सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

The document सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev is a part of the Class 10 Course Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi.
All you need of Class 10 at this link: Class 10

प्रश्न 1 : भारत की संसदीय पद्धति की परिसंघीय व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में द्वितीय सदन के रूप में राज्य सभा की प्रासंगिकता समझाइए।

उत्तर : वित्त विधेयक को छोड़कर अन्य समस्त विधेयकों के संबंध में लोकसभा व राज्य सभा को समान शक्तियाँ प्राप्त हैं। किसी विधेयक पर मतभेद की स्थिति में राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाता है तथा उसमें जो पारित होता है, वही सदन द्वारा पारित माना जाता है। इस स्थिति में राज्यसभा की शक्ति कम हो जाती है क्योंकि राज्यसभा सदस्यों की संख्या लोकसभा से कम होती है। राज्यसभा की यह स्थिति उसे एक कमजोर, निरर्थक व अनुपयोगी सदन भी ठहराती है। राज्यसभा में सरकारी प्रस्ताव अस्वीकृत होने पर भी मंत्रिमंडल को त्यागपत्रा नहीं देना पड़ता है। वित्त विधेयक को राज्यसभा मात्रा 14 दिन तथा साधरण विधेयक को 6 माह तक रोक सकती है। कुल मिलाकर राज्यसभा की शक्तियाँ लोकसभा से कम होती हैं।
इसके बावजूद भारत की संसदीय पद्धति की परिसंघीय व्यवस्था के दृष्टिगत राज्यसभा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जिसे निम्नप्रकार समझा जा सकता हैः
(1) अमरीकी सीनेट की भाँति ही राज्यसभा में संघ की इकाइयों का प्रतिनिधितव होता है, जो कि परिसंघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है।
(2) देश के विशिष्ट क्षेत्रा से सम्बद्ध विशेषज्ञ व विद्वानों का प्रतिनिधित्व होता है। अतः यह अधिक गरिमामय होती है।
(3) लोकसभा में शीर्घता से पारित पर गहन विचार.विमर्श हेतु राज्यसभा एक श्रेष्ठ मंच है।
(4) राज्यसभा समवर्ती सूची के विषय को राष्ट्रीय हित का घोषित कर दे तो संसद को उस विषय पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
(5) राज्यसभा किसी अखिल भारतीय सेवा के सृजन का निर्णय भी ले सकती है।
भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व संघात्मक व्यवस्था वाले देश में संसद का द्विसदनात्मक होना लोकतंत्रा को निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करता है।

 

प्रश्न 2 :भारत के संदर्भ में कार्यपालिका तथा विधायिका के बीच के सम्बन्ध का विवेचन कीजिए।

उत्तर :
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्थानुसार, विधायिका (संसद) तथा कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) में गहन सम्बन्ध है। विधायिका का कार्य संघीय सूची के विषयों पर कानून निर्माण करना तथा कार्यपालिका का कार्य कानूनों का क्रियान्वयन करना है। भारत में कार्यपालिका के सदस्य संसद के भी सदस्य होते हैं तथा वे लोकसभा के प्रति उत्तरदायी अनुच्छेद 75(3) होते हैं। प्रधानमंत्राी व मंत्रिपरिषद ही संसद को नेतृत्व प्रदान करते हैं तथा मंत्रिमंडल उसी समय तक अपने पद पर बना रहा है, जब तक उसे लोकसभा में बहुमत प्राप्त है। भारतीय संसद का एक प्रमुख कार्य कार्यपालिका पर नियंत्राण रखना भी है। इसके लिए कुछ प्रमुख व्यवस्थायें निम्नप्रकार हैंः
1. प्रश्नोत्तर द्वारा सरकारी विभागों की त्रुाटियों की निंदा व आलोचना से सरकार के गलत रास्ते पर जाने पर रोक।
2. किसी गम्भीर घटना की स्थिति में ‘काम रोको प्रस्ताव’ द्वारा उस पर विचार के लिए सरकार को बाध्य करना।
3. किसी विधेयक या नीति पर संसद की अस्वीकृति या बजट प्रस्तावों पर कटौती, मंत्रिमंडल के त्यागपत्रा की मजबूरी बन जाती है।
4. लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव।
5. संसद की अनुमति के बिना कोई करारोपण नहीं हो सकता है।
6. कार्यपालिका संसद का अनुमति के बिना लोकराजस्व का व्यय नहीं कर सकती है।
सिद्धांत रूप में देखा जाए तो विधायिका का कार्यपालिका पर पूर्ण नियंत्राण रहता है, लेकिन व्यवहारिकता इससे काफी हटकर है। प्रधानमंत्री, जो कि बहुमत दल का नेता होता है, की नीतियों का दल के सभी सदस्य प्रायः दलीय अनुशासन के कारण समर्थन करते हैं। दल की नीतियों का विरोध करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का उन्हें भय रहता है। अतः विधायिका अप्रत्यक्ष रूप से कार्यपालिका से नियंत्रित रहती है। प्रायः मंत्रिमंडल ही काननों का निर्माण करके सांसदों की सहमति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार बहुत दल की सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट को दल के सांसद बिना कटौती के स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि कटौती की स्थिति में सरकार गिर सकती है। साथ ही प्रधानमंत्राी के पास लोकसभा भंग करने की शक्ति भी होती है, जो कि विधायिका की अपेक्षा कार्यपालिका की अधिक शक्ति को स्पष्ट करता है। कहा जा सकता है कि कार्यपालिका पर विधायिका का प्रभावी नियंत्राण होते हुए भी कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका पर श्रेष्ठता व नियंत्राण बनाए रखती है।

