सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 7 (प्रश्न 18 से 35 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 7 (प्रश्न 18 से 35 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 18 : सामाजिक वानिकी क्या है? सामाजिक वानिकी किस प्रकार ग्रामीणो के उद्धार मे  सहायक हो सकती है? वर्णन कीजिए। 
 
उत्तर : सामाजिक वानिकी पर्यावरण सतुलन, वनो के निर्माण, भू-क्षरण व भू-स्खलन को रोकथाम से सबधित है। सामाजिक वानिकी से अभिप्राय वन विकास की ऐसी प्रणाली से होता है, जिससे समुदाय का आर्थिक व सामाजिक आवश्यकताओ को ध्यान मे रखकर वृक्षारोपण व वृक्षकटाव के कार्यक्रम बनाए व क्रियान्वित किये जाते है। राष्ट्रीय कृषि आयोग ने सामाजिक वानिकी को दो भागो मे बाटा है प्रथम प्रश्रेप वानिकी, जिसमे खेतो की मेढ़ो पर लाइन मे व घर, कुए आदि के पास-पास वृक्ष लगाना। द्वितीय, प्रसार वानिकी, जिसके अतर्गत इमारती लकड़ी व चारा वाली प्रजाति का शासकीय एव गैर.शासकीय क्षेत्रा मे रोपण, सड़क, रेल व नहरो के किनारो पर शीघ्र बढ़ने वाली प्रजाति का रोपण और पर्यावरण सरक्षण हेतु विकृत वनो मे सुधार आदि आते है। वास्तव मे, सामाजिक वानिकी का उद्देश्य मुख्यरूप से जनकल्याण ही है। इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रा के बेरोजगार व अर्ध बेरोजगार युवको को आशिक रोजगार तो मुहैया कराया ही जाता है, इसके अलावा, ग्रामीणो को ईधन की लकड़ी, गृह निर्माण के लिए लकड़ी तथा कृषको को हल आदि कृषि उपकरणो के लिए लकड़ी उपलब्ध करायी जाती है। सामाजिक वानिकी के अतर्गत वन भू-आकृतियो के आधार पर वृक्षारोपण के लिए स्थानीय प्रजातियो को विशेषरूप से प्राथमिकता दी गयी है। वनविहीन पर्वतीय क्षेत्रो को ढकने के लिए चीड़ प्रजाति के वृक्षो के विकास की ओर भी ध्यान दिया गया है। भू-क्षरण रोकने के की दृष्टी से घास तथा झाड़ियो का विकास व विस्तार किया जा रहा है। सामाजिक वानिकी के अतर्गत निम्नलिखित कार्यो को प्राथमिकता दी जा रही हैः
(i)  सामुदायिक भूमियो, सड़को, नहरो, रेलवे लाइनो के निकट, बजर भूमियो पर ईधन, चारा व फलदार वृक्षो वाली प्रजातियो का रोपण।
(ii)  भू व जलसरक्षण कार्य तथा वाटर हार्वेस्टिग स्ट्रक्चर्स।
(iii)  जल निकास व जल प्लावन दूर करने सबधी कार्य।
(iv)  ऊसर, बजर व निम्नकोटि की भूमि का विकास एव सुधार।
(v)  रेगिस्तानी क्षेत्रो मे पर्यावरण सतुलन हेतु वृक्षारोपण।
(vi) अक्षम वर्ग के व्यक्तियो को वृक्षो के पट्टे देना, जिसमे पेड़ो का उत्पादन प्रयोग मे ला सकेगे। 
(vii) निम्न श्रेणी के गरीब ग्रामीण परिवारो की निजी भूमि पर फार्म वानिकी का कार्य 
(viii) रेशम उत्पादन के लिए शहतूत के वृक्षो का व्यापाक रूप से रोपण।

प्रश्न 19 : मध्य प्रदेश मे मालवा की मिट्टी काली और कर्नाटक की लाल क्यों है? इन दोनो मिट्टीयो के तुलनात्मक उपजाऊपन की विवेचना कीजिए।
   
उत्तर : मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्रा मे पायी जाने वाली काली मिट्टी को रेगड़ कहते है। रेगड़ मिट्टी की बहुत उत्पत्ति पहले के लैगूनो मे नदियो द्वारा लायी गयी लावा के जमाव से हुई है। कुछ भूविदो के मतानुसार काली मिट्टी का निर्माण धारवाड़, बेसाल्ट, ग्रेनाइट, नीस इत्यादि चट्टानो की तह फूटने से होता है। वर्तमान मे ऐसी मान्यता है कि ये मिट्टीया ज्वालामुखी विस्फोट से निकले लावा के जमने से निर्मित हुई है। जिसके कारण इसकाी मिट्टी काली होती है। काली मिट्टी की सरचना मे उसके कण बहुत समीप पाये जाते है जिसके कारण मिट्टी की बनावट घनी होती है और इसमे पानी बहुत देर तक ठहर सकता है। इस मिट्टी मे गेहूँ, कपास, ज्वार, बाजरा, लालमिर्च, रागी, मूँगफली, तम्बाकू और दलहन की खेती होती हैै। काली मिट्टी मुख्य रूप से कपास की खेती के लिए विख्यात है। 
लाल मिट्टी का निर्माण शुष्क और नम जलवायु के बदलते रहने से प्राचीनतम रवेदार चट्टानो और रूपातरित चट्टानो मे टूट-फूट होन के कारण होता है। कर्नाटक मे बहने वाली ताप्ती नदी की घाटी मे अधिक गर्मी पड़ने के कारण पहाड़ी ढलान की चट्टान टूट जाती है जिसके फलस्वरूप उसमे मौजूद लेाहा मिट्टी मे समान रूप से फैल जाता है। यह मिट्टी भी उपजाऊ मिट्टी की श्रेणी मे आती है। इसमे मुख्य रूप से गन्ना, चावल, गेहूँ, जूट, मक्का, ज्वार, मूगफली, कपास, तिलहन और तम्बाकू की खेती की जाती है। 

प्रश्न 20 : भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून की अपेक्षा उत्तर-पूर्वी मानूसन से अधिक वर्षा होती है? समझाइए ऐसा क्यो है। 
   
