
इस पाठ के लेखक जगदीशचंद्र माथुर हैं। इनका जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। वे भारतीय सिविल सेवा में चयनित हुए और बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव जैसे उच्च पदों पर कार्य किया। प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ वे आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।

प्रयाग में पढ़ते समय उन्होंने लेखन शुरू किया। चाँद और रूपाभ जैसी पत्रिकाओं में उनके एकांकी-नाटक प्रकाशित होने लगे। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने सामाजिक समस्याओं (विवाह-प्रथा, स्त्री-शिक्षा, रूढ़िवादिता) पर आधारित एकांकी लिखे। प्रमुख कृतियाँ-भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया आदि। कोणार्क उनका सबसे चर्चित नाटक है। सन् 1978 में उनका निधन हो गया।
'रीढ़ की हड्डी' एकांकी 1939 में लिखा गया। इसमें लेखक ने विवाह-प्रथा, स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िगत सोच और लड़कियों को "बिक्री की वस्तु" समझने वाली मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया है।
'रीढ़ की हड्डी' एक व्यंग्यात्मक सामाजिक एकांकी है जो 1939 में लिखा गया। रामस्वरूप (बाबू) अपनी बेटी उमा का रिश्ता तय करने के लिए घर में खास तैयारी कर रहे हैं। लड़के वाले गोपालप्रसाद (वकील) और उनका बेटा शंकर (मेडिकल कॉलेज का छात्र) आने वाले हैं। रामस्वरूप ने गोपालप्रसाद से झूठ बोला है कि उमा सिर्फ मैट्रिक पास है, जबकि वह बी.ए. पास है।
रामस्वरूप और उनकी पत्नी प्रेमा बहुत घबराए हुए हैं। प्रेमा उमा को "सिर चढ़ा" और "मुँह फुलाए" समझती है। वह कहती है - "मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।" रामस्वरूप भी उमा को चुपचाप तैयार करने की कोशिश करते हैं और प्रेमा को चेतावनी देते हैं कि लड़के वालों के सामने पढ़ाई का जिक्र न करे। घर में तख्त बिछाया जाता है, चद्दर बिछाई जाती है, हारमोनियम और सितार तैयार किया जाता है। रतन (घरेलू सहायक) को मक्खन लाने भेजा जाता है।
गोपालप्रसाद और शंकर आते हैं। दोनों पिता पुराने जमाने की तारीफ करते हैं। गोपालप्रसाद कहते हैं कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाई नहीं करनी चाहिए, वरना वे "मेम-साहब" बन जाती हैं, राजनीति पर बहस करने लगती हैं और गृहस्थी बिगाड़ देती हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं - "हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए... हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए।" शंकर चुपचाप बैठा रहता है। दोनों पिता "खूबसूरती पर टैक्स" जैसे मजाक भी करते हैं।
उमा पान की तश्तरी लेकर आती है। उसके चेहरे पर चश्मा देखकर गोपालप्रसाद चौंक जाते हैं। रामस्वरूप झूठ बोलते हैं कि आँखें दुखने से चश्मा लगा है। उमा को सितार पर मीरा का भजन "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई" गाने को कहा जाता है। उमा गाती है, लेकिन बीच में शंकर की आँखों से मिलकर रुक जाती है। गोपालप्रसाद उसे पेंटिंग, सिलाई, इनाम आदि के बारे में पूछते हैं। उमा चुप रहती है।
जब रामस्वरूप बार-बार जवाब देने को कहते हैं तो उमा फट पड़ती है। वह तीखे शब्दों में कहती है - "जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है। पसंद आ गई तो अच्छा है, वरना..." वह लड़कियों को "भेड़-बकरियाँ" समझने वाली विवाह-प्रथा की निंदा करती है और पूछती है - "क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनकी चोट नहीं लगती?"
फिर उमा शंकर पर सीधा आरोप लगाती है - "इनसे ज़रा पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से कैसे भगाए गए थे!" गोपालप्रसाद क्रोध में भर जाते हैं। उन्हें पता चलता है कि उमा बी.ए. पास है। वे "बी.ए. पास! उफ्फोह! गजब हो जाता!" कहकर छड़ी लेकर चले जाते हैं।
उमा उनसे व्यंग्य करती हुई कहती है - "जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए! लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं - यानी बैकबोन, बैकबोन!" दोनों चले जाते हैं। रामस्वरूप कुर्सी पर धम्म से बैठ जाते हैं। उमा सिसकने लगती है। प्रेमा घबराकर आती है। ठीक उसी समय रतन मक्खन लेकर आता है और परदा गिर जाता है।
'रीढ़ की हड्डी' एकांकी स्त्री-शिक्षा, आत्मसम्मान और विवाह-प्रथा की कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य है। लेखक दिखाते हैं कि समाज लड़कियों को "बिक्री की वस्तु" मानता है और शिक्षित, सशक्त लड़की को "नखरेबाज" समझता है। उमा के माध्यम से संदेश दिया गया है कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि आत्मबल, स्वतंत्र विचार और नैतिक साहस (रीढ़ की हड्डी) पैदा करती है।
मुख्य संदेश:
| 1. लेखक का परिचय किस प्रकार किया गया है? | ![]() |
| 2. "रीढ़ की हड्डी" पाठ का सार क्या है? | ![]() |
| 3. पाठ में कौन-कौन से पात्र शामिल हैं और उनका क्या महत्व है? | ![]() |
| 4. पाठ में शब्द-संपदा का क्या महत्व है? | ![]() |
| 5. "रीढ़ की हड्डी" पाठ का केंद्रीय संदेश क्या है? | ![]() |