सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 6 (प्रश्न 1 से 14 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 6 (प्रश्न 1 से 14 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न1 : निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
(क) संसदीय कार्य प्रणाली में नियम 184 तथा 193 क्या संकेत देते हैं।
(ख) “गुजराल डाक्ट्रिन“ (सिद्धांत) का क्या अर्थ है? इसके विशिष्ट सिद्धांतों को लिखिए।
(ग) केंद्र में युनाइटेड फ्रंट सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(घ) भारत के संविधान में दिए गए किन्हीं चार मौलिक कर्तव्यों को लिखिए।
(ड़) भारत के संविधान में बाल श्रमिक के लिए क्या विशेष प्रावधान हैं?
(च) भारतीय संविधान में अनुच्छेद 356 क्या है? टिप्पणी कीजिए?

उत्तर : (क) संसदीय कार्य प्रणाली में नियम 184 संकेत करते हैं। कि निंदा प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव से भिन्न होते हैं तथा नियम 193 यह संकेत देते हैं कि अध्यक्ष या सभापति किसी मामले के महत्व को देखते हुए उस पर “अल्पकालीन चर्चा“ करा सकते हैं।
(ख) गुजराल डाॅक्ट्रिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्राी इंद्र कुमार गुजराल द्वारा प्रवर्तित एक सिद्धांत है जो पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने, द्विपक्षीय विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा, एक-दूसरे की अखंडता एवं प्रभुसत्ता का सम्मान करने पर बल देता है।
(ग) केंद्र में युनाइटेड फ्रंट सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अंतर्गत सभी दलों के घोषणा पत्रों में उल्लिखित तत्वों को संतुलित मात्रा में स्थान दिया गया है, जिसमें केंद्र-राज्य के बीच मधुर सम्बन्ध, धारा 356 का दुरुपयोग रोकना, समाजवादी ढांचे को बनाए रखना, गरीबी एवं बेरोजगारी, उन्मूलन, ग्रामीण क्षेत्रों सहित कृषि का विकास करने जैसे तथ्य महत्वपूर्ण हैं।
(घ) भारत के संविधान में उल्लिखित चार मूल कर्तव्य इस प्रकार हैं -
I. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थानों, राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान का आदर करें।
II. स्वतंत्राता आंदोलन को प्रेरित करने वाले अन्य आदर्शों को हृदय में संजोए तथा उसका पालन करें।
III. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें।
IV. देश की रक्षा करें तथा आह्नान करने पर राष्ट्र की सेवा करें।
(ड़) संविधान के अनुच्छेद 24 में बाल श्रमिक से संबंधित प्रावधान हैं, जिसके अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी  कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय स्थिति में नियोजित नहीं किया जाएगा।
(च) जब किसी राज्य में संवैधानिक संकट उठ खड़ा होता है तो राष्ट्रपति राज्यपाल के प्रतिवेदन से या स्वयं भी आश्वस्त होने पर अनुच्छेद 356 का सहारा लेकर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर देते हैं। यह अनुच्छेद केंद्र-राज्य संबंध को बिगाड़ने में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। 

प्रश्न 2 : ”भारतीय राजव्यवस्था संघात्मक की अपेक्षा एकात्मक अधिक है।“ विवेचना कीजिए।

उत्तर : संविधान में फेडरेशन (संघात्मक) शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। के.सी व्हीयर का मत है कि ”भारत मुख्यतः एकात्मक राज्य है जिसमें संघीय विशेषताएं नाममात्रा की हैं।“ पायली का मत है कि “भारत का ढांचा संघात्मक है, किन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है। उपर्युक्त दोनों कथनों का अभिप्राय यह है कि भारत में एक अनोखी व्यवस्था है जिसमें संघात्मक तथा एकात्मक दोनों प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं।
भारतीय राजव्यवस्था में संविधान की सर्वोच्चता, केंद्र तथा राज्यों में पृथक-पृथक सरकारें, केंद्र राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन स्वतंत्रा एवं सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक पुनरावलोकन, राज्य सभा और संविधान संशोधान में राज्यों की सहमति लेना आदि संघात्मक सरकार के लक्षण हैं।
भारत में संघात्मक लक्षण होते हुए भी अनेक एकात्मक लक्षण पाए जाते हैं। यह हैं - राज्य तथा संघ के लिए एक ही संविधान (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर), इकहरी नागरिकता, एकीकृत न्याय व्यवस्था, केंद्रीय सरकार को राज्यों की सीमा परिवर्तन का अधिकार, राज्यों के राज्यपालों की  नियुक्ति एवं पदमुक्ति, आर्थिक सहायता के लिए राज्यों की केंद्र सरकार पर निर्भरता, राज्यों को राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व, शक्तियों का बंटवारा केंद्र के पक्ष में, राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए, आपातकाल में केंद्र को अधिकारों को प्राप्त होना।
उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि भारत में संघात्मक एवं एकात्मक लक्षणों का समावेश है। व्यवहार में कार्यप्रणाली संघात्मक है लेकिन स्थायी प्रवृत्ति एकात्मक है। सामान्यतः संघात्मक व्यवस्था कार्य करती है, लेकिन केंद्र सरकार को यह अधिकार दिए गए हैं कि वह जब उचित समझे इसे एकात्मक स्वरूप में कुछ समय के लिए परिवर्तित कर सकती है। संभवतः संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय अखंडता बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था की है।

