सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 8 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 8 (प्रश्न 1 से 12 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 1 : राज्य सभा के कार्यों तथा शक्तियों का वर्णन कीजिए। इसकी शक्तियों की लोकसभा की शक्तियों से तुलना कीजिए

उत्तर : राज्यसभा संसद का एक स्थायी सदन है। इसका विघटन नहीं होता है, लेकिन हर दूसरे वर्ष इसके एक तिहाई सदस्य अवकाश ग्रहण करते हैं। हर एक सदस्य छह वर्ष तक राज्यसभा का सदस्य बना रहता है। यह संसद का द्वितीय या उच्च सदन कहलाता है। राज्यसभा का गठन राज्यों की विधानसभा द्वारा चुने गए सदस्यों से राज्य की जनसंख्या के आधार पर होता है। इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 250 होती है, जिसमें 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा आदि क्षेत्रों से मनोनित किये जाते हैं। सैद्धांतिक रूप से राज्यसभा ओर लोकसभा समान सदन हैं व दोनों को समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन व्यवहार में राज्यसभा एक गौण सदन के रूप में उभरती है। कुछ शक्तियाँ व कार्य ऐसे हैं, जो लोकसभा व राज्यसभा दोनों सदनों द्वारा किए जाते हैं। ये निम्न प्रकार हैंः
(i) सांसदों के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाले सदस्य या बाहरी व्यक्ति को दण्ड देना।
(ii) सदन से असंबद्ध लोगों को संसद के गलियारे से बाहर जाने या हट जाने का निर्देश देना।
(iii) सभी प्रक्रियाओं के साथ अपने सभी मामालें व कार्यों का नियमन व प्रबंधन स्वयं (न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना) करना।
(iv) लोकसभा द्वारा पारित विधेयक राज्यसभा द्वारा भी पारित किये जाने के बाद ही राष्ट्रपति के पास भेजे जाते हैं।
(v) लोकसभा सदस्यों की भांति राज्यसभा सदस्य भी राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं।
(vi) सुप्रीमकोर्ट व हाईकोर्ट के न्यायाधीशों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त या महालेखा नियंत्राक आदि को पदच्युत करने के लिए राज्यसभा की स्वीकृति भी आवश्यक है।
(viii) यदि लोकसभा भंग हो तो संकटकालीन घोषणा की स्वीकृति राज्यसभा ही देती है।
(ix) लोकसभा द्वारा राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाए जाने की स्थिति में, महाभियोग की जांच राज्य सभा ही करती है।
(x) संविधान संशोधन में लोकसभा व राज्यसभा की भूमिका समान है। 
इसके अलावा राज्यसभा को कुछ ऐसी शक्तियां प्राप्त हैं, जो लोकसभा को प्र्राप्त नहीं हैं। ये निम्नवत् हैंः  
(a) अनुच्छेद.249 के अनुसार, आपात् स्थिति में जब राष्ट्रीय हीत को देखते हुए संसद के लिए राज्यसूची में शामिल किसी विषय पर कानून बनाना जरूरी हो जाए, तो ऐसा उसी स्थिति में संभव है, जब राज्यसभा 2ध्3 बहुमत द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत करके संसद को प्राधिकार दे।
(b) अनुच्छेद.312 के अनुसार, संसद केंद्र और राज्य दोनों के लिए साझा अखिल भारतीय सेवा आयोग स्थापित करने के लिए कानून बना सकती है। परंतु, इसके लिए ऐसा प्रस्ताव राज्यसभा द्वारा 2ध्3 बहुमत में पारित होना आवश्यक है। 
(c) राज्यसभा, लोकसभा द्वारा पारित किसी भी संशोधन विधेयक को अस्वीकृत, लंबित या रद्दोबदल कर सकती है। 
राज्यसभा की शक्तियों की कुछ सीमांए हैं, जो निम्न प्रकार हैं-
I वित्त विधेयक राज्यसभा में नहीं लाया जाता है तथा उसमें किसी प्रकार के संशोधन या अस्वीकृत करने का इसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। 
II   राज्यसभा के सभापति को यह निर्णय लेने का विशिष्ट अधिकार प्राप्त नहीं है कि कोई विधेयक विशेष वित्त विधेयक है या नहीं, जबकि लोकसभा अध्यक्ष को यह अधिकार प्राप्त है। 
III    लोकसभा की भांति राज्यसभा को सार्वजनिक व्यय हेतु धन के लिए मतदान करने का अधिकार नहीं है।
IV मंत्रिमंडल राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं होता है।
V अनुदान मांगें राज्यसभा के मत के लिए प्रस्तुत नहीं की जातीं। 
VI संसद में किसी विषय पर संयुक्त अधिवेशन की स्थिति में संख्या में कम होने के कारण राज्यसभा लाभ की स्थिति में नहीं रहती। 

