सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 11 से 20 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 5 (प्रश्न 11 से 20 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 11 : भारत में खाद्य तेल के उत्पादन और आपूर्ति का परीक्षण कीजिए। इसके मूल सस्य क्या हैं और इसकी पैदावार कहाँ की जाती है? क्या हमें खाद्य तेल का आयात करना पड़ता है।

उत्तर : वनस्पति तेल व घी अत्यावश्यक उपभोक्ता वस्तुएं हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत सरकार ने तेल व वनस्पति घी को आवश्यक वस्तुएं घोषित किया हुआ है। मुख्य सदस्य हैंः तिलहन, मूँगफली, सरसों, रेपसीड, सूरजमूखी, नाइगर, सीसेम व सोयाबीन। रेपसीड और सरसों की कृषि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, असम व हरियाणा में मुख्यतः होती है। दूसरी ओर, मूँगफली पश्चिमी और दक्षिण भारत में होती है। मूँगफली और रेपसीड व सरसों का उत्पादन क्रमशः 5.5 मिलियन टन व 2.6 मिलियन टन था। वर्तमान में देश में 94 से अधिक वनस्पति इकाईयाँ हैं, जिनकी वार्षिक क्षमता 15.33 लाख टन की है। वर्ष 1986 में देश में विलायक विधि से तेल निकालने वाले कारखानों की संख्या 615 थी, जिनकी वार्षिक क्षमता 7.18 लाख टन थी। संगठित क्षेत्रा में तेल की पिराई करने वाली लगभग 230 इकाईयाँ हैं, जिनकी वार्षिक क्षमता 50 लाख टन तिलहन पिराई है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या की खाद्य तेल की मांग की पूर्ति आंतरिक साधनों से पूरी नहीं हो पा रही है। इसलिए प्रतिवर्ष काफी मात्रा में खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 1988-89 में देश में 727 करोड़ रुपये मूल्य के खाद्य तेल का आयात किया गया था। इस वर्ष तेल के वास्तविक उत्पादन का अनुमान 15.5 लाख टन व उत्पादन लक्ष्य 15.65 लाख टन था। तिलहनों के उत्पादन में वृद्धि हेतु केंद्र सरकार ने एक तकनीकी मिशन भी चलाया है, जिससे कि आयात को कम किया जा सके।

प्रश्न 12 : राष्ट्रीय जलग्रिड की अवधारणा और उसके आशय समझाइये।

उत्तर : राष्ट्रीय जल ग्रिड की संकल्पना केन्द्रीय जल एवं शक्ति आयोग (Central Water and Power Commission) द्वारा विभिन्न नदियों के बीच अन्तर संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से की गयी। इसके अन्तर्गत जल के बारे में व्यापक अध्ययन किया जा रहा है। इसमें निम्नलिखित उद्देश्य निहित हैंः
(i) प्रायद्वीपीय नदियों के अतिरिक्त जल का वैकल्पिक उपयोग करना। राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद बचे शेष जल का हस्तान्तरण जल की कमी वाले राज्यों में करना।
(ii) अतिरिक्त जल का हस्तान्तरण प्राथमिकता के आधार पर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में।
(iii) हिमालय और प्राद्वीपीय नदियों का विकास।
(iv) जल की कमी वालीे क्षेत्रों में कुछ नदियों में बाढ़ जाती है और इस प्रकार काफी जल व्यर्थ चला जाता है। इस जल को व्यर्थ होने से बचाने के लिए नदियों में अन्तर संबंध स्थापित करके कृषि कार्यों के लिए उपलब्ध कराने की व्यवस्था करना।
राष्ट्रीय जल ग्रिड से भारत में लगभग बाइस लाख मि. घनमीटर से भी अधिक अतिरिक्त जल का उपयोग हो सकता है तथा देश में 35 मि. हेक्टेयर भूमि की अतिरिक्त सिंचाई व 40 मि. किलोवाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन प्राप्त हो सकता है। लेकिन इसके लिए नदी प्रकमों में उचित स्थानों पर जल भण्डारण की पर्याप्त व्यवस्था नितांत आवश्यक है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित येाजनाएं बनाई गयी हैं-गंगा कावेरी लिंक नदी, ब्रह्मपुत्रा गंगा लिंक नहर, नर्मदा से पश्चिमी राजस्थान तक लिंक नहर, चम्बल से एक नहर, उड़ीसा के तटवर्ती इलाकों व आन्ध्र प्रदेश के लिए महानदी से लिंक नहर आदि।

प्रश्न 13 : भू-संरक्षण की आवश्यकता क्या है? भारत मेें भूमि संरक्षण करने के लिए सरकार ने प्रमुख रूप से क्या-क्या कदम उठाए हैं?