प्रश्न 3 : भारतीय राजनीति में क्षेत्राीय दलों की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर : भारत में स्वतंत्राता प्राप्त करने के पश्चात् भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही एकमात्रा ऐसा दल था जिसका पूरे भारत में जनाधार था तथा लगभग सभी राज्यों एवं केंद्र में उसकी सरकार थी। सर्वप्रथम केरल में गैर कांग्रेसी-साम्यवादी सरकार बनी। तब क्षेत्राीय दलों की प्रभुता का प्रारंभ हुआ।
कालांतर में अनेक क्षेत्राीय दलों का निर्माण हुआ। जिन्होंने क्षेत्राीय समस्याओं को उठा कर आंदोलन चलाए तथा राज्यों में चुनावों में अपनी भागीदारी एवं विजयश्री को बढ़ाया। राज्यों में क्षेत्राीय दलों की सरकारें भी बनने लगीं तथा उनके जनाधार में भी बढ़ोत्तरी हुई।
पिछले दो दशकों में राष्ट्रीय दलों विशेष रूप से कांग्रेस के जनाधार में कमी आई केंद्र में वह स्थायी सरकार देने में सक्षम नहीं रही। कुछ अन्य राजनीतिक दल जैसे भारतीय जनता पार्टी के जनाधार में वृद्धि हुई। केंद्र में अस्थिर एवं गठबंधन अथवा मोर्चा सरकारों का युग प्रारम्भ हुआ जिसमें क्षेत्राीय दलों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई।
क्षेत्राीय दल वर्तमान में केंद्रीय सरकार के निर्माता ही नहीं अपितु भाग्य विधाता भी हो गए हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि क्षेत्राीय दल अपनी जायज एवं नाजायज मांगे मनवाने में सफल हो रहे हैं।

प्रश्न 4 : पंचायती राज संस्थाओं की क्रियात्मकता पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर : 1959 से प्रारम्भ हुई पंचायत राजव्यवस्था में क्रियात्मकता का अभाव बना रहा। इसे दृष्टि में रखकर संविधान का 73वां संविधान संशोधन किया गया। इस संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को अधिक क्रियात्मकता प्रदान करने का प्रयास किया गया। पंचायती राज को संवैधानिकता प्रदान की। पंचायती संस्थाओं का कार्यकाल सुनिश्चित किया गया तथा एक निश्चित समय के पश्चात् उनका चुनाव कराना अनिवार्य किया गया। महिलाओं को क्रियाशील करने के लिए एक-तिहाई आरक्षण प्रदान कर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की गई।
पंचायतों को अनेक प्रभावी अधिकार प्रदान किए गए। 11वीं अनुसूची जोड़कर उनके विषय सुनिश्चित किए गए। उन्हें अपने आय के स्रोत स्वयं पैदा करने के लिए अधिकार भी प्रदान किए गए हैं। अनेक राज्य सरकारें इन संस्थाओं की क्रियात्मकता बढ़ाने के लिए इन्हें प्राइमरी शिक्षा पर नियंत्राण भी प्रदान करने जा रही है।
लेकिन समस्त प्रावधानों के बावजूद पंचायती राज संस्थाएं अभी सही अर्थों में क्रियात्मक नहीं हो पाई हैं जिसके अनेक कारण हैं, जैसे - अशिक्षा, जातिवाद, हिंसा, दलगत, स्वार्थगत राजनीति, संसाधनों की अपर्याप्तता आदि।

प्रश्न 5 : निम्नलिखित से क्या अभिप्राय है?
(i) कार्य स्थगन प्रस्ताव
(ii) गिलोटिन
(iii) वित्त विधेयक
(iv) संचित निधि 
(v) भारतीय संविधान 355 
 
