सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 4 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 4 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : निम्न पर व्याख्यात्मक टिप्पणियां लिखिये:
(i) भारत की नवीनतम जनसंख्या नीति
(ii) भारत सरकार का राजकोषीय घाटा

उत्तर  : 
(i) : सन् 2000 में भारत की आबादी एक अरब हो जायेगी। सन् 2050 तक भारत जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त कर लेगा। हमारी जनसंख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण मृत्यु दर की अपेक्षा जन्म दर में अपेक्षित गिरावट नहीं आना है। 1952 में भारत विश्व का पहला देश बना, जिसने परिवार नियोजन को राष्ट्रीय नीति का दर्जा दिया। 1976 में सरकार ने एक नई नीति की घोषणा की। इसी नीति का संशोधित रूप हमारी नयी जनसंख्या नीति के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं -
1. लड़कों के विवाह की आयु बढ़ा कर 21 तथा लड़कियों के विवाह की उम्र 18 कर दी गयी। 
2. संसद में 2001 तक प्रतिनिधियों की संख्या सुनिश्चित कर दी गयी है।
3. सरकार ने जनसंख्या शिक्षा योजना को स्कूलों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का निर्णय लिया हैं।
4. पहले ‘हम दो हमारे दो’ का सिद्धांत प्रचलित था, परन्तु नवीन नीति में संख्या पर जोर नहीं दिया गया है। व्यक्ति की जरूरतों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
5. लोगों को जीवन शैली की गुणवत्ता बढ़ाने पर अब अधिक बल दिया जा रहा है।
6. नई नीति के अनुसार हमें विकास की ओर अग्रसर होना होगा, लैंगिक समता का सद्भाव पैदा करना होगा, परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी-अपनी भूमिका को लेकर जिम्मेदार होना होगा तथा प्रजनन संबंधी सुविधाएं बेहतर बनानी होगी।
7. इस नीति में महिला साक्षरता पर बल दिया गया है और यह माना गया है कि केरल और गोवा की जनसंख्या में कमी आना महिला साक्षरता की देन है।
8. इस नीति में स्वास्थ्य के प्रसार तथा गुणात्मक सुधार पर बल दिया गया है।

(ii) भारत सरकार के समक्ष एक प्रमुख चुनौती वित्तीय घाटे पर अंकुश लगाने की है। वित्तीय घाटा केन्द्र सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों, ऋणों की वसूली तथा अन्य प्राप्तियों के कुल जोड़ में, कुल व्यय यथा राजस्व व्यय एवं पूंजी व्यय को घटाने से प्राप्त होने वाली रकम को कहा जाता है। इस वर्ष वित्तीय घाटे के आकलन की नई विधि लागू होने से आयोजन भिन्न पूंजी व्यय काफी कम हो गया है। ज्ञातव्य है कि यह मद वित्तीय घाटे को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फिर भी वित्तीय घाटा 1998.99 में जी.डी.पी. के 5.6 प्रतिशत के बजट अनुमान से बहुत ज्यादा 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। वित्तीय घाटे के बढ़ने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं- राजस्व प्राप्ति में कमी तथा व्यय में बढ़ोत्तरी। सीमा शुल्क तथा उत्पाद करों की वसूली में आयी गिरावट से जहां राजस्व प्राप्ति प्रभावित होती है, वहीं आयोजना भिन्न व्यय, ऋणों पर व्याज, आर्थिक सहायता, रक्षा आदि पर खर्च में बढ़ोत्तरी से व्यय प्रभावित होता है। इनके फलस्वरूप आय और व्यय के बीच दूरी बढ़ती जाती है और हम अपनी चादर के बाहर पैर फैलाने के लिए विवश होते हैं। अतः राजकोषीय घाटे में दिनों दिन वृद्धि होती जा रही है। और यह हमारी अर्थव्यवस्था एवं सरकारों के लिए सरदर्द बढ़ता जा रहा है।
 

