सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 6 (प्रश्न 15 से 29 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 6 (प्रश्न 15 से 29 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 15 : ”अनियम नगर विस्तार“ की प्रक्रिया में परिसरीय नगर वृद्धि, उपनगर तथा उपग्रही नगरों का अन्तर समझाइए और भारत के किसी भी महानगर को केन्द्र बनाकर प्रत्येक का कम से कम एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर : भारत में अनियमित नगर विस्तार की प्रक्रिया के कारण परिसरीय नगर वृद्धि की प्रवृत्ति स्पष्ट परिलक्षित होती है। महानगरों के आस.पास की ग्रामीण या कृषि भूमि महानगरीय सम्पर्क के कारण स्वप्रसार के क्रम में नगरीय रूप धारण कर लेती है। इसी को परिसरीय नगर वृद्धि कहा जाता है। नगरीकरण की प्रक्रिया सामान्यतः इमारतों के विस्तार की ओर संकेत करती है। अधिकांशतः कृषि योग्य भूमि पर नगरीयकरण हो रहा है और ये नगर धीरे.धीरे भीड़.भाड़ वाले महानगरों में परिवर्तित होते जा रहे हैं। आगरा, मेरठ, जयपुर, बेंगलूर, अहमदाबाद आदि महानगरों में परिसरीय नगर वृद्धि तेजी से हो रही है। महानगरों के भीड़ व शोर भरे वातावरण में अकुलाए लोग आजकल महानगरों छोड़कर नगरों के बाहर के छोर व अपेक्षाकृत शांत नगरों की ओर प्रवास करने लगे हैं। इससे नगरों के बाहर उपनगरों का निर्माण हो रहा है। नगरों के केन्द्रीय भाग दुकानों, व्यवसायिक परिसरों, कार्यालयों आदि के केन्द्र बनते जा रहे हैं। दिल्ली में पीतमपुरा, रोहिणी, पंजाबीबाग, आनन्द विहार, विवेक विहार; गुजरात में सूरत, भरौंच, बडोदरा, आनंद, नांडियार, अहमदाबाद; कलकत्ता में हावड़ा, दमदम, पानिहाटी व भटपार आदि उपनगरों के उदाहरण हैं। जब कोई छोटा पृथक नगर महानगरों के विकास के साथ.साथ अस्तित्व में आता है, तो इसे उपग्रही नगर कहा जाता है। दिल्ली में शहदरा, अहमदाबाद में साबरमती, बम्बई में कल्याण व जयपुर मेें सांगनेर आदि नगर उपग्रही नगरों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

प्रश्न 16 : समाकालित ग्रामीण ऊर्जा पद्धति से आप क्या समझते हैं? ऊर्जा के कम से कम तीन नए स्रोतों को भी लिखिए?

उत्तर : समवित ग्रामीण ऊर्जा पद्धति का उद्देश्य क्षेत्राीयता पर आधारित सूक्ष्म स्तरीय समन्वित ग्रामीण ऊर्जा परियोजना का निर्माण एवं योजना के तहत इसका सही उपयोग करना है। इसके अलावा इस ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति करना, समेकित विकास को बढ़ावा देना एवं इन क्षेत्रों में लोगों के जीवन स्तर को सुधारना है। रसोई बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रकाश एवं ऊष्मा की पूर्ति में परम्परागत व गैर-परम्परागत दोनों ऊर्जा स्रोतों का उपयोग महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। परम्परागत स्रोतों के तहत ग्रामीण विद्युतीकरण, पेट्रोलियम उत्पाद की आपूर्ति, तेल, ईंधन, लकड़ी एवं साॅफ्ट कोक आते हैं। नवीन व पुर्नउपयोग किये जाने वाले ऊर्जा स्रोतों के तहत सौर फोटो वोल्टेइक (SPV), पवन ऊर्जा, सूक्ष्म व गुरू जल विद्युत ऊर्जा, आदि आते हैं। ऊर्जा के ये स्वरूप पर्यावरण संरक्षण के अनुकूल, प्रदूषण रहित एवं वन विकास में अत्यन्त सहायक होते हैं। ऊर्जा के उपरोक्त स्रोतों का उपयोग सुदूरवर्ती, दूर-दराज व पर्वतीय क्षेत्रों में विस्तृत रूप से किया जा सकता है।


प्रश्न 17 : भारत में भूमि संसाधनों की पहचान तथा मानचित्राण में हाल में हुए विकास की जांच कीजिए।