उत्तर : तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट, मॅसूर एव मालवार इत्यादि क्षेत्रो मे दक्षिण-पश्चिम मानूसन की अपेक्षा उत्तर.पूर्वी मानसून से अधिक वर्षा होती है। दक्षिण.पश्चिम मानसून भारतीय भू-भाग मे पहचते ही उच्चावच तथा उत्तर.पश्चिम भागो मे स्थित निम्न वायु दाब क्षेत्रा के प्रभाव से इनकी दिशाा मे परिवर्तन हो जाता है और ये अरब सागर तथा बगाल की खाड़ी की शाखाए बनकर आगे बढ़ जाती है जिसके फलस्वरूप तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी भाग, मैसूर एव मालाबार क्षेत्रो मे कम वर्षा हो पाती है। 
नवबर के प्रारभ मे उत्तर.पश्चिम भाग से आने वाला मानसून बगाल की खाड़ी मे स्थानातरित हो जाता है। यह स्थानातरण आसानी से नही हो पाता है। उसी अवधि मे अरब सागर मे चक्रवात बनने लगते है और भारतीय दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी तटो को पार कर जाते है। जिसके कारण उपरोक्त क्षेत्रो मे भरी और व्यापक वर्षा होती है। इसे उष्ण-कटिबधीय चक्रवात कहते है, जो बहुत ही विनाशकारी होता है। इस चक्रवात के कारण यहाँ तूफान भी आते है। यह उष्ण कटिबधी चक्रवात कभी सुन्दरवन तथा बग्लादेश मे भी पहुच जाते है। इन्ही कारणो से तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी भाग, मैसूर और मालाबार क्षेत्रो मे दक्षिण.पूर्वी मानसून की अपेक्षा उत्तर.पश्चिमी मानसून से अधिक वर्षा होती है। 

प्रश्न 21 : किसी भी देश मे ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्रा’ क्या होता है? भारत के लिए इसकी प्रासगिकता की विवेचना कीजिए।
   
उत्तर : किसी देश का अनन्य आर्थिक क्षेत्रा उस देश के समुद्री तट से समुद्र के अन्दर का वह क्षेत्रा का उपयोग किसी भी रूप मे करने के लिए स्वतत्रा होता है। भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्रा समुद्र मे 24 लाख वर्ग किलोमीटर है। 
भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्रा मे विभिन्न प्रकार के ससाधन मौजूद है, जिनमे सजीव और निर्जीव दोनो प्रकार के ससाधन है। सजीव ससाधन मे मुख्यतया मछली प्रमुख है। सजीव ससाधनो का भडार अनुमानतः 40 लाख टन है। जिसके केवल 24.4 लाख टन का ही दोहन हो पा रहा है। निर्जीव ससाधनो मे बहुमूल्य खनिज पदार्थ प्रमुख है। जिनका समुचित दोहन कर भारत आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध हो सकता है। सजीव ससाधनो मे मछली के अलावा समुद्री वनस्पतिया, समुद्री जीव-जन्तु प्रमुख है। सबसे अधिक मत्स्य उत्पादक देशो मे भारत का विश्व मे आठवा स्थान है। भारत द्वारा प्रतिवर्ष 30 लाख टन पकड़ी जाने वाली मछलियो मे 56 प्रतिशत अनन्य आर्थिक क्षेत्रा से ही पकड़ी जाती है। समुद्र पौधे तथा जीवो का इस्तेमाल औषधि निर्माण मे किया जा सकता है। 

प्रश्न 22 : शुष्क-भूमि खेती क्या है? भारत के लिए इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए।
 
उत्तर : शुष्क-भूमिः ऐसी खेती को कहते है जिसमे सिचाई के कृत्रिम साधन उपलब्ध नही होते है तथा यह भूमि प्राकृतिक वर्षा पर ही निर्भर रहती है। भारत मे अनुमानतः 990 लाख हेक्टेअर भूमि मे होने वाली खेती प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर है, जो खेती के लिए की गई कुल बुआई ;1410.60 लाख हेक्टअर) का 70 प्रतिशत है। अमूमन इस तरह की भूमि पर जवार, बाजरा, तिलहन, दलहन इत्यादि फसलाे की बुआई की जाती है जिसे कम पानी की आवश्यकता होती है। शुष्क भूमि खेती मुख्य रूप से पश्चिम और दक्षिण उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य  प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र इत्यादि पर की जाती है। चूकि इस क्षेत्रा की कृषि वर्षा पर निर्भर होती है अतः इनके उत्पादन का ग्राफ हमेशा ऊपर-नीचे होता रहता है। इस कृषि पर निर्भर किसानो की आर्थिक हालत दयनीय होती है। भारतीय वैज्ञानिक फसलो की ऐसी किस्म का विकास करने मे लगे है जो कम पानी और कम समय मे पक कर तैयार हो जाये। भारत सरकार भी इस प्रकार की खेती मे लगे लोगो के जीवन स्तर को सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम चला रही है।

प्रश्न 23 : ‘एच.बी.जे. पाइप लाइन क्या है? इसके द्वारा किसका वहन किया जाएगा? कहाँ से कहाँ तक और किस प्रयोजन से?

उत्तर : हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर पाइपलाइन जो विश्व की सबसे लम्बी भूमिगत पाइपलाइन है, उर्वरक सयत्रो, शक्ति उत्पादन केद्रो और अन्य आद्योगिक प्रयोजन के लिए प्राकृतिक गैस का वहन करती है।

प्रश्न 24 : झूम खेती क्या है और इसे कहाँ किया जाता है?

उत्तर : झूम खेती अधिक वर्षा वाले इलाको मे की जाती है, इसके लिए जगलो को जलाकर या काटरक साफ कर दिया जाता है और फिर उस स्थान पर खेती की जाती है। भूमि का उर्वरता खत्म होने पर दूसरी जगह तलाश कर यही विधिा अपनाई जाती है। भारत मे उत्तरी.पूर्वी राज्यो एव भूमध्य रेखा के पास ऐसी खेती होती है।

प्रश्न 25 : मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान (Desert National Park) भारत मे कहाँ स्थित है? इसको क्यो बनाया गया है?

उत्तर : राजस्थान के जैसलमेर मे मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान, रेगिस्तान के प्राकृतिक वास एव प्रजातियो के सरक्षण एव सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है।

प्रश्न 26 : भारत के किस भाग मे समुद्र पर आधारित उद्योगो का अपेक्षाकृत अधिक विकास हुआ है और क्यो?    