उत्तर : (i) कार्य स्थगन प्रस्ताव - इसे काम रोको प्रस्ताव भी कहते हैं। सदन में जब किसी तात्कालिक विषय पर विचार-विमर्श  एवं समाधान तुरंत आवश्यक हो तो सदन के निर्धारित कार्यक्रम को बीच में ही इस प्रस्ताव द्वारा रोक कर (स्थगित कर) इस पर विचार किया जाता है।
(ii) गिलोटिन - किसी सदन में वाद-विवाद (बहस) को बीच में ही समाप्त कर उस पर तुरंत मतदान कराने की प्रक्रिया को कहा जाता है अथवा वाद-विवाद का समय निश्चित कर उसके तुरन्त बाद उस पर मतदान करा दिया जाता है।
(iii) वित्त विधेयक - ऐसे विधेयक जिनमें साधारणतः प्रतिवर्ष आगामी वित्त वर्ष के लिए सरकार के कर-प्रस्तावों को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं। इनमें धन विधेयक (अनु. 110) के लिए उल्लिखित मामले के अतिरिक्त मामलों भी सम्मिलित होते हैं।
(iv) संचित निधि - संविधान में भारत की एक संचित निधि तथा राज्य में एक संचित निधि का प्रावधान है। संचित निधि (भारत) में भारत सरकार द्वारा प्राप्त हुण्डियां, उधार, राजस्व आदि सम्मिलित होते हैं एवं राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा प्राप्त राजस्व, हुण्डियां, उधार आदि सम्मेलन होते हैं। इस निधि पर प्रायः संवैधानिक पदों के वेतन भारित होते हैं। इससे धन निश्चिित प्रयोजन के लिए एवं प्रक्रिया से ही निकाला जा सकता है।
(v) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 355 - अनुच्छेद 355 में उल्लेख है कि संघ सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक राज्य का बाह्य आक्रमण तथा आंतरिक अशांति से बचाव करेगा और यह सुनिश्चि करेगा कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार चल रही है। 

प्रश्न 6 : भारत में सार्वजनिक व्यय को संसद जिन विधियों से नियंत्रित करती है, उनकी विेवेचना कीजिए 
  
उत्तर : संसदीय लोकतंत्रा की अपनी एक विशेषता है, जहाँ कार्यपालिका को संसद के प्रति जवाबदेह रहना पड़ता है। संसद द्वारा कार्यपालिका के ऊपर रखा जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण नियंत्राण है- उसके बजट के ऊपर निगरानी। कार्यपालिका संसद के अधिकृत किये बिना एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकती है। खर्च से पहले का नियंत्राण बजट प्रावधानों द्वारा होता है क्यांेकि इसमें एक निश्चित राशि कार्यपालिका के खर्च के लिए निर्धारित होती है। बजट के बाद का खर्च लेखा परीक्षण द्वारा निर्धारित है। लेखा परीक्षण का काम महालेखा नियंत्राण करते हैं। फिर लेखा परीक्षण रिपोर्ट को संसद के सामने राष्ट्रपति द्वारा रखा जाता है। लेकिन संसद के पास इतना समय नहीं होता है कि वो महालेखा नियंत्राक की रिपोर्ट की तकनीकी गुत्थ्यिों को देख सके इसीलिए लोक लेखा समिति इस रिपोर्ट की जाँच पूरी तरह करती है। इसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट व लेखा परीक्षण रिपोर्ट को सरकार और संसद को भेज देती है।
सरकारी उपक्रमों सम्बंधी समिति लेखा नियंत्राक के उन अंशों पर विचार करती है, जो सरकारी उपक्रमों से संबंधित रहती है। इन सभी समितियों की सिफारिशें और लेखा नियंत्राक की रिपोर्ट संसद के हाथ में ऐसा अस्त्रा है, जिससे वो लोक व्यय पर नियंत्राण रखती है। लोकसभा की प्राक्कलन समिति एक ”स्थाई मितव्ययता समिति“ के रूप में कार्य करती है। इसकी आलोचना और सुझाव सरकारी फिलूलखर्ची पर रोक लगाने का काम करते हैं।

प्रश्न 7 : आपके विचार में, भारत में राष्ट्रीय एकता की समस्याएं क्या हैं? इनको दूर करने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।