प्रश्न 2 : ‘यद्यपि भारत में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है जैसे राष्ट्रपति देश का होता है, फिर भी हो सकता है कि राज्यपाल के अधिक अधिकार हो’। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? कारण बतलाइए।

उत्तर : राष्ट्रपति और राज्यपाल में किसे अधिक अधिकार है इसे समझने के लिए दोनों के अधिकारों का तुलनात्मक अध्ययन करना उपयुक्त होगा। जिस प्रकार केन्द्र का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है उसी प्रकार राज्यपाल भी राज्य का संवैधानिक प्रमुख हेाता हैं। केंद्र और राज्य की कार्यपालिका की शक्ति क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल में निहित होती है। कुल विशेष परिस्थितियों को छोड़कर राष्ट्रपति और राज्यपाल मंत्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य हैं। संविधान के अनुच्छेद 74(अ) के अनुसार राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य है जबकि राज्यपाल इस प्रकार की परिस्थितियों में स्वविवेक से निर्णय लेने को स्वतंत्रात है। लोक सभा या राज्य सभा जिस विधेयक को पारित करके राष्ट्रपति को भेजते हैं, राष्ट्रपति उस विधेयक को मंजूरी देने के लिए बाध्य हैं यदि वह विधेयक के प्रावधानों से असंतुष्ट है, तो लोकसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है। यदि लोक सभा पुनः विधेयक को पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजती है तो वह मंजूरी देने को बाध्य हो जाता है। इस प्रकार की बाध्यता राजयपाल के साथ नहीं है। यदि वह विधान सभा एवं विधान परिषद् से पारित विधेयकों से असंतुष्ट है तो उसे राज्य विधानमंडल को वापस न लौटाकर राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकता है। यहाँ पर स्पष्ट रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि राज्यपाल को राष्ट्रपति से अधिक अधिकार हैं, क्योंकि वह स्वविवेक से निर्णय लेने को स्वतंत्रा है। 
राज्य में विधि व्यवस्था की स्थिति खराब होने पर राज्यपाल बिना मुख्यमंत्राी के परामर्श के राष्ट्रपति से अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में विधानमंडल भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा कर सकता है। दूसरी ओर देश में विधि व्यवस्था खराब होने पर भी बिना प्रधानमंत्राी के परामर्श के देश में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हो सकता है। राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाकर पदच्युत किया जा सकता है लेकिन राज्यपाल पर महाभियोग नहीं लगाया जा सकता है। 
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि कुछ मामलों में राज्यपाल के अधिकार राष्ट्रपति से अधिक प्रतीत होते हैं। 

प्रश्न 3 : योजना आयोग एवं राष्ट्रीय विकास परिषद् का सार्वजनिक नीति निर्माण में क्या योगदान है, समझाइए।

उत्तर : स्वतंत्राता प्राप्ति करने के पश्चात भारत को अपने देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए विकास की अनेक योजनाओं को लागू करना था। इसी उद्देश्य से मार्च 1950 में एक गैर संवैधानिक निकाय ‘योजना आयोग’ का गठन किया गया। योजना आयोग द्वारा तैयार योजनाओं को राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा मंजूरी मिलती हैं। योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद् दोनों निकायों के अध्यक्ष प्रधानमंत्राी होते हैं। योजना आयोग में इसके स्थायी सदस्यों के अलावा केंद्र सरकार के वित्तमंत्राी, मानव संसाधन मंत्राी इत्यादि भी सदस्य होते हैं। प्रधानमंत्राी, योजना आयोग के सदस्य, राज्य के मुख्यमंत्राी एवं केंद्र सरकार के मंत्राी राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठकों में भाग लेते हैं। 
योजना आयोग योजना बनाने में निम्न प्रक्रिया अपनाता हैः
(अ) विकास प्रक्रिया की रूप रेखा को परिभाषित करना, (ब) विकास के लिए नीतिगत रूप रेखा तैयार करना, (द) केन्द्र और राज्यों के बीच संसाधनों को आवंटित करना (ड) सार्वजनिक क्षेत्रों द्वारा विशिष्ट परियोजनायें लागू करने पर विचार करना। 
योजनाओं को बनाने व उसके कार्यों का विस्तार होने के कारण इन दिनों योजना आयोग गैर संवैधानिक निकाय होने के बावजूद एक शक्तिशाली संगठन के रूप में उभरा है। केंद्र एवं राज्य के आर्थिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों के कार्यक्रमों में आवश्यकता पड़ने पर योजना आयोग अपने विचार भी देता है। योजना आयोग आगामी पांच वर्षों की योजना का प्रारूप तैयार कर पंचवर्षीय योजना की रूप रेखा तैयार करता है। 
राष्ट्रीय विकास परिषद् का गठन भारत के संघ राज्यों की योजना निर्माण में भागीदारी को ध्यान में रखते हुए 6 अगस्त, 1952 को एक गैर-संवैधानिक निकाय के रूप में किया गया। इसका सचिव योजना आयोग का ही सचिव होता है। राष्ट्रीय विकास परिषद् के निम्नलिखित उद्देश्य हैंः