उत्तर : समुद्र पर आधारित उद्योगो का विकास मुख्य रूप से तमिलनाडु, कार्नाटक, केरल व प. बगाल आदि के तटवर्ती क्षेत्रो मे हुआ है तथा मत्स्य पालन, मोती.शुक्ति, खाद्य.शुक्ति, समुद्री शैवाल, नौका व जहाजरानी आदि प्रमुख समुद्र आधारित उद्योग है। बम्बई, कलकत्ता, विशाखपट्टन व कोचीन मे बदरगाहो की उपलब्धता ने इनके लिए विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 27 : नाभिकीय (परमाणु) ऊर्जा के उत्पादन मे प्रयुक्त खनिजो के नाम बताइए और यह भी बताइए कि वे कहाँ मिलते है?  

उत्तर : यूरेनियम, थोरियम, बेरीलियम, प्लूटोनियम व जिरकोनियम प्रमुख परमाणु शक्ति वाले खनिज है। मोनेाजाइट से भी यूरनियम प्राप्त किया जाता है। यूरेनियम बिहार, मध्य प्रदेश, व राजस्थान मे; मोनोजाइट केरल, तमिलनाडु व आंध्रा प्रदेश के तटीय क्षेत्रो मे; बेरीलियम बिहार, आंध्रा प्रदेश व राजस्थान मे तथा जिरकोनियम केरल मे प्राप्त होता है। 

प्रश्न 28 : सभी का उत्तर दीजिए    

(a) भारत मे ‘सामाजिक वानिकी’ की अवधारणा समझाइए।
(b) निद्ध शक्ति केन्द्र (कैप्टिव पाॅवर स्टेशन) किसकोे कहते है? इस प्रकार के केन्द्रो को स्थापित करने का उद्देश्य क्या है?
(c) भारत मे कौन कौन से राज्य है, जहा झूमकृषि अब भी प्रचलित है?
(d) ‘जीव मडल सचय’ क्या होता है? उसका महत्व समझाइए।

उत्तर : (a): 1980 मे प्रारम्भ सामाजिक वानिकी, पर्यावरण सतुलन, वन लगाना, भू-क्षण एव भू-स्खलन की रोकथाम से सबधित है। इसके साथ ही यह चारे व ईधन की भी व्यवस्था करता है। राष्ट्रीय कृषि आयोग ने सामाजिक वानिकी को दो भागो मे बाटा है- प्रश्रेप वानिकी अर्थात खेतो की मेड़ो पर पक्तिबद्ध लाइन मे वृक्षारोपण करना तथा घर, कुए आदि उपलब्ध साधनो के आस पास वृक्ष लगाना। द्वितीय, प्रसार वानिकी, जिसके अन्तर्गत इमारती लकड़ी व चारा वाली प्रजाति का शासकीय एव गैर-शासकीय क्षेत्रा मे रोपण, सड़क, रेल व नहरो के किनारो पर शीघ्र बढ़ने वाली प्रजाति का रोपण और पर्यावरण सरक्षण हेतु विकृत वनो मे सुधार आदि आते है। सामाजिक वानिकी के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रा के बेरोजगारो एव अर्द्ध बेरोजगारो को आशिक रोजगार उपलब्ध कराया जा सका है। 

उत्तर (b) : पिछले अनेक वर्षो से विद्युत की कमी के कारण औद्योगिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। विद्युत कमी व औद्योगिक विकास के दृष्टिगत सरकार ने वृहद् औद्योगिक इकाइयो को ‘निद्ध विद्युत केन्द्र’ स्थापित करने की स्वीकृति दे दी। इन केन्द्रो से औद्योगिक इकाइयो को नियमित विद्युत आपूर्ति सुलभ होगी तथा राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड पर भार कम होगा।

उत्तर (c) : भारत मे असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश व उत्तरी उड़ीसा आदि राज्यो मे झूम खेती  (Shifting Cultivation)  की जाती है। इन स्थान परिवर्तन करने वाले कृषिको को एक स्थान पर स्थायी करने के लिए अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम मे 1981.87 की अवधि मे एक विशेष योजना आरम्भ की गयी। झूम खेती के तहत अब तक 9 राज्यो मे 25,632 झूमिया परिवारो को पाच वर्ष मे स्थायी करने के लिए चुना गया है। 

उत्तर (d) : बढ़ती हुई जनसख्या व उसकी बढ़ती खाद्य माग के कारण जीव मडल की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। अतः किसी क्षेत्रा विशेष से सबधित जीव प्रजाति को सरक्षण और सुरक्षा देने के उद्देश्य से जीव मडल सचय क्षेत्रा स्थापित करने का फैसला किया गया। भारत मे केरल मे नीलगिरि, उत्तर प्रदेश मे नन्दा देवी व मेघालय मे नोकर्क मे जीव मडल सचय स्थापित किये गए है। 

प्रश्न 29 : भारत के स्वतत्राता आदोलन के अतिम चरण विशेषकर 1947 के प्रारम्भ से स्वतत्राता प्राप्ति का विवरण दीजिए।

