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NCERT Solutions: रैदास के पद

अभ्यास प्रश्नोत्तर

रचना से संवाद - मेरे उत्तर मेरे तर्क (बहुविकल्पीय प्रश्न)

प्रश्न 1. "अब कैसे छूटै राम रट लागी" पंक्ति का भाव है?

(ग) आराध्य का नाम जपना - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि इस पंक्ति में रैदास कह रहे हैं कि प्रभु राम का नाम जपने की जो आदत लग गई है, वह अब छूट नहीं सकती। "रट लागी" का अर्थ है - निरंतर नाम जपते रहना। यह भक्त की आराध्य के प्रति गहरी आसक्ति और प्रेम को दर्शाता है।

प्रश्न 2. "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?

(क) एकाकार और समरूप - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि जब चंदन पानी में घुल जाता है तो दोनों एक हो जाते हैं और चंदन की सुगंध पानी के अंग-अंग में समा जाती है। इसी प्रकार भक्त और आराध्यएकाकार और समरूप हो जाते हैं। दोनों के बीच कोई भेद नहीं रहता।

प्रश्न 3. "तुम दीपक, हम बाती" से रैदास का क्या भाव है?

(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है। - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि जैसे दीपक और बाती मिलकर प्रकाश उत्पन्न करते हैं, वैसे ही भक्त और आराध्य के मिलन से जीवन आलोकित होता है। बाती अपने को जलाकर दीपक को प्रज्वलित रखती है - यह समर्पण का भाव है।

प्रश्न 4. "जो तुम तोरौ राम मैं निहं तोरौ" पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?

(ख) आराध्य से अटूट संबंध - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि रैदास कह रहे हैं कि चाहे राम उनसे संबंध तोड़ लें, वे राम का साथ नहीं छोड़ेंगे। यह भाव आराध्य के प्रति अटूट, एकनिष्ठ प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। भक्त इतना दृढ़ है कि वह स्वयं कभी यह नाता नहीं तोड़ेगा।

प्रश्न 5. "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" पंक्ति से आप क्या समझते हैं?

(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है। - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि रैदास कह रहे हैं कि उन्हें तीर्थ और व्रत की कोई चिंता नहीं, क्योंकि उनका सच्चा आश्रय केवल प्रभु के चरण-कमल हैं। बाह्य साधनों की अपेक्षा आंतरिक भक्ति और आराध्य के चरणों की शरण ही सर्वोपरि है।

प्रश्न 6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?

(क) "जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा" - यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि इस पंक्ति में रैदास कह रहे हैं कि ईश्वर हर जगह विद्यमान है - जहाँ भी जाओ, वहाँ उसी की पूजा होती है। यही सर्वव्यापकता (omnipresence) का भाव है।

अर्थ और भाव

प्रश्न (क): "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।" का अर्थ और भाव स्पष्ट कीजिए।

अर्थ: हे प्रभु! आप बादल हैं और हम मोर हैं। जैसे बादल को देखकर मोर प्रसन्न होकर नाचने लगता है, वैसे ही हम आपको देखकर आनंदित हो उठते हैं। और जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को एकटक निहारता रहता है, वैसे ही हम भी आपकी ओर एकनिष्ठ दृष्टि रखते हैं।

भाव: इस पंक्ति में रैदास ने दो उपमाओं का प्रयोग किया है - मोर-बादल और चकोर-चंद्रमा। दोनों उपमाओं से यह स्पष्ट होता है कि भक्त का प्रेम आराध्य के प्रति स्वाभाविक, तीव्र और एकनिष्ठ है। जैसे मोर की प्रसन्नता और चकोर की एकाग्रता अपने प्रिय के बिना अधूरी है, वैसे ही भक्त का अस्तित्व प्रभु के बिना अधूरा है।

प्रश्न (ख): "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।" का अर्थ और भाव स्पष्ट कीजिए।