उत्तर : उपग्रह के क्षेत्रा में नवीनतम विकास, भारत में भू-संसाधन की पहचान एवं मानचित्राण के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रहा है। इस उद्देश्य हेतु उपयोग किए जाने वाले पारम्परिक उपाय, यथा-सतह व वायवीय सर्वेक्षण आदि काफी खर्चीले होते थे। अब इन नए उपायों का उपयोग सुदूर संवेदन की सहायता हेतु किया जा रहा है, जा अपेक्षाकृत बहुत जल्द एवं सही जानकारी उपलब्ध कराता है। आई.आर.एस. (भारतीय सुदूर संवेदी) द्वारा राष्ट्रीय पेयजल आयोग को उसके उद्देश्यों को पाने में काफी सहायता दी जा रही है। इसकी सहायता से आयोग को देश मे पेयजल आपूर्ति के उद्देश्यों को 90 प्रतिशत तक प्राप्त करने मे सफलता मिली है। जबकि पारम्परिक स्रोतों द्वारा जल संसाधनों के क्षेत्रों का पता लगाने में केवल 45 प्रतिशत ही सफलता मिलती थी। उपग्रहा द्वारा लिए गए चित्रा द्वारा ऐसी भूगर्भीय संरचनाओं का पता लगाया जा सकता है, जिसे पारम्परिक सर्वेक्षण द्वारा पता लगाना सामान्यतः सम्भव नहीं है। उपग्रह की सहायता से पृथ्वी के किसी क्षेत्रा विशेष का बहुआयामी पे्रक्षण किया जाता है, ताकि उस क्षेत्रा में मृदा व इसके संबंधित अन्य संसाधनों का विस्तृत व सही अध्ययन किया जा सके।
आई.आर.एस..प् ‘ए’ हिमालय जैसे दुर्गम क्षेत्रों का भी अध्ययन करने में सक्षम है। आई.आर.एस. आंकड़ों की सहायता से राष्ट्रीय पेयजल कमीशन द्वारा पेयजल प्राप्ति के क्षेत्रा में 85.95 प्रतिशत तक सफलता हासिल की गयी है। उपग्रह द्वारा भेजे गए चित्रा के प्राप्त होने के एक सप्ताह के अंदर भू-विशेषज्ञों द्वारा, प्रभावित क्षेत्रों का एक मानचित्रा तैयार किया जाता है। सुदूर संवेदी द्वारा भूगर्भ में स्थित खनिज पदार्थों की भी सफलतापूर्वक जानकारी उपलब्ध करायी जा सकती हैं। इतना ही नहीं, आई.आर.एस. की सहायता से किसी क्षेत्रा में जल की स्थिति, उसकी फसलों के उत्पादन का आकलन, चारागाह से संबंधित आँकड़ें, भविष्य में उपयोग में लाए जाने के लिए सफल फसल पद्धति, बंजर भूमि आदि से संबंधित आँकड़े उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

प्रश्न 18 : स्थान के साथ घनत्व में परिवर्तन को समझाते हुए भारत में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए।

उत्तर : भारत में जनसंख्या वितरण से संबंधित प्रमुख कारक हैं-मृदा की उर्वरता, भौतिक कारक, यथा-नदी तट, शहरों में बाजार का प्रभाव, किसी क्षेत्रा में कच्चे मालों का उत्पादन एंव इसकी उपलब्धता आदि। सामान्य रूप से किसी क्षेत्रा की जनसंख्या वहाँ के मृदा उर्वरता पर निर्भर करती है, जनसंख्या का घनत्व भारत के ऐसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक है, जहाँ जल आसानी से उपलब्ध है। इस आधार पर जनसंख्या घनत्व पूर्व से पश्चिम की ओर क्रमशः कम होता जाता है। उदाहरण के तौर पर, पश्चिम बंगाल अधिक जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्रा, जबकि पंजाब व हरियाणा के मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत कम है। भारत में कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रा हैं-उत्तर की उच्च पर्वतीय माला क्षेत्रा, उत्तर-पूर्वी सीमांत के मानसूनी जंगलीय क्षेत्रा एवं पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात के कक्ष तक विस्तृत शुष्क-भू-क्षेत्रा। इसके अलावा भारत में जनसंख्या के वितरण के लिए अन्य उत्तरदायी कारक हैं, सांस्कृतिक कारक, यथा-लोगों के दृष्टिकोण एवं उद्देश्य, उनकी आर्थिक गतिविधियाँ व तौर-तरीके आदि तथा सामाजिक परिस्थिति से संबंधित कारक, यथा-विभिन्न क्षेत्रों में जन्म व मृत्यु दर एवं अद्यतन प्रव्रजन (Migration) आदि।

प्रश्न 19 :अरावली एवं हिमालय, दोनों क्षेत्रों के व्यापक निर्वनीकरण से उत्पन्न अनेक पर्यावरणी समस्याओं का विवरण दीजिए।

उत्तर : अरावली व हिमालय क्षेत्रा में विस्तृत वन विनाश पर्यावरण के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। इस वन विनाश का दूरगामी व तात्कालिक प्रभाव सूक्ष्म पर्यावरण (micro-climate) पर पड़ेगा। ज्ञातव्य है कि वनस्पति युक्त भू.भाग का तापमान वनस्पति रहित क्षेत्रों की अपेक्षा काफी कम होता है। अतः सप्ष्ट है कि वन विनाश से इन क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि हो जाएगी। वनस्पति विनाश के कारण मृदा भी प्रभावित होगी अर्थात् इन क्षेत्रों में मृदा अपरदन के कारण बाढ़ की आशंका उत्पन्न हो सकती है। पर्यावरण असंतुलन के कारण श्रीनगर के पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन भी संभव है। वन विनाश के कारण वन्य प्रणाली अनाधिकार प्रवेश करने वाले लोगों (Poachers) का आसानी से शिकार हो जाएंगे। साथही, अनेक विलुप्त होते जा रहे वन्य प्राणियों के लिए अस्तित्व का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। इसके अलावा वन विनाश का एक अन्य खतरनाक पहलू है-सार्वत्रिक तापन, (Global Warming), जिसके फलस्वरूप हिमालयन ग्लेशियर के पिघलने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। दूसरी ओर, अरावली पर्वत श्रृंखला, थार मरुस्थल के रेतीले आँधी वाले एवं राजस्थान के पूर्वी उर्वर क्षेत्रा के मध्य दीवार का काम करती हैं तथा इस रेतयुक्त वायु के झोंके के उत्तर पूर्वी क्षेत्रा की रक्षा करती हैं। अतः अरावली पर्वतीय क्षेत्रा में वन विनाश का पूर्वी राजस्थान के उर्वर क्षेत्रों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

प्रश्न 20 : समादेश क्षेत्रा विकास (कमांड एरिया डेवलेपमेंट) से क्या तात्पर्य हैं?

