
यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। कविता, संगीत और अन्य ललित कलाओं के साथ-साथ समाज और संस्कृति के विविध क्षेत्रों में उनकी गहरी रुचि है।
उनके तीन प्रमुख काव्य-संग्रह हैं - यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, और ड्योढ़ी पर आलाप। उन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन पर गिरिजा नामक पुस्तक भी लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि 'द्विजदेव' की ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन किया। वे आजकल स्वतंत्र लेखन और अर्धवार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।
यह पाठ एक साक्षात्कार (Interview) है जिसमें यतींद्र मिश्र ने भारत रत्न लता मंगेशकर से उनके जीवन, संगीत, परिवार, त्योहारों और यादों के बारे में बातचीत की है। लता मंगेशकर को 'मेरी आवाज ही पहचान है' - इस उक्ति से जाना जाता है। उन्होंने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत को समर्पित रहीं।
लता जी बताती हैं कि उनके पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर बहुत अनुशासनप्रिय थे। जब बच्चे शरारत करते थे, तो वे बिना कुछ बोले बस गंभीरता से देखते थे - और उसी से बच्चों का रोना शुरू हो जाता था। यह उनके "आग्नेय" व्यक्तित्व का असर था।
पिताजी की ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे से रात दो-तीन बजे तक चलते थे क्योंकि एक नाटक में पाँच अंक होते थे और लंबी रागदारी गायन की भी परंपरा थी। पिताजी माइक पर थोड़ी तेज आवाज में गाते थे और एक राग गाते समय उसमें सुर बदलकर नए राग में जाते और फिर वापस आते - यह उनकी विशेषता थी।
लता जी कहती हैं कि पिताजी से सबसे बड़ी सीख मिली - स्वाभिमान से जीना। उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं पसारा। यही संस्कार उनकी माँ में भी था। यह स्वाभिमान उनके पूरे जीवन में काम आया।
बचपन में सभी भाई-बहन मिलकर फ़िल्मों की नकल उतारते थे। 'संत तुकाराम' फ़िल्म का विशेष स्मरण है - जहाँ लता कमरे में गद्दे-तकिये की ऊँचाई बनाकर उस पर बैठकर तुकाराम के स्वर्ग जाने का गाना गाती थीं और नीचे बाकी भाई-बहन रोते थे। पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फ़िल्मों के अलावा दूसरी फ़िल्में नहीं देखने देते थे, इसलिए यह सब चोरी-चोरी होता था।
लता जी बताती हैं कि उन्होंने शुरुआत में छह-सात फ़िल्मों में अभिनय भी किया था, लेकिन मेकअप और कैमरे के सामने खड़े होना उन्हें पसंद नहीं था। उनका मन हमेशा सिर्फ गाने में रहा।
उनकी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में पूरा दिन बीत जाता था। उन्हें अपने गाने और परिवार के अलावा किसी चीज की चिंता नहीं थी। उनका एकमात्र लक्ष्य था - अधिक से अधिक गाना रेकॉर्ड करना और परिवार की जरूरतें पूरी करना।
यतींद्र मिश्र ने एक रोचक प्रश्न पूछा - यदि 1949-50 में ए.आर. रहमान, जतिन-ललित जैसे संगीतकार होते तो गाने कैसे बनते? लता जी ने हँसते हुए कहा कि यह बताना मुश्किल है, लेकिन तय है कि कुछ बहुत अलग होता। उन्होंने यह भी कहा कि पुराने संगीतकारों ने सीमित तकनीक में जो काम किया, वह अद्भुत था।
लता जी का मानना है कि संगीत में असीम शक्ति है। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर के एक कंसर्ट का उल्लेख किया - जब अली अकबर खाँ इतने सुर में बजा रहे थे कि सरोद का तार टूट गया। अली अकबर खाँ ने तब कहा - "बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।" इससे लता जी को लगा कि संगीत की सीमा अनंत है।
लता जी ने बताया कि उनके घर में होली की परंपरा थोड़ी अलग थी। वे 'गुड़वड़' परंपरा निभाते थे - होलिका दहन की राख एक-दूसरे पर डालना। रंग-पंचमी पर माँ-पिताजी केसर का पानी छिड़कते थे।
नवरात्रि उनके यहाँ 'गुड़ी पड़वा' से शुरू होती थी। घर के बाहर 'गुड़ी' बाँधते थे और कलश स्थापना होती थी। महाराष्ट्र में यह त्योहार राम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है, न कि दुर्गा की आराधना में - जैसा उत्तर प्रदेश और राजस्थान में होता है।
दीवाली पर लता जी पचास के दशक में तड़के पाँच बजे नहा-धोकर सभी संगीतकारों के घर मिठाई लेकर जाती थीं। नौशाद साहब के घर उन्हें इतनी सुबह देखकर नौशाद साहब डर गए थे, फिर बाद में लाड़ से बोले - "तुम हमारी धुनों में मिठास घोलती हो।"
लता जी के कोरस की लड़कियों के साथ बहुत आत्मीय संबंध थे। वे सब उनके घर जैसी थीं। रेकॉर्डिंग के समय स्टूडियो में कुर्सियाँ न होने पर सभी मिलकर जमीन पर बैठती थीं।
जब यतींद्र मिश्र ने कहा कि लता जी अमर हैं, तो उन्होंने विनम्रता से कहा - "मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।" उन्होंने मराठी कहावत उद्धृत की - 'गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन' - अर्थात गाँव बह जाता है लेकिन नाम रह जाता है। उनकी सबसे बड़ी खुशी यह थी कि उन्होंने अपने पिता का नाम आगे बढ़ाया।
इस पाठ का मुख्य संदेश है कि जीवन में सफलता पाने के लिए कठिन परिश्रम, अनुशासन और समर्पण आवश्यक है। लता मंगेशकर का जीवन यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची कला वही है जिसमें भावनाएँ और आत्मा हो। यह पाठ हमें यह भी बताता है कि आधुनिकता और तकनीक के बावजूद, मूल भावनाएँ और सादगी ही किसी कला की असली पहचान होती हैं।
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