उत्तर : भारत में कृषि कार्यों में लगभग 75 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या संलग्न है, लेकिन विभिन्न कारणों से भूमि की उर्वरता में कमी आती जा रही है। पानी और वायु के साथ मिट्टी की ऊपरी सतह, जिसमें पोषक तत्व रहते हैं, के कट जाने से भूमि की उर्वरता में कमी आती है। अपरदन पर वर्षा, भूमि की ढाल, भूमि की किस्म, वनस्पति, जुताई और फसलों का अभाव, ढाल पर जुताई तथा पशुओं द्वारा चलाई का सीधा प्रभाव पड़ता है। भूमि का विविध क्षरण शक्तियों द्वारा कटने.बहने से बचाने और उसकी उर्वरता बढ़ाने को भूमि संरक्षण या मृदा संरक्षण कहते हैं। मृदा क्षरण को रोकन के लिए निम्न उपाय किये जा सकते हैंः
(i) वृक्षारोपण कार्यक्रम द्वारा वर्षा की बूंदे सीधी मृदा पर नहीं पड़ती हैं और भूमि क्षरण रोका जा सकता है।
(ii) घास के मैदानों को चारागाह न बनाकर, पशुओं को घास काटकर खिलाना चाहिए। इससे घास की जड़ें भूमि को जकड़े रहती हैं।
(iii) मेढ़ बनाकर व भूमि को समतल बनाकर मृदा क्षरण रोका जा सकता हे।
(iv) पौधों की पक्तियां भूमि की ढाल व वायु की दिशा के विपरीत रखनी चाहिए।
(v) ढालू जमीन पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर जल प्रवाह को रोका जा सकता है।
मृदा संरक्षण के लिए सरकारीस्तर पर प्रथम योजना से ही प्रयास आरम्भ हो गए थे। यद्यपि देश में मृदा संरक्षण संबंधी गतिविधयों के वैचारिक स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया है, लेकिन मिट्टी के कटाव, उर्वरक शक्ति में कमी की प्रक्रिया को कम करना, अनुपजाऊ जमीन को खेती योग्य बनाना आदि मृदा संरक्षण के कई कार्यक्रम शुरू किए गए। प्रथम योजना में मृदा संरक्षण हेतु 1.6 करोड़ रुपये व्यय किये गए और 10 क्षेत्राीय अनुसंधान व प्रशिक्षण केन्द्र खोले गए। 1953 में केन्द्रीय मृदा संरक्षण डिवीजन की स्थापना की गयी। दूसरी योजना में इस कार्यक्रम पर 20 करोड़ रुपये व्यय किये गए तथा 300 लाख हेक्टेयर भूमि का संरक्षण की दृष्टि से सर्वेक्षण किया गया। तीसरी योजना में मृदा संरक्षण हेतु 78 करोड़ रुपये व्यय किये गए तथा 44.87 लाख हेक्टैयर भूमि का सर्वेक्षण किया गया। चैथी व पाँचवी योजना में मृदा संरक्षण पर क्रमशः 161 करोड़ रुपये व 215 करोड़ रुपये व्यय निर्धारित किया गया। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, असम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा व नागालैण्ड में स्थानान्तरित कृषि (Shifting Cultivation) पर नियंत्राण के लिए विशेष योजना शुरू की गयी। अखिल भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण (All India Soil and Land use Survey) कार्यक्रम के तहत पठारी जमीन का संरक्षण, झूम खेती पर रोक, आवाह क्षेत्रा का चित्रण, वर्गीकरण, व जलसंभर (water shed) की प्राथमिकताओं को सुनिश्चित करने के लिए समुचित प्रयास किये जा रहे हैं।

