सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 12 से 22 तक) Class 10 Notes | EduRev

Social Science (SST) Class 10 - Model Test Papers in Hindi

Class 10 : सामाजिक विज्ञान समाधान सेट 9 (प्रश्न 12 से 22 तक) Class 10 Notes | EduRev

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प्रश्न 12.      भारत की  भौगोलिक स्थिति, विस्तार और इसके लाभों पर चर्चा करें।

उत्तरः  

  • विश्व में भारत क्षेत्रफल में सातवां बड़ा (2.2%) और जनसंख्या में दूसरा बड़ा (16%) देश है। भारत का क्षेत्रफल इंगलैंड से 12 गुना और जापान से 8 गुना बड़ा है। लेकिन कनाडा का 1/3 है। भारत का अक्षांशीय विस्तार 804’ से 3706’ उत्तर और देशांतरीय विस्तार 6807’ से 97025’ पूर्व है। भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,782 वर्ग किमी. है। यह उत्तर-दक्षिण 3214 किमी. और पूर्व-पश्चिम 2933 किमी. में फैला है। कर्क रेखा इसके मध्य से गुजरती है। भारत के तटीय सीमा की कुल लंबाई 6200 किमी. और स्थलीय सीमा की लंबाई 15,200 किमी. है।
  • भारत और इसके दक्षिण एशिया के पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आपस में मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप का निर्माण करते हैं क्योंकि उत्तर में जहाँ यह हिमालय पर्वत से पृथक है वहीं दक्षिण में हिन्द महासागर इसे प्रायद्वीपीय स्वरूप प्रदान करता है।
  • भारत की भौगोलिक स्थिति और विस्तार का लाभः हिमालय पर्वत के दक्षिण एवं हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित भारत की भौगोलिक स्थिति बहुत ही उपयोगी है-
  • व्यापारिक: भारत के दक्षिण में स्थित हिन्द महासागर तीन महाद्वीपों एशिया, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया को आपस में जोड़ता है तथा स्वेज नहर मार्ग से यह यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से भी संबंधित है। इस प्रकार भारत वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग के संगम पर स्थित है। इससे भारतीय व्यापारिक संबंध में काफी वृद्धि हुई है।
  • मत्स्य खनन: भारत का हिन्द महासागर में 200 मील तक समाकलित आर्थिक क्षेत्रा (ई. ई. जेड.) के विस्तार और हिन्द महासागर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा नोडुल्स खनन के लिए प्रदत्त 1.5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र से मत्स्य पकड़ने और समुद्री खनन में काफी प्रगति हुई है।
  • जलवायु: हिन्द महासागर भारत को मानसूनी जलवायु प्रदान करता है जो भारतीय जन-जीवन और अर्थव्यवस्था को संचालित करता है।
  • ऊर्जा: ज्वारीय ऊर्जा, तरंग ऊर्जा, समुद्री तापमान में अंतर से उत्पन्न ऊर्जा के रूप में भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में पर्याप्त विभव मौजूद है।
  • भू-राजनीतिक: हिन्द महासागर में सर्वाधिक केन्द्रीय स्थिति के कारण भारत का भू-राजनीतिक महत्व बढ़ गया है। वर्तमान में भारत, आस्ट्रेलिया और द. अफ्रीका हिन्द महासागर के तटवर्ती देशों का संघ बनाने के लिए प्रयासरत है।

प्रश्न 13 :    भारत की भूगर्भिक संरचना पर टिप्पणी करें।

उत्तर : भारत की भूगर्भिक संरचना विलक्षण है, क्योंकि यहाँ प्रिकैम्ब्रीयन (Precambrian)  काल से लेकर वर्तमान होलोसिन काल तक का विस्तृत निक्षेप मिलता है। भारत की भूगर्भिक संरचना न केवल देश में पाये जाने वाले चट्टानों और खनिजों के वितरण को निर्धारित करती है बल्कि संरचना और उच्चावच में प्रत्यक्ष संबंध भी स्थापित करती है।

  • भारतीय भूगर्भिक इतिहास की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं -

(1) आद्य महाकल्प और धारवाड़ समूह - धरातल पर सर्वाधिक प्राचीन, अवशेष रहित, कायान्तरित शैलों से निर्मित समूह। प्रायद्वीपीय भाग में 1 लाख 87 हजार वर्ग किमी. क्षेत्रा में विस्तृत इस काल की खदान चट्टानों में कीमती खनिज - लौह अयस्क, मैगनीज, तांबा, लैड, सोना आदि का भंडार पाया जाता है।

(2) कड्डप्पा क्रम - की चट्टान धारवाड़ समूह से निर्मित सर्वाधिक पुरानी अवसादी चट्टानों, जीवांश रहित। आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विस्तृत। इन चट्टानों में धात्विक खनिज के भंडार पाये जाते है ।

(3) विन्ध्य क्रम - बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शैल अवसादी चट्टानों से निर्मित। विस्तार - कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान से प. बिहार तक।

(4) कैम्ब्रियन से मध्य कार्बोनीफेरस - इस काल की चट्टानें पश्चिमी हिमालय में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूरी तरह विकसित है। कैम्ब्रियन चट्टानों चीका, स्लेट, चूना पत्थर और क्वार्ट्ज से बनी हुई है जो हिमाचल प्रदेश में स्पीती घाटी में विशेष रूप से पायी जाती हैं।

(5) गोंडवाना समूह - कार्बोनीफेरस काल में हिमयुग का आविर्भाव हुआ और नदी घाटियों में पूर्व वनस्पतियों के दबने से कोयला का निर्माण हुआ। भारत का 98 प्रतिशत कोयला इसी काल का है।

(6) दक्कन ट्रैप - क्रिटेशियस काल से इओसीन काल तक प्रायद्वीपीय भारत के उ.-प. भागों में बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी क्रिया हुई और दरारी उद्भेदन के फलस्वरूप 5 लाख वर्ग किमी. से अधिक क्षेत्र पर क्षारीय लावा का विस्तार हो गया। इस क्षेत्रा में कालांतर में बैसाल्ट चट्टानों के अपरदन से उपजाऊ ”रेगुर“ या ‘काली कपास मिट्टी’ का निर्माण हुआ।

(7) टर्शियरी समूह - इस काल में वृहत् पर्वत निर्माणकारी घटनाओं के कारण हिमालय की उत्पत्ति हुई। टेथिस के तलछटों में मोड़ और पर्वत के रूप में उत्थान टर्शियरी से प्लीस्टोसीन काल तक विभिन्न चरणों में पूरा हुआ। भारत ने अपना वर्तमान स्वरूप इसी काल में धारण किया। इस काल के जमावों में कोयला-लिगनाइट और पेट्रोलियम का भंडार पाया जाता है।