उत्तर : भारत की राष्ट्रीय अखंडता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृति के लोग परस्पर सद्भाव है कि देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृति के लोग परस्पर सद्भाव व मेलजोल के साथ रहते हैं। किसी योजना की बात हो या किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की, अखंडता की बात शासकों के लिए सर्वोपरि है। अखंडता के लिए जरूरी है कि सभी समूहों और वर्गों को साथ लेकर चला जाए। सिर्फ राजनीतिक और भौगोलिक स्तर पर एकता रहने से ही काम नहीं चलता, अपितु सांस्कृतिक एकता का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत में विभिन्न संस्कृतियाँ अपने विभिन्न रंगों में मिलती हैं। फिर भी कुछ जगहों पर जातीय समस्या उभर कर सामने आई है। कहीं.कहीं तो जाति के आधार पर अलग प्रान्तों की माँग होने लगी है। भारत में असामान्य क्षेत्राीय विकास भी राष्ट्रीय एकता में बाधक रहा है। झारखण्ड आंदोलन या अलग राज्यों की भाग को इस नजर से देखा जा सकता है। क्षेत्राीयवाद व जातिवाद के बाद भाषावाद भी राष्ट्र की अखंडता के सामने प्रमुख समस्या है।
राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी क्षेत्रों का समान विकास हो। विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास कार्यों का लाभ सभी वर्गों के लोगों को मिले। साम्प्रदायिक दंगों को सख्ती के साथ कुचला जाना जरूरी है। इसके लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि देश के प्रति वे लोगों के भतर एक भावनात्मक लगाव पैदा करने में आगे आए।

प्रश्न 8 : भारत के नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक के कत्र्तव्यों तथा शक्तियों को, लेखा परीक्षण के संदर्भ में परिभाषित करते हुए यह बताइये कि कार्यपालिका के नियंत्राण से उनको स्वतंत्रा रखने के लिए संविधान में क्या व्यवस्था की गई है? 
 
उत्तर : (a) भारत के संविधान के अनुच्छेद 148 से 151 में नियंत्राण एवं महालेखा परीक्षक के संबंध में प्रावधान हैं। अनुच्छेद 148 के अनुसार, उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वह देश की समस्त वित्तीय प्रणाली का नियंत्राण करता है। अनच्छेद 149 के अनुसार, वह संघ राज्यों या संसद के किसी कानून के तहत किसी अन्य या संस्था के लेखों के संबंध में उन कत्र्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थी। भारत के नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक के लेखा परीक्षण के संबंध में कत्र्तव्य व शक्तियाँ निम्न प्रकार हैंः
(i) भारत और प्रत्येक राज्य व विधानसभा या प्रत्येक संघ राज्य क्षेत्रा की संचित निधि से सभी व्यय का संपरीक्षा और उन पर यह प्रतिवेदन कि क्या ऐसा व्यय विधि सम्मत है।
(ii) संघ या राज्य के विभाग द्वारा किए गए सभी व्यापार और विनियोग के हानि-लाभ लेखाओं की जाँच और उन पर प्रतिवेदन।
(iii) संघ राज्यों की आकस्मिक निधि और लोक लेखाओं के सभी व्यय की जाँच और उस पर प्रतिवेदन।
(iv) संघ/राज्य के आय-व्यय की जाँच ताकि यह ज्ञात हो सके कि राजस्व के निर्धारित, संग्रहण और उचित आवंटन के लिए पर्याप्त जाँच करने के लिए हुए निमित्त नियम और प्रतिक्रियायें बनाई गई हैं।
(v) संघ/राज्य के राजस्व के पर्याप्त रूप से वित्त पोषित सभी निकायों व प्राधिकारियों, सरकारी कंपनियों और अन्य निगमों व निकायों (यदि विधि द्वारा अपेक्षित हो) की आय-व्यय की जाँच व उस पर प्रतिवेदन। 
संघ संबंधी लेखा रिपोर्ट राष्ट्रपति को तथा राज्य संबंधी लेखा रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत की जाती है। नियंत्राक व महालेखा परीक्षक को कार्यपलिका के नियंत्राण के स्वतंत्रा रखने के लिए प्रमुख संवैधानिक व्यवस्थायें निम्न प्रकार हैंः
(i) उसके वेतन व भत्ते आदि भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
(ii) उसकी सेवा की शर्तें व वेतन संसद विधि द्वारा निर्धारित करेगी तथा उसका वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होगा। उसके सेवाकाल में उसके वेतन में उसके लिए अहितकारी कोई परिवर्तन नहीं होगा।
(iii) उसे साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ही संसद के दोनों सदनों के समावेदन पर हटाया जा सकता है।
(iv) उसका कार्यकाल 6 वर्ष का होगा तथा 65 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर पदमुक्त।
(v) सेवा निवृत्ति के बाद भारत सरकार/राज्य सरकार के अधीन कोई पद धारण नहीं कर सकता।