अर्थ: हे प्रभु! मुझे तीर्थयात्रा और व्रत-उपवास की कोई चिंता नहीं है। मेरा एकमात्र सहारा और विश्वास आपके चरण-कमल हैं।

भाव: इस पंक्ति में रैदास ने बाह्य धार्मिक आडंबरों जैसे तीर्थयात्रा और व्रत को नकारते हुए आंतरिक भक्ति की महत्ता प्रतिपादित की है। उनके अनुसार सच्ची भक्ति तीर्थ और व्रत में नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण में है। "चरन कमल" रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है जो प्रभु के चरणों की कोमलता और पवित्रता को दर्शाता है।

मेरी समझ मेरे विचार (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. "जो तुम तोरौ राम मैं निहं तोरौ" पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

उत्तर: इस पंक्ति में रैदास ने अपनी अटूट भक्ति और एकनिष्ठ निष्ठा को बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि भले ही राम उनसे संबंध तोड़ लें, वे राम को कभी नहीं छोड़ेंगे। यह भाव इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि रैदास समाज के उस वर्ग से आते थे जिसे तत्कालीन समाज में निम्न माना जाता था। इसके बावजूद उनकी ईश्वर भक्ति में कोई कमी नहीं थी।

इस पंक्ति से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं -

पहली बात यह है कि सच्ची भक्ति में भक्त स्वयं को कभी आराध्य से अलग नहीं करता। दूसरी बात यह है कि इस भाव में एकतरफा प्रेम की शक्ति दिखाई देती है - यानी भक्त को किसी प्रतिदान की आशा नहीं। तीसरी बात यह है कि रैदास का यह भाव उस दृढ़ विश्वास को दर्शाता है जिसमें भक्त को यह पूर्ण आस्था है कि प्रभु उसे कभी नहीं छोड़ेंगे। यह भाव उनकी आत्मा की गहराई से निकला हुआ उद्गार है जो पाठक के हृदय को भी स्पर्श करता है।

प्रश्न 2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तर: रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर आराध्य के चरण-कमल में अटूट विश्वास और आंतरिक भक्ति को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार बाह्य साधनों से नहीं, बल्कि मन, कर्म और वचन - तीनों से प्रभु के प्रति समर्पण ही सच्ची भक्ति है।

हमारे विचार से भक्ति के निम्न आधार हो सकते हैं - सच्चा प्रेम और विश्वास जो किसी दिखावे पर आधारित न हो; मन की शुद्धता और सद्विचार; दूसरों की सेवा जो ईश्वर की उपासना के समान है; ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से जीवन जीना; और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आराध्य पर विश्वास बनाए रखना।

प्रश्न 3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तर: दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को निम्नलिखित प्रतीकों और उपमाओं से व्यक्त किया गया है -

पद (1) में -चंदन और पानी: जैसे चंदन पानी में घुलकर उसे सुगंधित कर देता है, वैसे ही प्रभु भक्त के अंग-अंग में समाए हुए हैं। बादल और मोर: जैसे बादल देखकर मोर आनंदित हो उठता है, वैसे ही भक्त प्रभु को देखकर आनंदित होता है। चंद्रमा और चकोर: जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को एकटक निहारता है, वैसे ही भक्त आराध्य को निहारता है। दीपक और बाती: जैसे बाती दीपक के बिना और दीपक बाती के बिना अधूरा है, वैसे ही भक्त और आराध्य एक-दूसरे के पूरक हैं। मोती और धागा: जैसे मोती धागे में पिरोए जाते हैं और सोने में सुहागा मिलाने से वह और चमकता है, वैसे ही प्रभु भक्त को परिपूर्ण बनाते हैं। स्वामी और दास: भक्त अपने को दास और प्रभु को स्वामी मानकर समर्पण करता है।

पद (2) में -चरण-कमल: प्रभु के चरणों को कमल के समान पवित्र और कोमल बताया गया है। मन, कर्म और वचन से जुड़ाव: भक्त ने पूरी तरह अपने को प्रभु से जोड़ लिया है - विचार, कार्य और वाणी तीनों से।