(8) प्लीस्टोसीन और होलोसीन समूह - प्लीस्टोसीन काल में करेवा जलाशय से कश्मीर की घाटी और पीरपंजाल का निर्माण हुआ। दक्षिण भारत की नदियों के प्राचीनतम् कांप इस काल के ही हंै। गंगा-सतलज मैदान का पुराना जलोढ़ मैदान बांगर मध्य प्लीस्टोसीन काल में और नया बाढ़ मैदान खादर ऊपरी प्लीस्टोसीन और आधुनिक काल में बना है। पूर्वी तट पर डेल्टा का निर्माण भी आधुनिक काल का है।

  • इस प्रकार भारत का भूगर्भिक इतिहास पृथ्वी के सबसे प्राचीनतम अरावली पर्वत, विश्व के सबसे ऊंचे और आधुनिक मोड़दार हिमालय पर्वत श्रेणी और अत्याधुनिक समय के बने वृहद् मैदान को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 14 :   भारत का भू आकृतिक विभाजन और प्रत्येक भाग की संरचनात्मक विशेषता एवं महत्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर : भारत को 4 प्रमुख भू-आकृतिक भागों में बांटा गया है -
(1) हिमालय पर्वतीय श्रेणी,
(2) उत्तर भारतीय मैदान,
(3) प्रायद्वीपीय पठार और
(4) तटवर्ती मैदान

1. हिमालय पर्वतीय श्रेणी - हिमालय पर्वतमाला सिन्धु नदी के मोड़ से ब्रह्मपुत्रा नदी के मोड़ तक 2400 किमी. की पूर्व-पश्चिम लंबाई में चापाकार में फैला हुआ है। इसकी चैड़ाई 150 से 400 किमी. और औसत ऊँचाई 2000 मी. है। किन्तु यह पूर्वी भाग में 1500 मी. और मध्यवर्ती भाग में 8000 मी. ऊंचा है। इसका कुल विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्रफल में है। यह एक नवीन पर्वतमाला है जो उस विशाल पर्वत प्रणाली का भाग है जो मध्य एशिया से मध्य यूरोप तक फैली हुई है।

  • हिमालय को 4 प्रादेशिक भागों में बांटा गया है -

(I) पंजाब हिमालय - सिन्धु से सतलज के बीच 560 कि.मी. की लंबाई में विस्तार।
(II) कुमायूँ हिमालय - सतलज से काली नदी तक 320 कि.मी. की लंबाई में विस्तार।
(III) नेपाल हिमालय - काली और तिस्ता के बीच 800 कि.मी. की लंबाई में विस्तार।
(IV) असम हिमालय - तिस्ता और दिहांग के मध्य 720 कि.मी. की लंबाई में।

हिमालय का समानान्तर विभाजन - हिमालय पर्वतमाला अपने अनुदैध्र्य अक्ष पर समानान्तर पर्वतमालाओं के तीन मुख्य अनुक्रम में अवस्थित है जो विवर्तनिक अनुदैध्र्य घाटियों द्वारा पृथक होती है।
(I) वृहत् हिमालय या हिमाद्री - नंगा पर्वत से नमचाबरवा तक 2400 कि.मी. की लंबाई और औसत ऊंचाई 6000 मी. है। प्रमुख चोटी - एवरेस्ट-8848 मी. कंचनजंघा-8598 मी. है।
(II) मध्य हिमालय या हिमाचल - औसतन 80 कि.मी. चैड़ाई और 3700 से 4500 मी. की ऊँचाई। हिमालय के सभी स्वास्थ्यवर्धक स्थान इसी पर्वतक्रम में मिलते हैं।
(III) उपहिमालय या शिवालिक - औसत चैड़ाई 10 से 50 किमी. और ऊँचाई 900 से 1200 मी. है।

हिमालय का महत्व
(I) पर्यटन स्थल के रूप में
(II) सालों भर प्रवाहित नदियों का स्रोत
(III) वृहद् मैदान की उपजाऊ मृदा का स्रोत
(IV) जैव विविधता का प्रचुर भंडार
(V) जलापूर्ति और जलविद्युत का स्रोत
(VI) खनिजों का भंडार
(VII) प्राकृतिक अवरोधक या सीमा का कार्य
(VIII) जलवायविक प्रभाव - भारत को उष्ण कटिबंधीय मानूसनी चरित्रा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका

2. उत्तरी भारतीय मैदान - उत्तर भारत का विशाल मैदान विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला भू-भाग है। पूर्व-पश्चिम दिशा में इसकी लंबाई 2400 किमी. तथा कुल क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग कि.मी. है। इसमें कांप की औसत मोटाई 1300 से 1400 मी. तक है।
संरचना - मिट्टी की विशेषता व ढाल के आधार पर विशाल मैदान को 5 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है -
(i) भावर प्रदेश - हिमालय के पर्वतपदीय क्षेत्रों में कंकड़ पत्थरों से ढका भाग भावर कहलाता है। इसकी औसत चैड़ाई 10-15 कि.मी. है।
(ii) तराई प्रदेश - भावर के दक्षिण चिकनी मिट्टी, कंकड़, रेत से निर्मित 15-30 कि.मी. की चैड़ाई में फैला प्रदेश।
(iii) बाँगर प्रदेश - गंगा-सतलज मैदान का पुराना बाढ़ का मैदान। रेह, भूड़, कांकड़, बारिन्द आदि बाँगर प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं हैं।
(iv) खादर प्रदेश - गंगा-सतलज मैदान का नवीन बाढ़ का मैदान या कछारी प्रदेश।
(v) डेल्टाई प्रदेश - गंगा-ब्रह्मपुत्रा का विशाल डेल्टा प. बंगाल और बांगलादेश में विस्तृत है।

विशाल मैदान का उपविभाजन - उत्तर के विशाल मैदान को धरातलीय विशेषता के आधार पर 4 उपभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है -
(क) पंजाब-हरियाणा का मैदान - सतलज, व्यास व रावी नदियों से निर्मित, 1.75 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्रा में फैला मैदान।
(ख) राजस्थान का मैदान - अरावली के पश्चिम 1.75 लाख वर्ग किमी. क्षेत्राफल पर फैला मैदान। बलुआ टीलों और नीस एवं ग्रेनाइट निर्मित सतह। प्रमुख नदी - लूनी।
(ग) गंगा का मैदान - उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों के 3.57 लाख वर्ग कि.मी. भू-भाग पर फैला कांप निर्मित मैदान। इस मैदान को तीन उप विभागों में बांटा गया है -
(i) ऊपरी गंगा का मैदान - औसत ऊँचाई 100 से 300 मीटर
(ii) मध्य गंगा का मैदान - औसत ऊँचाई 75 से 30 मीटर
(iii) निम्न गंगा का मैदान - औसत ऊँचाई 30 मीटर से कम

(घ) ब्रह्मपुत्रा का मैदान या असम घाटी - मेघालय पठार और हिमालय पर्वत के बीच 80 कि.मी. चैड़ाई में फैला लम्बा और संकीर्ण मैदान।