प्रश्न 9 : साधन का न्यूनतम लागत समायोजन से क्या तात्पर्य है। उदाहरण देकर

उत्तर :  स्वतंत्रा बाजार अर्थव्यवस्था में फर्म का ध्येय लाभ को अधिकतम बनाना होता है। लाभ उस समय अधिकतम होता है जब आगम अधिकतम और लागत न्यूनतम होती है।
फर्म उत्पादन की विभिन्न तकनीकों में से उसे चुनेगी और उत्पादन के विभिन्न साधनों को इसी अनुपात में समायोजित करेगी जिससे दी गई वस्तु की मात्रा के उत्पादन में न्यूनतम संसाधनों का उपयोग हो। संसाधनों की दुर्लभता  उनकी कीमत से इंगित होती है। वे संसाधन जो माँग के मुकाबले में अधिक दुर्लभ होते हैं, उनकी कीमत अधिक होती है। दी गई मात्रा के उत्पादन में फर्म उन्हें उस अनुपात में समायोजित करेगी जिससे प्रति इकाई उत्पाद लागत सबसे कम हो। इसे निम्न उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है।
मान लीजिए किसी वस्तु के उत्पादन में केवल श्रम और पूँजी ही ऐसे आगत साधन हैं जिनकी आवश्यकता है। कुछ ही सीमा तक वे एक दूसरे के प्रतिस्थापी हैं और दी गई मात्रा के उत्पादन के लिए उन्हें चार भिन्न तरीकों में समायोजित किया जा सकता है।
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ऊपर दिया गया उत्पादन फलन हमें यह नहीं बताता कि चारों में से कौन-सा तरीका उत्पादक द्वारा इस्तेमाल किया जाएगा। उत्पादक की रुचि भौतिक उत्पादन में न होेकर उस लागत में है जिस पर विभिन्न तरीके सी दी गई मात्रा उत्पादित कर सकते हैं। यह पता  लगाने के लिए हमें आगत साधनों की कीमत भी पता होनी चाहिए। मान लीजिए, श्रम की हर इकाई की कीमत 10 रुपये और पूँजी की हर इकाई की 15 रुपये। विभिन्न तरीकों द्वारा  दिए गए उत्पाद की उत्पादन लागत क्या होगी? 
ऊपर दी गई तालिका से स्पष्ट है कि तरीका C अपनाने से 490 इकाइयों के उत्पादन पर साधनों के समायोजन की लागत सबसे कम यानि 85 रुपये आती है। मान लीजिए कि अब आगत साधनों की कीमत बदल जाती है। पूँजी सस्ती होकर 8 प्रति इकाई पर उपलब्ध होने लगती है। इससे विभिन्न साधन समायोजन की कुल लागत बदल जाएगी। इससे तरीके B की कुल लागत सबसे कम यानि 62 रुपये हो जाएगी। 
यदि उत्पादन फलन बदलता है या साधनों की कीमत बदल जाती है तो विभिन्न तरीकों की लागत भी बदल जाएगी। अतः आखिरकार, फर्म उन्हीं साधनों को अपनाएगी जिनसे प्रति इकाई उत्पादन लागत सबसे कम होेगी।

प्रश्न 10 : वास्तविक, निजी एवं सामाजिक लगात की परिभाषा दिजीए और उदाहरण देकर समझाऐं।

उत्तर :  कुछ अर्थशास्त्राी मुद्रा लागत और वास्तविक लागत के बीच विभेद करते है। वास्तविक लागत से आशय स्वामी द्वारा साधनों की पूर्ति करने में उठाई गई परेशानी इत्यादि से है। इस प्रकार सभी काम (श्रम) किसी न किसी प्रकार बलिदान करते हैं। केम्ब्रिज के प्रोफेसर मार्शल इस सिद्धांत के समर्थक थे। 
वास्तविक लागत की धरणा के साथ मुशिकल यह है कि वह व्यक्तिपरक है। चूँकि यह व्यक्ति में आत्मगत होता है, इसलिए इसे नापना कठिन है। इन साधनों के स्वामियों द्वारा श्रम और पूँजी की पूर्ति और विभिन्न व्यक्तियों द्वारा श्रमपूर्ति की वास्तविक लागत की तुलना नहीं की जा सकती। आजकल आत्मपरक वास्तविक लागत को लागत की व्याख्या का सही अंग नहीं माना जाता।
निजी लागत वह लागत है जो किसी फर्म को एक वस्तु के उत्पादन में खर्च करनी पड़ती है। सामाजिक लागत वह लागत है जो सारे समाज को वस्तु के उत्पादन के लिए चुकानी पड़ती है। इन दोनों में भेद है, और अक्सर होता है। नीचे व्यक्त की गई बातों को देखिएः
1. फैक्ट्रियाँ अपनी चिमनियों से वातावरण मेें बहुत धुआँ छोड़ती हैं। यह उनकी लागत की बैलेंस शीट बनाते समय लागत में कहीं व्याख्यित नहीं होता। लेकिन इसकी सामाजिक लागत कपड़े धेने में आनेवाली अतिरिक्त लागत, सरकारी इमारतों को रेत द्वारा साफ करने या लोगों द्वारा उपचार पर खर्च की गई राशि के रूप में हो सकती है।
2. जंगल का एक निजी ठेकेदार बिना समझ-बुझ के पेड़ कटवाता है। समाज को इसकी लागत बाढ़, भूमि-कटाव, जानवरों के लिए प्राकृतिक सुरक्षा क्षेत्रा की हानि के रूप में देनी पड़ती है जो कि पेड़ों की लागत से कहीं अधिक होती है।
3. एक औद्योगिक रसायनिक कारखाना अपनी गन्दगी को नदी में छोड़ता है। इससे (1) नदी की मछलियाँ मर जाती हैं। (2) नदी से पीने का पानी बनाने के लिए म्युनिसिपिल निगमों को पानी को शुद्ध बनाने पर अधिक खर्च करना पड़ता है।
वातावरण प्रदूषण का सारा विवाद निजी और सामाजिक लागत के भेद को ही दिखाता है।
जब हम फर्म के उत्पादन की लागत की विवेचना करते हैं तो हमारा आशय निजी लागत से है न कि सामाजिक लागत से।

