
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में हुआ। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति एक कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार और हास्य-व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं।

उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने (निबंध संग्रह), अश्रुदल, शतदल (काव्य), झलमला, त्रिवेणी (कहानी संग्रह), विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य (आलोचना)। उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया। सन् 1971 में उनका निधन हो गया।
'क्या लिखूँ?' निबंध में पद्मलाल पुन्नालाल बख्शी जी अपने अनुभव के माध्यम से निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया को बहुत मजेदार ढंग से बताते हैं।
लेखक कहते हैं कि आज उन्हें लिखना ही पड़ेगा क्योंकि नमिता ने 'दूर के ढोल सुहावने' विषय पर और अमिता ने 'समाज-सुधार' विषय पर आदर्श निबंध लिखने को कहा है। दोनों विषय परीक्षा में पहले भी आ चुके हैं।
सबसे पहले वे अंग्रेजी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर का कथन याद करते हैं कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है-जब मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति और मस्तिष्क में आवेग उठता है। उस समय कोई भी विषय उपयुक्त लगता है। लेकिन लेखक स्वीकार करते हैं कि उनके साथ ऐसा नहीं होता। उन्हें सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है।
फिर वे निबंधशास्त्र के आचार्यों के विचार पढ़ते हैं। आचार्य कहते हैं-
लेखक को इन सिद्धांतों को लागू करने में बहुत कठिनाई होती है। रूपरेखा बनाने में दिक्कत होती है। वे सोचते हैं कि मानटेन की पद्धति अपनाएँ-जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को लिखना ही स्वच्छंद और सच्चा निबंध होता है।
अंत में वे अमीर खुसरो की प्रसिद्ध कहानी याद करते हैं जिसमें चार औरतों की चार अलग-अलग इच्छाओं को एक ही पद्य में पूरा कर दिया गया था। लेखक भी उसी तरह दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ देते हैं।
फिर वे सुंदर ढंग से दोनों विषयों को मिलाकर निबंध लिखते हैं:
इस प्रकार लेखक दोनों विषयों को एक साथ समेट लेते हैं और पाठक को निबंध लिखने की कला भी सिखा देते हैं।
इस निबंध का मुख्य संदेश है कि निबंध लिखना कोई कठिन नियम-कानून का खेल नहीं है। इसमें सबसे जरूरी है लेखक का अपना सच्चा अनुभव, भाव और उल्लास। सिद्धांतों का पालन जरूरी है, लेकिन सख्ती से नहीं।
लेखक हास्य और आत्मीय शैली से बताते हैं कि-
पाठक को प्रेरणा मिलती है कि निबंध लिखते समय अपनी सच्ची भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें, नियमों को सहायक बनाएँ, बंधन नहीं।
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