उत्तर : भारत के स्वतत्राता आदोलन के अतिम चरण मे, एक ओर जहा ब्रिटिश सरकार, मुस्लिम लीग व काग्रेस नेताओ के बीच भारत के भविष्य को लेकर वात्र्ताओ के दौर जारी थे, दूसरी ओर, विभिन्न जन.कार्रवाइया भी सामने आ रही थी। आजाद हिद फौज के बदियो की रिहाई के लिए चले आदोलन ने जनता को व्यापक पैमाने पर प्रभावित किया। भारतीय सेना पर भी इस आदोलन का प्रभाव पड़ा। 1945.46 मेे सैनिक सेवाओ मे भी विद्रोह फैल गया। कलकत्ता से प्रारभ होकर यह विद्रोह थल, जल व वायु तीनो सेनाओ मे फैल गया। 18 फरवरी, 1946 को बबई जल सेना ने खुला विद्रोह किया तथा मजदूरो ने भी अनेक स्थानो पर प्रदर्शन किया, जबकि ट्राम कर्मचारियो की हड़ताल को अन्य मजदूरो का भी समर्थन हासिल था। इसी वर्ष कराची, कानपुर व कोयम्बटूर मे विशाल हड़ताल व प्रदर्शनो मे लाखो मजदूरो ने भाग लिया। सितम्बर, 1946 मे बगाल का तेभागा आदोलन व त्रावणकौर मे पुनाप्रा-वायलार आदोलन तथा जुलाई, 1946 मे हैदराबाद मे तेलगाना मे हुए सघर्ष मे किसानो, मजदूरो व कबायली जनता की प्रमुख भूमिका रही। यद्यपि, परस्पर एकता के अभाव मे ये सभी आदोलन या सघर्ष एक जनक्राति का रूप नही ले पाए, लेकिन इसने अग्रेजो के लिए भारत मे अधिक समय तक ठहरना मुश्किल कर दिया।
1946 मे ब्रिटेन मे एटली के नेतृत्व मे मजदूर-दल की सरकार स्थापित हो चुकी थी। उन्होने भारतीयो को सत्ता हस्तान्तरित करने के उपाय खोजने के लिए 24 मार्च, 1946 को कैबिनेट मिशन भारत भेजा। मिशन ने भारत के विभिन्न राजनीतिक दलो से वार्ता करके भारत मे एक सघ राज्य की स्थापना, सविधान सभा के सगठन तथा अतरिम सरकार के गठन के सबध मे एक योजना रखी। विभिन्न दलो मे योजना पर तीव्र मतभेद थे तथापि सभी राजनीतिक दलो ने उसे स्वीकार कर लिया तथा  सविधान सभा के चुनाव हुए। काग्रेस ने 199 व मुस्लिम लीग ने 73 सीटे जीती। काग्रेस ने इस सभा को सपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न माना, जबकि मुस्लिम लीग ने ऐसा मानने से इकार कर दिया। लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकृत करते हुए पाकिस्तान प्राप्ति के लिए 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्रवाही दिवस’ मनाने की घोषणा की। यह कार्य ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध न होकर हिदुओ के विरुद्ध था। इसके फलस्वरूप पूरे भारत मे साप्रदायिक दगे हुए। 2 सितम्बर, 1946 को काग्रेस ने अतरिम सरकार का गठन किया, परन्तु आरभ मे लीग ने उसमे भाग नही लिया। 13 अक्टूबर को मुस्लिम लीग के 5 सदस्य अतरिम सरकार मे शामिल हुए, लेकिन उनका रुख सहयोगपूर्ण न था तथा उन्होने सविधान सभा के कार्य मे भाग लेने से मना कर दिया। 
फरवरी, 1947 मे ब्रिटिश सरकार घोषणा कर चुकी थी कि वे जून, 1948 से पूर्व भारत छोड़ो देगे। लार्ड वैवेल के स्थान पर लार्ड माउण्डबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा गया। 3 जून, 1947 को माउण्टबेटन ने एक योजना की घोषणा की, जिसमे भारत का शासन जनता के हाथो मे सौपने का आश्वासन दिया गया। काग्रेस भारत-विभाजन के लिए तैयार हो गयी, यद्यपि गाधी जी इससे सहमत न थे। जुलाई, 1947 मे ब्रिटिश ससद ने ‘भारतीय स्वतत्राता अधिनियम, 1947ष् पारित कर दिया, जिसके आधार पर भारत और पाकिस्तान दो स्वतत्रा राज्यो का उदय हुआ। 15 अगस्त, 1947 सत्ता हस्तातरण का दिन निश्चित किया गया। लार्ड माउटबेटन भारत के प्रथम गर्वनर जनरल तथा मि. जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गर्वनर बने। 

प्रश्न 30 :  बीसवी शताब्दी के प्रथम दशक तक के क्रातिकारी आतकवाद के विकास का उसके महाराष्ट्र, बगाल तथा पजाब मे हुए प्रशासन के विशेष सदर्भ मे विवेचन कीजिए।

