सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 1 से 10 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 1 से 10 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : भारत के राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का चुनाव किस प्रकार होता है? इनके चुनाव में कौन-से संवैधानिक वाद अंतनिर्हित हैं?

उत्तर  : “राष्ट्रपतीय और  उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन अधिनियम.1952“ तथा उसके अधीन बनाए गए नियम भारत के राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन से संबंधित सभी मामलों का विनियमन करते हैं। हालांकि उपरोक्त अधिनियम में 1974 एवं 1997 में थोड़े संशोधन किए गए हैं, जिनका आधार पूर्ववर्ती चुनावों में प्राप्त अनुभव था।
राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा गुप्त मतदान के माध्यम से होता है। निर्वाचन एक ऐसे निर्वाचनमंडल द्वारा किया जाता है जो संसद के दोनों सदनों के निर्वाचितमंडल सदस्यों तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा गठित  होता है। संविधान के अनुच्छेद 58 में व्यवस्था है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने का पात्रा तभी होगा जब वह (क) भारत का नागरिक हो, (ख) 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, (ग) लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
किसी विधानसभा के सदस्यों का मत मूल्य ज्ञात करने के लिए राज्य की जनसंख्या में निर्वाचित विधायकों से भाग दिया जाता है। इस भागफल में 1000 से भाग देकर एक विधायक का मत मूल्य निकाला जाता है। सांसदों का मत मूल्य जानने के लिए समस्त राज्य विधानसभाओं के सदस्यों का मत मूल्य जोड़कर इसे दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों से भाग दिया जाता है। इसे किसी एक सांसद का मतमूल्य कहा जाता है। मतगणना की प्रक्रिया में सर्वप्रथम वैध मतों के आधे में एक जोड़कर कोटा निकाल लिया जाता है। यदि पहली गिनती में ही किसी प्रत्याशी को यह कोटा मिल जाता है तो वह राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हो जाता है, अन्यथा दूसरी, तीसरी, चैथी वरीयता के आधार पर मतगणना का क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि दो ही उम्मीदवार शेष रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में सर्वाधिक मत पाने वाला प्रत्याशी राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हो जाता है।
उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा आनुपातिक पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा गुप्त मतदान से होता है। अनुच्छेद 66 (3) के अनुसार कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति के रूप मे चुने जाने का पात्रा तभी होगा, जब वह (क) भारत का नागरिक हो, (ख) 35 वर्ष की आयु पार कर चुका हो, (ग) किसी लाभ के पद पर न हो, तथा (घ) राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
संविधान के अनुच्छेद 71 में उपबंध है कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या संबद्ध सभी शंकाओं और विवादों की जांच तथा निपटारा उच्चतम न्यायालय करेगा और उसका निर्णय अंतिम होगा।
राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में केवल इस आधार पर आपत्ति नहीं की जा सकती कि निर्वाचन नामावली के सदस्यों में कोई रिक्ति हो गई है। जो व्यक्ति न तो उम्मीदवार है और न ही निर्वाचक है, वह राष्ट्रपति के निर्वाचन की वैधता को चुनौती देने के लिए याचिका दायर नहीं कर सकता। (एन.बी. खरे बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग ए.आई. आर. 1958 एस सी 139)
राष्ट्रपतीय निर्वाचन के मामले में (ए.आई.आर. 1974 एस.सी. 1682 में) उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचन को इस आधार पर न तो स्थगित किया जा सकता है और न ही अवैध ठहराया जा सकता है कि किसी राज्य विधानसभा को भंग कर दिये जाने के कारण निर्वाचक-नामावली अधूरी थी या पूरी तरह गठित नहीं हुई थी। 

प्रश्न 2 : सामाजिक न्याय क्या है? संसद में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण भारत में एक सामाजिक न्यायप्रियता समाज की स्थापना में किस प्रकार सहायता दे सकता है।