विधा से संवाद - कविता का सौंदर्य

अनुप्रास अलंकार:"जैसे चितवत ंद कोरा" - यहाँ 'च' वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार हुई है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

उपमा अलंकार:"प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा" - यहाँ 'जैसे' वाचक शब्द से उपमा अलंकार है।

रूपक अलंकार:"तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां" - यहाँ चरण पर कमल का आरोप करके अभेद स्थापित किया गया है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।

कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ (तालिका)

विशेषताएँउदाहरण
अनन्य भक्ति भाव"जो तुम तोरौ राम मैं निहं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।"
सरल और लोकधर्मी भाषा"प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।"
उपमा और तुलना"प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।"
लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता"अब कैसे छूटै राम रट लागी।"
दृढ़ निष्ठा और आस्था"सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।"

विषयों से संवाद

प्रश्न 1. तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर: तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं। उस समय समाज में जाति-भेद और छुआछूत का बोलबाला था। मंदिरों और तीर्थस्थानों में निम्न जाति के लोगों का प्रवेश वर्जित था। रैदास और कबीर जैसे संत निम्न जाति से आते थे, इसलिए बाह्य धार्मिक अनुष्ठानों तक उनकी पहुँच सीमित थी।

इसके कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हो सकते हैं -

पहला, उस युग में धर्म के नाम पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड और आडंबरों का बोलबाला था। पंडित-पुजारी जटिल कर्मकांडों से आम जनता को भ्रमित करते थे। दूसरा, इस्लाम के प्रभाव से एकेश्वरवाद और निराकार भक्ति का विचार समाज में फैल रहा था। तीसरा, रैदास और कबीर ने यह सिद्ध करना चाहा कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए जाति, कर्मकांड या तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं - केवल सच्चा प्रेम और मन की शुद्धता चाहिए। इस प्रकार इन संत कवियों ने सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश देते हुए आंतरिक भक्ति को सर्वोपरि माना।

प्रश्न 2. "सोने मिलत सुहागा" - 'सुहागा' एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। 'सुहागा' का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।

उत्तर: यह प्रश्न विज्ञान के शिक्षक की सहायता से हल करना है। सामान्य जानकारी के आधार पर - सुहागा का रासायनिक नाम सोडियम टेट्राबोरेट (Sodium Tetraborate) है और इसे बोरेक्स (Borax) भी कहते हैं। इसका रासायनिक सूत्र Na₂B₄O₇·10H₂O है। इसका उपयोग सोने-चाँदी की धातुओं को शुद्ध करने और उनकी चमक बढ़ाने में होता है। विस्तृत जानकारी के लिए कृपया अपने विज्ञान के शिक्षक से संपर्क करें।

भाषा से संवाद - व्याकरण की बात

प्रश्न 1. पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढकर लिखिए।

उत्तर:

संज्ञा के उदाहरण:चंदन (पद 1), दीपक (पद 1), तीरथ (पद 2)

सर्वनाम के उदाहरण:हम (पद 1 - "हम पानी"), तुम (पद 1 - "तुम चंदन"), मैं (पद 2 - "मैं निहं तोरौ")

प्रश्न 2. रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों के लिए आप या आपके आस-पास के लोग किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।

पद में प्रयुक्त शब्दप्रचलित/आधुनिक समानार्थी
मोरामोर
चकोराचकोर
बातीबत्ती
रातीरात
सोनेसोना
तीरथतीर्थ
बरतव्रत

सृजन

प्रश्न 1. कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।

यह एक गतिविधि प्रश्न है जो कक्षा में सामूहिक रूप से किया जाना है।

प्रश्न 2. कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।

उत्तर (नमूना संवाद):

भक्त (रैदास): हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं पानी हूँ। जैसे चंदन पानी में घुलकर उसे सुगंधित कर देता है, वैसे ही आप मेरे जीवन में समाए हुए हैं।