प्रश्न 2 : (क) मौलिक अधिकारों के साथ नीति निर्देशक तत्वों की वर्तमान स्थिति जिन अवस्थाओं से उभरी है उसे संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
अथवा
(ख) ‘प्रधानमंत्राीय शासन’ की संकल्पना समझाइए एवं हाल के समयों में भारत में उसके पतन के कारण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (क) भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, परन्तु उनका स्वरूप नकारात्मक है। अर्थात् राज्य किसी कानून अथवा आदेश द्वारा नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता और यदि करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह ऐसे कानून अथवा आदेश को असंवैधानिक घोषित करके उसे रद्द कर दे। इसके विपरीत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का स्वरूप सकारात्मक है अर्थात् इनके माध्यम से राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह भारत को लोककल्याणकारी राज्य बनाने के लिए कतिपय उपाय करे, परन्तु यहां न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त नहीं है कि वह राज्य को इन निर्देशक सिद्धांतों का पालन करने के लिए बाध्य कर सके। इस प्रकार नीति निर्देशक सिद्धांतों की तुलना में मौलिक अधिकारों की स्थिति अधिक मजबूत है, परन्तु संविधान में अनुच्छेद 31 (C) जोड़े जाने तथा 42वें संविधान संशोधन के बाद स्थिति में इस सीमा तक परिवर्तन आ गया है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को न्यायालय द्वारा सीधे तौर पर लागू तो नहीं कराया जा सकता, किन्तु यदि भाग 4 में उल्लिखित किसी भी विषय पर कोई ऐसा कानून बनाया जाता है जो अनुच्छेद.14 तथा 19 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करता है तो केवल इसी आधार पर ऐसे कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता। इन दो अपवादों के अतिरिक्त मौलिक अधिकारों के शेष उपबन्धों को नीति निर्देशक तत्वों के ऊपर श्रेष्ठता प्राप्त है। इसी क्रम में 44वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 39(B) तथा (C) में प्रदत्त राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को मौलिक अधिकारों के ऊपर श्रेष्ठता हासिल है तथा यह श्रेष्ठता अनुच्छेद 31 (C) से संबंधित है।
(ख) ‘प्रधानमंत्राीय शासन’ वास्तव में ‘संसदात्मक शासन प्रणाली’ अथवा ‘मंत्रिमण्डलीय सरकार’ का पर्यायवाची है। पं. नेहरू के शब्दों में ‘प्रधानमंत्राी सरकार की धुरी है’ शासनाध्यक्ष होने के नाते सरकार एवं प्रशासन में उसकी स्थिति सर्वोच्च है उसके कार्य एवं दायित्व विशद हैं  था उसका अधिकार क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। यद्यपि भारतीय संविधान में प्रधानमंत्राी को व्यावहारिक तौर पर प्राप्त विशद शक्तियों का विधिवत उल्लेख नहीं है। तथापि जिन सिद्धांतों के आधार पर भारतीय संविधान कार्य करता है, उससे प्रधानमंत्राी का कार्य क्षेत्र और शक्तियां स्पष्ट हो जाती हैं। प्रधानमंत्राी को अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को चुनने का विशेषाधिकार है। वह अपनी इच्छा से किसी को भी मंत्रिमंण्डल में शामिल कर सकता है तथा किसी भी मंत्राी को हटा सकता है।
प्रधानमंत्राी संघीय सरकार के प्रशासन का समग्र पर्यवेक्षण तो करता ही है, साथ-ही-साथ वह विदेशी मामलों रक्षा, वित्त गृह तथा आर्थिक मामलों में उसके विशिष्ट दायित्व होते हैं। वह राष्ट्रीय विकास परिषद् तथा योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष होता है।
प्रधानमंत्राी शासन में प्रधानमंत्राी का व्यक्तित्व, शासन क्षमता, नेतृत्व एवं दूरदर्शिता देश को राजनीतिक स्थायित्व प्रदान करके उसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है। इतना ही नहीं इसका प्रभाव आर्थिक विकास की गति पर भी पड़ता है। प्रधानमंत्राी की विशिष्ट स्थिति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके त्यागपत्रा मान लिया जाता है। लोक सभा को भंग कर देने की सिफारिश राष्ट्रपति को करना प्रधानमंत्राी का विशिष्ट एवं वैयक्तिक अधिकार है।
भारत में जब तक किसी एक राजनीतिक दल को लोक सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त होता रहा तब तक प्रधानमंत्राी की स्थिति अत्यधिक शक्तिशाली रही। (स्व.) पं. जवाहरलाल नेहरू, (स्व.) श्रीमती इंदिरा गांधी तथा (स्व.) श्री राजीव गांधी ऐसे प्रधानमंत्राी रहे कि जिनके आगे अन्य सभी बौने नजर आते थे, लेकिन मिली जुली सरकारों के प्रधानमंत्रियों की स्थिति अत्यधिक कमजोर सिद्ध हुई है। उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए अपने समर्थकों के जायज तथा नाजायज दबावों को झेलना पड़ा है। स्पष्ट बहुमत के अभाव में प्रधानमंत्राीय शासन प्रणाली काफी बड़ी सीमा तक कमजोर हुई है तथा इससे उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता ने आर्थिक विकास की गति को भी प्रभावित किया है।
 

