  निर्धारित करती है।
जाड़े की ऋतु या शीतकालीन में परिस्थितियां विपरीत हो जाती हैं। सूर्य दक्षिणायन होता है और तापमान में कमी आ जाती है। स्थल पर कम दाब की जगह अधिक दाब हो जाता है, जिससे स्थल से सागर की ओर पवन चलने लगती है। इन पवनों को भूमध्यसागरीय प्रदेश के चक्रवातों से मदद मिलती है। शुष्क होने के कारण यह पवन बहुत कम वर्षा कराती है। हिमालय के कारण मध्य एशिया के अधिक दाब क्षेत्रा से चलने वाले शीत पवन भारत नहीं पहुंच पाते। भारत के इन दो मानसूनों को क्रमशः “गर्मी का मानसून“ तथा “जाड़े का मानसून“ कहा जाता है। भारतीय मानसून की उत्पत्ति के संबंध में भारतीय विशेषज्ञों द्वारा हाल ही में यह पता लगाया गया कि ग्रीष्मकालीन मानसून अरब सागर से जल लाता है न कि हिन्द महासागर से है। आधुनिक जलवायु विशेषज्ञों ने नया सिद्धांत प्रतिपादित करके यह बताया कि यह ऊपरी वायुमंडल के संचालन से प्रभावित है।
क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा पर अतितीव्र जेट पवनें चला करती हैं। हिमालय के उत्तर में पश्चिमी जेट पवन शक्तिशाली होती है। जब पूर्वी जेट पवन भारत के पश्चिमी भाग में उत्पन्न निम्न दाब गर्त के निकट आते हैं तो ठीक इसी समय निम्न वायुमंडल में मानसून का प्रस्फोट होता है। जब ये जेट पवन धीमे पड़ते हैं तो ग्रीष्मकालीन मानसून भी शक्तिहीन हो जाता है। 

(ख) भारत सरकार का कल्याण मंत्रालय आदिवासी विकास व कल्याण हेतु संपूर्ण नीति निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन तथा समन्वय के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस मंत्रालय द्वारा आदिवासियों के विकास के लिए निम्नलिखित योजनाएं चलाई गई हैं:

केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं : केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं में निम्नलिखित योजनाएं चलायी गई हैं:
1. जनजातीय विकास खंड, 2. सहकारिता 3. महिला छात्रावास 4. मैट्रिक के बाद छात्रावृत्ति 5. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग तथा पूर्व प्रशिक्षण योजनाएं 6. शोध, प्रशिक्षण एवं विशेष परियोजनाएं।
राज्य की योजनाएं : राज्य की ओर से निम्नलिखित क्षेत्रों में योजनाएं चलाई गई हैं:
शिक्षा : मैट्रिक पूर्व छात्रावृत्ति, वृत्ति, आवास, अनुदान, छात्रावास, निःशुल्क पुस्तकों की सुविधा, स्टेशनरी, वर्दी तथा दोपहर का भोजन,
आर्थिक विकास : कृषि कार्यों के लिए बीज, खाद आदि पर सब्सिडी, कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना पुनर्वास, संचार, पशुपालन, उद्यान विज्ञान, मत्स्य पालन, नहर से सिंचाई तथा मृदा संरक्षण आदि।
स्वास्थ्य, आवासीय तथा अन्य : इसके तहत आवास, पीने का पानी, मेडिकल तथा जन स्वास्थ्य, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां एव स्वैच्छिक संस्थाओं को सहायता देना प्रमुख है। इन  उपरोक्त विकास कार्यक्रमों का सकारात्मक प्रभाव आदिवासियों पर पड़ा है।

प्रश्न 17 : निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

(क) ब्रिटिश शासनकाल में ‘धन-निर्गम’ से आप क्या समझते हैं? भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके क्या प्रभाव पडे़?
(ख) ‘धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्रा में राजा राममोहन राय का नाम सर्वोपरि है’ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (क) ब्रिटिश शासनकाल में धन निर्गम का तात्पर्य था विभिन्न तरीकों से:सरकार को दी गई भेंट, अधिकारियों के वेतन-भत्ते, लगाई पूंजी पर मुनाफा, ऋण के मूल व सूद का भुगतान आदि, भारत के धन का देश से निकलकर इंग्लैंड पहुंचना। इस नीति के परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। भारतीय कृषि तथा हस्तशिल्प का अन्त करके इसने भारत में गरीबी, भुखमरी तथा अकाल की स्थिति पैदा की।