  • राष्ट्रीय योजना के लिए राष्ट्र के संसाधनों और योजना के हित में प्रयासों को अधिक सशक्त बनाना।
  • सभी क्षेत्रों के दृष्टिगत आर्थिक नीतियों को निर्धारित करना।
  • देश के सभी क्षेत्रों के लिए तीव्र तथा संतुलित विकास सुनिश्चत करना। 

योजना आयोग द्वारा तैयार किये गये योजनागत प्रस्तावों को अंतिम रूप से राष्ट्रीय विकास परिषद् ही अनुमादित करती है। चुँकि इसी बैठक में प्रधानमंत्राी एवं राज्यों के मुख्यमंत्राी भाग लेते हैं, अतः जो भी योजनाएं अनुमोदित होती है उसे सर्व सम्मति से मान लिया जाता है और योजनाएं लागू होने में कोई दिक्कत नहीं होती है। 
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सार्वजनिक नीति निर्माण में योजना अयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद् का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 4 : भारत के संविधान की प्रमुख प्रतिबद्धताएं क्या हैं जैसा कि उसकी उद्देशिका में निबद्ध हैं?

उत्तर :
यद्यपि भारतीय संविधान में प्रस्तावना को कोई विधिक महत्व नहीं दिया गया है, फिर भी यह काफी महत्वपूर्ण है, क्यांेकि यह संविधान के स्रोत , उद्देश्य एवं प्रवर्तन विधि को जानने में सहायता पहुंचाती है। वास्तव में भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान के मूल उद्देश्योें को दर्शाती है। इसमें एक प्रमुख बचनबद्धता यह है कि भारत जैसे गणतंत्रा राज्य में सत्ता लोगों के हाथ में निहित है। इसके बाद लोगों को सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक न्याय देने की बात कही गई है। सबको बराबरी का दर्जा और अवसर प्राप्त है। प्रस्तावना बंधुत्त्व और आपसी भाईचारा बढ़ाने तथा देश की एकता और अखंडता बढ़ाने की बात करती है। 42वें संविधान संशोधन, के बाद प्रस्तावना में अखण्डता, समाजवाद और भारत के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने की बात जोड़ दी गई। कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के वचन पर भी जोर दिया गया हैै।

प्रश्न 5 : भारत के संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग की जो अवधारण है, उसे समझाइए और उनके संरक्षण के लिए उसमें जिन रक्षोपाय का प्रावधान किया गया है, उनका उल्लेख कीजिए।

उत्तर :
संविधान में अल्पसंख्यक उन्हें कहा गया है, जो जहाँ के बहुसंख्यक निवासियों के बाद धार्मिक आधार पर गिने जाते हैं, जैस- मुस्लिम, सिक्ख, जैन और बौद्ध। अल्पसंख्यक की बात संविधान में एक विचार के रूप में निहित है ताकि बंधुत्व और अखंडता का उद्देश्य प्राप्त किया जा सके। संविधान में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। उनके हितों की रक्षा की बात भी कही गई है। उनके हितों की रक्षा के लिए कुछ संवैधानिक रक्षा कवच इस प्रकार हैंः
(क) भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ सभी अल्पसंख्यकों को भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने का अधिकार है।
(ख) भाषाई अल्पसंख्यकों को प्राथमिक शिक्षा उन्हीं की मातृभाषा में देने का काम राज्य करेगा। इसके लिए एक अधिकारी की नियुक्ति होती है। 
(ग) शिक्षा संस्थाओं में धर्म जाति, भाषा और वर्ण के आधार पर प्रवेश/नामंकन नहीं रोका जा सकता।
(ङ) सार्वजनिक रोजगार के अवसर पर कोई भेदभाव उनके साथ नहीं बरता जाएगा।