प्रश्न 3 : निम्नलिखित में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए।
(क) भारतीय संविधान के तिहत्तरवें संशोधन की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
(ख) भारत में नवीन राज्यों का गठन किस प्रकार होता है? विदर्भ, तेलंगाना जैसे अलग राज्यों की मांगों पर शासन द्वारा हाल में विचार क्यों नहीं किया गया?
(ग) विधान परिषदों का समर्थन किन मुद्दों पर किया जाता है? राज्य में उसकी स्थापना या विनाश किस प्रकार होता है?
(घ) सार्वत्रिक निर्वाचन, मध्यावधि निर्वाचन तथा उप-निर्वाचन में भेद बताइए एवं उसकी महत्ता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (क) संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अधीन राज्य से यह अपेक्षा की गई कि वह ग्राम पंचायतों के संगठन हेतु आवश्यक कदम उठाएगा तथा उन्हें ऐसी शक्तियां और अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों, परन्तु पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान न किए जाने के कारण उनको वह दर्जा प्राप्त नहीं हो पाया जिसकी अपेक्षा की गई थी। संविधान के तिहत्तरवें संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो गया है। इससे अब प्रत्येक राज्य सरकार पंचायतों का अब प्रत्येक राज्य सरकार पंचायतों का गठन करने, समय से उनके चुनाव कराने तथा उन्हें आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य बनाने के लिए बाध्य है। इस संशोधन की सबसे प्रमुख बात यह है कि पहली बार राजनीति में महिलओं की अनविार्य भागीदारी सुनिश्चित की गई है। सभी स्तर की पंचायतीराज संस्थाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए जाने से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं में जागरूकता आई है। लगभग सभी राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ी जातियों के लिए भी स्थान आरक्षित करके समाज के कमजोर वर्गों को राजनीतिक सत्ता में भागीदारी देकर लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार किया गया है।

(ख) भारत में नवीन राज्यों का गठन संविधान के अनुच्छेद 3 (क) में उल्लिखित प्रावधानों के अनुसार संसद द्वारा पारित विधि से किया जाता है। नए राज्यों के गठन सम्बन्धी विधेयक राष्ट्रपति द्वारा ऐसे राज्य अथवा राज्यों के विधानमंडलों को विचारार्थ प्रेषित किया जाता है, जो नवीन राज्य के गठन से किसी भी रूप में प्रभावित होने वाले हैं। राज्यों के विधानमंडल विधेयक पर विस्तार से चर्चा करके उसे उसी रूप में राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित अवधि में वापस राष्ट्रपति को भेज देते हैं। इस प्रकार से प्राप्त विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित तथा राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर दिए जाने पर नए राज्य के गठन की अधिसूचना जारी  कर दी जाती है। संसद नए राज्य के गठन के बारे में सम्बन्धित राज्यों के विधानमंडलों के परामर्श/प्रस्ताव को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
अभी हाल में उत्तरांचल, (उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जनपदों को मिलाकर), वनांचल (बिहार के आदिवासी जनपदों को मिलाकर) तथा छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश के पूर्वी जनपदों को मिलाकर) राज्यों के गठन की मांग पर विचार नहीं किया गया है। इसका प्रमुख कारण है कि इन राज्यों के विधानमण्डलों ने नवीन राज्यों के गठन सम्बन्धी संकल्प पारित करके अपनी सहमति जता दी है। (बिहार विधान सभा ने वनांचल विधेयक के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है, परन्तु इससे पूर्व वह पृथक झारखण्ड राज्य के गठन का संकल्प पारित कर चुकी है), जबकि तेलंगाना एवं विदर्भ को नया राज्य बनाने हेतु आंदोलन में वह गर्मी नहीं है जो उत्तरांचल, वनांचल तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के गठन में है।

