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Chapter Notes: झाँसी की रानी

कवयित्री परिचय

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज में ही हुई। वे अपने समय की प्रसिद्ध रचनाकार होने के साथ-साथ एक स्वतंत्रता सेनानी भी थीं, जिसके कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा था। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई।

उनके लेखन में देशप्रेम, स्त्री-केंद्रित विषयों और स्वाधीनता संग्राम के प्रति गहन प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनकी भाषा की सहजता ने उनकी रचनाओं को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - मुकुल, त्रिधारा (कविता संग्रह), बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी संग्रह), कदंब का पेड़, सभा का खेल (बाल साहित्य)। उन्हें कविता संग्रह मुकुल तथा कहानी संग्रह बिखरे मोती के लिए दो बार 'सेकसरिया पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 1948 में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।

पाठ का सार

'झाँसी की रानी' सुभद्रा कुमारी चौहान की बहुत प्रसिद्ध कविता है। यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। इस कविता में रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-वृत्त, उनके संघर्ष और विद्रोह से हमारा ओजपूर्ण साक्षात्कार होता है।

कविता में बताया गया है कि लक्ष्मीबाई का बचपन कानपुर के नाना धुंधूपंत के यहाँ बीता, जो उनकी मुँहबोली बहन 'छबीली' थीं। बचपन से ही उनके खेल वीरतापूर्ण थे - बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उनकी सहेलियाँ थीं। वीर शिवाजी की गाथाएँ उन्हें जबानी याद थीं।

विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं। राजा की असामयिक मृत्यु और निःसंतान होने के कारण अंग्रेजों ने डलहौजी की 'हड़प नीति' के तहत झाँसी पर अधिकार कर लिया। रानी ने अंग्रेजों से विनती की, किंतु उनकी एक न सुनी गई। तब रानी ने तलवार उठाई और अंग्रेजों से युद्ध किया।

कालपी, ग्वालियर के मैदानों में रानी ने वीरता से लड़ाई लड़ी। अंत में घायल होकर वे वीरगति को प्राप्त हुईं। मात्र तेईस वर्ष की आयु में उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। कवयित्री कहती हैं कि रानी का यह बलिदान अविनाशी स्वतंत्रता की चिंगारी बनकर सदा जीवित रहेगा।

संपूर्ण कविता (सरल हिंदी में भावार्थ सहित)

पद 1:सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भूकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

भावार्थ: 1857 की क्रांति के समय राजवंश भी सचेत हो उठे। भारत में स्वतंत्रता की नई ऊर्जा जागी। सभी को अपनी खोई हुई आजादी का महत्व समझ में आ गया और अंग्रेजों को भगाने का दृढ़ निश्चय हुआ।

पद 2:कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

भावार्थ: लक्ष्मीबाई कानपुर के नाना धुंधूपंत की मुँहबोली बहन थीं। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। वे नाना के साथ पढ़ती और खेलती थीं। बचपन से ही हथियार उनके खेल के साथी थे।

पद 3:लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार।

भावार्थ: लक्ष्मीबाई साक्षात लक्ष्मी और दुर्गा की तरह वीरता की प्रतिमूर्ति थीं। उनकी तलवार के वारों को देखकर मराठे भी रोमांचित हो जाते थे। नकली युद्ध, व्यूह रचना, शिकार, किले तोड़ना - ये सब उनके प्रिय खेल थे।

पद 4 (विवाह):हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में।

भावार्थ: उनकी वीरता के अनुरूप ही झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनकी सगाई और विवाह हुआ।

पद 5 (राजा की मृत्यु और विधवा होना):उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं, रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

भावार्थ: सुखमय जीवन जी रही थीं, किंतु भाग्य ने पलटा खाया। राजा की मृत्यु हो गई और रानी विधवा हो गईं। जो हाथ तलवार चलाते थे, उनमें चूड़ियाँ कभी नहीं शोभी।

पद 6 (डलहौजी की हड़प नीति):बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

भावार्थ: राजा की मृत्यु और निःसंतान होने का अवसर पाकर डलहौजी ने झाँसी पर अधिकार कर लिया और अंग्रेजी राज्य स्थापित कर दिया।

पद 7:अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

भावार्थ: अंग्रेज व्यापारी बनकर भारत आए थे, लेकिन अब उन्होंने राजाओं-नवाबों को भी ठुकरा दिया। रानी की विनती भी उन्होंने नहीं सुनी।

पद 8 (विद्रोह का संकल्प):कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।

भावार्थ: गरीबों की झोंपड़ियों में पीड़ा थी, महलों में अपमान था। ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई ने रण-चंडी का आह्वान किया और विद्रोह की ज्वाला जगाई।