प्रश्न 14. नहर सिंचाई के हानिकारक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर : भारत को प्रकृति ने पर्याप्त जल संसाधन प्रदान किये हैं तथा अपनी विशाल जल क्षमता का उपयोग करने के लिए देश ने अनेक जलाशयों व नहरों का निर्माण किया है। देश की कुल सिंचित भूमि का लगभग 40 प्रतिशत भाग नहरों द्वारा सींचा जाता है। यद्यपि, नहरें सिंचाई का काफी सस्ता व सहज उपलब्ध साधन हैं, लेकिन अनेक कारणों से इन्हें अहितकर भी कहा जाता है। कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंः
1. नहरों के निर्माण से पूर्व बड़े.बड़े बांध व जलाशय बनाए जाते हैं तथा उन पर करोड़ों रुपये का व्यय होता है और लाखों एकड़ भूमि को अधिग्रहीत किया जाता है। इस भूमि पर खड़े असंख्य वृक्षों को तो नष्ट किया ही जाता है, साथ ही, अन्य वनस्पति व वन्य प्राणियों की भी हानि होती है, जिससे पर्यावरण असन्तुलन का खतरा भी पैदा हो जाता है।
2. वर्षा ऋतु में कृषकों को कम पानी व शीत के उत्तरार्ध में अधिक पानी की आवश्यकता रहती है। लेकिन नहरों में वर्षा ऋतु में अधिक पानी व शीत ऋतु में कम पानी रहता है।
3. सिंचाई के समय खेतों में अधिक जल चला जाने से जलाक्रान्त की समस्या पैदा हो जाती है और वहां मलेरिया व इसी प्रकार के अन्य रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती हे।
4. कृषकों व जल-वितरण एजेंसियों के बीच सहयेग व समन्वय की भी अनेक समस्याएं देखने में आती हैं।
5. नहरों में बहने वाले जल का काफी भाग मिट्टी द्वारा सोख लिया जाता है और भाप बनकर उड़ भी जाता है।
6. नहरों के लिए बड़-बड़े बांधों के निर्माण से पारिस्थिति असंतुलन उत्पन्न हो जाने का खतरा रहता है। वनों के समाप्त हो जाने से जल ग्रहण क्षेत्रा असुरक्षित हो जाता है तथा भूक्षरण के कारण जलाशयों में मिट्टी भरने की आशंका रहती है।
7. नहरों के पानी से सिंचित भूमि में लाख व क्षार की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है।
8. मिट्टी के नम हो जाने के कारण निकटवर्ती सड़कों व भवनों के क्षतिग्रस्त होने की संभावना रहती है।
9. निकटवर्ती कुओं के पानी की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 15. (क) निम्नलिखित के प्रमुख लक्षणों के बारे में लिखिए:
(i) चोल वास्तुकला (ii) बैसाखी
(iii) नव-कला आंदोलन
(ख) निम्नलिखित के बारे में आप क्या जानते हैं?
(iv) मुंडा आंदोलन (v) विज्ञान संवर्द्धन की भारतीय संस्था
(vi) इल्बर्ट बिल (vii) शारदा अधिनियम
(viii) 1854 का शिक्षा प्रेषण
(ग) निम्नलिखित क्यों प्रसिद्ध हुए?
(ix) राम मनोहर लोहिया (x) सी.वाई. चिंतामणि
(xi) हेनरी काॅटन (xii) तेज बहादुर सप्रू
(xiii) वीरेसिलंगम पी.के. (xiv) भूलाभाई देसाई
(xv) कमला देवी चट्टोपाध्याय