(ग) भारत में सदा की भांति राज्यों में भी द्वि-सदनात्मक विधायिका की परिकल्पना के अंतर्गत विधान परिषदों का गठन किया जाता है। विधान परिषदों राज्यों में विशेष हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। संशोधी एवं विलम्बकारी सदन के रूप में कार्य करती हैं, कानूनों की खामियों को दूर करती हैं, विधि निर्माण में उच्च कोटि का वाद-विवाद करती हैं तथा जनमत के निर्माण में सहायता करती हैं।
विधान परिषदों की स्थापना अथवा विनाश सम्बन्धित राज्यों की विधान सभाओं द्वारा कुल सदस्य संख्या के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित संकल्प के आधार पर संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम से किया जाता है।

(घ) सार्वत्रिक निर्वाचन - किसी सदन का कार्यकाल पूरा हो जाने पर कराए जाने वाले निर्वाचन को सार्वत्रिक निर्वाचन कहा जाता है।
मध्यावधि निर्वाचन - जब किसी सदन को निर्धारित अवधि से पूर्व ही भंग करके उसके चुनाव कराए जाएं तो वह मध्यावधि निर्वाचन कहलाता है।
उप-निर्वाचन - जब किसी सदन के निर्वाचित सदस्य द्वारा त्यागपत्रा दे दिए जाने, मृत्यु हो जाने अथवा उसे अयोग्य करार दे दिए जाने से सदन का कोई स्थान रिक्त हो जाता है तो उसे भरने के लिए कराए जाने वाले निर्वाचन को उप-निर्वाचन कहते हैं।
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में जनता अपने शासकों का चुनाव स्वयं करती है इसलिए जब कोई सरकार सदन का बहुमत खो दे अथवा सदन का कार्यकाल पूरा हो जाए तो उसे नए सिरे से जनता का अभिमत जानना चाहिए। उप-निर्वाचन का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि देश के किसी भी भाग की जनसंख्या विधायिका में अपना प्रतिनिधित्व करने से वंचित न रह जाए।
 

प्रश्न 4 : निम्नलिखित प्रश्नों में से तीन के उत्तर दीजिए।
(क) ‘अस्थायी स्पीकर’ से क्या तात्पर्य है?
(ख) केंद्रीय सतर्कता आयोग की रचना एवं कार्यों को स्प्ष्ट कीजिए।
(ग) संविधान के अनुच्छेद 21 का विस्तार बताइए।
(घ) संसद के किसी भी सदन की सदस्यता की अपात्राता के बारे में किस प्रकार के मामलों पर राष्ट्र द्वारा निर्णय लिया जाता है।
(ड़) संसदीय सचिव एवं लोक सभा सचिव के मध्य भेद कीजिए।
(च) विशेषाधिकार प्रस्ताव क्या है?

उत्तर : (क) अस्थायी सरकार - आम चुनाव अथवा मध्यावधि चुनाव के बाद गठित सदन के स्थायी स्पीकर के चुने जाने तक सदन की कार्यवाही संचालित करने तथा निर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाने के लिए राष्ट्रपति (लोकसभा के मामले में) तथा राज्यपाल (विधानसभा के मामले में) द्वारा नियुक्त किया जाने वाला स्पीकर अस्थायी स्पीकर कहलाता है।

(ख) केंद्रीय सतर्कता आयोग एक वैधानिक निकाय है जिसमें मुख्य सतर्कता आयुक्त के अतिरिक्त तीन अन्य सतर्कता आयुक्त होंगे। इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्राी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस आयोग का कार्य सरकारी विभागों एवं सार्वजनिक उपक्रमों में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकना है।

(ग) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्राता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं“ अर्थात् राज्य प्रत्येक नागरिक को जीवन की सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य है तथा बिना किसी उचित कानून के किसी के जीवन एवं शरीर को क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती।

(घ) संसद के किसी भी सदन की सदस्यता की अपात्राता के बारे में राष्ट्रपति द्वारा निम्न मामलों में निर्णय लिया जाता है। जब कोई सदस्य -
(i) भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण किए हो।
(ii) न्यायालय द्वारा विकृतिचित्त घोषित कर दिया गया है।
(iii) दिवालिया हो।
(iv) भारत का नागरिक न रहा हो।

(ड़) संसदीय सचिव प्रधानमंत्राी के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कोई सांसद होता है जो मंत्रियों, राज्यमंत्रियों तथा उपमंत्रियों से सम्बद्ध रहकर कार्य करता है, जबकि लोक सभा सचिव लोक सभा सचिवालय का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होताह है जो लोेक सभा के संचालन का दायित्व संभालता है।