 

प्रश्न 6 : भारत के संविधान में राज्यों की भूमिका तथा उनके कृत्यों का जो प्रतिपादन हुआ है, उसके आधार पर उनका परीक्षण कीजिए।

उत्तर :
राज्य की शासन प्रणाली का संविधानिक प्रधान राज्यपाल होता है। वह राष्ट्रपति के प्रसादर्यन्त अपने पद पर रहता है। राज्य सरकार की समस्त कार्यपालिक शक्तियाँ औपचारिक रूप से राज्यपाल में निहित होती हैं। परन्तु वह इनका प्रयोग राज्य की मंत्रिपरिषद् के परामर्श पर ही करता है। व्यवहार में राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है। उसे यह भी अधिकार है कि यदि उसे विश्वास हो जाए कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार संचालित नहीं हो पा रही है, तो वह राष्ट्रपति को इस बारे में रिपोर्ट भेज सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उस राज्य में संविधानिक आपात्काल की घोषणा कर देता है और अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है। राज्यपाल के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैंः
1. वह बहुमत दल के नेता मुख्यमंत्राी नियुक्त करता है तथा उसके परामर्श पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है। राज्य के समस्त उच्च पदाधिकारियों जैसे; राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य, महाधिवक्ता आदि को राज्यपाल ही नियुक्त करता है। राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श लेता है। साथ ही, अधीनस्त न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी राज्यपाल करता है।
2. कोई भी विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के अभाव में कानून नहीं बन सकता है। वह किसी भी विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानमंडल के पास वापस भेज सकता है।
3. वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भी भेज सकता है।
4. वह विधानमंडल का अधिवेशन बुलाता है तथा सत्रावसान करता है।
5. राज्य विधान परिषद् के लगभग 1ध्6 सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल करता है।
6. राज्य विधानमंडल का अधिवेशन न चल रहे होने की स्थिति में वह अध्यादेश जारी कर सकता है।
7. वह किसी अपराधी को क्षमादान कर सकता है, दंड कम कर सकता है या स्थगित कर सकता है।
8. विधानसभा में किसी भी दल को अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में वह स्वविवेक से किसी भी दल के नेता को मुख्यमंत्राी नियुक्त कर सकता है।

प्रश्न 7 : भारत के निर्वाचन आयोग के संविधानिक दायित्यों को समझाइए।

उत्तर
: संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करने, चुनाव न्यायाधिकरणों की स्थापना करने एवं चुनाव संबंधी अन्य मामलों की देखभाल के लिए एक स्वतंत्रा निकाय के रूप में एक सदस्यीय या बहुसदस्यीय चुनाव आयोग को अपनाया गया है। इसका अध्यक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता है। उसे उसके पद से उसी रीति ओर उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है। इसप्रकार चुनाव आयोग को भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सचेत अभिरक्षक कहा जा सकता है। चुनाव आयोग के प्रमूख कार्य निम्न प्रकार हैंः
1. चुनाव तालिकाओं को तैयार करना और प्रत्येक जनगणना के बाद व विधानसभा तथा संसदीय चुनाव के पूर्व उन्हें संशोधित करना।
2. पूरे देश के चुनावी तन्त्रा का पर्यवेक्षण करना।
3. चुनाव की तिथियों एवं कार्यक्रम की अधिसूचना जारी करना, जिससे नामांकन भरे जा सकें और उनकी जाँच चुनावों से पूर्व हो सके।
4. चूनाव व्यवस्थाओं से संबेधित विवादों को हल करना, किसी राजनीतिक दल को मान्यता देना एवं उसे चुनाव चिन्ह प्रदान करना तथा चुनाव में धांधली किए जाने या अन्य गड़बड़ियों की स्थिति में मतदान रद्द करना।
5. किसी विधायक या सांसद की अयोग्यता के संबंध में राज्यपाल या राष्ट्रपति को परामर्श देना।
6. विधानसभा या लोकसभा चुनावों के पूर्व राष्ट्रपति को क्षेत्राीय आयुक्तों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सुझा देना।

 