पद 9 (युद्ध और वीरगति):रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार। तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार, घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।

भावार्थ: रानी ने कालपी और ग्वालियर तक वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी। घोड़ा गिर गया, चारों ओर शत्रु थे, किंतु रानी डटी रहीं। अंत में घायल होकर सिंहनी की तरह वीरगति को प्राप्त हुईं।

पद 10 (अंतिम):जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी।

भावार्थ: कवयित्री कहती हैं कि हे रानी, तुम्हारा बलिदान हम सदा याद रखेंगे। तुम्हारा त्याग स्वतंत्रता की अमर चेतना को जगाता रहेगा। तुम स्वयं अपनी अमिट निशानी हो।

कठिन शब्दों के अर्थ (शब्द-संपदा)

शब्दअर्थ
फिरंगीअंग्रेज, विलायती
मर्दानी/मर्दानाबहादुर, पुरुषोचित
छबीली/छबीलातेजस्वी, सुंदर, छबिवाली, सजीली
बरछीछोटा भाला
ढालतलवार, भाले आदि के आघात को रोकने का लोहे का बना कछुए की पीठ जैसा एक साधन
गाथाएँ/गाथाकथा, प्रशंसागीत
अवतारउतरना, नीचे आना; किसी देवता या ईश्वर का मनुष्यादि के रूप में जन्म लेना
नानामाता का पिता; अनेक प्रकार के, कई तरह के
दुर्गगढ़, किला, कठिन या तंग रास्ता
सुभटरणकुशल योद्धा
विरुदावलि/विरुदविस्तृत यशोगान, कीर्ति-गाथा
विधिसृष्टि की रचना करने वाला; कार्य करने का ढंग; भाग्य
बिरानी/बिरानापराया
बिसातफैलाव, हैसियत, शक्ति, सामर्थ्य
निपातगिरना, चलाना, फेंकना, पतन, विनाश
बेजारदुखी, ऊबा हुआ
सन्मुखसामने, भिड़ने वाला, अनुकूल
कृतज्ञउपकार मानने वाला, एहसानमंद
अविनाशीनाशरहित, अक्षय, नित्य
मदमाती/मदमातामस्त, मदमत्त
स्मारककिसी की स्मृति-रक्षा के अभिप्राय से संस्थापित संस्था, भवन, स्तंभ आदि
हरबोलाबुंदेलखंड क्षेत्र के लोकगायकों का एक समुदाय
द्वंद्वयुद्ध, संशय, युग्म

पाठ का मुख्य संदेश

'झाँसी की रानी' कविता हमें यह संदेश देती है कि देशभक्ति, साहस और बलिदान की भावना किसी उम्र या लिंग की मोहताज नहीं होती। मात्र तेईस वर्ष की आयु में रानी लक्ष्मीबाई ने जो वीरता और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया, वह युगों-युगों तक प्रेरणा का स्रोत रहेगा। यह कविता हमें यह भी सिखाती है कि जब समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर अन्याय का सामना करते हैं, तो कोई भी शक्ति उन्हें पराजित नहीं कर सकती। रानी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया - उनकी वीरता की कहानी आज भी 'बुंदेले हरबोलों के मुँह' से सुनी जाती है।

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FAQs on Chapter Notes: झाँसी की रानी

1. Who is the author of the poem "झाँसी की रानी"?
Ans. The poem "झाँसी की रानी" is authored by the renowned Hindi poetess, Subhadra Kumari Chauhan, who is celebrated for her contributions to Hindi literature and her patriotic themes.
2. What is the main theme of the poem "झाँसी की रानी"?
Ans. The main theme of the poem "झाँसी की रानी" revolves around the bravery and sacrifices of Rani Lakshmibai, the queen of Jhansi, highlighting her valiant fight against British colonial rule during the First War of Independence in 1857.
3. Can you explain the significance of Rani Lakshmibai in Indian history?
Ans. Rani Lakshmibai is a significant figure in Indian history as she emerged as a symbol of resistance against British imperialism. Her leadership during the First War of Independence and her indomitable spirit inspired many freedom fighters and is remembered as a pivotal moment in the struggle for India's independence.
4. What are the key emotions expressed in the poem?
Ans. The poem expresses emotions of courage, determination, and patriotism. It captures the essence of Rani Lakshmibai's fierce love for her motherland and her unwavering resolve to fight against oppression, making it an inspiring call for bravery in the face of adversity.
5. How does the poetess depict Rani Lakshmibai's character in the poem?
Ans. The poetess depicts Rani Lakshmibai as a strong and fearless warrior, emphasizing her leadership qualities and her willingness to sacrifice everything for the sake of her kingdom and people. Through vivid imagery and powerful language, the poetess portrays her as a heroic figure who embodies the spirit of resistance and valor.
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