उत्तर : (i) 10वीं-11वीं सदी में चोल वास्तुकला का विकास हुआ, जिसके तहत वृहदेश्वर मंदिर (तंजोर) तथा विजयालय चोलेश्वर के मंदिर आते हैं। वे मंदिर द्रविड़ कला से प्रभावित हैं और इनमें सुंदर चित्राकारी भी की गयी है।
(ii) बैसाखी पर्व मुख्यतः पंजाब में सिखों द्वारा फसल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। इस मौके पर वे सज-धज कर भांगड़ा नृत्य करते हैं और जश्न मनाते हैं।
(iii) नव-कला आंदोलन भारतीय चित्राकला शैली के यूरोपियन प्रभाव से उत्पन्न प्रभाव को माना जाता है। इसके प्रणेता अवनीन्द्रनाथ टैगोर, नंदलाल बोस तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर रहे हैं।
(iv) अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनकी शोषणपरक नीतियों से तंग आकर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में दक्षिण बिहार में 1895.1900 तक चलाया जाने वाला जनजातीय आंदोलन।
(v) 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में वैज्ञानिक प्रविधियों के संवर्द्धन हेतु अखिल भारतीय संस्थान के रूप में स्थापित संस्था, जिसने वैज्ञानिक पृष्ठ भूमि को आधार प्रदान किया।
(vi) विधि सदस्य सी.पी. इल्वर्ट द्वारा 2 फरवरी, 1883 को विधान परिषद में प्रस्तुत विधेयक (इलबर्ट बिल), जिसका उद्देश्य जाति-भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताओं को समाप्त कर, भारतीय तथा यूरोपीय न्यायाधीशों की शक्तियां समान करना था।
(vii) श्री हरविलास शारदा के प्रयासों से बाल विवाह को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बना, जिसके द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु सीमा बढ़ा कर बाल विवाह पर रोक लगाने की कोशिश की गयी।
(viii) बोर्ड आॅफ कंट्रोल के अध्यक्ष सर चाल्र्स वुड की अध्यक्षता में गठित कमिटी द्वारा 1854 में भारत में शिक्षा की वृहत् योजना का नाम जिसे भारतीय शिक्षा का ‘गैग्नाकार्टा’ भी कहा जाता है।
(ix) आधुनिक भारत के समाजवादियों में सर्वाधिक आदरणीय नेता के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने समाजवादी विचारधारा को बढ़ाने में अहम भूमिका निभायी।
(xi) वर्ष 1904 में हुए कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष, भारतीय सिविल सेवा के सदस्य तथा 1906.10 तक ब्रिटिश संसद सदस्य रहे। उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ नामक पुस्तक भी लिखी।
(xii) बनारस में सेंट्रल हिंदू काॅलेज के निर्माण में एनी बेसेंट के सहकर्मी, मालवीय के साथ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक, होम रूल आंदोलन के समय राजनीति में प्रवेश, नेहरू कमिटी रिपोर्ट से संबंधित तथा गोलमेज सम्मेलनों के प्रतिभागी।
(xiv) प्रख्यात वकील तथा उदारवादी नेता, जिन्होंने च£चत ‘आई.एन.ए. ट्रायल’ में बचाव पक्ष का नेतृत्व किया था।

प्रश्न 16. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत में राजनीतिक चेतना के प्रेरक कारणों की विवेचना कीजिये।

उत्तर : भारत में अंग्रेजी प्रभुसत्ता कायम होने का प्रमुख कारण यहां राष्ट्रीयता का अभाव था। भारत राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से विभिन्न स्तरों में विभाजित था। 1857 की क्रांति की विफलता