(च) विशेषाधिकार प्रस्ताव - जब किसी सदस्य या सदस्यों के समूह को यह आभास हो कि किसी मंत्राी, अधिकारी या किसी अन्य के भाषण एवं/अथवा कृत्य से उसे संसद द्वारा प्रदत्त किसी विशेषाधिकार का किसी भी रूप में हनन हुआ है, तो वह उस व्यक्ति/पदाधिकारी के विरुद्ध विशेषाधिकार प्रस्ताव ला सकता है।
 

प्रश्न 5 : पूर्ति में परिवर्तन के कारणों का वर्णण करें।

उत्तर :  वस्तु की कीमत में परिवर्तन के कारण उसकी पूर्ति मात्रा में परिवर्तन का सम्बन्ध हम पूर्ति वक्र के ऊपर नीचे या साथ-साथ चलने से जोड़ते हैं। जब कीमत में वृद्धि के कारण पूर्ति-मात्रा बढ़ जाती है तो हम उसे पूर्ति का प्रसार कहते हैं। लेकिन पूर्ति पर कई कारणों का प्रभाव पड़ता है। पूर्ति अनुसूची तथा पूर्ति वक्र की परिचर्चा करते समय हमने मान्यता की थी की उसके मूल्य के अतिरिक्त अन्य कारण अपरिवर्तित रहते हैं। लेकिन वास्तविक जीवन में ये कारणा बदलते रहते हैं। यदि अन्य चीजें अपरिवर्तित हैं की मान्यता छोड़ दिया जाए तो उसे पूर्ति की वृद्धि  या कमी कहते हैं जिसे पूर्ति वक्र के नीचे की ओर (दाईं) या ऊपर की ओर (बाईं) खिसकने से दिखाया जाता है। 

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 4 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev

वक्र के SS से S1S1 की ओर खिसकने से पूर्ति की वृद्धि चित्रित होती है। ऐसी स्थिति में विक्रेता प्रत्येक कीमत पर अधिक मात्रा बेचने के लिए तैयार होते हैैं। जब पूर्ति वक्र SS पर था तो Oa कीमत पर Ob मात्रा पूर्ति की गई थी। जब पूर्ति वक्र S1S1 पर खिसक गया तो उसी कीमत पर मात्रा Od की पूर्ति की गई।
पूर्ति में वृद्धि द्वारा वक्र के इस दाईं ओर खिसकने के कई कारण हो सकते हैंः
(क) तकनीक में बेहतरी
(ख) दूसरी वस्तुओं की कीमतों में कमी 
(ग) उत्पादन-साधनों की कीमतों में कमी 
(घ) उत्पादकों के उद्देश्यों में परिवर्तन

वक्र SS से S2S2पर खिसक जाने का अर्थ है पूर्ति में कमी। ऐसी स्थिती में विक्रेता प्रत्येक दाम पर कम मात्रा बेचने को तैयार हैै। उसी कीमत व्ं पर व्ब मात्रा के बजाय व्इ मात्रा बेचने के लिए पूर्ति की जा रही है।
पूर्ति में इस कमी द्वारा वक्र के बाईं ओर खिसक जाने के कई कारण हो सकते हैः
(क) उत्पादन की तकनीक में घटियापन आ जाना (सामान्यतया ऐसी स्थिति नहीं आ सकती)
(ख) दूसरी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि (अपने उत्पादन को अधिक लाभप्रद बना देना)
(ग) उत्पादन-साधनों की कीमतों में वृद्धि (फलस्वरूप, उत्पादन की लागत में लागत में वृद्धि और लाभ में कमी)
(घ) उत्पादकों के उद्देश्यों में परिवर्तन (जिसके कारण उसी कीमत पर पूर्ति में कमी हो जाती है)। इन कारणों के अलावा बाजार पूर्ति वक्र में परिवर्तन बाजार में विक्रेता फर्मों में परिवर्तन के कारण भी आ सकता है।

 

प्रश्न 6 :पूर्ति की लोच पर टिप्पणी करें।
 
उत्तर :  
यह वस्तु की कीमत में परिवर्तन की दशा में उसकी पूर्ति की अनुक्रिया का अंश है।

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यदि आरम्भिक कीमत P है और आरम्भिक पूर्ति की मात्रा Q है तथा P कीमत में परिवर्तन और q कीमत में परिवर्तन हो तो

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गुणांक के मूल्य पर निर्भर करते हुए पूर्ति को लोच शून्य से अनन्त मात्रा तक हो सकती है। नीचे दी गई अनुसूची और चित्र में स्थितियों को दिखाते हैं जब 
es>1  लेकिन अनन्त मात्रा से कम है
es<1 लेकिन शून्य से अधिक है।
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प्रश्न 7 : कुल उत्पाद, औसत उत्पाद और सीमान्त उत्पाद से आप क्या समझते हैं? इन तीनों के बीच का सम्बन्ध है?