उत्तर : सामाजिक न्याय समाज में एक ऐसी व्यवस्था उत्पन्न करने  का मानदण्ड है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षेत्रा में समान रूप से भागीदार बन सके और आर्थिक विकास के लाभ समान रूप से प्राप्त कर सके। इस हेतु आवश्यक है कि संपन्न वर्ग अपने लाभ का एक अंश त्याग कर उसे पिछड़े एवं शोषित वर्ग के लोगों को प्रदान करे। ताकि वह वर्ग भी विकास की दौड़ में आगे जा सके। सामाजिक न्याय का विचार आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक लाभों में प्रत्येक वर्ग की भागीदारी सुनिचिश्त करता है। सामाजिक न्याय से आशय आर्थिक दृष्टि से सभी वर्गों का समान करना नहीं, अपितु पिछड़े एवं असहाय वर्ग को कुछ ऊपर उठाना है ताकि एक न्यायसंगत समाज का निर्माण किया जा सके।
महिलाओं को पुरुषों जैसी ही राजनीतिक सहभागिता का प्रश्न  विश्व की आधुनिक सभ्यता का सर्वाधिक ज्वंलत विषय है। विश्व महिला सम्मेलनों में पुरुषों के साथ महिलाओं की समान भागीदारी के लिए संकल्प लिए जाते रहे हैं तथा सभी राष्ट्रों पर यह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास किया जाता रहा है कि राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाये। इसी प्रक्रम में मोर्चा सरकार ने संसद व विधानसभाओं में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की, लेकिन यह विधेयक प्रबल विरोधों के कारण अभी तक अधिनियम नहीं बन सका है। इस व्यवस्था के विधायन से देश में एक सामाजिक न्यायप्रिय समाज की स्थापना हो सकेगी।
देश में आधी आबादी महिलाओं की है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि उन्हें देश के विकास में पुरुषों के समान भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए। जब तक महिलाएं जागरूक नहीं होंगी तथा राष्ट्रीय विकास की धारा में अपनी सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगी, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। महिलाओं में जागृति फैलने से पूरा परिवार, गांव शहर और अंततः देश मेें जागृति फैलती है और सारा राष्ट्र उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है। चूंकि महिलाओं को हमेशा से दबाकर रखा गया था, अतः निरक्षरता, गरीबी तथा परंपरा के बंधनों को तोड़ना जरूरी है। आज भी ज्यादातर महिलाए संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद अशिक्षित तथा बिना जायदाद के, रूढ़िवादी भारतीय समाज में रहती हैं। रूढ़िवादी प्रथाएं, पुराने रीति-रिवाज एवं अनेक समाज विरोधी कायदे-कानूनों के समाप्त करने के लिए राजनीतिक तौर पर जागृत महिलाएं ही आगे आएंगी। पेयजल, चिकित्सा, परिवार नियोजन, स्त्राी शिक्षा, साक्षरता, दहेज, ग्रामीण विकास एवं कुटीर उद्योग जैसी गतिविधियों में भी महिलाएं अधिक सहानुभूतिपूर्वक कार्य करेंगी।
73वां संविधान संशोधन इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि इससे पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं हैं। भारतीय समाज में महिलाओं का स्थान सर्वोपरि है। ये राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में अहम् भूमिका निभाती हैं। जब तक महिलाएं जागरूक नहीं होंगी तथा राष्ट्रीय विकास की धारा में अपनी सक्रिय भूमिका तथा भागीदारी नहीं निभाएंगी, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।

प्रश्न 3 : निम्नलिखित में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए।
() अखिल-भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन के पक्ष एवं विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
() भारत में क्षेत्राीयवाद के उदय होने के कारणों की परिचर्चा कीजिए। यह किस प्रकार राजनैतिक प्रणाली को प्रभावित करती है?
() सर्वोच्च न्यायालय ने किन मूल कारणों से (1) केशवानंद भारती बनाम केरल प्रदेश (1973) एवं (2) मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार (1980) के मुकदमों के दौरान किनमूल ढांचोंकी पुष्टि की?
() भारत में संसद किस प्रकार वित्तीय प्रणाली को नियंत्रित करती है।

उत्तर(क) एक संघात्मक राज्य होने के बावजूद भी भारत में एकीकृत न्यायपालिका है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय एवं राज्यों में उच्च न्यायालय और उसके अधीनस्थ न्यायालय होते हैं। हाल के वर्षों में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन की मांग उठ खड़ी हुई है ताकि इसके अधीन अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करें और पदस्थापन एवं सेवा संबंधी अन्य शर्तें संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा नियोजित हों। लेकिन अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन पर विचार-विमर्श के उपरांत इसके पक्ष एवं विपक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं।

पक्ष में - अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के प्रतिवर्ष नियुक्त होने न्यायाधीशों का प्रत्येक राज्य से संबंधित एक कैडर होगा और वे अपनी जन्मभूमि, राज्य जैसे क्षेत्राीय-भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर न्यायिक कार्यों के प्रति सचेष्ट रहेंगे। उनकी नियुक्ति की एक समान कार्य प्रणाली एवं न्यायिक प्रक्रिया को बढ़ावा देगी। किसी भी राज्य को संपूर्ण राष्ट्र के प्रतिभाशाली लोगों की सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी और इससे त्वरित न्याय एवं विभिन्न न्यायालयों में लंबित पड़े मामलों को शीघ्र निपटारा करने में मदद मिल पाएगी। इस सेवा के गठन से स्थानीय स्तर पर अधीनस्थ न्यायलयों में चुस्ती आ सकेगी और न्यायिक विलंब को दूर किया जा सकेगा।

विपक्ष में - अखिल भारतीय सेवा के माध्यम से जो विभिन्न राज्यों का संवर्ग (कैडर) बनेगा, उसके सदस्य स्थानीय क्षेत्रों की परंपरा, संस्कृति एवं रीति-रिवाजों के जानकार नहीं होंगे और इससे न्यायिक प्रक्रिया एवं सामाजिक समन्वय के मध्य संतुलन बिगड़ने का खतरा बना रहेगा। इस सेवा के गठन से संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में वर्णित शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत पर प्रहार होने की संभावना रहेगी और केंद्र तथा राज्यों के अनावश्यक हस्तक्षेप से न्यायिक सक्रियता अथवा स्वच्छ न्यायिक व्यवस्था की राह में कुछ बाधाएं आने की संभावना बनी रहेगी।

(ख) क्षेत्राीयता एक क्षेत्रा विशेष में निवास करने वाले लोगों के अपने क्षेत्रा के प्रति वह विशेष लगाव व अपनेपन की भावना है, जिसे कि कुछ सामान्य आदर्श, व्यवहार, विचार तथा निवास के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। इसके विकास के लिए कई तत्व जिम्मेदार हैं, जैसे-