(ख) ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय (1774.1833) ने धर्म को तर्कसंगत बनाने का मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और अन्धविश्वासों का खण्डन करते हुए तथा एकेश्वरवाद का समर्थन करके प्रयास किया। उन्होंने सभी धर्मों का समन्वय प्रस्तुत करने की चेष्टा की। सामाजिक क्षेत्रा में सती प्रथा का विरोध में विधवा विवाह का समर्थन, बहुविवाह, जातिवाद, वेश्यागमन आदि कुरीतियों की आलोचना उनका मुख्य कार्य था। धार्मिक-सामाजिक सुधारों के वह अग्रदूत तथा प्रगतिशील पथ के अनुगामी थे। इसलिए उन्हें सर्वोपरि माना गया।

प्रश्न 18 : (क) निम्नलिखित के मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए:

(I) चैत्य (II) विजयनगर कला (III) यक्षागन (IV) ख्याल
(ख) निम्नलिखित के विषय में आप क्या जानते हैं?
(V) ललित कला अकादमी (VI) पूना सार्वजनिक सभा
(VII) रौलेट एक्ट (VIII) अगस्त 1917 की घोषणा
(ग) निम्नलिखित कहां स्थित हैं और किन घटनाओं से सम्बन्धित हैं?
(IX) सूरत (X) वैकोम (XI) मिदनापुर
(घ) निम्नलिखित किस लिए प्रसिद्ध हुए?
(XII) श्यामजी कृष्णवर्मा (XIII) रानी गैडिनल्यू
(XIV) सैफुद्दीन किचलू (XV) डाॅ. निवेदिता भसीन

उत्तर : (I) चैत्य : बौद्ध मन्दिर को जिसमें मूर्ति के स्थान पर लघु-स्तूप स्थापित होता है, चैत्य कहा जाता है।
(II) विजयनगर कला : वियजनगर शासकों के संरक्षण में विकसित होने वाली स्थापत्य कला (हजारा व विट्ठलस्वामी के मन्दिर) को दिया गया नाम। विशाल अलंकृत मंडप और गोपुर, पुष्प-पोटिका, अनियोत्तिकल विजयनगर शैली की प्रमुख विशेषताएं थीं। विजयनगर शैली के कल्यान और उत्सव मंडप अलंकरण के लिए विख्यात हैं।
(III) यक्षगान:आन्ध्र प्रदेश में प्रचलित एक नाट्य शैली है। इसे ‘भगवताराअता’ भी कहते थे। आरम्भ में इस शैली का प्रयोग कृष्ण कथाओं के लिए किया जाता था, किन्तु कालान्तर में दस अवतारों को चित्रित करने में इसका प्रयोग होने लगा। यक्षगान में कथानक का वर्णन संगीत, नृत्य एवं अभिनय के द्वारा किया जाता है।
(IV) ख्याल:यह एक स्वर प्रधान गायन शैली है। ख्याल का अर्थ है। ‘कल्पना’ अर्थात् विविध प्रकार की शब्द रचना के अन्तर्गत समयानुकूल स्वरों के माध्यम से अपना भाव प्रकट करना। इसका प्रचार-प्रसार शर्की सुलतानों के काल में अधिक हुआ। इसे शास्त्राीय स्वरूप प्रदान करने का श्रेय सदानन्द नियामत खां ;18वीं शताब्दी) को जाता है। ख्याल की भाषा बृजभाषा, राजस्थानी, पंजाबी व हिन्दी होती है। ख्याल तीन प्रकार के होते हैं:
(I) विलम्बित ख्याल, (II) मध्य ख्याल तथा, (III) द्रुत ख्याल