उत्तर :  कुल उत्पाद प्रत्येक आगत सम्मिश्रण के अनुरूप कुल भौतिक उत्पादन है।
औसत उत्पाद कुल उत्पाद को चल साधन की मात्रा से भाग देकर प्राप्त किया जा सकता है।
सीमान्त उत्पाद वह मात्रा है जो एक आलेखित साधन-आगत के उपयोग से कूल उत्पाद में जुड़ती है।
यदि कुल उत्पाद Pn है तो सीमान्त उत्पाद Pn-1  है।
अब हम उस परिस्थिति में उत्पाद के व्यवहार को देखेंगे जब चल साधन की अधिकाधिक इकाइयाँ अचल साधन के साथ प्रयुक्त की जाती है।

कुल उत्पाद तीन अवस्थाओं से गुजरता हैै
अवस्था एक: कुल उत्पाद चल साधन आगत के मुकाबले ऊँची दर से बढ़ता है। उदाहरण के लिए यदि आगत दुगुना हो जाए तो उत्पादन दुगुने से भी अधिक हो जाता है।
अवस्था दो: कुल उत्पाद बढ़ता तो रहे लेकिन घटती हुई दर से। श्रम के प्रत्येक प्रयोग से उत्पाद बढ़ता है लेकिन कम होती हुई मात्रा में।
अवस्था तीन: चल आगत में बढ़ोतरी से कुल उत्पाद कम होने लगता है।
कुल उत्पाद का सीमान्त उत्पाद से क्या सम्बन्ध है? पहली अवस्था में जब कुल उत्पाद अधिक दर से बढ़ता है तो सीमान्त उत्पाद भी बढ़ता है। दूसरी अवस्था में, जब कुल उत्पाद घटती हुई दर से बढ़ता है, सीमान्त उत्पाद घटता है। कुल उत्पादन उस समय अधिकतम होता है जब सीमान्त उत्पाद शून्य होता है। तीसरी अवस्था में, जब कुल उत्पाद घट रहा होता है, सीमान्त उत्पाद ऋणात्मक होता है।
भूमि और पूँजी की स्थिर मात्रा की स्थिति में नीचे दिए गए गेहूँ के उत्पादन  को देखिए। काॅलम 1 में श्रम आगत परिवर्तन को दिखाया गया है। काॅलम 2 में श्रम आगत के बढ़ने पर कुल उत्पाद पर असर को दिखाया गया है। काॅलम 3 और 4 क्रमशः औसत उत्पाद और सीमान्त उत्पाद को दिखाता है।
  सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 4 (प्रश्न 1 से 9 तक) Class 10 Notes | EduRev
अचल साधन 4 एकड़ भूमि और पूँजी की 4 इकाइयाँ हैं।
सभी व्यक्तियों की क्षमता बराबर मानी गई है।
अधिसूची दिखाती है कि व्यक्तियों की संख्या एक से दो हो जाने पर कुल उत्पाद श्रम की बढ़ोतरी की दर से अधिक दर पर बढ़ता है। 120% है जबकि मजदूरों की बढ़ोतरी 100% है। सीमान्त (भौतिक) उत्पाद 10 से बढ़कर 12 क्विंटल हो जाता है। यह पहली अवस्था की सीमा है, क्योंकि उसके बाद सीमान्त उत्पादन गिरने लगता है।
दूसरी अवस्था उस समय शुरू होती है जब काम पर लगाए गए व्यक्तियों की संख्या बढ़कर 4 हो जाती है। कुल उत्पादन अब भी बढ़ रहा है लेकिन बढ़ोतरी की दर कम हो जाती है। सीमान्त उत्पाद भी कम हो जाता है। यही क्रम 7वें व्यक्ति तक चलता है। 6 व्यक्तियों का कुल उत्पाद 33 क्विंटल है। जब 7वाँ व्यक्ति जोड़ा जाता है तो कुल उत्पाद वही रहता है। सीमान्त उत्पाद शून्य है। यह अवस्था 2 की सीमा है। 8 वें व्यक्ति के काम पर लगाए जाने से कुल उत्पाद कम हो जाता है, सीमान्त उत्पाद ट्टऋणात्कम हो जाती है।
सीमान्त उत्पाद और औसत उत्पाद के बीच क्या सम्बन्ध है?
1. औसत उत्पाद बढ़ता है जब सीमान्त उत्पाद औसत उत्पाद से अधिक हो।
2. औसत उत्पाद उस समय अधिकतम होता है जब सीमान्त उत्पाद औसत उत्पाद के बराबर हो।
3. औसत उत्पाद गिरता है जब सीमान्त उत्पाद औसत उत्पाद से कम हो।