 

प्रश्न 3 :भारतीय संसद में समिति-पद्धति के संगठन तथा कृत्यों का विवरण दीजिए।

उत्तर : संसद के पास हर मामले के लिए समय, दक्षता व परीक्षण करने का अभाव होता है। अतः संसद अपने कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न समितियों का सहयोग लेती है। इसके लिए संसद सदस्य संसद में प्रस्ताव पेश करते हैं या सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा नाम निर्दिष्ट की जाती हैं। भारत में दो प्रकार की संसदीय समितियाँ होती हैंः
I. स्थायी समितिः प्रत्येक वर्ष या समय-समय पर कारण अनुसार, सदन द्वारा चुनी जाती हैं अथवा लोकसभा/राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा नामांकन किया जाता है।
II. तदर्थ समितिः किसी विशेष मामले पर विचार करने व रिपोर्ट देने के लिए सदन अथवा लोकसभा/राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा संस्थापित रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद ये समाप्त हो जाती हैं। प्रवर या संयुक्त प्रवर समिति प्रमुख तदर्थ समिति है, जो कि किसी विधेयक पर विचार करने और रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त की जाती है।
स्थाई समितियाँ प्रकृति की दृष्टि से निम्न प्रकार की होती हैंः
1. लोक लेखा समिति: लोकसभा से 15 व राज्यसभा से 7 सदस्य। सरकार के विनियोग लेखा व उस पर नियंत्राक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट की जाँच।
2. प्राक्कलन समिति: यह समिति लोकसभा की समिति है, जिसका प्रतिवर्ष गठन होता है और सदस्य संख्या 30 है। बजट का विश्लेषण व धन प्राक्कलनों की जाँच।
3. सरकारी उपक्रम समिति: लोकसभा से 15 व राज्यसभा से 7 सदस्य। सार्वजनिक क्षेत्रा के कारखानों की रिपोर्टों तथा लेखों की देखभाल व कार्यकुशलता संबंधी सुझाव देना। कार्यकाल 1 वर्ष।
4. विशेषाधिकार समितिः 15 सदस्य। स्पीकर द्वारा नियुक्ति। सांसदों के विशेषाधिकारों के भंग होने की जाँच व उस पर अपनी व्याख्या सदन के समक्ष प्रस्तुत करना।
5. याचिका समिति: विधेयकों व जनहित मामलों से सम्बद्ध याचिकाओं या निवेदनों की जाँच।
6. कानून समितिः 20 से 30 तक सदस्य। सरकार प्रत्यायोजन की सीमा में रहकर संविधान प्रदत्त/संसद प्रत्योयोजित नियम, विनियम आदि की शक्तियों का उपयोग कर रही है या नहीं, की जाँच।
7. अनुमान समिति: विभागों द्वारा रखी गई मांगों में मितव्ययता, सुधार व दक्षता की ओर ध्यान दिलाना।
8. सार्वजनिक आश्वासन समिति: मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों को पूरा करना।

 

प्रश्न 4 : महिला राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना, 1988 की प्रमुख अनुशंसाएं क्या हैं? सांविधानिक संशोधन विधेयक (64 वां संशोधन) में परिकल्पित प्रासंगिक अनुशंसाएं क्या हैं?

उत्तर : महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दशाओं में सुधार एवं उनको संरक्षण प्रदान करने हेतु सरकार ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में नारी उत्थान की योजना निर्मित की। जिसे महिला राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान) के नाम से जाना जाता है। इसके तहत बाल विकास एवं महिला विकास विभा के केन्द्रीय दल ने एक करूपरेखा प्रस्तुत की, जिसे ‘अन्रर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर, 8 मार्च, 1988 को जारी किया गया। रिपोर्ट में महिलाओं के सम्पत्ति संबंधी अधिकार को संस्तुति प्रदान की गयी। इसके अतिरिक्त विधानसभा व संसदीय चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण को भी स्वीकार किया गया। इसके लिए एकीकृत नागरकि कोड ;न्दपवितउ ब्पअपस ब्वकमद्ध की आवश्यकता पर बल दिया गया। कार्यकारी महिलाओं, बालिकाओं व किशोर बालिकाओं के लिए आवश्यक सुविधाएं तथा महिलाओं के अधिकारों को दिलाने हेतु एक कमिश्नर की नियुक्ति की गयी। एक राष्ट्रीय संसाधन केन्द्र की स्थापना, सूचनाओं के प्रसार हेतु हुई। राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य योजना का मानना है कि विभिन्न कारणों से महिलाएं प्रायः सभी क्षेत्रों में उपेक्षित रही है। महिलाओं को मतदान अधिकार व मतदान प्रक्रिया में भाग लेने के बहुत कम अवसर मिले हैं। अतः लोकतंत्रा को मजबूत करने के लिए महिलाओं की सभी क्षेत्रों में सहभागिता आवश्यक है। इसके लिए जाति, वर्ग, धर्म व पारिवारिक स्तर पर प्रतिबंध लगाने वाले पारम्परिक कारकों को तोड़ना हेागा। 64 वें पंचायत राज संस्था संबंधी संविधान संशोधन विधेयक में महिलाओं के लिए तीस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इसके लिए विधेयक में संविधान में एक नया भाग 9 अनुच्छेद 243 जोड़ा गया। इसमें पचायतों की परिभाषा, उनकी संरचना, स्थान आरक्षण, शक्तियां, कार्यकाल, व उत्तरदायित्व आदि का उल्लेख है। विधेयक द्वारा संविधान में 11 वीं अनुसूची जोड़ी गयी। इसमें पंचायतों के कार्यक्षेत्रा के अनतर्गत दिये गए 29 विषयों में शैक्षिक प्रशासन, स्वास्थ्य व संस्कृति के साथ ही महिला एवं बाल कल्याण पर काफी बल दिया गया।