प्रश्न 11 : शुद्ध और पूर्ण प्रतिस्पर्ध की स्थिति के लिए कौन-कौन शर्तों  का होना आवश्यक है?

उत्तर :  शुद्ध प्रतिस्पर्ध बाजार की वह स्थिति है जिसमें वस्तु बाजार में एकसमान दाम पर बिकती है। प्रत्येक विक्रेता दी हुई कीमत ही लगाता है, यानि कोई भी एक विक्रेता बाजार में प्रचलित कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। विक्रेता दी हुई कीमत पर सिर्फ यह तय कर सकता है कि वह कितनी मात्रा बेचेगा। लेकिन अपनी बेचने वाली मात्रा में परिवर्तन करके वह कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। हम इस स्थिति से यह व्यक्त कर सकते हैं कि शुद्ध और पूर्ण प्रतिस्पर्धा की परिस्थितियों में विक्रेता कीमत स्वीकारक है। प्रत्येक विक्रेता का माँग-वक्र समस्तर होता है और मात्रा एक्सिज के समानान्तर होता है।

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यह देखा जा सकता है कि बेचनेवाला जो भी मात्रा चाहे - OM, ON या OQ  - कीमत पर बिना कोई प्रभाव डाले बेच सकता है, कीमत तो माँग और पूर्ति की शक्तियों की पारस्परिक क्रिया से निर्धारित होती है। पृथक विक्रेता या खरीदनेवाले का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
शुद्ध और पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति के लिए निम्न शर्तों का होना आवश्यक है। 
1. विक्रेता और खरीददारों की बहुत ही बड़ी संख्या जिसका अर्थ है कि प्रत्येक विक्रेता या खरीददार कुल उत्पादन का बहुत ही छोटा भाग बेचता या खरीदता है जिसके कारण उसके स्वतंत्रा रूप से इस भाग को खरीदो-फरोख्त में परिवर्तन से कीमत अप्रभावित रहती है। 
2. समरूप वस्तु, ताकि वस्तु और विक्रेता दोनों ही मानकीकृत हों और इस कारण वस्तु की एक इकाई या एक विक्रेता को अन्य इकाई या विक्रेताओं के मुकाबले में अधिक पसन्द न किया जा सके।
3. बाजार में वस्तुओं और उत्पादन-साधनों की पूर्ण गतिशीलता।
इन शर्तों  के पूरी होने पर शुद्ध प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा होती है। यदि ऊपर दी गई इन तीन शर्तों में हम यह चैथी शर्त भी जोड़ दें तो पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन जाएगी।
4. खरीददारों और विक्रेताओं द्वारा सामायिक और भविष्य की कीमतों और उत्पादन मूल्यों का पूर्ण ज्ञान। 
5.   पूर्ण प्रतिस्पर्धा वाले उद्योग में फर्मों को आने जाने की पूर्ण स्वतंत्राता रहती है यानि नई पर्में उद्योग में आना चाहें तो आ सकती हैं और पुरानी फर्में बाहर जाना चाहे तो उद्योग से बाहर ज

सकती हैं और पुरानी फर्में बाहर जाना चाहे तो उद्योग से बाहर जा सकती है।

प्रश्न 12 : एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा क्या है? इस बाजार स्थिति की मूल गुण क्या है?
 