प्रश्न 8 : सीमान्त प्रतिफल क्या हैं? यह क्यों घटता-बढ़ता हैं? सिद्धांत के प्रयोग को दर्शाऐं।

उत्तर :  चल साधन का प्रतिफल पहले बढ़ता है, फिर स्थिर हो जाता है और अन्ततः कम होने लगता है। पहली अवस्था में जब सीमान्त प्रतिफल बढ़ता है तो हम कह सकते हैं कि एक साधन का बढ़ता प्रतिफल लागू हो गया। अंत में एक साधन का घटता प्रतिफल लागू प्रतिफल लागू हो गया। अंत में एक साधन का घटता प्रतिफल लागू होता है जो कि क्लासिकी अर्थशास्त्रिायों को घटते प्रतिफल का प्रसिद्ध सिद्धांत है। उनका विश्वास था कि कृषि उत्पादन तो घटते प्रतिफल (सीमान्त) सिद्धांत को मानता है जबकि  उद्योग पर बढ़ते प्रतिफल (सीमान्त) का सिद्धांत लागू होता है। यह माना जाता था कि कृषि में भूमि तो सीमित मात्रा में उपलब्ध है जबकि अन्य साधन प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। 
जरा-सा गौर करने पर पता चलेगा कि यही बात दूसरे साधनों पर भी लागू होती है। कोई भी साधन जिसकी पूर्ति निश्चित है, जब दूसरे साधनों की बढ़ती हुई मात्रा के साथ जोड़ा जाएगा तो घटते प्रतिफल (सीमान्त) का सिद्धांत लागू हो जाएगा। हम प्रतिफल का सिद्धांत के स्थान पर साधन का प्रतिफल कहना बेहतर समझते हैं पहली अवस्था में जब सीमान्त उत्पाद बढ़ता है तो साधन का प्रतिफल और दूसरी अवस्था मे जब सीमान्त उत्पाद घटता है तो यह है एक साघन का घटता प्रतिफल।
सीमान्त प्रतिफल क्यों घटता-बढ़ता है? क्या ऐसा इसलिए होता है कि चल आगत की विभिन्न इकाइयों की कुशलता समान नहीं है। यदि पहले प्रयोग में लाई गई इकाइयाँ बाद में प्रयुक्त इकाइयों से अधिक कुशल होतीं तो घटते हुए प्रतिफल की व्याख्या की जा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं है। यह सिद्धांत इस बात पर आधारित नहीं है कि घटते प्रतिफल का कारण विभिन्न इकाइयों की असमान कुशलता है। वास्तव में साघन-आगत और उसके उत्पाद में सम्बन्धों की चर्चा करते समय हम यह मानकर चलते हैं कि आगत की सभी इकाइयाँ समान रूप से कुशल हैं। पहले बढ़ते और बाद में घटते साधन-प्रतिफल का स्पष्टीकरण हम साधनों के इष्टतम समायोजन में खोज सकते हैं। किसी विशेष तकनीक में उत्पादन के साधनों को समायोजित करने का एक इष्टतम तरीका होगा, यानि दिए गए साधनों द्वारा उत्पादन अधिकतम होगा। जब हम इस इष्ट की ओर बढ़ते हैं तो भौतिक सीमान्त प्रतिफल बढ़ेगा। लेकिन इससे आगे बढ़ जाने पर सीमान्त प्रतिफल कम होने लगेगा।
इस स्थान पर हमें एक विशेष बात का ध्यान रखना चाहिए। निजी उद्योग व्यवस्था में उत्पादक का उद्देश्य भौतिक उत्पादन को अधिकतम बनाना नहीं बल्कि लाभ को अधिकतम बनाना है। जब हम भौतिक आगत की लागत की चर्चा में जाएँगे तो इष्टतक भौतिक उत्पादन की प्रस्तावना को भी उपर्युक्त रूप से संशोधित करेंगे।
क्लासिकी अर्थशास्त्राीयों ने घटते प्रतिफल के बारे में इसलिए सोचा क्योंकि वे उपजाऊ व अच्छी जगह पर स्थित भूति की पूर्ति को सीमित समझते थे। भूमि की इस सीमित मात्रा पर श्रम के अधिकाधिक प्रयोग से प्रतिफल घटने लगेगा। जैसाकि हम पहले कह चुके हैं, इसका वास्तविक कारण भूमि के उपजाऊपन में अंतर न होकर एक अचल साधन के चल साधनों से समायोजन है। न केवल तर्क में बल्कि वास्तव में भी यह सिद्धांत लागू होता है। यदि घटते प्रतिफल का सिद्धांत लागू नहीं होता तो भूमि के सिर्फ एक छोटे से टुकड़े पर हुई पैदावार से सारे देश की अनाज की आवश्यकता पूरी की जा सकती थी।
घटते प्रतिफल के सिद्धांत का प्रयोग के बारे में तीन बातों का ध्यान रखना होगा।
(1) तकनीकि में सुधर होने पर सिद्धांत लागू नहीं होगा 
(2) यह मान्यता है कि उत्पादन की तकनीक अनुमति देती है  कि चल साधन की कम या अधिक मात्रा को अचल आधन के साथ समायोजित किया जा सकता है, 
(3) यह सिद्धांत न केवल भूमि पर जैसा कि क्लासिकी अर्थशास्त्राी मानते थे, बल्कि हर उस उत्पादन-साधन पर भी लागू होता है जिसकी पूर्ति सीमित है।