 

प्रश्न 5 : भारतीय संविधान में राज्यपाल को प्राप्त वैवेकिक शक्तियों तथा विशेष दायित्वों का स्वरूप में और विस्तार समझाइए।

उत्तर : राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जो कि मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है। लेकिन राज्यपाल सदैव मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने को विवश नहीं है। वह अनेक अवसरों पर स्वविवेक से भी कार्य करता है। संवधिान में राज्यपाल से विवेकानुसार निम्नलिखित कृत्य करने की विशेष रूप से अपेक्षा हैः
(क) छठी अनुसूची का पैरा 9(2) जिसमें असम का राज्यपाल अपने विवेकानुसार वह रकम अवधारित करेगा, जो असम राज्य खनिजों की अनुकूलता से उद्भूत होने वाले स्वामित्व के रूप में जिला परिषद को देगा।
(ख) अनुच्छेद 239(2), जो कि राष्ट्रपति को प्राधिकार देता है कि वह किसी राज्य के राज्यपाल को किसी निकटवर्ती संघ राज्यक्षेत्रा के प्रशासन के रूप में नियुक्त कर सकेगा और वह राज्यपाल ऐसे प्रशासक के रूप में अपने कृत्यों का प्रयोग अपनी मंत्रिपरिषद से स्वतंत्रा रूप से करेगा।
इसके अलावा संविधान में राज्यपाल के कुछ विशेष उत्तरदायित्व हैं, जिनका व्यवहार में वह अर्थ है, जो ‘विवेकानुसार’ का है। यद्यपि इसमें राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् से परामर्श करना होता है, लेकिन अंतिम विनिश्चय राज्यपाल का ही होता है। ये कार्य हैंः
(i) अनुच्छेद 371(2) के अधीन राष्टपति यह निर्देश दे सकता है कि महाराष्ट्र या गुजरात के राज्यपाल का राज्य में कुछ क्षेत्रों में विकास हेतु विशेष कदम उठाने का उत्तरदायित्व होगा, जैसे-विदर्भ या सौराष्ट्र।
(ii) नागालैण्ड के राज्यपाल का अनुच्छेद 371 (क)(ख) के अधीन उस राज्य में विधि या व्यवस्था के बाबत इसी प्रकार का उत्तरदायित्व तब तक है जब तक कि उस राज्य में विद्रोही नागाओं के कारण आंतरिक अशांति बनी रहती है। 
(iii) मणिपुर के राज्यपाल का उस राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनने वाली राज्य विधानसभा की सूची का उचित कार्यकरण सुनिश्चित करना। [ अनुच्छेद 371 ग (1)]।
(iv) सिक्किम के राज्यपाल द्वारा शांति के लिए और सिक्किम की जनता के विभिन्न विभागों की सामाजिक और आर्थिक उन्नति सुनिश्चित करने के लिए कार्य करना [अनुच्छेद 371 (च) (छ)]।
इसके अलावा, राज्यपाल को परिस्थितियों के अनुसार कुछ ऐसे विवेकाधीन कार्य भी करने होते हैं, जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है। ये निम्न प्रकार हो सकते हैंः
(i) राज्यविधान सभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत के अभाव में राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करके सरकार का गठन कर सकता है।
(ii) यदि स्थाई सरकार बनना संभव नहीं हो रहा हो तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद् को अपदस्थ करके व राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकता है। राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार न चलने की स्थिति में भी वह राष्ट्रपति से ऐसी सिफारिश कर सकता है। राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार न चलने की स्थिति में भी वह राष्ट्रपति से ऐसी सिफारिश कर सकता है। अनुच्छेद, 356 के अधीन ऐसा प्रतिवेदन देना ऐसा कृत्य है, जो राज्यपाल अपने विवेक से करता है।
(iii) किसी स्वतंत्रा ट्रिब्युनल द्वारा मुख्यमंत्राी को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी करार दिये जाने पर राज्यपाल मुख्यमंत्राी को पदच्युत कर सकता है। 
(iv) असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल स्वविवेक से विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुला सकता है।
(v) राज्यपाल को मुख्यमंत्राी से किसी भी विषय पर सूचना मांगने का भी अधिकार है।
(vi) वह किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करने का निर्णय ले सकता है। (अनुच्छेद 200)। साथ ही, किसी भी पारित विधेयक को पुनिर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
(vii) एक मंत्रिमंडल के पद त्याग व दूसरे आनुकल्पिक मंत्रिमंडल का गठन न होने की स्थिति में राज्यपाल, राष्ट्रपति के अधीन रहते हुए स्वविवेक से कार्य करता है।
(viii) किसी संकटकालीन स्थिति की आशंका को देखते हुए वह राज्य में आपात्काल की घोषणा कर सकता है।
(ix) संघ सरकार द्वारा राज्यों को राष्ट्रीय महत्त्व व प्रशासन से संबंधित निर्देश राज्यपाल के माध्यम से ही प्रेषित किये जाते हैं। राज्यपाल राज्यों द्वारा निर्देशों के उल्लंघन की स्थिति में राज्य मंत्रिमंडल को चेतावनी दे सकता है तथा अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति को संवैधानिक संकट की रिपोर्ट भेज सकता है। 
(x) राज्यपाल विधानसभा चुनावों के बाद दलीय स्थिति स्पष्ट न होने की दशा में किसी भी दल के नेता को सरकार बनाने के लिए स्वविवेक से आमंत्रित कर सकता है तथा उसे एक निश्चित समय में बहुमत सिद्ध करने के लिए कह सकता है।

