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राष्ट्रीय एकता

"भारत की संस्कृति अपने जन्मकाल से ही विभिन्न जातियों के सामूहिक योगदान का परिणाम है। अपने देश की| इस संस्कृति से प्रेम न होना अथवा पारस्परिक भेदभाव रखना राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वाधिक घातक है।"

रामधारीसिंह 'दिनकर' रूपरेखा

  • राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय,
  • राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता,
  • राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ : कारण और निवारण-
    (क) साम्प्रदायिकता,
    (ख) भाषागत विवाद,
    (ग) प्रान्तीयता या प्रादेशिकता की भावना,
  • राष्ट्रीय एकता की दिशा में हमारे प्रयास,
  • उपसंहार।

राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय

राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय है-सम्पूर्ण भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक एकता। हमारे कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, खान-पान, रहन-सहन और वेशभूषा में अन्तर हो सकता है, किन्तु हमारे राजनैतिक और वैचारिक दृष्टिकोण में प्रत्येक दृष्टि से एकता की भावना दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है।

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता

राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति, सुव्यवस्था और बाहरी शत्रुओं से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए तो हमारी पारस्परिक फूट का लाभ उठाकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे।
राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता

अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में बोलते हुए भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कहा था-"जब-जब भी हम असंगठित हुए, हमें आर्थिक और राजनैतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी। जब-जब भी विचारों में संकीर्णता आई, आपस में झगड़े हुए। जब कभी भी नए विचारों से अपना मुख मोड़ा, हानि ही हुई और हम विदेशी शासन के अधीन हो गए।"

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ: कारण और निवारण

राष्ट्रीय एकता की भावना का अर्थ मात्र यही नहीं है कि हम एक राष्ट्र से सम्बद्ध हैं। राष्ट्रीय एकता के लिए एक-दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना भी आवश्यक है। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के पश्चात् हमने सोचा था कि अब पारस्परिक भेदभाव की खाई पट जाएगी, किन्तु साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता, अज्ञानता और भाषागत अनेकता ने आज भी पूरे देश को आक्रान्त कर रखा है।

राष्ट्रीय एकता को छिन्न-भिन्न कर देनेवाले कारकों को जानना आवश्यक है, जिससे उनको दूर करने का प्रयास किया जा सके। इसके कारण और निवारण निम्नलिखित हैं-
(क) साम्प्रदायिकता:
राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा साम्प्रदायिकता की भावना है। साम्प्रदायिकता एक ऐसी बुराई है, जो मानव-मानव में फूट डालती है, दो दोस्तों के बीच घृणा और भेद की दीवार खड़ी करती है, भाई को भाई से अलग करती है और अन्त में समाज के टुकड़े कर देती है। दुर्भाग्य से इस रोग को समाप्त करने के लिए जितना अधिक प्रयास किया गया है, यह रोग उतना ही अधिक बढ़ता गया है। स्वार्थ में लिप्त राजनीतिज्ञ सम्प्रदाय के नाम पर भोले-भाले लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे रहे हैं; परिणामत: देश का वातावरण विषाक्त होता जा रहा है।
यदि राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधे रखना है तो साम्प्रदायिक विद्वेष, स्पर्धा, ईर्ष्या आदि राष्ट्र-विरोधी भावों को अपने मन से दूर रखना होगा और देश में साम्प्रदायिक सद्भाव जाग्रत करना होगा। साम्प्रदायिक सद्भाव से तात्पर्य यह है कि हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध आदि सभी मतावलम्बी भारतभूमि को अपनी मातृभूमि के रूप में सम्मान देते हुए परस्पर स्नेह और सद्भाव के साथ रहें। यह राष्ट्रीयता के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।
राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ: कारण और निवारणउर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल ने धार्मिक और साम्प्रदायिक एकता की दृष्टि से अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा था:मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा॥
धार्मिक एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने धर्म-ग्रन्थों के वास्तविक सन्देश को समझें, उनके स्वार्थपूर्ण अर्थ न निकालें। विभिन्न धर्मों के आदर्श सन्देशों को संगृहीत किया जाए। प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में उनके अध्ययन की विधिवत् व्यवस्था की जाए, जिससे भावी पीढ़ी उन्हें अपने आचरण में उतार सके और संसार के समक्ष ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर सके कि वह सभी धर्मों और सम्प्रदायों को महान् मानती है एवं उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है।

(ख) भाषागत विवाद:
भारत बहुभाषी राष्ट्र है। देश के विभिन्न प्रान्तों की अलग-अलग बोलियाँ और भाषाएँ हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा और उस भाषा पर आधारित साहित्य को ही श्रेष्ठ मानता है। इससे भाषा पर आधारित विवाद खड़े हो जाते हैं तथा राष्ट्र की अखण्डता भंग होने के खतरे बढ़ जाते हैं।
यदि कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा के मोह के कारण दूसरी भाषा का अपमान या उसकी अवहेलना करता है तो वह राष्ट्रीय एकता पर ही प्रहार करता है। होना तो यह चाहिए कि अपनी मातृभाषा को सीखने के बाद हम संविधान में स्वीकृत अन्य प्रादेशिक भाषाओं को भी सीखें तथा राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास में सहयोग प्रदान करें।
(ग) प्रान्तीयता या प्रादेशिकता की भावना:
प्रान्तीयता या प्रादेशिकता की भावना भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। राष्ट्र एक सम्पूर्ण इकाई है। कभी-कभी यदि किसी अंचल -विशेष के निवासी अपने पृथक् अस्तित्व की माँग करते हैं तो राष्ट्रीयता की परिभाषा को सही रूप में न समझने के कारण ही वे ऐसा करते हैं। इस प्रकार की माँग करने से राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का विचार ही समाप्त हो जाता है।
भारत के सभी प्रान्त राष्ट्रीयता के सूत्र में आबद्ध हैं; अत: उनमें अलगाव सम्भव नहीं है। राष्ट्रीय एकता के इस प्रमुख तत्त्व को दृष्टि से ओझल नहीं होने देना चाहिए।

राष्ट्रीय एकता की दिशा में हमारे प्रयास


हमारे देश के विचारक, साहित्यकार, दार्शनिक एवं समाज-सुधारक अपनी-अपनी सीमाओं में निरन्तर इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि देश में भाईचारे और सद्भावना का वातावरण बने, अलगाव की भावनाएँ, पारस्परिक तनाव और विद्वेष की दीवारें समाप्त हों। फिर भी इस आग में कभी पंजाब सुलग उठता है, कभी बिहार, कभी महाराष्ट्र, कभी गुजरात तो कभी उत्तर प्रदेश।

'अप्रिय घटनाओं की पुनरावृत्ति हमें इस बात का संकेत देती है कि हम टकराव और बिखराव पैदा करनेवाले तत्त्वों को रोक पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल राष्ट्रनेताओं अथवा प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर पर ही नहीं हो सकता, वरन् इसके लिए हम सबको मिल-जुलकर प्रयास करने होंगे।

उपसंहार

संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है और इस भावना को उत्पन्न करने के लिए हमें स्वयं को सबसे पहले मनुष्य समझना होगा। मनुष्य एवं मनुष्य में असमानता की भावना ही संसार में समस्त विद्वेष एवं विवाद का कारण है। इसलिए जब तक हममें मानवीयता की भावना का विकास नहीं होता, तब तक मात्र उपदेशों, भाषणों एवं राष्ट्र-गीत के माध्यम से ही राष्ट्रीय एकता का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता।
The document राष्ट्रीय एकता is a part of the Class 9 Course Hindi Class 9 (Sparsh and Sanchayan).
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