 

प्रश्न 9 : भारत के कोयला संसाधनों का मूल्यांकन कीजिए तथा उनके संरक्षण के उपाए बताइए।
 
उत्तर :
 कोयला उत्पादन में आज भारत का विश्व में तीसरा स्थान है। भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में जनवरी 1995 में 19689 करोड़ टन कोयले के भण्डार थे, जो 1200 मीटर की गहराई तक 0.5 मीटर या उससे मोटी परत के रूप में विद्यमान थे। भारत में कोयले का उत्पादन 1997-98 में 295.9 मिलियन टन था जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.6% अधिक था। कोयला उत्पादन में बिहार का प्रथम स्थान है। देश के प्रमुख कोयला क्षेत्रों को दो भागों में बांटा जा सकता है -

(i) गोंडवाना कोयला क्षेत्र - देश के कुल कोयले का 98 प्रतिशत भाग गोंडवाना क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। इस क्षेत्र से प्राप्त होने वाला कोयला एन्थे्रसाइट तथा विटूमिनस किस्म का होता है। इस क्षेत्र का अधिकांश कोयला पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में मिलता है।

(ii) टरशियरी कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र से देश को केवल 2 प्रतिशत कोयला प्राप्त होता है। इस क्षेत्र का कोयला जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, तमिलनाडु, असम, मेघालय, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में मिलता है। यह लिग्नाइट किस्म का होता है जिसे ‘भूरा कोयला’ भी कहते हैं।
कोयला देश का परम्परागत ऊर्जा स्रोत है। देश में ऊर्जा की बढ़ती हुई मांग के कारण इस संसाधन का अंधाधुंध तथा अवैज्ञानिक ढंग से दोहन हो रहा है। जिसके फलस्वरूप इसे संरक्षण प्रदान करना आवश्यक हो गया है। कोयले के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं -
(i) देश में गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहित करके कोयले के खनन व उपयोग में अपव्यय को रोका जा सकता है।
(ii) आधुनिक उपकरणों का प्रयोग करके कोयले की खानों में लगने वाली आग तथा भरने वाले पानी को रोका जाना चाहिए।
(iii) अनुसंधान व शोध के द्वारा कोयले के नए क्षेत्रों का पता लगाया जाना चाहिए तथा कोयला खानों की उत्पादकता में वद्धि की जानी चाहिए।
उपर्युक्त उपायों को अपनाकर देश में इस बहुमूल्य संसाधन का संरक्षण प्रदान किया जा सकता है।

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