(ख) (V)ललित कला अकादमी : देश-विदेश में भारतीय कला की समझ बढ़ाने और इसका प्रसार करने के लिए भारत सरकार ने 1954 में नई दिल्ली में ललित कला अकादमी की स्थापना की थी। अपनी गतिविधियां विकेन्द्रित करने की दृष्टि से अकादमी ने प्रादेशिक केन्द्र स्थापित किए हैं। सामुदायिक कलाकार स्टूडियो परिसर भी बनाया है। चित्राकला, मूर्तिकला, प्रिंट बनाने और चीनी मिट्टी के काम पर कार्यशालाओं की सुविधा भी है। प्रदर्शनियों का आयोजन, पत्रिकाएं एवं जनरल भी प्रकाशित कराए जाते हैं जिनका सम्पादन कला विशेषज्ञ करते हैं।
(VI) पूना सार्वजनिक सभा: पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना सुधार कार्य एवं सरकार व जनता के मध्य सेतु रूप में कार्य करने हेतु रानाडे ने 1867 में की।
(VII) रौलेट एक्ट : मार्च 1919 में पारित इस एक्ट के द्वारा, जो असहयोग का कारण बना, व्यक्ति को शरीर तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता से वंचित कर दिया गया।
(VIII) अगस्त 1917 की घोषणा : प्रशासन का भारतीयकरण, स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास तथा उत्तरदायी शासन की स्थापना इस घोषणा के मुख्य सिद्धान्त थे।

(ग) (IX) सूरत : गुजरात में स्थित समुद्रतटीय नगर 1907 के कांगे्रस अधिवेशन तथा फूट के लिए जाना जाता है।
(X) वैकोम : त्रावणकोर राज्य में स्थित यह स्थान 1924.25 में माधवन तथा के लप्पन के नेतृत्व में हुए मन्दिर प्रवेश आन्दोलन के लिए प्रसिद्ध है।
(XI) मिदनापुर : मिदनापुर पश्चिम बंगाल मंे स्थित है। यहां पर 1902 के लगभग सर्वप्रथम क्रान्तिकारी ग्रुप की स्थापना हुई

(घ) (XII) श्यामजी कृष्ण वर्मा : इंग्लैंड में बसे क्रान्तिकारी जिन्होंने ‘इण्डिया हाउस’ का निर्माण इण्डियन होमरूल सोसाइटी की स्थापना तथा ‘सोश्योलाॅजिस्ट’ का प्रकाशन किया।
(XIII) रानी गैडिनल्यू : सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नागा संघर्ष का नेतृत्स किया तथा वर्षों जेल में रहीं।
(XIV) सैफुद्दीन किचलू : सैफुद्दीन किचलू पंजाब के प्रमुख नेता। रौलेट एक्ट का विरोध करने में जिनकी गिरफ्तारी के विरुद्ध तीखी जन-प्रतिक्रिया ने पंजाब में दमन चक्र व जलियांवाला बाग कांड को जन्म दिया।
(XV) डाॅ. निवेदिता भसीन : भारत में इण्डियन एयरलाइन्स में महिला पायलेट निवेदिता भसीन ने 1986 में एफ.27 विमान की सिल्चर से कलकत्ता तथा 1989 में बोइंग.737 की मुम्बई से गोआ तक सौदामिनी देशमुख के साथ मिलकर कप्तानी संभालते हुए सफल उड़ान पूरी की।

प्रश्न 19 :भारत के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन पर ब्रिटिश शासन के प्रभाव की विवेचना कीजिए?

उत्तर : भारत की सामाजिक तथा आर्थिक दोनों ही दशाएं ब्रिटिश शासन से प्रभावित हुईं। हालांकि अंग्रेजों के आगमन के साथ ही भारतीय समाज का जो भी वर्ग उनके सम्पर्क में आया, उनसे प्रभावित हुआ। तथापि ब्रिटिश प्रशासन का भारतीय समाज और संस्कृति से सीधा प्रभाव 1813 ई. के बाद ही प्रारंभ हुआ।
सामाजिक प्रभाव: भारतीय समाज दो तरीकों से अंग्रेजों द्वारा प्रभावित हुआ, यथा पश्चिमी विचारधारा से सम्पर्क के कारण होते पुनर्जागरण आंदोलनोें और ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों द्वारा। यद्यपि ब्रिटिश शासन का भारतीय समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा, लेकिन साथ ही साथ नकारात्मक पहलू हो भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज में तर्क और विज्ञान में विश्वास पैदा हुआ; पश्चिमी उदारवाद और समाजवाद की भावना विकसित हुई। समानता की भावना पैदा हुई और राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। पश्चिमी शिक्षा के सम्पर्क में आने पर अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित हुआ। समाज सुधार आंदोलनों एवं गैर ब्राह्मण आंदोलनों के कारण जाति प्रथा और छुआछूत का विरोध हुआ। ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर सती प्रथा, बाल हत्या एवं बाल विवाह को अवैध घोषित किया और विधवा विवाह को कानूनी दर्जा प्रदान किया।
हालांकि समाज सुधार आंदोलनों और ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों से भारतीय समाज पर सतही प्रभाव पड़ा, लेकिन इनकी जड़ें इतनी गहरी थीं कि बाद में इनका भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