 

प्रश्न 6 : सरकार कृषि उत्पादन को किस तरह से सहायता कर सकती है। इसका उल्लेख करें।

उत्तर :  1. दान व सहायता अनुदान - इस विधि के अन्तर्गत सरकार निर्धन किसानों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहायता प्रदान करती है। अमरीका आदि विकसित देशों में हजारों डालरों की राशि जरूरतमन्द किसानों में बाँटी जाती है। 

2. माँग में प्रोत्साहन और शोध - सरकारी सहायता की दूसरी विधि कृषि पदार्थों की माँग में वृद्धि करना तथा कृषि उत्पादन की वृद्धि के लिए शोध पर खर्च करना है। विगत वर्षों में अमरीका में सार्वजनिक नियम 480  के अन्तर्गत कृषि पदार्थों की माँग में जो प्रर्याप्त वृद्धि की गई, है वह सम्भवतः सरकार द्वारा कृषि को दी जाने वाली सहायता का ज्वलन्त उदाहरण है। इसी प्रकार सरकार कृषि-शोध पर भी व्यय करके नई-नई प्रणालियों की खोज में सहायता देती है। 

3. फसल प्रतिबन्ध कार्यक्रम   - इस विधि के अन्तर्गत सरकार कृषि-उत्पादक की मात्रा पर भी प्रतिबन्ध लगा देती है। फसल प्रतिबन्ध का मुख्य उद्देश्य कृषि-उत्पाद की पूर्ति को सीमित करना है, जिससे उत्पादक फसल-नियन्त्राण अपनाकर वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। इसलिए फसल नियन्त्रण की सफलता सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के समस्त कृषि-उत्पादकों के संयुक्त प्रयास पर निर्भर करती है। सरकार इन असंख्य उत्पादकों में एकीकरण स्थापित करने का कार्य करती है। फसल-प्रतिबन्ध के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सरकार कृषि उत्पादकों को प्रलोभन देती है। 

4. उत्पादक-उपभोक्ता मूल्य अन्तर की सहायता - इस विधि के अन्तर्गत कृषि-उत्पादकों को कृ़ित्रम ऊँची कीमत (जिसे ‘सहायता कीमत’ भी कहते हैं) की गारन्टी दी जाती है, परन्तु उपभोक्ताओं को कृषि-पदार्थ बाजार द्वारा निर्धारित कीमत के आधर पर ही उपलब्ध होते हैं। बाजार द्वारा निर्धारित कीमत तथा सरकार द्वारा घोषित ‘सहायता मूल्य’ के अन्तर को सरकार अनुदान के रूप में कृषि उत्पादकों को देती है। इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह उपभोक्ताओं तथा उत्पादक दोनों के ही हितों की रक्षा करती है। 