प्रश्न 8 : लोकसभा के अध्यक्ष की शक्तियों तथा कृत्यों का परीक्षण कीजिए।

उत्तर :
लोकसभा अपने सदस्यों में से बहुमत द्वारा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव करती (अनुच्छेद.93) है। इनका कार्यकाल लोकसभा के भंग होने पर समाप्त हो जाता है। अध्यक्ष अपनी सहायता के लिए कुछ सदस्यों का एक अध्यक्ष मंडल भी मनोनीत करता है तथा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में इस अध्यक्ष मंडल का कोई सदस्य या उपाध्यक्ष के आदेश से लोकसभा की कार्रवाई का संचालन करता है। लोकसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्य व शक्तियाँ निम्नप्रकार हैंः
1. सदन के सदस्यों के प्रश्नों को स्वीकार करना, उन्हें नियमित करना व निमय के विरुद्ध घोषित करना।
2. किसी विषय को लेकर प्रस्तुत किया जाने वाला ‘कार्य स्थगन प्रस्ताव’ अध्यक्ष की अनुमति से पेश किया जा सकता है।
3. वह विचाराधीन विधयेक पर बहस रुकवा सकता है।
4. संसद सदस्यों को भाषण देने की अनुमति देता है और भाषणों का क्रम व समय निर्धारित करता है।
5. सदन में शांति व अनुशासन बनाए रखता है।
6. विभिन्न विधेयक व प्रस्तावों पर मतदान कराना व परिणाम घोषित करना तथा मतों की समानता की स्थिति में निर्णायक मत देने का उसे अधिकार है।
7. संसद व राष्ट्रपति के मध्य होने वाला पत्र-व्यवहार अध्यक्ष के माध्यम से होता है।
8. कोई विधेयक, वित्त विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय भी अध्यक्ष करता है।

 

प्रश्न 9 : पूर्ति की लोच से आपका क्या अभिप्राय है? विभिन्न प्रकार के पूर्ति लोच का उल्लेख करें। 

उत्तर : माँग के नियम की तरह पूर्ति का नियम भी कीमत परिवर्तन के कारण वस्तु की पूर्ति में होने वाले परिवर्तन की दिशा को बताता है कि कीमत बढ़ने पर वस्तु की पूर्ति बढ़ेगी और कीमत कम होने पर वस्तु की पूर्ति भी कम होगी। माँग के नियम की तरह यह नियम भी परिवर्तन की मात्रा को नहीं मापता। 
पूर्ति की लोच यह जानकारी देती है कि कीमत में परिवर्तन होने पर पूर्ति कितनी बढ़ेगी या घटेगी।
इस प्रकार पूर्ति की लोच एक प्रवृत्ति  की द्योतक है जो यह बताती है कि कीमत में परिवर्तन के कारण पूर्ति में कितनी मात्रा में परिवर्तन होंगे। 
”पूर्ति की लोच उस दर के निरपेक्ष मूल्य को प्रकट करती है जिसे हम पूर्ति में हुए प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में हुए प्रतिशत परिवर्तन से विभाजित करके प्राप्त करते हैं।“ - आर.जी. लिप्सी
पूर्ति की लोच के प्रकार 
1. पूर्णतया लोचदार पूर्ति  - जब कीमत में कोई परिवर्तन न हो और वस्तु की पूर्ति बढ़कर अन्नत हो जाय या घटकर शून्य रह जाय तो उसे पूर्णतया लोचदार पूर्ति कहते हैं। ऐसी स्थिति में पूर्ति वक्र  ग्.अक्ष के समानान्तरी होता है। 
2. लोचदार पूर्ति - जब कीमत के अनुपात में वस्तु की पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन की मात्रा अधिक होती है तो लोचदार पूर्ति कहते हैं। ऐसी स्थिति में पूर्ति वक्र एक सरल या धीमें ढाल वाला वक्र होता है। 
3. इकाई के समान लोचदार पूर्ति - जब एक वस्तु की पूर्ति में होने वाले परिवर्तन ठीक कीमत में परिवर्तन के अनुपात में होते हैं तो इसे इकाई के समान लोचदार पूर्ति कहते हैं। ऐसी दशा में पूर्ति वक्र एक सामान्य ढाल वाला वक्र होता है। 
4. बेलोचदार पूर्ति - जब कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के तुलना में वस्तु की पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन को अनुपात कम होता है तो इसे बेलोचदार पूर्ति कहते हैं। ऐसी स्थिति में पूर्ति वक्र का ढाल बहुत तीव्र होता है। 
5. पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति -जब वस्तु की कीमत में कितनी भी मात्रा में परिवर्तन होने पर इसकी पूर्ति में कोई पूर्ति में कोई परिवर्तन नहीं होते तो इसे पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति कहते हैं। बेलोच पूर्ति वक्र  X.अक्ष के समानान्तर होता है या यह एक शीर्षाकार वाला वक्र होता है।