उत्तर : कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई का विस्तार करना अत्यंत आवश्यक है। सिंचाई क्षमता का तेजी से बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने या सिंचाई क्षमता और उसके उपयोग के बीच के अन्तर को कम करने के उद्देश्य से पांवचीं पंचवर्षीय योजना के आरंभ (1974.75) में कमांड एरिया डेवलपमेंट कार्यक्रम में मुख्यरूप से खेत में विकास करने के कार्य, जैस-खेत में नालियों का निर्माण, भूमि का समतलीकरण, खेत से पानी की निकासी, बारीबारी से पानी की पूर्ति के लिए बाड़ाबंदी प्रणाली, खेतों के लिए सड़कें बनाना, चकबंदी की व्यवस्था करना, जोतों की सीमा का पुननिर्धारण आदि शामिल हैं। इसके अन्तर्गत निविष्टियों की पूर्ति और उधारों की व्यवस्था, कृषि विस्तार, बाजारों और गोदामों का निर्माण और संयोजक उपयोग के लिए भू-जल के विकास के लिए प्रबंध भी शामिल हैं। वर्तमान कार्यक्रम में 20 राज्यों और 2 संघ राज्य क्षेत्रों के लगभग 208 लागख हेक्टेयर खेती योग्य कुल कमान क्षेत्रों में 166 चुनी हुई सिंचाई परियोजनाएं शामिल हैं। 1990.91 में खेत की नालियों, बाड़ाबंदी और भू-समतलीकरण के अन्तर्गत क्रमशः 55.2, 58.4 और 3.3 लाख हेक्टैयर की लक्ष्य पूर्ति हुई। मार्च, 1992 तक इस कार्यक्रम पर 3,214 करोड़ रुपये की राशि व्यय की गयी, जिसमें केन्द्रीय सहायता 1,081 करोड़ रुपये थी।

प्रश्न 21 : पर्यावरण प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को बताते हुए यह समझाइए कि भारत में मानव के स्वास्थ्य पर उनका कया प्रभाव पड़ता है?

उत्तर : भविष्य की चिन्ता किये बिना मानव, विकास के नाम पर प्रकृति ओर पर्यावरण से विवेकहीन बर्ताव किया जा रहा हैं जंगलों की अधाधुंध कटाई, वायु व जल में विषैली हानिकारक गैसांे व अवशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन, नाभिकीय कचरा, औद्योगीकरण, शहरीकरण व जनसंख्या में तेजी से वृद्धि आदि कुछ ऐसे मानवीय कार्य हैं, जिनसे पर्यावरण के संतुलन मे व्यवधान उत्पन्न हो जाता है, इसे ही प्रदूषण कहा जाता है। वातावरण का बढ़ता तापमान, बाढ़, सूखा, दुलर्भ जन्तु व वनस्पतियों की विलुप्त होती प्रजातियां, ओजोन परत मेें छिद्र आदि के लिए पर्यावरण प्रदूषण ही उत्तदायी है। पर्यावरण प्रदूषण निम्न प्रकार का हो सकता है- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, स्थल प्रदूषण, विकिरण प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण ।

प्रदूषण का प्रकार मानव पर प्रभाव
(i) वायु प्रदूषण सिरदर्द; बेहोशी; एग्जीमा; त्वचा केंसर’ आनुवांशिक संरचना में परिवर्तन; यकृत, गुर्दे, मास्तिष्क संबंधी रोग तथा दमा व श्वसन संबंधी रोग
(i) जल प्रदूषण हैजा, पीलिया, दस्त, टाइफाइड, स्नायु संबंधी रोग।
(iii) स्थल प्रदूषण जीविका और खाद्य सुरक्षा में व्यवधान।
(iv) विकिरण प्रदूषण चर्म कैंसर, फोड़ा, रक्त कोशिकाओं में परिवर्तन, विकलांगता, मोतियाबिंद।
(v) घ्वनि प्रदूषण बहरापन, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, तुतलाना, मानसिक तनाव, सिर दर्द।

प्रश्न 22 : भारतीय कृषि में अनेक रासायनिक उवर्रकों के प्रयोग को संक्षेप में समझाइए।

