CBSE Class 10  >  Class 10 Notes  >  संस्कृत कक्षा 10 (Sanskrit )  >  अनुवाद - सूक्तयः | Chapter Explanation

अनुवाद - सूक्तयः - Chapter Explanation

1. पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥1॥

शब्दार्थाः

बाल्ये - (बाल्ये वयसि)-बचपन में।
महत् - (बृहत्)-बड़ा।
उक्तिः - (कथनम्)-कथन।

हिंदी अनुवाद
पिता पुत्र को बचपन में विद्यारूपी बहुत बड़ा धन देता है। इससे पिता ने क्या तप किया? यह कथन ही उसकी कृतज्ञता है।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धिं/सन्धिविच्छेद
तपस्तेपे - तपः + तेपे (विसर्ग सन्धिः)।
पिताऽस्य - पिता + अस्य (दीर्घ सन्धिः)।
इत्युक्तिः - इति + उक्तिः (यण् सन्धिः)।

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः/विग्रहः - समासनामानि
विद्याधनम् - विद्या एव धनम् कर्मधारयः - कर्मधारयः
तस्य कृतज्ञता - तत्कृतज्ञता - षष्ठी तत्पुरुषः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
उक्तिः - वच् + क्तिन्
कृतज्ञता - कृतज्ञ + तल्

2. अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः॥2॥

शब्दार्थाः

चित्ते - (मनसि)-मन में।
समत्वम् - समानता।
वाचि - (वाण्याम्)-वाणी में।
तथ्यतः - (यथार्थरूपेण) वास्तव में।

हिंदी अनुवाद
मन में जैसी सरलता हो, वैसी ही यदि वाणी में हो, तो उसे ही महात्मा लोग वास्तव में समत्व कहते हैं।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धि / सन्धिविच्छेद
तदेवाहुः - तत् + एव (व्यञ्जन सन्धिः) + आहुः (दीर्घ सन्धिः)।
समत्वमिति - समत्त्वम् + इति (संयोगः)

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः / विग्रहः - समास नामानि
अवक्रता - न वक्रता - नञ् तत्पुरुषः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
अवक्रता - अवक्र + तल्
तथ्यतः - तथ्य + तसिल्
समत्वम् - सम + त्वं

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः॥3॥


शब्दार्थाः
परुषां - (कठोराम्)-कठोर को।
भुङ्क्ते - (खादति)-खाता है।
अभ्युदीरयेत् - (वदेत्)-बोलता है।
धर्मप्रदाम् - (धर्मयुक्ताम्)-धर्मनिष्ठ सत्य व मधुर वाणी को।

हिंदी अनुवाद
जो धर्मप्रद वाणी को छोड़कर कठोर वाणी बोले, वह मूर्ख (मानो) पके हुए फल को छोड़कर कच्चा फल खाता है।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धिं/सन्धिविच्छेदं
योऽभ्युदीरयेत् - यः + अभि (विसर्ग सन्धिः) + उदीरयेत् (यण् सन्धिः)।
भुङ्क्तेऽपक्वं - भुम् + क्ते (परसवर्ण सन्धिः) + अपक्वं (पूर्वरूप सन्धिः)।

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः/विग्रहः - समासः/विग्रहः
धर्मप्रदां - धर्म प्रददाति इति - उपपद तत्पुरुषः
न पक्वं - अपक्व - नञ् तत्पुरुषः
विमूढधीः - विमूढा धीः यस्य सः - बहुव्रीहिः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
त्यक्त्वा - त्यज् + क्त्वा
परित्यज्य - परि + त्यज् + ल्यप्
पक्वम् - पच् + क्त

4. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नामनी मते ॥4॥

शब्दार्थाः

चक्षुष्मन्तः - (नेत्रवन्तः)-आँखों वाले।
प्रकीर्तिताः - (कथिताः) कहे गए हैं।
वदने - (मुखे) चेहरे पर।
मते - (विचारे) विचार में।

हिंदी अनुवाद
इस संसार में विद्वान लोग ही आँखों वाले कहे गए हैं। दूसरों के (मूल् के) मुख पर जो आँखें हैं, वे तो केवल नाम की ही हैं।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धिं / सन्धिविच्छेद
विद्वांस एव - विद्वांसः + एव (विसर्ग सन्धिः)
लोकेऽस्मिन् - लोके + अस्मिन् (पूर्वरूपसन्धिः)

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृति + प्रत्ययः
चक्षुष्मन्तः - चक्षुष् + मतुप्।
प्रकीर्तिताः - प्र + कीर् + क्त।

5. यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः॥5॥

शब्दार्थाः

प्रोक्तम् - (कथितम्)-कहा गया है।
ईरितः - (कथित:)-कहा गया है।

हिंदी अनुवाद
जिस किसी के द्वारा भी जो कहा गया है, उसके वास्तविक अर्थ का निर्णय जिसके द्वारा किया जा सकता है, उसे विवेक कहा गया है।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धि / सन्धिविच्छेदं
प्रोक्तम् - प्र + उक्तम् (गुणसन्धिः)
केनापि - केन + अपि (दीर्घसन्धि:)
इतीरितः - इति + ईरितः (दीर्घसन्धिः)

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः / विग्रहः - समासनामानि
तत्त्वार्थनिर्णयः - तत्त्वार्थस्य निर्णयः - षष्ठी तत्पुरुषः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
कर्तुम् - कृ + तुमुन्
प्रोक्तम् - प्र + वच् + क्त
ईरितः - ईर् + क्त
शक्यः - शक् + यत्