का यह एक प्रमुख कारण बना। इसी समय कुछ विशेष कारणों एवं परिस्थितियों से भारत में राजनीतिक चेतना का आविर्भाव हुआ। इसे हम निम्नलिखित भागों में बांट सकते हैं -
1. समाज के विभिन्न वर्गों में ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के खिलाफ असंतोष - अंग्रेजों की भू-राजस्व, औद्योगिक एवं व्यापारिक नीतियों से कृषक, मजदूर, मध्यम वर्ग, उद्योगपति आदि वर्गों के हित प्रभावित हुए। कृषकों को उनकी भूमि से बेदखल कर उन पर अतिरिक्त कर का बोझ लादा गया, मजदूर बेरोजगार हुए, उद्योगपति अपेक्षित लाभ से वंचित कर दिये गये तथा मध्यम वर्ग में बेरोजगारी, अशिक्षा आदि जैसी समस्याओं ने उनके विकास की गति को अवरुद्ध किया।
2. भारत का प्रशासनिक एवं राजनीतिक एकीकरण - ब्रिटिश सरकार ने भारत का राजनीतिक एकीकरण कर सम्पूर्ण भारत में एक प्रशासनिक व्यवस्था कायम की। इसी प्रकार रेल एवं डाक व्यवस्था शुरू होने से भारतीयों का एक-दूसरे से सम्पर्क बढ़ा। अंग्रेजों को आर्थिक नीतियों से यहां आर्थिक एकीकरण भी संभव हुआ। यह सब अंग्रेजों ने अपने हित के लिए किया परन्तु इससे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना बढ़ी।
3. पाश्चात्य शिक्षा एवं विचारों का प्रसार - अंग्रेजों को यहां शिक्षा का माध्यम बनाया। फलस्वरूप, शिक्षित वर्ग पाश्चात्य दर्शन, यथा-स्वतंत्राता, एकता एवं प्रजातंत्रा, समाजवाद जैसे विकसित पाश्चात्य दर्शन से अवगत हुआ। समाज के इसी वर्ग ने राष्ट्रीय आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ली। वे लोग भारत में भी इस दर्शन को क्रियान्वित करने की मांग करने लगे।
4. समाचार पत्रों की भूमिका - समाचार पत्रों के आगमन से देशभक्ति एवं विकसित पाश्चात्य दर्शन के प्रसार में सहूलियत हुई। राष्ट्रवादी नेताओं ने अंग्रेजी एवं स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों को राष्ट्रीयता के प्रसार का एक सशक्त माध्यम बनाया।
5. सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन - इस आंदोलन ने जहां सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रा में कई सुधार किये, वहीं भारत के गौरवशाली अतीत की याद दिला कर लोगों के आत्मविश्वास को बढ़ाया। इस आंदोलन के नेताओं ने स्वराज एवं राजनीतिक सुधार पर भी बल दिया।
6. फूट डालो एवं शासन करो की नीति - अंग्रेजों ने एक ओर जाति-भेद को बढ़ावा दिया तो दूसरी ओर हिन्दुओं एवं मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काने का भी प्रयास किया।
7. लाॅर्ड लिटन एवं लाॅर्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियां - इनके कार्यकाल में प्रेस की स्वतंत्राता पर पाबंदी लगायी गयी तथा शास्त्रा कानून पारित किया गया। इनकी अन्य नीतियों से भी जन आक्रोश बढ़ता चला गया।
8. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उत्पत्ति - इस संगठन के प्रारंभिक उद्देश्यों में लोगों में राष्ट्रीयता की भावना तथा राजनीतिक चेतना का विकास करना प्रमुख था। इस संगठन ने इस दिशा में राष्ट्रीयता को एक संगठनात्मक आधार प्रदान किया। इन सभी कारणों से लोगों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ और शीघ्र ही एक राष्ट्रीय आंदोलन का जन्म हुआ, जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।

