
शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं - साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह), मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त)।

उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' तथा 'साहित्य भूषण सम्मान', मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान' तथा 'श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 2022 में उनका निधन हो गया।
'संवादहीन' कहानी एक अकेली वृद्धा ताई और उनके पालतू पहाड़ी तोते मिट्ठू की ममता भरी दोस्ती की कहानी है।
ताई के बड़े घर में पहले पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर और गाय-ढोर सब कुछ था, लेकिन धीरे-धीरे पूरा परिवार शहरों में पलायन कर गया। बेटियाँ अपनी गृहस्थी में रम गईं। खेती-बाड़ी बंद हो गई तो नौकर-चाकर भी चले गए। ताई अकेली रह गईं। सूने खंडहर जैसे घर में उनकी भाँय-भाँय उन्हें काटने को दौड़ती थी।
गनपत ने ताई के सूनेपन को सहारा देने के लिए एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता मिट्ठू लाकर दे दिया। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वे अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं, रोटी बचाकर रखतीं। मिट्ठू कुशाग्र बुद्धि का था। ताई जो कुछ पढ़ाती, वह हू-ब-हू दुहरा देता। सुबह 'हर हर गंगे! सीताराम बोल!' कहकर ताई को जगाता, ताई के 'अब कैसे कटेगी?' का जवाब 'कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!' देकर दिलासा देता। दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद होता, कभी नोक-झोंक भी। पूरा गाँव मिट्ठू को देखने आता और घर गुलजार हो जाता।
एक बार ताई कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाना चाहती हैं। मिट्ठू को साथ ले जाना संभव नहीं था, इसलिए जगन मास्टर की घरवाली ने ताई के लौटने तक मिट्ठू को रखने की जिम्मेदारी ली। विदाई के समय ताई रोती रहीं और मिट्ठू 'हर हर गंगे', 'राम राम सीताराम' कहकर उन्हें भरोसा देता रहा।
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। बंद पिंजड़े में मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती थी। उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। मिट्ठू पहले तो बाहर नहीं आया, लेकिन धीरे-धीरे दाना चुगता हुआ बाहर निकला। फिर एक दिन उसकी नजर खुले रोशनदान पर पड़ी और वह उड़ गया। जगन मास्टर उसे पकड़ने के लिए पेड़-पेड़ पर दौड़े, लेकिन मिट्ठू आजाद हो चुका था।
गाँववालों को डर था कि ताई को यह सच पता चलने पर सदमा लगेगा। गनपत ने मिट्ठू जैसा ही एक दूसरा तोता लाकर रख दिया। जगन मास्टर ने नए तोते को 'राम राम सीताराम', 'हर हर गंगे' रटवाने की कोशिश की।
कुंभ से लौटकर ताई सीधे जगन मास्टर के घर पहुँचीं। वे सोच रही थीं कि मिट्ठू उन्हें देखते ही कूद-फाँद मचाएगा और 'राम राम सीताराम' की रट लगाएगा। लेकिन मिट्ठू चुपचाप इधर-उधर ताकता रहा। ताई उसे पुकारती रहीं, पर कोई जवाब नहीं मिला। ताई के सूनेपन का साथी अब किन अमराइयों में घूम रहा था, कोई नहीं जानता था।
कहानी 'संवादहीन' का मुख्य संदेश है कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विसंगति अकेलापन है। पलायन ने गाँवों को सूना कर दिया है। परिवार के सदस्य शहरों में चले गए, लेकिन बुजुर्गों का सूना घर और सूना मन छोड़ गए। मिट्ठू ताई के लिए मात्र तोता नहीं, संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र था। मनुष्य और पशु-पक्षी के बीच का यह प्रेमपूर्ण संबंध बताता है कि संवाद ही जीवन का आधार है। जब संवाद टूट जाता है, तब जीवन 'संवादहीन' हो जाता है।
जगन मास्टर द्वारा मिट्ठू को आजादी देना स्वतंत्रता की चाह को दर्शाता है, जबकि ताई का मिट्ठू के प्रति लगाव ममता और सहारे की जरूरत को। कहानी समकालीन यथार्थ की विसंगतियों-पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व-को बहुत संवेदनशीलता से उभारती है। शीर्षक 'संवादहीन' सबसे अधिक ताई के अंतिम सूनेपन के लिए सार्थक है। अंत में ताई फिर अकेली रह जाती हैं-संवादहीन।
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