उत्तर : अग्रेजो की नीतियो से असतुष्ट होकर भारत मे एक वर्ग ऐसा भी उत्पन्न हुआ, जिसका विश्वास हिसा मे हो गया। वह भारत मे नव-युवको का क्रातिकारी वर्ग था, जिसके केन्द्र स्थान पजाब, महाराष्ट्र और बगाल थे। इस आदोलन को क्रातिकारी आतकवाद का नाम उसमे अपनाए गए साधनो के कारण दिया गया है। वे सगठित हिसात्मक साधनो द्वारा अग्रेजी शासन को नष्ट करके स्वतत्राता चाहते थे और इस कार्य के लिए विदेशी सहायता तक लेने के लिए प्रयत्नशील थे। इन क्रातिकारियो मेे भी दो प्रकार की विचारधाराए उपस्थित थी। एक वे क्रातिकारी, जो सेना मे प्रवेश करने व विदेशो से सहायता पाने की नीति मे आस्था रखते थे तथा दूसरे वे, जो स्वतत्रा सगठन द्वारा अपने उद्देश्यो की पूर्ति मे विश्वास रखते थे। इन व्यक्तियो मे भूपेन्द्र नाथ दत्त, गणेश सावरकर, वी.डी. सावरकर, वरिन्द्र कुमार घोष, सरदार अजीत सिह, लाला हरदयाल, पुलिन बिहारी, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, श्याम जी कृष्ण वर्मा, मैडम कामा व लाला लाजपत राय के नाम उल्लेखनीय है। क्रातिकारियो ने अनेक स्थानो पर गुप्त समितियो की स्थापना की, हत्याकाड किये, गोलिया चलायी, धन लूटा, रेल पटरिया उखाड़ी तथा विभिन्न प्रकार से अग्रेजी शासन को आतकित किया।
बगाल मे इस कार्य का आरम्भ वरिन्द्र कुमार घोष और पुलिन बिहारी दास ने किया। उन्होने ‘भवानी मदीर’ तथा ‘वत्र्तमान राजनीति’ नामक दो पुस्तके छापी। इनमे से प्रथम पुस्तक ने क्रातिकारी दलो को एक स्थान पर अपने सगठन बनाने की आवश्यकता को बताया और दूसरी पुस्तक ने विदेशी सत्ता से सशस्त्रा युद्ध करने के तरीको को बताया। इनके प्रयत्नो के फलस्वरूप ‘अनुशीलन समिति’ नामक क्रातिकारी दल की स्थापना कलकत्ता और ढाका मे हुई। इसके अतिरिक्त साधना समाज, युगातर समिति, शक्ति समिति आदि सगठन भी थे। ‘युगातर’ समाचार पत्रा ने अग्रेजो के खिलाफ खुले सशस्त्रा विद्रोह का प्रचार किया। आदोलन के अन्य प्रमुख नेता  भूपेन्द्र नाथ दत्त थे। 1907.1909 के बीच क्रातिकारियो ने बगाल मे अनेक कार्रवाईयाँ की। खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी ने किग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास किया।
1897 मे दामोदर व बालकृष्ण चापेकर भाइयो द्वारा रैण्ड और एयरेस्ट की हत्या के साथ महाराष्ट्र मे क्रातिकारी आदोलन का सूत्रापात हुआ। वी.डी. सावरकर ने 1904 मे महाराष्ट्र मे ‘अभिनव भारत’ नामक एक क्रातिकारी दल का गठन किया, जिसकी शाखाए बम्बई व पूना के कई कालेजो के अलावा अन्य अनेक प्रातो मे भी वी.डी. सावरकर ने ब्रिटेन से भारत मे शस्त्रा लाने का प्रयत्न किया, लेकिन सफल न हो सके। एम.एल. धीगड़ा ने कर्जन विलि की हत्या कर दी। बम्बई, पूना, सतारा, बड़ौदा, नासिक, कोल्हापुर व नागपुर मे कई क्रातिकारी सगठन अपने-अपने स्तर पर सक्रिय थे। श्याम जी कृष्ण वर्मा व मदाम कामा का पूरा समर्थन महराष्ट्र के क्रातिकारियो को मिलता था।
पजाब मे क्रातिकारी आदोलन के प्रमुख प्रणेता सरदार अजीतसिह, लाला लालपतरय व सूफी अम्बा प्रसाद थे। आगा हैदर और सैयद हैदर रजा भी काफी सक्रिय थे। पजाब क्रातिकारी सगठन ने सशस्त्रा विद्रोह द्वारा अग्रेजी राज्य को उलटने की योजना तैयार की। अग्रेज सरकार ने पजाब के क्रातिकारियो के विरुद्ध दमन चक्र चलाया व जून, 1907 मे अजीत सिह तथा लाला लाजपतराय को निर्वासित कर माण्डले भेज दिया।

प्रश्न 31 :  ष्लार्ड लिटन एव लार्ड रिपन का वाइसराय बनना भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास मे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना हुई।’ कथन की सत्यता की जाच कीजिए।

उत्तर : लार्ड लिटनके दमनात्मक कदमो ने ब्रिटिश कानूनो को भारत मे अलोकप्रिय कर दिया था। इसी समय लार्ड रिपन के उदारवादी कदमो ने भारतीय राष्ट्रीय आदोलन को प्रेरणा प्रदान की। ऐसे समय मे, जबकि 1876 के अकाल के कारण लाखो लोग भुखमरी के शिकार हो रहे थे, लार्ड लिटन ने 1877 मे दिल्ली मे एक दरबार बुलाया। इस दरबार मे यह घोषणा की गयी कि रानी विक्टोरिया ने ‘भारत की साम्राज्ञी’ पद को स्वीकार कर लिया है। इस आडम्बर पूर्ण समारोह पर लाखो रुपये खर्च किये गए जिसका भार भारतीय राजकोष पर ही पड़ा तथा इस कृत्य की विभिन्न लोगो, समुदायो व समाचार पत्रो ने आलोचना की। लार्ड लिटन ने समाचार पत्रो की आवाज को दबाने के लिए 1878 मे वर्नाक्यूलर प्रेस कानून पारित किया, जिसने आग मे घी का काम किया और भारतीयो के मन मे विद्रोह की ज्वाला जन्म लेने लगी। इसके अलावा इसी दौरान लार्ड लिटन द्वारा उठाए गए कुछ और कदम भी ऐसे थे, जिससे लोगो मे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असतोष मे निरन्त वृद्धि हो रही थी और शासक तथा जनता के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे थे। 1878 मे बनाए गये ‘शस्त्रा कानून’ से भारतीयो को अपने पास शस्त्रा रखने पर प्रतिबध लगा दिया गया, लेकिन ‘शस्त्रा कानून’ से यूरोपियन को मुक्त रखा गया। अतः इस कानून से राष्ट्रवादियो ने स्वय को अपमानित महसूस किया। 1883 मे लार्ड रिपन ने भारत मे रहने वाले अंग्रेजों और अन्य यूरोपवासियो के जातीय अहकार को चोट पहुचने वाले ‘इलबर्ट बिल’ नामक विधेयक को वापस ले लिया। इस विधेयक के प्रावधान के अनुसार, भारत मे रहने वाले किसी अग्रेज या यूरोपवासी पर भारतीय न्यायाधीश की अदालत मे मुकदमा चलाया जा सकता था। भारत मे अग्रेज और भारतीय न्यायाधीशो के बीच समानता स्थापित करने के उद्देश्य से यह विधेयक लाया गया था, किन्तु अग्रेजो व यूरोपियन के तीव्र विरोध के फलस्वरूप सरकार ने इसे वापस ले लिया। इस बात से राष्ट्रवादियो को स्पष्ट महसूस होने लगा कि उनके हितो की रक्षा सिर्फ भारतीय ही करने मे सक्षम है। साथ.ही,वे यह भी महसूस करने लगे थे कि अपने उद्देश्यो की प्राप्ति हेतु उन्हे मजबूत आन्दोलन चलाना होगा। काफी समय से राष्ट्रवादी भारतीय अभिमत का प्रतिनिधित्व करने वाले एक ऐसे अखिल भारतीय सगठन की आवश्यकता भी महसूस कर रहे थे, जो राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर एक शक्तिशाली सगठन हो। अतः लार्ड लिटन के दमनात्मक कार्य व लार्ड रिपन के कुछ उदारवादी कार्य भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास मे किसी न किसी रूप मे सहायक रहे। 

