1784 का पिट का अधिनियम(संशोधन अधिनियम) - विविध तथ्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : 1784 का पिट का अधिनियम(संशोधन अधिनियम) - विविध तथ्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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संवैधानिक विकास
रेग्युलेटिंग ऐक्ट, 1773

  • इसके साथ भारतीय मामलों में अंग्रेजी संसदीय हस्तक्षेप का आरम्भ हुआ। इसके द्वारा भारत तथा इंग्लैंड में कंपनी के मामलों को नियंत्रित तथा नियमित करने का प्रयत्न हुआ।
  • सन् 1773 में कंपनी ने संसद से आर्थिक सहायता के लिए प्रस्ताव किया। इसके बाद लार्ड नार्थ ने 18 मई, 1773 को संसद में अपना प्रसिद्ध विधेयक प्रस्तुत किया, जो बाद में रेग्यूलेटिंग ऐक्ट कहलाया। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित यह रेग्यूलेटिंग एक्ट कंपनी के भारतीय प्रशासन पर संसदीय नियंत्रण की दिशा में प्रथम कदम था।
  • 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट के कारण -

(i) बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली के कारण उत्पन्न सांविधानिक गतिरोध के उपचार के लिए।
(ii) इंग्लैंड के शासक वर्ग को भय हुआ कि भारत से लौटने वाले कम्पनी के कर्मचारी इंग्लैंड के जन जीवन को भ्रष्ट न बना दें।
(iii) इंग्लैण्ड में कम्पनी के प्रशासनिक ढांचे में सुधार की आवश्यकता।
(iv) 1772 में कम्पनी के वित्तीय दिवालियेपन का भय, क्योंकि -
(a) कम्पनी के स्वामियों ने लाभांश 6% से 12.5% कर दिया।
(b) अंग्रेजों ने 1772 तक £ 4,00,000 वार्षिक प्राप्त किया।
(c) 1772 में कंपनी ने अंग्रेजी सरकार से 10 लाख पौंड ऋण मांगा।

  • रेग्यूलेटिंग ऐक्ट द्वारा कंपनी के व्यापार का एकाधिकर 20 वर्ष के लिए बढ़ाया गया। इस एक्ट द्वारा इंग्लैंड में भी परिवर्तन हुआ -

(i) कम्पनी के स्वामियों के अधिकरण के प्रभाव को कम करके निदेशकों के अधिकरण को अधिक शक्तिशाली बना दिया गया।
(ii) स्वामियों के अधिकरण में £ 1000 के भागीदार को ही मताधिकार मिला।
(iii) निदेशकों के अधिकरण में 24 निदेशक 4 वर्ष के लिए नियुक्त; 25: प्रतिवर्ष अवकाश ग्रहण करते।
(iv) कम्पनी को भारत प्रशासन से होने वाले समस्त पत्राचार की प्रतिलिपि अंग्रेजी सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करनी थी।

  • इस एक्ट से भारत में निम्नलिखित सुधार हुआ -

(i) बंगाल में गवर्नर-जनरल तथा 4 सदस्यीय परिषद् की नियुक्ति की गई।
(ii) परिषद् में बहुमत से निर्णय; गवर्नर-जनरल को निर्णायक मत का अधिकार।
(iii) कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना।
(iv) कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार की मनाही।

रेग्यूलेटिंग ऐक्ट का महत्व
(i) संसद द्वारा भारतीय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप आरम्भ हुआ।
(ii) कम्पनी अब व्यापारिक तथा राजनीतिक निकाय बनी।
(iii) इससे भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना के द्वार खुले।

1784 का पिट का अधिनियम
(संशोधन अधिनियम)

  • यह अधिनियम संशोधन अधिनियम था।
  • इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 में अन्तर्निहित गंभीर व्यवहारिक दोषों को दूर करना था।
  • 1773 के एक्ट के कारण उच्चतम न्यायालय और सर्वोच्च परिषद् के मध्य विवाद चरम सीमा पर पहुँच चुका था।
  • गवर्नर-जनरल की बंगाल की परिषद् की सदस्य संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई।

1786 का अधिनियम

  • गवर्नर-जनरल को यह अनुमति दी गई कि वह प्रधान सेनापति भी रह सकता है।
  • कार्नवालिस को व्यक्तिगत रूप से अपनी परिषद् के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार दे दिया गया।

चार्टर एक्ट, 1793

  • 1793 में कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को बीस वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
  • गृह सरकार के नियंत्रण बोर्ड में एक आयुक्त इस बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया गया।
  • गवर्नर-जनरल का बम्बई तथा मद्रास प्रेजिडेन्सियों पर नियंत्रण भी स्पष्ट कर दिया गया।
  • नियंत्रण अधिकरण के सदस्यों को वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा।

