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NCERT Solutions: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

अभ्यास - सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर


रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क (बहुविकल्पीय प्रश्न)

प्रश्न 1. "पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥" यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मन:स्थिति को दर्शाती है?(क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता

उत्तर - (ग) भय और शिष्टाचार

तर्क - परशुराम का रौद्र रूप देखकर सभा में उपस्थित राजा भयभीत हो गए। उन्होंने अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय दिया और दंडवत प्रणाम किया। यह भय से उत्पन्न शिष्टाचार था, न कि श्रद्धा या प्रेम से। इसलिए 'भय और शिष्टाचार' सबसे उचित उत्तर है।

प्रश्न 2. "जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।" पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?(क) संवेदनशीलता (ख) शिष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता

उत्तर - (ख) शिष्टता

तर्क - राजा जनक ने परशुराम के क्रोध के बावजूद स्वयं आकर सिर झुकाया और सीता से भी प्रणाम करवाया। यह उनकी शिष्टता और मर्यादापूर्ण व्यवहार को दर्शाता है। परशुराम जैसे क्रोधी ऋषि के सामने भी उन्होंने शालीनता नहीं छोड़ी।

प्रश्न 3. "अति रिस बोले बचन कठोरा।" जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना (ग) शिव-धनुष का खंडित होना (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

उत्तर - (ग) शिव-धनुष का खंडित होना

तर्क - परशुराम शिव-धनुष को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली मानते थे। जब उन्होंने खंडित धनुष देखा तो उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने जनक से पूछा कि इस धनुष को किसने तोड़ा। यही मुख्य कारण था उनके कठोर वचनों का।

प्रश्न 4. राम का कथन "होइहि केउ एक दास तुम्हारा" उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?(क) कूटनीति और चतुराई (ख) विनम्रता और मर्यादा (ग) त्याग और समर्पण (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

उत्तर - (ख) विनम्रता और मर्यादा

तर्क - राम ने परशुराम के क्रोध के सामने स्वयं को उनका दास कहकर अत्यंत विनम्रता का परिचय दिया। उन्होंने अपना परिचय न देकर सभी को बचाने का प्रयास किया। यह उनकी मर्यादापूर्ण और विनम्र स्वभाव की पहचान है।

प्रश्न 5. "सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहिं अपमाने॥" लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था। (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर - (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।

तर्क - लक्ष्मण निर्भय स्वभाव के थे। परशुराम की धमकियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने बचपन में कई धनुष तोड़ने की बात कहकर परशुराम के क्रोध को तर्क से काटा। वे परशुराम की शक्ति को जानते हुए भी उनकी अनावश्यक धमकियों से भयभीत नहीं हुए।


मेरी समझ मेरे विचार (विस्तृत उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. "अरध निमेष कलप सम बीता" पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तर - "अरध निमेष कलप सम बीता" का अर्थ है - आधी पलक झपकने का समय भी एक कल्प (ब्रह्मा के एक दिन) के समान लंबा और भारी लगा। यह पंक्ति सीता की माता सुनयना के संदर्भ में कही गई है।

जब सुनयना ने परशुराम का क्रोधपूर्ण स्वभाव सुना तो उन्हें अपनी पुत्री सीता के भविष्य की चिंता सताने लगी। परशुराम का रौद्र रूप और धमकी भरे वचन सुनकर सभा में भय का वातावरण बन गया था। ऐसे में सीता की माता को यह क्षण बहुत भारी और लंबा प्रतीत हुआ। यहाँ 'अतिशयोक्ति अलंकार' का सुंदर प्रयोग है जिसके माध्यम से एक माँ की व्याकुलता और चिंता को तीव्रता से अभिव्यक्त किया गया है।

प्रश्न 2. "सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहिहिं सब राजा॥" पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर - परशुराम ने कहा कि जिसने शिव-धनुष तोड़ा है वह सभा छोड़कर अलग हो जाए, अन्यथा सभी राजा मारे जाएँगे।