विशाल मैदान का महत्व
(i) कृषि के लिए उपजाऊ भूमि (भारत का खाद्यान भंडार)
(ii) मैदानी नदियों द्वारा सिंचाई और पीने के लिए जल की प्राप्ति
(iii) भूमिगत जल का भंडार
(iv) सभ्यता की जन्मभूमि
(v) नगर और ग्रामीण अधिवासों का बसाव
(vi) जल, स्थल और रेल यातायात के विकास में महत्वपूर्ण

  • संक्षेप में, भारत का वृहद् मैदान भारत की आत्मा है। यह देश का सबसे उन्नत भू-भाग है। भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है। यह कृषि, व्यापार, उद्योग व यातायात की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

3. प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश - सतलज, गंगा, ब्रह्मपुत्रा मैदान के दक्षिण संपूर्ण प्रायद्वीप को समेटते हुए प्रायद्वीपीय पठार विस्तृत, प्राचीन तथा कठोर चट्टानों द्वारा सृजित, अपरदनात्मक प्रक्रम द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों वाला पठारी प्रदेश है। 600 से 900 मी. की औसत ऊँचाई वाला यह पठार एक अनियमित त्रिकोण का निर्माण करता है जिसका आधार दिल्ली और राजमहल की पहाड़ियों के मध्य और शीर्ष कन्याकुमारी है। अरावली, पंजाब में किराना की पहाड़ियाँ, राजमहल तथा शिलाँग की पहाड़ियाँ इस प्रायद्वीपीय पठार की उत्तरी सीमा बनाती है।

संरचना और उच्चावच - भू संरचनात्मक सम्यता के आधार पर मोटे तौर पर इस पठारी प्रदेश को तीन उप प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है -

(i) केन्द्रीय उच्च प्रदेश - यह क्षेत्रा अरावली सतपुड़ा पर्वत श्रेणी और गंगा के मैदान के मध्य स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 300 से 700 मी. है। अरावली की पहाड़ियां, मालवा पठार, बुन्देलखंड का पठार, कैमूर विंध्य शृंखला, सतपुड़ा, महादेव, मैकाल, बराकर, राजमहल की पहाड़ियां तथा नर्मदा और ताप्ती की भ्रंशित्थ द्रोणी इस पठारी प्रदेश के उच्चावच के प्रमुख भूस्वरूप का निर्माण करते हैं।

(ii) पूर्वी पठारी प्रदेश - प्रायद्वीपीय भाग के उत्तर-पूर्व में स्थित इस पठारी प्रदेश में बघेलखंड का पठार, सोनपार की पहाड़ियां, रामगढ़ की पहाड़ियां, छोटानागपुर का पठार, रांची का पठार, हजारीबाग का पठार, गढ़घात की पहाड़ियां, छत्तीसगढ़ का मैदान, दण्डकारण्य प्रदेश, शिलांग का पठार और मिकिर एवं रेंगमा पहाड़ियां प्रमुख भू आकृतिक स्वरूप का निर्माण करती हैं। शिलांग का पठार जो उत्तर-पूर्व में पठार की सीमा बनाती है, प्रायद्वीपीय पठार से गंगा के जलोढ़ के दबे होने के कारण असंबद्ध है।

(iii) दक्कन का पठार - त्रिभुजाकार आकृति वाले इस पठारी प्रदेश के उत्तर में सतपुड़ा, प. में पश्चिमी घाट तथा पूर्व में पूर्वी घाट पर्वत श्रेणी स्थित हैं। इसकी औसत ऊँचाई 600 मी. है। ग्रेनाइट और नीस निर्मित नीलगिरि, अन्नामलाई, पालनी, कार्डोमम समूह, दक्कन का लावा पठार, अपरदित लक्षणों एवं जलोढ़ डेल्टाई मैदान वाली महानदी, गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, कावेरी नदी घाटियाँ तथा प्राचीनतम शैलों से निर्मित तेलांगना का पठार, बस्तर की पहाड़ियाँ, नल्लामलाई, वेलिकाüडा, पालकाडा, पंचमलाई, शिवराय और जावदी श्रेणियाँ आदि दक्कन पठार के प्रमुख भू आकृतिक स्वरूपों का निर्माण करते हैं।

  • इस प्रकार प्रायद्वीपीय भारत की संरचना और उच्चावच में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है।

प्रायद्वीपीय पठार का महत्व
(i) खनिज संपदा का भंडार
(ii) उपजाऊ रेगुर मिट्टी और बागानी कृषि के लिए लैटराइट मिट्टी का स्रोत
(iii) वन संपदा और जैव विविधता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण
(iv) इस क्षेत्रा में प्रवाहित नदियों द्वारा सिंचाई और जल विद्युत की सुविधा।

4. तटवर्ती मैदान - भारत की तटरेखा 6100 कि.मी. लंबी है। यह प. में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्रा डेल्टा तक फैली है। संपूर्ण तटवर्ती मैदान को 2 भागों में बांटा जाता है - (क) प. तटीय मैदान (ख) पूर्वी तटीय मैदान

पश्चिमी तटीय मैदान
यह मैदान पश्चिमी घाट के पश्चिम में कच्छ की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक औसतन् 64 किमी. की चैड़ाई में फैला हुआ है। इसमें मालाबार तट अधिक कटा-फटा हुआ है। पश्चिमी तटीय मैदान को चार भागों में बांटा जाता है -
(i) कच्छ तट
(ii) काठियावाड़ तट
(iii) कोंकण तट - दमन से गोआ तक
(iv) मालाबार तट - गोआ से केरल तक

पूर्वी तटीय मैदान

  • यह स्वर्णरेखा नदी से कुमारी अन्तरीप तक फैला है। यह पश्चिमी तट की अपेक्षा अधिक चैड़ा और कई प्रमुख डेल्टाओं से सुसज्जित है। इस तट को 2 भागों में बांटा गया है -

(i) कोरोमंडल तट और
(ii) उत्तरी सरकार तट

तटवर्ती मैदान की प्रमुख विशेषताएं
(i) कम चैड़ा, कम कटा-फटा होना जिससे प्राकृतिक बंदरगाहों का कम पाया जाना
(ii) पश्चिमी तट के पास महाद्वीपीय मग्न तट की अधिक चैड़ाई

तटवर्ती मैदान का महत्व
(i) पर्यटन केन्द्र
(ii) खनिजों का भंडार - थोरियम, नमक
(iii) बागानी कृषि का विकास
(iv) प्राकृतिक बंदरगाह और व्यापारिक केन्द्र
(v) मत्स्य केन्द्र
(vi) औद्योगिक महत्व - नमक और मत्स्य परिष्करण उद्योग