प्रश्न 17. शिक्षाविद् के रूप में रवीन्द्राथ टैगोर की भूमिका की विवेचना कीजिए।

उत्तर : भारतीय स्वतंत्राता आंदोलन के बहुमूल्य रत्नों में एक नाम रवीन्द्रनाथ टैगोर का है। वे बंगाल के एक सभ्रांत जमींदार घटाने से ताल्लुक रखते थे। खुद शिक्षित होने के कारण वे शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते थे। उन्हें ‘गुरु’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था। साहित्य के क्षेत्रा में वे बेजोड़ थे तथा उनकी प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। रवीन्द्रनाथ टैगोर शिक्षा को एक नया आयाम देना चाहते थे। इस क्षेत्रा में उनके विचार अन्य राष्ट्रीय नेताओं से भिन्न थे। शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने कलकत्ता में ‘शांति निकेतन’ की स्थापना की थी। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का विचार था कि शिक्षा और प्रकृति का अटूट संबंध है। वे प्राकृतिक माहौल में दी गयी शिक्षा को ज्यादा असरदार मानते थे। उनका मानना था कि प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखाती है तथा एक ऐसा स्वच्छंद एवं अनुकूल माहौल प्रदान करती है, जिसमें शिक्षा ज्यादा कारगर ढंग से प्राप्त हो सकती है। अपने द्वारा स्थापित ‘शांति निकेतन’ में उन्होंने अपने इस दृष्टिकोण का प्रयोग किया। यहां शिक्षा प्रकृति की गोद में प्रदान की जाती थी।
रवीन्द्रनाथ ‘गुरु-शिष्य’ परम्परा के समर्थक थे। वे ‘गुरुकुल प्रणाली’ के भी समर्थक थे। उनका विचार था कि गुरु और शिष्य का संबंध शिक्षा की दिशा और सार्थकता के लिए अनिवार्य है। उनका मानना था कि गुरु का आचरण उत्कृष्ट होना चाहिए, ताकि शिष्यों में उनके प्रति सम्मान तथा उनका अनुसरण करने की प्रवृत्ति का विकास हो सके। रवीन्द्रनाथ ‘मानवतावादी’ थे। उनके विचार में शिक्षा का उद्देश्य मानव समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करना तथा छात्रों का समुचित शारीरिक एवं मानसिक विकास करना था। वे संकीर्ण विचारधरा के खिलाफ थे। उन्होंने अपनी एक कविता में अपने भाव प्रकट किये थे। उन्होंने कहा था कि, “जहां मन डर से उन्मुक्त हो, जहां मस्तिष्क ऊंचा हो, जहां ज्ञान स्वतंत्रा हो, जहां विश्व छोटे-छोटे संकीर्ण घरेलू दीवारों में नहीं बंटा हो, जहां लक्ष्य स्पष्ट हो, इस प्रकार के स्वतंत्रा स्वर्ग में, हे भगवान! मेरे देश केा निद्रा से जगाओ।” इस प्रकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक भयमुक्त एवं प्रगतिशीत समाज की कल्पना करते थे, जो राष्ट्र को आजादी की ओर ले जा सके। उनका मानना था कि जब तक हम शिक्षित नहीं होंगे, हम अपने अंदर व्याप्त दोषों को दूर नहीं कर पायेंगे और जब तक ऐसा नहीं होगा हमारे लिए स्वतंत्राता का कोई मायने नहीं रह जायेगा। इस प्रकार वे राजनीतिक स्वतंत्राता से जरूरी मानसिक स्वतंत्राता को समझते थे।
टैगोर के अनुसार शिक्षण का माध्यम ऐसा होना चाहिए। जिसे बच्चा भी समझ सके। अतः शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए न कि अंग्रेजी में। टैगोर के अनुसार शिक्षा में सामाजिक मूल्यों तथा गुणों नैतिक प्रकल्पनाओं तथा मापदण्डों का उल्लेख होना चाहिये। आधुनिक शिक्षा सभ्यता विरोधी है तथा यह हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर से दूर करती है। विश्वविद्यालय स्तर पर भी हमें भारतीय इतिहास दर्शन, साहित्य तथा धर्म की शिक्षा दी जानी चाहिए। टैगोर के अनुसार शिक्षा का संबंध संस्कृति, ललित कला तथा आर्थिक विकास से होना चाहिए। उनके अनुसार कला एवं संगीत राष्ट्रीय अभिव्यक्ति के सर्वोच्च साधन हैं। उनके द्वारा लिखित गीत ‘आसार सोनार बांग्ला’ बांग्लादेश का राष्ट्रीय गीत है। उनके अनुसार शिक्षा द्वारा हम रचनात्मक कार्यकुशलता को बढ़ावा दे सकते हैं तथा अपने जीवन-यापन का साधन पा सकते हैं।
टैगोर सार्वभौमवाद में विश्वास रखते थे। वे सभ्यताओं के सम्मिश्रण की वकालत करते थे। इसे उद्देश्य से उन्होंने 1921 में ‘विश्वभारती’ की स्थापना की थी। वे चाहते थे कि पूर्व को पश्चिमी देशों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण ग्रहण करना चाहिए तथा पश्चिम को पूर्व से अनेकता में एकता का विचार ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार अपने अनूठे विचारों से गुरुदेव ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को एक नया आयाम देने का प्रयास किया।

प्रश्न 18. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखिये:

(I) होमरूल आन्दोलन (II) मिन्टो-मार्ले सुधार
(III) नेहरू रिपोर्ट (IV) शिमला सम्मेलन
(V) रेडक्लिफ अवार्ड