आर्थिक प्रभाव:चूंकि ब्रिटिश प्रशासन का मूल उद्देश्य भारत का आर्थिक दोहन कर इंगलैंड को समृद्ध बनाना था। इसी कारण ब्रिटिश नीतियों का भारत की आर्थिक दशा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े:
(i) कच्चे माल के निर्यात और तैयार माल के आयात के कारण भारतीय उद्योग नष्ट हो गए और दस्तकार एवं शिल्पकार बर्बाद हो गए।
(ii) स्वावलम्बी ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई और भारत कृषि उपनिवेश बन गया।
(iii) कृषि की अवनति और वाणिज्यीकरण के साथ ही किसानों की आर्थिक दशा दयनीय हो गई और वे जमींदारों के बंधुवा मजदूर और महाजनों के कर्जदार बनकर रह गए।
(iv) पुराने जमींदार के स्थान पर नए जमींदारों का उदय हुआ।
(v) पश्चिम औद्योगिक क्रांति के कारण भारत में नए उद्योगों के विकास के साथ ही मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ।
संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि भारत दरिद्रता, अकाल और अंसतोष का पर्यान बन कर रह गया था।

प्रश्न 20 : नेहरू की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत क्या थे? उन्हें अपनी विदेश नीति में कहां तक सफलता मिली?

उत्तर : नेहरूजी की विदेश नीति विश्व शांति की स्थापना एवं भाई-चारे की भावना पर आधारित थी। अपनी विदेश नीति को कार्यरूप देने के लिए उन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति और पंचशील सिद्धांत का अवलम्बन लिया।
जिस समय भारत स्वतंत्रा हुआ। उस समय सम्पूर्ण विश्व दो विरोधी गुटों में विभाजित था। जवाहरलाल यह अच्छी तरह जानते थे कि विश्व एवं भारत तभी समृद्ध एवं शांतिप्रिय बन सकते हैं जब वह इस गुटबाजी से दूर रहें, अतः उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलनों का श्रीगणेश किया। इस आंदोलन का सीधा उद्देश्य विश्व शांति और राष्ट्र हित के साथ-साथ शीत युद्ध की भीषणता को समाप्त करना था जिसमें विश्व की महाशक्तियां झुलसी जा रही थीं। इस आंदोलन की शुरूआत 1961 ई में हुई और इसका प्रथम अधिवेशन बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में हुआ। जिसमें जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो और नासिर सहित 25 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विश्व शांति के साथ-साथ भारत-चीन सम्बन्धों को मैत्राीपूर्ण एवं स्थायी बनाने के लिए भी प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत 1954 ई. में भारत-चीन समझौते के दौरान प्रतिपादित किया। पंचशील सिद्धांत थे:
(i)एक-दूसरे की अखंडता और स्वतंत्रा सत्ता को स्वीकार करना।
(ii) एक-दूसरे पर आक्रमण न करना।
(iii) समानता का व्यवहार करना।
(iv) एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
(v) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रमुखता देना।
हालांकि पंचशील सिद्धांतों को चीन ने स्वीकार तो किया, लेकिन चीन ने इन सिद्धांतों पर अमल नहीं किया और 1962 ई. में भारत पर आक्रमण कर तिब्बत एवं कश्मीर के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया। अतः यह कहा जा सकता है कि भारत-चीन समझौता एकपक्षीय ही रहा, जिस पर केवल भारत ही अमल करता रहा जहां तक भारत-चीन सम्बन्धों का प्रश्न है नेहरूजी की विदेश नीति असफल रही।
इन दो मुख्य सिद्धांतों के अतिरिक्त नेहरूजी की विदेश नीति के अन्य तत्व थे: साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध, अंतर्राष्ट्रीय बंधुत्व, अन्य देशों से मैत्राीपूर्ण राजनीतिक एवं आर्थिक सम्बन्ध और संयुक्त राष्ट्र संघ की शक्ति को मजबूती प्रदान करना।
उपर्युक्त सिद्धांतों को अपनाने के कारण और भारतीय हितों को सर्वाेपरि रखने के कारण पं. नेहरू की न केवल देश में, बल्कि विदेशों में लोकप्रियता बढ़ी और वे विश्व विभूति के रूप में पहचाने जाने लगे, लेकिन उनके अथक प्रयासों के बावजूद शीत युद्ध भयंकर तम होता गया और हथियारों की दौड़ बढ़ती गई तथा पाकिस्तान एवं चीन के भारत के साथ मैत्राीपूर्ण सम्बन्ध न रह सके। अतः नेहरू की विदेश नीति की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लग गया, लेकिन उनकी नीति इतने उच्च आदर्शों पर आधारित थी कि बाद में जो विदेश नीति निर्धारित की गई, उसके भी वही आदर्श रहे।