प्रश्न 32 : स्वदेशी आदोलन कहाँ तक ‘बायकाॅट’ (बहिष्कार) से सम्बन्धित था? आदोलन मे जनसहभागिता का विश्लेषण कीजिए।  

उत्तर : राष्ट्रीय आदोलन के लक्ष्यो और तरीको को प्रभावित करने व उन्हे परिवर्तित करने मे 1905 के बग-भग ने उल्लेखनीय भूमिका निभायी। बगाल विभाजन के पीछे अग्रेज सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर बनाना था। भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस व बगाल के राष्ट्रवादियो ने इसका तीव्र विरोध करते हुए स्वदेशी व बहिष्कार आन्दोलन चलाए। स्वदेशी व बहिष्कार आदोलनो को इससे पूर्व अमरीका, आयरलैण्ड व चीन के लोग अपने देशो मे अपना चुके थे। राष्ट्रवादियो ने यह महसूस किया कि स्वदेशी व बहिष्कार एक दूसरे के पूरक है, तथा एक के अभाव मे दूसरा पूरी तरह सफल नही हो सकता। इस आन्दोलन के दौरान विरोध के नए.नए तरीके अपनाए गए। लोगो ने सामूहिक रूप से स्वदेशी वस्तुओ को बढ़ावा व विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दिया। इसका उद्देश्य इग्लैड के आर्थिक हितो को क्षति पहुचाना था, क्योकि अधिकाश विदेशी वस्तुए इग्लैड से ही आती थी। एक ओर, सार्वजनिक स्थानो पर विदेशी कपड़ो की होली जलाई गयी तो दूसरी ओर, स्वदेशी वस्तुओ के उत्पादन व बिक्री पर जोर दिया गया।
बहिष्कार के कार्यक्रम के अन्तर्गत ब्रिटिश कपड़ो, विदेशी समान, शैक्षिक सस्थान व न्यायालयो आदि का बहिष्कार किया गया। लोग समूह बनाकर दुकानो पर जाकर दुकानदारो से विदेशी सामान न बेचने व ग्राहको से उन्हे न खरीदने का आग्रह करते थे। विदेशी सामान बेचने या खरीदने वालो से सम्पर्क समाप्त करने की नीति भी अपनायी गयी। धोबियो व नाइयो ने विदेशी वस्तुओ का उपयेग करने वाले लोगो का काम करने से इकार कर दिया। बहिष्कार के फलस्वरूप वस्तुओ की आपूर्ति करने के लिए स्वदेशी वस्तुओ को अपनाने पर जोर दिया गया। स्वदेशी कुटीर उद्योग, कपड़ा मिल, माचिस फैक्ट्री, साबुन फैक्ट्री आदि खोली गयी। इसी क्रम मे पी.सी. रे ने बगाल मे रासायनिक फैक्ट्री की स्थापना की। रविन्द्र नाथ टैगोर ने स्वय एक स्वदेशी स्टोर स्थापित करने मे सहायता की। अल्प समय मे ही अनेक राष्ट्रीय विद्यालयो की स्थापना की गयी। 1906 मे राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया गया। बगाल नेशनल कालिज तथा बगाल टेक्निकल इस्टीट्यूट की स्थापना की गयी। तिलक ने महाराष्ट्र मे स्वदेशी वस्तु प्रदर्शनी सभा के अध्यक्ष के रूप मे अनेक सहकारी केन्द्र स्थापित किये। उन्होने बम्बई मिल मालिको को धोतियो की आपूर्ति सस्ती दरो पर करने के लिए प्रोत्साहित किया। पूना मे एक स्वदेशी बुनकर कम्पनी की स्थापना हुई। न्यायालयो का बहिष्कार करते हुए विवादो का निपटरा स्थानीय पचायतो द्वारा किया जाने लगा। 16 अक्टूबर, 1905 (बगाल विभाजन) का दिन शोक दिवस के रूप मे मनाया गया। इस आन्दोलन मे किसान, श्रमिक, मुस्लिम समुदाय, व्यापारी तथा ब्राह्मण धर्मगुरूओ ने भी उत्साह से भाग लिया। स्वदेशी का अर्थ उस सब से हो गया, जिसका सबध भारतीय से था। शीघ्र ही यह आन्दोलन आजादी की लड़ाई का प्रमुख हथियार बन गया तथा पूरे भारत मे जनता की राष्ट्रीय भावनाओे को उभारने मे सफल रहा।