प्रश्न 15 : प्लेट टेक्टाॅनिक सिद्धांत के अनुसार हिमालय की उत्पत्ति को दर्शाऐं।

उत्तरः     प्लेट टेक्टाॅनिक सिद्धांत के अनुसार हिमालय की उत्पत्ति

  • पृथ्वी पर पर्वत निर्माण क्रिया के अन्तिम चरण में टेथिस सागर में निक्षेपित अवसादों के वलन से वर्तमान हिमालय और इससे सम्बद्ध पर्वतीय शृंखलाओं का निर्माण हुआ है।
  • अल्पाइन एवं हिमालय पर्वतों के निर्माण अवस्थाओं की व्याख्या प्लेट-विवर्तनिकी के सिद्धांत के आधार पर की जाती है। पर्वत निर्माण की घटनाएँ प्लेटों की गति से सम्बद्ध रही हैं। पर्वत निर्माण के प्लेट- विवर्तनिकी सिद्धांत ने पहले ही भू-अभिनति के सिद्धांत को विस्थापित कर दिया है। प्लेटों के आपसी टकराव के कारण उनमें तथा ऊपर की महाद्वीपीय चट्टानों में प्रतिबलों का एकत्राण होता है, जिनके फलस्वरूप वलन, भ्रंशन और आग्नेय क्रियायें होती हैं। हिमालय पर्वतमालाओं का निर्माण उस समय हुआ जब भारतीय प्लेट उत्तर की ओर खिसकी तथा यूरेशियन प्लेट को धक्का दिया। इसके फलस्वरूप 6.5-7.0 करोड़ वर्ष पहले टेथिस सिकुड़ने लगा। लगभग 3.0 से 6.0 करोड़ वर्ष पहले भारतीय एवं यूरेशियन प्लेट आपस में बहुत निकट आ गई। परिणामस्वरूप टेथिस क्षेपकारों में विभंगित होने लगा। लगभग 2.0 से 3.0 करोड़ वर्ष पहले हिमालय पर्वतमाला उभरने लगी।
  • हिमालय का उत्थान तीन चरणों में पूरा हुआ -

(i) पहली अवस्था में केन्द्रीय हिमालयी पक्ष का उत्थान हुआ जिसकी रचना मुख्यतः ओलिगोसीन युग की पुरानी रवेदार तथा अवसादी चट्टानों से हुई थी।
(ii) दूसरा उत्थान मिओसीन युग में हुआ जिसके अंतर्गत पश्चिमी पाक के पोटवार क्षेत्रा में एक बेसिन में निक्षेपित अवसादों का आवलन हुआ।
(iii) उत्तर पिल्योसीन युग में शिवालिक का वलन इसकी तृतीय अवस्था का द्योतक है।

 

प्रश्न 16 : महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन क्यों चलाया? भारत के विभिन्न भागों में आंदोलन की उग्रता का विश्लेषण कीजिए। 
    
उत्तर :
मेरठ षडयंत्रा के सिलसिले में कम्युनिस्ट नेताओं को दण्डस्वरूप जेल भेज दिया गया था। इस घटना से भारतवासियों  में काफी आक्रोश पैदा हो गया। गांधीजी को महसूस होने लगा कि देश अब हिंसक क्रांति की ओर शीघ्रता से बढ़ रहा है तथा वे इस बदलती प्रवृत्ति से काफी दुखी थे। गांधीजी ने अपने राजनीतिक जीवन का लक्ष्य देश को अहिंसा के माध्यम से स्वतन्त्रा करना बनाया हुआ था। गांधीजी ने प्रशासनिक सुधारों के उद्देश्य से यंग इंडिया में 11 सूत्राीय प्रशासनिक सुधारों को प्रकाशित किया तथा 2 मार्च, 1930 को लार्ड इर्विन को एक पत्रा लिखा। लेकिन वायसराय ने उन्हें कोई उत्साहवर्द्धक उत्तर नहीं दिया। अतः जन साधरण को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने के लिए, लगान में कमी, मद्यनिषेध, नमक कर समाप्ति, सैनिक व्यय में कमी, राजनैतिक बन्दियों की रिहाई, स्वरक्षा के लिए हथियारों के लायसेंस आदि प्रश्नों को लेकर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया। यह आंदोलन गांधीजी ने अपनी प्रसिद्ध डांडी यात्रा से शुरू किया। 12 मार्च, 1930 को साबरमती आश्रम से पैदल डांडी यात्रा शुरू करके गांधी जी ने 385 किलोमीटर दूर पश्चिमी समुद्र तट पर पहुंचकर 6 अप्रैल, 1930 को नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। तमिलनाडु में सी. राजगोपालचारी ने त्रिचनापल्ली से वेदराण्यम् तक की यात्रा की। गुजरात केे धरसाणा में सरोजनी नायडू ने नमक के राजकीय डिपों तक सत्याग्रहियों की अहिंसात्मक यात्रा की अगुआई की। देश भर में लागों ने हड़तालों, प्रदर्शनों व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा करबन्दी के अभियान में भाग लिया। महिलाओं ने भी इस आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया तथा वे जुलूसों व धरनों में पुरुषों के साथ बराबर की सहभागी बनीं। नागालैण्ड की बहादुर नायिका 13 वर्षीय रानी गैडिलियू के नेतृत्व में इस आन्दोलन की धार और भी तेज हुई। रानी को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया तथा 1947 में आजादी के बाद ही रिहा किया गया। शीघ्र ही यह आन्दोलन उत्तरी पश्चिमी किनारों तक भी पहंुच गया, जहां नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खां ने संभाला हुआ था। एम.एन. राय जैसे लोगों ने समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार किया। सूर्य सेन ने 1930 में चटगांव बन्दरगाह का शस्त्रागार लुटवा दिया तथा बंगाल में हिंसक कार्रवाइयों द्वारा ब्रिटिश शासन को परेशान कर दिया। किसानों ने कर न देने का फैसला किया तथा कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, बंगाल व अवध में किसानों के संगठन बने। 

 

प्रश्न 17 : ‘रेलवे ने भारत में वही किया जो अन्यत्रा और कहीं किया; इसने परिवहन स्थिति के स्वरूप को बदलकर हस्तशिल्प को यांत्रिक उद्योग में बदलने की गति में शीघ्रता प्रदान की। विवेचन कीजिए।
    