 

प्रश्न 10 : पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की व्याख्या करें।

उत्तर : 1. वस्तु की प्रकृति - वस्तुएँ शीघ्र नष्ट होने वाली तथा टिकाऊ हो सकती हैं। शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं की पूर्ति बेलोच होती है, क्योंकि कीमत में परिवर्तन के अनुसार इनकी पूर्ति को घटाया और बढ़ाया नहीं जा सकता। इसके विपरीत टिकाऊ वस्तुओं की पूर्ति लोचदार होती है। 
2. समय - समय जितना लम्बा होगा उतना ही वतस्तु की पूर्ति को घटाया या बढ़ाना सरल होगा। इसीलिए दीर्घकाल में पूर्ति अधिक लोचादर होती है। अल्पकाल में समय इतना कम होता है कि वस्तु की पूर्ति को बढ़ाना या घटाना संभव नहीं होता, इसीलिए अल्पकाल में पूर्ति बेलोचदार होती है। 
3. उत्पादन प्रणाली - उत्पादन प्रणाली जितनी सरल होती है उतना ही उनमें पूँजी का प्रयोग कम होता है। यदि एसी दशा में वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो उत्पादन को आसानी से बढ़ाकर पूर्ति में वृद्धि की जा सकती है। अतः उत्पादन की सरल प्रणाली में पूर्ति लोचदार होती है। इसके विपरीत, उत्पादन की जटिल प्रणाली में पूँजी की माँग बहुत अधिक होती है। वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर भी पूँजी की कमी के कारण पूर्ति को बढ़ाना संभव नहीं होता। ऐसी दशा में पूर्ति बेलोचदार होती है। 
4. भावी कीमतों का अनुमान - यदि विक्रेता वर्ग भविष्य में कीमत वृद्धि की आशा करता है, तो वर्तमान समय में वस्तु को कम मात्रा मे बेचेगा, जिसके फलस्वरूप पूर्ति बेलोच हो जाएगी। इसके विपरीत, यदि भविष्य में कीमत में गिरावट की आशंका है, तो विक्रेता वर्तमान समय में अपनी वस्तु को अधिक मात्रा में बेचेंगे जिसके कारण पूर्ति लोचदार हो जाएगी। 
5. आगतों की प्रकृति  - यदि उत्पादन में ऐसे आगतों का प्रयोग किया जा रहा है जो विशिष्टीकृत हैं अर्थात् एक ही वस्तु के उत्पादन के लिए इनका प्रयोग किया जा सकता है, तो उत्पादित वस्तु की पूर्ति लोचदार होगी। 
यदि उत्पादन की आगतें अविशिष्टीकृत हैं अथवा किसी भी वस्तु के उत्पादन के लिए इनका प्रयोग किया जा सकता है तो पूूर्ति लोचदार होगी। 
6. लागतों की प्रकृति  - यदि उत्पादन में लागत वृद्धिनियम लागू हो रहा है तो उत्पादित वस्तु की पूर्ति बेलोच होगी। लेकिन यदि उत्पादन की मात्रा बढ़ाने पर लागत "ह्नास नियम लागू हो रहा है तो पूर्ति लोचदार होगी। 

 

प्रश्न 11 : माँग एवं पूर्ति विश्लेषण  करें। कृषि पदार्थें के बाजार में कीमत एवं माँग तथा पूर्ति का संबंध इतने स्पष्ट रूप से क्यों दृष्टिगोचर नहीं होता जैसे कि औद्योगिक बाजार में  होता है?