प्रश्न 33 : ”अहिसात्मक सत्याग्रह की तकनीक को अग्रेजो के विरुद्ध शस्त्रा के रूप मे राष्ट्र द्वारा 1916-20 ई. के मध्य स्वीकार करवा लेने मे महात्मा गाँधी की सफलता अद्भुत थी“ स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर : महात्मा गाधी ने दक्षिण अफ्रीका मे 1894.1914 तक लोगो के शोषण के खिलाफ ब्रिटिश सरकार के विरोध मे अहिसक आन्दोलन छेड़ा और अपने उद्देश्य मे पूर्णतः सफल हुए। महात्मा गाँधी 1915 मे भारत वापस लौट आए। भारत मे भी उन्हे उन्ही परिस्थितियो का सामना करना पड़ा, जो उन्होने दक्षिण अफ्रीका मे देखी थी और जिसके विरोध मे अहिसक आन्दोलन का सूत्रपात किया था। महात्मा गाँधी ने भारत मे ब्रिटिश हुकूमत, उनकी दमनकारी नीति, उनके शोषण और रगभेद की नीति के विरुद्ध अहिसक सत्याग्रह की तकनीक को एक प्रभावकारी हथियार के रूप मे अपनाया। 
गाँधीजी ने 1917 मे चम्पारन मे नील की खेती करने वाले किसानो के प्रति येरोपियन अधिकारियो के अत्याचारो के विरोध मे प्रथम सत्याग्रह किया। सत्याग्रह आन्दोलन मे दो प्रमुख तत्व निहित थे-सत्य और अहिसा। गाधीजी का मानना था कि सत्य और अहिसा से जन्मी शक्ति आत्मा की शक्ति होती है। जीवन मे सफल होने के लिए यह आवश्यक है कि सत्याग्रह ही भय, घृणा और असत्य से दूर रहे। गाधीजी के भारतीय राष्ट्रीय आदोलन मे प्रवेश के समय आदोलन नेहरू, गोपाल कृष्ण गोखले, ऐनी बेसेट आदि अनेको नरमपथी लोग वैधानिक-तरीको से स्वतत्राता प्राप्ति हेतु सघर्षरत थे, वही दूसरी ओर बाल, पाल, लाल सदृश गरमपथी स्वतत्राता सग्राम मे किसी भी तरीके को अपनाने के लिए तैयार थे। तीसरा दल क्रातिकारियो का था, जो अग्रेजो से वैधानिक सुधार की अपेक्षा को भिक्षावृति कहता था और अग्रेजी शासन को समाप्त करने के लिए, त्याग, बलिदान और अन्य सभी उपायो को उचित मानता था। 
तत्कालीन परिप्रेक्ष्य मे महात्मा गाधी ने यह अनुभव किया की अग्रेजो की ‘फुट डालो और शासन करो’ की नीति और उनकी विपुल शक्ति के आगे भारतीय सशस्त्रा सघर्ष ने अपनी मजिल प्राप्त नही कर सकेगे। इसलिए उन्होने अहिसक सत्याग्रह का मार्ग अपनाया। 1917-18 के मध्य गाधीजी ने चम्पारण सत्याग्रह, खेड़ा (गुजरात) सत्याग्रह और मिल मजदूरो की मजदूरी मे 35 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी मे सफलता इसी नये अस्त्रा के सहारे प्राप्त की। 
उपरोक्त सफलताओ से देश मे अहिसक आन्दोलन की पृष्टभूमि तैयार हुई, जिसने रौलेट एक्ट के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी आदोलन चलाए जाने का मार्ग प्रशस्त किया। सत्य और अहिसा के प्रति गाधीजी का विश्वास अटूट था। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण 1920 के सहयोग आन्दोलन के सफलता के चरमोत्कर्ष पर होने के बाद भी चैरी.चैरा मे हुई हिसक घटनाओ के बाद इसे वापस लेना है। आन्दोलन वापस लेने के कारण गाधी जी को अपने सहयोगियो की आलोचना का शिकार होना पड़ा। परतु उन्होने कहा कि भारत को स्वतत्रा करने के लिए लोगो को सत्याग्रह का वास्तविक अर्थ समझना पड़ेगा और जब तक हम मन, वचन और कर्म से पूर्णः अहिसक नही हो जाते, तब तक आन्दोलन सफल नही हो सकता। गाधीजी के प्रयास से समस्त भारतवासियो ने असहयोग तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन मे सत्य और अहिसा के सहारे आन्दोलन किया तथा भविष्य मे अनवरत रूप से स्वतत्राता प्राप्ति के लिए इसका प्रयोग करते रहे।
जिस समय सम्पूर्ण विश्व हथियारो की प्रतिस्पद्र्धा मे शामिल था तो ऐसे समय मे सत्याग्रह शस्त्रा के रूप मे भारतीय जनमानस द्वारा स्वीकार करवाना महात्मा गाधी की सफलता का परिचायक है। शस्त्रा अंग्रेजों के विरुद्ध निःसशस्त्रा होकर उनका विरोध करना एक दुःसाहसिक कार्य था। 1919 मे जालियाँवाला बाग की हिसा ने भारतीय जनमानस मे प्रतिशोध की एक तीव्र लहर पैदा की, फिर भी 1920 के असहयोग आन्दोलन का आधार सत्य और अहिसा ही रहा। यह गाधीजी की बहुमुखी प्रतिभा का प्रतिफल था और यही उनके इन नवीन अस्त्रा की सफलता का परिचायक भी। 

प्रश्न 34 : 1950 मे बगाल विभाजन क्यों किया गया? इसने राष्ट्रीय आन्दोलन मे गरम और आतकवादी विचारधाराओ को किस प्रकार प्रोत्साहित किया? इसको क्यो रद्द किया गया और इसके क्या परिणाम हुए?