 

प्रश्न 21: निम्नलिखित पर टिप्पणियां लिखिए:
(क) सविनय अवज्ञा आंदोलन
(ख) भारत सरकार अधिनियम 1935 के अन्तर्गत प्रान्तीय स्वायत्तता 

उत्तर : (क) सविनय अवज्ञा आंदोलन : सविनय अवज्ञा आंदोलन  12 मार्च, 1930 ई. को डांडी मार्च के साथ प्रारंभ हुआ और 6 अप्रैल, 1930 ई. को डांडी में समुद्र जल से नमक बनाने के साथ ही आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। अब भारत में विभिन्न स्थानों पर भारतीयों द्वारा नमक बनाकर सरकार की अवज्ञा की जाने लगी। इस आंदोलन के दौरान ब्रिटिश कानूनों को तोड़ा गया। बंगाल एवं बिहार में चैकीदारी कर का विरोध किया गया। विदेशी वस्त्रों, स्कूलों एवं सरकारी नौकरियों का बहिष्कार किया गया और साथ ही साथ स्वाधीनता की मांग को बुलंद किया गया।
यह अहिंसात्मक आंदोलन 1931 ई. तक चला। आंदोलनकारियों को ब्रिटिश सरकार के दमन चक्र का सामना करना पड़ा। सरकार ने सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसाईं। गोलियां की बौछारें और उन्हें गिरफ्तार कर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया, लेकिन यह निर्बाध गति से चलता रहा। गांधी-इरविन समझौते के साथ ही आंदोलन स्थगित कर दिया लेकिन 1932 ई. में इसे पुनः प्रारम्भ कर दिया गया।

(ख) भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतगर्त प्रान्तीय स्वायत्तता: भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत प्रांतों को नई कानूनी मान्यता देतेहुए उन्हें काफी हद तक स्वायत्तता प्रदान कर दी गई और प्रांतों को भारत सरकार के पर्यवेक्षण एवं नियंत्राण से मुक्त कर दिया गया। प्रांतों को प्रदान की गई स्वायत्तता एवं स्वतंत्राता मात्रा दिखावा ही रही, क्योंकि प्रांतों को अधिकार एवं शक्ति ब्रिटिश क्राउन से प्राप्त होते थे, प्रांतों की समस्त कार्यकारी शक्तियां गवर्नर के हाथों में निहित थीं। हालांकि प्रांतों का समस्त कार्य मंत्रिमंडलों द्वारा चलाया जाता था, लेकिन मंत्री गवर्नर के प्रति उत्तरदायी होते थे। हालांकि गवर्नर मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करता था, लेकिन उसे स्वविवेक से निर्णय लेने का अधिकार था। गवर्नर का बजट के 40% भाग पर नियंत्राण था और वह मंत्रियों को पदच्युत कर प्रांतों का शासन अपने हाथों में ले सकता था। गवर्नर सदैव ब्रिटिश क्राउन के निर्देशानुसार कार्य करता था।
अतः व्यावहारिक तौर पर प्रांतों को भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा कोई स्वायत्तता प्रदान नहीं की गई, लेकिन इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता का मार्ग अवश्य ही प्रशस्त किया।

प्रश्न 22 : नेतृत्व किसे कहते हैं? नेतृत्व की प्रवृति को किस प्रकार समझा जा सकता है?        