6. वाक्पटुधैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते॥6॥

शब्दार्थाः

वाक्पटुः - (वाण्याम् निपुणः) बोलने में निपुण।
अकातरः - (भयरहित:)-निडर।
परिभूयते - (तिरस्क्रियते), अपमानित होता है।

हिंदी अनुवाद
जो मंत्री बोलने में चतुर, धैर्यवान् और सभा में भी निडर होता है वह शत्रुओं के द्वारा किसी भी प्रकार से अपमानित नहीं किया जा सकता है।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धिं/सन्धिविच्छेद
वाक्यपटुधैर्यवान् - वाक्पटुः + धैर्यवान् (विसर्ग सन्धिः)
स केनापि - सः + केनापि (विसर्ग सन्धिः)
अप्यकातरः - अपि + अकातरः (यण् सन्धिः)
परैर्न - परैः + न (विसर्ग सन्धिः)
केन + अपि - केनापि (दीर्घ सन्धिः)

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः/विग्रह - समासनामानि
वाक्पटुः - वाचि पटुः - सप्तमी तत्पुरुषः
अकातरः - न कातर: - नञ् तत्पुरुषः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
धैर्यवान् - धैर्य + मतुप्
मन्त्री - मन्त्र + इन्

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्यादहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च॥7॥

शब्दार्थाः

श्रेयः - (कल्याणम्)-कल्याण।
अहितं - (हितरहितम्)-बुरा।

हिंदी अनुवाद
जो (मनुष्य) अपना कल्याण और बहुत अधिक सुख चाहता है, उसे दूसरों के लिए कभी अहितकारी कार्य नहीं करना चाहिए।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धि / सन्धिविच्छेदं
इच्छत्यात्मनः - इच्छति + आत्मनः (यण् सन्धिः)
कुर्यादहितं - कुर्यात् + अहितं (जशत्व सन्धिः)
कदा + अपि - कदापि (दीर्घ सन्धिः)

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः / विग्रह - समासनामानि
अहित - न हितम् - नञ् तत्पुरुषः
आत्मनः श्रेयः - आत्मश्रेयः - षष्ठी तत्पुरुषः

8. आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥8॥

शब्दार्थाः

आचारः - (सदाचारः) अच्छा आचरण।
विशेषतः - विशेषरूप से।
वचः - (उक्तिः), कथन।

हिंदी अनुवाद
आचरण (मनुष्य का) पहला धर्म है, यह विद्वानों का वचन है। इसलिए सदाचार की रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए।

सन्धिः-विच्छेदो वा
पदानि - सन्धि/सन्धिविच्छेदं
प्रथमो धर्मः - प्रथमः + धर्मः (विसर्ग सन्धिः)
इत्येतद् - इति + एतद् (यण सन्धिः)
सदाचारम् - सत् + आचरम् (व्यंजन सन्धिः)
प्राणेभ्योऽपि - प्राणेभ्यो + अपि (पूर्वरूप सन्धिः)

समासो-विग्रहो वा
पदानि - समासः/विग्रह - समास नामानि
विदुषां वचः - विद्वद्वचः - षष्ठी तत्पुरुषः
शोभनम् आचारम् - सदाचारम् - कर्मधारयः

प्रकृति-प्रत्ययोः विभाजनम्
पदानि - प्रकृतिः + प्रत्ययः
विशेषतः - विशेष + तसिल्

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FAQs on अनुवाद - सूक्तयः - Chapter Explanation

1. सूक्तयः क्या हैं?
Ans. सूक्तयः वेदों में एक प्रकार की रचनाएँ हैं जो छंद और मन्त्रों के समूह के रूप में संग्रहित होती हैं। ये सूक्तयः वैदिक संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और धार्मिक और आध्यात्मिक संदेशों को समर्पित की जाती हैं।
2. सूक्तयः कितने प्रकार की होती हैं?
Ans. सूक्तयः दो प्रकार की होती हैं - सूक्तानि और अरण्यानि। सूक्तानि विविध देवताओं को समर्पित होती हैं और यज्ञ और अनुष्ठानों के दौरान पठने के लिए उपयोगी होती हैं। अरण्यानि वनस्पतियों, प्राणियों और प्रकृति को समर्पित होती हैं और वनस्पतियों के संरक्षण और प्रकृति के महत्व पर बल देने के लिए प्रयोग की जाती हैं।
3. सूक्तयः किस भाषा में लिखी जाती हैं?
Ans. सूक्तयः संस्कृत भाषा में लिखी जाती हैं। संस्कृत वेदों की मूल भाषा होती है और इसे वैदिक संस्कृति का भी कहा जाता है।
4. सूक्तयः की प्रमुखता क्या हैं?
Ans. सूक्तयः की प्रमुखता उनके धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व का उद्घाटन करना है। ये सूक्तयः विभिन्न देवताओं को समर्पित होती हैं और उनके द्वारा व्यक्त किए गए धार्मिक और आध्यात्मिक संदेशों को लोगों तक पहुंचाने का कार्य करती हैं।
5. सूक्तयः के क्या महत्व हैं?
Ans. सूक्तयः का महत्व इसके माध्यम से वेदों में व्यक्त किए गए संदेशों को संरक्षित रखना है। ये संदेश धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ावा देते हैं और मनुष्यों को उनके धार्मिक संस्कृति के साथ जोड़ते हैं। सूक्तयः आध्यात्मिकता, ईश्वरीयता और प्रकृति के महत्व को प्रशंसा करती हैं।
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