उत्तर : (I) भारत में होमरूल आंदोलन को प्रेरणा आयरलैंड में इसी प्रकार चल रहे आन्दोलन से मिली, जो सरकार को उखाड़ फेंकने में नहीं, बल्कि प्रशासन में सुधार का पक्षधर था। इस आंदोलन में ऐनी बेसेन्ट एवं तिलक ने अग्रणी भूमिका निभाई क्रमशः पूना और मद्रास में होमरूल लीग की स्थापना की गयी और स्वराज की मांग की गयी। इस लीग ने लखनऊ समझौते में अहम भूमिका निभाई। साथ ही, राजनीतिक चेतना जागृत करने में लीग का योगदान उल्लेखनीय रहा।

(II) मिन्टो-मार्ले सुधार मुख्यतः उदारवादियों को उग्रवादियों से अलग करने के उद्देश्य से किया गया। 1909 के अधिनियम के तहत विधानपरिषद् में भारतीयों की संख्या बढ़ायी गयी तथा उन्हें बजट पर बहस करने तथा सवाल पूछने का अधिकार दिया गया। यहीं से चुनाव प्रक्रिया का भी श्रीगणेश हुआ, परन्तु ‘अलग प्रतिनिधित्व’ के माध्यम से हिन्दुओं एवं मुसलमानों को अलग करने का प्रयास किया गया।

(III) साइमन कमीशन की असफलता एवं लाॅर्ड बर्केनहेड की व्यंग्यात्मक टिप्पणियों से उत्तेजित होकर मोतीलाल नेहरू, तेज बहादुर, सप्रू, जिन्ना आदि ने एक संविधान का निर्माण किया, जिसे ‘नेहरू रिपोर्ट’ कहा जाता है। इस संविधान में ‘डोमिनियन शासन’, ‘एकात्मक शासन’ आदि की बात की गयी थी। जिन्ना ने इसमें अपने’ 14 सूत्राी कार्यक्रम’ को शामिल करने की बात की, जिसमें पृथक् निर्वाचन, केन्द्र में एक तिहाई प्रतिनिधित्व आदि की मांग की गयी। फलतः सारा समझौता खटाई में पड़ गया।

(IV) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लाॅर्ड वेवेल ने युद्ध में कांग्रेस का सहयोग प्राप्त् करने तथा एक अस्थायी सरकार के गठन हेतु शिमला में एक सम्मेलन करने का फैसला किया। इस सम्मेलन में एक कार्यपालिका के गठन प्रस्ताव किया गया, जिसमें हिन्दू और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाना था, परन्तु कांग्रेस द्वारा मुस्लिम सदस्यों के चुनाव की इच्छा को जिन्ना ने ठुकरा दिया और वार्ता विकल हो गयी।

(V) भारत विभाजन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने एक वकील रेडक्लिफ की अध्यक्षता में एक सीमा-आयोग का गठन किया। इस आयोग ने जल्दीबाजी में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण किया। मुसलमान गुरदासपुर,, मुर्शिदाबाद, नादिया एवं कलकत्ता के छिन जाने से क्षुब्ध थे तथा हिन्दू व सिख लाहौर, नहर प्रदेश, खुल्ना एवं चटगांव की पहाड़ियों के छिन जाने से क्षुब्ध थे। परन्तु सत्ता प्राप्त करने की होड़ में इसका व्यापक विरोध नहीं हो सका।

प्रश्न 19. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखिये:

(I) बुद्ध का धर्मचक्रप्रवर्तन(II) ब्रह्म समाज
(III) भक्ति आंदोलन(IV) शर्की स्थापात्य कला
(V) विजय स्तंभ

उत्तर : (I) महात्मा बुद्ध ने 35 वर्ष की आयु में गया (बिहार में उर्वला नामक स्थान पर मोक्ष प्राप्त किया)। इसके बाद उन्होंने वाराणसी के निकट सारनाथ में अपने पांच ब्राह्मण शिष्यों को पहली बार उपदेश दिया। उनका यही प्रथम उपदेश ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहलाता है। यह बुद्ध के जीवन की पांच महान घटनाओं में से एक है और इसका प्रतीक चिन्ह ‘चक्र’ है।

(II) ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में राजा राममोहन राय ने की थी। इसका उद्देश्य हिन्दू धर्म में व्याप्त दोषों को दूर करना तथा एकेश्वरवाद का प्रचार करना था। समाज ने स्त्रिायों की दशा में सुधार, शिक्षा, प्रशासनिक सुधार आदि क्षेत्रों में भी योगदान दिया। आगे चल कर देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचन्द्र सेन ने इस समाज को नेतृत्व प्रदान किया।