उत्तर : भूमि पर ज्यों-ज्यों खेती की जाती है, उसकी उर्वरता में कमी आती है। भूमि की उर्वरता बढ़ाने हेतु मृदा में मिलाए जाने वाले पोषक तत्व उर्वरक कहलाते हैं। वास्तव में उवर्रक, कारखानों में तैयार किये जाने वाले अकार्बनिक रासायनिक पदार्थ हैं, जिनमें कुछ विशेष तत्वों की मात्रा निश्चित होती है। अन्य बातें समान रहने पर जमीन में एक टन उर्वरक डालने से खाद्यान्न उत्पादन में आठ से दस टन की वृद्धि होती है। एक अनुमान के अनुसार, कृषि उत्पादन में वृद्धि का लगभग 70 प्रतिशत उर्वरक के अधिक इस्तेमाल के फलस्वरूप होता है। गत कुछ समय से उवर्रक के क्षेत्रा में प्रति यूनिट खपत की दृष्टि से विश्व के देशों में भारत के स्थान में काफी सुधार हुआ है। देश में उर्वरकों की खपत 1950-51 के 0.07 मि. टन पोषक तत्व के स्तर से बढ़कर 1989-90 के दौरान 11.57 मि. टन पोषक तत्व हो गयी है। तथा 1901-91 के दौरान पूर्वानुमानित खपत लगभग 12.69 मेट्रिक टन पोषक तत्व है। भारत में मुख्यरूप से तीन प्रकार के रासायनिक उवर्रक होते हैंः
1. नाइट्रोजन वाले उर्वरक: इसमें नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा होती है। पत्तियो का रंग हरा व दानों को मोटा तथा प्रोटीन युक्त बनाने में सहायक।
प्रमुख उर्वरक - सोडियम नाइट्रेट, अमोनियम सल्फेट आदि। नाइट्रोजनी उर्वरक भूमि में उस समय डाले जाते हैं, जब उनका पौधे को तुरन्त आवश्यकता हो।
2. फास्फोरस वाले उर्वरक: इसमें फास्फोरस की मात्रा अधिक होती है। मुख्यरूप से दलहनी फसलों में प्रयुक्त व वायुमंडल की नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायक।
प्रमुख उर्वरक -सिंगल सुपर फास्फेट, डबल सुपर फास्फेट, ट्रिपल सुपर फास्फेट, ग्रोमोर, सुफला (पीला, गुलाबी, धूसर), डाई अमोनियस फसस्फेट, अस्थि चूर्ण, आदि। इनका प्रयोग खेत में बीज की बुवाई के तुरंत बाद किया जाता है, क्यांेकि फलसों को फास्फोरस की आवश्यकता प्रारंभिक दिनों में अधिक होती है।
3. पोटाश वाले उर्वरक: इसमें पोटाश की पर्याप्त मात्रा होती है। आलू, प्याज, टमाटर, गन्ना, तम्बाकू आदि फसलों को पैदावार बढ़ता है। यह पौधे में अमीनों अम्ल और प्रोटीन संश्लेषण करने में सहायक है तथा इन्जाइम्स पर नियंत्राण करता है।
प्रमुख उर्वरक-पोटोशियम कार्बोनेट, पोटेशियम नाइट्रेट, पोटेशियम सल्फेट, पोटेशियम क्लोराइड, मूयरेट आफ पोटाश आदि। इनका प्रयोग खेत में बीज बुवाई के तुरंत पूर्व किया जाता है।

प्रश्न 23 : बंगाल के विभाजन को घटित करने में प्रेरक तत्व क्या थे? उसके परिणाम क्या थे? उसको निराकृत क्यों किया गया?

उत्तर : भारत में राष्ट्रवाद व राष्ट्रचेतना की उत्पत्ति व प्रसार के कारण अंगे्रज सरकार अत्याधिक चिन्तित थी। इस सैलाब को रोकने के लिए राष्ट्रीय गतिविधियों के केन्द्र बंगाल को लार्ड कर्जन ने 7 जुलाई, 1905 ई. को दो प्रान्तों पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल में विभाजित करने की घोषणा की। पश्चिम बंगाल में बिहार तथा उड़ीसा और पूर्वी बंगाल में असम को शमिल किया गया। बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी सरकार का कुटिल उद्देश्य निहित था। वह ‘बांटो और राज्य करो’ की नीति का अनुसरण करके बंगाल की एकता को समाप्त करना चाहती थी। प्रशासनिक रूप से विभाजन की घोषणा (20 जुलाई, 1905) के पीछे प्रांत का बहुत बड़ा होना बताया गया था, परन्तु इसके पीछे मुस्लिम व हिन्दुओं को विभाजित करने की चाल थी, जिससे कि सरकार के विरुद्ध चल रही राष्ट्रवाद की तीव्र आंधी को रोका जा सके।
इसके दुष्परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिक तनाव बढ़ गया,लेकिन मुसलमानों बंग.भंग का विरोध करते हुए हिन्दुओं को सहयोग दिया और सम्पूर्ण देश में बंग.भंग के विरोध में सैकड़ों सभाएं हुई व जुलूस निकाले गए। 16 अक्टूबर, 1905 को विभाजन लागू होने के दिन रविन्द्र नाथ टैगोर के आह्नानपर शोक दिवस मनाया गया। बंगाल में के.के.मित्र, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी व लियाकत हुसैन की अगुवाई में व्यापक जनसमूह ने विरोध प्रकट किया। विदेशी वस्तुओं व सरकारी स्कूलों आदि का बहिश्कार किया गया और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आंदोलन चलाया गया। कलकत्ता में अनेक दमनात्मक कदम उठाए तथा 1908 तक प्रायः सभी बड़े नेताओं को जेल में बद कर दिया। आन्दोलन के दूरगामी परिणाम हुए तथा आन्दोलन गरमपंथी नेतृत्व के हाथों में चला गया। 1911 में बंगाल को पुनः एकीकृत कर दिया गया।

प्रश्न 24 : महात्मा गांधी ने इर्विन के सामने जो मांगे पेश की, उनका विश्लेषण कीजिए। सत्याग्रह के संचालन में केन्द्रस्थ विषय के रूप में नमक कैसे उभर कर आया?