5. ऋण सहायता या सरकार द्वारा उत्पादन की खरीद के तरीके से समता कीमत स्थापित करना - सरकार द्वारा कृषि को प्रदान की जाने वाली सहायता के उपरोक्त रूप मुख्यतः उन देशों में पाये जाते हैं जहाँ कृषि पदार्थों की पूर्ति सामान्यतः माँग से अधिक होती है। किन्तु अल्प-विकसित जनाधिक्य अर्थव्यवस्थाओं में कृषि उत्पादन की समानता कमी होती है। अल्प-विकसित अर्थव्यवस्था में सरकारी सहायता का स्वरूप कृषि को न्यूनतम सहायता कीमत  की गारन्टी देना होता है। सरकार कृषि उत्पादन की न्यूनतम कीमत की गारण्टी देती है। यदि किसी समय उत्पादन में असाधरण वृद्धि हो जाती है तो सरकार उपभोक्ता के रूप में वस्तु बाजार से कृषि-पदार्थों को खरीदती है, जिससे पदार्थ की कृत्रिम माँग बढ़ जाती है। माँग बढ़ जाने से, उत्पादन की मात्रा में वृद्धि के बावजूद भी, पदार्थ की कीमत नहीं गिरती है। इसके अतिरिक्त, कई बार सरकार प्रत्यक्ष रूप से भी, उत्पादक से निर्धारित न्यूनतम कीमत पर उत्पादन खरीदने को तैयार रहती है, भले ही, बाजार की शक्तियों के प्रभाव से संतुलन कीमत कम हो जाए। यदि सरकार द्वारा इस प्रकार की नीति न अपनाई जाए तो असामान्य उत्पाद की दशा में कीमतें नीचे गिर जाएँगी और उत्पादकों को असाधरण हानि उठानी पड़ेगी। 
 

प्रश्न 7 : ”प्रतिस्थापना के नियम को प्रयोग आर्थिक शोध के प्रायः प्रत्येक क्षेत्रा में फैला हुआ है।“ आर्थिक विश्लेषण में सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप को दर्शायें।

उत्तर : 1. उपभोग में - उपभोक्ता सीमित साधनों से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करने के अपने प्रयास में इसी सिद्धान्त को अपना मार्गदर्शक बनाता है। सिद्धान्त के अनुसार अधिकतम सन्तुष्टि उस समय प्राप्त होती है जबकि विभिन्न वस्तुओं से प्राप्त होने वाली सीमान्त उपयोगिता एवं मूल्य का अनुपात एक दूसरे के बराबर होता है। 

2. उत्पादन में - उपभोक्ता की माँति उत्पादक भी उत्पादनों के साधनों की सीमान्त उत्पदकता को बराबर करता है और उनके पुरस्कारों के अनुपात में कम उत्पादकता वाले उत्पादन के साधनों के स्थान पर अधिक उत्पादकता वाले उत्पादन के साधनों का प्रतिस्थापन करता है। ऐसा करने से उत्पादक को अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।

3. विनिमय में - विनिमय कम उपयोगी वस्तु के साथ अधिक उपयोगी वस्तु का हस्तान्तरण है।  विनिमय की आखिरी सीमा वहीं निश्चित होती है जहाँ दोनों वस्तुओं की सीमान्त उपयोगिता समान होती है। इस बिन्दु के पश्चात् विनिमय लाभदायक सिद्ध नहीं होता जोकि सिद्धान्त की मान्यता के अनुरूप ही है। 

4. वितरण में - राष्ट्रीय आय के वितरण की समस्या में इस सिद्धान्त का उपयोग वितरण का सिद्धान्त प्रतिपादित करने के लिए किया जाता है। प्रत्येक उत्पादन के साधन को उसकी सीमान्त उत्पादकता के अनुरूप पुरस्कार दिया जाता है। जब किसी उत्पादन के साधन की सीमान्त उत्पादकता एवं पुरस्कार का अनुपात अन्य साधन के अनुपात से अधिक है तो पहले साधन की मात्रा को बढ़ा दिया जाता है। अन्ततः सन्तुलन की अवस्था में प्रत्येक उत्पादन के साधन की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता के अनुसार निर्धारित होती है।

5. राजस्व में - राजस्व का सिद्धान्त अधिकतम सामाजिक लाभ का सिद्धान्त  होता है। अधिकतम सामाजिक लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है, जबकि राज्य प्रतिस्थापन सिद्धान्त के आधर पर सामाजिक कार्यों की योजना तैयार करे और कम सीमान्त सामाजिक लाभ वाले कार्यों के स्थान पर सीमान्त सामाजिक लाभ वाले कार्यों की प्रतिस्थापना करते हुए सीमान्त बिन्दु पर सभी सामाजिक कार्यों के सीमान्त लाभों के बराबर करने की चेष्टा करे।

- जलवायु: हिन्द महासागर भारत को मानसूनी जलवायु प्रदान करता है जो भारतीय जन-जीवन और अर्थव्यवस्था को संचालित करता है।

- ऊर्जा: ज्वारीय ऊर्जा, तरंग ऊर्जा, समुद्री तापमान में अंतर से उत्पन्न ऊर्जा के रूप में भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में पर्याप्त विभव मौजूद है।

- भू-राजनीतिक: हिन्द महासागर में सर्वाधिक केन्द्रीय स्थिति के कारण भारत का भू-राजनीतिक महत्व बढ़ गया है। वर्तमान में भारत, आस्ट्रेलिया और द. अफ्रीका हिन्द महासागर के तटवर्ती देशों का संघ बनाने के लिए प्रयासरत है।

 