इस चेतावनी का सभा पर निश्चित ही भयावह प्रभाव पड़ा होगा। पाठ में ही स्पष्ट किया गया है - "सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥" अर्थात देवता, मुनि, नाग, नगरवासी, सभी भयभीत थे। राजा इतने डरे हुए थे कि परशुराम के प्रश्न का उत्तर देने का साहस किसी में नहीं था।

कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न भी हुए होंगे, क्योंकि उन्हें लगा कि जो इस धनुष को तोड़ने का दोषी है उसे दंड मिलेगा। सामान्यतः इस चेतावनी ने सभा में दहशत और अनिश्चितता का वातावरण उत्पन्न किया।

प्रश्न 3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का 'विनय' का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के 'तर्क' का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर - राम और लक्ष्मण दोनों की प्रतिक्रियाएँ अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं, परंतु परशुराम के क्रोध को शांत करने के संदर्भ में राम का 'विनय' का मार्ग अधिक उचित और प्रभावी था।

राम ने विनम्रतापूर्वक कहा - "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥" उन्होंने परशुराम को 'नाथ' संबोधित किया और धनुष तोड़ने वाले को उनका दास कहा। यह विनम्रता किसी भी क्रोधित व्यक्ति का मन शांत करने में सहायक होती है।

लक्ष्मण का तर्क भी बौद्धिक दृष्टि से सही था, किंतु व्यंग्य और अपमानजनक लहजे के कारण वह परशुराम के क्रोध को और भड़काता रहा। एक क्रोधी व्यक्ति के सामने तर्क प्रस्तुत करते समय यदि वाणी में व्यंग्य हो तो स्थिति और बिगड़ जाती है।

अंततः राम की विनम्रता और विश्वामित्र के समझाने पर परशुराम का क्रोध शांत हुआ, न कि लक्ष्मण के तर्क से। अतः विनय का मार्ग अधिक व्यावहारिक और प्रभावी है।

प्रश्न 4. 'हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥' श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तर - श्री राम का हर्ष और विषाद से रहित रहना उनके निम्नलिखित गुणों को दर्शाता है -

पहला, धैर्य और स्थिरता - परशुराम के भयावह क्रोध के सामने भी राम विचलित नहीं हुए। उनका मन न प्रसन्न हुआ न दुखी हुआ।

दूसरा, भावनात्मक परिपक्वता - राम परिस्थिति की गंभीरता को समझते थे। उन्होंने न तो उत्तेजना में आकर प्रतिक्रिया की और न ही भय से मौन रहे।

तीसरा, मर्यादापूर्ण आचरण - उन्होंने विनम्रता से स्थिति को संभाला जो एक आदर्श राजकुमार के चरित्र की पहचान है।

अन्य पात्रों की तुलना में - परशुराम क्रोध से भरे हुए थे, लक्ष्मण उत्तेजित होकर व्यंग्य कर रहे थे, राजागण भयभीत थे, सीता की माता चिंतित थीं - किंतु राम एकमात्र ऐसे पात्र हैं जो पूर्णतः संतुलित और शांत रहे। यही उनका 'मर्यादा पुरुषोत्तम' स्वरूप है।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

प्रश्न 1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर - मैं जनक की सभा में अपने आसन पर बैठा था। वातावरण उत्सव जैसा था कि तभी सभा में एक हलचल मच गई। जटा-जूट से युक्त, हाथ में फरसा लिए, रौद्र रूपधारी परशुराम जी प्रवेश कर चुके थे। उनका भयानक वेश देखते ही सभी राजाओं के मन में भय समा गया।

हम सभी ने अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय दिया और दंडवत प्रणाम किया। हमारे पैर थर-थर काँप रहे थे। परशुराम ने खंडित धनुष देखकर जनक से कठोर शब्दों में पूछा कि इसे किसने तोड़ा। जनक चुप रहे।