उत्तर : सामान्यतः, माँग का नियम वस्तु की कीमत एवं वस्तु की माँग में विपरीत सम्बन्ध को स्थापित करता है। वस्तु की कीमत में वृद्धि के कारण वस्तु की माँग में संकुचन, एवं कीमत में कमी के कारण वस्तु की माँग में विस्तार की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसी प्रकार, पूर्ति के नियम का आधर वस्तु की कीमत एवं वस्तु की पूर्ति में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है अर्थात् वस्तु की कीमत में वृद्धि के कारण उत्पादक वस्तु की अधिक मात्रा बाजार में बेचने के लिए प्रेरित होते हैं, और कीमत में कमी के कारण वस्तु की पूर्ति में संकुचन आ जाता है। किन्तु, कीमत में परिवर्तन के कारण माँग एवं पूर्ति का यह प्रत्युत्तर केवल औद्योगिक पदार्थों के बाजार में ही सत्य प्रतीत होता है। इसके विपरीत, कृषि पदार्थों के बाजार में कीमत एवं माँग तथा पूर्ति का सम्बन्ध इतने स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होता।
कृषि पदार्थों की माँग एवं पूर्ति औद्योगिक बाजार की वस्तुओं की अपेक्षा कम लोचदार होती है, जिसके कारण वस्तु की माँग एवं पूर्ति पर कीमत का प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होता। कृषि पदार्थों की भिन्न प्रकृति का कारण कृषि की अनोखी विशेषताएँ  हैं जिनमें से निम्नलिखित उल्लेखनिय हैंः
1. उपभोग की प्रवृत्ति - आय में वृद्धि के साथ-साथ कृषि-पदार्थों पर किए जाने वाले व्यय में आनुपातिक रूप से कमी आ जाती है। इनकी अपेक्षा औद्योगिक वस्तुओं की माँग में सदा ही वृद्धि की प्रवत्ति पाई जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि पदार्थों, विशेष रूप से खाद्यान्न की माँग, व्यक्तिगत उपयोगों में सदा ही सीमित रहती है। इस तथ्य की पुष्टि ऐंजल द्वारा प्रतिपादित उपभोग के नियम  से भी होती है। इस नियम के अनुसार अतिरिक्त आय का अधिक भाग औद्योगिक वस्तुओं एवं अन्य सेवाओं की माँग में व्यय होता है। 
2. माँग का स्वभाव  - कृषि पदार्थों की माँग साधरणतया कम लोचदार होती है। कृषि पदार्थों की कीमत में परिवर्तन, वस्तु की माँग को अधिक प्रभावित नहीं कर सकते। अल्पकाल में कृषि पदार्थों की माँग लगभग स्थिर होती है। परिणमतः, अधिक उत्पादन की दशा में उत्पादक वस्तु की कीमत में  कमी कर उपभोक्ताओं को वस्तु की अधिक माँग खरीदने के लिए पे्ररित नहीं कर सकते। 
3. कृषि-क्षेत्रा में श्रम की गतिशीलता का अभाव - कृषि क्षेत्रा में लोगों में गतिशीलता का अभाव होता है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि में अतिरिक्त श्रम एवं प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या उग्र रूप में पाई जाती है। ऐसी स्थिति में, यदि कृषि-उत्पाद की कीमत में कमी होती है तो उत्पादक अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अधिक उत्पादन करने के लिए बाध्य होता है, जबकि इसके विपरीत, पूर्ति का नियम यह बतलाता है कि वस्तु की कीमत में कमी के कारण वस्तु की पूर्ति में कमी पायी जाएगी। 
4. प्राविधिक विकास  - जहाँ एक ओर कृषि क्षेत्रा में श्रम की पूर्ति में वृद्धि होती है, दूसरी ओर, औद्योगिक एवं प्राविधिक विकास के कारण कृषि क्षेत्रा में यन्त्रों का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्रा में श्रम की माँग में निरन्तर कमी होती जाती है। श्रम की माँग में अन्तर कृषि-श्रमिक को निम्न जीवन-स्तर अपनाने के लिए बाध्य कर देता है। अतः, प्राविधिक विकास के कारण जहां एक ओर औद्योगिक क्षेत्रा में श्रमिकों के जीवन-स्तर में सुधार आ जाता है, वहीं दूसरी ओर कृषि-श्रमिक की दशा शिथिल पड़ती जाती है। 
5. कृषि पदार्थों की पूर्ति का स्वभाव - कृषि पदार्थों की पूर्ति सामान्यतः लोचहीन होती है। कृषि उत्पादन में अन्य साधनों के अनुपात में भूमि की आवश्यकता अधिक होती है। भूमि की पूर्ति अधिकांशतः पूर्ण लोचहीन होती है तथा इसका किसी अन्य साधन से प्रतिस्थापन भी नहीं  किया जा सकता। अतः कृषि-उत्पादन की माँग में वृद्धि के प्रत्युत्तर में कृषि उत्पाद की पूर्ति को नहीं बढ़ाया जा सकता। 
6. कृषि में सीमान्त उत्पत्ति ह्नास नियम लागू होना  - भूमि की पूर्ति बेलोचदार होने और प्रतिस्थापन लोच भी बहुत कम होने के कारण कृषि में सामान्यतः उत्पत्ति ह्नास नियम शीघ्र लागू हो जाता हैै। कृषि में बड़े-पैमाने की मितव्ययिताएँ होने का क्षेत्रा अत्यन्त सीमित होता है। अतः कृषि उत्पादन की पूर्ति में वृद्धि भी सरलता से उपलब्ध नहीं होती। 
7. पूर्ण प्रतियोगी बाजार - कृषि-पादर्थ सामान्यतः पूर्ण प्रतियोगी बाजार में ही बिकते हैं। प्रत्येक व्यक्तिगत उत्पादक कुल कृषि उत्पादन के तुच्छ अंश का ही स्वामी होता है। अतः कोई भी व्यक्तिगत उत्पादक स्वतन्त्रा रूप से वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। प्रत्येक कृषि-उत्पादक ‘कीमत अपनाने वाली फर्म’  का स्वरूप होता  है। यदि वस्तु की कीमत में कमी हो जाती है तो कृषि-उत्पादक को भारी हानि उठानी पड़ती है। क्योंकि वह न तो (क) कीमत को स्वतन्त्रा रूप से प्रभावित कर सकता है और न (ख) वस्तु की पूर्ति में कमी कर सकता है। 
8. अस्थिर व्यवसाय - कृषि एक अस्थिर व्यवसाय है, जिसमें उतार-चढाव होते रहते हैं। तेजी के समय कृषि-उत्पादक की आय उद्योगों की आय के अनुपात में ही प्रायः बढ़ती है, किन्तु मन्दी के दौरान कृषि-उत्पादक की आय अपेक्षाकृत बहुत कम हो जाती है, क्योंकि कृषि उत्पादन की पूर्ति सदा ही लगभग स्थिर रहती है। 
”कृषि व्यवसाय में आय गैर-कृषि व्यवसाय की आय की तुलना में तेजी और मन्दी के समय में अधिक मात्रा में परिवर्तित होती है। लेकिन कृषि व्यवसाय में उत्पादन औद्योगिक उत्पादक की तुलना में अधिक स्थिर होता है।“- सेम्युलसन
9. प्रकृति पर निर्भरता - अन्त में कृषि-उद्योग प्रकृत्ति पर पूर्ण रूप से निर्भर रहता है। पूर्ण प्रतियोगिता बाजार के इस अस्थिर आय वाले उद्योग पर प्रकृति भी सदा दयालु नहीं होती। इसलिए, सैम्युलसन इसे ”प्रकृति की अभागी सौतेली सन्तान“ कहता है। किन्तु इन विशेषताओं के कारण कृषि को ‘सरकार का अधिक प्यार और ध्यान’  प्राप्त होता है। 