भौगोलिक कारक - देश के भौगोलिक रूप से विभाजित होने के कारण किसी भी क्षेत्रा का दूसरे क्षेत्रों से सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज, भाषा, परंपराएं, पोशाक, आभूषण, खान-पान, रहन-सहन आदि भिन्न-भिन्न होते हैं।
राजनीतिक कारक - राजनीतिक स्वार्थवश अनेक राजनीतिक दलों का जन्म होता है और वे अपने हितों की पूर्ति के लिए क्षेत्राीयता का प्रसार करते हैं।
सांस्कृतिक कारक - भाषा, संप्रदाय, जाति जैसे तत्वों ने भी क्षेत्राीयता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आर्थिक कारक - देश के आर्थिक विकास की गतिविधियां सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं रही हैं जो क्षेत्रा पिछड़े रह गए वहां असंतोष पैदा हुआ और वहां क्षेत्राीयता का प्रचार हुआ।
क्षेत्राीयता राजनीतिक प्रणाली को अत्यधिक प्रभावित करती है। इससे केंद्र एवं विभिन्न राज्यों के बीच का संबंध उलझ जाता है। नए-नए क्षेत्राीय दलों का उदय होने से केंद्र में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल पाता है और केंद्र सरकार साझेदारी अथवा जोड़-तोड़ के आधार पर बनने-बिगड़ने लगती है। इससे देश की स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराएं ध्वस्त होने लगती हैं। अंततः विभिन्न क्षेत्रों के बीच आपसी संघर्ष शुरू हो जाते हैं और कभी-कभी अलगाववाद का स्वर भी गूंजने लगता है।

(ग) 1950.72 की अवधि के दौरान तीन अलग-अलग मामलों में उच्चतम न्यायालयों के सामने यह प्रश्न आया कि मूल अधिकारों का संशोधन किया जा सकता है या नहीं। अंततः यह निर्णय दिया गया कि अनुच्छेद 368 के अधीन पारित संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भी संसद न तो मूल अधिकारों को छीन सकती है और न ही उन्हें कम कर सकती है।
1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 368 में संशोधन की शक्ति निहित है लेकिन संविधान के मूल ढांचे को संशोधित नहीं किया जा सकता है। इस निर्णय के बाद 42वें संशोधन से अनुच्छेद 368 में खंड 4 एवं 5 जोड़े गए और संसद की संशोधन करने की शक्तियों के “मूल लक्षणों“ के परिसीमन को कम कर दिया गया। लेकिन “मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ“ में उच्चतम न्यायालय ने “मूल लक्षणों“ के सिद्धांत की पुनः पुष्टि की और निर्णय दिया कि खंड 4 एवं 5 शून्य हैं। लेकिन “मूल संरचना“ क्या है, इसे स्पष्ट नहीं किया जा सका। फिर भी केशवानंद के मामले में न्यायमूर्ति सीकरी ने संविधान के मूल लक्षणों को इस प्रकार सारणीबद्ध करने का प्रयास किया-
1. संविधान की सर्वोच्चता;
2. गणतंत्रात्मक तथा लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली;
3. संविधान का पंथनिरपेक्ष स्वरूप;
4. शक्तियों का पृथक्करण;
5. संविधान का संघात्मक स्वरूप।
इसी मामले में न्यायमूर्ति हेगड़े तथा न्यायमूर्ति मुखर्जी ने मूल लक्षणों में भारत की संप्रभुता तथा एकता का तथा व्यक्तिगत स्वातंत्रय का समावेश किया।

(घ) वित्तीय मामलों में संवैधानिक उपबंध ऐसा है कि संसद के प्राधिकार से ही कोई कर लगाया जाएगा या एकत्रित किया जाएगा अन्यथा नहीं और राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष एक “वार्षिक वित्तीय विवरण“ (बजट) रखवाएगा।
जब सदन में बजट रखा जाता है तो संसद ही इसे मंजूरी देती है। राज्यसभा बजट पर सामान्य चर्चा में भाग लेती है लेकिन मांगों पर चर्चा एवं मतदान की प्रक्रिया में लोकसभा विचार-विमर्श करती है। संसद में वित्तीय प्रणालियों की अनियमितताओं को दूर करने के लिए “कटौती प्रस्ताव“ का प्रावधान है। ये प्रस्ताव तीन प्रकार के होेते हैं।
1. नीति निरनुमोदन कटौती, जिसमें मांग की राशि घटाकर एक रुपये कर दी जाती है।
2. मितव्ययता कटौती, जिसमें व्यय में मितव्ययता लाने की दृष्टि से मांग की राशि में उल्लिखित राशि कम करना होता है।
3. सांकेतिक कटौती, जिसमें मांग की राशि में 100 रुपये की कमी कर दी जाती है।
विनियोग विधेयक, लेखानुदान, अनुपूरक अनुदान तथा अतिरिक्त अनुदान एवं प्रत्ययानुदान तथा अपवादानुदान जैसी वित्तीय प्रक्रियाओं का नियंत्राण संसद ही करती है।
वित्तीय प्रणाली के विभिन्न कार्यों की जांच के लिए जो “लोक लेखा समिति“ या “प्राक्कलन समिति“ तथा “सार्वजनिक उपक्रम समिति“ बनाई जाती है, उसमें संसद सदस्यों की ही भागीदारी होती है। “नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक“ के प्रतिवेदन की जांच सांसदों से बनने वाली समितियां ही करती हैं। वस्तुतः भारत की संपूर्ण वित्तीय प्रणाली का नियंत्राक संसद ही है।