उत्तर : गांधी जी द्वारा लार्ड इर्विन को प्रस्तुत की गयी प्रमुख मांगे निम्नलिखित हैंः
1. मादक वस्तुओं का प्रयोग निषेध किया जाए व गुप्तचर विभाग समाप्त हो।
2. लगान में कमी की जाए।
3. सैनिक व प्रशासनिक व्यय में कमी की जाए।
4. ऐसे सभी राजनीतिक कैदियों को जिन पर कोई अपराधिक आरोप नहीं है, रिहा किया जाए।
5. देशी कपड़ों पर आयात शुल्क लगाया जाए।
6. नमक कर समाप्त किया जाए।
7. स्वरक्षा के लिए हथियारों के लाइसेंस दिये जाएं।
ब्रिटिश सरकार ने इनमें से किसी मांग को नहीं माना और न ही राष्ट्रवादी आंदोलन को किसाी प्रकार की राजनैतिक छूट देने को तैयार हुई। साथ ही, ब्रिटिश सरकार ने रियासतों को कोई भी स् तैयार हुई। साथ ही, ब्रिटिश सरकार ने रियासतों को कोई भी स्वतंत्राता देने से इंकार कर दिया। गांधी जी ने सभी मांगों को इस कुशग्रता के साथ रखा कि इससे जनसमुदाय में राष्ट्रीय चेतना की भावना का तेजी से प्रसार हुआ। गांधी जी चाहते थे कि देश का धन देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में उपयोग हो तथा धन के देश से बाहर जाने पर नियंत्राण किया जाए।
नमक सत्याग्रह शुरू करने के मुख्य विषय बन गया क्यांेकि यह गरीब अथवा धनी सभी लोगों के दैनिक उपभोग की अत्यावश्यक वस्तु था। नमक का बढ़ता मूल्य गरीबों को सर्वाधिक प्रभावित करता था। अधिकांश लोगों को ब्रिटिश अधीनता से बाहर निकाल राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से नमक को सत्याग्रह शुरू करने का माध्यम बना लिया गया। गांधी जी ने अपार जनसमूह के समर्थन से साबरमती आश्रम (12 मार्च, 1930) से डांडी (6 अप्रैल, 1930) तक की यात्रा करके नमक कानून का उल्लंघन करके नमक बनाया।

प्रश्न 25 : गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन क्यों चलाया? बाद में उसके साथ दूसरे प्रश्न कैसे जोड़ दिए गए? असहयोग आन्दोलन के रचनात्मक कार्यक्रम का विवेचन कीजिए?

उत्तर : प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर युद्ध की शर्तों के मुताबिक खलीफा की प्रभुसत्ता को कम कर दिया गया। इससे भारत की मुस्लिम जनता क्षुब्ध हो गयी, क्योंकि तुर्की का खलीफा इस्लामी दुनिया का प्रमुख माना जाता था। गांधीजी ने महसूस किया कि यह समय हिन्दु.मुस्लिम एकता के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है। उन्हें भारत की जनता के रोष का सर्मथन करने का फैसला किया। इसीलिए गांधीजी ने खिलाफत के प्रश्न पर अहिंसक असहयोग आन्दोलन का सूत्रापात किया और ब्रिटिश सरकार से कहा कि वे तुर्की के प्रति नरम रवैया अपनाए।

बाद में इसमें कुछ मुद्दे भी जोड़ दिए गए जो निम्न प्रकार हैंः
1. रौलेट एक्ट को खत्म किया जाए और ब्रिटिश सरकार पंजाब में की गई कार्रवाई (जलियाँवाला बाग कांड) के संदर्भ में दुःख प्रकट करे।
2. ‘स्वराज्य’ की राष्ट्रीय मांग को पूरा करे, जिसमें नये सुधारों के साथ कुछ सार्थक बात हो। इन मुद्दों के जुड़ने के बाद असहयोग आन्दोलन एक व्यापाक रूप में उभरकर सामने आया। इसने अपनी ओर आम लोगों को तेजी से आकर्षित किया।
असहयोग आन्दोलन के कुछ रचनात्मक कार्यक्रम इस प्रकार थेः
1. राष्ट्रीय स्कूलों और काॅलेजों की स्थापना की गयी। साथ ही, निजी मध्यस्थ कोर्ट जो ‘पंचायतों’ के रूप में जाने जाते थे, की समस्त भारत में स्थापना की गयी। सरकारी और गैर-सरकारी पब्लिक स्कूल, काॅलेज और कोर्ट के बहिष्कार के साथ ही कांउसिल के चुनावों का भी बहिष्कार किया गया।
2. हाथ से कातने और बुनने के काम को पुनः चालू किया गया ताकि स्वदेशी और खादी की लोकप्रियता को बढ़ावा मिले। इससे भारतीयों की श्रम के प्रति हीनभावना का अन्त हुआ और विदेशी कपड़ों का बिहष्कार भी संभव हुआ।
3. हिन्दू.मुस्लिम एकता में वृद्धि हुई, जिससे ‘भारतीयता’ की भावना का जन्म हुआ।
4. अस्पृश्यता/छुआछुत का अन्त और हरिजन कल्याण पर बल दिया गया।
5. महिलाओं की मुक्ति एवं उन्हें नेतृत्व योग्य बनाने की भावना का विकास करने पर भी ध्यान दिया गया। महिलाओं ने आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, जिससे इनके कमजोर लिंग होने की धारणा को धक्का पहुँचा। महिलाओं ने भी सरकारी दमन चक्र का बखूबी मुकाबला किया। नवम्बर, 1920 में प्रिंस आफ वेल्स के आगमन पर मजदूरों, किसानों व छात्रों ने हड़ताल कर उनके समक्ष अपना विरोध प्रदर्शन किया। 1921 में मोपला आंदोलन हुआ।

प्रश्न 26 : ‘कैबिनेट मिशन योजना’ क्या थी? ‘समूहन खण्ड’ उसके लिए आधारभूत किस प्रकार था? कांग्रेस और लीग की मनोवृत्ति पर उसका कया प्रभाव पड़ा?