उत्तर : 
यूरोपीय महाद्वीप में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यातायात व्यवस्था के क्षेत्रा में, विशेषकर रेलवे यातायात में महत्वपूर्ण विकास हुआ। रेलवे के विकास ने आधुनिक उद्योगों की स्थापना को व्यापक प्रोत्साहन प्रदान किया। भारत में 16 अप्रैल, 1853 को डलहौजी के प्रयासों से बम्बई व थाना के बीच 34 कि.मी. लम्बी रेल लाइन के रूप में रेलवे यातायात आरम्भ हुआ। रेलवे यातायात ने देश के औद्योगिकरण एवम् विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, लेकिन यह कार्य हस्तकला उद्योग की कीमत पर हुआ। वैसे भी ये वस्तुएं विदेशी मशीनों से बनी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ थी, क्यांेकि भारतीय वस्तुओं का निर्माण परम्परागत तकनीक के आधार पर होता था। ब्रिटिश वस्तुओं ने गांवों में पहंुचकर परम्परागत ग्रामीण उद्योगों को बंद करने की स्थिति में पहुंचा दिया, जिससे ग्रामीण शिल्पकारों को भारी कठिनाई हुई। शहरी व नगरीय क्षेत्रों पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ा। वास्तव में रेल विकास आर्थिक दृष्टिकोण पर आधारित था तथा यह ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता भी था। रेलवे विकास का भारत के पार्थक्य व पिछड़ेपर को तोड़ने में दूरगामी प्रभाव पड़ा। इसने सामाजिक एकीकरण को भी दृढ़ता प्रदान की। रेल विकास के साथ-साथ बडे़-बडे़ उद्योगों की स्थापना ने ग्रामीण कुटीर उद्योगों को विशेष पनपने का अवसर नहीं दिया, लेकिन रेलों ने देश के सम्पूर्ण सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक जीवन में क्रांति उत्पन्न कर दी। आज भारतीय रेल एशिया में सबसे बड़ी व विश्व में चैथे स्थान पर है तथा देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीयकृत सार्वजनिक प्रतिष्ठान है। निश्चय ही वर्तमान में रेल देश के प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन को गति प्रदान करने में अग्रणी हैं। भारत की वर्तमान औद्योगिक उन्नति, कृषि विकास, और उन्नत सामाजिक व्यवस्था का श्रेय निःसंकोच रेलवे को दिया जा सकता है। 

 

प्रश्न 18 : ”अगस्त प्रस्ताव से माउण्टबेटन योजना तक तर्कसंगत क्रम विकास था“। विवेचना कीजिए।
    
उत्तर :
 अंग्रेजों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को सदैव कुचलने का प्रयास किया। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दमन तथा ‘फूट डालो और शासन करो की नीति’ का सहारा लिया। पृथक साम्प्रदायिक प्रतिनिधत्व तथा मैकडोनाल्ड एर्वाड का यही उद्देश्य था। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस की सहमति के बगैर ब्रिटिश सरकार ने भारत को युद्ध में शामिल कर लिया। जिसका कांग्रेस कार्य समिति ने विरोध किया और घोषणा की कि ‘साम्राज्यवादी दंगों पर चलाये जाने वाले युद्ध में सहयोग“ नहीं देेंगे। अंग्रेजी हुकूमत भारतीयों की मांगों अनदेखा करती रही जिसके परिणामस्वरूप कांगे्रस मंत्रिमंडल ने 1939 में त्यागपत्रा दे दिया। परिस्थिति से विवश होकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए 8 अगस्त, 1940 के अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की। अगस्त प्रस्ताव के अन्तर्गत निम्नलिखित उपबंध शामिल थे- (1) युद्ध के बाद कए प्रतिनिधि संस्था की स्थापना, जो भारत के लिए नवीन संविधान बनाएगी।, (2) अतिरिक्त भारतीय सदस्यों को मनोनीत कर वायसराय की कार्यकारिणी में भारतीयों की अधिक सहभागिता तथा (3) एक युद्ध सलाहकार परिषद की नियुक्ति, जिसमें ब्रिटिश भारत एवं भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि होंगे। परंतु इस प्रस्ताव में भी राष्ट्रीय सरकार के गठन की मांग को अस्वीकृत कर दिया गया।  साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि ब्रिटिश सरकार शांति और भारत के कल्याण के लिए अपना उत्तरदायित्व किसी ऐसे दल को हस्तांतरित नहीं करेगी जिसका प्रमुख किसी अन्य दल को स्वीकार न हो। स्पष्टतः इस प्रस्ताव में मुस्लिम लीग को पृथक राज्य के लिए प्रोत्साहित किया गया था।
अगस्त प्रस्ताव की असफलता के बाद तथा विश्व युद्ध में जापान के हाथों मिल रही पराजय से भयभीत होकर 1942 ई. में स्टेफोर्ड क्रिप्स को एक प्रस्ताव के साथ भारत भेजा गया। क्रिप्स प्रस्ताव मे कुछ सुधार तो अवश्य किया गया, परन्तु मूलरूप से उस प्रस्ताव में अगस्त प्रस्ताव को ही दोहराया गया था। इस प्रस्ताव में भी ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत विभाजन की योजना को निरंतर आगे बढ़ाए जाने की बात निहित थी। प्रस्ताव में देशी राज्यों को संघ में सम्मिलित होने अथवा न होने की स्वतंत्राता तथा मुस्लिम  बहुल प्रांतों को पृथक होने की बात कही गयी थी। 
14 जुलाई, 1945 को तत्कालीन वायसराय लार्ड वेवेल ने भारतीय समस्याओं के समाधान हेतु एक योजना प्रस्तुत की, जिसे ‘बेवेल योजना’ के नाम से जाना जाता है। इस योजना में अन्य प्रावधानों के अलावा वायसराय की कार्यकारिणी में मुसलमानों तथा हिन्दुओं को बराबर स्थान देने की बात थी। कांग्रेस यद्यपि इस बात से सहमत थी परंतु उसने यह बात मानने से इंकार कर दिया कि मुसलमानों को मनोनीत करने का अधिकार सिर्फ मुसिलम लीग को ही हो। बेवेल योजना का यह प्रावधान भी भारत विभाजन की एक कड़ी थी। 
भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करने का उपाय खोजने के लिए 24 मार्च, 1946 को कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन द्वारा साम्प्रदायिक समस्या पर उस समुदाय के बहुमत प्राप्त सदस्यों की सहमति की अनिवार्यता और प्रान्तों को अपनी इच्छानुसार समूह बनाने का अधिकार तथा संविधान सभा में विभिन्न सम्प्रदायों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व देना आदि कार्य अप्रत्यक्ष रूप से भारत विभाजन की परिकल्पना को सच करना ही था।
अगस्त प्रस्ताव से लेकर कैबिनेट योजना ने जो काम परोक्ष रूप से किया, 1947 की माउंटबेटन योजना ने प्रत्यक्ष रूप से पूरा करते हुूए भारत तथा पाकिस्तान को स्वतंत्रा राष्ट्रों में विभाजित कर फूट डालो और शासन करो की नीति को अक्षरशः सच साबित कर दिया। विभाजन की इस प्रक्रिया ने ब्रिटिश शासकों की दुर्भावना को उजागर कर दिया। अखंड भारत और साम्प्रदायिकता से रहित स्वतंत्रा भारत का निर्मान संभव नहीं हो सका। अगसत प्रस्ताव, वेवेल योजना, कैबिनेट मिशन योजना एवं माउंटबेटन योजना के गहन अध्ययन से यह स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि 1940 के अगस्त प्रस्ताव से लेकर 1947 की माउंटबेटन योजना, विभाजन के तर्क संगत विकास का क्रम था। 

 

प्रश्न 19 : मैकडोनाल्ड निर्णय क्या था? यह किस प्रकार संशोधित किया गया और इसके क्या परिणाम हुए?
    