उत्तर : राष्ट्र चेतना का सबसे तीव्र प्रसार बगाल मे हुआ था। तत्कालीन बगाल मे बिहार, असम, उड़ीसा और बाग्लादेश सम्मिलित थे। तत्कालीन गृह सचिव राइसले के अनुसार उपविभाजित बगाल एक बड़ी शक्ति थी जो अगे्रेजी शासन की नीव को हिला सकती थी। इसलिए तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन ने देश भक्ति के उफनते शैलाब को रोकने के लिए राष्ट्रीय गतिविधयो के इस केन्द्र को जुलाई, 1905 ई. मे दो प्रातो पश्चिम बगाल (बिहार, उड़ीसा सहित) और पूर्वी बगाल (असम सहित) मे विभाजित करने की घोषणा की। यद्यपि ऊपरी तौर पर बगाल विभाजन का उद्देश्य प्रशासनिक कठिनाइयो को कम करना था। लेकिन वास्तविक रूप मे बगाल विभाजन का उद्देश्य बगाल मे उठ रही राष्ट्रीयता की लहर को शात करना था। ब्रिटिश शासन का उद्देश्य सिर्फ यही तक सीमित नही था बल्कि उनका उद्देश्य मूल बगालियो को, जिनकी सख्या 1.70 करोड़ थी, उन्हे बगाल मे अल्पसख्यक बनाना था। साथ ही, ब्रिटिश सरकार यहा भी अपने अमोध अस्त्रा ‘फूट डालो और शासन करो’ के सहारे हिन्दू एव मुसलमानो को आपस मे बाँटकर भारत के सामाजिक ढाचे को विभाजित कर देना चाहती थी। 
भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस और बगाल के राष्ट्रवादियो ने इस विभाजन का तीव्र विरोध किया। बगाल विभाजन से पूरे बगाल मे क्रातिकारी आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला। बगाल विभाजन ने सभी सगठनो, समुदायो तथा समाचार पत्रो को एक जुट होने का उपयुक्त अवसर प्रदान किया। राष्ट्रवासियो ने इसके विरोध मे स्वदेशी व बहिष्कार आन्दोलन का श्रीगणेश किया। इस आन्दोलन के दौरान विरोध के नए.नए तरीके प्रयोग किये गए। लोगो ने सामुहिक रूप से विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार करना प्रारभ कर दिया। गणमान्य लोगो ने विदेशी पदवी तथा छात्रो ने अंग्रेजी स्कूल और काॅलेज को त्याग दिया। बहिष्कार के फलस्वरूप माग की पूर्ति करने के लिए स्वदेशी वस्तुओ को अपनाने पर जोर दिया गया। राष्ट्रीय शिक्षा पर अमल करना आरभ किया गया जिसके तहत अगस्त, 1906 मे राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया गया। बगाल नेशनल कालेज तथा बगाल टेक्नीकल इस्टीच्यूट की स्थापना की गई। गरम पथियो के नेता अरविन्द घोष, लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक व विपिन चन्द्र प्राल  ने इस आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बना दिया। अग्रेजो के दमन चक्र के बावजूद काग्रेस और आन्दोलनकारियो की लोकप्रियता मे वृद्धि हुई। 16 अक्टूबर, 1905 को जिस दिन विभाजन लागू हुआ था, वह दिन शोक दिवस के रूप मे मनाया गया।
बगाल विभाजन से उपजा असतोष क्रातिकारी आदोलन की गतिविधिायो मे सक्रियता लाया। क्रातिकारियो ने 1907 मे भारत सचिव लार्ड हार्डिग पर दिल्ली मे बम फेका। बग-भग के बाद उत्तर प्रदेश और बगाल मे अनुशीलन समिति, लदन मे होमरूल सोसायटी, हिन्दुस्तान एसोसिएशन आदि की स्थापना क्रातिकारियो ने की। 1907 मे काग्रेस मे विभाजन के बावजूद राष्ट्रवादियो ने एक स्वर मे इसे रद्द करने की माग और स्वराज के लिए आवाज बुलद करते रहे। 
बगाल विभाजन के विरोध मे हो रहे आन्दोलन को दबाने के लिए अग्रेजो ने घोर-दमन चक्र चलाया। कई राष्ट्रवादी नेताओ को गिरफ्तार कर लिया गया तथा प्रेस पर प्रतिबध लगा दिया गया। परतु, भारतीयो के कड़े विरोध के कारण ब्रिटिश सरकार को 1911 ई. मे बग.भग का आदेश वापस लेना पड़ा। यह निर्णय जार्ज पचम के दिल्ली दरबार मे (1911) मे लिया गया, जो 1912 मे लागू हो गया। विभाजन वापस लेने के कारण राष्ट्रवादियो की उत्तेजना कुछ कम हुई और ब्रिटिश सरकार को 1914 के प्रथम विश्व युद्ध मे भारतीयो का सहायोग मिला।

प्रश्न 35 : विचार सम्प्रेषण की व्याख्या करे।

उत्तर : अपने विचार, ज्ञान, अवबोध तथा कौशल को दूसरे व्यक्ति तक पहुचाने की क्रिया विचार सम्प्रेषण कहलाती है। दूसरे व्यक्ति या व्यक्ति समूह ने सम्प्रेषित विचार को कितनी सफलता के साथ ग्रहण किया या सम्प्रषणकर्ता विचार-सम्प्रेषण मे कितना सफल हुआ है, यह निर्भर करता है इस तथ्य पर कि विचार-सम्पे्रषण की कला कितनी सफलता से प्रयुक्त की गई है। एक व्यक्ति जो कुछ भी जानता है, उसे सामान्य बना देता है। अपने विचार, ज्ञान, अवबोध तथा कौशल को दूसरे व्यक्तियो तक पहुचाने की क्रिया ही विचार-सम्प्रेषण है। 
विचार-सम्प्रेषण प्रक्रिया मे कम से कम दो पक्षो का होना नितान्त अनिवार्य है। एक पक्ष है सम्प्रेषणकर्ता तथा दूसरा पक्ष है सम्प्रषिती सम्प्रेषणकर्ता। 
किसी-न-किसी माध्यम से अपने विचार, ज्ञान, अवबोध तथा कौशल का सम्प्रषण कर उन्हे सामान्य बनाता है। जिन व्यक्तियो को ये विचार, ज्ञान, अवबोध तथा कौशल प्रदान किए जाते है, या जो इन्हे ग्रहण करते है उन्हे सम्प्रेषिती कहा जाता है। 
सम्प्रेषण के प्रभावी होने के लिए सचार धारा को दो-तरफ होना अत्यत आवश्यक हैै। विचार-सम्प्रेषण प्रभावी तब ही हो पाता है जब विचार सचारधारा मे दोनो तरफ से अर्थात् सम्प्रेषणकर्ता व सम्प्रेषिती के बीच विचारो को खुला आदान-प्रदान होता है। 
विचार सम्प्रेषण मे भाषा-शैली का अत्यत महत्वपूर्ण स्थान है। विचार-सम्प्रेषण मे सम्प्रेषणकर्ता किस भाषा का प्रयोग कर रहा है, यह महत्वपूर्ण होता है। भाषा सस्वर हो सकती है अथवा मौन। हम बोलकर या फिर सकेत या इशारो से अपने विचारो को सम्प्रषण करते है। भाषा बोधगम्य, सरस तथा सरल होनी चाहिए। शिक्षण का एक महत्वपूर्ण सूत्रा है कि ”छात्रा को छात्रा की भाषा मे ही पढ़ाओ“। इसके दो अभिप्राय हैः प्रथम, छात्रा जिस भाषा को जानता है उसी के माध्यम से शिक्षक को भी भाषा वही स्तर बनाए रखना होगा, तभी सफल शिक्षण होगा। इसके अतिरिक्त सम्प्रेषणकर्ता को सम्प्रेषण के उद्देश्यो को भी ध्यान रखना आवश्यक है; तभी सम्प्रेषण नीति का भी उल्लेखनीय स्थान है। 
अतः शिक्षण प्रक्रिया मे सम्प्रेषण अत्याधिक महत्वपूर्ण है। शिक्षक अपने शिक्षण कार्य के अन्तर्गत छात्रो तक जितने प्रभावी ढ़ग से अपनी बात पहुचा पाता है, उतना ही शिक्षण प्रभावी और सफल, बनता है। इस हेतु शिक्षक को छात्रो का स्तर, विषय वस्तु की प्रकृति, उपलब्ध समय और ससाधनो को ध्यान मे रखना चाहिए। इन सब बातो का ज्ञान शिक्षको को प्रशिक्षण के समय समझाया जाता है।

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