प्रश्न 4 :अनुपात-प्रतिफल पर टिप्पनी लिखें।

उत्तर : हम ऐसा केस लेंगे जिसमें सभी साधनों के आनुपातिक परिवर्तन से प्रतिफल भी बदल सकता हो। यह अनुपात-प्रतिफल का केस है। इस केस में सभी साधन-आगत समान अनुपात में बढ़ते हैं और प्रक्रिया का स्तर भी बढ़ता है। यदि एक व्यक्ति दो मशीनें चलाता है तो व्यक्तियों और मशीनों का अनुपात 1:2 ही रहेगा। लेकिन यहाँ भी प्रतिफल बदल सकता है। (क) बढ़ते प्रतिफल से, (ख) स्थिर प्रतिफल में, और अन्ततः (ग) अनुपात से घटते प्रतिफल में।
बढ़ते हुए अनुपात-प्रतिफल के केस में सभी साधनों के समान अनुपात में वृद्धि के प्रयोग से उत्पाद आगत के अनुपात से अधिक बढ़ता है। उदाहरण के लिए, यदि आगत 100% बढ़ता है और उत्पाद 150% बढ़ता है तो यह बढ़ते हुए अनुपात प्रतिफल का केस है।
स्थिर अनुपात प्रतिफल के केस का अर्थ है ऐसी स्थिती जिसमें उत्पादन में वृद्धि का अनुपात आगत में वृद्धि के अनुपात के बराबर होता है। आगत में, उदाहरण के लिए, 50% वृद्धि से उत्पाद भी 50% ही बढ़ता है।
घटते अनुपात-प्रतिफल की स्थिति में, उत्पाद-वृद्धि  का अनुपात आगत वृद्धि के अनुपात की तुलना में कम होगा। स्वरूप अर्थशास्त्रिायों का निम्न तर्क हैः
प्रक्रिया के अनुपात में बढ़ोतरी से श्रम में बँटवारा हो सकता है तथा विशिष्टता आ सकती है। विशिष्टता से उत्पादकता बढ़ती है। क्लासिकी अर्थशास्त्राी एडम स्मिथ जिसमे वैल्थ आॅफ नेशन्स लिखी है, पिन बनाने के उत्पादन में बढ़ोतरी का उदाहरण देता है जिसका कारण श्रम का बँटवारा और विशिष्टता हो सकते हैं। हर मजदूर पिन बनाने में अनिवार्य सभी प्रक्रियाएँ करने की बजाय एक विशेष कार्य कर सकता है। फलस्वरूप, उत्पादकता बढ़ती है। इसी प्रकार प्रक्रिया का अनुपात बढ़ने पर अधिक उत्पादक विशिष्ट का अनुपात बढ़ने पर अधिक उत्पादक विशिष्ट मशीनरी के इस्तेमाल की बात सोची जा सकती है।
घटते अनुपात का प्रतिफल क्यों लागू होता है? सामान्य कारण यह बताया जाता है कि प्रक्रिया का अनुपात बढ़ने पर संचालन व तालमेल कठिन हो जाता है। इसके कारण यह बताया जाता है कि प्रक्रिया का अनुपात बढ़ने पर संचालन व तालमेल कठिन हो जाता है। इसके कारण उत्पादन में वृद्धि का अनुपात कम हो जाता है। लेकिन प्रोफेसर लिप्से ने इसे तर्क संगत नहीं माना है। उनके अनुसार यह तर्क मानकर चलता है कि उच्च कोटि का संचालन सीमित है। यदि फर्मों का उद्देश्य लाभ को अधिकतम बनाना है तो वे स्वतंत्रा रूप से कार्य कर रहे ठीक एक जैसे कारखाने लगा सकते हैं। इसका अर्थ होगा कि फर्म कम-से-कम स्थिर आनुपातिक प्रतिफल तो प्राप्त कर ही सकती है। 

प्रश्न 5 :टिप्पनी लिखें। (a) मुद्रा लागत (b) अचल और चल लागत (c) समय तत्व लागत और (d) सीमान्त लागतें (e) अवसर लागत (f) सन्तुलन स्तर चार्ट।

उत्तर : (a) मुद्रा लागत 
उत्पादन की मुद्रा लागत से आशय उस खर्च से है जो एक दिए गए उत्पादन के लिए आगतों को खरीदने या किराये पर लेने पर आता है। इस प्रकार, फर्म के कर्मचारियों और मजदूरों की दी गई तनख्वाह और मजदूरों को दी गई तनख्वाह और मजदूरी, बिजली और ईंधन समेत उस सब कच्चे माल पर खर्च जो वस्तु के उत्पादन में काम आता है, लगाई गई पूँजी पर ब्याज, उत्पादन के दौरान मशीनरी के घिसने के कारण उसके मूल्य में कमी, बीमा लायक जोखिम उठाने के लिए बीमा खर्च - ये सभी फर्म की उत्पादन मुद्रा लागत के भाग हैं।

(b) अचल और चल लागत
उत्पादन की मुद्रा लागत को अचल और चल लागत में बाँटा जाता है। अचल और चल लागत का यह विभेद फर्म द्वारा उत्पादन के बारे में फैसलों के लिए महत्त्वपूर्ण है। अचल लागत वह होती है जो उत्पादन के घटाने या बढ़ाने से बदलती नहीं। यह वह खर्च है जो उत्पादन कम या ज्यादा यहाँ तक कि शुन्य भी हो, तो भी करना पड़ता है। अचल लागत के उदाहरण हैंः भूमि और फैक्ट्री की जमीन का किराया, नगर निगम द्वारा लगाए गए कर, बीमे की राशि, पूँजी तथा मशीनरी पर ब्याज, मशीनरी के पुराने होने के कारण नुकसान, कर्मचारियों की तनख्वाह का खर्च, इत्यादि। दूसरी ओर, चल लागतें वह लागतें है जो उत्पादन के साथ बदलती हैं। चल लागत के उदाहरण हैंः कच्चा माल जो उत्पादन में काम आता है, लगाए गए मजदूर, उत्पादन में काम आनेवाली बिजली इत्यादि।