उत्तर : ब्रिटेन में एटली की सरकार ने महसूस किया कि अल्पसंख्यक समस्या का बहाना बनाकर भारत में लम्बे समय तक शासन नहीं किया जा सकता है, क्यांकि अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय के हितों पर वीटो नहीं कर सकता है। इसके बाद भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करने का उपाय खोजने के लिए 19 फरवरी, 1946 को तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन का गठन करके मार्च, 1946 में भारत भेजा गया, जिसने दोनों समुदायों के लिए समझौते का मार्ग प्रशस्त किया। इसके सदस्यों के नाम थे-लार्ड पैट्रिक लाॅरेंस (भारत के लिए राज्य के सचिव), सर स्टेफोर्ड क्रिप्स (व्यापार परिषद् के अध्यक्ष) तथा ए.वी. अलेक्जेंडर (प्रथम नौसेनाध्यक्ष)।
भारत आने पर मिशन ने महसूस किया कि मुस्लिम लीग और काँग्रेस संविधान सभा तथा अंतरिम सरकार के गठन के संबंध में एकमत नहीं हो पा रहे हैं। अतः उन्होंने अपनी योजना की घोषणा की। संविधान सभा के गठन व आन्तरिक सरकार के बारे में इसमें पूरे भारत के लिए संघ सरकार का प्रावधान था। मिशन की योजना इस प्रकार थीः
1. समस्त प्रांतों को तीन समूह उत्तरी-पश्चिमी, पूर्वी और शेष भारत में बांटने की कोशिष की गयी। इन समूहों के प्रांतो को आपस में इकाई के रूप में सहयोग करने के लिए स्वीकृति दी जाएगी और प्रत्येक की अपनी विधायिका और कार्यपालिका होगी। प्रांतों को आँचलिक सरकार से जुड़े प्रांतीय विषयों पर नियम बनाने का अधिकार था। फलस्वरूप पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश एवं ब्लूचिस्तान एक तरफ और असम और बंगाल दूसरी तरफ अपनी पहचान भारतीय संघ के अंदर बना सकते थे। केबिनेट मिशन की यह योजना साम्प्रदायिकता का स्पष्ट आभास देती है क्योंकि ऐसा समूहीकरण हिंदू, मुस्लिम और सिक्खों के हितों को ध्यान में रखकर किया गया था।
2. कोई प्रांत यदि संघ से अलग होना चाहता है, तो पहले चुनाव के बाद ऐसा कर सकता है।
3. संघ का संविधान 296 सदस्यों द्वारा बनाया जाएगा। ये सदस्य साम्प्रदायिक आधार पर प्रांतीय असेम्बलियों ओर भारतीय राज्यों से चुने जाएंगे।
4. एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा, जिसमें सभी दलों के सदस्य होंगे। नयी कार्यकारणी परिषद् भी होगी, जिसके पास सभी विभाग होंगे। साथ-ही-साथ युद्ध की देखरेख भी भारतीय ही करेंगे। अंतरिम सरकार सत्ता के हंस्तातरण और नये संविधान के लागू होने तक कार्य करेगी।
काँग्रेस चुनाव लड़ने तथा संविधान सभा में भाग लेने के लिए राजी हो गयी, लेकिन मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में हिस्सा लेने से मना कर दिया। फिर भी काँग्रेस ने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्त्व में 2 सितम्बर, 1946 को सत्ता संभाल ली, जिसमें लीग के सदस्य शामिल नहीं हुए। मुस्लिम लीग ने मिशन की योजना के प्रति सहमति जताई, लेकिन लीग पाकिस्तान की माँग पर अडिग रही। वायसराय के समझााने पर लीग काँग्रेस के साथ अंतरिम सरकार में शामिल हो गयी, लेकिन यह सहयोग अधिक समय तक नहीं चल पाया।

प्रश्न 27 : स्वराज पार्टी के प्रादुर्भाव का परिचय दीजिए। स्वराज पार्टी का घोषणा पत्रा क्या था? स्वराजवादियों की मांगे क्या थीं? उन पर ब्रिटिश शासन की प्रतिक्रिया क्या थी?

