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निबंध- 11

वन रहेंगे हम रहेंगे

संकेत बिंदु:

  • प्रस्तावना
  • वनों के विभिन्न लाभ
  • हमारा दायित्व
  • वनों से प्राकृतिक संतुलन
  • नगरीकरण का प्रभाव
  • उपसंहार

प्रस्तावना: वनों के साथ मनुष्य का संबंध बहुत पुराना है। आदिमानव वनों की गोद में ही पला-बढ़ा है और अपना जीवन उन्हीं वनों में व्यतीत किया है। वन मानव के लिए प्रकृति प्रदत्त अनुपम वरदान है। वन मनुष्य की विविध आवश्यकताओं को विविध रूपों में पूरा करते हैं। सच तो यह है कि वनों के बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

वनों से प्राकतिक संतुलन: वन शिव की भाँति परोपकारी होते हैं। वे जहरीली गैसों का पानकर जीवनदायी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, जिससे प्राणियों को जीवन मिलता है। धरती पर निरंतर बढ़ते कल-कारखाने और उनसे निकलता धुआँ, मोटर-गाड़ियों का ज़हरीला धुआँ तथा मनुष्य के विभिन्न क्रियाकलापों से कार्बन डाई ऑक्साइड और सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी गैसों के कारण वायुमंडल विषाक्त हो जाता है। उससे ऑक्सीजन की मात्रा घटती जाती है पर पेड़-पौधे इस दूषित हवा का अवशोषण कर शुद्ध हवा देकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।

वनों के विभिन्न लाभ: वनों से मनुष्य को इतने लाभ हैं कि उनका आकलन सरल नहीं है।
वनों के लाभों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:

  • प्रत्यक्ष लाभ: वन मनुष्य को फल-फूल, इमारती लकड़ी और जलावनी लकड़ी, गोद, शहद, पत्तियाँ, जानवरों के लिए चारा और छाया देते हैं। इनसे हमारे उद्योग-धंधों को मज़बूत आधार मिलता है। बहुत से उद्योगों के लिए कच्चा माल इन्हीं वनों से मिलता है। कागज़, प्लाइवुड, रेशम, दियासलाई अगरबत्ती जैसे उद्योगों का आधार वन हैं।
  • अप्रत्यक्ष लाभ: वनों से अनेक ऐसे लाभ हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते हैं। वन सभी प्राणियों के लिए जीवनदायी ऑक्सीजन देते हैं जिसके मूल्य का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। इसके अलावा वन पशु-पक्षियों को आश्रय एवं भोजन उपलब्ध कराते हैं। वन एक ओर वर्षा लाने में सहायक हैं तो दूसरी ओर मिट्टी का कटाव रोककर मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनाए रखते हैं। इस मिट्टी को बहकर नदियों में जाने से रोककर वृक्ष बाढ़ रोकने में भी मदद करते हैं। इसके अलावा वन धरा का शृंगार हैं जो अपनी हरियाली से उसकी सुंदरता में वृद्धि करते हैं।

नगरीकरण का प्रभाव: दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती जनसंख्या और उसकी आवश्यकता की सर्वाधिक मार वनों पर पड़ी है। मनुष्य ने अपनी बढ़ती आवासीय आवश्यकता के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई की है। इसके अलावा उद्योगों की स्थापना से वन विनाश बढ़ा है। इससे सबसे अधिक बुरा असर शहरों और महानगरों पर पड़ा है जहाँ अब साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा दुर्लभ हो गई है। इन उद्योगों और कल-कारखानों की चिमनियों से निकला धुआँ न केवल मनुष्य के लिए बल्कि वनों की वृद्धि में बाधक सिद्ध होती है। वनों की कटाई करते हुए मनुष्य यह भी भूल जाता है कि वनों का विनाश करके वह अपना विनाश करने पर तुला है।

हमारा दायित्व: वनों का विनाश रोककर ही मनुष्यता का विनाश रोका जा सकता है। ऐसे में मनुष्य का यह पहला दायित्व बनता है कि यदि वह अपनी ज़रूरत के लिए एक पेड़ काटता है तो उसकी जगह चार नए पौधे लगाए और पेड़ बनने तक उनकी देखभाल करे। अब वह समय आ गया है कि त्योहारों, जन्मदिन, विवाह या अन्य मांगलिक अवसरों पर पेड़ लगाएँ जाएँ और उनका संरक्षण किया जाए। वनों को बचाने के लिए अब पुनः एक बार 'चिपको आंदोलन' जैसा ही आंदोलन एवं जन जागरण चलाकर इन्हें कटने से बचाने का प्रयास करना चाहिए। सड़कों को चौड़ा करने और मेट्रो रेल जैसी नई परियोजना को पूरा करते समय जितने पेड़ काटे जाएँ उनके दूने पेड़ लगाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।

उपसंहार: वन प्राणियों के लिए वरदान हैं। इस वरदान को बनाए रखने की बहुत आवश्यकता है। वनों के सहारे ही पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन संभव है। भरपूर वर्षा, धरती पर हरियाली और उसकी उर्वराशक्ति बनाए रखने के लिए वनों का होना आवश्यक है। हमें वनों के संरक्षण का हर संभव प्रयास करना चाहिए, क्योंकि वनों के बिना पृथ्वी पर जीवन न बचेगा। आइए हम सभी प्रतिवर्ष एक से अधिक पेड़ लगाने की प्रतिज्ञा करते हैं।

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