इस पाठ के लेखक कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' हैं। इनका जन्म सन् 1906 ई. में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था। इनका मुख्य कार्यक्षेत्र पत्रकारिता था। उन्होंने नया जीवन और विकास पत्रों का संपादन किया। प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम एवं सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले अनेक निबंध लिखे। अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
उनके संस्मरणात्मक निबंध-संग्रह - दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकराई, बाजे पायलिया के घुँघरू, जिंदगी लहलहाई, क्षण बोले कण मुसकाए, कारवाँ आगे बढ़े, माटी हो गई सोना, महके आँगन चहके द्वार और आकाश के तारे धरती के फूल - उनके गहन मानवतावादी दृष्टिकोण और जीवन-दर्शन के परिचायक हैं। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।
'मैं और मेरा देश' कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा लिखा गया एक विचारपूर्ण निबंध है जो व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित करता है।
लेखक निबंध का आरंभ अपने जीवन की पूर्णता के भाव से करता है। वह कहता है कि वह अपने घर में जन्मा, पड़ोस में खेला, नगर में घूमा और इस प्रकार एक पूर्ण मनुष्य बन गया। उसे लगता था कि उसकी मनुष्यता में कोई अपूर्णता नहीं रही।
परंतु एक दिन उस आनंद की दीवार में दरार पड़ गई जब उन्हें स्वर्गीय पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय के एक अनुभव का पता चला। लाला जी ने विश्व भ्रमण के बाद एक ही वाक्य में कहा - "मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।" इस एक वाक्य ने लेखक की पूर्णता को अपूर्णता में बदल दिया।
इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि व्यक्ति और देश एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हैं। देश का सम्मान ही नागरिक का सम्मान है। लेखक फिर यह प्रश्न उठाता है कि एक साधारण नागरिक देश के लिए क्या कर सकता है। इसके उत्तर में वह कहता है कि युद्ध में केवल लड़ने वाले नहीं, जय बोलने वाले भी महत्वपूर्ण होते हैं। एक साधारण नागरिक भी अपने देश के सम्मान की रक्षा में बहुत कुछ कर सकता है।
इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक दो घटनाएँ सुनाता है। पहली घटना में स्वामी रामतीर्थ जापान में रेल यात्रा के दौरान फल न मिलने पर कह देते हैं कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। एक जापानी युवक यह सुनकर दौड़ा और ताजे फल भेंट करते हुए कहा - बस एक मूल्य देना है कि आप अपने देश में यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इस प्रकार उस युवक ने अपने देश का गौरव बढ़ाया।
दूसरी घटना में दूसरे देश का एक विद्यार्थी जापान की सरकारी पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुरा लेता है। पकड़े जाने पर उसे न केवल देश से निकाला गया, बल्कि पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया गया कि उस देश का कोई नागरिक यहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। एक व्यक्ति के कृत्य से पूरे देश को लांछित होना पड़ा।
लेखक आगे कमालपाशा और एक देहाती बूढ़े किसान की घटना सुनाता है, जहाँ बूढ़े ने तीस मील पैदल चलकर राष्ट्रपति को मिट्टी की हँडिया में पाव-भर शहद उपहार में दिया। कमालपाशा ने उसे सर्वोत्तम उपहार माना क्योंकि उसमें हृदय का शुद्ध प्यार था।
अंत में लेखक देश के लिए दो आवश्यकताएँ बताता है - शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। देश के नागरिक को चाहिए कि वह न कोई ऐसा काम करे जिससे देश की शक्ति को क्षति पहुँचे और न ऐसा काम करे जिससे देश की संस्कृति और सौंदर्य को आघात लगे। देश की उच्चता और हीनता की कसौटी है - निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संचित | इकट्ठा किया हुआ, जमा किया हुआ |
| मानस | मन, चित्त, मन से उत्पन्न |
| तेजस्वी | तेजवाला, प्रतापी, शक्तिशाली, प्रभावशाली |
| ठसक | चाल-ढाल का बनावटीपन, ऐंठ, शान |
| धनिक | धनवान, धनी, स्वामी |
| रसद | अनाज, खाने का सामान, भत्ता, राशन |
| दाद देना | न्यायोचित प्रशंसा करना |
| साक्षी | गवाही, गवाह का बयान |
| लांछित | दोषयुक्त, कलंकित |
| हँडिया | एक प्रकार का मिट्टी का बर्तन |
| सुतली | सन या पटसन के रेशों से बटकर बनाई हुई डोरी |
| चौपाल | खुली या छायी हुई मंडपाकार बैठक जहाँ गाँव के लोग पंचायत करते हों |
| सघन | घना, गझिन, ठोस |
| तरेड़ | दरार |
| ज़ीना | सीढ़ी, सोपान |
| परकीय | दूसरे का, पराया |
| पराधीनता | दूसरे के अधीन होना, गुलामी |
| मुग्ध | मोहित, आनंदित |
| बामाशाह | एक ऐतिहासिक दानी व्यक्ति का नाम |
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