उत्तर : 1922 में चैरी-चैरा कांड के पणिामस्वरूप गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन को दुखी मन में स्थगित कर दिया। गांधी जी के इस कार्य का जनता के साथ.साथ राष्ट्रवादी नेताओं की भावनाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ा। आन्दोलन के नेताओं के बीच बढ़ते मतभेद के चलते दो प्रकार की विचारधाराओं का जन्म हुआ। एक विचारधारा परिवर्तनवादियों की थी, जो कि नेतृत्व में परिवर्तन की मांग करने लगे थे। इनमें देशबधु चितरंजन दास, हकीम अजमल खां, विट्ठल भाई पटेल तथा मोती लालनेहरू प्रमुख हैं। दूसरी विचारधारा अपरिवर्तनवादियों की थी, जो गांधी जी के नेतृत्व में पूर्ण विश्वास रखते थे तथा किसी प्रकार के परिवर्तन के पक्ष में नही थे। इनमें राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, सरदार पटेल आदि प्रमुख थे। कांगे्रस के गया अधिवेशन (1922) में एक ओर, परिवर्तनकारी 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत निर्मित परिषदों में प्रवेश करने व निर्वाचन में भाग लेकर अंदर से सहयोग के पक्षधर थे। तो दूसरी ओर, अपरिवर्तनकारी परिषद् में प्रवेश के विरोधी तथा गांधी जी द्वारा सुझाए गए रचनात्मक कार्य किए जाने के पक्षधर थे। परिवर्तनवादी कांग्रेसियों ने गया अधिवेशन में एक प्रस्ताव पेश करके परिषदों में प्रवेश की अनुमति मांगी, लेकिन प्रस्ताव बहुमत द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। फलतः देशबंधु ने अध्यक्ष पद व मोती लाल नेहरू ने कांग्रेस के महामंत्री पद से त्यागपत्रादे दिया। 1 जनवरी, 1923 को इन्होंने अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाकर कांग्रेस के समान्तर ही स्वराज पार्टी का गठन किया। देशबंधु इसके अध्यक्ष तथा मोती लाल नेहरू सचिव बनाए गए। स्वराज पार्टी ने अपने गठन के साथ ही, 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत परिषद् निर्वाचनों में भाग लेने व विधायिका में प्रवेश करके सरकार के साथ असहयोग करने का निर्णय लिया।
स्वराज पार्टी का चुनाव घोषणा पत्रा 1923 में प्रकाशित हुआ। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित थींः
1. भारतीय शासन तंत्र पर भारतीय जनता का अधिकार स्वीकारा जाएगा तथा इसे कार्यरूप दिया जाएगा।
2. स्वराज प्राप्ति के लिए विभिन्न उपायों का सहारा लिया जाएगा।
3. विधान मंडल चुनावों में सफल होने पर कोई भी सरकारी पद स्वीकार नहीं किया जाएगा।
4. मजदूर संगठन के कार्यों को बढ़ाया जाएगा, ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया जाएगा तथा एशियाई देशों के संघ की स्थापना की जाएगी।
5. ब्रिटिश शासन उनकी शर्तों का एक निश्चित तिथि से पूर्व पूरा करे अन्यथा शासन कार्य चलाना असंभव कर दिया जाएगा।
कांग्रेस का समर्थन हासिल करके स्वराज पार्टी ने चुनावों (नवम्बर, 1923) में भाग लिया तथा 145 में से 45 स्थान जीते। बंगाल व मध्य प्रांत की व्यवस्थापिकाओं में उन्हें पूर्ण बहुमत मिला। फरवरी, 1924 में मोतीलाल नेहरू ने केन्द्रीय व्यवस्थापिका में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जो कि 1919 के अधिनियम में परिवर्तन से संबंधित था। प्रस्ताव में स्वराजपार्टी ने अपनी मांगे स्पष्ट की थीं। प्रमुख मांगे थींः
I. भारत के सभी प्रतिनिधियों की गोलमेज परिषद का आयोजन हो, जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों व हितों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए भारत के लिए एक विधान का निर्माण कर सके।
II. वर्तमान व्यवस्थापिका भंग हो तथा नवीन व्यवस्थापिका के समक्ष उक्त योजना प्रस्तुत हो। इसे बाद में कानून बनाने के लिए ब्रिटिश संसद को प्रस्तुत किया जाए।
सर मैलकम हैली ने स्वराज पार्टी की उक्त मांगों पर विचार का आश्वासन दिया, लेकिन पार्टी के विधानसभा सदस्य हैली के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। इसकी प्रतिक्रिया में सदस्यों ने अनुदान मांगों को अस्वीकृत व वित्त विधेयक को पारित नहीं किया। 1919 के अधिनियम के क्रियान्वयन की जांच की स्वराज पार्टी की मांग के दृष्टिगत 1924 में सर मुडीमैन की अध्यक्षता में मुडीमैन रिर्फाम एन्क्वायरी कमेटी की स्थापना की गयी।

प्रश्न 28 : द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रति इण्डियन नेशलन कांग्रेस का दृष्टिकोण क्या था? अगस्त प्रस्ताव क्या था? वे कौन से कारक थे जिनके कारण ब्रिटिश शासन को अपनी निषेधात्मक नीति को बदल कर क्रिप्स को भारत भेजना पड़ा?