प्रश्न 8. मार्शल की गणनात्मक उपयोगिता की विचारधरा की आलोचना करें

उत्तरः- 1. उपयोगिता को गणनात्मक संख्या के रूप में नहीं मापा जा सकता - मार्शल की यह मान्यता है कि एक वस्तु की उपयोगिता एक उपभोक्ता द्वारा वस्तु के लिये दी जाने वाली कीमत के समान होती है। लेकिन कीमत का निर्धारण बाह्य शक्तियाँ करती हैं। एक वस्तु के एक इकाई उपभोग से उपभोक्ता को कितनी संतुष्टि या उपयोगिता मिलेगी यह एक अनुदर्शी  विचार है, जबकि मार्शल की विचारधारा में इसे संभव है कि इससे प्राप्त सीमान्त उपयोगिता दी जाने वाली कीमत के समान हो, लेकिन वस्तु की बड़ी मात्रा का उपभोग करते समय मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता का स्थिर रहना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार, मार्शल यह विचार करने में भी असफल रहे कि एक ही व्यक्ति के लिए भिन्न समय और स्थानों पर उपयोगिता भिन्न हो सकती है। 
2.  उपयोगिता को जोड़ा नहीं जा सकता - मार्शल के विश्लेषण में एक उपभोक्ता को प्राप्त होने वाली कुल उपयोगिता या संतुष्टि विभिन्न वस्तुओं के उपयोग से प्राप्त होने वाली उपयोगिताओं का कुल जोड़ है। लेकिन एजवर्थ, फिशर आदि का यह कथन है कि प्रत्येक वस्तु से प्राप्त अलग-अलग उपयोगिताओं का कुल जोड़ उपयोगिता के समान नहीं हो सकता। 
3.  उपयोगिता परस्पर निर्भर हैं  - मार्शल की यह मान्यता है कि उपभोक्ता द्वारा उपभोग की गई प्रत्येक वस्तु अपने आप में स्वतंत्रा है, इसलिए एक वस्तु की सीमान्त उपयोगिता का दूसरी वस्तु की सीमान्त उपयोगिता के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। लेकिन, व्यावहारिक जीवन में अधिकांश वस्तुएँ या तो प्रतियोगी होती हैं या पुरक। दूसरे शब्दों में, एक वस्तु के उपभोग से प्राप्त सीमांत उपयोगिता केवल उसी के उपभोग पर निर्भर नहीं करती बल्कि इसकी प्रतियोगी और पूरक वस्तुओं के उपभोग में परिवर्तन से भी प्रभावित होती है। 
4.  अवास्तविक मान्यताएँ - मार्शल की विचारधारा उनेक मान्यताओं पर आधारित है जो कि अवास्तविक हैं। उदाहरण के लिये, मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता का उपभोग काल में स्थिर रहना, प्रतियोगी वस्तुओं की अनुपलब्धता, उपभोक्ता की रुचि, फैशन और पसन्द में कोई परिवर्तन न होना, उपभोक्ता का विवेकशील व्यवहार आदि ऐसी मान्यताएँ हैं जो कि व्यवहार में लागू नहीं होतीं। 
संक्षेप में, जिन मान्यताओं पर मार्शल का उपयोगिता सिद्धान्त आधारित है वे अवास्तविक एवं भ्रामक हैं। जे. आर. हिक्स तथा आर.जी.डी. एलन ने तो मार्शल के सिद्धान्त की इस आधारभूत मान्यता को ही अस्वीकार कर दिया है कि उपभोक्ता का गणनात्मक मापन हो सकता है। 


प्रश्न 9. अनधिमान वक्र विश्लेषण एवं उपयोगिता विश्लेषण में अन्तर को समझाऐं। 

उत्तरः प्रो॰ हिक्स इस बात से सहमत नहीं हैं कि अनधिमान-वक्र विश्लेषण में कोई नवीनता नहीं है, और उपयोगिता-विश्लेषण का अनुवाद मात्रा है। उनका दृढ़ मत है कि अनधिमान वक्र विश्लेषण, आर्थिक सिद्धान्तों में एक वास्तविक परिवर्तन है। 
अनधिमान-वक्रों की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए निम्न तर्क दिये जा सकते हैंµ
(1)    उपयोगिता विश्लेषण में केवल एक वस्तु तथा उसकी कीमत का अध्ययन किया  जा सकता है। लेकिन, अधिमान-वक्र विश्लेषण में एक साथ दो वस्तुओं को लेकर उपभोक्ता व्यवहार का विवेचन किया जाता है। 
(2)    उपयोगिता विश्लेषण केवल ‘कीमत प्रभाव’ का ही अध्ययन करता है। अनधिमान-वक्र विश्लेषण में कीमत के साथ ‘आय के प्रभाव’ तथा ‘स्थानापत्ति प्रभाव’ का भी विवेचन किया जाता है। 
(3)    उपयोगिता की धरणा एक विषयगत धारणा है, जो इस मान्यता पर आधारित है कि उपयोगिता को मापा जा सकता है, जोड़ा जा सकता है, अथवा घटाया जा सकता है। उपयोगिता की माप के लिए काल्पनिक इकाइयों का प्रयोग किया जा सकता है। 
अनधिमान वक्र विश्लेषण में उपयोगिता को मापने की आवश्यकता नहीं रह जाती। सन्तुष्टि के विभिन्न स्तरों के बीच तुलना करके सन्तुष्टि के स्तर को अधिकतम बनाया जा सकता है। 
(4)    उपयोगिता विश्लेषण में प्रयुक्त ‘अन्य बातें समान रहें’ का वाक्यांश कई परिवर्तन घटकों को स्थिर मान लेता है, जबकि इन घटकों का प्रभाव आवश्यक रूप से उपभोक्ता-व्यवहार पर पड़ता है। अतः उपयोगिता विश्लेषण, स्थिरता की अवस्था में उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन करता है।
अनधिमान वक्र विश्लेषण में काल्पनिक मान्यताओं के लिए स्थान नहीं है और यह विश्लेषण गतिशील अर्थव्यवस्था से सम्बन्ध्ति है। 