उत्तर :  एकाधिकारी प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति है जिसमें एकाधिकारी तत्व और प्रतियोगितावादी तत्व दोनों ही मौजूद होते हैं। एकाधिकारी तत्व के कारण उत्पादित वस्तु विशिष्ट बन जाती है। प्रतियोगी तत्वों के कारण कीमत एक खास सीमा के बीच ही रहती है। इस बाजार स्थिति को विशिष्ट वस्तु की प्रतिस्पर्धा भी कहते हैं। इस बाजार स्थिति के मूल गुण यह हैंः
1. बाजार में खरीददारों और विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या
2. विशिष्ट वस्तु का होना
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा वाले उद्योग में नई फर्में उद्योग में आ सकती हैं और पुरानी छोड़कर जा सकती हैं। चूँकी एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में विक्रेता विशिष्ट वस्तु बेचता है, कुछ सीमा तक वह प्रभाव पड़ सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उपभोक्ता उस वस्तु को किस हद तक विशिष्ट मानते हैं और उस वस्तु की प्रतिस्थापी वस्तु की प्रतिस्थापी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा किस सीमा तक है। सामान्यतया, एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में विक्रेता का माँग वक्र ऋणात्मक ढ़ालवाला होता है। इसका अर्थ है कि वस्तु की अधिक मात्रा केवल कम कीमत पर ही बेची जा सकती है।

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ऊपर दिए गए चित्रा में PM कीमत पर OM मात्रा बेची जा सकती है। लेकिन OQ मात्रा बेचने के लिए कीमत PQ करनी पड़ेगी।
सामान्यतया, एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में विक्रेता का माँग वक्र एकाधिकार के अन्तर्गत विक्रेता के माँग वक्र से अधिक कीमत-लोचवाला होता है। यह इसलिए कि विशिष्ट वस्तु के निकट-प्रतिस्थापी उपलब्ध होते हैं जबकि एकाधिकार में वस्तु के निकट प्रतिस्थापी उपलब्ध नहीं होते।

प्रश्न 13 :अल्पाधिकार बाजार स्थिति की विशेषताओं का वर्णन करें।

उत्तर :  1. एक दूसरे पर परस्पर निर्भरता
चूँकि अल्पाधिकारी फर्म कुल उत्पादन का महत्त्वपूर्ण भाग बेचती है, उस द्वारा की गई क्रिया की उद्योग की अन्य फर्मों द्वारा प्रतिक्रिया हो सकती है। प्रत्येक फर्म को फैसले लेने से पहले दूसरों की प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखना पड़ता है। इससे जो स्थिति पैदा होती है उसे अल्पाधिकार में फर्मों की पारस्परिक निर्भरता का नाम दिया जा सकता है।

2. अल्पाधिकार में विज्ञापन तथा बिक्री पर खर्च
कीमत में कमी अल्पाधिकार बाजार में अपने अंश को बढ़ाने या कम होने से रोकने का सिर्फ एक तरीका है। इसका दोष यह है कि कीमत की लड़ाई का नुकसान सभी को हो सकता है। पूर्ण प्रतिस्पर्धा तथा एकाधिकार की दोनों ही स्थितियों में यह मजबूरी नहीं होती। अल्पाधिकार से विज्ञापन पर खर्च बहुत बढ़ जाता है, जिससे समाज को लाभ सन्देहास्पद है।

3. ग्रुप व्यवहार 
बाजार की अन्य स्थितियों में, फर्मों को अपना लाभ अधिकतम बनाना होता है। अल्पाधिकार का अर्थ है आपस में निर्भर कुछ ही फर्में। क्या इससे फर्मों को एक-दूसरे के साथ मिल अपने लाभ अधिक करने का बढ़ावा मिलेगा या वे अपने वैयक्तिक फायदों के लिए एक दूसरे से लड़ती रहेंगी? अल्पाधिकारी ग्रुप-व्यवहार का कोई एक मान्य सिद्धांत नहीं है।