(c) समय तत्व और लागत
अचल और चल लागत में विभेद विचाराधीन समय तत्व पर निर्भर करता है। पूर्ति के सिद्धांत में हम तीन प्रकार के समय तत्वों में विभेद करते हैंः (1) अति लघु समय, (2) लघु समय, और (3) लम्बा या दीर्घ समय।  अति लघु समय में वस्तु का उत्पादन कीमत के प्रति बेलोचदार होता है यानि कीमत में परिवर्तन से उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लघु समय में पूर्ति को बढ़ाया तो जा सकता है लेकिन केवल मौजूदा संयन्त्रा और उपकरण की अधिकतम क्षमता तक। उससे आगे वह भी बेलोचदार होे जाती है। लम्बे (दीर्घ) समय में, पूर्ति लगभग लोचदार होती है क्योंकि नई फर्में उद्योग में आ सकती हैं या उसे छोड़कर जा सकती हैं। साथ ही संयन्त्रा का विस्तार भी किया जा सकता है।
विभिन्न समय तत्वों में पूर्ति के व्यवहार के कारण लागत भी भिन्न-भिन्न होगी। अति लघु समय में पूर्ति अचल होने के कारण लागत का पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं होता। लघु समय में चूँकि पूर्ति  को चल साध्नों की क्षमता की सीमा तक बढ़ाया जा सकता है, इसलिए फर्म की कम से कम चल लागत तो वसूल होनी ही चाहिए। 
लेकिन लम्बे (दीर्घ) समय में सभी प्रकार की लागत- चाहे वह अचल हो या चल (सामान्य लाभ समेत) वसूल होनी चाहिए अन्यथा फर्म उत्पादन नहीं करेगी।
नीचे दी गई अनुसूची में एक काल्पनिक फर्म की कुल अचल लागत, कुल चल लागत और कुल लागत ;(TC = TFC + TVC) को दिखाया गया हैः

  
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उत्पादन की मात्रा का स्तर जो भी हो, कुल अचल लागत 120 रुपये पर टिकी है। शून्य उत्पादन पर यह 120 रुपये और 6 इकाइयों के उत्पादन पर भी 120 रुपये है। शून्य उत्पादन पर कुल चल लागत शून्य है और उत्पादन की बढ़ोतरी के साथ बढ़ती है। शूरू में यह घटती दर से बढ़ती है; लेकिन बाद में यह बढ़ती दर से बढ़ती है। ज्ब् का व्यवहार भी इसी प्रकार है

(d) औसत और सीमान्त लागतें 
अब हम कुल लागत से औसत अचल लागत (AFC)  , औसत चल लागत (AVC), औसत कुल लागत (ATC) और सीमान्त लागत (MC) निकालेंगे।

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कुल लागत या कुल चल लागत से सीमान्ल लागत निकाली जा सकती है। सीमान्त लागत, कुल उत्पादन में एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से बढ़नेवाली लागत है। इस प्रकार, 
ME = TCn—TCn—1
चूँकि औसत लागत और सीमान्त लागत दोनों ही कुल लागत से निकाले जाते हैं, उनके आपसी सम्बन्ध गणितीय हैं। इन्हें नीचे संक्षिप्त में बताया गया है।
1. जब सीमान्त लागत औसत लागत से कम होती है, यह औसत लागत को नीचे खींचती है और औसत लागत कम हो जाती है।
2. जब सीमान्त लागत औसत लागत के बराबर होती है, औसत लागत स्थिर होती है और न्यूनतम होती है।
3. जब सीमान्त लागत औसत लागत से अधिक होती है तो वह औसत लागत को ऊपर खींचती है और लागत बढ़ जाती है।
सीमान्त लागत और कुल लागत का सम्बन्ध इस प्रकार है: जब कुल लागत घटती दर से बढ़ती है तो सीमान्त लागत घटती है। जब कुल लागत की बढ़ोतरी की दर घटना बन्द कर देती है तो सीमान्त लागत न्यूनतम होती है। जब कुल लागत की बढ़ोतरी की दर बढ़ने लगती है तो सीमान्त लागत बढ़ती है। 