प्रश्न 10. अनधिमान-वक्र विश्लेषण के विभिन्न दोषों पर प्रकाश डालें।

उत्तरः- (1) अनधिमान वक्रों की धारणा उपभोक्ता के विवेकशील व्यवहार को काल्पनिक विचार पर आधरित है। एक साधारण उपभोक्ता से यह अपेक्षा करना कि वह सभी वस्तुओं के विभिन्न संयोजनों के बारे में पूर्व जानकारी रखता है, गलत होगा। प्रो॰ आर्मस्ट्रोंग का कथन है, कि उपभोक्ता विभिन्न संयोजनों के बीच इसलिए उदासीन नहीं होता, क्योंकि इनसे समान सन्तुष्टि मिलती है, बल्कि इसलिए कि उपभोक्ता का ज्ञान भी संयोजन का चुनाव करने के लिए तत्पर हो जाता है। 
(2)    अनधिमान वक्र विश्लेषण में अधिक तथा कम सन्तुष्टि के स्तर को प्रदर्शित करने वाले अनधिमान वक्रों को समझने के लिए काल्पनिक संख्याओं, प्रथम, द्वितीय..., आदि का प्रयोग किया जाता है। ये संख्याएँ भी उतनी ही काल्पनिक हैं, जितनी उपयोगिता विश्लेषण में उपयोगिता की माप के लिए प्रयुक्त इकाइयाँ काल्पनिक। 
(3)    अनधिमान वक्र विश्लेषण की आलोचना प्रो॰ मिल्टन फ्रीडमैन, एल.जे.सेवेज तथा डब्ल्यू. आई. आर्मस्ट्रोंग ने इस आधर पर की है, कि उपभोक्ता-व्यवहार में जहाँ ‘जोखिम’ तथा ‘अनिश्चितता’ का प्रभाव होता है, अनधिमान वक्र उन पर विचार नहीं करता। अर्थशास्त्राी वानॅ न्यूमैन तथा मोरगेंसटर्न का विचार है, कि जैसे ही हम उपभोक्ता-व्यवहार के संदर्भ में ‘प्रत्याशा की अनिश्चितता’ का समावेश करते हैं, हिक्स-ऐलन की क्रियात्मक उपयोगिता की पद्धति पूर्णतः असफल हो जाती है। 
(4)    अनधिमान वक्र विश्लेषण में केवल दो वस्तुओं को लेकर ही उपभोक्ता-व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है। यदि दो से अधिक वस्तुएँ होगीं तो त्रिविमा  अथवा बहुविमा चित्रा बनाने होगें, तथा अनधिमान-वक्र विश्लेषण सामान्य व्यक्तियों की समझ से दूर हो जाएगा, उच्चतर गणितीय-विधियों का प्रयोग करना पड़ेगा, जो कि सामान्य व्यक्ति की सामथ्र्य के बाहर की बात होगी। 
(5)    अनधिमान-वक्र विश्लेषण दुर्बल क्रम पर आधरित है, जिनमें उपभोक्ता की संयोजनों के बीच तटस्थता की स्थिति को प्रकट किया जाता है। पाल सेम्यूलसन द्वारा प्रतिपादित ‘उद्घाटित अनधिमान विश्लेषण’  में उपभोक्ता किसी भी स्थिति में तटस्थ नहीं होता, उसे विभिन्न संयोजनों के प्रति अपने अनधिमान को प्रगट करना ही पड़ता है। 
(6)    अनधिमान वक्र विश्लेषण को प्रोफेसर शुम्पीटर ने मिडवे हाऊस  की संज्ञा दी है। अनधिमान वक्रों को उन्होंने केवल मस्तिष्क की उपज बताया है, जिनकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है। जिस प्रकार का महत्त्व हमारे लिए पूर्णतया काल्पनिक उपयोगिता-फलन का है, उतने ही काल्पनिक अनधिमान वक्र हैं। 
(7)    डा. नोरिस ने अनधिमान-वक्र विश्लेषण की आलोचना करते हुए कहा है कि यह विश्लेषण अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में उपभोक्ता-व्यवहार का अध्ययन नहीं करता। 