4. अल्पाधिकारी के माँग वक्र की अनिश्चितता 
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्म का माँग वक्र पूर्णयता लोचदार होता है। बाजार में चल रहे दाम पर वह वस्तु की मनचाही मात्रा बेच सकती है। कम या अधिक मात्रा बेचने के लिए स्वतंत्रा फैसले का वस्तु की कीमत पर कोई असर नहीं पड़ता। एकाधिकार में फर्म का कोई प्रतियोगी नहीं होता। प्रतिस्थापी भी बहुत असन्निहित हैं। इस प्रकार एकाधिकारी फर्म को प्रतिस्पर्धियों की प्रतिक्रिया को नजर में रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती। उसका माँग वक्र निश्चित और दिया गया होता है। एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्म एक विशिष्ट वस्तु बेचती है। यह विशिष्टता पैकिंग में विभिन्नता, बेहतर सेवा और विज्ञापन मेें खर्च द्वारा लाई जा सकती है। लेकिन विशिष्ट वस्तु की विक्रेता का एकाधिकारिक तत्व सीमित होता है। उसका माँग वक्र एकाधिकार के विक्रेता के माँग वक्र से अधिक लोचदार होता है। विशिष्ट वस्तु के निकट प्रतिस्थापति भी उपलब्ध होते हैं। इसलिए यहाँ भी माँग वक्र निश्चित और दिया गया होता है। इसमें बिक्री बढ़ाने के लिए कीमत घटाना महत्त्वपूर्ण हथियार के रूप में प्रयोग नहीं होता। लेकिन अल्पाधिकार में फर्में एक-दूसरे पर निर्भर होती हैं। अल्पाधिकारिक वस्तु की कीमत में परिवर्तन से दूसरों पर असर पड़ना अनिवार्य है। इसलिए फर्म यह मानकर नहीं चल सकती है कि दूसरे उसकी कीमत-परिवर्तन पर प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। इसका अर्थ है कि फर्में भी कीमत में परिवर्तन करेंगी। इससे माँग वक्र अनिश्चित हो जाता है तथा परिवर्तन इस बात पर निर्भर करता है कि दूसरे क्या करेंगे। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि अल्पाधिकारी का माँग वक्र सामान्यतया अनिश्चित होता है।

प्रश्न 14 : एकाधिकार की स्थिति को स्पष्ट करें। 

उत्तर :  एकाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमे एक वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है और उस वस्तु की निकटतम प्रतिस्थापी वस्तु नहीं मिलती। चूँकी एकाधिकारी बाजार में वस्तु का अकेला विक्रेता होता है, बेचनेवाली मात्रा में परिवर्तन करके वह वस्तु की पूर्ति मेें परिवर्तन ला सकता है और बाजार में उसकी कीमत में भी परिवर्तन ला सकता है। इस प्रकार, एकाधिकारी कीमत निर्माता है, कीमत स्वीकारक नहीं, एकाधिकार का माँग वक्र (या औसत आय वक्र) ऋणात्मक ढालवाला होता है। इसका अर्थ है कि वह वस्तु की अधिक मात्रा सिर्फ कम कीमत पर ही बेच सकता है। 
आप देखेंगे कि एकाधिकारी का माँग वक्र DD ऋणात्मक ढालवाला है, यानि वह बाएँ से दाएँ नीचे खिसकता है। यदि एकाधिकारी  OM मात्रा बेचना चाहता है तो इसे कीमत PM पर बेचा जा सकता है। यदि वह बढ़ी हुई मात्रा ON बेचना चाहता है तो उसे कीमत कम करके PN तक लानी होगी।
OQ  मात्रा PQ कीमत पर बेची जा सकती है। नीचे दिए गया वक्र इस मान्यता पर बनाया गया है कि एकाधिकारी भिन्न खरीददारों से या भिन्न बाजार में एकसमान कीमत लगाता है। पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में वस्तु की विभिन्न इकाइयों की कीमत और विभिन्न खरीददारों से ली गई कीमत एकसमान होती है।

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 6 (प्रश्न 1 से 14 तक) Class 10 Notes | EduRev

लेकिन एकाधिकार में ऐसा नहीं भी हो सकता; एकाधिकारी विभिन्न ग्राहकों से भिन्न-भिन्न कीमत भी ले सकता है। वह वस्तु की विभिन्न इकाइयों की कीमत भी अलग-अलग लगा सकता है। उदाहरण के लिए, भारत के बहुत सी कम्पनियाँ बिजली की खपत के विभिन्न इकाई समूहों पर भिन्न-भिन्न दरों से कीमत लगाती हैं। इसी प्रकार, बिजली के विभिन्न  उपयोगों के लिए भिन्न-भिन्न दरें है। कृषि व उद्योग के लिए दी गई बिजली की दर प्रायः घरेलू या व्यापारिक उपयोगों के लिए दि गई बिजली की दर से कम होती है। कीमत में विभेद, जैसा कि इसे कहा जाता है, ये अन्य उदाहरण हैं। रेलवे द्वारा माल ले जाने के भाड़े की भिन्न-भिन्न दरें, और डाक्टरों द्वारा एक जैसी सेवा के लिए अमीर और गरीब रेागियों से अलग-अलग दर पर फीस लेना। 

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