उत्तर :
दूसरे गोलमेज सम्मेलन के अंत में रैम्जे मैकडोनाल्ड ने कहा था कि यदि भारत में विभिन्न जातियों की साम्प्रदायिक समस्या हल न हुई तो ब्रिटिश सरकार इस विषय पर अवश्य ही काई कदम उठाएगी। लन्दन में आयोजित सम्मेलन में विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। इसलिए 16 अगस्त, 1932 को रैम्जे मैकडोनाल्ड ने एक घोषणा की, जिसको साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) नाम दिया गया। रैम्जे मैकडोनाल्ड की यह घोषणा पूर्णतः साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली थी।
मैकडोनाल्ड निर्णय के मुख्य उपबंध थेः
(1)    प्रांतीय विधान मंडलों में स्थानों का बंटवारा, 
(2)    मुसलमानों, सिक्खों, भारतीय ईसाइयों, ऐग्लों इण्डियनों और महिलाओं के लिए अलग चुनाव पद्धति की व्यवस्था,
(3)    श्रम व्यापार, उद्योग, जमीदारों और विश्वविद्यालयों के लिए अलग चुनाव क्षेत्रों में निर्वाचन की व्यवस्था, एवं 
(4)    हरिजन अथवा दलित वर्गों को अलग निर्वाचन की व्यवस्था।
मैकडोनाल्ड निर्णय के उपरोक्त उपबंधों के आलोक में सवर्ण हिन्दुओं, हरिजनों एवं मुसलमानों के लिए सभी विधानमंडलों में पृथक प्रत्यक्ष निर्वाचक मण्डल की व्यवस्था तथा सवर्ण हिन्दू और हरिजन को पृथक राजनीतिक मान्यता देकर अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति जारी रखी। मैकडोनाल्ड निर्णय का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत को स्थायित्व प्रदान करना था। 

मैकडोनाल्ड निर्णय में निहित साम्प्रदायिकता की बात ने महात्मा गांधी को इसका विरोध करने के लिए विवश कर दिया। गांधीजी ने 20 सितम्बर, 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। यद्यपि प्रारम्भ में डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने गांधीजी के इस विरोध को राजनीतिक धूर्तता (Politial Stunt) कहा परन्तु बाद में चलकर मदन मोहन मालवीय, राजेन्द्र प्रसाद तथा एम.एस. राजा के प्रयत्नों से 26 सितम्बर, 1932 को गांधीजी और अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता (Poona Pact) के नाम से जाना जाता है।
पूना पैक्ट के अन्र्तगत दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था समाप्त कर दी गई, परन्तु प्रान्तीय विधानमंडलों में हरिजनों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गई तथा केंद्रीय विधामंडलों में हरिजनों के लिए 18 प्रतिशत सीटों का आरक्षण तथा उनकी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था की बात कही गई। स्थानीय संस्थाओं एवं सार्वजनिक सेवा में भी उनके लिए उचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई। 
मैकडोनाल्ड निर्णय ने भारत में दलितों को एक नई राजनीतिक शक्ति प्रदान की तथा उनको विकास का अवसर प्राप्त हुआ। महात्मा गांधी दलितों के उत्थान के लिए जीवन पर्यन्त लगे रहे। 

 

प्रश्न 20 : सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर तिलक और गोखले के दृष्टिकोणों में मुख्यत मतभेदों का विश्लेषण कीजिए। 
    

उत्तर : भारत को स्वतंत्रा कराने तथा आर्थिक एवं सामाजिक रूप से उसका उत्थान करने में जिन सपूतों ने अपना योगदान दिया, उनमें बाल गंगाधर तिलक एवं गोपाल कृष्ण गोखले का नाम महत्त्वपूर्ण है। ‘लोकमान्य’ तिलक गरमदल के नेता थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि विदेशी शासन चाहे जितना भी अच्छा क्यों न हो, परन्तु वह स्वशासन का स्थान कभी नहीं ले सकता। वे उदारवादियों के इस दृष्टिकोण से बिल्कुल सहमत नहीं थे कि अंग्रेेजों को जब विश्वास हो जाएगा कि भारतीय स्वशासन के योग्य हो गये हैं तो वे स्वयं ही भारत को छोड़कर चले जायेंगे। तिलक स्वतंत्राता की प्राप्ति को अपना प्रिय लक्ष्य समझते थे और इसके लिए सभी प्रकार के साधनो को उचित समझते थे। अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए लोकमान्य तिलक ने ‘मराठा’ और ‘केसरी’ नामक दो समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया। इन समाचार पत्रों में जनता में जागृति फैलाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। राष्ट्रीय जागृति और वीरता उत्पन्न करने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र में शिवाजी उत्सव और गणपति उत्सव मानने की प्रथा जारी की। उन्होनें कांग्रेस आंदोलन को विद्रोह में तबदील कर दिया और ”स्वतंत्राता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा“ का नारा दिया। वे स्वेदशी के पक्षधर थे और ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत करते थे। अपनी गरमपंथी विचारधारा के कारण ही लोकमान्य तिलक भारतीय ‘असंतोष के जन्मदाता’ (Father of Indian unrest)  कहलाते थे। लोकमान्य तिलक ने उस समय स्वराज्य की माँग की और आंदोलन किया, जब लोग ब्रिटिश सरकार से अत्यंत ही भयभीत थे। अतः अमरीकी अनुसंधानकत्र्ता डाॅ. थियोडर एलिसे का यह कथन- ‘जब भारत में वास्तविक राजनीतिक जागृति शुरू हुई तो सबसे पहले तिलक ने ही स्वराज्य की आवश्यकता और उसके लाभों की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया था’ अक्षरशः सत्य है। हम यदि यह कहें कि स्वतंत्राता आंदोलन की आधारशिला रखने का श्रेय लोकमान्य तिलक को ही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