मन ही मन मैं सोच रहा था कि जो भी इस धनुष को तोड़ने वाला होगा उसे ही दंड मिलेगा, हम तो बच जाएँगे। किंतु जब परशुराम ने कहा कि यदि धनुष तोड़ने वाला सामने नहीं आया तो सभी राजाओं को मारा जाएगा, तब सभी के हृदय में भय और घबराहट भर गई।

फिर दशरथ पुत्र राम ने विनम्रता से कहा कि धनुष तोड़ने वाला आपका दास होगा। लक्ष्मण ने व्यंग्यपूर्ण उत्तर दिए जिससे परशुराम और क्रोधित हो गए। अंततः विश्वामित्र मुनि के समझाने और राम के विनय से परशुराम का क्रोध शांत हुआ और वे चले गए। सारी सभा ने चैन की साँस ली।

प्रश्न 2. "अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥" जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?

उत्तर - यह मनुष्य के स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। जनक के चुप रहने पर कुटिल राजा मन में इसलिए प्रसन्न हुए होंगे क्योंकि -

जब किसी बड़े और शक्तिशाली राजा पर संकट आता है तो उसके प्रतिस्पर्धी या ईर्ष्यालु राजा मन में प्रसन्न होते हैं। उन्हें लगा कि जनक ने सभी राजाओं को आमंत्रित करके स्वयंवर रचा और यह धनुष-खंड की घटना उनके राज्य और प्रतिष्ठा पर संकट लेकर आई है।

इसके अतिरिक्त, कुटिल राजाओं को यह भी प्रतीत हुआ होगा कि परशुराम का क्रोध जनक पर केंद्रित है, इसलिए वे स्वयं सुरक्षित हैं। दूसरों की विपदा पर मन ही मन प्रसन्न होना मनुष्य की स्वार्थी और कुटिल प्रवृत्ति को दर्शाता है।

विधा से संवाद

कविता का सौंदर्य

यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के बालकांड का एक अंश है। इसमें शिव-धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है।

संवादों की विशेषता और उदाहरण

राम की विनम्रता - "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥" राम ने परशुराम को 'नाथ' संबोधित करके अत्यंत विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया। वे शिव-धनुष तोड़ने वाले को परशुराम का दास बता रहे हैं, जो उनकी विनय और मर्यादा का प्रतीक है।

परशुराम का रौद्र रूप - "अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥" / "सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥" परशुराम जनक को 'जड़' कहते हैं और शिव-धनुष तोड़ने वाले को सहस्रबाहु जैसा शत्रु घोषित करते हैं।

लक्ष्मण का प्रत्युत्तर - "बहु धनुहीं तोरींं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥" लक्ष्मण बचपन में अनेक धनुष तोड़ने की बात करके परशुराम के क्रोध को तर्क से काटते हैं।

पौराणिक संदर्भ - "धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसारा॥" परशुराम त्रिपुरारि (शिव) के धनुष की तुलना साधारण धनुष से करने पर क्रोधित होते हैं - पूरा पौराणिक संदर्भ यहाँ आता है।

नाटकीयता - पूरी कविता एक दृश्य-नाट्य की तरह है। प्रत्येक पात्र अपने-अपने भाव व्यक्त करता है - परशुराम क्रोधित, राम शांत, लक्ष्मण व्यंग्यी, जनक भयभीत, राजागण आतंकित।

भाव-पहचान एवं विश्लेषण

भाव/मन:स्थितिसंबंधित पंक्तिसंबंधित पात्रमन:स्थिति का कारण
चिंताबिधि अब सँवरी बात बिगारीसीता की माता सुनयनापुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित
क्रोधअति रिस बोले बचन कठोरापरशुरामशिव-धनुष खंडित देखकर अत्यंत क्रोधित
भयउठे सकल भय बिकल भुआलासभी राजागणपरशुराम का भयानक और रौद्र वेश देखकर
व्यग्रताअरध निमेष कलप सम बीतासीतापरशुराम का क्रोधपूर्ण स्वभाव सुनकर
संयम/विनम्रताहृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरुरामन हर्षित, न दुखी - पूर्ण भावनात्मक संतुलन
ईर्ष्या/कुटिलताकुटिल भूप हरषे मन माहींकुटिल राजागणजनक के संकट में आने पर मन में प्रसन्न

"अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं" - परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित था अथवा विवेकपूर्ण निर्णय? जनक जानते थे कि क्रोधित परशुराम के सामने उत्तर देना और अधिक खतरनाक हो सकता है। अतः उनका मौन एक भयजनित विवेकपूर्ण चुप्पी थी। वे स्थिति को और बिगाड़ना नहीं चाहते थे।

विषयों से संवाद

प्रश्न 1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है?

उत्तर - राम के चरित्र की विशेषताएँ - विनम्रता, मर्यादा, धैर्य और उदारता - आज के जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। हमें इन गुणों का परिचय निम्नलिखित परिस्थितियों में देना पड़ता है -

विद्यालय में जब कोई शिक्षक नाराज हों तो विनम्रतापूर्वक स्थिति स्पष्ट करना। घर में बड़ों से मतभेद होने पर उनसे मर्यादित भाषा में बात करना। मित्रों के बीच विवाद होने पर धैर्य से समाधान निकालना। किसी गलतफहमी की स्थिति में स्वयं को विनम्रता से प्रस्तुत करना। सार्वजनिक जीवन में भी उदात्त और शांत व्यवहार से समाज में आदर और विश्वास प्राप्त होता है।

प्रश्न 2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।

उत्तर - महाभारत में द्रौपदी-स्वयंवर का प्रसंग स्वयंवर प्रथा का एक प्रसिद्ध उदाहरण है। राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। इसमें एक विशेष शर्त रखी गई थी - एक घूमते हुए यंत्र पर लगी मछली की आँख को नीचे रखे जल के प्रतिबिंब को देखकर बाण से बेधना था।

अनेक राजाओं ने प्रयास किया किंतु सफल नहीं हुए। ब्राह्मण वेश में आए अर्जुन ने यह लक्ष्य भेद किया और द्रौपदी ने उनके गले में वरमाला डाली। इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि स्वयंवर में कन्या को अपने वर के चयन का अधिकार था और पराक्रम एवं कौशल को आधार बनाकर वर का चुनाव होता था।

सृजन

प्रश्न 1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मन:स्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।

उत्तर -

सुनयना (माँ, मन ही मन) - सखियाँ कह रही थीं कि यह स्वयंवर शुभ होगा। परंतु यह क्या हो गया! परशुराम जी का क्रोध देखकर हृदय काँप रहा है। हे विधाता, मेरी सीता का क्या होगा?

सीता (आँखों से माँ को देखते हुए) - माँ, मैं देख रही हूँ आपके मन की व्यथा। मेरा मन भी घबराया हुआ है। परंतु राम वहाँ शांत खड़े हैं - उनकी आँखों में अभय है।

सुनयना (धीरे से सीता का हाथ थामते हुए) - बेटी, यह परशुराम जी का स्वभाव सुनकर मेरा हृदय डूब रहा है। एक-एक पल कल्प के समान लग रहा है।

सीता (मन में) - माँ, राम ने जो विनम्रता से कहा - 'नाथ, धनुष तोड़ने वाला आपका दास है' - यह सुनकर मेरा मन कुछ शांत हुआ। जो इतने धैर्य और विनय से बोल सकते हैं, वे मुझे और सबको सुरक्षित रखेंगे।

प्रश्न 2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर - सभा में परशुराम के आने की खबर सुनते ही सीता के मन में चिंता का भाव उत्पन्न हुआ होगा। जब उन्होंने परशुराम का भयानक वेश और क्रोध देखा तो भय भी अनुभव हुआ होगा।

जब लक्ष्मण ने व्यंग्य में कहा - "बहु धनुहीं तोरींं लरिकाईं" - तो सीता के मन में एक ओर गर्व होगा कि उनके होने वाले देवर इतने निर्भय हैं, किंतु साथ ही शंका भी - कहीं यह स्थिति और न बिगड़े।

जब राम ने शांत भाव से विनम्र उत्तर दिया तो सीता के मन में राम के प्रति सम्मान और विश्वास और गहरा हुआ होगा। हँसी भी आई होगी लक्ष्मण की निडरता पर।

अंततः जब परशुराम का क्रोध शांत हुआ तो सीता ने भी राहत की साँस ली होगी। इस पूरी घटना ने सीता को यह विश्वास दिलाया होगा कि राम जैसा धैर्यवान और मर्यादित स्वामी उनके लिए उचित है।

प्रश्न 3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे?