(III) भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण-भारत के आलवार एवं नयनारों ने की थी। वहां से उत्तरी भारत में इसका प्रसार हुआ। इस आंदोलन के संत, यथा-कबीर, नानक, तुलसी, चैतन्य आदि ने धार्मिक जटिलता, जांत-पांत के खिलाफ तथा भाई-चारे के समर्थन में कार्य किया। इनक क्रियाकलापों से निम्न वर्ग के लोग जाग्रत हुए, परन्तु उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। इस आंदोलन ने क्षेत्राीय भाषाओं का विकास किया।

(IV) मलिक सरवर ने जौनपुर में शर्की साम्राज्य की स्थापना की थी। वहां की स्थापत्य कला अनूठी है। सल्तनत काल की स्थापत्य कला में हिन्दू प्रभाव का यह अनूठा उदाहरण है। तिरछी दीवार, चैकोर स्तंभ, छोटी गलियारे आदि इस स्थापत्य कला की विशिष्टता है। अटाला देवी मस्जिद तथा जौनपुर की अन्य मस्जिदों में मीनारों का अभाव है, जो इन्हें अन्य मस्जिदों से विशिष्टता प्रदान करती है।

(V) मेवाड़ के राणा कुम्भा ने मालवा ने महमूद खिलजी को परास्त करने के पश्चात् चित्तौड़ में ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण कराया था। यह स्तंभ मुसलमानों के विरुद्ध राजपूत प्रतिशोध का प्रतीक है। इस स्तंभ में एक लेख भी अभिलेखित है। ज्ञातव्य है कि महमूद खिलजी ने भी जीत का दावा करते हुए माण्डू में एक सात मंजिला इमारत का निर्माण कराया था।

प्रश्न 20 : ”शिक्षक वह माली है जो बच्चा रूपी पौधों को सींचकर बड़ा करता हैव्याख्या करें।

उत्तर : शिक्षक देश की संस्कृति का प्रतिनिधि होता है। उन पर राष्ट्रनिर्माण की जिम्मेदारी होती है। अतः उन्हें सर्वगुण सम्पन्न होना पड़ता है। उनमें निम्नलिखित गुण होना चाहिए।
1. सामान्य किन्तु आवश्यक वेश-भूषा जो साफ-सुथरा हो।
2. उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होना चाहिए।
3. स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए। एक स्वस्थ्य मानव में ही स्वस्थ मस्तिष्क विराज करता है।
4. सहानुभुति एवं सहयोग की भावना हो।
5. अध्यापन कार्य में रूचि रखता हो।
6. सहनशील एवं धैर्यवान हो।
7. शिक्षा का विषय, शिक्षण सत्रों एवं शिक्षण सिद्धान्तों का ज्ञाता होना चाहिए।
8. स्फूर्ति, उत्साह एवं आत्मविश्वास से पूर्ण होना चाहिए।
9. लगनशील, सदाचारी तथा हँसमुख होना चाहिए।
10. बाल मनोविज्ञान का ज्ञाता होना चाहिए।
11. छात्रों की वैयक्तिक विभिन्नता का ज्ञान होना चाहिए।
12. कुशल अभिव्यक्ति क्षमता का स्वामी होना चाहिए।
13. कथनानुसार आचरण करने वाला।
14. अध्यापन-कार्य में रूचि रखनेवाला।
15. कक्षा नियंत्राण की कला रखनेवाला।
16. समय का पाबंद होना चाहिए।
17. आशावादी तथा न्याय एवं निष्पक्षता का प्रतीक होना चाहिए।
18. उदार, त्यागी, पहल शक्ति और साघन सम्पन्न होना चाहिए।
19. कत्र्तव्यनिष्ठ, इमानदार और शिक्षणविधियों का ज्ञाता होना चाहिए।
20. मृदुभाषी, वाक्पटु तथा मिलनसार होना चाहिए।
21. धर्मनिरपेक्ष एवं समाज से सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता रखता हो।
22. चरित्रावान तथा ज्ञान पिपासु हों।

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