जहाँ तक गोपाल कृष्ण गोखले की विचारधाराओं का सवाल है, तो वे पक्की उदारवादी विचारधारा के थे। उनका मानना था कि कांग्रेस को भारतीय प्रशासन में सुधार के लिए धीरे.धीरे संवैधानिक आंदोलन करना चाहिए। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि देश का पुनर्निमाण राजनीतिक उत्तेजना की आँधी में नहीं बल्कि धीरे.धीरे हो सकता है। ”मुझे अपने देश के लक्ष्य और चेतना में पूरा विश्वास है और इसकी सीमित क्षमताओं में विश्वास करता हूँ, परन्तु भारत का यह शानदार भविष्य अंग्रेजी राज्य की अवाध सर्वोच्चता में ही प्राप्त किया जा सकता है“ -1903 ई. में गोखले के इस भाषण से अंग्रेजों के प्रति उनका दृढ़-विश्वास स्पष्टतः परिलक्षित होता है। गोखले केवल याचिकाओं एवं संवैधानिक आंदोलनों के लिए अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। यद्यपि, गोखले उदारवादी तथा ब्रिटिश उपनिवेश की मुखालिफत करने वाले थे फिर भी वह स्वशासन के महान देवदूत थे। तुलनात्मक अध्ययन के लिए हम यह कह सकते हैं कि गोखले नरम थे और तिलक गरम। गोखले तत्कालीन विधान में केवल सुधार चाहते थे, जबकि तिलक उसे नए सिरे से बनाना चाहते थे। गोखले उसके शासन और सुधार की ओर मुख्य ध्यान देते थे, तिलक राष्ट्र और उसके निर्णय को मुख्य समझते थे। निष्कर्षतः गोखले की कार्य प्रणाली का उद्देश्य विदेशियों को हृदय से जीतना था, जबकि तिलक उन्हें देश से बाहर निकालना चाहते थे। 
 

प्रश्न 21 : उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हुए अद्वितीय जनजातीय विप्लव का विवेचन कीजिए।
   
 
उत्तर : कोई भी आदिवासी, विद्रोह तभी करता है, जब बाहरी संसार के लोग उसके सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक संसाधनों का अतिक्रमण करने लगते हैं यथा, जंगलों की कटाई, अयस्कों का दोहन, विसंस्कृतिकरण आदि। उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजातीय विप्लव भी इन्ही भावनाओं से ग्रस्त था। जब गोरी सरकार ने इन जनजातियों पर अत्याचार करना प्रारम्भ किया तो ये आदिविासी इसे अपनी आजादी और संस्कृति पर अतिक्रमण समझने लग गये तथा ब्रिटिश सरकार की जड़े खोदने लगे। यद्यपि इन्हें इसमें सफलता प्राप्त नहीं हुयी तथापि इनके विद्रोहों ने अंग्रेज सरकार के होश ठिकाने लगा दिये। इनकी असफलता के अनेक कारण हैं परन्तु प्रमुख कारण इनका पिछड़ापन था, क्यांेकि जहाँ ये आदिवासी तीर-कमान-ढाल, आदिकालीन शस्त्रों व नीतियों पर युद्ध कर रहे थे वहीं ये विदेशी अत्याधुनिक अस्त्रा-शस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे।
इन जनजातियों ने यद्यपि अनेकों स्थान पर विद्रोह किये तथापि कुछ ‘मील के पत्थर’ इस प्रकार हैंः

कोल विद्रोह: यह विद्रोह 1820 से 1837 तक चलता रहा, यह बिहार के रांची से प्रारम्भ होकर सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू तथा मानभूम के पश्चिमी भाग तक फैल गया, यह विद्रोह तब हुआ जब अंग्रेजों ने कोल मुखिया से शासन छीनकर बाहर से आये सिक्ख व मुसलमानों को सौंप दिया। इसे अंग्रेजी सेना ने बुरी तरह कुचल दिया। 

संथाल विद्रोहः यह विद्रोह 1855.56 में हुआ, इस विद्रोह का नेतृत्व सीदो और कान्हू नामक दो भाइयों ने किया। यह विद्रोह हजारीबाग और मानभूम से राजमहल पहाड़ियों के क्षेत्रा में बसे आदिवासी संथालो के लगभग 40 ग्रामों में उस समय प्रारम्भ हुआ जब इनसे साहूकारों द्वारा बहुत ऊँची दर पर लगान वसूला जाने लगा। जब साहूकारों द्वारा ऊंची दर पर लगान वसूला गया, रेल व राजस्व विभाग द्वारा वेगार लिया गया एवं बाहरी व्यक्तियों द्वारा इन आदिवासियों की स्त्रिायों से व्याभिचार किया जाने लगा, तो संथाल जवान इस अत्याचार को सहन न सके और विप्लव की इस आग में कूद पड़े। अंग्रेजी सरकार ने इस विप्लव को बुरी तरह कुचल दिया।

रम्पा विद्रोह: 1879 ई. में यह आंध्र प्रदेश में गोदावरी के पहाड़ी क्षेत्रों से उपजा। यद्यपि इस विद्रोह के उपजने के अनेकानेक कारण है तथापि प्रमुख कारण मनसबदारों का इमारती लकड़ी व चराई करों में भारी वृद्धि कर देना था। इस विद्रोह का नेतृत्व कोया व कोंडा डोरा आदिवासी मुखियों ने किया। रम्पा विद्रोह की भड़कती आग को ठंडा करने के लिए ब्रिटिश सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी।

मुंडा विद्रोह -बिहार राज्य (वर्तमान में झारखण्ड)  में उपजा एक प्रमुख विद्रोह जिसके अंश वर्तमान राजनीति में भी दृष्टिगत होते हैं। रांची के दक्षिणी क्षेत्रा के आदिवासियों ने बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेज सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। यह विद्रोह अंग्रेजी सरकार के खिलाफ किये गये सभी विद्रोहों में सर्वाधिक सुसंगठित व योजनाबद्ध था। यद्यपि यह विद्रोह कुछ दिन के लिए दबा दिया गया तथापि यह विभिन्न रूपों में उपस्थित होकर स्वतंत्राता संग्राम को सुदृढ़ करता रहा।

इसके अतिरिक्त निम्न विप्लव भी महत्त्वपूर्ण हैंः
1. खासी विद्रोह: 1829 असम में तीरता सिंह के नेतृत्व में।
2. फरैंजी या पागल पंथियों का विद्रोह: 1840-57 बंगाल के करमशाह व टीपू के नेतृत्व में।
3. रामोसी विद्रोह: 1822-83 महाराष्ट में।
4. भीलों का विद्रोह: 1819-46, मध्यभारत तथा राजस्थान में। 
5. चुआर विद्रोह: 1768-1831 तक।
6. ‘हो’ विद्रोह: 1820-22 में।
7. खोंद विद्रोह: 1815-55,तमिलनाडु में। 

 