उत्तर : किसी समूह विशेष पर नियन्त्राण करना या प्रभाव डालना ‘नेतृत्व’ कहलाता है। जब हम नेतृत्व को शिक्षा के सन्दर्भ में लेते हैं तो पाते हैं कि नेतृत्व के बहुत से कारक, उसकी सभी परिस्थितियों के लिए सामान्य होते हैं, किन्तु कुछ कारक विशिष्ट भी होते हैं। नेता एक समूह का प्रमुख सदस्य होता है जो समूह के व्यवहारों को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित करता है। लिलियम, क्लार्क और ट्रो के अनुसार ऐसे नेताओं का व्यक्तित्व जादू भरा होता है जो बुद्धिमता के स्थान पर मानवीय गुणों से परिपूर्ण होता है। कुछ विद्वान नेतृत्व को श्रेष्ठता के रूप में लेते हैं।
कुछ प्रमुख परिभाषाओं द्वारा नेतृत्व की प्रकृति को इस प्रकार समझा जा सकता है:
लेपियर तथा फान्र्सवर्थ के अनुसार,”नेतृत्व वह व्यवहार है जो दूसरे लोगें के व्यवहार को उससे भी अधिक प्रभावित करता है जितना कि सामान्य व्यक्तियों के व्यवहार, नेता को प्रभावित करते हैं।“
पिगर ने लिखा है,” नेतृत्व का तात्पर्य एक ऐसी दशा से है जिसमें एक या कुछ व्यक्ति विशेष परिस्थितियों में ऐसा स्थान ग्रहण कर लेते हैं कि उनकी इच्छाओं, निर्णयों, निर्देशनों के अनुसार चलना, अधिकांश व्यक्ति, अपने हित में समझने लगते है“। इससे यह स्पष्ट होता है कि नेतृत्व एक विशेष गुण है तथा जिन व्यक्तियों में इस गुण की प्रधानता होती है, उन्हीं को हम नेता कहते हैं।
सीमेन तथा माॅरिस का कथन है,”नेतृत्व का तात्पर्य उन क्रियाओं से है जो कुछ व्यक्तियों को एक विशेष दिशा में जाने की प्रेरणा देती है।“
उक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति समूहों को नेतृत्व प्रदान कर सकता है यदि वह:
1.    समूहों के कार्य, उद्देश्य और प्रयोजन को स्पष्ट करने में समूहों की सहायता करे।
2.    कार्य, उद्देश्य तथा प्रयोजन की प्राप्ति में समूहों की सहायता करे।
3.    सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता प्रदान करे।
समूह का जो मार्गदर्शक होता है, वही समूह का नेता होता है। नेता को नेतृत्व संबंधी अनेक क्रियाएं करनी पड़ती हैं। नेता को प्रमुख रूप से यह तय करना होता है कि क्या करना है और कैसे करना है। उसे विभिन्न स्रोतों तथा साधनों का परिस्थितिजन्य उपयोग भी करना पड़ता है।
जहाँ तक विद्यालयी नेतृत्व का प्रश्न है, सहयोगी सदस्य ही नेता के गुणों को मान्यता देते हैं, जबकि नेता उनकी आवश्यकताओं, आंकांक्षाओं तथा वरीयताओं को पूरा करता है। इस दृष्टिकोण से विद्यालय में प्रधानाध्यापक ही नेता होता है व कक्षा में शिक्षक नेता का पद सम्भालता है।
प्रधानाध्यापक एक नेता के रूप में पाठयक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रभावी अनुदेशात्मक कार्य को दिशा तथा गति प्रदान करता है। प्रधानाध्यापक ही भौतिक तथा मानवीय संसाधनों की व्यवस्था तथा नियंत्राण करता है। शिक्षा अनुदेशनों को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाने का दायित्व भी उसी का होता है। विद्यालय में अनुशासन स्थापना, पाठ्यक्रम-नियोजन, समुचित वातावरण निर्माण आदि से सम्बन्धित सुझाव देना, इनका क्रियान्वयन कराना, और विचारों को आदान-प्रदान प्रधानाध्यापक का ही कार्य होता है।

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