आराध्य (प्रभु): रैदास! तुम्हारी भक्ति मुझे भी तुम्हारे पास खींचती है। जैसे बाती दीपक को प्रकाशित करती है, वैसे ही तुम्हारी भक्ति मेरे अस्तित्व को सार्थक करती है।

भक्त: प्रभु! मैं तो आपका दास हूँ। जैसे मोती धागे में पिरोए बिना बिखर जाता है, वैसे ही मैं आपके बिना अधूरा हूँ।

आराध्य: रैदास! यही सच्ची भक्ति है। तुम जाति और समाज की सीमाओं से परे मुझसे जुड़े हो - यह प्रेम ही सच्चा धर्म है।

प्रश्न 3. "जो तुम तोरौ राम मैं निहं तोरौ" पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।

उत्तर (नमूना लघुकथा):

अटूट मित्रता

राम और श्याम बचपन के घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन किसी गलतफहमी के कारण राम ने श्याम से बात करना बंद कर दिया। श्याम बार-बार राम के पास जाता, उसे मनाने की कोशिश करता, लेकिन राम ने नाराज होकर कह दिया, "मैं तुमसे दोस्ती तोड़ता हूँ।"

श्याम ने धीरे से कहा, "मित्र! तुम मुझसे दोस्ती तोड़ सकते हो, पर मैं नहीं तोड़ूँगा। सच्ची दोस्ती वह है जो मुसीबत में भी नहीं टूटती।"

महीनों बाद राम गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। पूरे शहर में उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था। तभी श्याम आया और बिना किसी शिकायत के उसकी सेवा की। राम की आँखें भर आईं। उसने कहा, "मित्र! तुमने साबित कर दिया कि सच्चा मित्र वही है जो टूटने पर भी जुड़ा रहे।"

इसीलिए कहते हैं - जो तुम तोरो, मैं नहीं तोरूँ - यही अटूट मित्रता की असली पहचान है।

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FAQs on NCERT Solutions: रैदास के पद

1. Who was Raidas and what was his contribution to literature?
Ans. Raidas, also known as Ravidas, was a prominent saint and poet in the 15th century, associated with the Bhakti movement in India. He is celebrated for his devotional hymns and poems that express deep spirituality and social reform, advocating for the equality of all individuals regardless of caste or creed. His verses often emphasise the importance of love, devotion to God, and the rejection of social discrimination.
2. What themes are commonly found in Raidas's poetry?
Ans. The poetry of Raidas encompasses themes of love for God, the unity of all beings, and the importance of personal experience in spirituality. He often critiques social injustices, particularly caste discrimination, and emphasises the need for equality and brotherhood among all people. His verses reflect a deep yearning for divine connection and the transformative power of love and faith.
3. How did Raidas's teachings influence society during his time?
Ans. Raidas's teachings played a significant role in challenging the rigid caste system prevalent in society during his era. By promoting the idea of equality and spiritual connection beyond social hierarchies, he inspired many followers to seek a direct relationship with the divine, undisturbed by societal norms. His influence contributed to the broader Bhakti movement, which sought to reform religious practices and promote inclusivity.
4. In what ways do Raidas's poems reflect his philosophical beliefs?
Ans. Raidas's poems reflect his philosophical beliefs through their emphasis on inner spirituality over external rituals. He advocates for a personal connection with God, suggesting that true devotion comes from the heart rather than through formal religious practices. His poetry often illustrates the idea that divine presence can be experienced in everyday life and that love and humility are essential virtues in the pursuit of spiritual truth.
5. What is the significance of Raidas in contemporary discussions of social justice?
Ans. In contemporary discussions of social justice, Raidas serves as an important figure due to his advocacy for equality and his critique of caste-based discrimination. His teachings resonate with modern movements aimed at promoting social reform and inclusivity, highlighting the relevance of his messages in today's society. Raidas's legacy continues to inspire individuals and groups fighting against social injustice and striving for a more equitable world.
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