उत्तर : द्वितीय महायुद्ध की घोषणा ने इंडियन नेशनल कांग्रेस को दुविधा में डाल दिया, कयोंकि अन्तर्राष्ट्रीय नीति के क्षेत्रा में कांग्रेस की सहानुभूति ब्रिटेन और उसके सहयोगियों के साथ थी और कांग्रेसी युद्ध में ब्रिटेन की हार नहीं चाहते थे। ब्रिटिश लोकतंत्रा, स्वतंत्राता व संसदीय संस्थाओं के प्रति कांग्रेस में आदर का भाव था, जबकि नाजियों को वे स्वतंत्राता तथा लोकतंत्रा का दुश्मन समझते थे। इंग्लैण्ड द्वारा 3 सितम्बर, 1939 को युद्ध की घोषणा के उपरान्त वायसराय लिनलिथगो ने गांधी जी को बातचीत के लिए आमंत्रित किया, लेकिन यह प्रयास असफल रहा। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनता के पूछे बिना ही भारत को युद्ध की आग में धकेल दिया। कांग्रेस ने इस पर तीव्र आपत्ति की तथा ब्रिटिश सरकार को प्रथम महायुद्ध में किये गए वायदों के उल्लंघन का स्मरण कराया। भारत मंत्री ने 1939 में वायसराय को सलाह दी कि इस गतिरोध को दूर करने के लिए कांगे्रस व मुस्लिम लीग के नेताअेां की एक सभा बुलाई जाए लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अन्ततः कांग्रेस ने असंतुष्ट होकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्रा दे दिया तथा प्रान्तीय कांग्रेस मंत्रिमंडलों को ब्रिटिश सरकार की युद्ध में किसी प्रकार की सहायता न करने का आदेश दिया। कांग्रेस की मांग थी कि ब्रिटेन, भारत को स्वतंत्रा राष्ट्र घोषित करे तथा तुरन्त ही लोक शासन की स्थापना करे। कांग्रेस ने कहा कि भारत ब्रिटेन को युद्ध में सहयोग दे सकता है, यदि यह सहयोग बराबरी व स्वेच्छा को आधार पर हो। 7 जुलाई, 1940 को कांग्रेस ने पूना प्रस्ताव में ब्रिटेन को शर्तों के आधार पर सहयोग देने का प्रस्ताव रखा। मुख्य प्रस्ताव थे-युद्धोपरांत भारत को पूर्ण स्वतंत्राता तथा भारतीय प्रशासन के केन्द्रीय क्षेत्रा में तत्काल अस्थायी मिली-जुली सरकार की नियुक्ति। संवैधानिक गतिरोध दूर करने हेतु भारतीयों के लिए औपनिवेशिक स्वराज्य के संदर्भ में एक प्रस्ताव की घोषण 8 अगस्त 1940 को लार्ड लिनलिथगों ने की। इसे ही अगस्त प्रस्ताव कहा जाता है। प्रस्ताव की प्रमुख बातें निम्नलिखित हैंः
1. युद्धोपरांत संवैधानिक प्रारूप तैयार करने के लिए एक प्रतिनिधि संस्था की स्थापना।
2. तत्काल वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया जाएगा तथा कुछ भारतीयों को इसमें मनोनीत किया जाएगा।
3. देशी राज्यों व अन्य भारतीयों की एक मिली-जुली युद्ध सलाहकार समिति गठित की जाएगी, जो युद्ध संबंधी मामलों पर ब्रिटिश सरकार को सलाह देगी।
4. ब्रिटिश सरकार का लक्ष्य भारत में औपनिवेशिक स्वराज्य की स्थापना है।
काँग्रेस ने इन प्रस्तावों को असंतोषजनक व निराशाजनक बताते हुए ठुकरा दिया। महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया। इधर, जापान भी युद्ध में शामिल हो गया तथा वह अमरीका, सोवियत संघ व चीन पर सफलता हासिल करते हुए दक्षिण पूर्व एशिया में बर्मा तक आ गया। युद्ध का भारतीय सीमा तक विस्तार होने पर ब्रिटेन की चिन्ता बढ़ने लगी तथा उसने अपनी निषेधात्मक नीति में बदलाव लाते हुए कांग्रेस व अन्य नेताओं का सहयोग प्राप्त करने की नीति अपनायी। अंग्रेजों ने 11 मार्च, 1942 को सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भारत भेजा। क्रिप्स अपने साथ युद्ध कालीन व युद्धोत्तर कालीन प्रस्ताव लाए थे, लेकिन भारतीय जनता ने उन्हें अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 29 : शिक्षा मनोविज्ञान के प्रमुख उद्देश्य का वर्णण करें।

उत्तर : शिक्षा मनोविज्ञान के कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं -
1. शिक्षार्थी को समझना। 2. शिक्षा प्रणाली को समझना। 3. उस विधि को समझना जिसके द्वारा उध्यापक अपने कार्यक्रमों को सुगमता से चला सके। 4. रुचियों, अभिरुचियों, विकास की अवस्थाओं तथा बालकों के मानसिक स्तर के अनुसार उचित शिक्षा, परिस्थितियां नियत करने में अध्यापक की सहायता करना। 5. अध्यापक की निर्देशन देने की योजना बनाने, संगठित करने या कार्यक्रमों के लिए निर्देशन करने में सहायता करना। 6. मूल्यों, निर्धारण तकनीकों की योजना बनाने तथा विद्यार्थीयों की रुचि, अभिरुचि उपलब्धि, व्यक्तित्व और बुद्धि को निर्धारण करने में अध्यापक की सहायता करना। संक्षेप में यह कहा जा सकता है शिक्षा मनोविज्ञान का उद्देश्य है - व्यक्ति का अच्छे से अच्छा विकास तथा निरन्तर शिक्षा विकास में वृद्धि।
शिक्षण में अध्यापक का सीधा सम्बन्ध छात्रों से होता है। वह छात्रों को प्रगति की राह दिखाने वाला मार्ग-प्रदर्शक है। यदि वह उचित तथा वैज्ञानिक विधियों से अपने विषय का ज्ञान छात्रों तक पहुँचाता हैं तो वह निश्चय ही उनके व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
व्यक्ति किसी कार्य को करने में तभी सफल होता है जब उसे उस कार्य को करने की योग्यता होती है। मनोविज्ञान या शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता का ज्ञान प्राप्त करता है। यह ज्ञान उसे शिक्षण कार्य में सफल बनाने में सहायता देता है।
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्यापक को बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान हो जाता है। वह बालकों की शारीरिक, सामाजिक आदि विशेषताओं से परिचित हो जाता है। इस विशेषताओं की जानकारी से उसे पाठ्य-विषयों और क्रियाओं का चुनाव करने में सफलता मिलती है।
शिक्षा, मनोविज्ञान, अध्यापक को बालक के स्वभाव तथा व्यवहार से अवगत कराता है। इसके आधार पर बालक की मूल प्रवृत्तियों तथा संवेगों का पता चलता है। इनसे परिचित होने के कारण उसका शिक्षण उत्तम होता है।
शिक्षा मनोविज्ञान बालकों के चरित्रा निर्माण में सहायता देता हैं। इसके अध्ययन से अध्यापक उन विधियों का प्रयोग करने लगता है जिनसे बालकों में नैतिक गुणों का विकास होता है।
अध्यापक जो भी ज्ञान देता है, उसका प्रभाव तथा उस ज्ञान के कारण बालकों में क्या व्यावहारिक परिवर्तन हुए है, इसकी जानकारी शिक्षा मनोविज्ञान ही देता है। मूल्यांकन के अन्तर्गत कौन-कौन सी बातें ली जाएं जिससे बालक का सम्पूर्ण रूप से मूल्यांकन हो जाए, आदि की जानकारी शिक्षा मनोविज्ञान ही प्रदान करता है।

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