प्रश्न 22 : व्यावसायिक शिक्षा और तकनीकि शिक्षा की आवश्यकता पर चर्चा करें।

उत्तर : इस अध्याय में हम व्यावसायिक प्रतिबद्धता, व्यावसायिक शिक्षा व्यवसाय एवं कम्प्युटर शिक्षा की आवश्यकता पर चर्चा करेंगे। किसी भी व्यवसाय में प्रगति करने के लिए उस व्यवसाय के प्रति साकारात्मक सोच होना चाहिए। एक सफल शिक्षक बनने के लिए हमें शिक्षण व्यवसाय के प्रति साकारात्मक अभिवृति करखना होगा। विवशता में शिक्षण व्यवसाय, शिक्षण के प्रति न्याय नहीं होगा। हम पूर्ण रूप से अपनी सारी उर्जा शिक्षण में नहीं लगा पाऐंगे। सबसे पहले तो यह देखना होगा कि आप अपने आपको इस शिक्षण व्यवसाय में कहाँ पाते हैं। आपके अभिरुचि और विचार क्या है। अगर आप व्यावसायिक मनोवृत्ति के न हो तो आपका कक्षा में व्यावहार ठीक नहीं होगा, आप ठीक से पढ़ा नहीं पाऐंगे और इस तरह आप छात्रों के प्रति न्याय नहीं कर पाऐंगे। सम्मान जनक व्यवसाय के लिए व्यावसायिक प्रतिबद्धता होना जरूरी है।
व्यावसायिक निष्ठा एक एैसा गुण है जो व्यक्ति अपने व्यावसाय एवं कार्य के प्रति रुचि, उत्साह एवं आत्मविश्वास का संचार करता है। साकारात्मक दृष्टिकोण ही व्यक्ति में व्यावसायिक निष्ठा, जवाबदेही आदि गुणों का पोषण करता है। निष्ठावान होना सफलता का राज है। शिक्षण व्यावसाय की साकारात्मक अभिव्यक्ति आप में आत्मविश्वास, स्वमूल्यांकन, नवीन, ज्ञान के प्रति उत्साह, कार्य सन्तुष्टि आदि गुणों का विकास करती है। 

शिक्षा को व्यावसाय से जोड़ना आज की स्थिति में बहुत ही आवश्यक है। शिक्षा को रोजगारोन्मुख होना पड़ेगा। सिर्फ किताब पढ़ने से काम नहीं चलेगा। आगे चलकर शिक्षा से रोजगार मिले, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ भाषा और लिपि का ज्ञान होना नहीं है। हमें आधुनिक समाज में जीना है। अतः आधुनिक सोच और खोजों के साथ चलकर रोजगार पाना है। व्यवसायिक शिक्षा का प्रयोग भारत में बहुत ही जोरों से चल रहा है। इसका लाभ भी विद्यार्थी को मिल रहा है। 
माध्यमिक शिक्षा का क्षेत्रा 14.18 वर्ष की आयु वर्ग के विद्यार्थी को उच्च शिक्षा के साथ-साथ काम-काज की दुनिया में दाखिल होने के लिए तैयार करता है। माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की संख्या वर्ष 1950.51 के 7416 से बढ़कर 1999.2000 में 116000 हो गई जिसमें विद्यार्थी नामांकन संख्या 28 मिलियन थी। छठे अखिल भारतीय शैक्षिण, सर्वेक्षण, 1993 ने यह दर्शाया कि वर्ष 1986 से 1993 की अवधि के दौरान छात्राओं के नामांकन में प्राथमिक चरण में 20 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक चरण में 40 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में कक्षा 9 से 10 में 51 प्रतिशत और कक्षा 11 से 12 में 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस क्षेत्रा में मुख्य ध्यान असमानताओं को कम करने, पाठ्यक्रम के नवीकरण, जिसमें व्यवसायीकरण तथा रोजगारोमुन्ख पाठ्यक्रमों पर जोर दिया गया हो मुक्त शिक्षण प्रणाली का विस्तार और नई सूचना एवं संचार प्रौद्योगियों विशेषकर कम्प्यूटरों के अधिक प्रयोग पर बल दिया जा रहा है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) स्कूली शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए शैक्षणिक और तकनीकी सहायता मुहैया कराती है। केन्द्रीय विद्यालय संगठन 871 केन्द्रीय विद्यालयों की प्रबंध व्यवस्था करता है और नवोदय विद्यालय नें मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में 410 संस्थाओं के जरिए ढ़ाचागत सुविधाओं के विस्तार, व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरु की हैं।

विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा के क्षेत्रा में प्रभावशाली वृद्धि हुई है। सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया गया है। विश्वविद्यालयों को विदेशों में परिसर खोलने की अनुमति दी गई है। सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, सभी स्तरों (स्नातकोत्तर और स्नातक) पर सभी उच्च शैक्षिक संस्थाओं में विदेशियों के लिए 15 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें रख सकती हैं। इन उपायों से न सिर्फ शिक्षा के स्तर में सुधार होगा बल्कि इससे यह व्यवस्था वैशिवक दृष्टि से अधिक प्रतिस्पर्धी भी बनेगी। महिलाओं, ग्रामीण इलाकों की शैक्षिक जरूरतों पर ध्यान देना तथा सेवा में आ चुके कर्मियों के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए भी मुफ्त विश्वविद्यालय प्रणाली प्रस्तुत किए गए पाठ्यक्रमों में विविधीकरण में एक और कदम है। संसाधनों पर दबाव की समस्या को देखेते हुए, संसाधनों के आंतरिक सृजन के लिए कुछ उपाय पहले ही शुरू किए जा चुके हैं। विश्वविद्यालय की फीस बढ़ाने के साथ-साथ भारत शिक्षा कोष जैसी निधियों/न्यासों के निर्माण में उद्योग और व्यक्तियों के अंशदान लिया जाना आवश्यक है। उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए, प्रयोक्ता प्रभारों की वसूली किया जाना अब अत्यधिक जरूरी हो गया है। 

देश की तकनीकी व्यवसायिक शिक्षा के उच्चकोटि की जनशक्ति सृजित करके आर्थिक और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस समय डिग्री स्तर के 1058 अनुमोदित इंजीनियरिंग काॅलेज और डिप्लोमा स्तर के 1231 काॅलेज हैं। इसके अलावा, 797 संस्थान मास्टर आॅफ कम्प्यूटर एप्लिकेशन्स (एमसीए) संबंधी विषय भी पढ़ाते हैं। एमबीए पाठ्यक्रमों की शिक्षा देने वाले 820 अनुमोदित प्रबन्ध संस्थान भी हैं। तकनीकी संस्थाओं और उद्योग के बीच मजबूत संबंध विकसित हो चुके हैं। महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी विकास मिशनों के जरिए, उद्योग-संस्था-संबंधों में 5 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थाओं में 7 सामान्य क्षेत्रों में तथा साथ ही भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर के साथ संबंधों में मजबूती आई है। तकनीकी शिक्षा को मजबूत बनाने तथा पाॅलिटेक्नीक से पास होने वाले विद्यार्थियों के स्तर में सुधार लाने के लिए विश्व बैंक की सहायता से राज्य क्षेत्रा की परियोजनाओं में तीन चरणों में बड़े पैमाने पर प्रयास किए जा रहे हैं। आगामी वर्षों में न सिर्फ सरकारी बल्कि निजी क्षेत्रों में भी तकनीकी और प्रबंध संस्थाओं की नेटवर्किंग के जरीए गुणवत्ता और प्रासंगिकता में सुधार लाने पर जोर दिया जाएगा। 

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