उत्तर - यदि मुझे अपना परिचय देना हो तो मैं इस प्रकार दूँगा -

मेरा नाम [अपना नाम] है। मैं [अपने शहर/गाँव] का निवासी हूँ। मेरे माता-पिता [नाम] जी हैं जिन्होंने मुझे ईमानदारी और परिश्रम का मूल्य सिखाया है। मैं [अपनी कक्षा] का विद्यार्थी हूँ। मुझे पढ़ने, लिखने और [अपनी रुचि] में विशेष रुचि है। मैं मानता हूँ कि सच्चाई, विनम्रता और मेहनत ही जीवन की असली पूँजी है। मेरा लक्ष्य [अपना लक्ष्य] है और मैं उसे प्राप्त करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता हूँ।

परिचय में अपनी वास्तविक विशेषताएँ, मूल्य और लक्ष्य बताना अधिक उचित है न कि केवल बाहरी उपलब्धियों का बखान करना।

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

अलंकार - उदाहरण सहित

विशेषताअर्थउदाहरण (पाठ से)आपका उदाहरण
अनुप्रास अलंकारएक ही वर्ण की बार-बार आवृत्तिअरि करनी करि करिअ लराईकल कूकती कोयल कुंज में
अतिशयोक्ति अलंकारबात को बढ़ा-चढ़ाकर कहनाअरध निमेष कलप सम बीताउसके आँसू नदी बन बहे
रूपक अलंकाररूप का आरोपण करनापद सरोज मेले दोउ भाईमन-मंदिर में राम विराजें

बहुभाषिकता - अवधी शब्द और खड़ी बोली रूप

यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो हिंदी का ही एक रूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है।

अवधी शब्दखड़ी बोली का शब्दपंजाबी में शब्द
कोहीक्रोधीगुस्सैल
वेषुवेषਵੇਸ਼ (वेश)
रिसाइक्रोध करनाਗੁੱਸਾ ਕਰਨਾ
आयसुआज्ञाਹੁਕਮ (हुक्म)
ढोटापुत्र, बेटाਪੁੱਤਰ (पुत्तर)
बिलोकेदेखाਵੇਖਿਆ (वेखिआ)
असीसआशीर्वादਅਸੀਸ (असीस)
बेगिशीघ्र, जल्दीਜਲਦੀ (जल्दी)

लोक में भाषा - लोकोक्तियाँ

शब्दलोकोक्तिअर्थ
मनमन के जीते जीत है, मन के हारे हाराआत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है।
रामराम नाम जपना, पराया माल अपनाकेवल दिखावे की भक्ति से काम नहीं चलता।
राजाराजा की बात और बरसात का कोई ठिकाना नहींशक्तिशाली व्यक्ति का व्यवहार अनिश्चित होता है।
बातबात का धनीवचन का पक्का व्यक्ति।
सिर (सिरु)सिर उठाकर चलनाआत्मसम्मान के साथ जीना।

गद्य-रूप

मूल चौपाई - "नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥"

गद्य-रूप - हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।

दी गई चौपाई का गद्य-रूप - "अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥"

गद्य-रूप - अत्यंत भय के कारण राजा जनक परशुराम के प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे। इधर कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न हो रहे हैं। देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री-पुरुष - सभी के हृदय में गहरा भय और चिंता है।

गतिविधियाँ

गतिविधि 1 - कथन और पात्र

कथनरामलक्ष्मणपरशुरामजनकसीता की माता (सुनयना)
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।



विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।



सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।



इस कारण ये सब राजा आए हैं।



बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।



क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?



कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?



इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!




गतिविधि 2

रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। विद्यार्थी कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत करें।

काव्य-पंक्ति और भाव

पंक्तियाँ -"रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभारा। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसारा॥"

(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?

यदि मैं ये पंक्तियाँ मंच पर बोलता तो मेरे चेहरे पर क्रोध, अभिमान और तीव्र आक्रोश का भाव होता। भौंहें चढ़ी हुईं, आँखें लाल, आवाज़ में कठोरता और गर्जना - ये सब भाव स्वाभाविक रूप से आते। क्योंकि परशुराम एक अपमान का अनुभव कर रहे हैं - उनके प्रिय शिव-धनुष की तुलना साधारण धनुहिया से की जा रही है।

(ख) निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे -

पात्रभाव
परशुरामक्रोध, अभिमान, रौद्रता, आक्रोश
राजा जनकभय, शिष्टता, विवेकपूर्ण संयम
लक्ष्मणनिर्भयता, व्यंग्य, हास्य, साहस
रामशांति, विनम्रता, धैर्य, मर्यादा
सभा में उपस्थित अन्य राजाभय, घबराहट, कुछ में कुटिल प्रसन्नता

भाषा संगम

"अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।"

'धनुष' शब्द के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्द -

कमान (हिंदी); धनु:, चापम् (संस्कृत); धणुख (पंजाबी); कमान/कौस (उर्दू); कमान (कश्मीरी); धनुषु, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामटुं (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिरू (मणिपुरी); धनुष, धनु, कार्मुक (ओड़िआ); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगू); विल् (तमिल); धनुस्सु, विल्लू (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)

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FAQs on NCERT Solutions: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

1. What is the significance of the dialogue between Ram, Lakshman, and Parshuram in the context of the epic Ramayana?
Ans. The dialogue between Ram, Lakshman, and Parshuram is significant as it illustrates the themes of duty, righteousness, and the conflict between different warrior classes. Parshuram, being a Brahmin warrior, challenges Ram, a Kshatriya, on the principles of warfare and dharma. This interaction highlights the moral dilemmas faced by the characters and sets the stage for Ram's adherence to his duties as a prince and warrior.
2. How does the character of Parshuram contribute to the overall narrative of the Ramayana?
Ans. Parshuram's character serves as a representation of the old order of Brahmin warriors who uphold strict codes of honour and duty. His confrontation with Ram not only tests Ram's character but also signifies the transition from old ideals to new ones as embodied by Ram. This clash ultimately reinforces Ram's position as a righteous hero who respects the values of dharma, thus enriching the narrative of the Ramayana.
3. What themes are explored through the dialogue in the Ram-Lakshman-Parshuram conversation?
Ans. The themes explored in the dialogue include the nature of duty (dharma), the concept of power and its rightful use, and the tension between different social classes, namely Brahmins and Kshatriyas. The conversation reflects the moral complexities of adhering to one's commitments while facing challenges from others, particularly those who question one's authority and legitimacy.
4. In what way does the dialogue reflect the cultural values of ancient Indian society?
Ans. The dialogue reflects cultural values such as respect for authority, the importance of dharma, and the significance of lineage and caste in ancient Indian society. The interaction between Ram, Lakshman, and Parshuram showcases the reverence for sages and warriors, as well as the societal expectations placed upon individuals based on their roles and responsibilities within the community.
5. How does the conflict between Ram and Parshuram resolve, and what does it signify?
Ans. The conflict between Ram and Parshuram resolves when Ram demonstrates his inherent virtue and strength, proving himself worthy of his role as a Kshatriya. This resolution signifies the triumph of righteousness and the establishment of Ram as a leader who embodies the ideals of dharma. It marks a pivotal moment in the narrative, illustrating that true strength lies not just in physical prowess but also in moral integrity and adherence to one's duties.
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