 

प्रश्न 12 : कृषि उत्पादन साधरणतया पूर्ण प्रतियोगिता की दशाओं में ही बिकता है। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णण करें। 

उत्तर : (i) कृषि पदार्थ मूलतः एक रूप  और सामान्य किस्म के होते हैं। रामसिंह के खेत अथवा शामसिंह के खेत से प्राप्त की गई धन की किस्म मूलतः एक जैसी ही होती है। 
(ii) सामान्यतः समग्र कृषि उत्पादन  असंख्य छोटी-छोटी इकाइयों के उत्पादन के जोड़ का परिणाम होता है। कोई एक उत्पादक कृषि उत्पादन की समग्र पूर्ति को प्रभावित नहीं कर सकता। अतः यदि कम कीमत के कारण, भगवानसिंह कम उत्पादन करने का निर्णय भी कर लेता है, तो उसके इस निर्णय का समग्र कृषि उत्पादन की पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। 
(iii) प्रत्येक कृषि-उत्पादक ‘कीमत अपनाने वाली फर्म’ के रूप में ही कार्य करता है। कोई भी एक उत्पादक कृषि उत्पादन की कीमत को निर्धारित नहीं कर सकता। पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में कोई भी उत्पादक यदि अधिक कीमत लेेने का प्रयास करता है तो प्रतियोगी शक्तियाँ उपभोक्ता केा इस उत्पादक से छीन लेती है। दूसरे शब्दों में कोई भी व्यक्तिगत उत्पादक समग्र माँग एवं पूर्ति के आधर पर निर्धारित कीमत को अपनाता है। उस कीमत पर वह चाहे जितनी अधिक या कम मात्रा विक्रय कर सकता है। 
पूर्ण प्रतियोगिता के कारण कृषि-उत्पादक सदा ही बाजार की दशाओं पर निर्भर रहता है। यदि बाजार में कुल माँग एवं कुल पूर्ति के आधर पर धन की कीमत में कमी हो जाती है तो धन का उत्पादक अपने आय-स्तर को बनाये रखने हेतु धन का अधिक उत्पादन करेगा। अर्थात् उत्पादक को कम कीमत पर अधिक उत्पादन करना पड़ेगा। 

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