(e) अवसर लागत 
यह लागत की आधु निक धारणा है। इसे अंतरण कीमत या विकल्प लागत भी कहते हैं। अवसर लागत ‘पूर्व निश्चित विकल्प की लागत है’। जब कोई फर्म एक वस्तु के उत्पादन के लिए साधन-आगत खरीदती या किराये पर लेती है तो इन साधनों को कम से कम उतार देना पड़ता है जितना वे सर्वश्रेष्ठ के निकटतम उपयोग से कमा सकते हैं। इस प्रकार, यदि फर्म । को किसी मैनेजर को रखना हो और वह मैनेजर दूसरी नौकरी में 3000 रुपये प्रतिमाह कमा सकता हो तो फर्म को उसे कम से कम 3000 रुपये अवश्य देने होंगे। हो सकता है कि उसकी सेवाएँ बनाए रखने के लिए फर्म उसे अधिक तनख्वाह दे। तब यह उसकी अवसर लागत के अलावा अतिरिक्त कमाई होगी।
इस स्थान पर हम प्रत्यक्ष और अन्तर्निहित लागत में विभेद करना चाहेंगे। प्रत्यक्ष लागत से आशय उस मुद्रा व्यय से है जिसे कोई फर्म साधन-आगतों की सेवाओं को खरीदने या किराये पर लेने के लिए खर्च करती है। अर्थशास्त्रिायों के अनुसार, यदि किसी व्यवसाय का मालिक कुछ साधनों की स्वपूर्ति करता है तो उन ”स्वपूर्ति साधनों“ की लागत का श्रेय भी देना पड़ेगा। यदि मालिक अपनी पूँजी लगाता है तो वह ब्याज जो उसे पूँजी को दूसरों को उधर देकर मिल सकता था, लागत में जोड़ा जाएगा। इसी प्रकार यदि वह व्यवसाय में स्वयं मैनेजर है जो तनख्वाह उसे विकल्प रेाजगार से मिल सकती थी, वह उत्पादन की लागत में जोड़ी जाएगी। इस लागत को अन्तर्निहित लागत कहते हैं।
इस प्रकार, किसी फर्म की अवसर लागत वह लागत है जो साधनों का वास्तव में खरीदने पर खर्च होती है। प्रत्यक्ष लागत या जात फर्म के मालिक द्वारा स्वपूर्ति की जाती है। अन्तर्निहित लागत और जिसका हिसाब उसके वैकल्पिक उपयोग से लगाया जाता है।
अवसर लागत की यह धरणा न केवल किसी व्यक्तिगत फर्म बल्कि पूरे उद्योग और यहाँ तक कि सारी अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है।
उद्योग तो वस्तु उत्पादन करनेवाली सभी फर्मों का योग है। एक उद्योग को कम से कम उतनी मजदूरी देनी पड़ती है जितनी अन्य उद्योग दे रहे हैं। यदि कोई उद्योग ऐसा नहीं करता तो मजदूर दूसरे उद्योग में चले जाएँगे।

(f) सन्तुलन स्तर चार्ट 
सन्तुलन स्तरी चार्ट व्यवसाय में फैसले लेने में काफी सहायता होता है। इससे फर्म फर्म के कुल संचालन को सरसरी नजर में देखा जा सकता है। किसी भी व्यवसाय की पहली दिलचस्पी नुकसान से बचना है और बाद में लाभ कमाना है। 
लागत अनुसूची द्वारा दी गई सूचना और उस कीमत द्वारा जिस पर फर्म अपना माल बेच सकती है, हम सन्तुलन स्तर चार्ट बना सकते हैं। कुल अचल लागत, कुल चल लागत और कुल लागत का ज्ञान हमें पहले से ही है। यदि हमें फर्म के कुल आगम का ज्ञान प्राप्त हो जाए तो हम यह चार्ट बना सकते हैं।
सन्तुलन स्तर बिन्दु वह बिन्दु है जिसपर कुल आगम और कुल लागत बराबर होते हैं। नीचे दी गई लागत अनुसूची को देखिएः

  
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ऊपर दी गई अनुसूची में औसत चल लागत स्थिर है। इसका अर्थ है कुल चल लागत उत्पाद के अनुपात में बदलती है।

प्रश्न 6 : कुल आगम औसत आगम और सिमान्त आगम की व्याख्या करें।

उत्तर : आगम उत्पादन की बिक्री से मिलने वाला पैसा है आगम के साथ-साथ प्रयोग किए जाने वाले तीन आम शब्द हैं: कुल आगम, औसत आगम और सीमान्त आगम। कुल आगम फर्म द्वारा उत्पादन के विभिन्न स्तरों (और बिक्री) से प्राप्त कुल पैसा है। यह फर्म के उत्पाद पर खरीददारों द्वारा किए गए कुल खर्च के बराबर है। वस्तु की प्रत्येक इकाई की कीमत को उत्पाद की मात्रा से गुणा करके फर्म का कुल आगम प्राप्त किया जा सकता है। 
औसत आगम कुल आगम को प्रत्येक स्तर पर बेचे गए उत्पाद से भाग देकर किया जा सकता है। सीमान्त आगम उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई बेचने से प्राप्त कुल आगम में बढ़ोतरी है। अलजबरा की भाषा में, यह फर्म के कुल आगम में वह बढ़ोतरी है जो उत्पादन की n-1 इकाइयों के स्थान पर n इकाइयों से प्राप्त होती है।
आगे दी गई काल्पनिक अनुसूची को देखने से प्रत्येक स्तर पर कुल आगम, औसत आगम और सीमान्त आगम के सम्बन्धों को आसानी से समझा जा सकता है। यह एक काल्पनिक फर्म के कुल आगम, औसत आगम और सीमान्त आगम को रुपयों के रूप में उत्पाद (बिक्री) से सभी स्तरों पर 1 से 10 तक के उत्पाद के सभी स्तरों पर दिखाती है। इस अनुसूची में हम यह मान्यता करते हैं कि फर्म द्वारा उत्पादन पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में हो रहा है। इसका अर्थ है कि फर्म अपनी स्वतंत्रा क्रिया से बाजार में वस्तु की प्रचलित कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती, अर्थात वस्तु की कीमत फर्म के लिए पूर्व निर्धारित है। वह बाजार में प्रचलित कीमतों पर वस्तु की मनचाही मात्रा बेच सकती है।


सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 1 से 10 तक) Class 10 Notes | EduRev
सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 1 से 10 तक) Class 10 Notes | EduRev

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 1 से 10 तक) Class 10 Notes | EduRev

हम आगम को OY एक्सिज पर तथा बिक्री OX एक्सिज पर दिखाते हैं। चित्रा के नीचले भाग में औसत और सीमान्त आगम के सम्बन्धों को दिखाया गया है। कुल आगम को व्यवहार चित्रा के ऊपरी भाग में दिखाया गया है। देखने पर पता चलेगा कि- 
(1) कुल आगम उत्पादन के OM1 के स्तर पर पहुँचने तक बढ़ता रहता है। यह सीमान्त आगम के धनात्मक रहने तक बढ़ता रहता है, यानि कि उसके शून्य के ऊपर रहने तक। जब T1 बिन्दु के बाद सीमान्त आगम ऋणात्मक हो जाता है तो कुल आगम गिरने लगता है।
(2) कुल आगम बढ़ती दर पर बढ़ता रहता है जब तक कि सीमान्त आगम बढ़ता रहता है और चित्रा में बिन्दु T तक नहीं पहुँच जाता जो कि बिक्री के OM का संगत है। कुल आगम घटती दर से बढ़ता है जब सीमान्त आगम कम होने लगता है लेकिन अभी शून्य से ऊपर है जो चित्रा में T1 बिन्दु है और जो OM1 बिक्री के व्ड का संगत है।
(3) औसत आगम उस स्थिति तक बढ़ता है जब तक सीमान्त आगम औसत आगम से अधिक है यानि बिन्दु A तक, जो कि MR वक्र और AR वक्र के एक दूसरे को काटने का बिन्दु है। उसके बाद वह गिरने लगता है। दूसरे शब्दों में, औसत आगम उस समय तक बढ़ता रहता है जब तक कि सीमान्त आगम औसत आगम से ऊँचा है।
जब औसत और सीमान्त आगम बराबर होते हैं तो औसत आगम अधिकतम होता है। जब सीमान्त आगम औसत आगम से कम होता है तो औसत आगम कम होने लगते है। चूँकि आगम उत्पादन की मात्रा को उसकी कीमत से गुणा करके प्राप्त किया जाता है और चूँकि हम यह मानकर चलते हैं कि किसी उत्पादन के लिए वस्तु की पूर्व-निर्धारित कीमत है, इसलिए कुल, औसत औसत सीमान्त आगम का व्यवहार कुल औसत और सीमान्त उत्पाद के अनुसार होता है।

प्रश्न 7 : कुछ विशेषज्ञों की रायह है कि देश के विभिन्न भागों में जो बांध और जलाशय हैं, उनसे अप्रिय परिणाम हो सकते हैं। ये शंकाएं कहां तक सही हैं?

उत्तर :  देश के विभिन्न भागों में स्थिति बाँध और जलाशय पर्यावरण पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख प्रभाव हैंः जल ग्रहण क्षेत्रों की उर्वरता पर असर; बाँध के कारण गृह विहीन लोगों के पुनर्वास की समस्या; प्रदूषित पानी से उत्पन्न रोगों में वृद्धि; जलाशयों के निर्माण से भूकम्प आने की आशंका व बाँधों को बनाने के लिए जंगलों को काटना पड़ता है, जिससे पौधे और पशु की प्रजातियों का नुकसान (कई प्रजातियाँ तो लुप्त होती जा रही है)। नियंत्रित क्षेत्रा विकास (Command Area Development) मुख्यतः कृषकों के लिए काम कर रहा है लेकिन आर्थिक परेशानी की वजह से जल निकासी, जमीन का उपज के आधार पर वर्गीकरण और उन्हें समतल बनाने का काम नही हो सका है। पानी जमाव से मलेरिया और फलेरिया जैसे रोग पनपते हैं। बाँधों से गाँव, जंगल और जमीन पानी में डूब जाते हैं। इसलिए इनके निर्माण से पहले पर्यावरण संतुलन की तरफ ध्यान देना आवश्यक है।

प्रश्न 8 : उत्तर भारत की पहाड़ी अर्थव्यवस्था के प्रमुख लक्षण क्या हैं? उसके अपेक्षाकृत पिछड़ेपन के ये कारक कैसे बने?