चार्टर ऐक्ट, 1813

  • इसके द्वारा कम्पनी का भारतीय व्यापार का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, यद्यपि उसका चीन के साथ व्यापार तथा चाय के व्यापार का एकाधिकार बना रहा। इन प्रतिबंधों के साथ भारत का व्यापार सभी अंग्रेजों के लिए खोल दिया गया।
  • कम्पनी का चार्टर 20 वर्ष के लिए पुन: बढ़ाया गया।
  • कम्पनी को एक लाख रुपया वार्षिक भारत में साहित्य तथा शिक्षा पर व्यय करने का आदेश दिया गया।
  • 1813 के चार्टर एक्ट लागू करने के निम्नलिखित कई कारण थे -

(i) वित्तीय कठिनाई।
(ii) 1812 की पाँचवीं रिपोर्ट में भिन्न-भिन्न सिफारिशें।
(iii) नेपोलियन की ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ के कारण अंग्रेजी व्यापारियों के लिए कठिनाइयाँ।
(iv) अंग्रेजी व्यापारियों द्वारा भारतीय व्यापार के रास्ते सबके लिए खोलने की माँग।

चार्टर एक्ट, 1833

  • इंग्लैंड में 1813 और 1833 के बीच औद्योगिक क्रांति ने मशीन युग का आरम्भ किया। इससे वस्तुओं के उत्पादन में बड़ी भारी क्रांति आ गई।
  • 1830 ई. म ह्निग (Whig) दल शक्ति में आया। यह सरकार उदारवादी नीति वाला था।
  • 1832 में ‘संसद सुधार एक्ट’ पारित किया गया।

गृह सरकार के विषय में प्रावधान
(i) कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार चीन तथा चाय के विषय में भी पूर्णतया समाप्त।
(ii) कम्पनी के चार्टर का बीस वर्ष के लिए नवीकरण।
(iii) कम्पनी को भारत का प्रशासन, अंग्रेजी क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में करना था।
(iv) कम्पनी को व्यापारिक कार्य शीघ्रातिशीघ्र बंद करने का आदेश।
(v) गवर्नर-जनरल द्वारा सभी कानून अब अधिनियम कहलाते जो कि पहले ;त्महनसंजपवदद्ध (विनियम) कहलाते थे।
(vi) इस अधिनियम से भारत में यूरोपीय लोगों को बसने, सम्पत्ति अधिग्रहण करने तथा व्यापार करने की पूर्ण स्वतंत्रता दे दी गई। इस धारा के अनुसार यूरोपीय लोगों के भारत में बसने पर लगे प्रतिबंध पूर्णरूप से हट गए।

  • इस अधिनियम से कम्पनी के भारत के प्रशासन में परिवर्तन -

(i) प्रशासन का केन्द्रीकरण।
(ii) बंगाल का गवर्नर-जनरल अब भारत का गवर्नर-जनरल बना दिया गया।
(iii) प्रशासन तथा वित्त की सभी शक्तियाँ सपरिषद् गवर्नर-जनरल के हाथ में दे दी गई।
(iv) समस्त कानूनों को संहिताबद्ध करने तथा सुधारने के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की गई (मैकाले के नेतृत्व में)। मैकाले इस पद (विधि आयोग के निदेशक) का प्रथम अधिकारी था।
(v) बंगाल की प्रेजिडेंसी दो भागों में बाँट दी गई:
(क) फोर्ट विलियम की प्रेजिडेन्सी।
(ख) आगरा की प्रेजिडेन्सी।
यह प्रावधान कभी कार्यान्वित नहीं किया गया।

अन्य धाराएँ

  • धारा संख्या 87 के अनुसार यह कहा गया कि किसी भी भारतीय अथवा क्राउन की भारतीय प्रजा को अपने धर्म, जन्म स्थान, वंशानुक्रम, वर्ग के आधार पर कम्पनी के अधीन किसी भी स्थान पर सेवा के अयोग्य नहीं माना जा सकेगा।
  • 1833 के एक्ट द्वारा भारत सरकार को आज्ञा दी गई कि दासों की अवस्था को सुधारने का प्रयत्न करें ताकि दासता समाप्त की जा सके।
  • 10 वर्ष बाद यानि 1843 के अधिनियम पाँच द्वारा में दास प्रथा समाप्त कर दी गई।

चार्टर एक्ट, 1853
प्रावधान

  • कंपनी के डायरेक्टरों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई जिसमें से छ: क्राउन द्वारा मनोनीत किए जाने थे।
  • नियंत्रण बोर्ड, उसके सचिव तथा अन्य पदाधिकारियों का वेतन तो अंग्रेजी संसद नियत करेगी परंतु भुगतान कम्पनी करेगी।
  • डायरेक्टरों को कोर्ट का संरक्षण प्राप्त।
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