प्रश्न 11. उत्पत्ति वृद्धि नियम की व्याख्या करें एवं ये नियम लागु होने के कारणों की चर्चा करें।
उत्तरः
- यह नियम बताता है कि उत्पत्ति के साधनों में वृद्धि करने पर कुल उत्पादन में अनुपात से अधिक वृद्धि होती है। दूसरे शब्दों में, जब उत्पादन के एक साधन को स्थिर रखकर अन्य साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो सीमान्त उत्पादन तथा औसत उत्पादन दोनों में ही वृद्धि होती है। 
”श्रम तथा पूंजी मेें वृद्धि सामान्यतः संगठन को और अधिक श्रेष्ठ बनाती है जिसके कारण श्रम एवं पूंजी की कार्य-क्षमता मेें वृद्धि हो जाती है।“ - मार्शल 
मार्शल तथा अन्य प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रिायों का यह विचार है कि उत्पत्ति वृद्धि नियम केवल विनिर्माण उद्योगों में ही क्रियाशील होता है। लेकिन आध्ुानिक अर्थशास्त्रिायों ने इस नियम को अधिक व्यापक माना है। उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्रा में यह नियम उत्पादन की आरम्भिक अवस्थाओं में क्रियाशील होता है। 
”जब किसी प्रयोग में उत्पत्ति के साधन की अधिक मात्रा प्रयुक्त की जाती है तो प्रायः संगठन में सुधर हो जाता है, जिससे उत्पत्ति के साधनों की प्राकृतिक इकाइयाँ (मनुष्य, भूमि, अथवा द्राव्यिक पूंजी) अधिक कुशल हो जाती है।“ - श्रीमती जाॅन रोबिन्सन
उत्पत्ति वृद्धिनियम यह बताता है कि उत्पत्ति के साघनों की मात्रा में वृद्धि करने पर संगठन में सुघार हो जाता है तथा साधनों की कार्य-क्षमता बढ़ जाती है। बाह्य और आंतरिक बचतें प्राप्त होने लगती हैं, जिससे फलस्वरूप सीमान्त एवं औसत उत्पादन बढ़ता है।
जैसे-तैसे परिवर्तनशील साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है, उसके साथ ही कुल उत्पादन अनुपात से अधिक मात्रा में बढ़ता है। इसके साथ ही औसत और सीमान्त उत्पादन में भी वृद्धि होती है। 
नियम लागू होने के कारण 
(1)  साधनों की अविभाज्यता - श्रीमति रोबिन्सन का विचार है कि उत्पत्ति वृद्धिनियम साधनों की अविभाज्यता के कारण लागू होता है। अविभाज्यता से आशय यह है कि साधनों को छोटे-छोटे भागों में नहीं बाँटा जा सकता।  मशीन, यंत्रा, उद्यम आदि ऐसे साधन हैं जो कि अविभाज्य साधन का प्रयोग ज्यादा अच्छी तरह होने लगता है और कुल उत्पादन अनुपात से अधिक बढ़ता है। 
(2)  बड़े-पैमाने की बचतें - जब कोई उद्योग उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में वृद्धि करता है तो बड़े-पैमाने की बाह्य और आंतरिक मितव्यताएं प्राप्त होने लगती हैं। अतः उत्पादन अनुपात से अधिक मात्रा में बढ़ता है। 
(3)  विशिष्टीकरण - यदि कोई उत्पादन में विशिष्टीकरण प्राप्त कर लेता है तो भी उत्पत्ति वृद्धिनियम लागू होता है। विशिष्टीकरण में फर्म केवल एक वस्तु के उत्पादन पर ही ध्यान केन्द्रित करती है। जिस प्रकार प्रबन्ध के लिए एक मैनेजर की बजाय क्रय-विक्रय, उत्पादन, तकनीकी विकास, निर्माण, हिसाब-किताब के लिए अलग-अलग मैनेजर नियुक्त किये जाते है। निश्चय ही ऐसी स्थिति में साधनों की उत्पादकता बढ़ेगी। 
(4)    साधनों का आदर्श संयोजन - यदि उत्पत्ति विभिन्न साधनों के बीच प्रतिस्थापन संभव होता है और उनकी पूर्ति को किसी सीमा तक घटाया-बढ़ाया जा सकता है तो उद्यमी साधनों का ऐसा संयोग स्थापित कर सकता है जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त हो। 

  • जिसकी रचना मुख्यतः ओलिगोसीन युग की पुरानी रवेदार तथा अवसादी चट्टानों से हुई थी।
     
  • दूसरा उत्थान मिओसीन युग में हुआ जिसके अंतर्गत पश्चिमी पाक के पोटवार क्षेत्र में एक बेसिन में निक्षेपित अवसादों का आवलन हुआ।
  • उत्तर पिल्योसीन युग में शिवालिक का वलन इसकी तृतीय अवस्था का द्योतक है।
Offer running on EduRev: Apply code STAYHOME200 to get INR 200 off on our premium plan EduRev Infinity!

Related Searches

study material

,

practice quizzes

,

Sample Paper

,

video lectures

,

pdf

,

Objective type Questions

,

Extra Questions

,

Summary

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

Exam

,

Semester Notes

,

mock tests for examination

,

Viva Questions

,

Important questions

,

Previous Year Questions with Solutions

,

shortcuts and tricks

,

ppt

,

Free

,

past year papers

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

,

MCQs

,

सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 1 से 11 तक) Class 10 Notes | EduRev

;