उत्तर : कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश तथा उससे जुड़े कुछ भाग उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रा में आते हैं। फल, आलू व अन्य सब्जियाँ इस क्षेत्रा में उत्पादित की जाने वाली प्रमुख फसलें हैं। भौगोलिक परिस्थितियों की विभन्नता के कारण उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था शेष भारत से काफी अलग है। उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषतायें निम्न प्रकार हैंः
1. रेल परिवहन का अभाव। सड़क परिवहन प्रमुख यातायात साधन।
2. लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर।
3. धान, गेहूँ, मक्का, सेब, आलू बुखारे, आडू, खुबानी व केसर (जम्मू कश्मीर) की खेती।
4. कृषि के अलावा आय का प्रमुख साधन पर्यटन।
5. बड़े पैमाने के उद्योगों का अभाव। लघु, कुटीर, हस्तशिल्प व हथकरघा उद्योगों की प्रमुखता।
6. जनसंख्या धनत्व, शेष भारत की तुलना में काफी कम।
7. आवश्यकता पूर्ति हेतु लोगों की स्थानीय बाजार पर निर्भरता, जिससे परस्पर प्रतियोगिता के अभाव में बाजार में अपूर्णताएं।
8. प्रति व्यक्ति घरेलू, उत्पादन राष्ट्रीय औसत के लगभग बराबर।
9. लोग अधिक परिश्रमी, जिससे अर्थव्यवस्था श्रम प्रधान।
अतः भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इन क्षेत्रों में सरलता से परिवहन, औद्योगिक बाजार, कृषि आदि सुविधाओं का विकास नहीं किया जा सकता। आवागमन की दुर्गमता, बाजारों के विस्तार व व्यवसायिक क्रिया-कलापों में मुख्य बाधा है। श्रम आपूर्ति, शक्ति के साधन, बाजार सुविधाओं, कच्चा माल व वित्तीय साधनों की समस्याएं इन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना में मुख्य बाधक है। अनुपजाऊ मृदा, अपर्याप्त सिंचाई सुविधायें, अधिकांशतः सब्जी के बाजार और जमीन की कम पानी सोखने की शक्ति उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि के निम्न उत्पादन के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 9 : आधुनिक टेक्नोलाॅजी ने मौसम का पूर्वानुमान पहले से अच्छी तरह देने में कैसे योग दिया? इस विषय में भारत में किये गए विशेष प्रयासों का उल्लेख कीजिए?
 
उत्तर :  हाल के कुछ वर्षों में मौसम का पूर्वानुमान व मौसम संबंधी जानकारी पूर्व की अपेक्षा काफी अच्छे ढंग से प्राप्त हो रही है। यह सब अत्याधुनिक व विकसित तकनीक के कारण संभव हुआ है। मौसम संबंधी जानकारी देने के लिए आजकल उपग्रहों का उपयोग किया जा रहा है। भारत के इन्सेट उपग्रह द्वारा पे्रषित मेघ प्रतिबिम्बीय आँकड़ों से मौसम संबंधी भविष्यवाणी की जाती है। भारत में मौसम विज्ञान के क्षेत्रा में सेवायें प्रदान करने वाला प्रमुख संगठन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग है। देश भर में 1,400 से अधिक एजेंसियाँ मौसम संबंधी जानकारियाँ एकत्रित करती हैं तथा विश्लेषण के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग को देती हैं। यह विभाग मौसम पूर्वानुमान, राडार मौसम विज्ञान, भूकंप विज्ञान, कृषि मौसम विज्ञान आदि क्षेत्रों में अनुसंधान करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली व क्षेत्राीय कार्यालय बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, नागपुर व नई दिल्ली में हैं। विभिन्न राज्यों की राजधानियों में भी मौसम विज्ञान केंद्र हैं। विभिन्न देशों के साथ मौसम विज्ञान संबंधी आँकड़ों का आदान.प्रदान उच्च गति के दूरसंचार चैनलों द्वारा होता है। 1979 में आरम्भ मानूसन प्रयोग विश्वव्यापी वायुमंडलीय अनुसंधान नामक एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन का अंग था। इसका आयोजन विश्व मौसम विज्ञान संगठन व अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संघ परिषद ने किया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने इसमें भाग लिया एवं भारत में मुख्य रूप से भारतीय मौसम विभाग इस परियोजना को चला रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आई.एम.डी.), नई दिल्ली द्वारा स्थापित सुपर कम्प्यूटर CRAY/MP-14  भी बेहतरी की दिशा में उठाया गया कदम है।

प्रश्न 10 : एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में अवस्थित होने के कारण भारत को किस प्रकार के भू-राजनीतिक तथा आर्थिक सौलभ्य प्राप्त हुए?
 
उत्तर : एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित होने के कारण भारत को अनेक भू-राजनीतिक व आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं। हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित भारत की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए बहुत हितकर हैं क्योंकि पुराने एवं नये विश्व के अधिकांश सम्पर्क रास्ते इधर से गुजरते हैं। भारत के उत्तर में हिमालय की ऊँची पर्वतमालयों तथा दक्षिण में हिन्द महासागर है। हिमालय की ऊँची पर्वतमालाओं के कारण भारत की सुरक्षा को उत्तर की ओर के देशों से कम खतरा रहता है। हिन्द महासागर के तट पर स्थित होने के कारण भारत को समुद्र से प्राप्त होने वाले अधिकांश लाभ प्राप्त होते हैं तथा वह समुद्री सम्पदा का पर्याप्त दोहन करता है। समुद्री सम्पदा के दोहन में मत्स्य पकड़ना, खनिज व तेल निकालना आदि शामिल हैं। समुद्री मार्ग द्वारा भारत के दक्षिण एशिया के सुदूर देशों के साथ व्यापार एवं वाणिज्यिक संबंध होने के साथ ही सांस्कृतिक संबंध भी हैं। एशिया के मानचित्रा पर एक दृष्टि डाली जाए तो इस  बात में कोई संदेह नहीं रहता है कि भारत, भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वाधिक प्राकृतिक भौगोलिक इकाई है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं और यहाँ प्राकृतिक संसाधन प्रर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। उत्तर का पर्वतीय क्षेत्रा जंगलों व पशुधन, गंगा व ब्रह्मपुत्रा का मैदान कृषि, दक्षिण का पठार खजिन, कृषि व उद्योग तथा तटीय प्रदेश मछली पालन की दृष्टि से काफी समृद्ध है। 

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